बुधवार, 1 मई 2013

हमारा सेंसर-बोर्ड.


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भारत में सिनेमा और टीवी सीरियलों को प्रदर्शित होने से पहले सेंसर से गुज़रना पड़ता है .पर ऐसा लगता है कि कोई सुविचारित अनुशासन- व्यवस्था,या कला.संस्कृति,भाषा आदि के मानदंड निर्धारित नहीं हैं, जन-सामान्य पर उसका प्रभाव क्या पड़ेगा इसका कोई विचार नहीं, क्या संदेश जा रहा है इस ओर से भी उदासीन. सड़क चलता मनोरंजन और वैसी ही भाषा .इनके गानो और संवादों की सस्ते मनोरंजन वाली छँटी हुई शब्दावली पूरे देश (और विदेशों तक भी)पहुँच कर व्यवहार में आने लगती है .ऐसे उत्तेजक और सस्ते गाने जो संगीत कला को भी कलंकित  कर रहे हैं . . 
आज के अधिकांश चल-चित्र सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं .मनोरंजन के इन साधनों को नाट्यकला की आधुनिक परिणति मानें तो उसकी भी कुछ मान्यतायें और अपनी कुछ परंपराएं हैं जो समाज के हित-संपादन के लिए निर्धारित की गई हैं .लोक रुचि का विरेचन , परिमार्जन  और उन्नयन करने के साथ मानसिक आनन्द के स्थान पर उसे विद्रूप कर मर्यादाहीनता का पाठ पढ़ाया जा रहा है.भाषा भ्रष्ट हो रही है ,बज़ारूपन ,सस्तापन .क्रूरता और भोगवाद सब जगह हावी हो रहा है. यह मनोरंजन का साधन  न रह कर बाज़ारवाद का वाहन बन गया है .इन्द्रिय-बोधों को ऐसा  ग्रसता  हैं कि अनायास अपने प्रभाव में ले लेता है .परिणाम है संस्कार-हीनता और चारित्रिक- गिरावट ,जिसकी कोई सीमा नहीं .
अक्सर ही ऐसे चल-चित्र खूब चलते हैं जो स्वस्थ मनोरंजन देने और समाज में  जागरूकता लाने के बजाय मन की विकृतियों को हवा देते हैं  और भाषा-भूषा,आचार-विचार  पारिवारिक और सामाजिक व्यवहारों की जड़ें खोदते हैं.न सौन्दर्य ,न संदेश ,न सच ,बस उत्तेजित करना और इच्छाओं को हवा देना.
 इनके भोंडेपन और उद्देश्यहीनता पर नियंत्रण लगाना क्या सेंसर का काम नहीं है? .मनोरंजन के नाम पर कोई प्रस्तुतीकरण क्या ऐसा होना चाहिये जो सामाजिक और संस्कृतिक , मूल्यहीनता को प्रोत्साहन दे?  उसकी स्तरीयता और उद्देश्यपरकता  के साथ लोक जीवन पर उसके प्रभाव के आकलन  से सेंसर-बोर्ड का कोई वास्ता नहीं?यह भी कि इन्हें पास करनेवालों की  समाज और संस्कृति के क्षेत्रों में कितनी पैठ है जो इस पर गहराई से   विचार करें.
आखिर सेंसर काहे के लिये है?
 अगर आज हम यह प्रश्न नहीं उठायेंगे तो मूल्यहीनता के भंवर में डोलते आज के समाज को बाहर आने  में पता नहीं कितनी देर होती चली जायेगी .

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

हिन्दी की जान !

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सुन रही हूँ पूर्ण-विराम की खड़ी पाई या डंडा हिन्दी की जान है,उसके बिना उस की मौत हो जाएगी.बचपन  में कहानियाँ सुनी थीं परियों की ,राक्षसों की ,जादूगरनियों की ,उनमें से किसी- किसी की जान ,कहीं पिंजरे के तोते में ,किसी छिपी डिब्बी में बंद माला में  या ऐसे ही कहीं एक जगह रखी रहती थी. तब बड़ा कौतुक होता था सुनकर .उसके पीछे खूब तमाशे होते थे. कोई पूरी तैयारी से उसे मारने पर तुला होता था. बचानेवाला तो हीरो होगा ही  पर दुष्ट लोग उसे अपने वश में करने के पूरे यत्न करते रहते थे.
आज वही हिन्दी के साथ हो रहा है. इतनी प्राचीना,आयु-प्राप्ता हो गई, पहले भरा कुटुम्ब रहा - सब एक साथ मैथिली ,मगही ,भोजपुरी ,राजस्थानी ,बुंदेली ,अवधी ,ब्रज ,बाँगड़ू ,और भी कितनी ,सब एक परिवार रहे .कोई बोली लिखें-बोलें हिन्दी होती थी. यह भी सबके साथ मिल कर चलनेवाली ,उदार-मना ,आपसी लेन-देन में विश्वासवाली .
समय बदला, मन बदल गये. कमरों में रहनेवाली बोलियाँ बाल-बच्चोंवाली हुईं . अपना -अपना अलग करने लगीं. उनके बच्चे तू-तू ,मैं-मैं पर उतर आये. अलगौझा होने लगा बँटवारे की नौबत आ गई .रह गई खड़ी बोली .अकेली क्या करे !जो अपनेवाले थे, घर से ,बाहर निकले तो अंग्रेज़ी के सम्मोहन में ऐसे फँसे कि मुँह चुराने लगे ,उपेक्षा करने लगे. जैसे हिन्दी के होने से उनकी शान घटती हो.
यों समय के साथ चलती आई है हिन्दी, तमाम नये चिह्नों को ग्रहण किया है ,बढ़िया निभ रहा है.बवाल है फ़ुल-स्टाप पर . सबके साथ उसका प्रवेश भी हुआ.पर उसे देख लोग भड़क गये .कबीर के शब्दों में कहें तो 'उनहिं  अँदेसा और .. ' एक  बिन्दु  आयेगा तो साथ लायेगा नौ सौ जोखिम . यहाँ लोग दीवार देख कर रुकते हैं ,छोटी-सी बिन्दी किनारे कर देते हैं. हर छोटी-छोटी बात पर  कौन ध्यान देगा ? नई पीढ़ी भी साथ छोड़-छोड़ भाग रही हैं.जब अपने ही कन्नी काटने लगें,कैसे सधेगी भाषा बिना डंडे के !जिस डंडे के कारण अब तक जमी हुई है, चलती-फिरती है ,वही छीनने पर उतारू हैं लोग , कैसे सँभलेगी, कहाँ तक अपना भार ढोयेगी .एक ही तो सहारा है .
 सो  वही डंडा पकड़ाये दे रहे हैं !
भाई लोगन का कहना है हिन्दी अब पुरनिया भईं ,इनके पास अपने ज़माने का एक ही तो निशान बचा -डंडा , सबसे निराला! उसे काहे हटाय दें ?  ई और लोग ,उहै डंडा खींचन पे उतारू .छोटी सी बिन्दी से साधना चाहते हैं. जो हिन्दी की राह का  रोड़ा है.वैसे ही कमज़ोर ठहरी लड़खड़ा कर लुढ़क जाएगी .अंग्रेजी आदि  भाषाओँ ने इसे खूब साधा. उन में इतनी व्याप्ति और मज़बूती है ,ऊपर से सब मिलकर साध लेते हैं- कितने भी रोड़े डाल कर देख लो !
इधर अपनी साथिन मराठी भी समर्थ है.उसने  विश्राम-सूचक लघु बिन्दु उत्साह से स्वीकारा ,मज़े से धार लिया .उसके अपने लोग हाथों-हाथ लेते हैं.
मतलब यह कि डंडा होगा, किसी की मनमानी नहीं चलेगी. हम तो कहते हैं हालातों ने जो नई ध्वनियाँ डाल दीं -ऑ,क़,ख़,फ़,ज़ आदि उन्हें भी धकिया दो ,पराई आवाज़ों की कोई जरूरत नहीं . हिन्दी हमारी माँ है ,जैसी है बढ़िया है .बुढ़िया है फ़ैशनेबल मत बनाओ(बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम वाली नौबत न आये) .हिलती-डोलती-चलती रहे बस!. ये  सब अविचारी उसका विराम-दंड छीन, फ़ुलस्टाप पर टिकाना चाहते हैं .अगर   माई भरभरा कर गिरी , तो कौन सेवा-सुश्रुषा करेगा? गिरी-पड़ी यों ही बिदा हो जाएगी..और तब सारा पाप-दोष ,देख लेना, इन्हीं डंडा छीननेवालों के सिर पड़ेगा!
तो फ़ुल-स्टॉपवाली बिन्दी को गोली मारो,बस डंडा उसके हाथ पकड़ा कर निचिंत हो जाओ !
समझदार को इशारा काफ़ी! 
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(हमारी मातृभाषा इतनी विवश और दुर्बल नहीं कि ,विराम का डंडा हटाने से धराशायी हो जाये .फ़ुलस्टाप लगाने से उसकी गतिशीलता किसी प्रकार कम नहीं हो सकती .हिन्दी ने भी अन्य भाषाओं की तरह बिन्दु के प्रयोग को जहाँ स्वाभाविक रूप में ग्रहण किया वहाँ उसकी गतिशीलता किसी प्रकार बाधित नहीं हुई . )

