मंगलवार, 13 मई 2014

कथांश - 5.

उस दिन देखा तो देखता रह गया .
तेरह-चौदह बरस की धूप-छाँही वय .
पड़ोस की  ग़मी में जाने के पहले माँ ने कहा था ,'बेटा, कुंडी मत लगाना .अभी जरा देर में आऊँगी तो पहले दरवाजे के नल पर नहाऊँगी , तब अंदर आऊँगी .
वहीं पीछे वाली रस्सी की अरगनी पर कपड़े टाँग कर वे बाहर निकल गईं .
मैं अंदर कमरे में अपना बस्ता फैलाए बैठा था.
4-5 साल छोटी गुड़िया जैसी बहन ,मेरे आस-पास मँडराती ,पास बैठ कर  कागज़ पर लाइनें खींचती अ -आ करती रहती या साथ लगे घर में खेलने चली जाती .
  तुलसी चौरे के  इधर आँगन में ,माँ चिड़ियों के लिए अन्न के दाने बिखेर देती थीं  ,और वहीं एक कूँड़े में पानी भी .चहचहाट मची रहती  .कुछ कौए भी मुँडेर से उतर आते .मुझे उनका आना अच्छा नहीं लगता.लगता है  पक्षी चेहरा देखकर मनोभाव ताड़ लेते हैं .उनके आते ही गौरैयाँ सहम जाती  .पर मेरे उधर बढ़ते ही कौए और कबूतर उड़ जाते  . गौरैयाँ चोंचें नचाती निश्चिंत चुगती रहती  .अक्सर  पीली चोंचवाली गुरगुचियाँ टहलती दिखाई देतीं,  ये लोग कभी अकेली नहीं आतीं ,झुण्ड में रहने की आदत , जब उतरती  4-6 इकट्ठी और चाँव-चाँव कर आसमान सिर पर उठा लेती  .उनका शोर सुनकर मैं विस्मित हो रहा था तब माँ ने उनके बारे में एक कहानी सुनाई थी - सात  बहनें और सबसे छोटा एक भाई. वह कथा बहुत दिनों कर मन में,कौतुक जगाती घूमती रही थी. 

बहुत देर लगातार पढ़ नहीं पाता मैं.बीच में मन उचटता है .ध्यान इधर-उधर चला जाता है .
 इतने में आवाज़ आई,' मुन्ना !'
 माँ  लौट आईँ थीं ,आँगन के नल पर स्नान करना था उन्हें.
अरगनी पर टँगे तौलिया की ओर इशारा कर रहीं थी - 'बेटे, ज़रा वो अँगौछा पकड़ा दे .'
नहा चुकी थीं, भीगा आँचल देह पर चिपका जा रहा था ,छिपाने के बजाय तन की गरिमा को और उजागर करता हुआ . दो स्वर्ण कलश कस्तूरी आच्छादनों से युक्त !  मुग्ध-सा मैं हाथ बढ़ा कर तौलिया पकड़ा आया . इन्हीं पयोधरों से निसृत दुग्ध-धारा से मेरा रोम-रोम सिंचा है .विभोर मन, अनोखी तृप्ति का बोध लिए कमरे में लौट आया . .मन विचित्र रोमांच से भरा - इसी आँचल का प्रसाद पा कर बड़ा हुआ हूँ .
किताब खुली रही मन  उड़ता रहा .
आज इतना बड़ा हो गया हूँ , समझ पा रहा हूँ कि पुरुष आजीवन इनके मोह से मुक्त क्यों नहीं हो पाता .


चौथी- या पाँचवीं में पढ़ता था मैं, तब भी कभी-कभी माँ के पास जा लेटता था .वक्ष से चिपका लेतीं थीं मुझे .और तब सब-कुछ भूल कर
,तुरंत शान्तिपूर्वक  निद्रालीन हो जाता.
 वे कहती थीं  गमलों में नहीं,धरती के क्रोड़ से उगने दो पौधों को ,उस मूल-माटी से सने ,वे धरा की ऊर्जा को पकड़ कर आकाश में उठते  दिशाओँ में फैलेंगे.गमले की छोटी-सी परिधि में कहाँ वह आकर्षण कि जड़ों को गहरे ,और गहरे खींचे !धरती की धड़कनों से जुड़ कर अधिक चैतन्य रह ,पोषण पाता  अपार ऊर्जा से सिंचेगा . मूल की  पकड़ शाखाओं को संतुलित रख , आकाश में मुक्त-भाव से सिर उठाने की छूट देगी . 

फिर मेरी जड़ों में कोई कतर-ब्योंत  वे कैसे सहन कर पातीं - मैं जो  उनकी  निर्मिति था .
*
अब  भी लगता है वे , सहस्र-सहस्र नेत्रों से मुझे देख रही हैं
 माँ , तुम्हार प्रसाद है यह जीवन , जिसका संस्कार किया है तुमने वही यह मन .तुम दूर नहीं हो. मुझसे दूर कहाँ रह सकती हो ,क्योंकि मैं तुम्हारी संतान हूँ.
पिता को मैं नहीं जानता .मुझे रचनेवाली तुम हो .जैसा तुमने ढाला ढल गया .  
आकाश से झरती ये प्रकाश-किरणें तुम्हारी दृष्टि-विक्षेप है, आशीषमयी प्रफुल्ल दिशाएँ तुम्हारी प्रसन्न मुद्रा ,शीतल-सुगंधित पवन तुम्हारे आँचल का परस. 

