गुरुवार, 12 मार्च 2015

केवल महिलाओं के लिए ...

जिस समय पति से  घर का कोई काम करा रही हों -

* 1 . उस समय आपको खाली नहीं रहना चाहिए कुछ करती हुई ही दिखाई दें.चाहे दूसरे कमरे में चली जाइये वहाँ चाहे जो चाहें करिए .चले जाना इसलिए भी अच्छा है कि काम करने का उनका बेतुका तरीका देख कर आप बिना टोके रह नहीं पाएँगी .पता नहीं पत्नी के सामने ऐसे करने लगते हैं या इस व्यक्ति के ढंग ही ऐसे हैं. बेकार में  कहा-सुनी होने लगे तो जो काम हो रहा है उससे भी जाएँगी.
* 2 . दिखना  यही चाहिए कि आप व्यस्त हैं .कुछ पढ़ना ही चाहें तो कोई कपड़ा और सुई-धागा सामने कर के, कोई देखे तो लगे कि कुछ सिलाई चल रही हैं.
* 3 .इधर आना हो तो हँसती हुई कदापि न आएं ,खुश न दिखाई दें नहीं तो वे समझेंगे मुझसे काम करा के खुश हो रही है .
* 4 . थोड़ा सा मुँह बना लें तो और अच्छा  .किसी बात पर हँसी भी आए तो दूसरी जगह जाकर हँस आएँ ,इधर आने पर गंभीर होना या मुँह ज़रा चढ़ा होना फ़ायदेमंद है  .इससे उनकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि कहें  'ज़रा यह उठा दो '', देखो तो ज़रा..' वगैरा वगैरा .... .और फिर  होगा ये कि जब तक कुछ करेंगे ,आपको बराबर घेरे रहेंगे वो.
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गुरुवार, 5 मार्च 2015

कथांश - समापन .

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 पारमिता से उस दिन सच ही कहा था- मैं दुखी नहीं हूँ .दुखी न होने पर सुखी होना जरूरी होता है क्या ?एक न्यूट्रल-सी मनस्थिति-  भी तो संभव है -कैसा लगता है  जब ख़ुद की ही समझ में न आये . 

नहीं, जड़ता नहीं ,सारी दुनिया की बातें अनुभव हों ,एक निज को छोड़ कर ! ये तो मन है  ,कभी लीन रहता है ,कभी उचटता है .कभी कुछ अच्छा लगता है कभी कुछ  बुरा ,बड़ी मिलीजुली-सी चीज़ है ज़िन्दगी .
कुछ मन से ,कुछ बेमन से(हो सकता है अधिकतर)  दुनिया यों ही चलती है.
मन की बात आई तो  मंदिर के पुजारी  याद आ गये.
 आती बिरिया जहाँ दो-तीन दिन  रुका था , लौटते पर  फिर वहीं रुका  हूँ .यों ही  घूमते-घूमते मंदिर की ओर बढ़ गया था. नवरात्रों में हमारे घर का वातावरण मंदिरमय हो उठता था .कपूर -गंध से व्याप्त प्रांगण में पग धरते ही देखा कन्या-भोज चल रहा है.

 माथे पर टीका लगाए प्रसन्नमुखी बालिकाएँ देख कर अच्छा लगा . माँ भी नवरात्रों में कन्यायें जिमाती थीं.पूरे नौ दिन व्रत करती थीं . माँ के पूजाघर से आती अगरुधूम  गंध - वैसे ही  नासापुटों में समा रही है . एक अदृश नेहिल  परस बार-बार  छू जाता  है .
पुजारी जी का दिया -हलवा पूड़ी और चने -ग्रहण करता हूँ. प्रसाद देते हुए एक लड़के से कह रहे थे ,'अरे ,षष्टी तू यहीं घूम रहा है ..' 

शिखा-शेष  सफ़ाचट्ट शीष धारे वह  10-11 बरस का लड़का खड़ा हो गया था.
'तेरी  ईजा  शिकायत कर रही थी  पढ़ने-लिखने  में मन नहीं लगाता, आवारा गर्दी करता है..'
मुझे अपनी ओर देखते पा कर बोला ,'आज तो छुट्टी है, शाब जी ..'
 वे कह रहे थे ,'अरे किसी काम से लग ,खाली बैठे खुराफ़ातें सूझेंगी बेटा. अपने पर काबू कर लिया तो समझो सब जीत लिया .मन को छुट्टा छोड़ा तो कहीं का न रहेगा .'
 मैंने जोड़ा  ,'सच में,इस उमर में नियंत्रण होना बहुत ज़रूरी है.'
'इसी में नहीं, हर उमर में भैयै ,अनुशासन-नियम मानना बहुत ज़रूरी हैं. मन के मते चलने से बचाने को  तो सारी व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं .गृहस्थ-जीवन की नींव पर तो दुनिया टिकी है ,अपना ही  अपना सोचने को तो इंसान नहीं जनमता .' .
मैं अचकचा गया .बाहर निकल आया.
जीम चुकी कन्यायें बाहर निकल रही थीं .9-10 बरस की लड़की के साथ ,एक छोटी-सी बच्ची , दो-ढाई बरस की रही होगी, हाथ में प्रसाद का दोना लिए निकली है. बच्ची मुझसे टकरा गई ,चौंक कर देखने लगी.
'लगी तो नहीं बेटा ?' मैंने पूछा.
उसने 'ना' में सिर हिला दिया .
 आज को माँ होतीं तो इसे  खाली हाथ  नहीं जाने देतीं ,मैंने जेब से रुपये निकाले.
बड़ी लड़की ने मना किया ,' नहीं, हम सबसे नहीं लेते .'
'अरे, ये तो मेरी माँ ने तुम्हारे लिए दिये हैं.'
अजाने व्यक्ति से लेने में वह झिझक रही थी , पीछे से पुजारी जी  बोले
'ले ,लो बेटा ,आज तो तुम्हारी पूजा का दिन है .'
मैंने रुपये देकर प्रणाम किया.
'इसकी बात सुनो ,' पुजारी जी ने 
छोटी बच्ची का दुलार करते हुए पूछा ,'छोनी के दाँत  काए के लिए ?'
वह तत्काल बोल उठी ,'हँछने के लिए .'
 हम दोनों हँस रहे थे .बच्ची शरमा गई .भाग गई बड़ी बहन के पीछे.
मुझे  वसु का ध्यान आ गया. उस दिन चलते समय देखा था - मेरी छोटी- सी बहिन कितनी बदल गई है - गरिमामयी , दीप्ति पूर्ण! विस्मय से देखे जा रहा था..
'तू मामा बननेवाला है , रे '- उसकी सास बोल उठी .
' अरे !' एकदम मुँह से निकला .
माँ के शब्द याद आए ,'मुन्ना, बहन का ध्यान रखना. अकेली न रह जाय वह .'
माँ ,कैसे उऋण होऊँगा तुमसे ? और बहन, मेरे मन की शीतल  छाँह -तुम जो मेरी माँ का अंश हो ?
इधर दुर्गा सप्तशती का पाठ चल रहा है .माँ भी करती थीं .चलते-फिरते मेरे कानों में पड़ता  रहा है ,वैसै मैं प्रसादी- भक्त रहा हूँ  बस !
नौरतों में माँ-दुर्गा की भक्ति का ज्वार उमड़ता है .लाउडस्पीकर की कान-फोड़ आवाज़ें रात देर तक गूँजती  हैं. भक्ति  के ढोल पीट कर करतब दिखानेवालों की बाढ़ आ जाती है .