रविवार, 14 अप्रैल 2013

एक मोहक लोक-विधा की जीवन-यात्रा : नचारी .


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[कुछ प्रतिक्रियायें पढ़ कर लग रहा है कि 'नचारी ' का स्वरूप स्पष्ट हो सके इसके लिए कोई उदाहरण (हिन्दी भाषा में)सामने हो तो अधिक सुविधा होगी .एक नचारी -]

नोक -झोंक
'पति खा के धतूरा ,पी के भंगा ,भीख माँगो रहो अधनंगा ,
ऊपर से मचाये  हुडदंगा , ये सिरचढ़ी गंगा !'
फुलाये मुँह पारवती !
'मेरे ससुरे से सँभली न गंगा ,मनमानी है विकट तरंगा ,
मेरी साली है, तेरी ही बहिना,देख कहनी-अकहनी मत कहना !
समुन्दर को दे आऊँगा !'
'रहे भूत पिशाचन संगा ,तन चढ़ा भसम का रंगा ,
और ऊपर लपेटे भुजंगा ,फिरे है ज्यों मलंगा !'
सोच  में है पारवती !
'तू माँस सुरा से राजी ,मेरे भोजन पे कोप करे देवी .
मैंने भसम किया था अनंगा ,पर धार लिया तुझे अंगा !
शंका न कर पारवती !'
'जग पलता पा मेरी भिक्षा ,मैं तो योगी हूँ ,कोई ना इच्छा ,
ये भूत औट परेत कहाँ जायें ,सारी धरती को इनसे बचाये  ,
भसम गति देही की !
 बस तू ही है मेरी भवानी ,तू ही तन में औ' मन में समानी ,
फिर काहे को भुलानी भरम में ,सारी सृष्टि है तेरी शरण में !
कुढ़े काहे को पारवती !'
'मैं तो जनम-जनम शिव तेरी ,और कोई भी साध नहीं मेरी !
 जो है जगती का  तारनहारा , पार कैसे मैं पाऊँ  तुम्हारा !' 
मगन हुई  पारवती !]
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हिन्दी के पाठकों के लिए 'नचारी' एक अल्प-ज्ञात विधा रही है ,जिसका  आगमन आदि-कालीन कवि ,मैथिल-कोकिल विद्यापति के काव्य में समारोहपूर्वक पूरी विदग्धता और रसात्मकता के साथ  होता है और फिर उन्हीं के साथ प्रस्थान भी.शासन बदले,नई चुनौतियाँ सामने आईं भक्ति की वह मस्ती गई जो विद्यापति और कबीर के स्वभाव में थी ,शौर्य और शृंगार की कदमताल रुक गई .बदलते परिप्रेक्ष्यों में ,कभी-कोई भूला बिसरा कवि ही 'आज मैं एकु-एकु करि टरिहौं.' कह कर आराध्य को ललकारने का साहस कर सका. दैन्य का विस्तार होने लगा. कविता की उमड़ती लहरें मर्यादा के बाँधों में सीमित हो दीन मुद्रा दिखाने लगीं, फिर 'नचारी' जैसी उन्मुक्त विधा की गुज़र कहाँ होती! 
  आदिकाल की काव्यधाराएं  क्षीण पड़  गईँ थीं .साहित्य-मंच पर मुख्य भूमिका निभाने अन्य भाषाएँ अपने संस्कारों सहित आ विराजीं. ब्रज और अवधी का प्राधान्य हो जाने से मूलरूप में मैथिली में रची जानेवाली यह  विधा  विद्यापति के बाद साहित्य-जगत से लुप्त हो गई, यहाँ तक कि ''नचारी'' संज्ञा  भी लोगों के लिए अपरिचित हो गई . लेकिन उसका लोप नहीं  .सीमित क्षेत्र में ही सही, 'नचारी' ने अपनी उपयोगिता बनाए रखी  ,और जन-जीवन से जुड़ी रही .हिन्दी का सामान्य पाठक भले ही परिचित न हो पर अपने क्षेत्र में इसने असीम लोक-प्रियता पाई और अभी भी लोक-जीवन को रस-विभोर कर रही है .
 'नचारी' को मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है. इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' में प्राप्त होता है. इसकी रचना में लोक-भाषा (देसिल बयना ) का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण विदग्धता , रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं. आराध्य की परम निकटता से प्रेरित, निश्छल मन की अंतरंगता और लोक-मन की बेधड़क उक्तियाँ , मुँह लगे सेवक के समान कहा-सुनी पर भी उतारू हो जाए पर उसके महत्व की स्वीकृति 'नचारी' का सर्वोपरि तत्व है- हँसी-ठिठोली ,उपालंभ ,शिकायत ,सब-कुछ ,निष्ठा के अटूट तार में पिरोया हुआ .'नचारी' भक्ति- काव्य का ही एक रूप है . 
 'नचारी' का संबंध नाच से भी जोड़ा जाता है .आराध्य के आगे अपनी लाचारी एवं विवशता को वर्णित करते हुए ,अपनी मनोभावनाओं  को बिना किसी लाग-लपेट के  प्रभु के सम्मुख नाच-गा कर प्रस्तुत कर देना इनका उद्देश्य है.अन्य देवताओं के लिये  और सामाजिक थीम पर भी नचारियाँ प्राप्त होती हैं .नेपाल में 'नचारी' की धुन पर भक्ति-गीतों का लेखन पर्याप्त मात्रा में होता रहा  है . विष्णु और गणेश,सूर्य,दुर्गा  की नचारियाँ मिल जाती हैं.
हिन्दी के शैव-साहित्य में नचारियों का विशेष स्थान है,इनमें आराध्य के प्रति भक्त की  भावनाओं का उद्रेक सर्वत्र विद्यमान रहता है. लिखित से पहले मौखिक परंपरा में प्रचलित रही हो यह संभव है क्योंकि नृत्य और गान के साथ उसकी स्वीकृति और लोक-प्रियता, दरबारी कवि के जीवन-काल में ही इतना व्यापक रूप पा ले यह बहुत आसान  नहीं लगता -विशेष रूप से जब प्रकाशन और प्रसारण के साधन विकसित न हुए हों . 'नचारी' का विस्तार सुदूर नेपाल से लेकर उत्तर भारत के पूर्वी क्षेत्रों तक है.. बिहार ,बंगाल, उड़ीसा, असम और नेपाल के साथ ही साथ अवध के भी ज्‍यादातर हिस्‍सों में  लोक-गीतों के रूप में  इसकी व्याप्ति रही है.अबुल फ़ज़ल के 'आईने अकबरी' में इनका उल्लेख होना ,इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है.
