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एक विशेष घटना जिसके फल स्वरूप सृष्टि में अव्यवस्था फैल गई थी
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एक विशेष घटना जिसके फल स्वरूप सृष्टि में अव्यवस्था फैल गई थी
['मोइ दीनों संदेस पिय, अनुज नंद के हाथ।
रतन समुझि जनि पृथक मोहि, जो सुमिरत रघुनाथ।।'
- रत्नावली]
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'कैसी अद्भुत जोड़ी!'
विवाह समय सब ने कहा था कैसी अद्भुत जोड़ी- जैसे वर-कन्या के वेष में स्वयं सीता-राम विराज रहे हों!
लोगों की नज़र लग गई उस युगल पर.
'जड़ चेतन गुन-दोसमय बिस्व कीन्ह करतार..'
विधाता गुण-दोषमयी सृष्टि रचकर अपने प्रयोग करता है. मानव के लिए विज्ञान और आनन्द का विधान तो किया पर सबसे पहले अन्न-प्राणमय देह ज़रूरी कर मनोमय को बीच में डाल दिया.आदमी बेचारा करे तो क्या करे?
मन के उत्पात झेले बिना निस्तार कहाँ!
दो प्रखर व्यक्तित्व संपन्न प्राणी मिलें तो जीवन सामान्य कैसे रह पाये.नियति पहले ही असामान्यता उनके हिस्से में लिख देती है. क्योंकि यहाँ सर्वथा दोषहीन कोई नहीं होता.
और बुद्धि के हंस ने तुरंत विकार परख लिया. रत्नावली की बात तुलसीदास के मन को लग गई. कोई साधारण स्त्री होती तो पति पर उसके कहने का यह प्रभाव न पड़ता, गृहस्थी की गाड़ी ढचर-ढचर करती आगे बढ़ती रहती. जीवन का प्रवाह टकराता-बिछलता बहता रहता. पर यह रत्नावली थी और पति थे तुलसीदास. दोनों एक दूसरे की टक्कर के.कोई किसी से घट कर नहीं - न विचार-व्यवहार में न बुद्धि-विवेक न काव्य-कौशल में .दीनबन्धु पाठक की संस्कारशीला, सुशिक्षित परम रूपवती कन्या.जिसके लिये पिता को तुलसी के सिवा कोई उपयुक्त वर जँचा ही नहीं था.
तुलसीदास लौ़ट आए. पर अब घर, घर कहाँ था.
अचानक कैसा विपर्यय -.एकदम सब कुछ बदल गया.
राजापुर में तुलसी के पिता पं० आत्माराम शुक्ल और पं० जीवाराम शुक्ल दो भाई थे पं.जीवाराम ,के पुत्र थे परम कृष्ण भक्त, अष्टछाप के कवि नंददास.
वहाँ जाकर जब यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे, मनका संताप तीव्र हो उठा. श्राद्ध कर्म संपन्न कर, विरक्त मन से काशी चले आये.
तुलसी के मानस में बार-बार वही शब्द कौंध जाते हैं.
रत्ना ने कहा था राम की कथा कहते हो,मर्यादापुरुष की कथा कहने के लिये, निर्मल प्रेम की महत्ता निरूपित करनेवाले राम के चरित को गुनना आवश्यक है. उसके बिना उन्हें वर्णित करना संभव नहीं.
उन दिनों प्रयाग में माघ मेला चल रहा था। अपने यात्रा-पथ में वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये।साधु-संतों का जमावड़ा लगा था.श्रद्धालु जन कथा-वार्ता ,व्रत-पूजा में समय बिता कर तीर्थराज का पुण्य-लाभ ले रहे थे
गंगा तट पर दिन व्यतीत करते गोस्वामी जी के कानों में एक दिन कहीं से आते हुए राम कथा के स्वर गूंजे.उसी कथा के जो सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी, पर बालपन की अबोधता में गुनने से रह गये थे .चकित हो कर उन्होंने चारों ओर देखा.
आभास हुआ वटवृक्ष के नीचे भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि विराजे हैं, रामकथा का अनुश्रवण चल रहा है. यंत्र-चालित से नयन मूँद आवेष्टित तुलसी सुनते रहे,राम की लीलाओं का साक्षात्कार करते रहे.
