लालित्यम्

ललित लेखन -गद्य .


हमारी वाणी

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  • कहानी-कुञ्ज
  • भानमती का कुनबा.

मंगलवार, 29 मार्च 2016

सुना आपने ?

 *
सुना आपने -  पानी के पुराने बिल माफ़ और बिजली के रेट आधे !
समझदार थे वे, जिनने बिल नहीं चुकाया . नियमों को मान कर चलेवाले  मूर्ख निकले?
 मज़े से उपभोग करो  ,मूल्य चुकाने नाम कन्नी काट जाओ .अब  बिजली का दाम भी कम हो  गया डट कर फूँको.देखो न ,बिजली-पानी के लिये शोर मचा रहे हैं लोग और हम अपने लोगों को खुली छूटें दे रहे हैं.
कुछ तुम्हारी जेब से तो जाता  नहीं , काहे चिल्लाय रहे हो , आ जाओ हमारे साथ तुम भी .
लोक  तत्काल फ़ायदा देखता है - ये उनमें लोकप्रियता पाने का हमारा फ़ार्मुला है .
कौन कहता है इसे  मुफ़्तखोरी ? ये तोहफ़ा है , हमारी जनता के लिये  .हमें चुना है  प्रसाद तो पायेंगे ही.
समाज में सुव्यवस्था और सदाचरण लाना हमारा काम कैसे ? हमें तो अपने आगे का इन्तज़ाम करना  है !
-
हमारा मुँह का तक रहे हो !
देखो भई ,तुम्हें समझाये  दे  रहे हैं -लिखे-पढ़े हो समझ जाओगे  . प्रान्तों की संसाधन-संपन्नता भिन्न है  भौगोलिक कारण हैं. सबके भंडार अलग-अलग हैं . हमारा कोई दोष नहीं उसमें.भेद सब  ऊपरवाले का किया-धरा है . रही बात एक  देश ,एक राष्ट्रीयता  की - उसे  बाँट दिया हमने , जितना हिस्सा जिसके हाथ लगे ! सबकी अपनी सुविधा-दुविधा, हमने क्या सबका ठेका लिया है ?
*


.

प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 4:52 am 4 टिप्‍पणियां:

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

अरे, राम कहो ...


*

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राम कहो ...
मेरे पति की आदत थी हमारी नन्हीं-सी बेटी की छोटी-सी  गोद में किसी प्रकार सिर टिका कर कहते थे 'निन्ना आ रही है 'और वह दोनों हथेलियों से थपक-थपक कर लोरी गा कर सुलाने लगती थी.कभी ऊँ-ऊँ करेके रोने का नाटक करते तो लाड़ लडाना शुरू कर देती थी.
केवल मेरी बेटी नहीं मैने अन्य बालिकाओं में भी यही वात्सल्य उमड़ते देखा है जैसे  प्रकृति प्रदत्त उनके स्वभाव में हो .इसमें वे बड़ा-छोटा नहीं देखतीं. 
इसलिये जब स्मृति ईरानी ने उस छात्र के लिये 'बच्चे' शब्द का प्रयोग किया तो मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा .उम्र में काफ़ी छोटा होगा सो वात्सल्य प्रकट कर दिया ,  उस छात्र (आदमी कहूँ क्या?)की आपत्ति देख  कर  कुछ विचित्र लगा पर पर लक्षण  देख कर  मामला समझ में आने लगा. 'मातृवत् परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्ठवत्' वाली उक्ति इस कोटि के लोगों को बेकार की बात लगती है. मुफ़्तखोरों को ऐसी बातें बकवास लगती हैंजो उनके मौज-मज़े में थोड़ा भी खलल डालें.परायी स्त्री में मातृभाव देखना उनके लिये वैसा ही  है जैसे गधे के सिर पर सींग ' खोजना.दूसरों की गाढ़ी कमाई पर मौज करना ऊपर से गुर्राना उनकी आदत है . जैसा  अन्न  वैसा ही  मन .सारी बेतुकी बहस उनकी छूछी बौद्धिकता की उपज है .
 हे  स्मृति, -तुम सुन्दर हो ,युवा हो (मुझे लगती हो ), जम कर बोलती हो और वह भी सोच-समझ कर कि साधारण दिमाग़वाला तक  कन्विंस हो जाय .
क्यों कुछ लोगों की बोलती बंद करने पर उतारू हो ?और तुम्हारे लिये हो  मातृभाव की स्वीकृति या सम्मान ,उन लोगों में जो प्रतिद्वंद्वितापूर्ण  महिषासुरी भाव से भरे हों ?
 अरे , राम कहो !  