मन में प्रश्न जागता है -कन्या पूज्य है ,और उसके बाद की सारी भूमिकायें उपेक्षणीय ? भगिनी,सहचरी ,माँ और कितने रिश्तों से अभिहित , द्वार आए याचक से ले  कर मान्यजनों तक की पूरणा करती हुई  पोषण  तत्परा गृहिणी ?
नवरात्रियों की पूजा सजीव नारीत्व की अभ्यर्थना है. बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक कुमारी ,युवती , ज्ञात-अज्ञात .कितने रूप कितने नाम !

उपवास ,कर्मकांड आदि से  काया को कितना भी रगड़ते रहें, भावना का परिष्कार नहीं हुआ तो यह सारा पूजा-पाठ व्यर्थ है ,मन का महिष बार-बार सिर उठाता रहेगा.
इस पर्वतीय प्रदेश में चूल्हे की आँच पर महिलाओँ को भोजन बनाते देखता हूँ  तो माँ का ध्यान आ जाता है. पहले हमारे घर में गैस नहीं थी . वह चूल्हे पर भोजन बनाती थीं .रसोई घर में, पीला प्रकाश बिखेरता बीच में  टँगा  एक बिजली का बल्ब था . माँ जब  अंगारों पर रोटी सेंकती  तो उन लपटों की हिलती रोशनी में उन का मुख  दीप्त हो उठता था.
  काल के व्यवधान  के साथ  भावों और कल्पनाओं से संकुल हो वह रूप स्मृतियों में अतीन्द्रिय  हो उठता है.
*
इन पर्वतों का जीवन बड़ा शान्तिपूर्ण है -नीचे मैदानोंवाली  वाली भागम-भाग से दूर . कहीं , कोई जल्दबाज़ी नहीं .
ट्रेन में कोई बता रहा था पहाड़  के लोग  ठाले-बैठे गप्पें मारते या नशापानी करते  हैं .काम-धाम की सारी जिम्मेदारी लुगाइयों की ,घर और बाहर खेती-पाती,पशु, साज-सँभाल सब उनके जिम्मे .
 महिलाओं के कुछ वाक्य कान में पड़ जाते हैं .एक कह रही है,' सब कट्ठे करके डाल देवें, मैं लत्ते धोवण में लग री .मरद से तो कुछ .होत्ता भी ना .'
'शान घटे सी. लुगाई के आग्गे कुछ करण की के जरूरत ?'
एकदम याद आ गई भोले शंभु भी भाँग-धतूरा चढ़ाये
रहते हैं या फिर समाधिलीन . सारे दायित्व सारे गौरा के हिस्से .सचमुच लोक-देवता का साक्षात् स्वरूप कि हम तो ठहरे निर्लिप्त-निरासक्त ,तुम माया हो. अपने को विस्तारो, हर जगह समाओ.
शाम की हवाओं में ठंडक घुल गई है -ऊपर से बैग उतार कर स्वेटर और गुलूबंद निकाल लिया (साथ में आया हुआ सुमति का छोटा-सा
संदेश तब से  उसी पॉकेट में पड़ा है). पहन कर तन को आराम मिला - तन से अधिक  मन को .
पहाड़ी मौसम की मनमानी में बहुत साथ दिया है इसने. सबसे ऊपर रखता हूँ कि झट से निकाल सकूँ .
पीछे बैठी दोनों महिलायें बड़े ध्यान से  बुनाई का डिज़ाइन देख रही हैं,'सोणी बुनाई गेरी है..'.उन्हें  भान नहीं कि मैं उनकी बात सुन रहा हूँ
 ,भाषा और लहज़े का ठेठपन छिपता है कहीं ,वही हरियाणेवाली हैं.
इधर जो वृद्ध सज्जन बैठे हैं शीशा गिराना चाहते हैं ,' बड़ी ठंडी हवा है भाई ..'
मैं हाथ बढ़ा कर  खींच देता हूँ ,' बेमौसम बरसात हुई है न,सर्दी एकदम से बढ़ गई .'
'इंसान अपनी मनमानी से कहाँ चूकता है ,तभी न कुदरत का हिसाब गड़बड़ा रहा है,'
किसी नदी का पुल पार हो रहा है .उधर किनारे की ऊंची सी चट्टान पर धोबी पछीट-पछीट कर कपड़े धो रहा है  ,पानी में घुमाकर कर पत्थरों पर दे मारता है -दूर-दूर तक छींटे बिखराता हुआ. मुँह से 'हेओ-हेओ' आवाज़ निकलती है .
कपड़े पर  पर कुछ जम जाए तो छुड़ाना कितना मुश्किल - रोएं  घिसते हैं कोरापन उड़ जाता है ,कपड़े की दमक खो जाती है .
मन को भी झटक-पटक कर स्वच्छ किया जा सकता है क्या ?
समय के साथ सब बदल जाता है. पहले छोटी-छोटी बातें मन को  ख़ुश कर देतीं थीं ,अब बड़ी बातें भी ज़रा देर में उड़ जाती हैं .


