बुधवार, 25 जून 2014

कथांश - 7.

कल्चरल नाइट थी वह. छात्र-जीवन का समापन  .
बहुरंगी कार्यक्रम चल रहे थे ,एनाउंसमेंट हो रहे थे, रह-रह कर तालियाँ बज रहीं थीं .
मैं भी आगे की पंक्ति में ,फ़ाइनल के छात्रों के साथ बैठा था .कैंपस इंटरव्यू में जिन्हें जॉब मिल चुके थे ,उनमें से एक मैं भी  .
 जीवन-धारा दूसरी ओर मुड़ने का क्रम, वातावरण में बिदा की गंध ,प्रसन्नता और उदासी का विचित्र सा मिश्रण. जिनका भविष्य निश्चित हो चुका था, उनके मन उमंग से भरे ,एक दूसरे के पते-ठिकाने का लेन-देन चल रहा था. अब  तो
मुझे भी यहाँ से चल देना है .
पहले सीधा माँ के पास ,कुछ दिन रुक कर  नये लगे काम पर.
माँ प्रसन्न होगी ,पुत्र योग्यता सिद्ध कर आजीविका कमाने लगा .
स्टेज पर क्या चल रहा है दिमाग़ रजिस्टर नहीं कर रहा था तभी कान में कुछ शब्द पड़े  - ध्यान उधर ही केन्द्रित हो गया .
एक छात्र था मंच पर , गुरु गंभीर तार-स्वर में शब्द मुखरित हो रहे थे -
'धिक् जीवन जो पाता ही आया है विरोध ...'
सब ओर से ध्यान हट कर उधर ही केन्द्रित हो गया . सुनने लगा -
'धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध '
सुनता रहा ,साथ में जो वक्तव्य चल रहे थे समझता रहा .
पर वे  दो छोटी पंक्तियाँ अंतर्मन पर लिख गईं हों जैसे.
 मेरी ही व्यथा है यह  - गहन मंथन, राम की हताशा का हो, या स्वयं रचनाकार का आत्म-भुक्त , पर यही है मेरा सच - जीवन का अब तक का सारांश .
 बार-बार वही पंक्तियाँ मन में घूमती  हैं -'धिक् जीवन...'
अंतर्मन से धिक्कार उठती है अपने लिए . 
अवरोध और विरोध ही झेलता आया सदा ,कुछ नहीं कर पाया जो चाहा.
 खुल कर बोल नहीं सका कभी . किससे कहूँ -  माँ एकाकी जूझती रही. मेरे लिए ही तो , हाँ और वसु के लिए भी.
जी-जान से यत्न करता हूँ ,कोई कसर नहीं छोड़ता .पर जब फल की आशा बँधती है सब  हाथ से फिसल जाता है .अचानक  कोई  झटका, जैसे निरभ्र आकाश से वज्रपात हो जाए . आशा का महल  टूट कर बिखर जाता है .हत्बुद्ध देखता रह जाता हूँ .


छात्र जीवन के समापन पर यही दो पंक्तियाँ  मन की स्लेट पर लिखे लिए जा रहा हूँ ,सुदूर प्रदेश के किसी  अनजाने स्थल पर ,अजनबियों के बीच पैर जमाने.
एक अध्याय का समापन - माँ की प्रतीक्षा पूरी हुई .पुत्र अपने पाँव खड़ा हो गया.  

जब से वसु का पत्र पढ़ा है ,मन बहुत विचलित है .कार्य क्रम में शामिल होने की बिलकुल इच्छा नहीं थी ,पर भार कर जाऊँ भी कहाँ ! 
सब कुछ कर के क्या मिला ?
मन बार-बार हटाता हूँ ,सिर घूमने लगता है .
सोचना नहीं चाहता ,चाहता हूँ एकदम ब्लैंक हो जाऊँ, बस .
लिखा है , आजकल कुछ अस्वस्थ चल रही हैं ,पहले वहीं जाना है  .बीच का समय वहीं साथ बिताना है .
फिर ज्वाइन करने के बाद , वसु और माँ को अपने पास लाने की व्यवस्थाओं में कुछ समय तो लगेगा.
माँ का बड़ा मान  है वहाँ . उनके स्वच्छ और सादे  परोपकारी जीवन ने सब को प्रभावित किया है .और  सब सबसे बढ़ कर मीता का आसरा था , अब तक  उसका आसरा रहा .पर अब ? अब वहाँ कैसा होगा सोच नहीं पाता .

वहाँ से सबका टिकट कट जाय  वही अच्छा.पर माँ तैयार नहीं होंगी  कहती हैं रिटायरमेंट को कुछ साल रह .गए हैं पूरे कर लूँ .चलो, कुछ समय और सही .अब वे कुछ यात्राएँ करना चाहती है दो जनी और भी उनके साथ हैं, इतने वर्षों का साहचर्य ,साथ में घूमने की इच्छा अब पूरी करेंगी .     
 मैंने  यही चाहता हूँ  शेष जीवन वे निश्चिंत हो कर आराम से रहें.