*
- प्रतिभा सक्सेना.







प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 6:36 am 9 टिप्‍पणियां:
लेबल: छूछी, निन्ना, बोलती बंद.

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

स्मॉग से ईंट !

 *
स्मॉग (धुँआसा शब्द  हो सकता है बिलकुल सही न हो) से  ईंट का निर्माण   -
आश्चर्य मत कीजिये .चीन के एक कलाकार ने वातावरण में छाये प्रदूषण को समेट कर उसे ठोस रूप में सामने ला दिया.हवा में समाये कटु-तिक्त कणों को समेट कर उनकी घनाकार ईंट बना कर प्रत्यक्ष कर दिया. कलाकार का नाम जिंगोऊ ज़ियाँग (मंडारिन भाषा में) पर वह अपने को Brother Nut कहलाना अधिक पसंद करता है.
 प्रारंभ में वह इससे बचने को सुरक्षा का आवरण ओढ़ता रहा फिर उसे लगा कि इस प्रकार के स्मॉग से छुटकारा संभव नहीं .उस ने विचार किया यद्यपि वह प्रदूषण के PM 2.5 (Particular Matter) के या उसके दुष्प्रभावों को विशेषज्ञ नहीं फिर भी कुछ तो करना चाहिये . और भाई नट ने रिचार्जेबिल बैटरीज़वाला बहुत शक्ततिशाली वैक्यूम क्लीनर खरीदा और उसे लेकर निकल पड़े.बीज़िंग के विशेष स्थानों पर सौ दिनों तक वेग से चला कर वातावरण का दूषण एकत्र करते रहे .जो भूरा जंक इकट्ठा हुआ उसमें  लाल मिट्टी मिला कर ईंट के ठोस रूप में तैय्यार कर लिया .
सड़कों पर क्लीनर लगा कर जब वे अपने कार्य में लगे थे तो कुछ लोग उन्हें हाइटेक क्लीनर समझकर कह उठे - वाह बीज़िंग में यह काम बढ़िया हो रहा है.
और कुछ ने तो उन्हें वैक्यूम क्लीनर विक्रेता समझ लिया था. पर   वे लगे रहे अपने काम में और उड़नशील कणों की  ठोस रूप देकर ही दम लिया .
धुन के पक्के निकले  Brother Nut ! 
*
प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 10:05 pm 13 टिप्‍पणियां:

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

बहुत-से स्वाद खो गये हैं -

*
सहज-सरस , तोष और पोष देनेवाले बहुत से स्वाद खो गये है. नये निराले अटपटे-लटपटे स्वादों ने जगह ले ली उनकी.न परिचित रूप, न स्वाभाविक रंग .उनकी जगह लेने जाने कितने बनावटी रसायनी घाल-मेल मुख्यधारा में आते जा रहे हैं.अजीनोमोटो जैसा जीव भी  रसोई में प्रवेश पा गया .गहरी मंदी आँच पर सीझने का सोंधापन ,स्वाद का वह रचाव खो गया ,अब तो 'बस दो मिनट या चटपट काम होने लगा है - किसी तरह जल्दी निपटे ,जान छूटे !
भोजन का तो रूप ही बदल गया .समोसे समोसे न रहे -किसी में पनीर भरा ,कहीं मैगी से लेकर करमकल्ला तक. बीकानेरी भुजिया कितने रूप बदल गई -आलू भुजिया ,लहसुन वाली ,खारी और जाने कैसे-कैसे विचित्र स्वादों वाली- नाम लेते ही सामने एक पूरी एक शृंखला आ जायेगी .असलियत यह कि ज़माना है पैकिंग का ,और विज्ञापन का
कमाल . क्या चाहिये यह जानने को  भी गहरे उतरना पड़ेगा - किसमें क्या खासूसियत है .खोजते रहो,  टेस्ट करते रहो.पता नहीं क्या-क्या मिल जाये ,सिर्फ़ जो चाहिये उसके सिवा .
जाना-बूझा ताज़ा सामान मिला करता था , देख कर रुचि जागती थी -अब प्रयत्न करके जगानी पड़ती है .पचास तरह की चीज़ें, पचासों वेराइटीज़ में .चुनना भी मुश्किल ! खाने को क्या मिल रहा है इसका कोई पता-ठिकाना नहीं.जिह्वा कुछ खोजती रह जाती है .तुष्टि के स्थान पर कुछ और की चाह उमड़ आती है.बनाने-खाने-खिलाने की सरल परंपरा ,वह आश्वस्त करता का अंदाज़ कहीं बिला गया ,अब तो तमाम उपचार ,व्यवहार साथ चले आते हैं .तन-मन को सरसाता वह सोंधापन ग़ायब हो गया है . खटरागों  से भरा नया आचार असहज लगने लगता है कभी-कभी. घर भी जैसे बाहर होता जा रहा है . स्वाभाविकता सिमट गई है ,नये अंदाज़ों के नये मसाले,
स्वादों को भटकाये ले जा रहे है .कुछ चाहो मिलता है कुछ और.
नई पीढ़ी को शायद भान ही नहीं कि उसने क्या कुछ गुमा दिया और क्या-क्या गुमाती  जा रही है. कितने असली स्वाद ग़ायब हो गये हैं. बनावटी महकें और बाज़ारू स्वाद मुँह लगते जा रहे हैं.घाल-मेल मुख्य धारा में समाता जा रहा है ,कुछ खास पाने की चाह बढ़ती जा रही है. कितनी कीमत चुका कर इस मिलावट और बनावट को खरीदा गया है जिसमें ऊपरी बातों का रोल  भोजन से  अधिक हो जाता है .खा कर तोष और पोष मिले या न मिले अपने विज्ञापन से  मन और नेत्रों को आकर्षित कर लेने की कला में उसकी विशिष्टता है . इसी दौड़ में भाग रहे हैं लोग .पीढ़ियों का अनुभव लुप्त हो जाये. नया   अपना रास्ता चलता जायेगा .
जो अपना है उसे तो सैंत कर  रख लें.नए को स्वीकारने का यह मतलब तो नहीं कि पुराना  अपदस्थ हो जाये!
*
प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 11:07 am 9 टिप्‍पणियां:
लेबल: अटपटे-लटपटे, मुँह लगना, सीझना, सैंत कर., सोंधापना

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

सागर - संगम -11.