फिर अपने आराध्य की जन्म-स्थली जाये बिना तुलसी कैसे रह सकते थे, वे अयोध्या के लिये निकल पड़े.
जीवन की तीर्थयात्रा अनवरत चलती रही .तुलसी अधिकाधिक निर्लिप्त होते गये. आराध्य के चरणांकित किसी स्थान को छोड़ा नहीं उन्होंने .
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इतना उत्कट प्रेम वहन करने के बाद मन का कागज़ कोरा रह कैसे रह सकता है! जीवन-पुस्तक के आगे के पृष्ठ लिखे जाने से पिछले अध्याय रिक्त नहीं होते. आधार से हट कर ऊपरी संरचना कहाँ जमेगी, कहाँ आगे का संभार टिकेगा! तार कहीं न कहीं जुड़ते चलते हैं.
कभी-कभी हृदय में आवेग सा उमड़ता है जो भीतर तक हिला जाता है. कुछ चुभता है, रह-रह कर दंश देता है.
तुलसी रत्ना को कब भूले! बस,रूपान्तरण हो गया. दीनबन्धु-पुत्री की सुरञ्जित साड़ी आवेष्टित काया, हाड़-मांस की नाशवान देह न रह कर जनक-सुता के दिव्य रूप में परिणति पा गई. और उसी के साथ सारा परिवेश सिया-राम मय हो कर दिव्यता से आवरित हो गया.
नवल तन पर सुन्दर साड़ी धारण किये('सोह नवल तन सुन्दर सारी' - राम चरितमानस) जनक-सुता के रूप में उस अवतरण की कान्ति से संपूर्ण मानस दीप्तिमान हो उठा. वन-वन भटकते, वर्षाकाल में 'प्रियाहीन' अकेले मन की व्यथा झेलते राम और उनके विरही मन को अभिव्यक्त करते भुक्तभोगी भक्त तुलसी के मानस के तार जुड़ गये. जीवन-व्यापी वियोग, भक्ति के आवरण में,सिया-राम की अमर कथा का एक मार्मिक अध्याय बन गया.
'जासु कृपा निर्मल मति पावौं,'
यह निर्मल मति उसी अनुकम्पा का प्रतिफल है, जो सारे जग को सिया-राम मय कर तुलसी की वर्णना में विकीरित हो रही है.
क्षणिक मोहावेश में सारी मर्यादायें भूले, तुलसी को धिक्कार कर रत्ना वन्दनीया हो गई.
नहीं, वह कोरी आसक्ति नहीं थी!
चित्त चेत गया और तुलसी ने जीवन के परम उद्देश्य का बोध पा लिया था.
'हम तो पावा प्रेम रस पतनी के उपदेस.'
सचेत मन, दृढ़ निश्चय ले नयी दिशा में प्रवृत्त हो गया -
'रतन, तुम्हें इस बंधन से मुक्त करता हूँ, और मै भी निर्बाध हो प्रस्थान करता हूँ.
सहधर्मिणी, तू भी तप जीवन के कठिन ताप में, कि तन की माटी कंचन हो जाये!'
(क्रमशः)
*
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जिस राह को उतावली में पार
कर तुलसी रत्नावली से मिलने उसके पीहर जा पहुँचे थे, उसी पर ग्लानि-ग्रस्त,
यंत्र-चलित से पग बढ़ाते लौटे जा रहे हैं.
अपने आप से पूछते
हैं- कोरी आसक्ति थी ?
एक दिन उसे नहीं देखा तो बिना सोचे -विचारे
अधीर-आकुल सा दौड़ा चला गया. क्या कहते
होंगे रत्ना के परिवारजन .मेरा तो कोई अपना था ही नहीं जिसकी मर्यादा का सवाल उठता. लोक-व्यवहार का ध्यान नहीं आया जिसे निभाने का अवसर स्थितियों ने कभी दिया नहीं था
विवेकहीन,पापी,
कुमति मैं. कैसा अनर्थ कर डाला, हे राम जी !
सिर झुकाए पग बढ़ाये चले
जा रहे हैं,धोती का छोर फरफराता हवा में उड़ता बार-बार चेहरे पर आ जाता है अपने ही
सोच में लीन , हाथ से समेटते हैं और वैसा ही छोड़ देते हैं.
मन का मंथन
पल भर को थमता नहीं -
जनम का अभागा मैं!