सोच में खलल पड़ा .मेरा नाम पुकारा जा रहा है .आकाश   स्टेज पर बुला रहा है .मेरा बहुत साथ निभाया है उसने .अपने घर से आया हुआ सामान हमेशा बाँटता रहा ,छात्रावास के  दो सालों में मेरे बहुत निकट आ गया -पर कल उससे कुछ नहीं कहा मैंने .मीता की बात उससे कभी नहीं की थी . डर था लड़कों की छेड़खानियों का सामना न करना पड़े . मैं उतना उद्धत नहीं हो पाता ,बोल्डली फ़ेस नहीं कर पाता .चुप्पा-सा रहा हूँ शुरू से.

आकाश केे साथ कुछ और  लोग शामिल हो गए हैं,' अरे ,आता क्यों नहीं .यों ही छोड़ेंगे नहीं हम तुझे !..
जाए बिना छुटकारा नहीं . 

*

गुरुवार, 12 जून 2014

कथांश - 6 .


*
वसुधा  ,मेरी बहिन - मुझसे पाँच साल छोटी.
एक दिन माँ ने कहा,' अब इसका विवाह हो जाय तो ठीक रहे  .'
मैं चौंक गया- ' इत्ती बड़ी हो गई ?'

मुझे तो कभी बढ़ती दिखाई नहीं दी  .उस ओर मेरा ध्यान ही नहीं था .
'अठारह पार कर गई है . लड़कियाँ बड़ी जल्दी बड़ी हो जाती हैं.'

फिर बोली थीं ,'इसका घर-संसार बसा देख लूँ  तो मुझे निश्चंती हो .'
' इत्ती भी क्या जल्दी ,उसे पढ़ लेने दो .'
' बाप की छाया के बिना बेटी बड़ी बिचारी सी हो जाती है .'
'माँ, ऐसे मत कहो , मेरी बहिन किसी की दया की पात्र नहीं है. तुमने और मैंने  हमेशा  मन रखा है उसका .'
'वह नहीं कह रही बेटा .मैं दुनिया की बात कर रही हूँ .लोग जब पिता की बात करते हैं उस  पर क्या बीतती है.'
पिता की बात ! क्या बीतती है ?हाँ ,जानता हूँ मैं !
तीन-चार साल की थी वह .मालिनी के ताऊ जी से बहुत हिली थी, उन्हें पापा कहने लगी . वो लोग ताऊ को पापाजी जी कहते हैं , और अपने पिता को चाचा . जब भी वे आते  खुश हो  कह उठती  - 'मेले पप्पा आ गए!'
 अकेले भी बैठी होगी तो बोलती रहेगी ,' ये मेले पप्पा की किताब.'
मैंने पूछा- 'कहाँ हैं तेरे पप्पा?'
'वो हैं न जो मूँछें लगाए हैं, इत्ती बली वाली ..'
वे भी तो - कोई बेटी नहीं है न ,तीन बेटे हैं बस .
 कहते हैं,' बट्टो, तू ही तो मेरी बिटिया है.'
गोद में उठा लेते हैं - ऊपर उछाल देते हैं उसे .जब हाथ फैला कर गुपचते हैं वसु खिलखिला कर हँस उठती है .दोनों बाँहें गले में डाल चिपक जाती है.
 
अरे, एक बार तो मुकुन्द से लड़ गई ,उन्हीं के बेटे से .इससे तीन साल बड़ा!
उसने चिढ़ाने को कह दिया पापा तो मेरे हैं ,और सब लोग तो हमारी देखा-देखी कहने लगे.   मेरे बापू को पापा कहती है और तू भी.. .'
'वो मेले पप्पा हैं ..'
'चाहे पूछ ले किसी से ,वो तो मेरे हैं .'
' जाओ ,नहीं पूछती ' खिसिया कर चिल्लाई .'मैं क्यों पूछूँ,मैं तो कहूँगी .'
'कैसा मुँह बना रही है, बिल्ली .'
वह झपटी ,उसने दोनों हाथ पकड़ लिये, 'बोल अब क्या करेगी?'

मैं बढ़ा, दोनों को अलग करने. तब तक वसु ने किचकिचा कर उसके हाथ पर दाँत गड़ा दिये .
'अरे,अरे ,काटना मत!' मैंने उसे खींच कर हटाया.
मुकुन्द के हाथ पर दाँतों के हलके-से निशान उभर आए थे .
 भूल नहीं सकता वसु का वह खिसिआया चेहरा .
 मेरी बहिन आक्रामक स्वभाव की  नहीं है ,उस दिन जाने क्या हो गये था उसे!


फिर वह रोई थी,सिसकियों से हिलती वह छोटी सी  देह मुझे आक्रोश से भरती रही पर मैं कुछ न कर सका था.
 कितने साल बीत गए पर मुकुन्द 'कटखनी' कह कर अब भी चिढ़ा देता है .
बच्चे कितने सरल मन से किसी को अपना लेते हैं .

