सोमवार, 25 जून 2012

कृष्ण-सखी - 47 & 48.


47
अभी- अभी उत्ताल तरंगों का रुद्र-नर्तन थमा है बाढ़ का तांडव शान्त हो चला है .
जीवन सरिता उतार पर आते कितने ध्वंसावशेष , कितनी सड़न और तल के कीचड़ का फैलाव छोड़े जा रही है -सब सामने आयेगा बाद में धीरे-धीरे .
महा-समर बीत चुका है .अभी तो जीतनेवालों को विजयोन्माद ने छा लिया है .युधिष्ठिर सहित पाँचो पांडव  सकुशल हैं,निश्चिंत हैं ,अपने कौशल पर तुष्ट.
'उधऱ का केवल एक ही बचा ,युयुत्सु .' सहदेव ने कहा .
'वह तो हमारी ओर था ,हमारा औचित्य समझा था उसने .' युधिष्ठिर का मत था ,' धर्म की विजय होनी ही थी.'
उन्हें लग रहा था उनके धैर्य शान्तिपूर्ण व्यवहार और धर्म-बुद्धि का परिणाम है यह.
पाँचाली ने सिर उठा कर उनकी ओर देखा था .
सब चुपचाप सुन रही है कृष्णा,  विचार चल रहे है - वासुदेव धर्मराज के परम मान्य हैं ,उन्हें धर्म की मर्यादा का स्थापक मानते हैं . फिर उनकी तरह विचार क्यों नहीं कर पाते !इन्हीं के  उस बंधु ने कितनी रूढ़ियाँ निश्शंक हो कर तोड़ दीं .नई मर्यादायें रच दीं .एक सहज मानवी दृष्टि लेकर जो उचित लगा उससे विरत नहीं हुआ किसी का कुछ कहना कभी उसके आड़े नहीं आया .
पूरे परिवार को ऐसी विषम स्थितियों और कुत्सित षड्यंत्रों से घिरा देख वे कैसे शान्त रह लेते हैं ,उसे विस्मय होता है .
वह समझ नहीं पाती कि उनके मन में क्या है ,या सबसे उदासीन .जो होता है उसे वैसा ही चलने दो .-क्या यही धर्म है ?
अनीति होते ,अत्याचार होते देखते रहना नीति है या धर्म ?धर्म अत्यंत  गूढ़ वस्तु है या सहज-स्वाभाविक !.
अगर गूढ़ है सब उसे समझ नहीं सकते तो वह सबके लिये साध्य नहीं हो सकता .इतना सहज हो कि सर्व-सुलभ सर्वसाध्य-सर्वमान्य हो सके .सबके कल्याण का सबके सुख का मार्ग प्रशस्त कर सके ,सहज प्रस्फुटित हो अनायास अंतर में जागे सुन्दर संकल्प के समान.
बीच-बीच  में कृष्ण से दृष्टि विनिमय -एक दूसरे के मनोभाव समझ रहे हैं.
भीम ने अपनी गदा पर दृष्टि डाली ,'जब दुर्योधन -दुःशासन आदि ही गदा की भेंट चढ़ गये, तो सब गया समझो .'
अपनी गदा के आघात से बहुत संहार किया था उनने भी .
'नहीं भैया ,जब तक कर्ण रहता हम निष्कंटक नहीं हो सकते थे ,और फिर पितामह को भी तो युद्ध से हटाना था नहीं तो हममें से कोई नहीं बचता .'
अब नकुल -सहदेव को भी बहुत कुछ याद आने लगा .
कृष्ण बैठे सुन रहे थे - अब जब सब बीत गया तो कैसे श्रेय लेने को आतुर हैं ये लोग !
वे चुप न रह सके -
'युद्ध की वास्तविकता तो वही बता सकता है जो इस संपूर्ण काल को आँखों देख कर भी साक्षी-मात्र  रहा हो .''
सब की दृष्टि उधर घूम गई .
'ऐसा कौन है ,जो निष्पक्ष सब-कुछ देखता रहा ?'
'है ,ऐसा वह वीर ! रण में उतर  आता तो किसी की कुशल नहीं थी. घोर विनाश  अवश्यंभावी था .'
सब चकित एक-दूसरे का मुख देख रहे हैं .
'अच्छा!' कई स्वर एक साथ, ' कहाँ हैं वह ?हम अवश्य जायेंगे उनके पास .'
कौन है ऐसा धीर-वीर ,जिसने आद्योपान्त यह महा-रण देखा और अपने एकान्त में कहीं  निर्लिप्त बैठा है ?
जनार्नद के साथ वे पाँचो गये, जानना चाहते हैं युद्ध का सत्य !
पांचाली नहीं गई .इस सब से तटस्थ रहना चाहती है.जो मन पर स्मृतियों की खरोंच छोड़ते  निकल गये , अब उन अध्यायों को याद करने की  इच्छा नहीं है .
**
ये सब भ्रम में पड़े हुये हैं .
ले गये कृष्ण - कर्ता और भोक्ता नहीं, दृष्टा बर्बरीक - चलो वही बतायेगा युद्ध का सच .
उसकी असीम सामर्थ्य देख कृष्ण अवाक् हो गये थे , समझ गये अगर युद्ध में बर्बरीक सम्मिलित हो गया तो क्या होगा ?जो रास्ते पर लाये हैं सब बिखर जायेगा .
वह युद्ध में भाग लेने जा रहा था .
उसकी  माता ने आज्ञा माँगने पर उसे कह कर भेजा था कि दोनों पक्ष तुम्हारे  पूज्य हैं .तुम्हारे लिये उचित यही होगा कि जो हार रहा हो उसके सहायक बन उसी की ओर से युद्ध करो .'
नहीं ,नहीं होने दूँगा .उन्होंने  निश्चय कर लिया .
ब्राह्मण का वेश बना उसे वचन-बद्ध कर उसका शीष मांग लिया , तब उसने जाना कि यह कृष्ण हैं .
याचक का समुचित मान कर उसने शीष समर्पित कर दिया और उनके पूछने पर महासमर देखने की अपनी कामना व्यक्त कर दी .
 कृष्ण ने  टीले पर स्थित , अश्वत्थ-शिखर पर वह मस्तक स्थापित कर -दिव्य-दृष्टि प्रदान की ,कि इस ऊँचाई से तुम सब कुछ असली रूप में देख सकोगे .
बर्बरीक का शीष अभी उसी टीले पर टँगा है !
- सारा महाभारत उसके सामने से गुज़रता चला गया.
 क्या कहा बर्बरीक ने ?
 'धर्म-युद्ध '?वह हँस पड़ा था.
'प्रारंभ से अंत तक छल और प्रवंचनायें, निहित स्वार्थ !'
उसने धर्मराज की ओर देखा-'क्यों महाराज, प्रारंभ से आपने क्या किया माता के शब्द, भाइयों पर शासन,स्त्री पर दाँव और गुरुहत्या ,'  उन्होंने सिर झुका लिया .सबकी पोल-पट्टी मैं जानता हूँ .                                
भीम-अर्जुन  को देखा - 'नीति की निरंकुश  अवहेलना  -कितनी बार. गिनवा दूँ क्या ?'
सब के सिर झुक गये.
एक ओर नहीं दोनों ओर का सच यही है .'
उसने कहा -
 'युद्ध कहाँ था वह?कहीं नहीं किसी की हार-जीत .श्रीकृष्ण का चक्र चारों ओर घनघनाता  घूम रहा था .सब कट-मर रहे थे -केवल सुदर्शन चक्र और कुछ नहीं. और?...और क्या था?
 .प्रतिहिंसा-हेतु आवाहित ,यज्ञ- वेदी से प्राप्त गंध-धूम रुचिरा,अग्निकन्या ,मुक्तकेशी पांचाली विचरती हुई खप्पर भर-भर,रक्त-स्नान करती  - अपना निमित्त पूरा कर रही थी.'
 तनिक व्यंग्य से कहा था उसने - 'ये पाँचो पांडव ! कैसे विभ्रम में पड़े हैं ,जिनका जीवन ही -किसी के उत्सर्ग से प्रति-फलित दान है !'
 अवाक्-प्रश्नमयी दृष्टियाँ  कृष्ण की ओर उठीं .उन्होंने शान्त रहने का इंगित किया .
आगे कुछ बोल सके किसी में साहस नहीं था.
 लौटते समय कृष्ण ने बताया था - बर्बरीक  भीम का पौत्र था -घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती का पुत्र.शिव के वरदान से वे त्रैलेक्य-विजयी होने में समर्थ .
भीम का पौत्र - बर्बरीक !
जिससे  नारायण ने कहा था ,'तुम में वह नरोत्तमता अनायास व्यक्त हो उठी है जिसके लिये योगी-मुनिजन ,जन्म-जन्मान्तर साधना करते हैं !'
और भी-
'बर्बरीक, किसी आगत युग में तुम श्याम सम पुजोगे तुम्हारी पुरुषोत्तमता को पूरी प्रतिष्ठा मिलेगी !'
*
48.
सारा राज-पाट अब पांडवों का हुआ. मृत परिजनों के अंतिम संस्कार ,उनका ही कर्तव्य है .और युधिष्ठिर कर्तव्य निर्वाह से कभी पीछे नहीं हटते.
 पर अचानक कुन्ती माता ने उस दिन सबको चौंका दिया .उन्होंने कहा   ,
'पुत्र ,वसुषेण का अंतिम संस्कार तुम्हें ही करना है .'
पाँचो पांडव चौंक कर उनकी ओर देखने लगे ,
' न हमारे कुल का न पक्ष का ,जीवन भर विरोधी रहा हमारा , कितने अहित  किये,कभी शान्ति से रहने न दिया . हम क्यों ...''
भीम ने कहा 'माँ वह हमारा शत्रु ,...'
कुन्ती ने एक उसाँस भरी. कुछ क्षण चुप रहीं
' वसुषेण !..हाँ वह मेरा पुत्र था ,तुम सबका ज्येष्ठ भ्राता ... '
सारे पांडव विस्मय से माँ का मुख देख रहे हैं .
अर्जुन उठ कर खड़े हो गये ,'किस प्रकार का भ्राता ,भाई क्या आकाश से गिरते हैं ,सदा प्राणों का प्यासा रहा था... !'
बीच में टोक दिया युधिष्ठिर ने ,'बंधु ,उत्तेजित न हो .माता की पूरी बात सुन लो .'
 पांचाली एकटक कुन्ती की ओर देख रही है .
अशान्त मौन सर्वत्र.
'अब तक समझ नहीं पाई कैसे बताऊँ ,क्या बोलूं .लेकिन आज ...आज विवश हूँ कहने के लिए ....हाँ ,वह मेरा सबसे बड़ा पुत्र ..'
उसने सिर झुका लिया कुछ रुकी ,फिर बोलने लगी -
'दुर्वासा ने मुझे वर दिया था - सर्वविदित है .उस समय अनुभवहीन थी ..विवाह से पूर्व उस वर  का प्रयोग कर के देखना  भारी पड़ गया .सूर्य-देव का आवाहन किया था .वे निष्फल कैसे जाने देते .परिणाम यही .जिसे मैंने -जन्मते ही अपने से दूर कर दिया ..'