मौखिक परंपरा में 'नचारी'-गीत मिथिला के घर-घर में प्रचलित हैं .विद्यापति(14 वीं शताब्दी)प्रथम 'नचारी' लेखक माने जाते हैं .अन्य कुछ नाम हैं परमहंस विष्णु पुरी(1425-1500),गोविन्द,कामश्याम,उमापति(1570-1650),लाल लक्ष्मीनाथ गोसाईं,कान्हा रामदास और चंद झा(1831-1907,.संस्कृत के  पंडित होते हुए भी विद्यापति का  ‘भाखा प्रेम’ अद्वितीय था.  देशी भाषाओं की लहर जब पूरे देश में फैल रही थी तो उन्होंने ही  अगुआई की थी. ' देसिल बयना सब जन मिट्ठा' कह कर वे भारतीय भाषाओं को सादर आमंत्रण दे रहे थे.राज-दरबार में रहते हुये भी उन्होंने समझ लिया था कि जन-रुचि के परिष्करण और रस के संस्कार देने के लिए लोक-भाषा के महत्व और साहित्य का समाजिक-जीवन से जुड़ाव कितना आवश्यक  है .लोक-शैली और लोक-भाषा में रचित नचारियाँ मन  का रंजन करती हुई , जन-जीवन में इतनी रमी हैं कि  तीज-त्यौहार,सामाजिक और धार्मिक उत्सव .विवाह जनेऊ आदि और लोकाचार के हर अवसर पर इनका गायन नये रंग और उल्लास भरने लगा  .
विद्यापति का काव्य सरस, मधुर एवं देसिल बयना में होने के कारण इतना लोक-प्रिय हो गया कि उनके जीवनकाल में ही  लोक-कंठ का शृंगार बन गया और समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे अपनी जीवन-पद्धति में शामिल कर लिया . 
 मैथिल-कोकिल ने तत्कालीन समाज की स्थितियों को अनदेखा नहीं किया था.महेशवाणी और 'नचारी' के माध्यम से  गरीबी, पराधीनता और विभेद को जिस कौशल से उन्होंने सामने रखा वह दृष्टव्य है- वे ही अपने अराध्य शिव से कह सकते हैं कि ‘क्यों भीख मांगते फिर रहे हो, खेती करो इससे गुण गौरव बढ़ता है.’ (बेरि बेरि अरे सिब हमे तोहि कइलहूँ, किरिषि करिअ मन लाए/ रहिअ निसंक भीख मँगइते सब, गुन गौरब दुर जाए).
उनकी उक्तियों में 
 मध्ययुग के समाज की दशा के साथ सामंती समाज के नारी-मन की वेदना बोल उठी है 
- 'कौन तप चूकल हूँ भेलहूं जननी गे (हे विधाता, तपस्या में कौन सी चूक हो गई कि स्त्री होके जन्म लेना पड़ा!)'
 यह काव्य-विधा आज भी अप्रासंगिक नहीं हुई है ,लोक-जीवन और उत्सव-परंपराओं में में रसी-बसी है . बाबा नगरी देवघर में बसंत पंचमी के मेले की परंपरा  प्राचीन काल से चली आती है.है. उत्तरवाहिनी गंगा से कांवर लेकर बाबाधाम पहुँचे काँवरियों को 'तिलकहरू' कहा जाता है. इसमें मिथिला प्रांत के भक्तों द्वारा बाबा बैद्यनाथ का तिलकोत्सव  होता है. वे पार्वती  के मायके वाले हैं अतः शिवरात्रि के पूर्व यहाँ आ कर बाबा बैद्यनाथ का तिलक कर विवाह का न्योता देते हैं. 'नचारी' और महेसबानी गा कर वे मगन-मन नत्य करते हैं और उत्सव मनाते हैं.मिथिलांचल में भी सावन महीने में मधुश्रावणी पर्व पर नव-विवाहिताओं के  'नचारी' गायन से घर आँगन और बगीचे गुंजायमान होने लगते हैं 
 'नचारी' विधा का यही स्वर  30-32 के अवज्ञा आन्दोलन में एक नया रूप धरता है .
समय के अनुरूप मैथिल कवियों ने अपना कथ्य इस शैली में सँवार लिया .चारों ओर के आघात झेलती बिहार की धरती  लोक-गीतों में अपनी व्यथा उँडेल देती है .एक किशोर कवि  'प्रलयंकर'के कंठ से 'नचारी' में ढल  कर अत्याचार के विरुद्ध  आक्रोश फूट निकला -
'दुर दुर कहेन छे सरकार,
आपन बैसल मौज करे छै,
प्रजा करे हाहाकार
दुर दुर कहेन छे सरकार,'
  जनता को सचेत करते एक मुसलमान कवि की शिकायत,   'अल्हुआ(शकरकंद) भ गेल साबूदाना'
बिहार के किसान- आन्दोलन में लोक-कवि का स्वर पुकार कर पूछता है-
'क्यों बाबू साहेब,क्यों गरीब
क्यों बागमंत क्यों कमनसीब
सब बैसय हमरी छाती पर ,
कटहर हो अथवा नारिकेर .'
और भी -
'हम भार सम्हारी सबहि केर,
खाम्ही खुट्टा लरबर लरबर,
जे करइत हो चरमर चरमर
हम ओ भरिगर पुरना मचान' .
इसके साथ ही -
'पीसे अछि हमरा जमिंदार,
सोके अछि हमरा सूदवाला ,'
उधर नदियों की बाढ़ चैन नहीं लेने देती-
'चौपट्ट करे छवि साल-साल 
जीवछ करेह कोसी कमला,'
दुर्भाग्य यह कि उन्हें कोई भी  नहीं बख़्शता, 
'कुश तिल लै आवति ओझा जी,
हंटर लै घुमति दरोगा जी'
और तो और देवता भी लेवता बन गया है.
-हम से वे भी अपना मतलब साधने लगे हैं -
'रहता प्रसन्न बरहम बाबा,जो दूध बहावैं भरि छावा.'
   बिहार के मिथिला क्षेत्र में एक पमरिया नामक समुदाय, निवास करता है. जो इस्लाम का अनुयायी है. पर बच्चे के जन्म के मौके पर ये लोग हिंदू समुदाय के भजन, लोकगीत आदि गाते हैं.अगुआ अपने पुरुषोचित माने जाने वाले वस्त्रों को बदलकर घाघरा चुनरी आदि पहन ढोलकी और झालर के साथ शुरू करते हैं .'आहे दुर्गा जी के नामे,' 'आहे भोला बाबा के नामे', दोहराते दोहराते, नाचना गाना शुरू करते इस्लाम को मानने वाले ये तीनों 'नचारी', महेशवाणी गाने लगते हैं और बच्चे को  दुआ देते हैं. कुछ समय पहले तक ऐसा दृश्य सचमुच घर-आंगनों में दिखाई दे जाता था . डमरू ध्वनि के साथ 'नचारी' के स्वर, देवधर से भागलपुर और काशी में भी अब तक सुनाई देते हैं . 
आज के साहित्य के लिए यह भले ही अप्रचलित विधा हो गई हो लेकिन अपनी जीवंत अनुभूतियों ,सहज भंगिमाओं , ताज़े रंगों सतत प्रवाहित भाषा और अनूठी शैली के साथ ''नचारी'', साहित्य-मंच पर अवतरित हो कर प्रतिष्ठित हो जाए तो हिन्दी और उसकी सहयोगिनी भाषाओँ में एक नयी प्रतीति जगा सकती है. 
(मिथिला और बिहार के रचनाकारों से विशेष आग्रह - अगर 'नचारी', अपनी अनूठी भंगिमाओं सहित, हिन्दी मंच पर  जम गई तो यह उस अंचल का अमूल्य उपहार होगा - प्रतिभा.)
- उदाहरण ,उद्धरण आदि में सहायता हेतु गूगल का आभार .



गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

भानमती समझ गई...


  संत कबीर ने कहा था-
'देस-विदेसे मैं फिरा गाँव-गाँव की खोर ,
ऐसा हियरा ना मिला लेवे फटक -पछोर.'
भानमती ने सुना, तुरंत बोल उठी,' दीदी जी ,किसउ आदमी को फटक- पछोर करते देखा है कभी?'
'नहीं, कभी नहीं' - उत्तर भाविनी ने दिया. 
 शोध-छात्रा भाविनी से संतों-भक्तों की चर्चा चल रही थी.भानमती अपने खेत की मूँगफली लाई  थी,वहीं  बैठ गई कान लगा कर सुनने लगी.
 'तुलसी ने ग्राम-वधुओं और सीता का कितना मनमोहक चित्र खींचा है -
बहुरि बदन बिधु आँचल ढाँकी ,पिउ तन चितै भौंह करि बाँकी.खंजन मंजु तिरीछे नैननि .
निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि.'
भानमती खिलखिला कर हँस पड़ी.
 चौंक कर मैंने पूछा,'क्या हुआ?' 
'देख लेओ, भगत जी का हाल ,सारा धियान मेहरुअन पर लगाये रहे- ऊ कइसे पूछिस ई कइसे बताइस, .तुम देखो ई मरद लोग इहै सब तो तकत रहत हैं.'
 सिर में खुजली-सी हुई. फिर ज्ञान-चक्षु खुलने लगे.भाविनी ने सचेत हो कर पैंतरा बदल लिया था.
वैसे भी भानमती जो है सो है ही ,इस लड़की भाविनी को उसकी नाम-कहानी से जान लीजिये -
माता-पिता ने चाव से नाम रखा था मन-भावनी .चलते-फिरते लड़के बोल जाते 'ओ मन-भावनी!'
सो हाई स्कूल में 'मन' उड़ा कर उसने भावनी कर लिया (भला हुआ भवानी नहीं किया). फिर और समझ आई तो इ की मात्रा और जोड़ ली - भाविनी बन गई.
हाँ, बात हो रही थी फटक-पछोरवाली.
 मैं भी गाँवों में घूमी, शहरों में घूमी ,देश-देशान्तर देखे ,पुराने से ले कर नए ज़माने तक .पर आज तक किसी आदमी को फटक-पछोर करते नहीं देखा.
'अउर गजब देखो, कबीर इन्हइ  से आस लगाये कि वे  फटक-पछोर कर लेवें.किसी को सूप पकड़ना भी न आता होगा ,वो तो औरतें ही हैं सारी  फटक- पछोर ,बीनना-चुनना ,पिसना-कुटना कर राँध-पका कर उन लोगन का पापी पेट भरती हैं.
आदमी-जन तो  पान चबाते  ,नशा करते, बीड़ी पीते  खैनी रगड़ते हैं. और फिर दुनिया के रंग देखते पंचायत करते या फिर संतई छाँटत, भाँग-गाँजा ,चिलम के दम लगाय के  उपदेश पियावत  हैं .' 
 उसने बड़ी हैरत से यह  भी पूछा,' ई संत लोग मेहरारुन को हमेसा काहे कोसत रहत हैं?
'उन्हें लगता है औरतों ने सारी दुनिया को  बिगाड़ रखा है.'
 'अपना संत हुई जात हैं  कच्ची गिरस्थी  मेहरिया के सिर .काहे से कि गिरस्थी की जिम्मेदारी इन केर बस की नाहीं. 'अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम 'ठाली बैइठे इन केर धियान तहूँ औरतन में परा रहत है. '
भाविनी ने ऊपर से जड़ा ,'उन्हें  चक्की पीसते देखते हैं खुद ज्ञान-लाभ करते हैं.'
'ऊ दही-मही  बिलगावे तौन निरीच्छन ई करें   उजलापन-कालापन कुरूपता का जिकर करें. '  
,. ये साधु-संत  चैन से नहीं रह पाते.उन्हें तो यही चिन्ता खाये जाती है कि औरतें  क्या कर रही हैं? क्यों कर रही हैं?..उनका विचार है औरतों को सुधार देंगे तो दुनिया सुधर जायेगी .और आदमी? उसे सुधारने का तो सोचना ही बे-कार .  गृहस्थी को जंजाल कह  कर निकल जाते  हैं .और घूम-घूम कर वहीं चारों ओर मँडराते हैं .इनका अच्छी-बुरी औरत का भेद कितना स्वार्थभरा ...केवल पति की सेव करे अपने को  पूरी तरह नकार दे ,तब औरत सच्ची पतिव्रता है,नहीं तो डायन. कबीर ही क्यों, सारे संत एक हैं इस मामले में.'
 'चुनरी में लगा दाग़ इन्हें फौरन दिखाई दे जाता है.' भाविनी कहाँ चुप रहनेवाली.
 ' भानमती,  अपने मर्यादाशील तुलसीदास जी तो उदाहरण सामने रख कर सिखाते हैं. उद्दंड, अहंकारी पति  से पत्नी कैसे बात करे, पूरा खाका खींच दिया -
 रहसि जोरि कर पति पद लागी ,बोली बचन नीति रस पागी .

नीति-संगत बात ,पति का  भला हो जिसमें, कहो ज़रूर.पर तुम्हारा दर्जा बराबरी का नहीं किसी के सामने कभी मत कहना ,पति की शान घटेगी. मौका देख कर कहीं अकेले में ,पहले उस के हाथ जोड़ना फिर झुक कर चरण स्पर्श करना.  आज्ञा पाकर  परम विनीत हो स्वामी,नाथ कह के शुरुआत करना.
और भी देखो-
  हिमाचल की पत्नी के मन में द्विधा है, विवाह योग्य पुत्री की जननी, पर पति के सामने एकदम गऊ - 
'पतिहिं एकान्त पाइ कहि मैना ,
नाथ, न मैं समुझे मुनि बैना .' 
'हमने सब सुनी है ,बोलो भला नारद की बात बे समुझी नायँ होंयगी ?औरत में ई सब समझै का माद्दा आदमी से जियादा होवत है.'
'पर नीति कहती है ,पति के सामने मूर्ख बने रहने में ही हित है .अक्लमंदी देख कहीं वह कुंठित न हो जाय .मन ही मन चाहे हँसी आ रही हो,जानबूझ कर बेतुके सवाल पूछे. पति का उत्साह बढ़ेगा.उसका मनोबल ऊँचा होगा .पत्नी के अनुकूल रहेगा ,यहाँ तो बेटी का मामला है .कहीं ज़िद पर अड़ गया जड़ आदमी (पर्वत है न )तो मुश्किल हो जायेगी.'
वे दोनों मुखर, मैं सुने जा रही चुपचाप. 
 'इहां बसब रजनी भल नाहीं..' 
कह कर इनने सीता जी को एक रात माता-पिता के पास रुकने नहीं दिया ,
रत्नावली के साथ का अनुभव था .सो सावधान कर दिया.'
अब भाविनी मेरी ओर घूमी -
'..और जायसी हैं संत आदमी ,पर  नख-शिख और शृंगार के क्या अपरंपार वर्णन - दंग रह जाते हैं हम तो ! कोई तो प्वाइंट नहीं छोड़ा. '
हमारी भानमती विशेष पढ़ी-लिखी नहीं पर,लोक की सारी सामर्थ्य समाए है .भाषा भदेस हो जाये भले ,अभिव्यक्ति-कौशल के सामने बड़े-बड़े पानी भरें .
'औरत, रांड भई तौन बिन मालिक की गइया ,सबै दुहन को,जुलम करन को  तैयार. अउर मरद रँडुआ होय, चाहे घर-छोड़ा , बैल से साँड हुई जात है- हर जगह मुँह मारन को उतारू .संत होय  चाहे साधारन मरद लच्छन उहै रहत हैं .आदमी भए से चैन कहाँ परत , मेहरारू होवन का शौक चर्रावत है. .'
भाविनी और मैं एक दूसरे का मुँह तक रहे हैं ,
कहती तो ठीकै है हमारे कबीर, संत-शिरोमणि,कौन कम रहे ? लौट-लौट कर सिन्दूर ,काजल ,चुनरी ,पर कविताई करते ऐसे मगन हुए कि  ,खुद सजने लगे और राम की दुल्हनिया बन कर ही तृप्त  हुए .
 .एक और देखे थे ,जिनने पुरुष देह पर राधा रूप धर लिया , घघरी-उढ़निया ओढ़, चूड़ी- टिकुली कर आफिस में जा बैठते थे .बाकी दुनिया के लोगन का देखि लेओ ,होरी माहियाँ साल भर की  भड़ास निकार लेत  हैं .'