मैं तो ये भी नहीं कर सकता . किसी को इस प्रकार पुकार नहीं  सकता .मीता के पिता को , उसी के समान बाबूजी कह सकता था ,पर वह नौबत ही कहाँ आई. 
आज तमाम भूली-भटकी बातें मन में घिर आई हैं .
 एक बार छुट्टी में घर आया तो वसु काढ़ा बना रही थी .
'किसकी तबीयत ख़राब है, ' मैंने पूछा ,बोली .'वो उस घर में पापा जी को  ठंड लग गई है .अम्माँवाला काढ़ा बना रही हूँ .'
तब भी एक गहरी सांस खींची थी माँ ने .
 अपने पिता को कभी देखा नहीं था
उसने.अपने चारों ओर दूसरे बच्चों का लाड़-चाव ,  घुमाना ,चीज़ें खरिदवाना ,हाट-बाज़ार ले जाना सब देखती थी .
  एक बार मुझसे पूछा था,' भइया ,अपने पिताजी कहाँ हैं?'
बातों में बहला दिया मैंने . समझ में नहीं आया उससे क्या कहूँ .

ये भी नहीं कह सकता कि वे नहीं हैं..उफ़, क्या-क्या सोच जाता है मन!
कैसे, कहाँ, क्यों? कोई उत्तर नहीं  .उन्होंने माँ को छोड़ दिया ?माँ ने छोड़ दिया ?कुछ भी मुँह से नहीं निकलता . वे कहाँ हैं, क्या करते हैं,कभी आते-जाते हैं किे नहीं ? 

बड़ा मुश्किल है सब  प्रश्नों के उत्तर देना .

सोच था एक दिन उसे पास बैठा कर बात करूँगा .समझाऊँगा - सब को दुनिया में सब-कुछ नहीं मिलता !

इस सच को,जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं मैं  नहीं पचा पाता .मन के भीतर  उठते दुर्वेग  को झेलते, सहज होने का दिखावा कितना कठिन है !
 बच कर भागने को कोई रास्ता नहीं .जाऊँगा भी कहाँ , सब साथ चलेगा.
माँ के सामने भी यही सब आता होगा .उनने क्या सोचा होगा पता नहीं कैसे झेला होगा  . 

वे  कह देती थीं , 'उनकी नौकरी ऐसी है कि मुझे साथ नहीं रख सकते .'
पीछे-पीछे बहुत बातें करते थे लोग पर धीरे-धीरे समझ में आने लगा.माँ के सौजन्य से ,उनके आचार-व्यवहार , और उनकी दृढ़ता का प्रभाव कि
लोग उनसे सहानुभूति रखने लगे  . जो कहते होंगे पीछे कहते होंगे सामने कोई नहीं बोलता.उनका  सादा रहन-सहन और ज़रूरत पड़ने पर  सहायता हेतु सदा तत्परता ,उन पर विश्वास करते हैं सब ,मन से आदर करते हैं. 
*
माँ को  मामा का ही सहारा था .
मामा के तीनों बच्चे प्रायः ही उनके पास आ जाते थे .वे पढ़ाई में उनकी सहायता कर देतीं थीं, उनका कहना था  लोग यह भी देखते हैं कि इनके घर संबंधी-कुटुंबियों का आना-जाना  चलता है या नहीं .तीज-त्योहार खाली न रहें   मामा भी बहिन का मान रखने की कोशिश करते थे .
 बड़े होते-होते वसु ने मामी से बहुत सी बातें जान ली थीं. फिर भी पर मन में एक उत्सुकता , उन्हें देखने की इच्छा , इस संबंध के प्रति एक ललक ,उसके मन से जाती नहीं थी.
 घर हो चाहे बाहर ,पिता की चर्चा उठते ही मेरा व्यवहार असहज हो जाता  .किसी के सामने घर-परिवार की बातें न ,उठें यही मनाता रहता . 
वे हमारी ज़िन्दगी में नहीं हैं ...मुँह से नहीं कह सकता.एक छाया-ग्रह के समान उनका उल्लेख सारी खुशियों को ग्रस लेता है.  

बचपन से बड़ा चुप्पा हो गया था  .सबसे मिलने-जुलने से कतराता था.
 जो बहुत अपने रहे उन्हीं से अपमानित होता रहा अपनी आलोचनाएँ ही सुनता आया . शिकायत भी
किससे करता !
सामने-सामने मेरी हेठी होती  और मैं चुप देखता रहता ,इसके सिवा और चारा भी क्या था साथ के लोग कहाँ के कहाँ पहुँच गए , पीछेवाले आगे निकल गए .और मैं बस जहाँ के तहाँ  !

