विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान) -
गुरुवार, 27 जुलाई 2023
कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ
शुक्रवार, 9 जून 2023
क्या उत्तर देंगे?
*
अपने समाज में अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का और उसे अभिव्यक्त करने वाले सांस्कृतिक चिह्नों को धारण करने का कल्चर है क्या आप लोगों में ?
आपकी विवाहित महिलाओं ने माथे पर पल्लू तो छोड़िये, साड़ी पहनना तक छोड़ दिया...किसने रोका है उन्हें?
तिलक बिंदी तो आपकी पहचान हुआ करती थी न...कोरा मस्तक और सुने कपाल को तो आप अशुभ, अमंगल का और शोकाकुल होने का चिह्न मानते थे न...आपने घर से निकलने से पहले तिलक लगाना तो छोड़ा ही, आपकी महिलाओं ने भी आधुनिकता और फैशन के चक्कर में और फारवर्ड दिखने की होड़ में माथे पर बिंदी लगाना क्यों छोड़ दिया?
आप लोगो ने नामकरण, विवाह, सगाई जैसे संस्कारों को दिखावे की लज्जा विहीन फूहड़ रस्मों में और जन्म दिवस, वर्षगांठ जैसे अवसरों को बर्थ-डे और एनिवर्सरी फंक्शंस में बदल दिया तो क्या यह हमारी त्रुटि है?
हमारे यहां बच्चा जब चलना सीखता है तो बाप की उंगलियां पकड़ कर इबादत के लिए जाता है और जीवन भर इबादत को अपना फर्ज़ समझता है....
आप लोगों ने तो स्वयं ही मंदिरों की ओर देखना छोड़ दिया, जाते भी केवल तभी हो जब भगवान से कुछ मांगना हो अथवा किसी संकट से छुटकारा पाना हो...
अब यदि आपके बच्चे ये सब नहीं जानते कि मंदिर में क्यों जाना है, वहाँ जाकर क्या करना है और ईश्वर की उपासना उनका कर्तव्य है....तो क्या ये सब हमारा दोष है?
आप के बच्चे कॉन्वेंट से पढ़ने के बाद पोयम सुनाते थे तो आपका सर ऊंचा होता था !
होना तो यह चाहिये था कि वे बच्चे भगवद्गीता के चार श्लोक कंठस्थ कर सुनाते तो आपको गर्व, होता!
इसके उलट जब आज वो नहीं सुना पाते तो ना तो आपके मन में इस बात की कोई ग्लानि है, ना ही इस बात पर आपको कोई खेद है!
हमारे घरों में किसी बाप का सिर तब शर्म से झुक जाता है जब उसका बच्चा रिश्तेदारों के सामने कोई दुआ नहीं सुना पाता!....
हमारे घरों में बच्चा बोलना सीखता है तो हम सिखाते हैं कि सलाम करना सीखो बड़ों से, आप लोगों ने प्रणाम और नमस्कार को हैलो हाय से बदल दिया...तो इसके दोषी क्या हम हैं?
हमारे मजहब का लड़का कॉन्वेंट से आकर भी उर्दू अरबी सीख लेता है और हमारी धार्मिक पुस्तक पढ़ने बैठ जाता है!...
और आपका बच्चा न रामायण पढ़ता है और ना ही गीता....उसे संस्कृत तो छोड़िये, शुद्ध हिंदी भी ठीक से नहीं आती क्या यह भी हमारी त्रुटि है ?
आपके पास तो सब कुछ था-संस्कृति, इतिहास, परंपराएं! आपने उन सब को तथाकथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में त्याग दिया और हमने नहीं त्यागा बस इतना ही भेद है!....
आप लोग ही तो पीछा छुड़ाएं बैठे हैं अपनी जड़ों से! हम ने अपनी जड़ें ना तो कल छोड़ी थी और ना ही आज छोड़ने को राजी हैं!
आप लोगों को तो स्वयं ही तिलक, जनेऊ, शिखा आदि से और आपकी महिलाओं को भी माथे पर बिंदी, हाथ में चूड़ी और गले में मंगलसूत्र-इन सब से लज्जा आने लगी, इन्हें धारण करना अनावश्यक लगने लगा और गर्व के साथ खुलकर अपनी पहचान प्रदर्शित करने में संकोच होने लग गया!...
तथाकथित आधुनिकता के नाम पर आप लोगों ने स्वयं ही अपने रीति रिवाज, अपनी परंपराएं, अपने संस्कार, अपनी भाषा, अपना पहनावा-ये सब कुछ पिछड़ापन समझकर त्याग दिया!