दुनिया का कोई व्यापार किसी के लिए रुकता नहीं .सारे  रिश्ते  समय के साथ रूप बदल लेते हैं .इसी सब के साथ चले बिना भी निस्तार नहीं .
'बस..बस  ज्यादा वैरागी मत बनो, ईश्वर ने जो दिया ग्रहण करते चलो बिरजू ...'
पर वैरागी था  कब मैं ? राग के बिना जीना भी कैसा जीना , संसार
एकदम निस्सार  हो कर रह जाय तो .
 अपना-अपना जीवन सबको जीना है .पारमिता तुम अपनी गृहस्थी में पूरी सच्चाई से, मैं  अपने संबंधों में पूरी ईमानदारी से.किसी स्तर पर साथ हैं दोनों ,एक विश्वास कि कोई अंतर्मन में  शुभाशंसा लिए बैठा है , हर दुख-सुख  पर  उसकी संवेदना  की छाँह है .

मन को अवलंब देने के लिए यही बहुत है .
पश्चिम के आकाश में हवाएँ बादलों के माडल  बना- बना कर बिगाड़ रही हैं .कभी तो अधबना ही छितरा देती है -  कार्यशाला में उनकी जोड़-तोड़ लगातार चल रही है.
अरुण कंठी श्यामा चिड़ियाँ चहकने लगीं . नन्हीं-नन्हीं कायायें पंख फड़फड़ाती हुई  इकटठी एक जगह आ बैठती हैं फिर एकदम चहचहाती उड़ जाती हैं,.जैसे हँसी की एक लहर डोल गई हो .
 उधर ढाल पर ग्वाला अपनी गायों-बछड़ों को जंगल से लौटाए लिये जा रहा है .भटके हुओँ को बार-बार टेरता है -घेरता है ,छोड़ेगा किसी को नहीं .

अपने पशुओँ पर नियंत्रण रखना आता है उसे.
बहुत चर लिया .लौट रहा हूँ मैं भी ,अपने झुंड में सम्मिलित हुए बिना निस्तार कहाँ ?
'ओ चरवाहे  सँग-सँग मुझे लिए चल !'

(समाप्त)
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

ब्रह्मांडीय ध्वनियों का दृष्यात्मक रूप - देवनागरी लिपि .



  ब्रह्मांडीय ध्वनियों का दृष्यात्मक रूप - देवनागरी लिपि .
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लिपि के विषय में यजु तैत्तरीय संहिता में एक कथा दृष्टव्य है  -
देवों के सामने एक बड़ी कठिनाई आ गई ,वे जो बोलते वह वाणी अदृष्य हो जाती है ,फिर उसका कोई चिह्न नहीं बचता .अपनी समस्या उन्होंने इन्द्र के सामने रखी . वाणी को आकार देने के  लिये इन्द्र ने वायु देव का सहयोग माँगा.तब वह अक्षरों में साकार होने लगी (दक्षिण में लेखन विद्या 'इन्द्र वायव्य व्याकरण' नाम से जानी जाती है .) 
ब्रह्मांडीय ध्वनियों के अनुसरण पर रचित होने के कारण यह लिपि ,उस (देव) वाणी का दृष्यात्मक रूप है .
वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. ओमप्रकाश पांडे के अनुसार
 ' इसे अपौरुषेय  इसलिए कहा जाता है कि इसकी रचना ब्रह्मांड की ध्वनियों से हुई है। उन्होंने बताया कि गति सर्वत्र है. गति होगी तो ध्वनि निकलेगी और  ध्वनि से शब्द  सौर परिवार के प्रमुख, सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं, और ये चारों और से अलग-अलग निकलती है. इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनन पर भाषा के 36 स्वर बने. इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती है तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसु की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे के 72 व्यंजन बन गये.'
ब्रह्मांड की ध्वनियों से तात्पर्य है जो शब्द-ब्रह्म  व्यापक नाद के रूप में सारे ब्रह्मांड में व्याप्त है.(ध्यानावस्था में यह सर्वव्याप्त नैसर्गिक संगीत, साधक को सुनाई देता है ). यूरोप के प्राचीन दार्शनिकों को भी इसके अस्तित्व में विश्वास था उन्होंने इसे ."म्जूज़िक ऑव दि स्फ़ियर्स' (विश्व का मधुर संगीत) कहा था  यही(अनहद नाद)जो किसी टकराहट के बिना बजता है और निरंतर गुंजित होता है.
तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना कि कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांति अनुभव करती है.
 ऋषियों ने अपनी स्थिर-चित्तता और ध्यान के द्वारा उन संगीतमय तत्वों को समझा था , जिसे आज के भौतिक शास्त्री विज्ञान के माध्यम से समझ पाते हैं.उनके अनुसार सभी प्राकृतिक रूपाकार और दृश्य-जगत का स्वरूप संगीत-लहरियों की सारणियों के समान है. जो कुछ ऊपरी तल पर सघन (ठोस) दिखता है, वह गहरे स्तर पर  लहरों और तरंगों से युक्त है.
ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है. इन ध्वनियों को नासा ने भी माना है. स्पष्ट है कि वैदिक काल में  ब्रह्मांड में होने वाली ध्वनियों का ज्ञान ऋषियों को था. तभी स्वरों के सहारे वे पिंड को ब्रह्मांड से जोड़ सके.

 ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों को ले कर  संस्कृत की रचना हुई और  इन्हीं  के आधार पर इसकी वर्णमाला रची गई ।  इसी भाषा में ऋषि मुनियों ने मन्त्रों की रचना की क्योंकि ब्रह्मांडीय  ध्वनियों के अनुसरण पर रचे गये इन वर्णों का  उच्चारण मस्तिष्क में उचित स्पन्दन उत्पन्न करने के लिये अति प्रभावशाली था . इसका, प्रकृति और पर्यावरण से गहरा संबंध है. इसकी ध्वनि के स्पर्श से पर्यावरण सात्विक होता है.सृष्टि की इन  मूल ध्वनियों को पकड़ कर स्वरों में बाँधना और उनका नियमन कर लेना  किसी साधारण व्यक्ति की सामर्थ्य में नहीं .पिंड को ब्रह्मांड से संयोजित करने का यह अनूठा प्रयास था.
उन्होंने वाणी -विज्ञान पर भी गहन विचार किया ,और आत्मा में झंकृत होने से लेकर मुखर होने तक उसके चार स्तर निर्धारित किये (परा ,पश्यंती, मध्यमा और वैखरी).  वैखरी में आने पर वाणी ध्वनित होती है ,जिस मुखावयव से वह  उच्चरितण उस के आधार पर उसका वर्गीकरण किया .प्राचीन संस्कृत के स्वरों और व्यंजनों में ,उन्हीं ध्वनियों को क्रमानुसार आबद्ध किया गया  है .
 यह  क्रम आगे चला  और  श्रुति-परंपरा  में चलती हुई भाषा का रूप विकसित होने पर   -उसमें अनेक परिवर्तन आने लगे थे. पाणिनि ने भाषा को व्यवस्थित रूप में व्याकरण-बद्ध कर  कर उसका संस्कार किया ,वह संस्कृत कहलाई .संस्कृत पूर्व वैदिक भाषा पूर्व भाषा के अपौरुषेय वर्णों को आकृति रूप देने के लिये वे मनीषी उतनी ही समर्थ और सतर्क लिपि की संरचना में प्रवृत्त हुये होंगे .पूर्व प्रचलित ब्राह्मी लिपि का परिष्कार कर जो रूप रचना की गई - वही है यह देवनागरी .
ब्रह्मांडीय ध्वनियों के अनुसरण पर रचित होने के कारण देव वाणी उसका दृष्य रूप है .
स्वर और व्यंजन में तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक क्रम-विन्यास - देवनागरी के वर्णों का क्रमविन्यास उनके उच्चारण के स्थान को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।जिसके अत्यन्त तर्कपूर्ण ध्वन्यात्मक क्रम होने के कारण ही अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक संघ (IPA) ने अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला के निर्माण के लिये आंशिक फेरबदल  स्वीकार कर लिया.
इसके स्वर और व्यंजनो की संख्या इतनी है कि सभी प्रकार की आवाजों को वैज्ञानिक तरीके से बोला तथा लिपिबद्ध किया जा सकता है . इन  स्वरों को भी दीर्घ, ह्रस्व और प्लुत तीन रूपों में बाँटा गया .इस लिपि की वर्णमाला तत्वत: ध्वन्यात्मक हैजिसमें एक ध्वनि के लिये  एक ही निश्चित संकेत-चिह्न  है.
 शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है.
 देवनागरी एवं संस्कृत ही दो ऐसे साधन हैं जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं. इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है.
 नासा के एक कार्यक्रम में वेदों में निहित ध्वनि-विज्ञान के बारे में डॉ. ओमप्रकाश पांडे ने एक व्याख्यान दिया था, जिसे आधार मान कर न्यूलैंड के एक वैज्ञानिक स्टेन क्रो ने एक डिवाइस विकसित कर लिया. ध्वनि पर आधारित इस डिवाइस से मोबाइल की बैटरी चार्ज हो जाती है. इस बिजली की आवश्यकता नहीं होती है.
 उन्होंने बताया कि इस डिवाइस का नाम भी 'ओम डिवाइस' रखा गया है.
वैज्ञानिक मानते हैं कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण  कंप्यूटर की सभी समस्याओं को हल करने में सक्षम है.
( अमेरिका संस्कृत को ‘नासा’ की भाषा बनाने की कसरत में जुटा है क्योंकि वही ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें  कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में सूत्र के रूप में कंप्यूटर के द्वारा भेजा जा सकता है.)
 ए एल बाशम, "द वंडर दैट वाज इंडिया" के लेखक और इतिहासविद् के अनुसार -
 'प्राचीन भारत के महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है जिसमें प्रथम स्वर आते हैं और फिर व्यंजन जो सभी उत्पत्ति क्रम के अनुसार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किये गए हैं. इस वर्णमाला का अविचारित रूप से वर्गीकृत तथा अपर्याप्त रोमन वर्णमाला से, जो तीन हजार वर्षों से क्रमशः विकसित हो रही थी, पर्याप्त अंतर है.'
इतनी समर्थ लिपि के स्थान पर किसी  अपर्याप्त और अनेक दृष्टियों से अक्षम लिपि को ग्रहण कर अपनी अनेक सांस्कृतिक धरोहरों से वंचित हो जाना ,और उन उपलब्धियों  को काल के गह्वर में समाने  के लिए छोड़ देने का विचार ही कष्टदायक लगता है .

'यदि हम भारत में संस्कृत की अवहेलना करते रहे तो हम अपने मूल को स्वयं ही नष्ट कर देंगे जो सृष्टि के निर्माण काल से वर्तमान तक की अटूट कडी है. नहीं तो फिर हमें संस्कृत सीखने के लिये विदेशों में जाना पड़ेगा।'
 - चाँद शर्मा.
और तब हमें अपनी पहचान के लिये दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा क्योंकि व्यक्ति, जाति तथा राष्ट्र की पहचान उस की वाणी से होती है.
*
( गूगल से मिली जानकारी के लिए आभार ),
*


बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

बिहार की माटी की सोंधी गंध..

12 फरवरी को जिनका जन्म दिवस है,अनेक विभिन्नताएँ  जिस व्यक्तित्व को बहुआयामी  और पूर्णतर बनाती हुई सतत नवीनता का संचार करती हैं ,हृदय और मस्तिष्क की सुचारु समन्विति ,लेखन में जीवन्तता भर, रमणीय अर्थ का हेतु बन,  लोक एवं प्रबुद्ध सभी स्तरों पर पाठक मन को बाँधे रखने में  समर्थ हैं ,मैं उन सलिल वर्मा का अभिनन्दन करती हूँ !
 व्यापक  अध्ययन का प्रभाव , दृष्टि और सृष्टि की व्याप्ति में मुखरित  करते हुए  सलिल की  अपनी शैली है - कलम में बिहार की सोंधी माटी की गंध समाए दुनिया-जहान की चर्चाएँ,  लोक और वेद(विज्ञता) दोनों को साधने का निराला अंदाज़ उन्हें विलक्षण बनाता है . यों तो सारी कलाएँ विद्याएँ और कौशल(तकनीकी ज्ञान)'साहित्य' शब्द की 'सहित' वाली व्युत्पत्ति में समाहित हैं ,लेकिन सलिल के व्यक्तित्व में संगीत, साहित्य और  अभिनय  की त्रयी उनके कथ्य को बड़ी सहज भंगिमा से सज्जित कर,  पाठक का मन बाँधे रखती है , और सबको हृदयानुभूति से जोड़ अपना बना लेने की विलक्षण कला उनके लेखन को भी जीवन्त अनुभव बना देती है .
 व्यक्तित्व ही साहित्य में प्रतिफलित होता है या यों कहें कि साहित्य भाषा का व्यक्तिनिष्ठ प्रयोग है ,तो सलिल को उनके लेखन में प्रतिबिंबित होते देखना ऐसा  सुखद अनुभव है जो मुझे ही नहीं बहुतों को आनन्दित करता है. मनस् एवं बौद्धिक प्रक्रियाओं से आपूर्ण जीवनानुभवों के  सहज , सरस और बहुआयामी प्रस्तुतियों की  मौलिकता उन्हें जहाँ इतना लोकप्रिय और  आत्मीय बना देती है वहीं उनकी कलात्मक रुचियाँ ,  वस्तु को नव्य परिप्रेक्ष्य दे कर अनोखे टटकेपन से  निखारती  हैं .
यही है वाग्देवी की अनुकम्पा , जो व्यक्ति में   सृजनात्मिका शक्ति बन अवतरित होती है और  उसके  सृजन  को  पूर्णतर बनाती हुई , सृष्टा के साथ समष्टि को भी  अलौकिक आनन्द का भागी  बनाती है .
प्रिय सलिल ,तुम पर  माँ सरस्वती की कृपा-दृष्टि  निरंतर बनी रह कर उन्नयन की ओर अग्रसर करती रहे!