 क्या कमी रही .कहाँ चूक हुई मुझसे ?
 एक तार  भंग होते ही आगे का सब तार-तार होने लगता है !
जिसे जो कहना था कह गया ,जाने क्या समझते रहे लोग मुझे. मैं जैसा नहीं था .वही दोष झेलता रहा.सामने कोई कहे ,कोई पूछे तो बोलूँ ,पीछे-पीछे बातें बनती रहें ,कानों तक आवाज़ें आती रहें तो किसे जवाब दूँ ?
मेरे कहने को कुछ नहीं .कोई ऑप्शन नहीं मेरे पास !
   *

रविवार, 1 जून 2014

सौ का नोट

*
तब मैं बहुत छोटी थी . बात द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद की1947 से पहले की है , जब 40-50 रुपए महीने की आय में 3-4 बच्चोंवाली गृहस्थी मज़े से चल जाया करती थी.दो रुपये में एक सेर घी मिलता था. जीवन बहुत सीधा-सादा था तब .
घर पर हमें माँ पढ़ाती थीं. उस ज़माने की हाईस्कूल पास थीं वे . प्रायः ही रसोई में बैठा लेतीं और अपने काम करते-करते हमारा काम देखती जातीं. हमारा दिमाग़ इधर-उधर भागा कि फ़ौरन एक चपत रसीद.
अंग्रेज़ी के मीनिंग तो  याद हो जाते ,हिन्दी ,अपनी भाषा ! लिखना-पढ़ना याद करना  कभी मुश्किल नहीं लगा  . पर गणित के सवालों से बड़ी घबराहट लगती थी.
'मन लगा कर करोगे तो कुछ कठिन नहीं लगेगा', उनका कहना था,' और जितने सवाल ठीक आयेंगे हर सवाल पर एक पैसा मिलेगा .'
हिसाब ख़ुद रखना पड़ता था -बाकायदा कापी पर लिख कर.और जब कुछ पैसे इकट्ठे हो जाते तो  वे उधार कर देतीं .कहतीं , 'मेरे संदूक में सौ रुपये का नोट है .तुड़ाऊँगी तब दे दूँगी .'
 उस सौ के नोट ने हमें ऐसा लुभा रखा था कि हम अपने मन को समेट कर पाठ पूरा करने में पूरा ध्यान लगा देते.
उनके संदूक खोलते पर हम वहीं मँडराते ,सौ का नोट निकालें शायद ! पर इत्ती छोटी रकम के लिए इत्ता बड़ा नोट तुड़ाएं . कुछ  रुपये इकट्ठे तो होने दो पहले..'
 इतना भारी नोट यों निकालना ठीक नहीं , बंद कर के रखना पड़ता है..चलते-फिरते कोई देख ले तो?
 मुझसे दो साल छोटा भाई विष्णु और मैं. कितने पैसे इकट्ठे हो गये हिसाब जोड़ कर ही मगन रहते थे .कभी-कभार खुश होने पर कुछ पैसे पकड़ा भी देतीं जिनसे हम लेमनचूस(तब यही कहते थे),और बर्फ़ के गोले खरीद कर खा लेते  . पर हाँ , ठीक-ठीक पूरा हिसाब फ़ौरन लिखना बहुत ज़रूरी था.
हमारी पुरानी कापियाँ-किताबें उन्होंने कभी बेची नहीं .हम अच्छी तरह पास हुए क़ीमत वसूल हो गई (मैथ्स में अंत तक मेरे बढ़िया नंबर आते रहे ).अब यही किताबें किसी ग़रीब बच्चे के काम आएँ . वह हिसाब की कापी भी इधऱ-उधऱ हो गई ,कितने पैसे इकट्ठे हो गये (रुपये भी होने लगे थे), यह भी भूल-भाल गये .
आजकल के बच्चे इतने मूर्ख नहीं होते, और न वैसे बहुमूल्य नोट संदूको में धरे जाते हैं.  अपनी आँखों देखा नहीं कभी , पर माँ की उस मोदमयी  मुद्रा और  सौ के नोट की याद कभी-कभी बहुत आती है.

मंगलवार, 13 मई 2014

कथांश - 5.

उस दिन देखा तो देखता रह गया .
तेरह-चौदह बरस की धूप-छाँही वय .
पड़ोस की  ग़मी में जाने के पहले माँ ने कहा था ,'बेटा, कुंडी मत लगाना .अभी जरा देर में आऊँगी तो पहले दरवाजे के नल पर नहाऊँगी , तब अंदर आऊँगी .
वहीं पीछे वाली रस्सी की अरगनी पर कपड़े टाँग कर वे बाहर निकल गईं .
मैं अंदर कमरे में अपना बस्ता फैलाए बैठा था.
4-5 साल छोटी गुड़िया जैसी बहन ,मेरे आस-पास मँडराती ,पास बैठ कर  कागज़ पर लाइनें खींचती अ -आ करती रहती या साथ लगे घर में खेलने चली जाती .
  तुलसी चौरे के  इधर आँगन में ,माँ चिड़ियों के लिए अन्न के दाने बिखेर देती थीं  ,और वहीं एक कूँड़े में पानी भी .चहचहाट मची रहती  .कुछ कौए भी मुँडेर से उतर आते .मुझे उनका आना अच्छा नहीं लगता.लगता है  पक्षी चेहरा देखकर मनोभाव ताड़ लेते हैं .उनके आते ही गौरैयाँ सहम जाती  .पर मेरे उधर बढ़ते ही कौए और कबूतर उड़ जाते  . गौरैयाँ चोंचें नचाती निश्चिंत चुगती रहती  .अक्सर  पीली चोंचवाली गुरगुचियाँ टहलती दिखाई देतीं,  ये लोग कभी अकेली नहीं आतीं ,झुण्ड में रहने की आदत , जब उतरती  4-6 इकट्ठी और चाँव-चाँव कर आसमान सिर पर उठा लेती  .उनका शोर सुनकर मैं विस्मित हो रहा था तब माँ ने उनके बारे में एक कहानी सुनाई थी - सात  बहनें और सबसे छोटा एक भाई. वह कथा बहुत दिनों कर मन में,कौतुक जगाती घूमती रही थी. 