स्नेहमयी, शान्तिमयी .माँ तुम सदा-सर्वदा मेरे साथ हो ,मैं अकेला कहाँ !
अकेला नहीं ,पर कोई साथ नहीं दिखता -  मीता की याद आती है .
मन में तीव्र आवेग उठता है कंठ खोल कर आवाज लगाऊँ ,'पारमिता ,ओ पारमिता ,तुम कहाँ हो ?'

अब मेरे लिए वह पहलेवाली मीता नहीं  ,किसी की पत्नी है . पर बान्धवी है  मेरी ,और चिर-दिन  रहेगी!
*
(क्रमशः)

मंगलवार, 6 मई 2014

कथांश - 4 .

4.
उस दिन मैंने मीता से कहा था, 'मेरे नहीं तुम्हारे सही , किसी के पिता की तो छाँह हम पर रहे !'
बाद में देखा  माँ साथवाले कमरे में थीं , कपड़े ले कर बाहर निकल रही थीं .
कुछ देर पहले छत पर देखा उन्हें. ओह, कहीं सुन तो नहीं लिया !
उन्हें कहीं यह न लगे कि पिता की छाँह से वंचित रहने का मुझे पछतावा है 
ओ माँ ,तुम्हारे मन में अपराध बोध न हो कि तुम्हारे कारण हम वंचित रहे.
 केवल एक अनुकूलता के लिए तुम उस अस्वस्थ वातावरण में हमें पलने देतीं.तब जो होता वह क्या ठीक होता?तुमने दुख सहे अपने सुख के लिए नहीं.भविष्य पर किसी का वश नहीं.जो सबसे सही लगा वह करने का परिणाम ग़लत कैसे हो सकता है .  अपने सुख के लिए तो नहीं किया ,अन्याय से समझौता करते-करते तुम, तुम नहीं रहतीं और तब मैं भी जो हूँ, वह नहीं हो पाता.

 पिता  के साथ मैं  बहुत कम रहा था .जो समय मिला उसमें हम दोनों में कभी ताल-मेल नहीं रहा. घर में उनकी आतंकपूर्ण छवि  छाई रहती थी .उन्हें लगता था सब कुछ उनके हिसाब से होना  चाहिए .
मुझे याद है एक बार पिता ने मुझे बहुत मारा था .
वे माँ पर बिगड़ रहे थे. मैं वहीं खड़ा था .जो मुँह में आए वे कहे जा रहे थे  मुझे  बुरा लग रहा था कुछ देर सुनता रहा फिर बोला था ,'तुम बहोत गंदे हो .गाली बकते हो .'
वे आगे बढ़े और मुझे पीट डाला.