पढ़ी नहीं तो क्या हुआ, कढ़ी है हमारी भानमती! ओहिकी बातन का जवाबै नहीं हमरे पास! 
*

गुरुवार, 21 मार्च 2013

ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है!


*
उस दिन रागिनी जी से भेंट हुई बेटी के पास आई हुई थीं.पति का देहान्त हुए दस साल हो गये थे ..बच्चे अपनी नौकरियों पर पुत्री का विवाह सबसे निवृत्त ,अब तो कुछ करने को बचा भी नहीं 
 उनकी परेशानी है- बहुत ऊब लगती है .जहाँ जाओ नए सिरे से फिर अपने को ढालो ,
अकेले रह नहीं सकते हारी-बीमारी में किसे पुकारें .
 न यों चैन न वों चैन !
एक और सीनियर बैठे थे बोले,क्या करें ,सब अपने काम में व्यस्त .हम अकेले क्या करें.सब का अपना ढंग हैं .कभी-कभार लोगों से मिल जुल लें, बस इतना ही .और करने को है ही क्या?".
'तो फिर आप भी व्यस्त हो जाइये .'
'अब हम, काहे में ?'.
'अपना कोई शौक.' 
'खतम कर दिये सारे शौक अपने .घर-परिवार के पीछे .'
'नहीं,नहीं फिर से शुरू कर कर दीजिये .'
'अब क्या करना है? छोड़ दिया सो छोड़ दिया .अब तो दिन काटने हैं !"
ये कैसी ज़िद कि अब आगे कुछ नहीं करना!
ऐसे झींक-झींक कर ज़िन्दगी कटती है कहीं !
दो-तीन लोग और शामिल हो गये थे. 
चर्चा चल रही थी. अपनी खुशी ख़ुद ढूँढनी पड़ेगी उसके  लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं  ,जीवन इतना कांप्लेक्स हो गया है इतना चुनौती भरा ,ये बच्चे तो इसमें फँस गए हैं .हमारे जैसा निश्चिन्त और सुविधावाला समय इन्हें कभी कहाँ मिला .क्या करें ये लोग भी ?
'हाँ, हम तो खुद नहीं चाहते ,कि हमारे लिए अपना काम हर्ज करें .'
'तब तो और भी अच्छा क्यों किसी का आसरा ढूँढें !सच में इच्छा हो तो सब हो जाता है .'
 मैंने अक्सर देखा है रिटायर हो कर लोगों की मानसिकता बन जाती है कि  हमें कोई नहीं .समझता,हम अकेले पड़ गए .जब कि बच्चे भरसक साथ हैं सहायता को तत्पर हैं .अक्सर  खुद ही को-ऑपरेट नहीं करते, उनकी मजबूरी नहीं देखते .
कहते हैं आखिर हम क्यों ज़िन्दा हैं? 
 ज़िन्दा तो रहना ही पड़ेगा जब तक ज़िन्दगी है .दिन रात मौत-मौत पुकारते ,मनहूसियत फैलाते ,दूसरे को परेशान करते रहिए ,या मन ही मन बिसूरते रहिये. ऊपर से जीवन की अवधि कितनी बढ़ गई है, अस्सी से ऊपर तो आम बात है . बीमार पड़ो कुछ हो भी जाए तो बच्चे लग जाएंगे जी-जान से. ,मरने थोड़े ही देंगे .बचा कर ही दम लेंगे .दवाएँ और बाकी तंत्र इतना विकसित हो गया है कि हर उपचार मौजूद.
समय का पहिया घूमता रहेगा अगर कोई एक जगह खड़ा रहे ,तो कैसा लगेगा .धीरे-धीरे सब बदल रहा है .आपके समय भी नई चीज़ें आईँ थीं ,अब विकास की गति ज़रा तेज़ है,साधन भी उतने ही बढ़े हैं .
रहना ही है तो ढंग से जिया जाय .कुछ ऐसे कि मन को खुशी और संतोष मिले.
इस के लिए ज़रूरी है अपने मन का कुछ करना.
एक जन बता रहे थे,' हमारी पड़ोसन ने पैंसठ साल की उम्र में  म्यूज़िक की क्लास ज्वाइन की है .उनकी बहिन भी गाने का प्रेक्टिस करती है.'
'हिम्मत होनी चाहिए और फिर तो अपनी हॉबी शेअर करनवाले मिल जाते हैं .कंप्यूटर पर और आसानी से..'
'समान सोचवालों का ग्रुप बना लो.'
'हमेशा मिलने-बतियाने की सुविधा कहाँ?'
 उसी के लिए कंप्यूटर है .जब चाहो अपनी बात कह दो, उनकी सुन लो- सोच कर 
अचानक बोल उठी, 
'और कुछ नहीं तो आप कंप्यूटर सीख लीजिए. दुनिया भर की नई बातें ,नई खबरें ,रेसिपीज़, कुछ पढ़ने-लिखने में रुचि हो तो भी भंडार भरा है हर तरह का.  ,गाने भी  और हाँ, यू-ट्यूब पर  मनचाहे प्रोग्राम भी . अब तो तमाम ऊपरी काम भी उससे हो जाते हैं .हमारे यहाँ तो रेलवे, प्लेन आदि का रिज़र्वेशन भी उसी से होता हैं .घर बैठे .'
'हाँ, वो तो है ,पर अब हम क्या सीखें सीख चुके जो सीखना था.'
'पर इम्टी माइंड डेविल्स वर्कशाप! फ़ालतू बाते दिमाग़ में आयें ही क्यों?' अरे ,यह क्या कह गई, मैं! 
उन्हें कुछ बुरा लगा शायद ,बात को घुमाने लगी,' यह नहीं करना चाहें कोई तो कुछ ऐसा शौक पाल लें कि मन लगा रहे . वैसे दिमाग़ की तो आदत है ..'
रागिनी जी सचेत हुईं ,'
 'हाँ, दिमाग की क्या आदत है जी? 
'सारे खुराफ़ात, की जड़ है !इस उमर में तो बड़ी जल्दी जंक लगने लगती है ..साथ हाथ पाँव उसी के चेते चलते हैं फिर तो मन भी वैसा ही ढलने लगता है.'
वे कुछ सोच रहीं थीं ,वे महोदय चुप सुन रहे थे,मुँह बनाए जैसे कड़वी दवा पी ली हो . 
'ऐसे में  कितनी डल हो जाती है लाइफ, न ?'
कुछ सिर हिले.
 मन में उठ रहा था  सीखने में काहे की शरम ?कोशिश पहले.फ़ायदे बाद में पता लगेंगे .किसी पर निर्भर नहीं.पैसा खर्चना नहीं .
यहाँ तो पोता भी कंप्यूटर से चिपका रहना चाहता है,हम लोग मना करते रहते हैं . 
'कंप्यूटर के लिए औरों का मुँह देखना पड़ेगा.' 
'नहीं, नहीं , और खुश होंगे, .कहेंगे  हमारे पापा गुज़रे ज़माने के नहीं आज को टक्कर देनेवाले हैं .'
'और सीखने में कुछ नहीं माउस पकड़ना शुरू करिये, वह सब सिखा देगा .बच्चे बड़ी खुशी से गाइड करेंगे .शुरू में दो-चार दिन ताल-मेल बैठाना पड़ेगा.इतनी तो कूवत है ,दिमाग भी अभी तो,भगवान की दया से अच्छा- खासा है. बस ऐसे ही सचेत बना रहे !'
समर्थन के भाव उजागर होगए भंगिमा से .
 '...और ई-मेल करना आ जाये तो देखो क्या आनन्द आता है ,संदेशों के लेन-देन में .अब चिट्ठी-पत्री तो कोई करता नहीं ,फ़ोन पर वो बात नहीं आती जो अपने आप किसी का लिखा पढ़ने में आती है .'
वे चुप ही रहे,शायद कुछ चल रहा था अन्दर ही अन्दर .
*
रिटायरमेंट के बाद कुछ लक्षण अपने आप उभरने लगते हैं-
  एक रिक्तता-सी  मन पर , फ़ालतू हो गये का बोध मन को तिक्त करता हुआ.,, ,शिकायतें किसी-न किसी से.बार-बार दोहराना कि हमारे समय में ऐसा नहीं था,बदली हुई स्थितियों को  स्वीकारने से बचना.(ठीक तो है आपके पिताजी के समय जो जो होता था वह आपके समय में भी तो बदल गया ) , नई चीज़ों से बिदकना,अपने को बदलने को बिलकुल तैयार नहीं. ऐसे ही रहेंगे ,एकदम रिजिड,अपने को लाचार,असमर्थ अनुभव करते.कुछ जानने-सीखने की चाह ही खत्म. तटस्थ-सी.नकारात्मकता- बे-मन से जिये जा रहे हों जैसे .
प्राचीन काल में वानप्रस्थ का विधान इसीलिये किया गया होगा ,कि हमारा ज़माना गया ,तुम्हें संस्कार और शिक्षा दे दी , व्यक्तित्व विकस गया, समय आ गया अगली पीढ़ी को मान्यता देने का .जो सिखाया है उसे चरितार्थ होते देखने का ..अब भोक्ता की जगह दृष्टा बनने के दिन हैं.उस स्तर से कुछ ऊँचा जो उठ गये  .सारे अनुभव साथ हैं,कितने उदाहरण सामने से गुज़र चुके कितनी उठा-पटक के साक्षी रहे,इतना कुछ  कि मन की झोली भरी है .
अपने से आगे जाने के लिए  शिक्षा और संस्कार देकर समर्थ बनाया है, अब उस संतान को निश्चिंत मन से, भविष्य सौंप दें . महत्व छोटों को मिले कि वे बड़े हो गये . और अपने लिए कुछ ऊर्ध्व स्तरों की खोज करें जहाँ ,संतोष और शान्ति हो . सब प्रसन्न रहें .
-कोशिश करने में क्या हर्ज है !
*
20-25 दिन बाद फिर मिले थे.मेरे पास आये बोले ,' मैंने सीख लिया कंप्यूटर ...' 
बड़े उत्साह में थे बोले .'कई लोगों से  कांटेक्ट हो गया है ,अब खाली नहीं रहता .'
 .'..अरे वाह !'
 सुना है रागिनी जी भी  व्यस्त हैं -मिलूँगी जा कर उनसे . .
वे खुश थे .मुझे अच्छा  लगा .
'फिर तो आप दूसरों के लिए माडल हो गए .अब जुड़िये अपने जैसों से ,
सीनियर्स क्लब बना कर हीरो बन जाइये आप .'
उत्साहित थे वे.
ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है! 
*