अनायास धर्मराज कह उठे ,'ओह !यह क्या हो गया !...काश ,पहले पता होता ...कितना अनर्थ घटता रहा .'
अर्जुन का मुख एकदम श्वेत,'हम  वंचित रह गये अग्रज भ्राता की छाँह से ,उनके संरक्षण से ,स्नेह से , सदा उन्हें लांछित प्रताड़ित करते रहे उन्हें.माँ .ऐसा क्यों किया तुमने ?भाई  ही भाई के प्राणों का बैरी  हो गया !'
'फिर सब उनके प्रति इतने क्रूर क्यों रहे?माँ, तुम भी ..?' युधिष्ठिर चुप न रह सके .
अर्जुन अति व्याकुल ,' और मेरे कारण ,हाँ मेरे ही कारण .जीवन भर अपमान दुर्वचन कहे गये उनसे -क्या करूँगा ऐसा जीवन लेकर ,इस विजय का क्या अर्थ रह गया मेरे लिये ?'
' हे विधाता, फिर तो स्त्रियों के पेट में कोई बात न पचे कभी , ... ऐसे अनर्थ तो न घटें .' युधिष्ठिर एकदम कह गये .
कुन्ती ,चुप  .पर कहाँ तक चुप रहें ,बताना ही पड़ेगा.
'मेरा पालन-पोषण महाराज कुन्तिभोज ने किया. वे मेरे पिता नहीं थे .माता का सान्निध्य  कभी  मिला नहीं.माता-पिता और पुत्री का सहज अपनत्व और नेह अप्राप्य रहा.'
'जननी-जनक का संतान के प्रति वात्सल्य संबंध कभी नहीं जाना .पुत्री होने के दायित्व निभाती रही ,हर घड़ी परीक्षा की घड़ी लगती थी .माता-पिता के साथ जो सहज-भाव होता है ,वहाँ कभी अनुभव नहीं किया .यही लगता रहता कहीं कोई चूक न हो जाय .जिनके घर में थी उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना था .
फिर दुर्वासा मुनि का आतिथ्य मेरा दायित्व रहा .जिस महा क्रोधी को झेलने में  समर्थ- जनों के छक्के छूटजाते हैं ,मेरा कर्तव्य रहा उन्हें प्रसन्न रखना . कैसे करती रही  ,जैसे क्षुर-धार पर चलना .निभा दिया सब.उसके बाद भी सारी  अशान्ति अपने  पल्ले बाँध लाई .शाप ही तो हिस्से में आये .
 आगे तक सोच-समझ लूँ तब इतनी बुद्धि कहाँ थी ! व्यवहार-कुशल हो सकूँ ऐसा वातावरण कभी नहीं मिला ,न परिवार की छाया न सामाजिक संबंधों का विस्तार    . .भय और  आशंकाओं से त्रस्त .किससे कहती .धात्री ने जो उचित समझा करवाती गई ,मैं करती गई .समाज में रहना था .कर्तव्य निभाना था. मेरा अपना क्या था वहाँ ! ...  मुझे क्षमा करना मेरे पुत्रों !'
'रहने दो माँ ,जो हो चुका उसके लिए क्या करेगा अब कोई ,'युधिष्ठिर बोले थे .
 हम सब उस अन्याय के हिस्सेदार हैं .'
सबके शीष झुके थे .
*
.एक झूठ कैसे-कैसे अनर्थों की जड़ बन जाता है .
बहुत बार पछताई है कुन्ती .पर आज..अपने जीवन को धिक्कार रही है .
वसुषेण की निष्प्राण देह को देख रहे हैं युधिष्ठिर ,अर्जुन तीनों भाई और कुन्ती ,जिनके नेत्रों में उमड़े वाष्प-कण दृष्टि धुँधलाये दे रहे हैं .
कुंती बैठ गई ,कर्ण का मुख दोनों हथेलियों में भर लिया मन में आया काश, उसके जीवित रहते कभी उसका मुख यों निहारा होता !
 'रहने दो बुआ ,अब वह इस सबसे परे जा चुके हैं !'
कुन्ती ने सुना या नहीं , वह चौंक उठी थी -
  'अरे इसके ये दाँत टूटे हुये् मुख रक्त से सना .अर्जुन तुमने ..?
'नहीं माँ ,ऐसा नीच कार्य मैं नहीं कर सकता.'.
कृष्ण बोल उठे ,'उस घायल अवस्था में मरते-मरते भी एक याचक की इच्छा पूरी करने से विरत नहीं हुआ वह,अपनं स्वर्णमंडित दाँत स्वयं उखाड़ कर दे दिये .'
रक्त-रंजित होने की याचक की आपत्ति पर ,कैसे कर्ण ने अपने शऱ-संधान द्वारा  निकाली गई जल-धारा से  उन्हें  धोया था .खंडित शरीर से घिसटते हुये सब करता रहा.'
स्तंभित सब !
कानों में शब्द जा रहे हैं -
पांचाली उद्भ्रान्त-सी  ,अस्थिर -विकल , विस्फारित नयन - भावहीन मुख
सुने जा रही है .
वह दीप्तिमान देह  कवच- कुंडल उतरने की खरोंचें ,धूल और घावों के रुधिर से लिप्त, सामने पड़ी है .
शरीर पर जगह-जगह सूखे हुये रक्त के चिह्न ,कई जगह  तो ऊपर से कवच पहनने की रगड़ से हो गये घाव भी .
यह तो शरीर के घाव हैं .जन्म से मृत्यु पर्यंत हृदय पर जो घाव होते रहे
उसे कौन जानेगा ?द्रौपदी ने गहरी साँस ली .
हताश अर्जुन धरती पर बैठ गये .
'वे सबसे अधिक अपने थे ,वे सबसे श्रेष्ठ थे  .वे सबसे ज्येष्ठ थे .'
 उन के स्नेह -संरक्षण  वरदान से वंचित रह गये हम !
माँ ,कैसे सहन कर सकीं तुम .उन पर इतने दारुण  अत्याचार कैसे कर  सकीं तुम ?
धिक्कार है हमें, जिनके कारण वे सदा तिरस्कृत हुये .'
'ओह ,उनके कवच-कुंडल ,उतरवा लिये शरीर से जैसे कोई शरीर से चर्म खिंचवा ले ,फिर भी वे महाधीर विचलित नहीं हुये .किसी को कष्ट नहीं हुआ उनकी असह्य पीड़ा से .'
सूर्य की माता अदिति ,उनकी पितामही ने कवच-कुंडल प्रदान किये थे ,इन्द्र ने  अपने पुत्र की रक्षा  के लिये उतरवा लिये' -कृष्ण ने बताया .
अर्जुन व्याकुल हो उठे .
'नहीं, मैं नहीं क्षमा कर सकता अपने आप को .हमें नहीं चाहिये विजय ,नहीं चाहिये राज्य .कुछ नहीं चाहिये जो इतने क्रूर  अन्याय से प्राप्त हो '

सब ने तिरस्कार किया ,अपने स्वार्थ साधने सब पहुँचे उसके पास !   .
और उनने अपने लिये कभी किसी से कुछ नहीं चाहा.
उन्होंने चाहा था कुछ. पांचाली जानती है .उस दृष्टि का ताप आज भी विचलित कर देता है उसे ..
मत्स्य-बेधन को तत्पर हुये वसुषेण ने पाँचाली को देखा था .
आज वह दृष्टि याद आ रही है .कितना चाव ,कितना नेह -ज्यों कह रहा हो ,'बस, अब तुम मेरी हो .'
अभिभूत-सी देखती रह गई थी ,अपलक - कैसा दैदीप्यमान पुरुष !
फिर ध्यान आया यह कौन ?पार्थ नहीं है यह .
जब सुना अंगराज कर्ण है ,अधिरथ सूत का पुत्र. वह एकदम बोल उठी,'नहीं,नहीं संधान मत करना .'
वह चकित रुक गया .
'मैं कुलहीन से विवाह नहीं करूँगी .'
 पल भर में सारी स्निग्धता ,वितृष्णा बन गई ,अमृत विष में परिणत हो गया . मेरे मुख से निकले  तीखे  वचनों ने सौम्य मुद्रा को रौद्र ,वीभत्स बना डाला .

मैं कुछ नहीं जानती थी वसुषेण ,मेरे कानों में जो भरा गया था वह विष उन वचनों में फूट पड़ा था.मेरा अंतर भी सदा दग्ध रहा उस ताप से.पर फिर भी अपराध मेरा था !
काश ,सारे संसार की प्रताड़ना स्वयं पर ले कर उसे निरापद कर पाती  .
आज भी मन करता है वह एक बार नेह से देख ले,जिसे अपने व्यंग्य-बाणों से विदीर्ण कर दिया है ,एक बार उससे  कह दे ,'अपनी भूल के लिये मैं जीवन भर पछतायी हूँ .तरसी हूँ .तुम अधिकारी थे .'
अंतर से स्वर उठता था तुम मेरे हो ,पार्थ के साथ कैसी विचित्र समानता थी ,जो तुम्हारी याद दिलाती थी .
जब एक माता ने ,वधू को पुत्रों विभाजित किया था ,पर सबसे पहला  स्थान जिसका था वही वंचित कर दिया गया.
जब-जब कर्ण अपमानित हुआ ,उसके हृदय पर झटका लगा ,रातों को अनिद्रित सोचती रह गई .ऐसे देवोपम पुरुष का कैसा दुर्भाग्य .
 याज्ञसेनी ,तुमने छू लिया होता नेह के पारस- परस से तो वह स्वर्ण सा दमक उठता !