आज इतने वर्षों बाद आप लोगों की नींद खुली है तो आप अपने ही समाज के दूसरे लोगों को अपनी जड़ों से जुड़ने के लिये कहते फिर रहे हैं!
अपनी पहचान के संरक्षण हेतु जागृत रहने की भावना किसी भी सजीव समाज के लोगों के मन में स्वत:स्फूर्त होनी चाहिये, उसके लिये आपको अपने ही लोगों को कहना पड़ रहा है.... विचार कीजिये कि यह कितनी बड़ी विडंबना है!
यह भी विचार कीजिये कि अपनी संस्कृति के लुप्त हो जाने का भय आता कहां से है और असुरक्षा की भावना का वास्तविक कारण क्या है?
आपकी समस्या यह है कि आप अपने समाज को तो जागा हुआ देखना चाहते हैं किंतु ऐसा चाहते समय आप स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने वाला आचरण नहीं करते, जैसे बन गए हैं वैसे ही बने रहते हैं...
आप स्वयं अपनी जड़ों से जुड़े हुए हो, ऐसा दूसरों को आप में दिखता नहीं है,,
और इसीलिये आपके अपने समाज में तो छोड़िये, आपके परिवार में भी कोई आपकी सुनता नहीं,, ठीक इसी प्रकार आपके समाज में अन्य सब लोग भी ऐसा ही आपके जैसा डबल स्टैंडर्ड वाला हाइपोक्रिटिकल व्यवहार (शाब्दिक पाखंड) करते हैं!
इसीलिये आपके समाज में कोई भी किसी की नहीं सुनता!... क्या यह हमारी त्रुटि है?
दशकों से अपनी हिंदू पहचान को मिटा देने का कार्य आप स्वयं ही एक दूसरे से अधिक बढ़-चढ़ करते रहे,,
और आज भी ठीक वैसा ही कर रहे हैं ...
परंतु हम अपनी पहचान आज तक भी वैसे ही बनाए रखने में सफल रहे हैं, तो हमें देखकर आपको बुरा लगता है!
हमसे ईर्ष्या होती है हमसे घृणा करने लगते हैं आप अपनी संस्कृति और परम्पराओं को नहीं संभाल पाए तो अपनी लापरवाही और विफलता का गुस्सा हमारी जड़ों को काट कर क्यों निकालना चाहते हैं?
दूसरों को देखकर विचलित होने के स्थान पर आवश्यकता ये सीखने की है कि कैसे अपने संस्कारों में निष्ठा रखी जाती है, कैसे उन पर गर्व किया जाता है, कैसे तत्परता से उन्हें सहेज कर उनका संरक्षण किया जाता है!
अपनी पहचान को आप खुलकर प्रदर्शित कीजिये, इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है.... किंतु अपनी संस्कृति तो आपको बचानी नहीं है, उसे अपने हाथों स्वयं ही नष्ट करने पर तुले हुए हो!
अपने समाज में अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का और उसे अभिव्यक्त करने वाले सांस्कृतिक चिह्नों को धारण करने का कल्चर तो बनाइए पहले!
(- जी हाँ, किसी ने कहा है यह, मैं तो केवल सामने रख रही हूँ.- प्रतिभा सक्सेना.)
शनिवार, 3 जून 2023
तृप्ति की क्वालिटी -
*
पहले एक पहेली बूझिये फिर आगे की बात -
'कोठे से उतरीं, बरोठे में फूली खड़ीं.'
इन फूलनेवाली महोदया का तो कहना ही क्या!(इन पर एक पूरा पैराग्राफ़ लिखना अभी बाकी है).
बीत गए वे दिन जब घरों में भोजन बनाना जैसे कोई नित्य का आयोजन होता था.किसी विशेष अवसर पर तो अनुष्ठान जैसा. सुरुचि -सावधानी के साथ विधि-विधान से यत्नपूर्वक बनाना और चाव-भाव से खिलाकर तृप्त कर देने का उछाह . न कोई शार्ट-कट , न रेडी मेड साधन,और न कोई जल्दी-पल्दी.पूरे विधान के साथ ,सधी हुई आँच पर पूरे इत्मीनान से पकाना ,कोई हबड़-तबड़ नहीं. कोई कहीं भागा नहीं जा रहा है.- न पकानेवाले न खानेवाले.