 वत्स !  इस  शुभ जन्म-दिवस पर मैं , स्वास्थ्य,सफलता,सुयश और समृद्धियों से पूर्ण तुम्हारे शतायु  होने की कामना करती हूँ !

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

एक प्रयोग ( कथांश - 29.पर)


 {मेरे विशेष आग्रह पर  ,सर्वप्रिय ब्लागर, श्री सलिल वर्मा जैसे कुशल  एवं अनुभूति-प्रवण गद्यकार ने अपनी व्यस्तता के बावजूद भी ,अतिथि लेखक के रूप में  इस कथांश को  प्रस्तुत किया है . यह हमारा एक प्रयोग है  -इस आशा के साथ कि एक ही कथानक पर दो व्यक्तियों का लेखन, मूल वस्तु  के निरूपण में कुछ नई ग्राह्यता  लाकर नवीन बोधों  का संचार करे .
इस पर सहृदय- जनों की प्रतिक्रिया हमें आगे विचार करने को प्रेरित करेगी - सुधीजन अपने बेलाग विचारों से हमें उपकृत करें !  -प्रतिभा.}
 *
 कथांश -29.
सफ़र पर रवाना होने से पहले मैं वसु के घर गया... वसु का घर तो वह बाद में हुआ था,

पहले तो पारमिता का घर है. मैं जानता हूँ कि पारमिता का घर कहते हुये मैं असहज हो

जाता हूँ. अगर वसु उस घर की बहु न होती तो मैं क्या कहता... शायद तब उस घर से मेरा

कोई सम्बन्ध ही न रहा होता.

सफ़र पर रवाना होने से पहले मैं वसु के घर गया. लेकिन प्रवेश करते ही सामना हो गया पारमिता से. शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मैं यहाँ आया होऊँ और पारमिता के अलावाकिसी और से सामना हुआ हो मेरा. ओशो कहते हैं कि ख़ाली सड़क पर गाड़ी चलाते हुये अगर दूर सड़क किनारे लगे किसी लैम्प-पोस्ट से टकराने का ख़्याल दिमाग़ में बैठा हो तो पूरी सड़क छोड़कर इंसान उस खम्बे से टकरा जाता है. 
  पारमिता का ख़्याल इस घर में आतेहुए इस तरह दिमाग़ पर छाया रहता है कि बस वही मिल जाती है मुझे अगवानी में.
”आइये ,ब्रजेश बाबू!” पारमिता ने एयर-होस्टेस वाले अन्दाज़ में मुस्कुराते हुये कहा. 
”यात्रा पर निकलने से पहले सोचा वसु से मिल लूँ!” 
”क्यों, मुझसे नहीं मिलने का मन हुआ!”
विनोदी स्वर में पारमिता ने उलाहना दिया.
”नहीं तुम सब से मिलने आया हूँ!” मैं झेंप गया
.”अच्छा है! घूम आओ. बदलाव तुम्हारे लिये बहुत अच्छा रहेगा. यात्राएँ नये अनुभव देती
हैं.”
”पलटकर देखता हूँ तो अब किसी भी नये अनुभव से डर लगता है.”
”इतना भारीपन अच्छा नहीं. कुछ दिन की छुट्टी ज़रूरी है.”
”भारीपन से नहीं डरता हूँ मीता, दिल के बोझ से घबराता
हूँ.”
“समझ सकती हूँ बिरजू, बड़े कठिन दिन झेले हैं तुमने.
”कठिनाई तो जीवन का अंग हैं.
लेकिन जब अपनी विवशता कठिनाई को जन्म दे तो टूट जाता है इंसान.”
”वो विवशता परमात्मा की इच्छा थी बिरजू. प्रसाद समझकर स्वीकार करो उसे. अतीत को थामे रखने से ज़िन्दगी नहीं थमती, बोझ और घुटन साँसें थमने तक पीछा करती रहती हैं.”
”मैं ही क्यों...मेरे साथ ही क्यों.. मैं यीशु नहीं हूँ मीता कि कह दूँ - जैसी तेरी मर्ज़ी. मुझे जवाब चाहिये,
जबकि मुझे ख़ुद नहीं मालूम कि मेरा सवाल किससे है!”
”तुम्हें कैसा लग रहा है ब्रजेश?”
पारमिता ने बात की दिशा मोड़ते हुए पूछा. हालाँकि उसके इस सवाल का कोई औचित्य नहीं
था.
” बस जीवन के पड़ाव पार करता चल रहा हूँ. एक तटस्थ सी मनस्थिति... भावातीत अवस्था... दु:खी नहीं हूँ, पर सुखी हूँ? क्या पता.”
”हम्म्म!” पारमिता इससे आगे कुछ भी नहीं कह पाई. कुछ कहना मतलब ऊन का सिरा पकड़कर खींचना... और अतीत के स्वेटर उधेड़ना.
“अरे! भैया!!” अचानक वसु कमरे में दाख़िल होते हुये बोली, “आप कब आए?”
”बस अभी-अभी...!”
“ब्रजेश! तुम्हारे लिये वसु और तनय ने ही सारी ख़रीदारी की हैं!” मीता अब खुलकर बोल पा
रही थी. “”वसु! अब तुम ही अपने सामने सारे सामान रखवा दो!”
“सारे सामानों की लिस्ट आपने ही तो बनाई थी दीदी! मैं सारी ज़रूरी दवाएँ भी ले आईहूँ.”
जाने की सारी व्यवस्थाएँ पूरी हो चुकी हैं. एक उदासी ख़ामोशी की चादर ओढ़े कमरे में ऊँघ रही है.