'मुझे ऐसा लगता था कि पहुँच में होते हुये भी वे हमें हत नहीं करते ...' भीम के कथ्य में निहित सच को और भाइयों ने भी अनुभव किया था .
'आज यह भी बतला दो माँ, कि क्या वे जानते थे कि हम उनके भाई हैं ?'
'हाँ ,यह बात मैंने उसे बतलायी थी ,उसे अपनी ओर करने गई थी ,उससे भिक्षा माँगी थी ...' ..कुन्ती का स्वर बार-बार रुँध जाता है ,
'तुम सब के जीवन के लिये !'
'उनके साथ इतना होने पर भी  माँ, तुम उन्हीं से .हमारे लिये ...,आज समझ में आया ...ओह मैं सोच नहीं पाता ! '
'हमारा जीवन वही भिक्षा है जो तुम माँग लाईँ माँ ,उन्हें मृत्यु के मुख में झोंक कर .'
'एक पुत्र के लिये जीते जी दूसरे के तन का चर्म उतरवा लिया, कैसे सह सकीं तुम ?'
कृष्ण ने पूछा ,' .आज पता लगा कि अग्रज थे इसलिये इतना दुख ? वे भाई नहीं होते एक मनुष्य होने के नाते सारे व्यवहार  उचित थे ?और वे , अगर सोचो तो , हर स्थिति में अपने आदर्शों पर अटल रहे थे .
अपने जन्म का रहस्य जानने के बाद भी अपने-पराये की भावना से निर्लिप्त रह अपना कर्तव्य निबाहते रहे .'
युठिष्ठिर ,चुप न रह सके ,'नहीं बंधु .तब भी वे एक श्रेष्ठ पुरुष थे .अपने पक्ष के लिये अपने निहित स्वार्थ के लिये हम सब उनके साथ अन्याय करते रहे .अपराधी हम हैं .'
अब वे नहीं हैं,कुछ भी कहो ,कितना भी पछताओ उन्हें क्या ?सब जानते थे  पर अपने आदर्शों को अंत तक जीते रहे ,किसी से  बिना कुछ कहे चले गये .'
 कुन्ती सहन न कर सकी मुंह में आँचल ठूँस वहाँ से उठ गई .
रुँधे हुए रुदन की आवाज़ रह-रह कर आ रही है .
 आह , वसुषेण  ?अपना लिया होता उसे तो जीवनव्यापी बिडंबनायें न झेलनी पड़तीं .जिससे बच कर भागी उसे ही नयनों के सामने देखना ,निरंतर अपमानित होते ,क्षुब्ध और विवश . वही नियति बन गई .उसी विधि  से तीन-तीन पुत्र उत्पन्न करना क्या .यही विधि का विधान था ?जिससे भागने का प्रयत्न किया वह बारबार सामने आता रहा .

भिन्न-भिन्न जनक थे. उन पुत्रों को एक जुट रखने के लिये द्रौपदी को माध्यम बनाया .पर उसी वधू के कारण एक पुत्र, अर्जुन के समान प्रतापी पुत्र , वह भी सबसे बड़ा .उससे बैर बँध गया . देखती रही विवश कुन्ती .जो नहीं चाहती वही हो कर रहता है .जिसे टालने के लिये कितने प्रयास करती है वही सामने प्रत्यक्ष हो जाता है .सामाजिक मर्यादा की रक्षा के लिये जो किया ,उससे कहीं आगे जा कर वही करने को विवश हो गई . किसे दोष दे .ऐसा नहीं कि समाज में वैसा हुआ नहीं था ,कृष्ण द्वैपायन ,सत्यवती सब .यथार्थ बने सामने खड़े थे .
तभी साहस कर स्वीकार कर लिया होता तो कितनी यंत्रणाओं से बच जाती !
जब  पांडु ने संतान की इच्छा जताई थी .कुन्ती विचार -मग्न हो गई थी. क्या कह दे  कि एक कानीन पुत्र है स्वीकार कर सको तो !
पर मन आशंका-ग्रस्त रहा.अब तक क्यों छिपाये रहीं ?विवाह के समय ही बता देती तो आज ये द्विधा नहीं होती .कहीं पूछ दिया गया कि किसका है ,क्या प्रमाण है ? तो किस-किस को उत्तर देती  .और फिर जिसे जन्म लेते ही बहा दिया था जिसे किसी और ने उसे अपना लिया , पुत्रवत् स्नेह-ममता से सींचा .दाई-माँ से सारी सूचनायें मिलती रही थीं .स्वरूपवान् तेजस्वी ,देख कर नयन जुड़ा जायँ ऐसा युवक .इतने वर्ष की सार-सँभाल किसी ने की .अब किस मुँह से कहूँगी ये मेरा है ,मुझे लौटा दो.
कुन्ती किससे सलाह लेती ?माँ-पिता कहाँ  जिनसे अधिकारपूर्वक पूछ सके ?और जिनने पोषण किया उनसे कहने का साहस नहीं कर सकी .
कर्ण के अंतिम कृत्यों के बाद  जब परिवार- जन उसे अंतिम बिदा दे रहे थे ,द्रौपदी बढ़ आई थी .
आज कैसी पांचाली को देख रहे हैं धर्मराज !अब तक खुले रहनेवाले केश बँधे हैं पर यह वह द्रौपदी नहीं है .नितान्त परिवर्तित यह नारी!
क्या इसे पहचानते हैं ?
कभी पहचाना था ?क्या ज़रूरत थी .पत्नी थी अपना धर्म निभाती हुई. जानने को था भी क्या?यही है वह ?
क्रोध देखा है उसका, करुणा भी .प्रश्न पूछती तेजोद्दीप्त पांचाली के सम्मुख आँखें नहीं उठा पाये थे .उत्तर उनके पास थे कहाँ ?आज पहली बार उसे रोते देख रहे हैं .
वस्त्रहरण पर भी जो चुनौती सी देती रही आज वह कितनी निरीह कितनी विवश  .
'आर्य वसुषेण ,क्षमा कर देना मुझे .मैं कुछ नहीं जानती थी .मेरी दृष्टि बाँध दी गई थी .'
पहली बार द्रौपदी के मुख पर दारुण पश्चाताप की गहरी छाया देखी .युधिष्ठिर ने कहा कुछ नहीं.
द्रौपदी विषण्ण बैठी है.
कैसा आवेग बार-बार उठ कर मन को मथे डाल रहा है .
दोनों कर जोड़ शीष झुकाये  बोली थी, थी 'आर्य वसुषेण , क्षमा कर देना मुझे .'
*
कर्ण ने उस दिन कुन्ती से कहा था -
'जन्म लेते ही  स्वाभाविक संबंधों से काट कर फेंक दिया गया मैं. गर्हित पदार्थ सा .जीवन भर मेरे होने के अपवाद से बचती रहीं आप ,अब अंतिम समय  में क्यों कलंक लेती हैं?चलने दीजिये ऐसे ही .मैंने कभी नहीं जाना कि मैं कुन्ती-पुत्र हूँ ,जीवन भऱ अपमानित हुआ, राधेय बना रहा .जिनने उपकार किया, जीवन दिया ,ममता दी, और फिर जिसने मित्र बन कर नाम और विश्वास दिया ,जब कि उनका मेरे लिये कोई दायित्व नहीं था ,उनका ऋण चुकाना है .फिर भी आप  निराश नहीं लौटेंगी मेरे पास से .'
उसका मन उमड़ पड़ा-
माँ थीं तुम ? ,एक के लिये इतना मोह औऱ दूसरा जन्म से मृत्यु तक जीवन  परित्यक्त, वंचित ,अपमानित ! दोनों के लिये समान नहीं तुम .--पर अंतर से उठती पुकार  दबा गया कर्ण .--आशा लेकर आई आगता को आहत नहीं करूँगा .
' मुझे उसका ऋण चुकाना है जिसने सबके सामने सिर उठा कर जीने का अवसर दिया.नहीं तो कहीं सिर झुकाये बैठा होता ,आपको मेरे पास आने की आवश्यकता भी नही होती .भूल गईँ होतीं आप .
नहीं मारूँगा आपके प्यारे पुत्रों को बस एक को ,जो आपका पुत्र होने का अनुचित लाभ उठाता रहा . एकलव्य हो या मैं, वंचित - वर्जित रहे ,उसी के कारण .
या पार्थ जाये  या परित्यक्त राधेय, आपके पाँच पुत्र जीवित रहेंगे .
वैसे भी मेरे छोटे से परिवार के सिवा और किसे मुझ में रुचि है जिसे दुख होगा?
आपकी ओर भारी शक्तियाँ हैं .येन-केन प्रकारेण मुझे हत करने का उपाय खोज ही निकालेंगी .अब तो जीवन बीत गया .अंत बेला आ गई है .
अपयश का भागी बन क्या करूँगा जी कर ?आप निश्चिंत हो कर जाइये .'
नदी के तट से सिर झुकाये कुन्ती लौट रही थीं. झलझलाते नयनों से  अपने धुँधलाये अतीत की झलक को -वह उनके ओझल हो जाने तक खड़ा देखता रहा था!
*
कर्ण का ध्यान सबके मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ है .कुन्ती कभी  हँसती कहाँ थीं ,बस हल्की सी मुस्कान कभी-कभी उदित हो जाती थी .युधिष्ठिर राजा बने पर अशेष ग्लानि है -इस राज्य का अधिकारी तो कोई और था .माँ का सबसे बड़ा पुत्र ,सबसे प्रतापी ,सबसे तेजस्वी सबसे योग्य !
ओ माँ ,तुने क्यों नहीं सत्य को सामने आने दिया ?जीवन की धारा ही बदल जाती ,जो हुआ है कभी न होता .
द्रौपदी के पछतावे का कोई छोर नहीं .

वह कह उठी ,'मेरे पुत्रों को बैरियों ने मारा किन्तु तुम्हें तो जन्म से अपनों ने ठुकराया ,सदा अपमानित किया . क्षमा करना, तुम्हारे आगे हमारे दुख  दुख कुछ नहीं .'
इन कुन्ती-पुत्रों से उनकी विचित्र समानता अनुभव करती थी  वह .गंभीर स्वभाव ,गहन दृष्टि ,स्नेह,सहानुभूति से भरी .कभी कोई हल्की बात नहीं .सहज ,गरिमामय व्यक्तित्व .
मन में प्रश्न उठता है -
तुमने  अर्जुन की कामना की थी ?
हाँ ,अर्जुन !
और कर्ण ?
 कर्ण ? नहीं जानती थी उसे .जब जाना तब विरोध करने का, दूर होने का जितना प्रयत्न करती रही उतना ही छाया रहा वह मुझ पर !
 कैसा दुर्निवार आकर्षण,जो स्थिर न रहने दे .
अर्जुन दुखी थे , अपने परम तेजस्वी अग्रज को मैंने छल से मार दिया .जीवन भर उन्हें मेरे कारण अपमानित और तिरस्कृत होना पड़ा.
अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये उनका प्रतिद्वंद्वी बना रहा .
उनके साथ सभी ने अन्याय किया .
कर्ण की चर्चा होने पर पितामह ने बताया -
 उसने कहा था -'अब कुछ नहीं चाहिये. मन विरक्त हो गया है.जिनका ऋण है मेरे ऊपर वह चुका दूँ, बस .
 आशीष दीजिये कि यह अभिशप्त जीवन कालिमा ओढ़ कर न जाये .जो किया कर्तव्य हेतु ,अपने स्वार्थ के लिये नहीं '.
'नहीं वत्स ,उन्नत शिर और उज्ज्वल मुख ले कर जाओ .सबसे अधिक निर्मल तुम्हारा चरित्र युग-युगों तक स्मरणीय रहेगा !'
(क्रमशः)
*

(नोट- वर्तमान में खाटू श्याम - श्रीकृष्ण ने शीश को खाटू नामक ग्राम में स्थापित कर दिया था जो आज लाखों भक्तों और श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है ! फल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने शीश दान किया था.हर माह की सुदी १२ को वहाँ मेला लगता है)




गुरुवार, 14 जून 2012

कृष्ण-सखी - 45 & 46 .