मेरे मन में डर बैठ गया था. उनके सामने पड़ने से बचता रहता था.
मुझे नहीं मालूम हम लोगों के लिए  पिता की इतनी बेरुखी क्यों थी .माँ कुछ भी अपने मन से करें उन्हें अनुचित लगता था  .किसी भिखारी को एक मुट्ठी अन्न दे दें तो पिता के वाग्बाण चलने लगते थे .तुम्हीं लोगों के मारे ये लोग कुछ करे-धरे बिना आराम से खाना चाहते हैं .वे सबको फटकार कर भगा देते थे . साधु-संतों से तो उन्हें चिढ़ सी थी.मुस्टंडे बस खाने भर के हैं कोई काम इनके बस का नहीं .तुम औरतें ही इनके दिमाग़ चढ़ाती रहती  हो
मामा-मामी से और लोगों से सुनकर जो जाना उसी से समझने की कोशिश की  .माँ ने कभी कुछ नहीं बताया मुझे . 
दोनों की उम्र में बहुत अधिक अंतर नहीं था पर पिता के मुख की कठोरता और स्वभाव का रूखापन उन्हें उनकी उम्र से बहुत बड़ा दिखाता था.
दोनों साथ होते तो लोगों ने प्रायः भ्रम हो जाता था .
कुछ मनचलों ने एक बार फब्ती कसी थी 'अरे बुड्ढे, हमारे लिए भी तो कुछ छोड़ दे.'
फिर उन्होंने माँ को साथ ले जाना छोड़ दिया था.माँ की सौम्यता और सुरुचि की प्रशंसा कोई करे  उन्हें नहीं भाता था .वे उनके काम में सदा कमियाँ ही निकालते  थे.
उनका कहना था औरत हो ,औरत की तरह रहो ,सिर पर चढ़ने की कोशिश मत करो ,जैसा कहता हूँ वैसा  करो ,
जिसे मैं नहीं चाहता ,तुम नाम मत लेना ,नहीं तो दोष तुम्हारा .साथ मेरे ही रहना है.मेरे हिसाब से चलोगी तो चैन से रहोगी ,पर तुम्हें मेरा साथ रास नहीं आता .अपनी अलग खिचड़ी पकाना चाहती हो .कोई ज़रा सी तारीफ़ कर दे सिर चढ़ जाता है तुम्हारा.  तुम्हारे मारे सब मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं    .. क्या-भाई क्या बहन !तुम हो क्या  .पंख कतरी  चिड़िया स्वच्छंदता कैसे हो सकती है वह तो पिजड़े में ही खुश रहे .अपनी असलियत समझे रहे नहीं तो नोंच डाली जाएगी .
..निरंकुश मत हो ,जैसे कहते हैं  वैसे चलो .हम खुश तो तुम भी खुश .औरत  हो वश में रहो हमारे , ,स्वच्छंद आचरण ?छी-छी ,न घर की रहोगी न घाट की . ढली रहो मेरे साँचे में .
माँ चुप रहती थीं.
एक बार वे मायके में थीं .पिता किसी बात पर उनसे लड़ बैठे  .मामा -मामी को भी घसीट लिया कि वे ही दिमाग़ खराब करते हैं .चढ़ाते रहते हैं .
कहने लगे ,' क्या चाहते हो तुम लोग ? रख लो ,कितने दिन पूरा करोगे ,आखिर में रोती-धोती मेरे दरवाज़े ही आएगी.बच्चे को ले कर जायेगी कहाँ ?
और हम दोनों को वहीं छोड़ कर चले  गए - देखें कितने दिन सँभालते हो .दिमाग़ सही हो जायेगा तो एक दिन तुम्हीं ले कर वहाँ छोड़ने आओगे.'
बात इतनी-सी थी कि माँ के एक रिश्ते दार ने कहा ' दामाद बाबू नहीं आये ?
पिता सामने बैठे थे ,उसने उन्हें पहचाना नहीं और  माँ से पूछ लिया .
माँ ने पिता की ओर देखा
भाई ने कहा ,'ये क्या सामने तो हैं ,पहचान नहीं रहे?'
पर पिता उखड़ गए .
मेरा अपमान करने में  तुम लोगों को मज़ा आता है .माँ को देख कर बोले ',मुझे नीचा दिखाना  तुम्हारी आदत में शुमार है .' 
लाख मनाने की कोशिश की,हम लोगों की कोई चाल नहीं आपको गलत फ़हमी है . माफ़ी  भी माँगी  गई  . पर वे नहीं माने .कह गए,
'अभी तो नहीं ले जाऊँगा ,अब जब रखते न बने तुम्हीं छोड़ कर जाना .'
 माँ से क्या कहा यह मुझे नहीं पता. कुछ संवाद सुने थे पर याद नहीं करना चाहता. माँ ने  कभी किसी को बताया नहीं .
धमकी दे कर चले गए थे वे.

और तब से बस एक बार मिले थे जब मैं सात साल का था .
उन्होंने संदेशा भेजा था कि थे माँ स्कूल की नौकरी छोड़ दें और वापस लौट आएँ.पर माँ इसके लिए तैयार नहीं हुईं.
रिश्तेदारों ने भी समझाने की कोशिशें की - क्यों बच्चों का भविष्य बिगाड़ रही हो ?.बाप के बिना ये क्या कर पाएँगे .इस मास्टरी में क्या रखा है? पति अच्छा कमा रहा है, बैठ कर राज करो .पति-पत्नी में झगड़े तो चलते रहते हैं . कोई घर थोड़े छोड़ देता है .अपना नहीं तो बच्चों के भविष्य का ख़याल करो .
मैं बड़ा हो कर काम पर लग गया तो पता किया था .वे वहाँ नहीं रहते थे .बहुत सी उड़ती हुई बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं थीं.
उस रात माँ को चुपचाप रोते देखा था .मुझ पर क्या बीती थी  मैं ही जानता हूँ .
 ज्यादतियाँ पिता करते रहे ,दण्ड सारे माँ को भुगतने पड़े .

पर  मेरे मन में कोई द्विधा नहीं ,  अच्छी तरह जानता हूँ अपनी माँ को .
अंतरात्मा की पुकार सुनी उन्होंने ,सुख-दुख की चिन्ता नहीं की . जो ठीक हो वह करने का परिणाम ग़लत कैसे हो सकता है ?
 आज मैं जो हूँ ,बस इसलिए कि वे मेरी माँ रहीं .
कोई खोज-बीन करने की ,उनके चरित्र का  प्रमाण-पत्र पाने की कोई इच्छा नहीं, कोयले और हीरे में जो अंतर न कर पाये उससे कोई बहस बेकार है .
माँ ,तुम्हीं से मैंने सीखा कि अनुचित को प्रश्रय देकर आगे बढ़ने का सपना देखना अंतरात्मा से द्रोह है.
 बस तभी एक ज़िद ठान ली थी कि मन गवाही नहीं देगा उससे समझौता नहीं करूँगा,कभी नहीं .
*
(क्रमशः)

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

कथांश -3 .