पूरे मनोयोग से तैय्यारी और पूरी रुचि से आस्वादन.
संतोष .और प्रशंसा के दो बोल सुनने को मिल जाएँ तो लगता सारा श्रम सार्थक हो गया. वे दिन कब के बीत गये .
परिवार में 6-7 लोग होते ही थे ,आए-गए भी बने रहते थे. और खुराक,आज से कहीं अधिक .अपने से ही देख लें, कितना खा और पचा लेते थे औऱ अब जैसे डर-डर कर खाते हैं ,
हाँ ,तो जैसे रुचिपूर्वक ,इत्भोमीनान से भोजन पकाया जाता था और उतने ही चाव से परोसा-खिलाया जाता था .खाना अब भी घरों में पकता है पर उन दिनों के साथ ही वह भाव, चाव और स्वाद ग़ायब हो गए है.
न वह आयोजन,न वह व्यवस्था ,वह सामग्री ,वे साधन और वे प्रयास भी अब उसके पासंग भर भी नहीं .अब कहाँ चूल्हा, और धुएँ की सोंधी महक ,अब तो गैस की कसैली गंध,नॉब को खोलते -बंद करते प्रायः ही हवा में तैर आती है.सिल-बट्टा कही दिखाई नहीं देता और न जम कर पीसने वाले. पत्थर की सिल पर पिसे उस ताज़े पिसे मसाले की बात ही और थी,जो मौसमी तरकारियों में सिझ कर जो अनुपम स्वाद देता,ये पनीर ,न्यूट्री नगेट और खुम्भी,जैसी माडर्न चीजों की उसके आगे क्या बिसात! पिसे मसाले कहाँ? महरी या नाइन ,हल्दी भी सिल पर पीस कर नारियल की नट्टी में रख देती ,कि दाल में पड़ जाय.बाकी तो खड़े मसालों के साथ सिल पर पिसेगे ही.
वो अरहर की आम पड़ी चूल्हेवाली दाल जिसमें देसी घी में लहसुन-मिर्च का करारा छौंक लगा हो ,उसके आगे म़ॉडर्न करियाँ फीकी पड़ लगती हैं.हमारे घर लौकी के बड़े-बड़े टुकड़े दाल चढ़ाने के साथ ही डाल कर घुला दिये जाते थे ,जिससे दाल में विलक्षण स्वाद का आ जाता थ. सिल पर पिसी चटनी की तो बात ही क्या !
आज पिसे मसालों के डिब्बे और दुनिया भर के पैकेट अल्मारी में भऱे हैं, पर उन गिने-चुने मसालोंवाला स्वाद खो गया है.हर चीज़ में टमाटर डालने की रीत नहीं थी,सब अपना एक निराला स्वाद लिये थीं तरकारी का रसा कृत्रिम रूप से गाढ़ा न हो कर मसालों की असली गंध में बसी तरावट वाली तरलता सँजोये रहता था.तरकारियों ,और बटलोईवाली दाल के क्या कहने ,जिसे चूल्हे पर चढाने बाद पहला उबाल उतार फेंकना जरूरी होता था. और लोहे के बड़े चमचे में अंगारों पर रख कर बनाया हुआ,दूर तक गमक फैलाता ,देशी घी का तीखी मिर्चोंवाला करारा छौंक बटलोई मैं छनाक से बंद होता देर तक छुनछुनाता,स्वाद की घोषणा कर देता था.
काँसे की थालियाँ, फूल की कटोरे कटोरियों के साथ चम्मच घर में गिनती के रहते थे .वे लंबे गिलास विस्थापित हो गए. भारी पेंदी की पतीलियाँ और लोहे की कढ़ाइयाँ जाने कहाँ खो गईं . कुकर और पैन उपस्थित हैं.नानस्टिक में दो बूँद तेल से काम चल जायेगा.और देशी घी भी लोगों को नुक्सान करने लगा है,अब तो रिफ़ाइण्ड आयल ,रिफ़ाइण़्ड प्रकृति के अनुकूल पड़ता है.
खाना चलते-फिरते फटाफट बनता है ,प्लेटों में परस कर पेट भरने का पूरा इन्तज़ाम होता है.चम्मचों की कमी नहीं .डिज़ाइनदार ,श्वेत ,झमकती फ़ुल,हाफ़ ,क्वार्टर प्लेटों से टेबल सजा है ,छुरी चम्मच,नैपकिन सब उपस्थित फिर भी जाने क्यों मन वैसा नहीं भरता.