काम-धाम के बीच अनायास छा जाने वाले निर्लिप्तता के पल मैंने देखे हैं. अपना काम करते हुये कोई कैसे इतना निस्संग हो जाता है. सबका कर्त्ता होते हुये भी अनासक्त... अपने आप में विलीन और फिर अचानक वर्त्तमान, जैसे नाटक के दूसरे अंक में प्रवेश कर आया हो.
सात बार वेदी पर घूमे, लेकिन केवल मजबूरी में
अपना दु:ख छोटा लगता है, जब वे चरण याद आते हैं!हॉस्टल के उस कविता-प्रेमी रूममेट से
सुनी ये पंक्तियाँ अनायास होठों पर आ गईं. अंतस भीग गया पूरी तरह... दर्द की करवट या
जागी हुई पुरानी वेदना. मन भी बड़ा विचित्र है... कभी लीन – कभी उचाट, कितना दौड़ता-

दौड़ाता है, फिर भी कोई काम नहीं रुकता. दुनिया गले में पड़ा ढोल है... बीच-बीच में आवाज़
आती रहनी चाहिये – बिन पीटे गुज़र कहाँ!
***
अगले ही दिन एक पार्सल आया. ये किसने भेजा है मेरे नाम... लिखावट देखी सी थी, पर
पहचानी नहीं थी. पार्सल खोला तो एक डिब्बे में जमाकर रखा ऊनी पुलोवर और गुलूबन्द –
हाथों का बुना हुआ. दिमाग़ के दरवाज़े धकेलकर कई सवाल दाख़िल होने की जद्दोजहद में
थे...
“ब्रजेश जी! जा रहे हैं. पिछले दिनों बहुत भार झेला है. मन का विचलन स्वाभाविक है.”
ये कौन बोला!! कौन बतिया रहा है मुझसे? मैंने अपना सिर घुमाकर देखा... कोई नहीं.
सामने खुला हुआ पार्सल और मेरे हाथ में उस पुलोवर में लिपटा काग़ज़ का एक टुकड़ा, जो
पलटते वक़्त मेरे हाथ में आ गया था. ये आवाज़ उसी से आ रही थी और इस आवाज़ ने उस काग़ज़ के टुकड़े को ख़त का नाम दे दिया था.
“जाइये भ्रमण कर आइये. मेरे बुने हुये ये ऊनी वस्त्र विषम मौसमों में कुछ ओट दे सकें तो मुझे प्रसन्नता होगी. आप पहनेंगे तो अच्छा लगेगा.”
मैंने एक बार फिर उन वस्त्रों पर नज़र डाली... उनपर हाथ फेरा तो ऊन की गर्मी से अलग किसी के स्नेह की ऊष्मा मुझे स्पर्श
करने लगी. कोई पहचाना... अचीन्हा... कोई अपना... कोई पराया... क्या था... कौन था?”
यही मनाती हूँ कि आपकी यात्रा सफल हो. आपका उद्देश्य पूर्ण हो. एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ. मेरी ओर से आप किसी प्रकार बाध्य नहीं हैं. आपका मन जो गवाही दे आप वही करें. विषम परिस्थितोयों में माँ जी, वसुधा जी और आपका बहुत अवलम्ब मिला. वे दिन पार हो गये, अब मैं सम्भल गई हूँ.”सु म ति...
 तभी मुझे लगा कि यह यह स्पर्श मुझ क्यों जाना पहचाना सा लग रहा है. अब उस ख़त में मुझे उसका चेहरा नज़र आने लगा था... वही मासूमियत और कृतज्ञता का भाव लिये वो मुझसे अपनी बात कह रही थी, नि:स्वार्थ होकर.”माँ-पिता जी ने भी अपना दुराग्रह छोड़ दिया है. मैं भी कुछ काम कर रही हूँ, आप बिल्कुल चिंता न करें. कुछ आपकी मजबूरियाँ रहीं – कुछ मेरी विवशताएँ. अब वह सब बीत गया. कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं कि इंसान का वश नहीं
रहता – अनचाहे भी. उस माँग को पूरा करना होता है – आप चिंता न करें.”
ये कैसा चमत्कार है भगवन. जो बातें, जो सवाल मैं मीता से आज सुबह कर रहा था उनके जवाब मुझे सुमति दे रही थी. उसकी बातों में एक पाकीज़गी थी. मुझे क्यों लग रहा था कि मैं उसकी बातों से पूरी तरह कंविंस होता जा रहा हूँ.
“ज़रूरत के समय आश्रय और आप लोगों का सहारा मिला. माँ ने जितना स्नेह दिया वह मेरे लिये जीवन भर की थाती है. शेष कुशल और हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकारें!”
इतना शालीन पत्र... संस्कारों की सुगन्ध लिये. कब वो पत्र मैंने पार्सल वाले डिब्बे में डाला और कब वो पुलोवर सिर से बदन पर उतारा, कब वो मफलर देवानन्द वाले अन्दाज़ में अपने गले के हवाले किया... मुझे होश नहीं. कोई मुझसे करवाता चला गया वो सब.
“वसु! ओ वसु!! देख क्या आया है मेरे लिये!””
”अरे वाह! हीरो लग रहे हैं आप!... दीदी! दीदी!! ज़रा इधर तो आना!”
“ओह्हो!! बहुत सुन्दर! जँच रहे हो तुम भी!” मीता ने कहते हुये डिब्बे से ख़त निकाल लिया और पढ़ने लगी. उसके होठों पर मुस्कुराहट नाच रही थी. “कितनी समझदार लड़की..!”और
फिर मेरी ओर देखकर यह कहती हुई अन्दर चली गई, “चलो तैयारी पूरी हुई!”