* 11.
(दृष्य - वही .सूत्रधार नटी और लोकमन .)
सूत्र -आपने ऐसी धारा बहाई कवि ,कि हम तो उसी में बहते चले गये ,भूल गये कि हम उस समय से कितना आगे बढ आये हैं .
नटी - कितनी -कितनी भिन्नतायें ,लेकिन कैसा सामंजस्य !पर मित्र ,इसके बाद यह कहानी क्या रुक गई ?
लोकमन - कहानी कभी नहीं रुकी ,रुकेगी भी नहीं .राजनीति और धर्म के अंधे ठेकेदार फूट के बीज बोते रहे लेकिन जन के स्तर पर समन्वय की प्रक्रिया निरंतर चलती रही .कश्मीर से केरल तक और बंगाल से गुजरात तक ये उदात्त संवेदनापूर्ण स्वर हमें वहाँ के कवियों की वाणी में सुनाई देते हैं .उनके उदार दृष्टिकोण संकीर्णता से ऊपर उठ गये हैं ,भाषा की दीवारें गिर गई हैं ,संप्रदाय के बंधन टूट गये हैंं और वे मानवता के स्तर पर मुखर हो उठे हैं . .
नटी - विस्तार से बताइये कवि ,संकेतों की भाषा में नहीं .
लोकमन -भारत  में हर युग में ऐसे साधक हुये हैं .उनके उदार दृष्टिकोण धार्मिक और भाषागत संकीर्णताओं से ऊपर रहे . सुनो ,गुजरात के जन कवि अखा की वाणी [1630-1715]--
'बहु विद्या बहु दिन पढे,खाली किनहा शीश ,
अखा वाद करतो गयो ,चिन्हे नहीं जगदीश !
जप तप संयम साधना ,सब देह का व्यापार ,
अखा आतम तो एक है,तहाँ दिवस नहीं तिथि वार !
और दादू दयाल का नाम सुना है आपने ?'
 नटी - हाँ , उन्हीं ने तो कहा था  ने कहा था- भाई रे! ऐसा पंथ हमारा
द्वै पख रहित पंथ गह पुरा अबरन एक अघारा
बाद बिबाद काहू सौं नाहीं मैं हूँ जग से न्यारा  !
वाद-विवाद काहू सों नाहीं याहि जगत से न्यारा !
सम दृष्टि ,सुभाइ सहज में आपहि आप विचारा !
मैं तैं मेरे यह मति नाहीं ,निरबैरी ,निर्विकारा !
मन ही मन तू समझ समाना आनँद अपारा 1
सूत्र - हाँ सुना था कहीं हमने भी कि जैन कवि आनन्द घट ने सभी धर्मों के आराध्यों को पर्यायवाची माना और कहा नाम अलग अलग हैं सत्ता एक है -राम कहो ,रहमान कहो ,कोउ कान्ह कहो महादेव री ,

सूत्र - वे  गुजरात के संत प्राणनाथ भी तो  ,जिन्होने प्रणामी समप्रदाय चलाया ,बुन्देलखण्ड में भूदेव नाम से जाने जाते हैं .उन्होंने सारे तीर्थों के साथ मक्का मदीना की यात्रा कीथी ,और सब धर्मों के ग्रंथों का गहन अध्ययन कर उनके तत्वों को ग्रहण कर प्रणामी संप्रदाय की स्थापना की.
सूत्र - उन का प्रभाव ,हमारे महात्मा गांधी पर भी पड़ा था.

लोकमन -
धारा बहती जाये ..
गुर्जर की धरती ने ऐसे विरल पूत उपजाये !

भेद-भाव से रहित वहाँ संतों के मधु स्वर गूँजे ,
जाति धर्म भाषा के सारे ही आडंबर डूबे ,
शुद्ध भावना के स्वर ,मानवता के प्रेम भरे स्वर ,
हिन्दू ,मुस्लिम .जैन ,पारसी जन के अंतस् के स्वर
अखा ,दीन दरवेश ,हरी सिंह ,नरसी काजी अनवर ,
वसुधा ही कुटुंब  चेतना मानव की अविनश्वर !
नटी - तो क्या अन्य प्रदेशों की  लोक-चेतना में यह गूँजें नहीं उठी ?
 लोक - इस भारत के हर प्रान्त में ऐसे ही मानवतावादी संदेश वाणी में गुंजार उठे .
 बुन्देलखण्ड में जो भूदेव नाम से अमर होगये उनकी आवाज सुनो --
कृष्ण, मुहम्मद ,देवचंद ,प्राणनाथ ,छत्रसाल ,
इन पंचन को जो भजे ,दुःख हरे तत्काल !
इन प्राणनाथ ने विक्रम की अठारहवीं शताब्दी में कहा था -बोली जुदी सबन की ,और सबका जुदा चलन
सब उरझे नाम जुदे धर ,पर मेरे तो कहना सबन ,
बिना हिसाबे बोलियाँ गिने सकल जहान ,
सबको सुगम जान के कहूँगा हिन्दुस्तान !