45.
शिविर का द्वार फटाक् सा खुला ,कहीं कोई आड़ नहीं .
निद्रा से अकस्मात जागे .वे पांचो शीघ्रता में अंदर घुसे .द्वार पर ही धृष्टद्युम्न का शव पाँवों से टकराया युधिष्ठिर गिरते-गिरते बचे .
आड़े-टेढ़े कई शव वहीं पड़े -शिविर में जो सोये थे वे सभी .
सामने खड़ी अस्त-व्यस्त -सी पाँचाली !आँखें एकदम सूनी ,आँसू अंतरग्नि  की आग से शुष्क ,यह वही तेजस्विनी पाँचाली है ?
पहचान में नहीं आ रही .
पड़े हुये कबंधों को बार-बार देखती है -ये हैं उसके पुत्र ?
किधर जाये, किसे उठाये ,किसे पुकारे ! कौन-सा कौन है पता नहीं चल रहा .
बार-बार आँखें फैलाये सिर घुमा-घुमा कर पांचों को देखती है फिर निढाल-सी  वहीं बिखरे रक्त के बीच धरती पर बैठ जाती है .कौन आया ,कौन गया कोई भान नहीं .
भीतर प्रविष्ट हुये पाँचो भाई,  सामने का दृष्य देख वहीं जड़ीभूत .
 न कोई किसी को देख  रहा ,न बोल  रहा .मुर्दनी छाई सबके चेहरों पर .कुछ नहीं बचा जो कहें-सुनें .
युधिष्ठिर एकदम शान्त - यह तो मरघटों की शान्ति है .
अर्जुन की मुद्रा पल-पल बदलती, और भीम चेहरे के भाव पकड़ में नहीं आ रहे , पल-पल विकृत होते .नकुल-सहदेव श्री-हत लुटे-से .
इनने तो एक-एक पुत्र ही खोया पर उसके तो पाँचो एक साथ मौत के घाट उतार दिये गये !
किसी का साहस नहीं हो रहा उससे कुछ कहे .
कहे कौन ?पाँचो पति दुख- मग्न एक साथ . कौन इस विषम घड़ी में उसे सांत्वना दे ,कुछ कहे ,संताप  बाँटे !
  कौन आगे आए?सब विमू़ढ़. एक दूसरे से आँख बचाते ,
और पांचाली ?
 अकेली  - एकदम निस्सहाय.इस समय कोई उसके साथ नहीं . अपने आप में बिलकुल अकेली !
सब स्तब्ध .जैसे सारा दृष्य वहीं जम गया हो ,चित्र-लिखित !
भीम के कंठ से मौन भंग करता  विचित्र- सा स्वर उठा ,'किसने ,कैसे ?'
अर्जुन ने सिर उठा कर देखा ,' एक ही तो बचा था ,वही गुरु-पुत्र अश्वत्थामा .और किसमें सामर्थ्य थी इतनी ?'
पता नहीं समय कैसे बीत रहा है ?
जब युधिष्ठिर ने सत्याभास वाला कथन किया तब किसे पता था कि इसकी यह प्रतिक्रिया भी हो सकती है ?
दोनों ओर की  चालें  .कौन कब बीस निकल जाए .
कौन धीरज देगा इसे ?  पाँच पतियों में से कौन ?
पाँचाली को अपनी ही सुध नहीं .

कौन आगे आये , हृदय से लगा कर सांत्वना के दो बोल बोल दे ?
. किसकी पत्नी है यह इस समय?
उसका दायित्व है -सबके भोजन का ,विश्राम का, देह पर अधिकार  बारी बारी हर एक का .
- किन्तु उसके लिये कब, कौन ?
बड़े-छोटे  भाई हैं.पत्नी के संबंध में भी पारस्परिक मर्यादा .कभी सम्मिलित चर्चा ,विचार-विमर्श नहीं .साथ में  हैं ,तो आपस में भाई है पति का रिश्ता चला जाता है  पृष्ठभूमि में .
किसी को साहस नहीं सामने आए ,सब स्तब्ध .
बहुत विचलित है पार्थ  -किसके कारण सह रही है पाँचाली इतनी यंत्रणायें . मुझे वरा था उसने .क्या दे सका मैं ?
पाने के नाम पर  बाँट दिया टुकड़ों में .
रह-रह कर हूक उठती है अंतर से .किससे कहें अर्जुन !

 रह-रह कर पांचाली का मुख देखते हैं .उसकी भाव-शून्य दृष्टि ,देख कर भी नहीं देख रही .
 हम? हम कब हुये उसके .सदा विपदा में अकेला छोड़ दिया !

 किसी से नहीं कह सकता. पाँचाली से भी नहीं .उसका मन औरों से फिर गया तो .कहीं कोई व्यवधान आ गया तो !
आँखें जल रही हैं ,मुखमुद्रा कैसी ?एक गहरी सांस .
खड़ा हो गया उठ कर, द्रौपदी की ओर देखा नहीं जा रहा .

अचानक कुछ आहट , धीरे से कृष्ण प्रवेश करते हैं
सामने दिखी अकेली अभागिनी  ,कोई सांत्वना देने वाला नहीं .
अग्नि संभवे ,जलो जीवन भर .कहाँ है अंत?
वे बढ़े,' कृष्णे !'
कैसी सूनी निगाहें .कुछ देख नहीं रही ,कुछ सुन नहीं रही .
क्या कहूँ ,कैसे सांत्वना दूँ ?
जो हो गया उसकी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी .
कृष्ण ने आगे बढ़ कर पुकारा ,'पांचाली .'
द्रौपदी देख नहीं देख रही किसी को ! एकदम अपने आप में डूबी .
भीम उत्तेजित हो  उठे ,युधिष्ठिर की ओर देखा .रुक गये .
कृष्ण आगे बढ़ कर उसके समीप धरती पर बैठ गये .
अपना हाथ बढ़ा कर उसका हाथ पकड़ लिया .उसने दृष्टि उठा कर देखा - अपार करुणा से लहराते- वे दो नयन !
कुछ क्षण देखती रह गई वह .फिर सिर झुका कर उस हाथ पर टिका दिया .दूसरे हाथ से कृष्ण ने उस मुक्तकेशी शीश पर हाथ रखा  हौले-हौले थपकते .
आपद-विपद में एक ही आसरा -कृष्ण,परम सखा !
'मेरी व्यथा  को तुम्हीं समझोगे मुरारी,' -  इतना मंद स्वर, बस कृष्ण ही सुन पाये .
अर्जुन उठे .खड़े कुछ शून्य में ताकते .
द्वार की ओर बढ़े .एक उचटती-सी दृष्टि सब पर डाली ,पाँचाली पर टिकी .
फिर बाहर निकल गये
 कुछ शब्द पीछे छूट गये   - 'उस पापी का शीष लाकर  तेरे चरणों में डालूँगा तभी चैन पाऊँगा .'