बुधवार, 20 मार्च 2013

एक थी गौरैया .


*
 एक छोटी-सी गौरैया थी.उसे एक द्यूल मिला - (पता है द्यूल क्या होता है? चने की दाल का एक दाना.)
वह बड़ी खुश हुई .और उसे खाने के लिये चक्की के खूँटे पर जा कर बैठ गई .खूँटा फटा हुआ था .उसकी चोंच से द्यूल एकदम गिरा और खूँटे की दरार में जाकर फँस गया.
चिड़िया खूँटे से कहने लगी ,'मेरा द्यूल दे दो .'
खूँटा बोला 'अरे वाह, मैं क्यों दूँ ,तुम मुझ पर चढ़ कर बैठीं .तुमने गिराया .मैं काहे को दूँ ?'
चिड़िया बढ़ई के पास गई ,'बढ़ई, बढ़ई खूँटा चीर. खूँटा द्यूला दे नाहीं, मैं चब्बऊँ क्या?(चिड़िया हैं न ,ऐसे ही बोलती है ,चबाऊँ को चब्बऊं कहती है )
बढ़ई हँसने लगा ,'अरे जा ,जरा से द्यूल के पीछे मैं खूँटा चीरूँ .भाग जा यहाँ से .'
उसे बुरा लगा वह राजा के पास गई,'राजा,राजा ,बढ़ई दंड,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं, खूँटा द्यूला दे नाहीं ,मैं चब्बऊँ क्या?'
राजा ने कहा ,' राज के इतने काम करने हैं और मैं बेकार में बढ़ई को दंड देने लगूँ ,
यहाँ शोर मत मचाओ ,कहीं और जाओ .'
परेशान हो कर चिड़िया रानी के पास गई ,'रानी,रानी, राजा रूठ .राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं  ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'वाह री चिड़िया ,मैं क्यों  राजा से रूठूँ ,मुझे कोई और काम नहीं क्या ? '
क्या करे, बेचारी छोटी- सी गौरैया!
तब उसे चूहे की याद आई .उसके पास जाकर बोली ,'चूहे,चूहे ,रानी के कपड़े काट .रानी राजा रूठे नाहीं राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं  ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं, मैं चब्बऊँ क्या?'
चूहे को बड़ा मज़ा आया बोला,' जरा सी गौरैया ,नन्हा सा द्यूल .बेकार सबसे कहती फिर रही है .कुछ और ढूँढ कर खा ले .'
परेशान हो गई , सोचने लगी क्या करूँ अब ?
एक हाथी उसे अपनी पीठ पर बैठने देता था .चलो उसी के पास चलें उसने सोचा .
गई . हाथी ने पूछा क्यों रोनी शकल बनाए है तू ?'
उसने वही बात बता दी, 'हाथी,हाथी ,चूहे को दबा ,चूहा कपड़े काटे नाहीं, रानी राजा रूठे नाहीं, राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'अरे, इतना हबड़ा मैं,बेकार में चूहे को दबा दूँ . जरा सी बात के लिये  परेशान कर दिया . किसी और से कह जा के .'
इतने में उसे तेज़ी से जाती हुई चींटी दिखी. बस, उड़ कर पहुँच गई उसके पास .
'ओ चींटी ,मेरा एक काम कर दे.' 
चींटी रुकी,' क्या?'
' ज़रा देर को हाथी की सूँड़ में घुस जा .'
'क्यों ?हाथी ने क्या बिगाड़ है तेरा?'
' वह मेरा काम नहीं कर रहा है. हाथी चूहा दाबै नाहीं ,चूहा कपड़े काटे नाहीं, रानी राजा रूठे नाहीं, राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं, खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'नहीं ,सूँड़ के अंदर बिलकुल अच्छा नहीं लगता.गीला-गीला है वहाँ ,हवा भी नही आती.'
बड़ा गुस्सा आ रहा थी चिड़िया को, भूखी तो थी ही, 'अच्छा ,मत घुस. अभी तुझे ही खा जाती हूँ .'
वह चोंच खोल के बढ़ी.
चींटी डर गई .भाग के कहाँ जाती .चिल्ला पड़ी ,'नहीं, मुझे मत खाओ , अभी जा रही हूँ .हाथी की सूँड़ में घुसती हूँ .'
गईं दोनो हाथी के पास .
दोनों को साथ देख हाथी घबराया .उसे पता था एक बार एक हाथी की सूँड़ में चींटी घुस गई थी .उसके रेंगने से वह इतना दुखी हुआ कि सूँड़ पटक-पटक कर बेहोश हो गया था.
वह तैयार हो गया ,'अरे चींटी बहिना , मैं तो गौरैया से हँसी कर रहा था .चलो अभी चलता हूँ .कहाँ है चूहा?'
चूहे ने हाथी पर बैठी गौरैया को आते देखा. बुरी तरह डर गया 'अरे हाथी दादा, तुम आराम करो ,मैं जा रहा हूँ रानी के कपड़े काटने .'
रानी ने चूहे के साथ उसे को आते देखा .समझ गई बोली ,'नहीं चूहे मुन्ना ,इतने मँहगे कपड़े काटना मत! मैं अभी राजा से रूठती हूँ .'
इतनी देर में राजा खाना खाने अंदर आया था ,उसने देखा रानी रूठने की तैयारी कर रही है .
चिड़िया खिड़की पर बैठी थी .उसे याद आ गया .झट से रानी से बोला ,'तुम कितनी अच्छी हो ,तुम्हारी बात ज़रूर सुनूँगा .कहाँ है बढ़ई? बेचारी छोटी-सी गौरैया का काम नहीं कर रहा है ,अभी दंड देता हूँ .'
 वह दौड़ कर पहुँची बढ़ई को बुलाने .
'चलो राजा ने बुलाया है .'
'क्यों?'
 'चलो तो ,अभी पता लग जाएगा !.'
वह खूब खुश थी .बढ़ई समझ गया.
जाकर राजा से बोला ,' राजा जी, मैंने तो इस छुटकन्नी से हँसी में कहा था.ये ग़लत समझ गई .चलो गौरैया रानी ,अभी खूँटा चीर देता हूँ.
उसने उठाई कुल्हाड़ी और चल दिया गौरैया के साथ. पहुँचे खूँटे के पास . 
बुरी तरह घबरा गया खूँटा .एक दम द्यूल निकाल के सामने रख दिया .
'मैं क्या करूँगा द्यूल का मैं तो कुछ खाता नहीं .ले जा ,चिड़िया बच्ची .' 'बढ़ई बाबा,आप भी आराम कीजिये .'
गौरैया ने अपना द्यूल चोंच में रखा और फुर्र से उड़ गई. 
*(बचपन की याद)