सूत्र  -  जानता हूँ ,कोई दीन दरवेश उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक जीवित थे ,ये ईस्ट इंडिया कमपनी में मिस्त्री थे और हाथ कट जाने के बाद फकीर हो गये थे .[मुसलमान दरवेश का छायाचित्र
हिन्दू कहे सो हम बडे ,मुसलमान कहे हम्म ,
एक मूँग दो फाड हैं ,कौन जाद कौन कम्म !
 लोक -और सुनो ,जाति के कोली अर्जुन की भाषा गुजराती ,उर्दू और पंजाबी की खिचडी थी .उनने खुद कहा --सुनो मेरा साथी ,गाया गुजराती ,
मेरी जबान जरा उर्दू में आती ,
साहब तो सबै बूझे बोलत बिलाती ,
नीच पास नाणु होय शिर छाय थाती !
संस्कृत का पूत जो कपूत नीच नाती !
लोक -एक साध्वी थीं माता ओंकारेश्वरी उन्होंने समाज के निम्न वर्ग को ईश्वर के सबसे अधिक समीप पाया था -
नंगा आवे ,नंगा जावे ,नंगा जन नारायण पावै !

सबका साहब एक ,एक ही मुसलिम हिन्दू !
सूत्र -इन कवियों पर किसा विशेष प्रान्त की छाप नहीं है ,शब्द -शब्द पर भारतीयता की मुहर है .

 लोक -भाषा की दृष्टि से भी इन उदारमना संतों को कभी प्रान्तों की बाधा नहीं आई,उन्होंने वही भाषा अपनाई जो भारत के सामान्य जन की भाषा थी ,क्योंकि उन्हें सबसे जुड़ना था सबके साथ चलना था .
सूत्र - अच्छा इन कवियों पर किसी संप्रदाय -धर्म के प्रभाव नहीं रहे थे?
लोकमन - साथ रहने से प्रभाव तो अनायास आ जाता है -परस्पर प्रभावों  के कारण  भिन्न मतों को लोग एक मंच पर बोलते हैं, वाणी में उदारता और सामंंजस्य का क्रम आगे बढ़ता  हैं .

गुजरात के नभुलाल[1853 -1928]और कोली जाति के अर्जुन [1900-1976]पर सूफियों का स्पष्ट प्रभाव है -साधना मार्ग के चार पड़ावों का स्पष्ट उल्लेक है --पिछाना शीर दहीं मस्का ,लगा रोगान प्यारा है ,
सरीकत और तरीकत से हकीकत कू विचारा है ,
मारिफत में मिला अखा सबै दुख का पसारा है ,
नहीं सैतान ,नहिं बंदा सभी का सिरजनपारा है
पवन आतस जमीं आबे सबै साहब हमारा है !
नभू मुकररबडा रकीन ए मुरसद का इसारा है !
1955से 2024में रंग अवधूत पर बौद्ध धर्म का प्रभाव था  और अनेक भाषाओं में समान रूप से पारंगत थे -हिन्दी ,,गुजराती ,मराठी ,संस्कृत अंग्रेजी में इनका काव्य मिलता है .इनका कहना है -हिन्दू ,मुस्लिम ,पारसी ख्रिस्ती कहो तो हम ही हैं ,
ना नात है ना जात है ना बात है वहाँ हम ही हैं ,
सातवें आसमान पर है तख्त निरगुन हमपिंका ,बिन तार तंबूर ओम बजा के हम हमहीं में मस्त हैं !
लोकमन -इस धरती पर जो आया यहीं के रँग में रँग गया .कितने धर्म ,कितने मत-मतान्तर एक दूसरे में घुलमिल गये गंगा की धारा के समान भारत की संस्कृति अनगिनती जलधाराओं को आत्मसात् कर और प्रखर ,प्रबल गहन और व्यापक बनती रही  .
नटी -उर्दू के शायरों ने इस भाव का बड़ा प्यारा चित्र खींचा है 
लोक मन - ठीक कह रही हो .यही धारा बही है जाँनिसार अख्तर की इस शायरी में  -
'पिला साकिया बाद ए खाना साज ,
कि हिन्दोस्ताँ पर रहे हमको नाज!
मुहब्बत है खाके वतन से हमें ,मुहब्बत है अपने चमन से हमें ,
हमें अपनी सुबहों से शामों से प्यार ,हमें अपने शहरों से नामों से प्यार !
उठाये जो कोई नजर क्या मजाल ,तिरे रिंद लें बढ के आँखें निकाल !
निगाहें हिमाला की ऊँची रहें ,सदा चाँदतारों को छूती रहें ,
रहे पाक गंगोतरी की फबन ,मचलती रहे जुल्फ गंगो-जमन !
झलकती रहे यह अशोका की लाट ,ये गोकुल की गलियाँ ये काशी के घाट !
लुटाती रहे अने नयनों का मद ,ये सुबहे बनारस ,ये शामे अवध !
रहे आसमाँ पर दमकता हिलाल ,रहे ईद का मुस्कराता जमाल !'