*
नहीं, मीता से मेरा विवाह संभव  नहीं हुआ
इस दुनिया के रास्ते कभी सीधे नहीं चलते  ,एक बात के साथ दूसरी लगी चली आती है .हर कथा के साथ कुछ अवान्तर कथायें आ जुड़ती हैं.फिर  ज़िन्दगी की राह मुख्य मार्ग के बीच  ऐसी अटकती है कि  गली-कूचों में भटक कर  रास्ता ढूँढना पड़ता है
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, हमें लग रहा था अब जीवन सही ढर्रे पर आ गया है .माँ समझ रहीं थीं लड़का लायक निकला , अपवादों की वैतरणी पार हो गई. चार साल मीता मेरी मित्र रही थी ,मेरा घर कॉलेज से बहुत दूर नहीं था .एकाध जब बार नोट्स लेन-देन के क्रम में मेरे घर आई .माँ से उसका खूब ताल-मेल बैठ गया  .
उन्हीं से पता चला  जब चार साल की थी तभी उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी .एक  विधवा बुआ ने साज-सँभाल की थी .उनका कहना मीता के पिता नहीं टालते .
मीता अक्सर ही हमारे घर आ जाती ,माँ की सहायता करती ,कहती ,'माँ से बहुत सीखने को मिलता है .'
कभी-कभी माँ बुलवा लेतीं - उससे कह देना आज मैंने गाजर का हलुआ बनाया है .
अपनी बहन से मेरी माँ की मैत्री जान कर पिता मीता के उनके पास आने में कोई रोक नहीं करते .

मैं कॉलेज से लौटता तो वह हलुआ खाती मिलती .कभी कढ़ी-चावल का स्वाद खींच लाता .वह अपनी महाराजिन का बनाये खाने से ऊबती थी .कहती थी माँ के हाथ में निराला स्वाद है . हो मेरी माँ चाहे कुछ बना दें स्वाद ही अलग होता था -कहते हैं किसी-किसी की उंगलियों में रस होता है कि जो छू लें वह  स्वाद से भर जाता है.
लग रहा था अब जीवन की सारी कमियाँ पूर्ण हो जाएँगी .लेकिन मेरे लिए कुछ भी पाना आसान होता तो बात ही क्या होती.
मेरे पिता बीच में आ खड़े हुए  और जीवन का प्रवाह फिर चक्कर खा गया  .

उसकी बुआ जीवित होतीं तो अपने भाई को अनुकूल कर लेतीं .शादी के दो साल बाद ही विधवा हो जाने पर उन्होंने बहुत कुछ झेला था.उनकी एक बहिन ने पति और ससुरालवालों की प्रतारणा से ऊब कर आत्म-हत्या कर ली थी.  वे माँ की विवशता समझतीं थीं .
बिना माँ की लड़की पर माँ की ममता उमड़ पड़ती थी. छोटी बहन भी दीदी-दीदी कह उसके पीछे लगी रहती .मीता की बुआ से माँ की भेंट मंदिर के उत्सव में हुई .थोड़ा सहेलापा हो गया -वैसे माँ की रिज़र्व रहने की आदत थी किसी से अधिक मेल-जोल नहीं देखा मैंने. 
मैंने कभी नहीं कहा उनसे पर माँ  मेरा मन जानतीं थीं -बहू बनाना चाहती थीं उसे .भरे-पुरे घर की लड़की को हमारे यहाँ  किसी कमी का अनुभव न होगा उन्हें मेरी योग्यता पर पूरा विश्वास था .
  