दुर्भाग्य साथ-साथ चलता रहा.सारे संबंध टूटते गये पिता माता ,पालनकर्त्री
धायमाई पुनिया ,सब
काल के ग्रास बन गये.ऐसा दुर्भाग्य साथ लेकर जन्मा कि संसार में प्रवेश करते ही
त्याग दिया गया .संबंधों की डोर आगे बढ़ने के बजाय हर बार कटती रही .
बीते हुए दिन ,उस विपन्न
बचपन को कैसे भूला जा सकता है जब, न खाने का ठिकाना ,न रहने का ठौर.दूसरों की दया पर निर्भर दिन किसी तरह कटते थे,भूख से बिलबिलाते बालक को चार चने भी चार फल सम लगते थे.जरा सी छाछ मिल
जाय तो अहो भाग्य, जैसे अमृत पा लिया हो .उस त्रस्त मनस्थिति
की स्मृति आज भी सिहरा देती है.पता नहीं पूर्व जन्म के किन पातकों का फल मिलता
रहा. कैसी कैसी मानसिक यातना में समय बीत रहा था .
और फिर -
एक दिन माथे पर छाप दिये
एक तेजस्वी संत गाँव में आए . गली में घूमते उन्हें अचानक सामने पा मैं चकित रह
गया था , अभिभूत-सा देखे जा रहा था.
दिपदिपा रहा था चेहरा ,माथे पर तिलक काँधे पर उत्तरीय .
वे सामने आकर खड़े थे .ध्यान से देख रहे थे .बालक सकुचा गया .
तू कौन है रे ?
मैं, रम्बोला.
क्या, रम्बोला
?
हाँ ,सब
रम्बोला कहते हैं.
रामबोला है तू?
मैंने सिर हिलाया.मेरी
दृष्टि जैसे बंध गई हो .
तेरे-माता-पिता?
कोई नहीं मेरा .
जिसका कोई नहीं उसके राम
जी होते हैं.
मेरे मन में शंख-ध्वनि सी गूँज उठी.
किसी राह चलते ने सन्त को सारी सूचनाएँ दे डालीं- दीन अनाथ है, अभुक्त मूल में
जन्मा ,अमंगलकारी बालक ...
वे सुनते रहे, निहारते
रहे. फिर बोले -
मेरे साथ चलेगा?
उन्होंने, मुझसे पूछा था.
कानों ने पहली बार ऐसे आश्वस्तिपूर्ण शब्द सुने . हाँ ,मुझी से पूछ रहे थे वे -
मेरे साथ चलेगा ?
अँधा क्या चाहे -दो आँखें !
अभिभूत मैं , मुख से बोल न फूटा, हृदय उमड़ आया. झुक कर उनके चरण परस लिये.
गुरु ने कहा था जिसका कोई नहीं वह राम का है, उसके सब-कुछ राम जी हैं
कोई संचित पुण्य जागा होगा जो गुरु का संरक्षण पाया. हाथ बढ़ाकर अपना लिया था उन्होंने,चरणों में शरण मिली. जो कुछ भी आज हूँ, उन्हीं की कृपा से. उन्हीं की अनुकम्पा से शास्त्र-ज्ञान पा धन्य हुआ , जीवन का परिष्करण और शुभ संस्कार उनके सान्निध्य में विकसे. उबार लिया उस दीन-हीन भिखमंगे बालक को ,अनगढ़ मृदा-पिंड को सँवार कर सुचारु रूप दे दिया . पेट भरने को घर-घर भीख माँगता, रिरियाता रम्बोला, तुलसीदास में परिणति पा कर श्री राम की कथा वाचन का अधिकार पा गया.
रामकथा से फिर रत्ना की याद आई.
उस ने कहा था राम कथा
सुनाना क्या सहज है?राम के चरित में पैठ कर साक्षात्कार किये बिना कैसे कोई राम को जानेगा.
जानेगा नहीं तो गायेगा कैसे?
कहाँ धीर-मति राम और कहाँ
उद्धत-उतावला तुलसी!
बार-बार पछताते हैं. मन ही
मन स्वयं को धिक्कारते हैं .
सब कुछ भली प्रकार चल रहा
था. जीवन में संतोष की बयार बहने लगी थी. हाँ,अच्छाइयां भी आईं थीं हिस्से
में, सामने आने लगीं थीं.