बहुत देर लगातार पढ़ नहीं पाता मैं.बीच में मन उचटता है .ध्यान इधर-उधर चला जाता है .
 इतने में आवाज़ आई,' मुन्ना !'
 माँ  लौट आईँ थीं ,आँगन के नल पर स्नान करना था उन्हें.
अरगनी पर टँगे तौलिया की ओर इशारा कर रहीं थी - 'बेटे, ज़रा वो अँगौछा पकड़ा दे .'
नहा चुकी थीं, भीगा आँचल देह पर चिपका जा रहा था ,छिपाने के बजाय तन की गरिमा को और उजागर करता हुआ . दो स्वर्ण कलश कस्तूरी आच्छादनों से युक्त !  मुग्ध-सा मैं हाथ बढ़ा कर तौलिया पकड़ा आया . इन्हीं पयोधरों से निसृत दुग्ध-धारा से मेरा रोम-रोम सिंचा है .विभोर मन, अनोखी तृप्ति का बोध लिए कमरे में लौट आया . .मन विचित्र रोमांच से भरा - इसी आँचल का प्रसाद पा कर बड़ा हुआ हूँ .
किताब खुली रही मन  उड़ता रहा .
आज इतना बड़ा हो गया हूँ , समझ पा रहा हूँ कि पुरुष आजीवन इनके मोह से मुक्त क्यों नहीं हो पाता .


चौथी- या पाँचवीं में पढ़ता था मैं, तब भी कभी-कभी माँ के पास जा लेटता था .वक्ष से चिपका लेतीं थीं मुझे .और तब सब-कुछ भूल कर
,तुरंत शान्तिपूर्वक  निद्रालीन हो जाता.
 वे कहती थीं  गमलों में नहीं,धरती के क्रोड़ से उगने दो पौधों को ,उस मूल-माटी से सने ,वे धरा की ऊर्जा को पकड़ कर आकाश में उठते  दिशाओँ में फैलेंगे.गमले की छोटी-सी परिधि में कहाँ वह आकर्षण कि जड़ों को गहरे ,और गहरे खींचे !धरती की धड़कनों से जुड़ कर अधिक चैतन्य रह ,पोषण पाता  अपार ऊर्जा से सिंचेगा . मूल की  पकड़ शाखाओं को संतुलित रख , आकाश में मुक्त-भाव से सिर उठाने की छूट देगी . 

फिर मेरी जड़ों में कोई कतर-ब्योंत  वे कैसे सहन कर पातीं - मैं जो  उनकी  निर्मिति था .
*
अब  भी लगता है वे , सहस्र-सहस्र नेत्रों से मुझे देख रही हैं
 माँ , तुम्हार प्रसाद है यह जीवन , जिसका संस्कार किया है तुमने वही यह मन .तुम दूर नहीं हो. मुझसे दूर कहाँ रह सकती हो ,क्योंकि मैं तुम्हारी संतान हूँ.
पिता को मैं नहीं जानता .मुझे रचनेवाली तुम हो .जैसा तुमने ढाला ढल गया .  
आकाश से झरती ये प्रकाश-किरणें तुम्हारी दृष्टि-विक्षेप है, आशीषमयी प्रफुल्ल दिशाएँ तुम्हारी प्रसन्न मुद्रा ,शीतल-सुगंधित पवन तुम्हारे आँचल का परस. 

स्नेहमयी, शान्तिमयी .माँ तुम सदा-सर्वदा मेरे साथ हो ,मैं अकेला कहाँ !
अकेला नहीं ,पर कोई साथ नहीं दिखता -  मीता की याद आती है .
मन में तीव्र आवेग उठता है कंठ खोल कर आवाज लगाऊँ ,'पारमिता ,ओ पारमिता ,तुम कहाँ हो ?'

अब मेरे लिए वह पहलेवाली मीता नहीं  ,किसी की पत्नी है . पर बान्धवी है  मेरी ,और चिर-दिन  रहेगी!
*
(क्रमशः)

मंगलवार, 6 मई 2014

कथांश - 4 .