***सुमति को जवाब लिख दिया था. मगर बहुत कुछ अनकहा रह गया.

“उस दिन तुम्हारा हाथ पकड़कर साइड में खड़ा कर लिया था, वह क्या यों ही? तब कुछ  सोचा-विचारा नहीं था... मन के भीतर बैठा कोई करवा गया था. मेरे आगत के लिये अवलम्ब जुटा गया. अंतर्मन कुछ निर्णय अपने आप ले लेता है, ऊपरी मन को पता भी नहीं चलता.” यह सब लिखा नहीं गया मुझसे. झिझक ने हाथ रोक लिया.
     जिनसे आगे बढना चाहो, उनकी यादें अपने आप पीछे चली आती हैं. वो अफ़साना जिसका अंजाम नहीं सूझ रहा था, कहीं उसका कोई ख़ूबसूरत मोड़ तो नहीं...! सब छोड़कर अलग रहूँ कुछ दिन. हल्का हो लूँ, कुछ सन्यत होकर लौट आऊँ. बस! *** “भैया तुम जा रहे हो. मुझे अकेली छोड़कर?””मैं छुट्टी लेकर जा रहा हूँ. यूँ ही घूमने फिरने. वापसी अभी निश्चित नहीं. लेकिन आना तो है ही ना! सारे रिश्ते नाते, रीति-नीति... मुझे ही निभाना है! और अकेली कहाँ है तू! तनय हैं, तेरी दीदी है. हाँ, मेरी बहन तू अकेली है ,पगली!” “मज़ाक मत करो भैया! मेरा मायका होगा कभी कहीं? भाभी लाओगे न भैया!”
”हाँ बहिन! सुमति के पिता को भी आश्वस्त कर आया हूँ. आगे रहने का एक ढर्रा भी बनाना है, गले में टँगा ढ़ोल बजाये बिना निस्तार कहाँ...! पलायन नहीं, आगे की तैयारी के लिये एक के बाद एक सिर पड़े आघातों को सहला सकूँ जिसमें, बिखरती हुई ऊर्जा समेट सकूँ, इतना अवकाश
ज़रूरी लग रहा है मुझे! थोड़े दिन छुट्टी दे दे बस मेरी बहना!”
”राखी से पहले ज़रूर लौट आना. राह देखूँगी!”और उसी समय कमरे में रखे रेडियो पर गीत बजने लगा – अबके बरस

भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय, रे!!
-
सलिल वर्मा .
*

(क्रमशः)
*

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

कथांश - 29.

श्री सलिल वर्मा द्वारा पुनर्रचित ,कथांश - 29 अगली पोस्ट में प्रस्तुत है .
उस पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ यथस्थान सुरक्षित हैं .
असुविधा हेतु क्षमा करें !

- प्रतिभा सक्सेना .
*
( प्रिय गिरिजा,
तुम्हारी मुश्किल ( टिप्पणी में अंकित)का अनुमान कर वह पोस्ट फिर से लगा रही हूँ .)
*

यात्रा पर निकलने से पहले वसु से मिलने गया था.

बहुत समय बाद अकेले में पारमिता से बात हुई . शुरू में तो   समझ में  नहीं आया  क्या बोलें.

चुप्पी को उसी ने तोड़ा ,बोली ,' जा रहे हो ..,घूम आओ, बदलाव तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा .यात्राएँ नये अनुभव देती हैं '.

'हाँ , बहुत थक गया हूँ .इस भारीपन को झेलना मुश्किल हो गया  है  .कुछ दिन की छुट्टी चाहता हूँ .'

गंभीर थी वह भी ,' समझ रही हूँ . बड़े कठिन दिन झेले हैं तुमने .पर अपना ध्यान रखना .'

यह भी पूछा था,

'तुम्हें कैसा लग रहा है ब्रजेश?'

कैसा लग रहा है ?कुछ पल सोचता रह गया. ' जीवन के पड़ाव पार करता चल रहा हूँ. एक तटस्थ सी मनस्थिति-  दुखी नहीं हूँ .सुखी भी नहीं  . पर केवल अपना सोचने से काम कहाँ चलता है ?'

उसके मुँह से बस 'हूँ' निकला .

अधिक न मैं कुछ कह पाया ,न उसने  पूछा.

तैयारियों की बात होती रही .

'तुम्हारे लिए वसु और तनय ने कुछ खरीदारी की है ,'

फिर वसु के आवाज़ दे कर बोली थी - अब तुम्हींआ कर अपने सामने रखवा भी दो.'

वह बैठी देखती रही.

'दीदी ने कुछ  दवाओं  और ज़रूरी चीज़ों की लिस्ट बनवा दी थी - ये लो भइया .'

जाने की व्यवस्थाएँ  लगभग पूरी  हो चुकी हैं.

 चुप्पी-सी छाई है .

काम-धाम के  बीच अनायास छा  जानेवाले  निर्लिप्ति के क्षण मैंने देखे हैं. अपनी ड्यूटी सँभालते ,कोई इतना निस्संग क्यों हो जाता है? सब का कर्ता हो कर भी अनासक्त -   अपने में विलीन फिर अचानक वर्तमान , जैसे नाटक के दूसरे अंक में प्रवेश कर आया हो .

होस्टल के उस कविता-प्रेमी लड़के से सुनी एक पंक्ति मन में कौंध गई -' सात बार वेदी पर घूमे लेकिन केवल मजबूरी में, अपना दुख छोटा लगता है जब वे चरण याद आते हैं'.


तब भी  मन भीग उठा था , आज अनायास मन में फिर से वही वेदना  जाग गई .

लाख कोशिश करो सोच पूर्वाग्रहों से मुक्त  नहीं हो पाता.  मन विचित्र है  कभी लीन , कभी उचाट. कहाँ -कहाँ की दौड़ लगा आता है..फिर भी  कोई काम नहीं रुकता .  दुनिया एक ढोल है गले में पड़ा हुआ बीच-बीच में.आवाज़ होती रहनी  चाहिये - पीटे बिना गुज़र कहाँ ?

बस, अब दो दिन और , फिर अपना अकेले राम और अनजानी राहें !

*

अगले ही दिन मेरे नाम  एक अच्छा-खासा पार्सल आ गया !

'अरे, ये किसने भेज दिया ?' मुँह से निकला

 खोला तो हाथ का बुना एक पुलोवर,और मफ़लर .