श्रेष्ठ कुल मिला था पूर्वजों का दुर्लभ दाय, सुगठित काया माता-पिता की देन। गुरु के सान्निध्य में विकसित संस्कारशीलता एवं संयत व्यवहार जिस पर मनोयोग से अर्जित ज्ञान ने सान चढ़ा दी थी। कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था..
भाग्य ने साथ दिया तो दीनबंधु पाठक ने अपनी विदुषी पुत्री के लिये उचित पात्र समझ गृहस्थ जीवन में प्रवेश करा दिया.
जिसे कहीं से अपनत्व न मिला हो उसे सु्न्दर-सुघर पत्नी पा कर जैसे स्वर्ग मिल गया .सोचा था दारुण काल बीत गया ,अब चैन के दिन आये हैं जीवन की सुविधाएँ भोगने का अवसर पाकर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहा था।
रही-सही कसर सुघर,विदुषी पत्नी के सान्निध्य ने पूरी कर दी. पति के रहन-सहन, वेष-भूषा का पूरा ध्यान रखती थी वह. कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके तुलसी का ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था.
समय अपनी गति से बीत रहा था ,सब कुछ सहज सुखपूर्वक जैसे कहीं कोई व्यवधान नहीं हो. सांसारिक जीवन रास आने लगा था.
विधि के लेख के आगे किसकी चली है. अचानक ही विघ्न पड़ गया.
अछोर पछतावा उनके हिस्से में लिख गया.
जनम का अभुक्त दोषी हो जो, किसी से नाता कैसे निभता. भटकन ही जिसका जीवन हो, परिवार का शील-संयम वह क्या जाने
सहज-सन्तुष्ट जीवन मेरे जैसों के लिये कहाँ? घोर अशान्त मन में स्वयं के लिये धिक्कार उठने लगी-मेरी ही मति फिर गई थी.
किसेी को कैसे दोषी कहूँ - जैसी करनी रही, वैसी ही भरनी मिलेगी .
एक लंबी साँस अनायास निकल
गई.
संसार
मेरे लिए वर्जित है.जो भी जुड़ा कोई संबंध नहीं टिका. मेरा दुर्भाग्य कहीं उसे भी न ले डूबे. वह संकट
में पड़े उससे पहले ही मैं चला जाऊं .
दूर
चला जाऊँगा. अब नहीं आऊंगा उसके जीवन में. अपना अधिकर छोड़ता हूँ, रत्नावली जिये, दमके.
मार्ग में पड़े पत्थर से
पाँव टकराया गिरते-गिरते बचे,
सिर उठा कर सामने देखा
हरहराती हुई नदी बह रही थी ,काले बादल
अभी भी आकाश में छाये थे. पर पानी का वेग थम-सा गया था .
जिस घाट से उतरे थे उसी पर
आ कर खड़े हो गये .
किनारे कोई नाव नहीं थी.
इतनी तूफ़ानी रात में नाव लाएगा भी कौन ?
जिस तख़्ते के सहारे नदी
पार की थी ,उसे किनारे की एक शिला से टिका दिया था. वहीं पड़ा था.
चलो यही सही,तुलसी आगे
बढ़े, पकड़ कर अपनी ओर घसीटना चाहा .
अरे, यह क्या?
दृष्टि सचेत हो गई. काहे का
लट्ठा? हाथों में थमी थी अकड़ी हुई मृत देह !
एकदम हड़बड़ा गये तुलसी
पकड़ ढीली हुई, शव छूट कर नीचे ढह गया.
विस्फारित नयन, स्तंभित
से खड़े रह गये .
मुख से निकला - राम,राम !
हे, राम
जी!
(क्रमशः)
हमारी नातिन बड़ी सफ़ाई पसन्द है .
एक बार की बात है मेरा कंघा नहीं मिल रहा था.
वह बोली,'नानी मेरा ले लीजिये .'
'ढूँढ रही हूँ.अभी मिल जायेगा,जायेगा कहाँ !'
' मुझे पता है आप किसी के कंघे से बाल नहीं काढतीं .मेरा बिल्कुल साफ़ रखा है .आपने उस दिन ब्रश से साफ़ किया था ,तब से वैसा ही रखा है. '
'क्यों तुम उससे बाल नहीं काढ़तीं ?'