युधिष्ठिर देखते रहे .भीम नकुल-सहदेव सब एकदम चुप.किसी की पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी .
कहीं फिर कोई अनर्थ न घटित हो जाये !
नहीं अस्त्र-शस्त्र कुछ नहीं ले गया ,कुछ अनर्थ नहीं करेगा .भीम को इंगित किया युधिष्ठिर ने .वह उठ कर चला गया .
'सखी .उस हत्यारे ने पाँचों कुमारों को...'कृष्ण आगे बोल नहीं पाए.
आँखें फाड़ कर देख रही है  पांचाली  .
युधिष्ठिर की चिन्ता, 'कहाँ गया होगा ! पता नहीं कहाँ छिपा होगा  वह गुरु पुत्र अश्वत्थामा!.'
'पाप सवार है उसके सिर पर . कहीं थिर नहीं रह सकता .
 मिल जायेगा  कहीं .अभी लाते हैं  पकड़ कर उसे,' कहते हुये उठ खड़े हुये  कृष्ण , और शिविर से बाहर निकल गये .
**
46.
तमतमाये मुख भीम खुले द्वार से दिखाई दिये ,
अर्जुन लौटे ,कृष्ण लौटे ,पकड़ लाए थे अश्वत्थामा को .रस्सियों से बँधा हुआ.
एक धक्का दिया ,वह जा गिरा पाँचाली के पगों के पास  !
'दंड दो इसे,' कैसा स्वर हो उठा था पार्थ का .
 उस स्तब्ध शिविर में गूँज गया ,'इसे दंड दो पांचाली .इसने तुम्हारे सोते हुए पुत्रों की हत्या की है .पाँच पुत्रों की .कृष्णा, इसे दंड दो !'
 देखती रही चुपचाप उसकी ओऱ .फिर एक फिसलती-सी दृष्टि युधिष्ठिर पर  डाली .
'कहीं कोई दंड है ?  पांचाली की विचित्र वाणी ,
चरणों में गिर गया गुरु-पुत्र.
'मैं बाल घाती हूँ ,मैं पापी हूँ .'
झुका खड़ा है अश्वत्थामा .
एकदम द्रौपदी को लगा बड़ा कुमार चरण स्पर्श करने झुक रहा है .मेरा बड़ा कुमार ?दिल फटने लगा कहाँ है मेरा कुँवर? ...कहाँ हैं मेरे हृदय के पाँच खंड ?
नहीं .वह  नहीं यह अश्वत्थामा ,उनका हत्यारा !
एकदम कैसे लगा जैसे मेरा पुत्र खड़ा है ,क्या पुत्र सब के एक से होते हैं ?
'जाओ निकल जाओ ,मुख मत दिखाओ,'.कह उठी वह .
वह चलने के उपक्रम में  घूम गया .
कृष्ण ने मार्ग रोक  लिया .
'नहीं पहले दंड.'
वह देखती रही - सिर झुकाए इस दीन युवक को दंड?क्या करूँ जो इसे किये का फल मिले .क्या करूँ जिससे मेरा अंतस्तल शीतल हो ?
दो ही  निराले व्यक्तित्व थे .वसुषेण और अश्वत्थामा .
उसके शरीर पर कवच-कुंडल ,इसके माथे दमकती मणि !
अश्वत्थामा .ऊंचा-पूरा युवक - बलिष्ठ शरीर ,माथे पर मणि दिपदिपाती हुई !
आज कैसा खड़ा है पांचाली के सामने .शीष झुकाए .तेज हत .नेत्र उठ नहीं रहे ,और कृष्ण ने  झकझोरते हुये  कर  दिया द्रौपदी के आगे  .'लो ,यही है वह पातकी ,कायर , योद्धा के नाम पर कलंक , दंड दो इसे.'
अर्जुन सिर काटने को तत्पर .
'यह तो पहले ही मर चुका . कहाँ गया इसका तेज ,मणि पर कालिख पुत गयी .जब अंतरात्मा , की द्युति खो गई मणि क्या कर लेगी .अब मार कर हत्या मत लो पार्थ .छोड़ दो भीम .'
सब स्तब्ध !
कैसी वाणी बोल रही है आज,
'जिनके लिये हर तरह से निभाती रही .नीति-अनीति , समझते हुये भी मौन झेलती रही..जब वही नहीं रहे ....मेरा क्या ..
उन सबके और-और हैं ,और ठिकाने भी हैं ...मैं ही रह गई एकदम अलग.. .!'
उन विषम क्षणों में सब कुछ सोच गई वह .मन का उद्वेग ,शब्दों में फूट पड़ा था.
समझ रहे हैं जनार्दन .क्या बोलें .कैसे सांत्वना दें ?
'इसका शीश चाहिये मुझे ,' पार्थ फिर बढ़े .
पांचाली ने हाथ उठाया ,'गुरु-पुत्र है ,उन्हीं का अंश .नहीं .वर्जित है ,पार्थ उसकी हत्या . वह तो पहले ही मर चुका छोड़ दो उसे, रहने दो .'
कंठ भरभरा उठा, कुछ रुकी वह.
फिर सुना सब ने   ,' वे तुम्हारे गुरु थे ,उनकी हत्या ..अंतिम समय तक उनका मन इसी में पड़ा रहा....'
यह क्या कह रही है द्रौपदी !
कोई किसी को नहीं देख रहा, अपने आप में सब , स्तब्ध .
'मुझे नहीं चाहिये प्रतिशोध .हटा दो यहाँ  से इसे ...'
 बार-बार कंठावरोध  हो रहा है .रुक -रुक कर  संयत होने का प्रयत्न करती है -
'एक माँ  का दुख कैसा होता है तुम नही जानते, जनार्दन .नहीं ,मैं नहीं .....इसकी माता कृपी .अनपेक्षित  वैधव्य  की  यंत्रणा से नहीं उबर पाई होंगी वे ....नहीं मैं नहीं दे सकती एक और दुख ..कितना दारुण!  मैं झेल रही  हूँ जो . जानती हूँ हृदय का घाव कितना पीरता है . किसी पर न पड़े यह यंत्रणा ,यह दुख मुझसे नहीं सहन हो रहा ,माता कृपी का क्या दोष ? मैं किसे दोष दूँ ? .नहीं ,जाने दो ,जाने दो उसे कृष्ण .
जाओ गुरु-पुत्र ,चले जाओ यहां से .'
वह मुड़ा  .पार्थ का  स्वर उभरा ,'रुको, सुन लो जाने से पहले .ऐसे नहीं मुक्ति पाओगे तुम !'
 कृपाण उठा ली ,सिहर उठे सब .क्या हो  रहा है यह ?
उसके कपाल को बेध रहे हैं . मस्तक-मणि निकाल ली . रक्त की बूँदें टपक रही हैं .उसी के वस्त्र से पोंछ देते हैं अर्जुन. दारुण  पीड़ा से विकृत अश्वत्थामा .
,वह मांसल मणि अर्जुन के   हाथ में  है.
  हत-तेज,रक्त-रंजित वह विकृत मुख !
 'रहने दो !पार्थ,  क्या होगा उससे .मेरे बच्चे लौट आयेंगे मेरे पास ?'
कोई कुछ नहीं बोल रहा .
पांचाली का एकदम शान्त स्वर ,'तुमसे क्या कहूँ ,मुकुन्द ! जब नीति और धर्म के ज्ञाता स्वयं को नहीं रोक पाते तो अन्य लोगों को...'
कई दृष्टियाँ उधर उठ गईँ जैसे पूछ रही हों -
यह पांचाली क्या कह रही है -सुन रहे हो धर्मराज ?
वे सदा की तरह गंभीर ,अगम.
असह्य पीड़ा से विकल  अश्वत्थामा का हाथ चला गया घाव पर जिसे भिगोती रक्त- धार बह निकली थी.
 कैसा दारुण दृष्य !
गूँजने लगा, रह-रह कर छा जाते दुःसह मौन में  कृष्ण का स्वर ,' जा अश्वत्थामा, इस महिमामयी नारी ने छोड़ दिया तुझे .  चिर-जीवी हो तू,इस घाव की पीड़ा युग-युगों तक झेलता !याद करता रह अपने पापों को , क्षण भर भी शान्ति न मिले तुझे, शताब्दियों- सहस्राब्दियों तक .यही व्रण लिए भटकता रह कोई औषधि नहीं जिसकी ,केवल यंत्रणा ,दारुण संताप और पश्चाताप . युग-युगान्तरों तक जीवित रह तू . जा , जीता रह इस यंत्रणा के साथ अनंत काल तक ..!'
काँप उठी द्रौपदी ,
'मैं तो मुक्त हो जाऊँगी , जो हुआ उससे आगे निकल जाऊँगी, जनार्दन.ये यहीं अटका रहेगा .कैसा दारुण शाप !'
फिर घूमी उसकी ओर-
'जाओ, भाग जाओ ! खो चुके  सब ,जो साथ लाये  थे .'
'जाओ अश्वत्थामा, जाओ .बस, चले जाओ यहाँ से ,एक क्षण भी मत रुको .नहीं देखना चाहती मैं तुम्हारा मुख ,एक पल  के लिये भी नहीं . पता नहीं क्या कर बैठूँगी .तुरंत निकल जाओ यहाँ से .'
वह चला, पग जैसे बरबस घिस़ट रहे हों
विकृत-वीभत्स मुद्रा लिए रक्त टपकाता, वह निकल गया शिविर से बाहर .
*
(क्रमशः)

शुक्रवार, 8 जून 2012


भानमती की बात - कहिनियाँ .

'अरे ,कहाँ चली गईं थीं भानमती , कितना याद कर रही थी तुम्हें ?.'
'सच्ची .कित्ते दिन से नहीं मिले आपसे, बहुत कहना इकट्ठा हो गया .'
बस,अब वह चालू हो जायेगी.  देखना,मुझे बोलने का मौका कब  मिले !
एक  बात तो  है बहुत दिनों तक उसकी बात न सुनूं  तो भीतर हुड़कन  उठने लगती  है. कुछ कमी- सी लगती है ,जैसे  मन कोई कोना  सूना-सा पड़ा हो . इसी भानमती के बहाने जुड़ जाती हूँ उस सबसे जिनका साथ दूर हो गया है .
 दो हैं जो अपनी संस्कृति से हमें जोड़े रखती हैं, पोषण-कर्त्रियाँ भी कह सकते हैं , एक भाषा दूसरी नारी . नारी भी, जो अभी अपने ही रंग में  है ,बदला नहीं उसने  अपना मूल-चरित्र .जैसे भानमती जिसके बहाने लोक-मन का सामीप्य पा लेती हूँ .
उसके साथ हो कर बहुत कुछ पढ़ती-गुनती हूँ .जीवन की वे सहज किन्तु  दुर्लभ बन गई बातें .जो किताबों में कहीं नहीं मिलतीं.
'आप जौन  कहिनियाँ पूछे रहीं  सो आपुन भौजी से पूरी करवाय लाये. काहे से कि  हम तो बीच-बीच में भुलाय जात हैं. '
मैं उत्साहित हो उठी .व्रत-पूजा के अवसर पर  जो कहिनियाँ सासू-माँ ,सुनाया करती थीं स्मृति से उतरती जा रही हैं ,कहीं आगे कहीं पीछे .किसी का किसी में जोड़ बैठती हूँ .
पिछली बार भानमती साथ थी , बोली ,'काहे परेसान हैं ,हम पूरी लाय देंगे .'
' अपने गाँव  गई थी  ,उसकी ददिया सास विधिपूर्वक व्रत-कथायें सुनाती हैं .गली मोहल्ले की स्त्रियाँ गहने-कपड़े पहने ,सेंदुर मेंहदी रचाये उन्हे घेर कर बैठ जाती है ,'हाँ अजिया ,सुरू करो ..'
वे सब व्रतार्थिनियों की अँजलि में अक्षत-पुष्प-जल दे कर ,
(कथा-समाप्ति पर गौर को अरपने के लिये ) प्रारंभ करती हैं -
' आरी-बारी ,सोने की दिवारी ,
कहाँ बैठी बिटिया कान-कुँवारी .
का धावै ,का मनावै ,
सप्ता धावै,सप्ता मनावै .
सप्ता धाये का फल पाए ?

पलका पूत ,सेज भतार ,
आम तर मइको ,महुआ तर ससुरो .
डुलियन आवैं पलकियन जायँ .
भइया सँग आवें ,सइयाँ सँग जायँ .
चटका चौरो ,माँग बिजौरो ,
गौरा ईश्वर खेलैं सार .
बहुयें-बिटियाँ माँगें सुहाग ,
सात देउर दौरानी ,सात भैया भौजाई,

पाँव भर बिछिया ,माँग भर सिंदुरा ,
पलना पूत, सेज भतार ,
कजरौटा सी बिटियां सिंधौरा सी बहुरियाँ ,
फल से पूत, नरियर से दमाद.
गइयन  की राँभन,घोड़न की हिनहिन .

देहरी भरी पनहियाँ ,कोने भर लठियाँ ,
अरगनी लँगुटियाँ
चेरी को चरकन ,
बहू को ठनगन
बाँदी की बरबराट,काँसे की झरझराट,

टारो डेली,बाढ़ो बेली,
वासदेव की बड़ी महतारी .
जनम-जनम जनि करो अकेली .
 *
मैं जानी बिटिया बारी-भोरी ,
चन मँगिहै ,चबेना माँगिहै ,
बेटी माँगो कुल को राज .
पायो भाग  , सत्ता दियो सुहाग !
जैसी उनकी ,तैसी सबकी होय!'
*
समापन पर वे सब अपनी- अपनी अक्षत-पुष्प-जलांजलियाँ  ,गौरा को समर्पित कर उनका वंदन करती हैं ,एक स्वर में दोहराती हुई ,'.जैसी उनकी तैसी सबकी होय !'
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया !
भारत की  नारी ,तुम्हारे सारे  व्रत-पर्व ,इसी मूल भाव से संचालित हैं .
*
- प्रतिभा सक्सेना.
(क्रमशः)

मंगलवार, 5 जून 2012

कृष्ण-सखी - 43.& 44.