बुधवार, 13 मार्च 2013

यादों के चिराग़ -

*
आजकल बड़ी पुरानी बातें ,लगातार याद आए जा रही हैं. मित्रों ने भी चढ़ा दिया ,'और बताओ,' कह कर .
तब की पत्रकारिता की क्या कहूँ -अब की तो लुटिया ही डुबोये दे रही है.
 बच्चों की एक पत्रिका थी 'शिशु', मुख-पृष्ठ पर लिखा होता था-
'छिछु की गाली आती है ,पूछी खींचे लाती है ,
पहले मुझको देती जा ,दूध-बताछा लेती जा !'
उस पर  बना होता था पूसी द्वारा खींची जाती 'शिशु' पत्रिकावाली गाड़ी का मन-भावन चित्र.
अब के बच्चे उन सुरुचिपूर्ण चीजों से वंचित रह गए हैं .
 उससे भी पुरानी याद -एक लोरी ,जिसे पलँग जैसे  झूले पर मेरी माँ गाकर हम दोनों (मैं और  दो साल छोटा भाई) को सुनाती थीं .मन लगा कर सुनते - सुनते हम सो जाते थे. मेरे बच्चे भी यह लोरी बड़े चाव से सुनते रहे. पर उनकी  पूछिये मत, एक सुना कर छुट्टी नहीं, जितनी याद हैं सब सुनाती जाऊँ.,हर बार पूरी होते ही अगली के लिए आँखें खोल दें - और सुनाओ .
और बच्चों के बच्चे तो काफ़ी बड़े हो कर भी कहते 'तकिया झालरदार वाली' ..  .
उस लोरी के स्वर  'शिप्रा की लहरें'(ब्लाग) सँजोये हैं
-'
 1947 से पहले ग्वालियर राज-घराने में पुत्र का जन्म हुआ था,पूरी रियासत में उत्सव मनाए गए .बधाइयाँ दी गईं .मेरी माँ ने भी लिखी थी एक कविता जो मैंने मंच पर सुना कर इनाम पाया था .कुछ पंक्तियाँ याद हैं -
'यों कि हमारी रानी ने युवराज-रत्न को जया है ,
इसीलिए द्वारे-द्वारे पर मंगल साज सजाया है .'
और भी काफ़ी था.पर उसे याद करने का मन नहीं होता ,
जब से सुभद्रा कु.चौहान की कविता में पढ़ा, 'अंगरेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी.' उस राजवंश के प्रति मन की भावना को आघात पहुँचा. तब भी विदेशी  का हित-साधन करते रहे थे अब सोनिया की कांग्रेसवाली कुर्सी का पाया बनने की होड़. जिसके पास सत्ता उसकी 'हाँ,जू' करने की आदत जाय कहाँ!
ओह, क़लम का निब तीखा हो उठता है , कागज़ न फटने लगें कहीं.

'विदेशियों से संघर्ष करते युग बीते, अब स्वतंत्रता मिल रही है' -लोगों में नया उत्साह जाग उठा था.बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधी थीं ,अब ये होगा,वो होगा ,एक नई व्यवस्था का शुभारंभ होगा ,नए युग का आगमन !
पहला धक्का तो साथ ही लगा- विभाजन का दंश! वे स्मृतियाँ आज भी टीसती हैं.समय और सिखा गया कि जितनी बड़ी आशा बाँधो उतना ही भारी धक्का लगता है.एक झटके में जो काम लौह पुरुष, सरदार पटेल ने कर डाला ,चिकने-चुपड़े लोगअपनी रसिक मिजाज उदारता की झोंक में बंदर -बिल्ली की कथा रच गए.अपना हित प्रधान न होता तो राष्ट्र-भावना इतनी गौण न होती.
 राष्ट्र पिता की परिकल्पना भी, पहले समय की कसौटी पर कस जाने दें,  यह  उचित नहीं समझा गया.दूसरों को समिधा बना कर अपनी सिद्धि और क स्वयं त़ृप्त तथा परिपक्व हो कर ,प्राकृत वासनाओं के ऊपर होने  की महानता दर्शाने के लिए निरीह, अनुभवहीनों को माध्यम बना लेना. ऐसे  चमत्कार दिखाने से किसी का भला होता है?इन प्रयोगों में   क्या संदेश निहित है . स्वाभाविक रूप से मानव बने रहना क्या छोटी उपलब्धि है !फिर भी राष्ट्र-धर्म के प्रति निष्ठा से भर तुल गए होते तो वे जाँ-बाज़, स्वाधीन देश में शान से जीते, अपनी बात मनवाने का अचूक अस्त्र जिनके पास था वे विदेशियों को  इस अन्याय और अहिंसा से क्यों नहीं विरत कर सके.नेताजी, आज़ाद और अन्य क्रान्तिकारियों के लिये क्यों नहीं खड़े हुए ? देश पर बलिदान होनेवालों को देश के लिये जीने का अवसर मिलता, पर अपनों ने ही जो द्रोह  किये गए उनकी पोल अब खुलती जा रही है.
जिन्ना ,मुस्लिम-लीग ,गांधी ,पटेल .दंगे-फसाद क्या नहीं हुआ .
पिता जी के  मित्र ,जो लाल दाढ़ी रखते थे,जिनके घर मुन्नी आपा के पास मैं कारचोबी का (सलमे-सितारे) का काम सीखने जाती थी, वे उस कस्बे से तभी पाकिस्तान चले गए. वहाँ उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य दिखाई दिया होगा. उनका छोटा भाई मसूद हमारे साथ पढ़ता था .अपने को मसउद लिखता था और जैसे टेबललैम्प के सिलेन्ड्रिकल शेपवाली कत्थई टोपी लगाता था .पीछे की ओर कुछ टेढ़ी-सी ,उसमें लंबा सा फुँदना होता था जो उसके एक्शनों को साथ हिलता-झूमता रहता ,देख कर बड़ा मज़ा आता था.मुन्नी आपा को हमेशा चिढ़ाता रहता था.  कैसा जोकर था-कहता था 'लाला लाहिल्ल्ललिल्ला-मसूर की दाल में कुत्ते का पिल्ला'.और भी तमाम बातें, कोई मुल्ला-मौलवी सुन ले तो बाजा बजवा दे.