'मैं तो मम्मी के से काढ़ लेती हूँ , मेरा कंघा हमेशा बिल्कुल साफ़ रखा रहता है.'
सुन कर मैं तो हक्की-बक्की. आगे कुछ सूझा ही नहीं.
अब आप देख लीजिये -
ऐसी होती है सफ़ाई !
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इधर क्लोनिंग के विषय में बहुत कुछ सुनने में आ रहा है .वनस्पतियाँ तो थीं ही अब ,जीव-जन्तुओं पर भी प्रयोग हो रहे हैं और सफलता भी मिल रही है. क्लोनिंग की बात से मन में कुछ उत्सुकता और कुछ शंकायें उत्पन्न होने लगीं .
एक कोशिका से संपूर्ण का निर्माण? शरीर या भौतिक स्वरूप निर्मित हो सकता है लेकिन उसके भीतर जो प्रवृत्तियाँ ,मानसिकता और आत्म तत्व है -उसका व्यक्तित्व और उसकी अपनी अस्मिता - वह भी उस निर्मित शरीर में अपने आप आ जायेंगे ? चेतना के विभिन्न स्तरों में मानव सबसे उच्च स्तर पर है,बुद्धि का विकास और चैतन्य के गहन स्तरों तक (कोशों के हिसाब से देखें तो मानव अन्नमय और प्राणमय कोष से आगे बढ कर मनोमय,विज्ञानमय तक पहुँच रहा है और आनन्दमय कोष भी उसके लिये अछूता नहीं है जब कि पशु जगत तक की सृष्टि निम्न स्तरों तक सीमित है . खनिज ,वनस्पति और पशु इस सीढ़ी के क्रमशः निचले पायदानो पर हैं . जब तक चेतना धुँधली पड़ी है शरीर का यांत्रिक संचालन संभव है ,ऐसे तो मुर्दों को भी संचालित कर ज़ोम्बी बना कर उनसे काम लिया जाता है पर वह उनकी अपनी चेतना नहीं है.
पौराणिक कथाओं में रक्तबीज का प्रकरण आया है -रक्त की एक बूँद से संपूर्ण काया विकसित हो जाती है. वह स्वाभाविक प्राणी नहीं है(उसे क्लोन कहना अनुचित नहीं होगा).किसी विशेष उद्देश्य के लिये उसे विकसित किया गया है ,वह उद्देश्य पूरा होने के बाद उसका कोई भविष्य नहीं .रक्तबीजों में से कोई बच गया हो तो वह मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से संचालित होगा या नहीं ,वह प्रजनन करने में समर्थ है या नहीं , क्या अपनी अस्मिता का भान उसे है, आत्मबोध से संपन्न है,एवं आत्म-विकास का उत्प्रेरण उसमें होता है या नहीं ,ये सारे ,और भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं.
नई सृष्टि प्रक्रिया अपनाने से पहले उत्तरों को खोज लेना -कम से कम मुझे- उचित लगता है।नई सृष्टि रचने से पहले उसकी भावी व्यवस्था पर विचार करना लेना रचयिता का दायित्व बनता है,विशेष रूप से जब बाकी दुनिया उससे प्रभावित होती हो.
एक समाचार(बात पुरानी है ) -
मनस्विनी रत्ना ,जिस सुहाग पर मायके में इठलाती थी,उसकी विलक्षण विद्वत्ता-वाग्मिता का दम भरती थी उसके कथा-वाचन के अर्थ-गांभीर्य पर गर्व करती थी, आदर्शवाद पर फूलती थी,जिसे मान्य-पुरुष मान कर निश्चिंत थी आज वही सारी मर्यादायें तार-तार कर तूफ़ानी रात की इस इस कुबेला, अनाहूत, विचित्र वेष धरे परिवारजनों के विस्मय का केन्द्र बना, सिर झुकाए खड़ा है .
वह चकित-अवाक् जैसे समझ न पा रही हो- यह क्या हो रहा है.
मर्यादाशील बाला पीहर आए पति से किसी के सामने कुछ बात करने, पूछने का तो सोच भी नहीं सकती.
उसे लगा सब की दृष्टियाँ उस पर आ टिकी हैं ,जैसे घड़ों पानी पड़ गया हो . कहाँ जाकर मुँह छिपा ले!