*
(क्रमशः)

प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 7:10 am 5 टिप्‍पणियां:

बुधवार, 16 सितंबर 2015

हरमीत बिल्ला

*
कई वर्ष मुज़फ़्फ़रनगर में रही थी.
जब वहाँ  से चलना पड़ा तो चिट्ठी-पत्री के लिये अपनी मित्र से उनके घर का डाक का पता पूछा . घर तो कई बार गई थी , बाहर के पत्थर पर निवास के नाम का अंकन भी देखा था -पर कभी गौर नहीं किया ,ज़रूरत नहीं समझी कि देख कर ठीक से पढ़ लूँ. सोचा भी नहीं था कि कभी इस पर भी कोई कौतुक खड़ा हो जाएगा .
अपना नाम और मोहल्ला बता कर निवास का नाम 'हरमीत बिल्ला' लिखाया उन्होंने .एक से एक अजीब नाम  सुने हैं ,लड़कियों का नाम बिल्लो भी सुना है .अपने को क्या अंतर पड़ता है ,सोचा मैंने .किसी के नाम पर होगा , हरमीत नाम और बिल्ला सरनेम-निकनेम .जो भी हो .
फिर एक बार मेरी  मित्र के पत्र में उनका पता अंग्रेज़ी में लिखा आया , निवास का नाम लिखा था - 'Hermit Villa', .मेरे तो ज्ञान-चक्षु खुल गये .अंग्रेज़ी के हिन्दीकरण का ऐसा प्रभावी रूप आज तक नहीं देखा था. यों भी देखा जाय तो अंग्रेज़ी में जो अक्षर लिखे गए उनका मुखर होना ज़रूरी नहीं ,लिखते कुछ हैं ,बोलते कुछ .और हिन्दी -  लोक-भाषा में अक्सर ही व का ब (कहीं-कहीं भ भी -यूनिवर्सिटी को
यूनिभर्सिटी ,सुना होगा आपने भी )हो जाता है .  यह तो स्थानीय जनता के द्वारा सहज-सरल रूपान्तरण है ,वह भी कितना सार्थक !अनायास चल पड़ा और बिना किसी विवाद के  शिरोधार्य कर लिया  सब ने .यह है असली जनता-जनार्दन की आवाज़ ! पोस्ट आफ़िस वालों ने भी माना ,तभी तो डाक सही जगह पहुँचती है .
कभी आप मुज़फ़्फ़र नगर जायँ, तो आर्यकन्यापाठशाला इन्टर कॉलेज से थोड़ी दूर एक भवन मिल जायेगा जिसके द्वार के निकट एक प्रस्तर-शिला पर अंग्रेज़ी में  अच्छे खासे अक्षरों में अंकित है - Hermit Villa ,अंग्रेज़ों के ज़माने का मज़बूत निर्माण है .अभी भी शायद वैसा ही खड़ा हो. वहाँ की बोली में किसी भाषा के शब्दों को अपने ढर्रे में ढाल लेने की अद्भुत क्षमता पाई है मैंने .बहुत से उदाहरण हैं जिनमें से एक यह - हरमीत बिल्ला !
*
प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 5:41 pm 10 टिप्‍पणियां:
लेबल: कौतुक, ज्ञान-चक्षु, ढर्रे .