उसके पिता माँ से मिलने भी आए थे .हमारी पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी पा कर चुपचाप चले गए थे .और बात आगे नहीं बढ़ी
उन्हें जब विदित हुआ माँ पिता से अलग रहती हैं तो उनके विषय में पूछ-ताछ करते रहे  .उन्हें यह गले से उतारना मुश्किल लगा था कि कोई महिला पति अपने आप अलग ,बिलकुल अकेली रहे .और रिश्तेदारों के विषय में भी उन्होंने पड़ताल की थी.
माँ के आने के बाद  सबने आ-आकर समझाया था ,पति का घर छोड़ कर मत जाओ. स्त्री को  हर हालत में सहन करना चाहिये यही उनका कहना  था.आश्वासन देते थे कि वे पिता से बात करेंगे  पर  कोई बीच में पड़ने नहीं आया .सब यही कहते  रहे धीरे-धीरे   समय के साथ सब ठीक हो जाएगा .
नाते-रिश्तेदार हैं बहुत पर  समय पर साथ देने कोई नहीं आया  , अकेली स्त्री से सब  कन्नी काट जाते हैं, सारे इष्ट-मित्र ,और संगी-साथी किनारा कर लेते हैं. उस क्षेत्र के बाहर आने के बाद हमें उनके  परिवार में कैसे गिना जाता.
 रिश्तेदार  कहने को ,मां के सिवा  मुझे कोई नहीं दिखाई देता .मामा हैं पर  उन्हें कौन पूछता है .प्रश्न यही उठता  कि पिता साथ  नहीं तो  क्या कोई चाचा-ताऊ-आदि भी  नहीं परिवार में,  जो साथ खड़ा हो !
 उनके मन में यही आया  कि कुछ कारण तो होगा ही .पति से अलग रह रही अकेली महिला कैसे सम्माननीय हो सकती है !किसी का सहारा लिए बिना दुनिया चलती है कहीं?
और मेरी माँ के लिए जिसके मन में ऐसी भावना  हो उससे समझौता करना मेरे बस बस में नहीं था.
मीता ने मुझसे कहा था उन्हें कहने दो मैं तैयार हूँ . मान  जाएगे धीरे-धीरे ,वे  अनुकूल हो जाएँगे ,मुझे बहुत प्यार करते हैं .
पर मेरे  मन ने गवाही नहीं दी
बिना माँ की बच्ची को पिता ने ही सँभाला था .मीता उनसे बहुत जुड़ी थी.उनका बहुत ध्यान रखती थी .वे दोनों इस प्रकार अलग हों यह मुझे गवारा नहीं हुआ , मीता का मन सदा अपराघ बोध से ग्रस्त रहता कि असहाय पिता को इस हाल में अकेला छोड़ दिया.  घरवालों का विरोध ले कर हमें अपनी गृहस्थी नहीं बसानी.अभी और प्रतीक्षा करें, संभव है उनका मन अनुकूल हो जाय.

मेरे निर्णय को माँ का  मौन समर्थन प्राप्त था.
*
(क्रमशः)

*

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

कथांश -2.

*
बस दो लोग बार-बार मन में जागते हैं. माँ और मीता .यही मेरे अपने, चिर दिन साथ रहेंगे - दोनों .
माँ तो माँ है ,और मीता ?
मीता मेरी सहपाठिन .चार साल साथ पढ़े थे दोनों .केवल चार बरस .पर लगता है जाने कितनी पुरानी है पहचान .
 पहली बार लाइब्रेरी में ध्यान गया था. वह कोई फ़ार्म भर रही थी,मेज़ पर झुकी हुई.चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था .अचानक सिर उठा कर इधर-उधर देखा  उसने ,अपने पेन को झटका, हिला-डुला कर देखा .चलते-चलते रुक गया था ,किसी तरह चला नहीं .
'बड़ी मुश्किल है .'उसके मुख से निकला . मैे शेल्फ़ से किताबें निकाल लाया था, सामने खड़ा था.
 किताबें मेज़ पर रख कर जेब से पेन निकाल कर दे दिया .
'बस थोड़ा-सा बचा है ,मुश्किल से पाँच मिनट लगेंगे.'
'आप आराम से भर लीजिये. '
वह फिर फ़ार्म पर झुक गई
केश-संभार के पीछे चेहरा गुम गया .
'आप आराम से भरिये, दूसरा है मेरे पास .'
मैं चला आया था .
दो दिन बाद कॉरिडोर में जा रहा था ,पीछे से आवाज आई ',जरा सुनिए ...रुकिए ..'
पीछे घूम कर देखा वही लड़की  रुक गया मैं.
मेरा पेन निकाल कर दिया उसने, 'धन्यवाद.'
'आपका शुभ नाम जान सकती हूँ ?'
'मैं ?ब्रजेश कहते हैं मुझे .'
मैंने पूछा नहीं था.उसका नाम मुझे बाद मे पता चला - पारमिता !
फिर क्लास में बैठे देखा लेक्चर-थियेटर था .उस ओर की बेंच पर हाथ में पेन पकड़े तिरछी घूमी लेक्चर पर ध्यान लगाए थी.
ध्यान से देखा .नेत्र बँध से गए.
चकियाया सा  देखे जा रहा है युवक.
पहली बार देख रहा है किसी नारी को ?
नहीं बचपन से देखा है, देखता आया हूँ . माँ बहिन , बुआ भी थीं पहले. चाची मामी उनकी पुत्रियाँ -कई बहनें . साथ भी रहा हूँ -   सब हैं
 कभी कोई कौतूहल नहीं जागा .सहज रूप से उन संबंधों में बँधा रहा . 
माँ -वो तो माँ हैं! कुछ और सोचा नहीं कभी. जन्मदात्री ,पयपान किया, गोद में सोया ,पोष-तोष पाता रहा .सब अनायास मिलता रहा , कभी विचार नहीं आया ये नारियाँ  हैं.
बहिन छोटी है मुझसे ,बच्ची-सी लगती है, हमेशा स्नेह -संरक्षण की अधिकारिणी .कभी इससे अधिक मन में आया  नहीं. किसी दूजी ओर ध्यान  गया  नहीं .कोई प्रवृत्ति नहीं जागी मन में, स्मृतियों में कोई आवृत्ति नहीं हुई .
परिवार की कितनी नारियाँ .सब संबंधों की पीठिका बनी-बनाई मिलती है,उसी अलिखित संहिता के अनुसार किस भाव  से देखना है पहले ही तय रहता है .बिना किसा द्विधा के  व्यवहार चलने लगता है .अलग-अलग खाँचे, उसी में जम जाते हैं सारे नाते .
पर यह?
नितान्त नई  लड़की से पाला पड़े तो मन  कुछ निराली ही संहिता रचने लगता है.
आज ही देख रहा हूँ इस देह-यष्टि के साथ -एक नया रूप .मन में  कभी ऐसा नहीं जगा था .आश्चर्य, कौतूहल ,देखने की कामना ,कुछ खींचता -सा .अपने को भूला सा ,कुछ नए बोध उदित हेने लगे.
 - तिरछी गर्दन की लास्यपूर्ण भंगिमा, घूमे हुए मुख की आत्मलीन मुद्रा को  विजड़ित कौतूहल से ताकता रह गया.
साथ बैठे लड़के ने टहोका दिया ,'क्या देखे जा रहा है..साले.. ?
मैं एकदम चौंक गया, दृष्टि हटा ली .रोकता रहा उधर न जाए .
ध्यान बार-बार उचटता रहा.