साथ में पत्र भी - 'ब्रजेश जी' संबोधन के साथ


 'जा रहे हैं .जाइये बहुत पिछले दिनों भार झेला हैं .मन का विचलन स्वाभाविक है ,कर आइये भ्रमण .मेरे बुने हुए ये ऊनी वस्त्र, विषम मौसमों में कुछ ओट दे सकें तो मुझे ख़ुशी होगी.आप पहनेंगे तो अच्छा लगेगा.

यही मनाती हूँ कि आपकी यात्रा अपने उद्देश्य में सफल हो.

एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ मेरी ओर से आप किसी प्रकार से बाध्य नहीं हैं .आपका मन जो गवाही दे वही करें .विषम समय में माँजी,वसुधा जी और आपका बहुत अवलंब मिला .वे दिन पार हो गये. अब मैं सँभल गई हूँ .माता-पिता ने भी अब अपना दुराग्रह छोड़ दिया है .कुछ काम कर ही रही हूँ आप चिन्ता न करें .

 कुछ आपकी मजबूरियाँ रहीं, कुछ मेरी विवशताएँ .अब वह सब बीत गया .

 .कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती हैं कि इंसान का वश नहीं रहता -अनचाहे भी ,उस माँग को पूरा करना होता है -आप चिन्ता न करें ...'

वसु-पारमिता के लिए  आभार आदि पढ़ते-पढ़ते  स्वेटर  पर दृष्टि गई,

उठा कर देखने लगा.  खोल कर देखा खूब आरामदेह -बढ़िया साइज़ . मफ़लर उठा कर  गले मेैं लपेट लिया .

मुँह से निकला ,'अच्छा है?'

वसु को आवाज़ लगाई ,'देख तो.. मेरे लिए ये क्या आया है .'

'अरे वाह भइया !' मारे उत्तेजना के उसने  दीदी को पुकार लगा दी.

'क्या हुआ?' कहती पारमिता चली आई .

सब खुश - कितनी समझदार लड़की!

मैनें दोनों तहा कर तुरंत बैग में रख  लिए .

उन लोगों ने चिट्ठी भी उठाई और पढ़ ली ,मेरे मना करने की कोई तुक थी भी नहीं.

मीता की प्रशंसा भरी बोली - 'देखा!'

मैंने चिट्ठी फिर उठा ली ,' पूरी पढ़ी कहाँ अभी..'

'स्वेटर ट्राई करने की जल्दी जो थी ..'


  आगेका पढ़ने लगा -


'  ज़रूरत के समय आश्रय और  आप लोगों का सहारा मिला .माँ ने जितना स्नेह दिया मेरे लिए वह तो वह जीवन भर की थाती है.और कुछ औपचारिक पंक्तियों के बाद ,'शेषकुशल' और .

हार्दिक शुभकानाएँ स्वीकारें.'


पूरी पढ़ कर बैग की पाकेट में घुसा दी .

अब तक वहीं खड़ी थी ,चलते-चलते पारमिता एक वाक्य उछाल गई -

'चलो, तैयारी पूरी हुई !'

*

सुमति को उत्तर दे दिया था  -

आपके बुने स्वेटर से बहुत आराम निलेगा .तन से अधिक मन को .नौकरी न मिले तो भी ज़रूरत के लिए ही पारमिता के पास कुछ रखा  आया हूँ ..संकोच न करें.


मैं आऊँगा .विनीता की शादी तब तक तय हो जायगी आशा यही है.

मन में आया था लिखूँ ,'उस दिन हाथ पकड़ तुम्हें साइड में खड़ा कर लिया था ,वह क्या यों ही? तब कुछ सोचा-विचारा नहीं था पर भीतर बैठा कोई करवा गया. मेरे आगत के लिए अवलंब जुटा गया.

 अंतर्मन, कुछ निर्णय अपने आप ले लेता है ,ऊपरी मन को पता भी नहीं चलता.'

पर यह कुछ उसे लिखा नहीं.


जिनसे आगे बढ़ जाना चाहो उनकी यादें अपने आप पीछे चली आती हैं .


उसने पूछा था कैसा लग रहा है ?

कह नहीं पाया ,पर   लग तो रहा ही है ,मन उड़ा-उड़ सा  कहीं टिकता नहीं.कुछ नहीं . एक रीतापन !जिसे भरने का कोई उपाय नहीं.

सब छोड़ कर अलग रहूँ कुछ दिन थोड़ा .हल्का हो लूँ .अधिक संयत हो कर लौट आऊँ, बस .

*

वापसी कब?

अभी निश्चित नहीं, पर  आना तो है ही,  सारे रिश्ते-नाते ,रीति-नीति  निभाना है ..सुमति के पिता को आश्वस्त कर आया हूँ .आगे रहने का एक ढर्रा भी बनाना है.

गले में टँगा, ढोल बजाये बिना निस्तार कहाँ !

पलायन नहीं ,आगे की तैय्यारी के लिए .एक के बाद एक सिर पड़े आघातों को सहला सकूँ जिसमें , बिखरती हुई ऊर्जा  समेट सकूँ, इतना अवकाश बहुत ज़रूरी लग रहा है!


पारमिता ,मैं तुम्हें भी विरत नहीं खुशियों में डूबते देखना चाहता हूँ .जो मेरा साथ निभायेगी उसे भी प्रसन्न और तुष्ट रखना चाहता हूँ. अपने आप को कहीं सार्थक कर सकूँ - यत्न यही रहेगा  .


 जब वसु से कहा था,' मैं छुट्टी ले कर जा रहा हूँ ,यों ही घूमने-फिरने.. .'

वह परेशान हो उठी ,' भइया, तुम चले जा रहे हो  मुझे अकेली छोड़ कर?'

'नहीं पगली .अकेली कहाँ तू?. और तुझे तुझे कैसे छोड़ूँगा, अकेली बहन मेरी .लौट आऊँगा .यहाँ  तनय है और तेरी दीदी भी है  न!'

'मेरा  मायका होगा कभी कहीं ?..भाभी लाओगे न भइया ?

'हाँ बहिन ,जीवन के सारे ज़रूरी काम पूरे करूँगा ..अभी  थोड़े दिन छुट्टी दे दे बस ..!'

'ठीक है .राखी से पहले  जरूर लौट आना. राह देखूँगी . '

' चल, मान लिया !'

यही सही - अभी तो काफ़ी दिन हैं राखी के .

*

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

नव संवत्सर पर ..