बुधवार, 9 सितंबर 2015

छुट्टी -

*
छुट्टी ! मतलब नियमों- अनुशासनों से खुली  छूट , लादी गयी व्यवस्था  से मुक्ति , मनमाने मौज से रहने का दिन .सारी चर्या पर ख़ुद का नियंत्रण - नहाने ,खाने, बैठने-उठने सब में !
बल्कि छुट्टी का खुमार एक दिन पहले की शाम से चढ़ने लगता है . लगता है कल कौन ड्यूटी बजानी है और आराम-आराम से चलने लगते हैं शेष बचे रहे दिन के धंधे .  खाने  कोई जल्दी नहीं न सोने की  .फिर इधर उधर कुछ-न-कुछ करते काफ़ी रात हो जाती है .

असली छुट्टी का दिन शुरू होता है चौथाई दिन चढ़े जागने के बाद से. सोओ देर में, तो समय से कैसे उठ सकते हैं ? नींद खुल भी जाय तो बिस्तर पर पड़े रहने का अपना ही आनन्द है .और उठने की जल्दी भी क्या ? उठे तो पहले टीवी पर हाथ गया , एक छुट्टी का ही तो दिन मिलता है कुछ मन का करन को . पर इत्मीनान से देखने की फ़ुर्सत किये है ?दैनिक क्रियाओं के बिना चलता नहीं न ! कोई प्रोग्राम लगा कर छोड़ दिया , अपनी तान उठाता रहता है टीवी.जिसे मौका मिला कोई बटन उमेठ कर अपने हिसाब से एडजस्ट कर , वाल्यूम बढ़ा देता है .बीच बीच में आपसी मुँहाचाही तो चलनी ही है -कुछ कहने-सुनने को एक ही तो दिन मिलता है  .इन्हीं सब झंझटों में नाश्ते में देरी होते जाना स्वाभाविक है . भोजन के समय से ज़रा सा पहले हो जाय तो भी गनीमत है .
 अब तक पड़े बहुत से ऊल-जलूल काम निबटाना भी जरूरी - इधर का सामान उधर करना, किताबें अगर घर में हों तो उलटना-पलटना , कागज़-पत्तर समेटना ,कपड़ों के पचड़े सँभालना . कैलेंडर का पन्ना बदलना भी बीच में कहाँ हो पाया था . आज सारे बचे-खुचे काम दिखाई दे रहे हैं हैं .
रात देर में सोये  ,ऊपर से खाना देर में खाओ तो शरीर अलसायेगा ही . ज़रा लेटने का मन हो आता है - वैसे
मौका कहाँ  मिलता है इत्मीनान से बैठने का भी. मन करता है आज  ड्यटी से छूट मिली है ,ज़रा पाँव पसार कर लंबे हो लें .फिर कहीं कोई आ गया तो  उसके साथ बैठक ही सही. कहीं बाहर भी निकल सकते हैं  ,बाज़ार या कोई और कारण .लौटत-लौटते समझ में आने लगता है ' कल फिर वही ढर्रा !,सुबह जल्दी उठना है ड्यूटी पर हाज़िरी देनी है .'
वाह  ,सोचा था क्या-क्या कर डालेंगे. कुछ नहीं हो पाया - बेकार निकल गया दिन - बीत गई छुट्टी  !

*
प्रस्तुतकर्ता प्रतिभा सक्सेना पर 5:05 pm 14 टिप्‍पणियां:
लेबल: ऊल-जलूल, खुमार, चर्या, ढर्रा., पचड़े, मुँहाचाही
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