*

43
'एक-एक से बदला लूँगा !'
रह-रह कर अश्वत्थामा की बुद्बुदाहट.
रात्रि के नीरव अंधकार को झकझोरती  घूहुह्घुः-घुहुह्घुः की घहराती हुई ध्वनि गूँज  गई - ऊपर वृक्ष की शाख पर कोई उल्लू बोल उठा था .
  तल में बैठे कृतवीर्य ने जड़ों का सहारा लिये अधलेटे उद्विग्न मित्र से कहा .
'कैसा अपशकुन !पता नहीं और क्या होनेवाला है !'
 "जो हो चुका है उससे अधिक और क्या हो सकता है ? सब इनकी दुरभिसंधि है . पितृहीन कर दिया गया मैं ,क्षत-विक्षत युवराज सारी आशा छोड़ बैठे हैं .'
 अश्वत्थामा की घोर विकलता को कृतवीर्य कुछ धीरज बँधाना चाहते हैं
एक बार नहीं ,दो बार नहीं, कई बार वही कर्कश उलूक-ध्वनि .
दोनों चुप !
 अचानक वह रात्रि-चर पंख फड़फड़ाता उड़ गया .
फिर सुनाई देने लगीं पक्षियों की भयभीत चीत्कारें .
'अरे,रात्रि का अँधियार पा जुट गया यह अपना कार्य साधने में .'
 विकलता से छोटे-छोटे चक्करों में  मँडराते, घबराये पक्षियों की  करुण पुकारें ,
शावकों की दारुण चिचियाहट वाली आर्त रोदन- ध्वनियाँ वायुमंडल विदीर्ण कर रही हैं  .
'रात्रि  में  निद्रालीन पक्षियों का आखेट कर रहा है ... '
कुछ देर विचार-मग्न रहा , अचानक गुरु-पुत्र उठ कर बैठ गया .
'बस ,बहुत हुआ .अब रात्रि व्यर्थ खोने के लिये नहीं है .कुरु-सेना नायक विहीन है .घायल युवराज वहाँ ताल का जल बाँध कर छिपे हैं . चलो ,हमें कुछ करना होगा .'
कृतवर्मा ने पूछा ,'क्या निश्चय किया है मित्र ? .'
  चलो अभी बताता हूँ .'
 दोनों उठ कर चल पड़े .
*
पीड़ा से व्याकुल और भय से त्रस्त दुर्योधन ,ताल से बाहर आने का सोच भी नहीं सकता .कानों में पुकार आई -
'मित्र !'
अश्त्थामा का स्वर था,साथ में कृतवीर्य.
दुर्योधन घिसट आया .बढ़ कर सहारा दिया दोनों ने .
'हम निश्चय कर आये हैं युवराज, ,तुम निराश मत हो  .'
'अब क्या होना है ?
'अभी कुछ भी हो सकता है .
कृतवर्मा बोले ,'अब गुरु-पुत्र को सेनानायक बना दो .फिर हम देख लेंगे .'
अश्वत्थामा बोला ,'मैं करूँगा ,बहुत बदले चुकाने हैं मुझे,तुम्हें सिंहासन पर देखना है .  सामने होने का साहस नहीं था ,तो यह सब किया पखंडियों ने .'
दुर्योधन उसका मुख देखता रहा .
'तुम यह मत समझो कि हम हार गये .मैं तुम्हें विजय दिलाऊँगा .बस अब मुझे सेनापति बना दो .बदला लिये बिना मुझे शान्ति नहीं मिलेगी .तुम निराश मत हो .उन पांचो के सर काटकर तुम्हारे पगों में ला डालूँगा .'
'मैं कर सकूँगा .यह  मस्तक-मणि प्राप्त है मेरा कोई क्या कर लेगा ?'
 दुर्योधन आशान्वित हो उठा.
 तुरंत  अपने रक्त से उसका तिलक कर सेनापति का पद प्रदान किया .
'' बस मित्र अब यह सूचना तात कृपाचार्य को देना है .निश्चिन्त रहो , शीघ्र लौटूँगा !'
वे चले गये
*
विश्रान्त दुर्योधन ,किसी विध चैन नहीं .रात बीत रही है .और दो घड़ियों में भोर का उजास छा जायेगा .
किसी के आने की आहट . वह उत्साह में सारे कष्ट भूल, बाहर निकल आया .एक बड़ी- सी रक्त-सनी गठरी हाथों में ,आँधी के वेग से सामने आया गुरु-पुत्र .विद्रूप, भयानक मुख ,विकृत हास्य- भाव  लिये  .
'अरे अश्वत्थामा  !'
'लों .उन पाँचो के शीष! तुम्हारे शत्रु यमलोक सिधार गये .'
दुर्योधन सारा कष्ट भूल चैतन्य हो उठा.
'देखूँ .देखूँ . भीम का सिर दो मुझे .'
दाँत पीसते हुये उसने सारा बल लगा कर दोनों हाथों से भींचा ,खोपड़ी एकदम तरबूज -सी  पिच गई - तरल बह चला .दोनों कर-तल रक्त सिक्त
निराश हो ,गिरा  दी उसने ,
'नहीं ,नहीं ! यह भीम नहीं हो सकता ....मेरी गदा से टकरा कर भी न टूटनेवाली उसकी हड्डियाँ ऐसे नहीं पिचकतीं .'
उसने झुक कर  ध्यान से देखा ,
'अरे, यह तो सुतसोम का शीष है ,भीम का पुत्र ! '
फिर शेष चारों पर दृष्टिपात किया ,एकदम चिल्ला उठा  ,'अरे .यह क्या कर डाला ?...
ये  पाँचो पांचाली के  पुत्र थे,... बाल हत्या !'
रक्त-सनी ,लोथड़ों  से लिथड़ी हथेलियाँ झटक कर झाड़ने लगा ,घोर वितृष्णा से मुख घुमा लिया उसने .
अश्वत्थामा   हत-तेज -जैसे दमकते दर्पण पर किसी ने फूँक मार दी हो .
' रे पामर, यह क्या किया?  जाओ.चले जाओ यहाँ से ..रहा-सहा भी नष्ट कर दिया तुमने !...
दूर हो जाओ यहां से , खोजते होंगे वे तुम्हें .जाओ ,भागो यहाँ से !'
हताश  दुर्योधन गिरता-पड़ता झील की ओर लौट पड़ा .दुःसह वेहना से कराह उठता था .
विजय श्री पाने की आशा में अभी तक भूला हुआ था , आहत तन अधिक झेल न सका .साँसें उखड़ गईँ. वहीं गिर पड़ा .
*
44 .
ओह,बीत ही नहीं रही ,यह रात कितनी लंबी है !
पांचाली बहुत बेचैन , जैसे कोई  हृदय पर तान-तान कर घूँसे मार रहा हो !
आँखें बंद करती है ,घबरा कर खोल देती है .
सारी रात्रि घोर व्याकुलता में बीत रही है  .
फिर-फिर देकती है - भोर अभी भी नहीं हुआ .
उठ कर शिविर के द्वार पर खड़ी हो गई .
 शिविरों के मध्य के मार्गों पर अँधेरे से ही आवागमन प्रारंभ हो जाता है .
बस थोड़ी-सी की दूरी पर उनका दूसरा शिविर ,पाँचो पुत्र ,धृष्टद्युम्न और अन्य लोगों के रात्रि-शयन हेतु .उसी के सामने बाहर कुछ कोलाहल ,कुछ लोग इकट्टे खड़े, कुछ आते-जाते कुछ देर रुक कर खड़े हो जाते .
बड़ी हलचल सी है.
वार्तालाप के स्वर सुनाई दे रहे हैं .
'यह तो युद्ध-भूमि नहीं .रात्रि में यह क्या हुआ?
'वह आया था उसे देखा मैंने .'
किसी ने पूछा ,'कौन था ?'
'गुरु-पुत्र,वही अश्वत्थामा,उन्मादी सा चिल्लाता चला जा रहा था , 'मेरे पिता ,गुरु थे उनके .झूठ-सच सब एक कर दिया ,द्रोही,कपटी सारा दायित्व उन्हीं का है.तो उनने कहा -चुप रहो .'
 ' किसने कहा ?,'
'कृतवर्मा और कृपाचार्य -साथ थे उसके .'
'हाँ ,अभी कुछ देर पहले मैं जब इधऱ से जा रहा था तो देखा था . वे दोनों  शिविर के द्वार पर खड्ग लिये खड़े थे .मुझे विचित्र लगा .पर राजपरिवार की बातें ,मैं बिना रुके चला गया मुश्किल से डेढ़-दो घटी पहले ..'
 शिविर के द्वार पर उलटे-सीधे  शव पड़े हुये रक्त की धारायें धऱती पर जमी हुई .
'हाँ ,आवाजें मैनें सुनी तो बाहर आकर देखा . मैं झाँका , फिर छिप गया .
'जब कृपाचार्य ने चुप रहने को कहा तो बोला -
  'क्यों चुप रहूँ ?सारे संसार को चीख-चीख कर बताऊँगा कि वास्तविकता क्या है ?हम उन्हें धर्म का गूढ़ ज्ञाता जान कर चुप हो जाते थे .पर वे बड़े चुप्पे ...निकले  गुरु को भी नहीं छोड़ा  झूठ से मार दिया .'
तभी उसने इन  के पाँचों पुत्रों को..'
'क्या पाँचो पुत्रों को ..',
आगे सुनने का धीरज खो बैठी पांचाली ,पीछे घूम कर चीखी ,'पार्थ ,भीम , उठो ,सब उठो! देखो हमारे पुत्रों को क्या हुआ ..?'
वह निकल कर पास के शिविर की ओर भागी .
*
आस-पास ,नीचे-ऊपर क्या है ,कुछ देखे बिना भागती हुई पुत्रों के शिविर के द्वार पर पहुँची .
पट खुले पड़े - सपाट !
 पाँव नीचे बिखरे शवों से टकरा रहे हैं रक्त की कीच पाँवों को सान रही है .उसे कोई  भान नहीं .दृष्टि भीतर लगी उन पाँचो को खोज रही है .
अन्दर बालकों  की शैयाओं  के पास शीष-विहीन पाँच कबंध उलटे-सीधे .कौन सा किसका कुछ पता नहीं . चारों ओर रक्त ही रक्त !
वह उधर धृष्टद्युम्न का औंधा पड़ा शव .
आँखें फाड़े पांचाली खड़ी है !
*
इस ओऱ कोलाहल मचा है .चर्चाएं चल रही हैं.
'क्या हुआ?'
'क्या हुआ उन्हें?'
'शीष काट कर बाँध ले गया पाँचो के .'
'किसी को पता नहीं चला ?'
'--कैसे पता लगता ?रात्रि का समय था सब गहरी नींद सो रहे थे .चढ़ती उमर की नींद .सोते-ही सोते ,चिर-निद्रालीन हो गए .हत्यारा कहीं का !'
आते-जाते लोग रुक जाते हैं .
'कौन ?'  प्रश्न किया किसी ने  .
'वही,द्रोणपुत्र अश्वत्थामा! सोते हुए कुमारों का शिरोच्छेदन कर बदला निकाला है उसने .'
'देखा किसी ने ?'
'आधी रात के बाद .कौन था देखने वाला.?प्रहरी की पहले ही हत्या कर दी .'
'हाँ, देखा है मैंने .लघुशंका के लिये निकला था ,देखा  रक्त टपकाता गट्ठर लिये है हाथ में .केश बिखरे विचित्र -सी मुद्रा. बोलता जा रहा है ,'वंश नाश कर छोड़ूँगा .'
..और भी बहुत कुछ ...मैं तो भाग कर आड़ में छिप गया .'
'पर  वहाँ  का बदला ?यहाँ शिविर में आकर .बालकों से ?'
'देखा भी किसी ने ?'
'कौन साहस कर पाता ?'
'उसके ऊपर तो जैसे  भूत सवार था .इनने  भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर उसके पिता की हत्या करवाई  , दुर्योधन ,कर्ण सबको अनीति से मारा ,आज उसने पूरा बदला निकाल लिया !'
'क्या,क्या?'
 'मैं नहीं , वही ये सब कह रहा था..,यही नहीं और भी बहुत-कुछ .हाँ यह भी कि -
 काहे के धर्मराज ?अनुज-वधू पर हिस्सा बँटाते समय कहाँ था उनका धर्म ?मन की बात पर माता की आज्ञा का पालन. आगे फिर कभी माता की सहमति की भी आवश्यकता नहीं पड़ी .मत कहो धर्मराज !कितने अधर्म के काम किये .आज्ञाकारी भाइयों की अनीति  भी उन्हीं की कहायेगी .'
लोग चुप !
 'वे दोनों भी कह रहे थे -ठीक  कहते हो  ,सारे भाई तो  उनके इशारे पर चलनेवाले , काहे नहीं नीति की सीख दी .वह उनकी पत्नी कहाँ रही थी .उस पर कृपाचार्य ने ठप्पा लगाया अरे. हम सब तो उनके आगे पापी हैं,वे तो दूध के धुले रहे .'
'हाँ बहुतों ने सुना .वह बहुत बातें कहता चला जा रहा था.'
लोग आ-जा रहे थे .चर्चायें चल रहीं थीं.
*
जब पांडव-शिविर में पांचाली की पुकार गूँजी अचानक नींद से जाग गये वे.
 पहले कुछ समझ न पाये .फिर उठ कर चल पड़े .
 पांचाली को तीव्र गति से जाते  देखा.शीघ्रता से पग बढ़ाये.
निकटस्थ शिविर ,कितने शव दिखाई दे रहे थे द्वार के समीप बिखरे .
 महारथी जो उस रात वहाँ सोये थे , सब के शव.
उन सब को हड़बड़ाये हुये आते देख ,लोग इधऱ-उधर हो गये .
वे धड़धड़ाते शिविर में घुस गये.
*
(क्रमशः)