 कानों में शब्दों की  गूँज जागी, 'बेटा, मन लगा कर पढ़ना!'
जानता हूँ इसके बिना निस्तार नहीं .
नहीं देखूँगा उधर , लेक्चर से ध्यान बार-बार  हट जाता है .
क्लास चल रही है .बोर्ड पर  समीकरण लिखे जा रहे हैं उन्हीं में डूबने की कोशिश करता रहा.

*
(क्रमशः)

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

कथांश -1.

*
जीव ,  जब विगत संस्कार समेट संसार-यात्रा पर निकलता है तब अंदाज़ तो होता होगा किस-किस राह गुज़रना है - जनम तीर्थ-यात्रा बनेगा या वृथा चक्कर ?पता नहीं कितने-कितने स्थलों से हो कर जाना है .यहाँ आ कर भले ही विस्मृत कर बैठे, पाथेय तदनुसार पहले ही साथ धर दिया गया होगा - कब क्या झोली से निकल आए ख़ुद को पता नहीं .
मूंज की खरारी खाट पर  चित्त लेट कर आसमान को ताकना  अच्छा लगता है. संध्याओं के नित नये  रूप, रात्रियों में मखमली श्याम रंग पर टँके ,चमकीले सितारे.हर रात का अपना संभार .अमावस की मखमली श्यामता धीर-धीरे उजलाने लगती है .दूज की तनु चंद्र-रेखा ,शंकर के सघन जटा-जूट पर शोभायमान ज्योति-रेखा सी ,पंचमी की श्यामा सुन्दरी ,अष्टमी की सहज सहनीय सिन्दूराभ सौम्या  , दशमी की चंदनवर्णी तरुणा और पूर्णिमा की दुग्ध-धवल गौरांगना  ,सबका अपना पृथक् व्यक्तित्व .शुक्ल और कृष्ण पक्षों की आचार-संहिता के अनुरूप  वेष -भूषा धारण किए - हर ऋतु में एक नई रूप-सज्जा  से अलंकृत. 
 अष्टमी की  रात्रियों में गौर और श्यामता के मध्य  की सहज सहनीय उज्ज्वलता मुझे माँ की याद दिलाती है ,  उनके शीतल आँचल का आभास मिलता है, माँ की वात्सल्यमयी दृष्टि
नहलाती सी ,मन एक विलक्षण शान्ति से भर जाता है .
मैं जब पाँच वर्ष का था, मुझे ले कर  वे चली आईं थीं .कुछ दिन भाई के पास रह कर काटे .घर की सम्हाल की ,ट्रेनिंग की ,और प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका लग गईं.तब माँ ,मामा के साथ रहती थीं .मामी काम-धाम में निपुण नहीं थीं .माँ ने सब संभाल लिया था,और  मामी निश्चिंत  .मुझे अजीब लगता ,पहले हम लोग आते थे तो मामी दौड़-दौड़ कर खातिरदारी करती थं -पिता दो-चार दिन रह कर लौट जाते. हम लोग दस-पन्द्रह दिन बाद तक आराम से रहते.चलते पर मनुहार करते मामा-मामी फिर आने का आग्रह करते बिदा करते.


बाद में वैसा कुछ नहीं. माँ दिन-रात काम में जुटी रहतीं ,मामी आराम से बैठी रहतीं या पड़ोस में बतियाने चली जातीं.मामी के बच्चों को भी उन्हें ही सँभालना पड़ता.वे कुछ नहीं कहतीं शान्त भाव से काम में लगी रहतीं अपने खाने का ध्यान भी नहीं . मुझे वे  बहुत थकी  लगतीं  . रात को अक्सर बेचैनी में हाथ-पाँव पटकते देखता था  मैं उन्हें.     आज समझ में आता है ,तब इतना नहीं सोच पाता था.
सात बरस का था तब एक बार आए थे पिता .मुझ से पूछा था चलोगे मेरे साथ ,वहाँ अच्छी तरह पढ़ पाओगे ?