कैसे सामना करूँगी अब ? इस घर ने पाँव पूज कर मान्य का पद दिया जिसे, मान मर्यादा के साथ मुख्य द्वार से प्रवेश कर, अगवानी पा उच्च आसन का अधिकारी था वह इस प्रकार अशोभन वेष में अचानक ,खिड़की से घुस आया है.
प्रारंभिक प्रश्नोत्तरों के बाद ,सबको लगा मार्ग की बाधाओं से त्रस्त ,थकित है पाहुन,थोड़ा एकान्त, थोड़ी विश्रान्ति, थोड़ा सहज होने का समय पा ले.
रत्ना की खिसियाहट भरी भंगिमा देख तुलसी की सारी उत्कंठा हिरन हो चुकी थी .
कुछ देर चुप रह कर बोले - तुम वहाँ नहीं थीं ,इसलिए...
ओह मैं! इस विभ्रमित मानसिकता का कारण मैं! दोष अंततः मेरा ही. पीछे-पीछे दौड़े चले आये. लाज नहीं आई ?कुछ तो विचारते,..क्या सोचेंगे घर के लोग ?
खीझे हुए स्वर एकदम फूट पड़े -
लाज न आई आपको, पीछे दौड़े चले आये , धिक्कार है ऐसे प्रेम को ,
तुलसी सन्न रह गये. उफनते दूध पर जैसे अञ्जलि भर पानी पड़ गया हो, उद्वेग से भर गये अंतर्मन धिक्कार उठा - क्यों चले आए?
हताश भंगिमा लिये वह हतप्रभ मुख रत्ना के अंतर में चुभने लगा,उसने बात को सँभालने का यत्न किया -
इस अस्थि चर्ममय भंगुर देह में जैसी प्रीत है ,यदि श्री राम में होती तो भव-भीतियाँ ही मिट जातीं .
तुलसी का सिर झुका ही रहा. मनस्ताप जाग उठा.
सारी मर्यादायें तोड़ कर धर दीं. क्या कर रहा हूँ - इसका भी भान नहीं रहा. अंतर्मन से धिक्कार उठी .कैसा आवेश कि बिना सोचे-समझे निकल पड़ा.उचित-अनुचित कुछ न विचारा.
जैसे कोई आवेश चढ़ा हो, रत्ना से मिलना है जुनून सा सवार था -रत्ना,रत्ना. बस रत्ना. अविराम रट रत्ना-रत्ना ,न भूख न प्यास .बस तुल गये ,रत्ना के पास चलना है ,कैसे हरहराती जमुना पार की ,कैसे घर में प्रवेश किया आवेग में सब करते गए!
उत्कण्ठा भरे मन से रत्ना के शब्द टकराए- धिक्कार है ऐसे प्रेम को!
एकदम वेग पलट गया .
सोते से जाग उठे. अरे,मैं क्या कर बैठा ,अंतर पश्चाताप से भर गया-
एक ही आघात और आसक्ति विरक्ति बन गई.
और उस एक पल में जनमों के सुप्त संस्कार जाग उठे. एक झटके ने समय की धुन्ध झाड़ दी. स्मृतियों के पट खुल गये.
मन पर वराह मन्दिर का वातावरण छा गया. कर्ण-कुहरों में राम-कथा के बोल समाने लगे.लगा सूकरखेत में गुरु से सुनी रामकथा उच्चरित हो रही है .
नया बोध उदित हुआ .
तब उस बचपन के अचेत मन में जो नहीं जागा था आज अनायास सजग हो गया.
गुरु ने कहा था , जन्म लेते ही जिसके मुख से रुदन का नहीं राम-नाम का स्वर फूटा ,वह राम से दूर कहाँ तक रहेगा!
उस एक पल में गृहस्थ जीवन त्याग, तुलसी वैरागी हो गये.
एक पल ठहरना भी असह्य हो उठा. किसी की ओर देखा नहीं ,चुपचाप घूम कर लौट पड़े.
द्वार खोल निकल गये .
बाहर आ कर चारों ओर देखा. वर्षा थम-सी गई थी ,हवाएं शान्त हो चली थीं .
मोखे की टेक से मृत सर्प की देह नीचे तक लटक आई थी .
मुख से निकला 'हे राम' और वे आगे बढ़ गये.
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(क्रमशः)