लगता है तृप्ति की क्वालिटी अब बदल गई है.
*
मंगलवार, 22 नवंबर 2022
चलो, आज इस महाद्वीप के बहुरंगी आँगन में..
*
(पृष्ठभूमि में धीरे धीरे प्रकाश बढ रहा है ।एक ओर से कुछ युवक और युवतियाँ - विभिन्न देशों की वेश-भूषा - में धीरे धीरे प्रवेश करते हैं ।
एक युवती -(एक्शन के साथ ) चलो, आज इस महाद्वीप के बहुरंगी आँगन में
जहाँ खड़ी है मानवता भारी चिन्ता ले मन में
संकल्पना विश्व मानव की आशाओं में भर कर !
भारत के सांस्कृतिक दूत से हम आ बसे यहाँ पर !
एक युवक -कितने वर्ष हो गये हमें इस धरती पर रहते भारत के संस्कार और यहाँ का नये प्रकार का जीवन दोनों कैसे मिल रहे हैं।
दूसरा .-कितने देशों के लोग ,कितनी संस्कृतियाँ ,सब मिलजुल कर एक व्यापक मानव संस्कृति की रचना कर रहे हैं।लगता है सारी दुनिया यहाँ हिल-मिल कर रह रही है ।
दू.यु.- हाँ बंधु ,मैंने तो इस देश में ही जन्म लिया ।मुझे लगता है सारी दुनिया मेरा घर है उधर भारत इधर अमेरिका बीच की सारी दुनिया को समेटे ज्ञान-विज्ञान और धर्म-आध्यत्म का समन्वय कर रहे हैं
यु. जैसे पूरव और पश्चिम का मेल हो गया हो ।एक दूसरे को समझ कर और अपना कर दोनों ही पूर्ण होते जा रहे हैं ।
यु. - हमारे वेदों ने यही कहा है -चलते रहो -आगे बढ़ते रहो -शरीर मन और बुद्धि सदा सचेत रहे और नई चीजों को ग्रहण करती हुई नई चेतना से पूर्ण रहे ।
पृ .संगीत- चरैवेति दुहरा, वेदों ने ये ही तो गाया है
सत्य एक है, तू-तू मैं-मैं मिथ्या है माया है ।
यु.. सदा सक्रिय हो रहे बुद्धि बस वही युक्ति अपनाई !
नई रोशनी में विचार की स्वतंत्रता भी चाही .
यु .- सच है , निर्णय को अपना विवेक हो ,प्रखर तर्क वाहन हो ,
धर्म धरा पर सब के सुख औ'मंगल का साधन हो !
नई दिशायें खोजो ,नई विधाओं को स्वीकारो
नये विचारों से रे मानव, जीवन-जगत सँवारो !
(पीछे से दैड़ते हुये कुछ लोग आते हैं ।शोर की आवाजें आ रही हैं ।आनेवाला व्यक्ति दोनों हाथ उठा कर सावधान करता हुआ )
किन्तु, दूसरी ओर कहीं से उठती काली आँधी ,
मानवीयता की सीमायें, बर्बरता ने लाँघी !
इस प्रशान्त सागर से ले अतलान्त महासागर तक ,
उसने अपनी पहुँच बना ली घर औ' चौबारों तक
(बम लेकर ,हथियार लेकर भागते आते लोग आतंकी आवाजें आ रही हैं - ,हम हवाई जहाजों में बम रख देंगं ।तुम सबको मार डालेंगे ।ये स्कूल कालेज ,अस्पताल मंदिर नष्ट कर देंगे ।इस सारी सभ्यता को मटियामेट कर देंगे मंच पर हिंसा का वातावरण इस सारी उसभ्यता को, तुम्हारी उपलब्धियों को मटिया मेट कर देंगे।
(ट्विनटावर्स और ट्रेड लेंटर के ध्वंस का दृष्य उभरता है । )
मानव की जय-यात्रा के वे ऊँचे पैमाने , और शान्ति-प्रतिमाओं के खंडक दानव मनमाने
(पृष्ठभूमि में ट्विन टावर और सेंटर, यानों का उडना बम फटने की आवाज़ें ,टावरों का गिरनाऔर बुद्ध प्रतिमाओ के खण्डन के दृष्य )।
निगल गया उनका जुनून ,जाने कितनो की जाने । क्षिति का उर विदीर्ण करता , भर विश्व-द्रोह की तानें.