4.
उस दिन मैंने मीता से कहा था, 'मेरे नहीं तुम्हारे सही , किसी के पिता की तो छाँह हम पर रहे !'
बाद में देखा  माँ साथवाले कमरे में थीं , कपड़े ले कर बाहर निकल रही थीं .
कुछ देर पहले छत पर देखा उन्हें. ओह, कहीं सुन तो नहीं लिया !
उन्हें कहीं यह न लगे कि पिता की छाँह से वंचित रहने का मुझे पछतावा है 
ओ माँ ,तुम्हारे मन में अपराध बोध न हो कि तुम्हारे कारण हम वंचित रहे.
 केवल एक अनुकूलता के लिए तुम उस अस्वस्थ वातावरण में हमें पलने देतीं.तब जो होता वह क्या ठीक होता?तुमने दुख सहे अपने सुख के लिए नहीं.भविष्य पर किसी का वश नहीं.जो सबसे सही लगा वह करने का परिणाम ग़लत कैसे हो सकता है .  अपने सुख के लिए तो नहीं किया ,अन्याय से समझौता करते-करते तुम, तुम नहीं रहतीं और तब मैं भी जो हूँ, वह नहीं हो पाता.

 पिता  के साथ मैं  बहुत कम रहा था .जो समय मिला उसमें हम दोनों में कभी ताल-मेल नहीं रहा. घर में उनकी आतंकपूर्ण छवि  छाई रहती थी .उन्हें लगता था सब कुछ उनके हिसाब से होना  चाहिए .
मुझे याद है एक बार पिता ने मुझे बहुत मारा था .
वे माँ पर बिगड़ रहे थे. मैं वहीं खड़ा था .जो मुँह में आए वे कहे जा रहे थे  मुझे  बुरा लग रहा था कुछ देर सुनता रहा फिर बोला था ,'तुम बहोत गंदे हो .गाली बकते हो .'
वे आगे बढ़े और मुझे पीट डाला.

मेरे मन में डर बैठ गया था. उनके सामने पड़ने से बचता रहता था.
मुझे नहीं मालूम हम लोगों के लिए  पिता की इतनी बेरुखी क्यों थी .माँ कुछ भी अपने मन से करें उन्हें अनुचित लगता था  .किसी भिखारी को एक मुट्ठी अन्न दे दें तो पिता के वाग्बाण चलने लगते थे .तुम्हीं लोगों के मारे ये लोग कुछ करे-धरे बिना आराम से खाना चाहते हैं .वे सबको फटकार कर भगा देते थे . साधु-संतों से तो उन्हें चिढ़ सी थी.मुस्टंडे बस खाने भर के हैं कोई काम इनके बस का नहीं .तुम औरतें ही इनके दिमाग़ चढ़ाती रहती  हो
मामा-मामी से और लोगों से सुनकर जो जाना उसी से समझने की कोशिश की  .माँ ने कभी कुछ नहीं बताया मुझे . 
दोनों की उम्र में बहुत अधिक अंतर नहीं था पर पिता के मुख की कठोरता और स्वभाव का रूखापन उन्हें उनकी उम्र से बहुत बड़ा दिखाता था.
दोनों साथ होते तो लोगों ने प्रायः भ्रम हो जाता था .
कुछ मनचलों ने एक बार फब्ती कसी थी 'अरे बुड्ढे, हमारे लिए भी तो कुछ छोड़ दे.'
फिर उन्होंने माँ को साथ ले जाना छोड़ दिया था.माँ की सौम्यता और सुरुचि की प्रशंसा कोई करे  उन्हें नहीं भाता था .वे उनके काम में सदा कमियाँ ही निकालते  थे.
उनका कहना था औरत हो ,औरत की तरह रहो ,सिर पर चढ़ने की कोशिश मत करो ,जैसा कहता हूँ वैसा  करो ,
जिसे मैं नहीं चाहता ,तुम नाम मत लेना ,नहीं तो दोष तुम्हारा .साथ मेरे ही रहना है.मेरे हिसाब से चलोगी तो चैन से रहोगी ,पर तुम्हें मेरा साथ रास नहीं आता .अपनी अलग खिचड़ी पकाना चाहती हो .कोई ज़रा सी तारीफ़ कर दे सिर चढ़ जाता है तुम्हारा.  तुम्हारे मारे सब मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं    .. क्या-भाई क्या बहन !तुम हो क्या  .पंख कतरी  चिड़िया स्वच्छंदता कैसे हो सकती है वह तो पिजड़े में ही खुश रहे .अपनी असलियत समझे रहे नहीं तो नोंच डाली जाएगी .
..निरंकुश मत हो ,जैसे कहते हैं  वैसे चलो .हम खुश तो तुम भी खुश .औरत  हो वश में रहो हमारे , ,स्वच्छंद आचरण ?छी-छी ,न घर की रहोगी न घाट की . ढली रहो मेरे साँचे में .
माँ चुप रहती थीं.
एक बार वे मायके में थीं .पिता किसी बात पर उनसे लड़ बैठे  .मामा -मामी को भी घसीट लिया कि वे ही दिमाग़ खराब करते हैं .चढ़ाते रहते हैं .
कहने लगे ,' क्या चाहते हो तुम लोग ? रख लो ,कितने दिन पूरा करोगे ,आखिर में रोती-धोती मेरे दरवाज़े ही आएगी.बच्चे को ले कर जायेगी कहाँ ?
और हम दोनों को वहीं छोड़ कर चले  गए - देखें कितने दिन सँभालते हो .दिमाग़ सही हो जायेगा तो एक दिन तुम्हीं ले कर वहाँ छोड़ने आओगे.'
बात इतनी-सी थी कि माँ के एक रिश्ते दार ने कहा ' दामाद बाबू नहीं आये ?
पिता सामने बैठे थे ,उसने उन्हें पहचाना नहीं और  माँ से पूछ लिया .
माँ ने पिता की ओर देखा
भाई ने कहा ,'ये क्या सामने तो हैं ,पहचान नहीं रहे?'
पर पिता उखड़ गए .
मेरा अपमान करने में  तुम लोगों को मज़ा आता है .माँ को देख कर बोले ',मुझे नीचा दिखाना  तुम्हारी आदत में शुमार है .' 
लाख मनाने की कोशिश की,हम लोगों की कोई चाल नहीं आपको गलत फ़हमी है . माफ़ी  भी माँगी  गई  . पर वे नहीं माने .कह गए,
'अभी तो नहीं ले जाऊँगा ,अब जब रखते न बने तुम्हीं छोड़ कर जाना .'
 माँ से क्या कहा यह मुझे नहीं पता. कुछ संवाद सुने थे पर याद नहीं करना चाहता. माँ ने  कभी किसी को बताया नहीं .
धमकी दे कर चले गए थे वे.