शुक्रवार, 25 मई 2012

कृष्ण-सखी - 41 & 42.



41
 किसी भाँति स्थिर नहीं हो पा रही पांचाली .
पिछली घटनाओं ने झकझोर कर रख दिया है .
सहज तो वे पाँचो भी नहीं - जैसे भीतर ही भीतर जैसे कुछ खटक रहा हो  .
जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ.सारी घटनायें एक-एक कर मस्तिष्क में घूम गईँ . भीम द्वारा दुःशासन की छाती का रक्त पीना- सोच कर ही सिहर उठती है .अर्जुन ने कर्ण का वध किया - रथ का पहिया निकाल रहा था वह .
यह भी जानती है जन्म से प्राप्त उसके कवच-कुंडल, जिनके होते वह अभेद्य था ,किसी छद्मवेशी याचक ने पहले ही उतरवा  कर शरीर छील दिया .
 स्पष्ट है कि अर्जुन के हित में ही किसी ने यह क्रूर कृत्य किया .
वह क्या समझा नहीं होगा?
संतोष के स्थान पर एक तीखी चुभन व्याप गई .
क्यों? मैं क्यों विचलित हूँ -स्वयं से पूछती है ,उत्तर कोई नहीं .
रह-रह कर भीतर से उद्दाम रुदन का वेग उठता है .
कौरवों में कोई नहीं बचा ,अंत में दुर्योधन भी गदा-युद्ध में भीम द्वारा उरु-भंग कर अक्षम कर दिया  गया .
हाँ ,सुना है - नीति के अनुसार , गदा-युद्ध के लिये और किसी को न चुन अपने स्तर के भीम को ही चुना था उसने.
माता गांधारी के एक दृष्टि-पात से अभेद्य  बन गया था उसका शरीर .बस ,कमर के नीचे क्षीण सा आवरण - वही भीम  की गदा से खंडित हो कर भीषण  अपघात का कारण बना.
और तब बलराम भैया अपना आपा खो बैठे  .
दुर्योधन उनका प्रिय शिष्य था .
यह भी सर्व विदित है कि उनकी इच्छा तो उसी से अपनी बहिन, सुभद्रा का विवाह करने की थी .पर अर्जुन उसे पहले ही हर ले गये .
एक प्रश्न उठा था-
  'दाऊ ने भीम से कुछ कहा ?'
मस्तिष्क पर ज़ोर डालती है पांचाली - कहाँ ?किससे सूचनायें मिली थीं ?  याद नहीं आ रहा .
दोनो पक्षों में कार्य करनेवाले ,माली ,रजक ,स्वच्छकार आदि कुछ न कुछ बोलते रहते हैं .अंदर की कुछ सूचनायें सज्जाकारिनें अपने भीतर पचा नहीं पातीं ,अवसर पाते ही मुखर हो जाती हैं .कौन कहाँ आया-गया  उनके पारस्परिक वार्तालाप से कितना-कुछ पता चलता है.
कितने सूत्र हैं ,चर हैं , अनुचर हैं ,बाहर चलती चर्चायें हैं-विमभ्र में पड़ गई .
सिर घूम रहा है .
हाँ ,वह कथन ज्यों का त्यों याद है ,
'कहते क्या? हल ले कर दौड़े थे उसकी ओर ,' रे नराधम ,अभी अनीति का फल चखाता हूँ .'
पर छोटे भाई कृष्ण ने बीच में ही कौली भर ली ,समझाया इसने कैसी अनीति की थी ,कुल-वधू को सभा में अपनी जाँघें खोल कर ....'
' गृहवधू की सम्मान-रक्षा जिनका कर्तव्य था वही बेचने पर उतर आयें तो भी दोष दूसरे का ?दूध के धुले बनते हैं.. .'
उनका रोष बोल रहा था ,'.... प्रारंभ  उन्हीं ने किया, जो धर्मराज कहलाते हैं .मर्यादा किसने भंग की ? कुल-नारी को सामान्या किसने बनाया ? हार गये तो कहाँ रहा उनका अधिकार ?उनके लिये पराई नार हो गई वह ?सभा में बैठे वयोवृद्ध-जन क्या तर्क दे पाते - इसीलिये सब चुप ! फिर किस नाते भीम और पार्थ ने शपथ ली  ,
 वही तो आज्ञा देने वाले बड़े भाई थे .समझाते ,कहते  पांचाली  अब उनकी वस्तु हुई - वे जाने, हमें क्या ?
अरे ,भाइयों को तो पहले ही हार चुके थे ,  वे भी तो सुयोधन के जन हो गये थे .'
पाँचाली वितृष्णा से भर उठी. पत्नी को बलि का बकरा बना देनेवाला  पति कहलाने का अधिकारी ?
किसे क्या कहे ?उस दिन देखा था वहाँ - प्रतापी वीर पति माना था जिन्हें,हीन-वेष धारे सिर झुकाये  बैठे रहे !
कैसा लगा था?
सबसे समर्थ समझा था जिन्हें ,वे  तेज-हत, सबसे विवश.
तीक्ष्ण दृष्टि पतियों पर डाली थी उसने .
एक बार तो  उत्तेजित अर्जुन और भीम ने सारा अनुशासन तोड़ दिया था.
अर्जुन ने आँखें उठा कर युधिष्ठिर को देखा था - वह दृष्टि!  अपमान के दाह से विकृत ,क्रोध और तिरस्कार से कौंधती - द्रौपदी को लगा था  पार्थ अभी कुछ कर डालने को खड़े हो जायेंगे .
पर तभी भीम हाथ मलते बोल पड़े ,'मैं उस हाथ को जला दूँगा जिसने पांचाली को दाँव पर लगाया!'
नकुल-सहदेव अस्थिर हो उठे थे .
 चौंक कर, सब लोग इन भाइयों को ही देखने लगे थे .
दुर्योधन और शकुनि के नयन चार , जिनमें कुछ संकेत करता उपहास भरा था .
 पार्थ ने एकदम अपने को संयत कर सिर झुका लिया .
युठिष्ठिर शान्त निर्विकार .
पांचाली समझ रही है .
समझी थी तब भी , जब सभा में बुलाने आये  दूत को वह प्रश्न दे दे कर  बार-बार लौटा रही थी-
 युधिष्ठिर ने गुप्त रूप से एक विश्वस्त सेवक से कहलाया था 'यद्यपि वह रजस्वला है तथा एक वस्त्र में है,  वैसी ही उठ कर चली आये, सभा में पूज्य- वर्ग के सामने उसका उस दशा में कलपते हुए पहुँचना दुर्योधन आदि के पापों को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त होगा.'
उनके लिये जन की सहानुभूति बटोरने को एक माध्यम भर - मैं !
पत्नी की आर्त-त्रस्त-दीन दशा का प्रदर्शन कर दया पाने की चाह - छिः!
घोर वितृष्णा से भर उठी वह.
वाह रे नीतिज्ञ !
आँखें जल उठीं थीं कृष्णा की - क्रोध या घृणा ?
कौन जाने !
*
42 .
अब भी जब याद आता है सुलग उठती है भीतर ही भीतर .
भूल जाना चाहती है. वह सब कभी याद न आये !
कोई बस नहीं चलता स्मृतियों पर . मन उन्मन होते  ही एक दूसरी को धकेलती चली आती हैं.
शान्त होना चाहती है .बहुत कठिन लगता है इतनी उद्विग्न मनस्थिति को झेलना .
दिन भर की विश्रान्ति के बाद वे सब निद्रा-मग्न , पर उसकी आँखों में नींद कहाँ !
 कितना अशान्त अंतर !बार-बार उठती है  -लेटती है .निद्रा का नाम नहीं .
  पाँच पतियों से रक्षित होने का गर्व पल भर में बिखर गया था .
समझ रही थी इन  कृती पुरुषों से जुड़ कर जीवन की उच्चतर भूमिकाओं में संचरण कर सकेगी . पर पत्नी के संदर्भ में वे नितान्त भोगी निकले .
हाँ, एक !केवल अर्जुन, संयमी -विचारशील ,पर कितना विवश !
यही असंतोष उसे  जीवन भर भटकाता रहा .
 कभी मुख से न कहे तो क्या  याज्ञसेनी जानती है .जिस सान्निध्य के लिये सब कुछ स्वीकार किया, उसी के लिये तरसती रही !
भीम स्नेहिल हैं , मन के भोले .दोनो छोटे अपनी सीमाओं में रहनेवाले .
धर्मराज युधिष्ठिर ? सब के संचालक -तब लगता था मितभाषी हैं ,गूढ़-गंभीर ,उनके मन की थाह कोई नहीं पा सकता .
 संतोष कर लिया था यह सोच कर कि भोग करना पुरुष-स्वभाव का अंग है  , उनका अघिकार है ,संतुष्ट करना मेरा कर्तव्य .पर हर बात की एक सीमा होती है .
और उस दिन सारे भ्रम टूट गये .वह स्मृति ही दग्ध कर देती है .
जिस संबंध को बड़ा सहज-सुन्दर और नितान्त अपना समझे थी,  भरी सभा के बीच, अपनी सारी विकृतियों और कुरूपता  के साथ  उद्घाटित हो गया .
आकाश से एकदम गहरी खाई में जा पड़ी थी वह .
क्यों याद आता है वह .जब भी निराश होती है ,वही सब मन पर घिर आता है.
 किसी एक की नहीं हूँ  -कौन साथ देगा मेरा ?
पाँच लोग ,पाँच तरह के मन .
*
पाँच लोग ,पाँच तरह के मन .
बरस-बरस, एक-एक के साथ पूरी निष्ठा से रहना है .किसी  से अंतरंग नहीं हो सकती .मन की बात किसी से नहीं कह सकती, कहीं परस्पर उनमें  भेद पड़ गया तो ?
नहीं,ऐसी स्थिति कभी न आये- यही संकल्प था मेरा !.
 कितना भी हटाने का यत्न करूँ  वही  बातें ही ध्यान में आई चली जा रही है.
उन्हें तो पाँच वर्ष में एक ही वर्ष उसका तन मिलता है .प्रत्येक का साथ देना है द्रौपदी को .
और मेरा मन ?उसे लगता है - कुछ नहीं ,मन नहीं है मेरे .  ,
उठ कर बैठ गई .बहुत देर से अनुभव कर रही थी वह कहना चाह रही है बहुत कुछ .मन में घुमड़ रहा है   ,संघर्षों को झेलता ,जीवन की तिक्तताओं और विषमताओं  से अनुतप्त शान्ति-हीन जीवन किसी नितान्त अंतरंग से  बाँटना चाहती है . पर किससे कहे ?
 कैसा प्रारब्ध था मेरा !
कैसा महाभारत चल रहा है -एक साथ दो -दो .एक बाहर एक भीतर !
साक्षी केवल पांचाली का मन !