मेरा जाने का मन नहीं हुआ .मैंने कहा था ,'बापू तुम यहीं आ जाओ न. '
पर वे नहीं रुके .
कैसे बहिन-भाभियों के बहकावे में आकर माँ पर इल्ज़ाम लगाया होगा पिता ने !इतने अविश्वासी थे वे ?
विश्वासहीनता की स्थिति बड़ी दुखदायी होती है .जो जानता है क्या सच है क्या झूठ और जो नहीं जानता वह भी मन ही मन व्याकुल रहता है .सबसे अदिक उत्ताप उन्हीं को झेलना होता है जो अपने होते हैं .जिनके साथ बहुत से दुख जिेये होते हैं उनसे कभी नाता टूटता नहीं .
 असहनीय होते हैं वे पल जब कोई आत्मीय लगता संबंध सारी कुरूपताएँ ओढ़े पूरी निर्ममता  के साथ अचानक सामने आ जाय ,जब कुछ सोचो और कुछ निकले. उस समय की हताशा झेलना कितना भारी पड़ता होगा.सारा विश्वास ज़रा में टूट जाए तो क्या बीतती है किसी पर! सारी दुनिया को लात मार कर पलट देने का मन करता है .

' बेटा ,मन लगा कर पढ़ना, ' कैसे कहती थीं ,आज समझ में आता है. उन्हें लगता होगा कोई कहने न पाये कि पिता से अलग कर बेटे का जीवन बिगाड़ दिया .

 दिन में वे कुछ घंटों को चली जाती थीं कोई कोर्स ज्वाइन किया था उन दिनों.
एक बार गईं तो दो-तीन दिन नहीं आईं ,फिर लेकर आईं थीं एक नन्हा-सा शिशु .लाल-लाल हाथ-पाँव उछाल कभी रोता कभी किलकता.

मेरा बिगड़ा हुआ मुख देख कर  माँ ने कहा था,'ये तुम्हारी बहिन है.'
'ये कहाँ से आ गई?'
'भगवान ने भेजी है ,तुम्हें राखी बाँधने के लिए .'
दिन भर पड़ी-पड़ी कपड़े गंदे करती ,रात में भी चिल्ला-चिल्ला कर रोती .मुझे देख कर हँसने लगती थी .
पर थोड़ी बड़ी होने पर मुझे अच्छी लगने लगी थी.
बाद में हम लोग दूसरी चले आये थे ,माँ ने स्कूल में बच्चों को  पढ़ाना शुरू कर दिया था .

*

(क्रमशः)



सोमवार, 14 अप्रैल 2014

धरती सजी रहे - बाल-कहानी.