टु.- लेकिन ये दुर्दान्त रक्त के प्यासे कब समझे हैं
रूढ़िग्रस्त ये जीव, सड़ रहे मानों पर मरते हैं.
(एक संत सामने आता है और कुछ लोगों को इधऱ उधऱ करता हुआ कहता है -)
एक चेतना सब जीवों में ,लक्ष्य एक सबका है
औरों का उपकार पुण्य ,दुख देना पाप बड़ा है
धरती को कुटुंब मानो रे, धर्म यही बतलाता ,
जीना-मरना यहीं ,हमारा जीवन भर का नाता.
(युवक-युवतियाँ आगे बढ आते हैं -)
एक.- इंसानी दिमाग कुण्ठित कर जोंबी रच डाले हैं
अतिचारो का होता है नर्तन. इनके इंगित पर
भर देते उन्माद कि अपने उल्टे पाठ पढ़ाते,!
मृत्यु ध्वंस की आग लगाते घूम रहे ये पशु-नर !
(पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता की मूर्ति और सत्यमेव जयते का चिह्न उभरता है )
दूसरा - समता ,स्वतंत्रता ,मानव की गरिमा औ' अनुशासन ,
कुछ न चाहिये इन्हें , प्यास है सिर्फ खून की इनको,
सब को दानव बना रहे लो सुनो, जुनूनी भाषण,
(आतंकी नारों और भाषणों की ज़ोर ज़ोर की आवाजें )
संत - सत्य प्रेम के लिये नहीं तृष्णा का पोषण करने ,
तहस-नहस सब करते बम बन कर आते हैं मरने !
युवती - यहाँ चार बस, वहाँ हरम में मिलें बहत्तर हूरें ,
यही धर्म सिखलाते उनको नफ़रत भरते मन में - ।
दूरा युवक -
बुद्धि व्यर्थ है, न्याय भ्रष्ट है, तर्क पाप है जिनको ,
सत्य रुद्ध सब ज्ञान त्याज्य और धर्म ख़ब्त है उनको !
(युवक-युवतियाँ मिलकर अपने हाथ उठा-उठा कर बोलते हैं -)
हम आज़ाद करेंगे जग को ऐसे हत्यारों से
कायर ,पापी ,बर्बरता के ध्वंसक हथियारों से !
संत - कैसा मज़हब,प्रेम नहीं ,औरों से घृणा सिखाये
मानवता से गिरे हुये , औरों को तुच्छ बताये
धर्म नहीं जो द्वेष -दुश्मनी सर्वनाश सिखलाये
जो न शान्ति से जिये कि कोई और न जीने पाये !
एक साथ आ जाओ,धरती का कलंक धो डालो,
बहुत हो गया, रक्तबीज का अब लोहू पी डालो
शान्ति दूत हो तो क्या ,पशुता सहन करे जाओगे
समाधान खोजें मिलजुल कर सारे पक्ष विचारे !
इस जीवन में अर्थ भरें ,इस जग को और सँवारें
नापें सागर की गहराई ,बाँटें सुख-दुख सारे !
--- प्रतिभा सक्सेना
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022
कनक-बिन्दु बिखरे...
*
'कनक-बिन्दु दइ-चारक देखे, सिर धरि जनक सुता सम लेखे'
- तुलसीदास जी ने रामचरित मानस मेंं उल्लेख किया है ,भरत जी ने वन में कुश-किसलय की साथरी पर दो-चार स्वर्णबिन्दु झलकते देखे और उन्हें सीताजी की उपस्थिति का आभास हो गया.
आज घर में मुझे जगह-जगह कनक-बिन्दु बिखरे दिखाई दे रहे हैं..
महाअष्टमी का पर्व है - बहू ने विशेष रूप से भारतीय वेष-भूषा धारण की है . उसने लाल रंग की किरन लगी साड़ी पहनी है. बार्डर में लगी सुनहरी किरन के नन्हें कण जो घर में उसके चलते-फिरते झर गए हैं जगह-जगह दमक जाते हैं. और मेरे मन में तुलसीदास जी की पंक्ति गूँजने लगती है 'कनक-बिन्दु दइ-चारक देखे -भऱत जी ने सीता जी के जड़ाऊ वस्त्रों से झरे ऐसे ही सुनहरे-कण देखें होंगे जो उनका मन श्रद्धा से भऱ गया. सीताजी के वस्त्र सोने की गोटा-किनारी से मण्डित होंगे ,मेरी बहू के कपड़ों में साधरण गोटा और किरन टँकी है .लेकिन उन्हीं से घर झिलमिला उठा है .पूजा के समय सिर ढाँकने पर किरनवाली कोर मुख के चारों ओर सुनहरा आभा-मण्डल निर्मित कर रही है.मैं अभिभूत सी देखती हूँ. फिर अपनी दृष्टि हटा लेती हूँ. पूजा देवी की हो रही है.मेरा ध्यान क्यों बँटा जा रहा है!