और तब से बस एक बार मिले थे जब मैं सात साल का था .
उन्होंने संदेशा भेजा था कि थे माँ स्कूल की नौकरी छोड़ दें और वापस लौट आएँ.पर माँ इसके लिए तैयार नहीं हुईं.
रिश्तेदारों ने भी समझाने की कोशिशें की - क्यों बच्चों का भविष्य बिगाड़ रही हो ?.बाप के बिना ये क्या कर पाएँगे .इस मास्टरी में क्या रखा है? पति अच्छा कमा रहा है, बैठ कर राज करो .पति-पत्नी में झगड़े तो चलते रहते हैं . कोई घर थोड़े छोड़ देता है .अपना नहीं तो बच्चों के भविष्य का ख़याल करो .
मैं बड़ा हो कर काम पर लग गया तो पता किया था .वे वहाँ नहीं रहते थे .बहुत सी उड़ती हुई बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं थीं.
उस रात माँ को चुपचाप रोते देखा था .मुझ पर क्या बीती थी  मैं ही जानता हूँ .
 ज्यादतियाँ पिता करते रहे ,दण्ड सारे माँ को भुगतने पड़े .

पर  मेरे मन में कोई द्विधा नहीं ,  अच्छी तरह जानता हूँ अपनी माँ को .
अंतरात्मा की पुकार सुनी उन्होंने ,सुख-दुख की चिन्ता नहीं की . जो ठीक हो वह करने का परिणाम ग़लत कैसे हो सकता है ?
 आज मैं जो हूँ ,बस इसलिए कि वे मेरी माँ रहीं .
कोई खोज-बीन करने की ,उनके चरित्र का  प्रमाण-पत्र पाने की कोई इच्छा नहीं, कोयले और हीरे में जो अंतर न कर पाये उससे कोई बहस बेकार है .
माँ ,तुम्हीं से मैंने सीखा कि अनुचित को प्रश्रय देकर आगे बढ़ने का सपना देखना अंतरात्मा से द्रोह है.
 बस तभी एक ज़िद ठान ली थी कि मन गवाही नहीं देगा उससे समझौता नहीं करूँगा,कभी नहीं .
*
(क्रमशः)

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

कथांश -3 .

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नहीं, मीता से मेरा विवाह संभव  नहीं हुआ
इस दुनिया के रास्ते कभी सीधे नहीं चलते  ,एक बात के साथ दूसरी लगी चली आती है .हर कथा के साथ कुछ अवान्तर कथायें आ जुड़ती हैं.फिर  ज़िन्दगी की राह मुख्य मार्ग के बीच  ऐसी अटकती है कि  गली-कूचों में भटक कर  रास्ता ढूँढना पड़ता है
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, हमें लग रहा था अब जीवन सही ढर्रे पर आ गया है .माँ समझ रहीं थीं लड़का लायक निकला , अपवादों की वैतरणी पार हो गई. चार साल मीता मेरी मित्र रही थी ,मेरा घर कॉलेज से बहुत दूर नहीं था .एकाध जब बार नोट्स लेन-देन के क्रम में मेरे घर आई .माँ से उसका खूब ताल-मेल बैठ गया  .
उन्हीं से पता चला  जब चार साल की थी तभी उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी .एक  विधवा बुआ ने साज-सँभाल की थी .उनका कहना मीता के पिता नहीं टालते .
मीता अक्सर ही हमारे घर आ जाती ,माँ की सहायता करती ,कहती ,'माँ से बहुत सीखने को मिलता है .'
कभी-कभी माँ बुलवा लेतीं - उससे कह देना आज मैंने गाजर का हलुआ बनाया है .
अपनी बहन से मेरी माँ की मैत्री जान कर पिता मीता के उनके पास आने में कोई रोक नहीं करते .