*
'माँ ,देखो ,ये कबूतर इस पानी में घुस कर पंख फड़फड़ा रहा है- सारा पानी उछाल-उछाल कर चारों तरफ़  कीचड़ कर दिया '
'रोज़ भगाती हूँ,और जब देखो तब चले आते हैं ..', अम्माँ थोड़े गुस्से में थीं. मुकुल ने और शिकायत की,'और ये चिड़ियाँ तोता, गिलहरी मौका लगते ही फल और डालें कुतरती रहती हैं .'
'अब जाल लगवा देंगे चारों ओर ..' मम्मी ने कहा.
मुकुल बड़ा-सा बाँस लेकर सारे पक्षियों और गिलहरी को दूर तक खदेड़ने लगा.
उसी रात उसे सपना आया -कि तोता ,गौरैया ,गिलहरी , कबूतर, खरगोश आदि बहुत से लोग आये हैं .कह रहे हैं ,'हमें तुमसे बात करनी है.
सपने में मुकुल ने सोचा 'अरे ,इन सब को भी बोलना आता है ..'.
 उसे याद आया कितोता तो हमारी बोली अच्छी तरह बोल लेता है .'
वह बाहर निकल आया
'आओ बैठो .'
वे रंग-बिरंगे नन्हें -प्यारे लोग उसके आस-पास बैठ गये .मुकुल के मन में खुशी की लहरें उठने लगीं .उसे लगा खूब सुन्दर-सुन्दर बहुत तरह के खिलौने उसके पास इकट्ठे हो गए हैं .
उसने सोचा ,'कितने प्यारे , जानदार खिलौने जैसे हैं ये सब .'
उसे बड़ा आश्चर्य हुआ उसने पूछा, 'क्या हुआ?'
'तोता आगे आया बोला ,'आप लोग क्या चाहते हैं .हम पशु-पक्षी यहाँ नहीं रहें ? .'
'नहीं क्यों , रहो न .हमने कब मना किया आराम से रहो ,बस हमारी जगह पर गड़बड़ मत करो .'
' आपकी जगह कौन सी  ?
'यही, जहाँ हम रहते हैं .,  पाँच साल में हमने इसे कितना अच्छा कर लिया पर तुम लोग समझते नहीं ..'     '
 ,'हाँ ,पाँच साल से आप लोग यहाँ आ गये .पहले हज़ारों सालों से ,हम सब यहाँ रहते थे ,धीरे-धीरे आप लोगों ने हमें भगा कर सब अपने कब्ज़ें में कर लिया . ये तो खुली जगह थी खूब पेड़ थे दूर-दूर तक खुला आसमान था, धूप-हवा-पानी किसी चीज़ की कमी नहीं थी .लेकिन ये सारी जगह आपकी कैसे हो गई .?.'
'ज़मीन ले कर पापा ने ये बड़ी-सी कोठी बनवाई है न, अपने रहने के लिये .'
' और हम सब को उजाड़ दिया .हम लोग लड़ नहीं सकते और आदमी लोग हमेशा मनमानी करते हैं.'
वे बोलने लगे-
'पेड़ कटवा दिये..हमारे घोंसले तोड़-फोड़ दिये अंडे-बच्चे निकाल फेंके .न हमारे रहने को जगह न खाने को फल कहाँ जाये हम '
'हम तो आपसे कुछ नहीं लेते .न हमें कपड़े चाहियें ,न बड़े-बड़े घर ,और सामान तो बिलकुल नहीं'
छोटी-सी गिल्लो बोली ,' हम तो धरती के खिलौने हैं ,सबको खुश रखते हैं. यह सब प्रकृति ने सब जीवों के लिये रचा है .आप लोगों ने सब-कुछ   छीन लिया. सब के  हिस्सों को अपने लिये समेट लिया ....'   
'कैसे ?'
.,देखो न ,सब जगह दीवारें खिंच गई ,ये लो सुनो .ये छोटी-सी गौरैया क्या कह रही है..'
वह आगे फुदक आई ,'हमने तो घरों के मोखों में घोंसला बनाना शुरू कर दिया था.तुम्हारे आँगन में खेलना हमें बड़ा अच्छा लगता था .पर तुम लोगों ने हर जगह जाली और तार लगा दिेये .
'अम्माँ कहती हैं तुम लोग खूब कूड़ा और तिनके फैलाती हो ..'
मुकुल को ध्यान आया अभी कुछ दिन पहले अम्माँ सफ़ाई कर रहीं थीं ,झाड़ू के धक्के से  बराम्दे की साइड से एक तिनकों का घोंसला नीचे आ गिरा .दो बिलकुल नन्हें बच्चे ज़मीन पर पड़े चीं-चीं कर रो रहे थे ,दो अंडे टूटे पड़े थे उनका पीला पदार्थ ज़मीन बिखरा पड़ा था. जन्म लेने के पहले ही उस जीव की हत्या हो चुकी थी .'
' अपने घर तो बढ़ाते जा रहे हो और हमारा छोटा-सा घोंसला ,जरा सी जगह में, उसे नहीं रहने दिया..हमारे अंडे-बच्चे मर जाते हैं हमें भी दुख होता है ..'
मुकुल सिर झुकाये सुन रहा था .समझ नहीं पा रहा था क्या उत्तर दे .
गिलहरी बोल पड़ी,'
तुम-लोग घऱ बनाते हो तो कितना सामान पड़ा रहता  है ,और कितनी  गंदगी फैलाते हो तुम लोग हर जगह थूकना ,कूड़ा फैलाना और भी जाने-क्या-क्या..   ,'
नन्हा खरगोश अब चुप न रह सका ,'भगवान ने इन्हे सब के साथ मिल कर रहने की अक्ल क्यों नहीं दी? अरे, ये आदमी लोग बड़े स्वार्थी हैं.. .बड़े लालची हैं.'
'हम लोग तो ज़रा सी जगह में गुज़र कर लेते थे .तुम लोग चार-जनों के लिये  कितनी-भी जगह घेर लो मन नहीं भरता .हमारे लिय न नदी का पानी पीने लायक रहा .सब गंदगी बहा-बहा कर खराब कर दिया. हवा में तमाम धुआँ और अजीब सी महकें .सांस लेते तक नहीं बनता-कभी-कभी तो ..'
कौवे का कहना था   ' धरती माता का दुलार सब प्राणियों के लिये है . हमारे न होने पर इनका जीवन भी  कितना कठिन हो जायेगा ये नहीं जानते ये लोग .!
मुकुल को याद आया कि पशु- पक्षी इस धरती के लिये बहुत उपयोगी हैं ,और पेड़-पौधों के बिना दुनिया उजाड़ हो जायेगी ..'.
इतने में उसकी नींद खुल गई .
सपना उसके ध्यान में था. .कभी पढ़ा हुआ एक  कथन उसके मन में कौंध गया -' यह धरती  एक कुटुंब है जिसमें सभी जीव-धारी एक दूसरे पर निर्भर हैं .'
उसने सोचा कुछ -न कुछ करना ज़रूर पड़ेगा जिससे कि यहाँ सबका जीवन सुखी हो सके .इन प्यारे-प्यारे खिलौनों से  धरती
हमेशा सजी रहे !
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