मुझे लगता है तुलसीदास जी ने रत्नावली को किरन लगी साड़ी में देखा होगा -तब तो महिलाएं सिर पर पल्ला लिये रहती थीं ,सो किरन के आभामण्डल से सिन्दूर मण्डित मुख दमक रहा होगा,एक तो रत्ना परम सुन्दरी ,ऊपर से सुनहरी द्युति .वैसे भी तुलसीदास जी की रत्ना के प्रति आसक्ति अकारण ही तो नहीं थी,और ऊपर से ऐसा अनोखा शृंगार!
मुझे विश्वास हो चला है भरत जी को भाभी की उपस्थिति का आभास होने के मूल में तुलसी की यही स्मृति रही होगी .
हाँ, तो मैं अपने घर की बात कर रही थी .किरनवाली साड़ी तो बहू ने एक ही दिन पहनी ,लेकिन वे स्वर्ण-बिन्दु
घर में कई दिनों तक दमक भरते रहे!.
*.
सोमवार, 12 सितंबर 2022
एक सूचना.
गुरुवार, 4 अगस्त 2022
'हिन्दू': व्युत्पत्ति के अनुसार -
*
जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो बताया गया था कि जिस प्रकार व्यक्ति जीवन में अपना नामकरण स्वयं नहीं करता ,उसका नाम दूसरे लोगों द्वारा उसे दे दिया जाता है उसी प्रकार यह नाम हिन्दूऔर हिन्दुस्तान हमें दूसरों के द्वारा दिया गया है .
- कि 'हिन्दु' शब्द सिन्धु का एक रूप है -क्योंकि जो लोग उत्तर-पश्चिम से इधर आये थे उन्हें भारत में आने के लिये सिन्धु नदी पार करनी पड़ी . इस पार के प्रदेश को उन लोगों ने सिन्धु के नाम को आधार बना कर नाम दे दिया .लेकिन उनके उच्चारण भिन्न प्रकार के थे जहाँ 'स' ध्वनि 'ह' में परिणत हो जाती थी (वे सप्ताह को हप़्ता ,मास को माह उच्चरित करते थे )उन्होने 'सिन्धु' को 'हिन्दु ' कहना शुरू कर दिया था, परिणाम स्वरूप सिन्धु नदी के इस पार के प्रदेश को हिन्दुस्तान नाम दे दिया.
परंतु वास्तविकता यह है कि 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग , बहुत प्राचीन काल से होता रहा है. भारत के प्राचीन ग्रंथ " वेदों " और " पुराणों " में . हिन्दू ' शब्द का उल्लेख मिलता है.
अतः इसका संबंध प्राचीन, संस्कृत से है, जहाँ यह कथन मिलता है -
" हीनं दुष्यति इति हिन्दूः ।”
अर्थात : जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं ।
यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विच्छेदन करें तो पायेंगे ....
हीन + दू = हीन भावना + से दूर
अर्थात् : जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे , मुक्त रहे , वो हिन्दू है !
"ऋग्वेद" के " बृहस्पति अग्यम् " में 'हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-
“ हिमालयं समारभ्य यावद् इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं
हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।"
अर्थात् : हिमालय से इंदु सरोवर तक , देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं !
केवल " वेद " ही नहीं, बल्कि " शैव " ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं
" हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ।”
अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !
" पारिजातहरणम् " में 'हिन्दू' को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-
”हिनस्ति तपसा पापान्
अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !
" माधव दिग्विजय में भी 'हिन्दू' शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-
“ ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्ढाृंय: ।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ।"
अर्थात : वो जो " ओमकार " को ईश्वरीय धुन माने , कर्मों पर विश्वास करे , गौ-पालक रहे , तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है !
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक " कल्पद्रुम " में भी दोहराया गया है :
" हिनस्तु दुरिताम्''
ऋग्वेद में " (8:2:41) में हिन्दू नाम के एक बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन भी मिलता है.
निष्कर्ष - बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहने वाले , सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू कहलाए.
*