मैं कॉलेज से लौटता तो वह हलुआ खाती मिलती .कभी कढ़ी-चावल का स्वाद खींच लाता .वह अपनी महाराजिन का बनाये खाने से ऊबती थी .कहती थी माँ के हाथ में निराला स्वाद है . हो मेरी माँ चाहे कुछ बना दें स्वाद ही अलग होता था -कहते हैं किसी-किसी की उंगलियों में रस होता है कि जो छू लें वह  स्वाद से भर जाता है.
लग रहा था अब जीवन की सारी कमियाँ पूर्ण हो जाएँगी .लेकिन मेरे लिए कुछ भी पाना आसान होता तो बात ही क्या होती.
मेरे पिता बीच में आ खड़े हुए  और जीवन का प्रवाह फिर चक्कर खा गया  .

उसकी बुआ जीवित होतीं तो अपने भाई को अनुकूल कर लेतीं .शादी के दो साल बाद ही विधवा हो जाने पर उन्होंने बहुत कुछ झेला था.उनकी एक बहिन ने पति और ससुरालवालों की प्रतारणा से ऊब कर आत्म-हत्या कर ली थी.  वे माँ की विवशता समझतीं थीं .
बिना माँ की लड़की पर माँ की ममता उमड़ पड़ती थी. छोटी बहन भी दीदी-दीदी कह उसके पीछे लगी रहती .मीता की बुआ से माँ की भेंट मंदिर के उत्सव में हुई .थोड़ा सहेलापा हो गया -वैसे माँ की रिज़र्व रहने की आदत थी किसी से अधिक मेल-जोल नहीं देखा मैंने. 
मैंने कभी नहीं कहा उनसे पर माँ  मेरा मन जानतीं थीं -बहू बनाना चाहती थीं उसे .भरे-पुरे घर की लड़की को हमारे यहाँ  किसी कमी का अनुभव न होगा उन्हें मेरी योग्यता पर पूरा विश्वास था .
  
उसके पिता माँ से मिलने भी आए थे .हमारी पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी पा कर चुपचाप चले गए थे .और बात आगे नहीं बढ़ी
उन्हें जब विदित हुआ माँ पिता से अलग रहती हैं तो उनके विषय में पूछ-ताछ करते रहे  .उन्हें यह गले से उतारना मुश्किल लगा था कि कोई महिला पति अपने आप अलग ,बिलकुल अकेली रहे .और रिश्तेदारों के विषय में भी उन्होंने पड़ताल की थी.
माँ के आने के बाद  सबने आ-आकर समझाया था ,पति का घर छोड़ कर मत जाओ. स्त्री को  हर हालत में सहन करना चाहिये यही उनका कहना  था.आश्वासन देते थे कि वे पिता से बात करेंगे  पर  कोई बीच में पड़ने नहीं आया .सब यही कहते  रहे धीरे-धीरे   समय के साथ सब ठीक हो जाएगा .
नाते-रिश्तेदार हैं बहुत पर  समय पर साथ देने कोई नहीं आया  , अकेली स्त्री से सब  कन्नी काट जाते हैं, सारे इष्ट-मित्र ,और संगी-साथी किनारा कर लेते हैं. उस क्षेत्र के बाहर आने के बाद हमें उनके  परिवार में कैसे गिना जाता.
 रिश्तेदार  कहने को ,मां के सिवा  मुझे कोई नहीं दिखाई देता .मामा हैं पर  उन्हें कौन पूछता है .प्रश्न यही उठता  कि पिता साथ  नहीं तो  क्या कोई चाचा-ताऊ-आदि भी  नहीं परिवार में,  जो साथ खड़ा हो !
 उनके मन में यही आया  कि कुछ कारण तो होगा ही .पति से अलग रह रही अकेली महिला कैसे सम्माननीय हो सकती है !किसी का सहारा लिए बिना दुनिया चलती है कहीं?
और मेरी माँ के लिए जिसके मन में ऐसी भावना  हो उससे समझौता करना मेरे बस बस में नहीं था.
मीता ने मुझसे कहा था उन्हें कहने दो मैं तैयार हूँ . मान  जाएगे धीरे-धीरे ,वे  अनुकूल हो जाएँगे ,मुझे बहुत प्यार करते हैं .
पर मेरे  मन ने गवाही नहीं दी
बिना माँ की बच्ची को पिता ने ही सँभाला था .मीता उनसे बहुत जुड़ी थी.उनका बहुत ध्यान रखती थी .वे दोनों इस प्रकार अलग हों यह मुझे गवारा नहीं हुआ , मीता का मन सदा अपराघ बोध से ग्रस्त रहता कि असहाय पिता को इस हाल में अकेला छोड़ दिया.  घरवालों का विरोध ले कर हमें अपनी गृहस्थी नहीं बसानी.अभी और प्रतीक्षा करें, संभव है उनका मन अनुकूल हो जाय.

मेरे निर्णय को माँ का  मौन समर्थन प्राप्त था.
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(क्रमशः)

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