रोज़ अखबारों उन घटनाओं के विवरण छपते थे ,पाकिस्तान बनने की कहानी, हमारी आँखों देखी .एक मौसी लाहौर में थीं .उन्हें क्या-क्या झेलना पड़ा पर वे सपरिवार आ गईँ .और जाने कितने परिवार, कोई आधे-अधूरे ,लुटे-पिटे - सारी क़ीमत उन्हीं ने चुकाई थी.
कैसे थे वे दिन! अख़बारों के शब्द पढ़ने में जैसे ज़बान काँपती,कान दहकते थे. वह समय बड़ा अजीब रहा ,सुबह-शाम खबरें जैसे काटने को दौड़तीं पर बिना जाने भी किसी को चैन नहीं.
चढ़ा हुआ उत्साह उतर गया ,और स्वतंत्र-भारत से बाँधे हुए लोगों के मंसूबे ध्वस्त होते चले गए.
स्मृतियाँ भी अजीब हैं , कभी सिलसिलेवार नहीं. जब आती हैं अंधाधुंध -एक दूसरी को ठेलती, कहाँ-कहाँ से निकल आती हैं - क्रमहीन ..
 जब स्वतंत्रता प्राप्ति के जलसे चल रहे थे तो मंच पर मैं भी कुछ  बोली थी, इनाम में पुस्तकें मिली थीं ,देने वाले थे ,प्रदेश के शिक्षा मंत्री सन्नू लाल, शुद्ध भाषा भी नहीं बोल पाता जो उसे तो यह भी नहीं भान होगा कि इनमें क्या लिखा है -किसी ने खरीद कर पैकेट बना दिये होंगे ,वह खड़े हो कर पकड़ाता रहा !
हम लोगों की बचपन की बड़ी बुरी आदत थी .जब कोई अशुद्ध भाषा बोलता तो हम भाई-बहिन आँखों ही आँखों में एक दूसरे को देख कर मुस्कराते थे. तब समझते थे बड़े लोग सही ही बोलते हैं. हम आपस में  एक दूसरे के अशुद्ध शब्दों पर खूब खिंचाई करते. शुद्ध बोलने के चक्कर में मेरे विचित्र शब्दों का खूब तमाशा बना है .
हाँ, तो सन्नू लाल को देख-सुन कर बड़ी निराशा हुई थी .पता लगा पढ़े-लिखे नहीं हैं ,दलित जाति को ऊँचा उठाने के लिय इन्हें मंत्री बनाया गया है. सुधार और सुव्यवस्था के लिए कोई योग्य और समर्थ व्यक्ति नहीं जुड़ा? मखौल बना कर रख दिया शिक्षा-नीति और दलित दोनों का .अब तो  नेताओं का दिमाग़ी दिवालियापन देखने की आदत पड़ गई है.
तब लड़कियों के स्कूल बहुत कम होते थे, प्राइमरी से आगे तो केवल शहरो में ही.
 ,मैंने लड़कियों के स्कूल में, अपने जीवन में सिर्फ़ एक वर्ष पढ़ा .शेष सारा सड़कों के साथ .
शुरुआत में ही घर में पढ़ा कर सीधे छठी कक्षा में भर्ती करा दिया गया, लड़कों का स्कूल ज़िन्दाबाद! चारों ओर के गाँवों के पढ़नेवाले लड़के वहीं समाए थे .
आठवीं की परीक्षा बोर्ड की होती थी उज्जैन में सेंटर .वहीं जाकर दी .फ़र्स्ट आई थी .
हमारे घर के पास वाले घर में भोंपूवाला ग्रामाफ़ोन था ,रोज़ शाम को वही-वही गाने लगा देते थे वे लोग.उनमें से दो थे -'हमें तो शामे  ग़म में.... और ज़िंदगी चंदरोज़ है !'
इधरवाले पंडित जी की विधवा लड़की कमला ,बड़े शौक से सुनने बैठ जाती .कहती कैसी भगती के गाने हैं  'श्याम' (शामेग़म)का नाम आ गया भक्ति तो उमड़ेगी ही.और ज़िन्दगी 'चंदगोद' भी उसे पसंद था.
बहुत-कुछ याद आता है .पर सब कहना न संभव है, न उससे कोई लाभ !
यह तो अभी कुछ बरस पहले की बात है.विष्णु(मेरा भाई ) के एक मित्र लंच पर आए ,खानें में सहिजन की फलियाँ भी बनी थीं -मसालेवाली.
स्वाद लेते रहे फिर पूछ बैठे,'ये क्या भिंडी की तरकारी है?'
 विष्णु ने, मैंने कौतुक से एक दूसरे को देखा एक ही भाव-  ये क्या भिंडी भी नहीं जानते?
मैं तो किसी बहाने उठ कर रसोई में चली गई .हँसी न रुके तो और क्या करूँ !
 विष्णु की आदत थी ,कोई मेरे लिए चिट्ठी डालने को दे (पहले पोस्टकार्ड खूब चलते थे)तो उसके गलत शब्दों को अंडर-लाइन करना फिर डाक में छोड़ना.और कुछ लोग हमेशा शाम को 'श्याम' और 'हम जाऊँगी' लिखते थे .उन लाल स्याही से टीपे शब्दों पर बड़ी हँसी आती थी .मैंने कहा भी कम से कम ये चिट्ठियां तो मत रंगा करो .पर आदत कहीं छूटती है!
 पत्रों का ज़माना बीत गया, अब तो हैं बस फ़ोन और ई-मेल !
हाँ, जो कहने की इच्छा बहुत दिनों से हो रही थी वह बात तो रह ही गई -
एक बड़ा पुरानी कविता ,यह भी पता नहीं किसकी  - ख़ैबर का दर्रा! कुछ -कुछ ध्यान में हैं .पर यही पंक्तियाँ स्मृति  में कौंधती हैं -
'कड़कती बिजलियों की इस जगह छाती दहलती है,... घटा बच के निकलती है,... हवा थर्रा के चलती है.'
रचयिता और पूरी रचना यदि कोई बता सके तो बहुत आभार होगा !
कृपया अपने घर के, या जो भी उपलब्ध हों उन  वरिष्ठ-जनों से भी पता करें.यह मेरा विशेष अनुरोध !इतनी प्रभावशाली कविता विस्मृतियों में खो न जाए !
अब कोई मत कहना- और बताओ ,
अपनी गाथा गाती चली गई, बहुत हो गया!
***