सिर झटक दिया द्रौपदी ने - कुछ याद नहीं करना चाहती ,शून्य हो जाना चाहती है .अपने पर बस नहीं रहता. अस्थिर मन में सब उमड़ता चला आता है .
अंतरात्मा  चीत्कार उठी - यहाँ कोई नहीं मेरा ! क्या करूँ मैं ?
स्मृतियों के दंश  असह्य हो उठते हैं ,तब अंतर्मन से विकल पुकार उठती है -
हे जनार्दन ,परम-आत्मीय ,प्राण-सखा कृष्ण !कहाँ हो तुम ? बस तुम हो और कोई नहीं. किसी के काँधे संतप्त सिर नहीं रख सकती . वे सब एक हैं !
बस एक ही आसरा - मुकुन्द , माधव !
इन दिनों वे भी बहुत व्यस्त .दिन भर सारथी बने साथ देते हैं उन सबका .
 याद करती है उनकी कही बातें .कुछ आश्वस्त होता है मन .
पांचाली ने पूछा था ,'अपना राज-रनिवास छोड़ कर हर समय दौड़े रहते हो सखा .कभी-किसी के लिये, कभी किसी के पीछे .फिर भी कहनेवाले चूकते नहीं .जाने कितनी बार अपयश ही आया हिस्से में . असंतोष नहीं होता .. ?'

 'इसी में  मेरा सुख है ,मेरा संतोष है ।मेरा जीवन इसी के निमित्त है ।पर उस सब में डूबा नहीं अलग रहा ,साक्षी मात्र !'
'हाँ ,तुम तटस्थ रह कर हँसते-गाते  ,नाचते-नचाते रहे !
 वही कर्मयोग जिसे जीवन में उतारते रहे ,रणक्षेत्र में मुखर हो उठा .
वे शब्द कानों में प्रतिध्वनित होने लगे -
एक महानाट्य रचना चल रही है प्रतिपल. इस विराट् पटल पर दिक्-काल को पृष्ठभूमि बनाये परा-प्रकृति का ललित-लेखन ! रंगभूमि में नित नये पात्र ,नित नये प्रयोग. प्रशिक्षण चल रहा है अविराम ! उदाहरण और आत्म-निरीक्षण बस दो साधन, परिष्कार अपना स्वयं करना है यहाँ - स्व-भाव, क्षमतानुसार .अंतिम परीक्षा में कौन खरा उतरेगा  किसी को क्या पता !
* 
(क्रमशः)

बुधवार, 16 मई 2012

कृष्ण-सखी - 39 & 40 .



39
*
उस दिन जो सुन पाया बार-बार  क्यों  उद्विग्न करता है!
अंतर से कोई बोल उठता है -अब पांचाली के कहने पर चेते हो ,सत्यवती ने भी कुछ कहा था .तब संरक्षक बने चुप बैठे रहे ?
 हाँ ,तब मस्तिष्क का प्रवाह दूसरा था -स्त्रियों की बातें !जैसा रखा जायेगा रहेंगी. नीति क्या उनके कहे चलेगी ?
 एकदम झटका-सा लगा .गंगा-माँ ,अपनी शर्तों पर आईं थीं ,छोड़ कर चली गईँ .पूर्वज पुरूरवा को भी,सुना है,उर्वशी ने इसीलिये त्यागा.
पहले सोचा होता ,कुल-शील की धज्जियाँ ,इतना सर्वनाश और ये विकृतियाँ -  बचा जा सकता था.
यह पांचाली है !वह विमाता थी - सत्यवती .
फिर ध्यान आया .प्रतिज्ञा की मैंने ,पर क्यों ?  विमाता के कारण ही तो .
परिवार में उनका प्रवेश न हुआ होता तो ..
बुद्धि सतर्क हुई -
वे स्वयं नहीं आईँ .मैंने ही रथ भेज कर बुलाया था ,उन्हें  ले कर उनके पिता साथ आये .
शर्तें उनके पिता ने रखी..
अपनी युवा पुत्री एक वृद्ध को ब्याहने के पहले पिता उसका हित सोचता है --स्वाभाविक है .वे भी कहाँ गलत रहे.
और विमाता ?
मन ने प्रश्न किया - सत्यवती संतुष्ट रहीं क्या ?
उन्हीं ने कहा था-
  'मुझे संसार का क्या अनुभव था, पिता का कहना था तुम दुनियादारी नहीं जानतीं .और मैंने मान लिया ,पिता हैं मेरे हित  के लिये कर रहे हैं .राजमाता बनूँगी -कितनी शक्ति कितना वैभव. कहीं न कहीं तो मन का समाधान करना था . वृद्ध से विवाह करना मुझे क्यों रुचता पर पुत्री की बात का महत्व ही क्या? दायित्व पिता का होता है ,मैं क्या कहती ?'
 युवा  कन्या,धीवर की ही सही  बूढ़े के साथ विवाह कर राजमहल में आयेगी.यहाँ के लोग कैसा व्यवहार करेंगे .बड़े घरों की बड़ी बातें ,सब छिपा रह जाता है. फिर यह तो राजमहल ,जहाँ पति का युवा पुत्र ,राज- पद का अधिकारी .और वृद्ध का क्या ठिकाना ?अकेली स्त्री पता नहीं कल को क्या हो? सब अनिश्चित ही तो था .वचन उनके पिता के कहने पर उठाये थे .
उन्होंने कहा था-
'....तुम्हारे पिता मेरे पिता से कम वय के तो नहीं होंगे ! देवव्रत,तुम बीच में साधते गये सब !
दोनों ने मिल कर सब तय कर लिया और यहाँ की मर्यादायें ,वर्जनायें इन सारे बंधनों में जकड़ दिया  .
'जन-जाति की कन्या मैं ,बात को सीधे शब्दों में कह देती हूँ .पुरुष में पकी उम्र में भी ,वात्सल्य नहीं जागता ,लालसा ही जागती है ?
ओह, भीष्म ,किससे कहूँ  पहले वह पराशर ,ऋषि कहाते हैं जो .नदी पार करा रही थी वहीं संयम खो बैठे .मैं तो धीवर पुत्री ठहरी..  कितना
मुक्त जीवन था .क्या मोल इन स्वर्ण -हीरे-मोतियों का .रात-दिन का मनस्ताप और चिन्तायें हैं मेरे लिये  तो .'
 पूछा था उन्होंने -
' तुम्हें क्या सूझा, मेरे पिता की शर्तें मानते गये? तुम्हीं हो इस सब के उत्तरदायी !'
कोई उत्तर नहीं था भीष्म के पास !
'वहाँ निश्चिंत जीवन बिता रही थी ..प्रसन्न थी चाहे नदी पर नाव खेऊँ या वन में विहार करूँ .मैंने तो बता भी दिया था एक पुत्र है मेरा .पर तुम्हारे पिता ..अब मैं क्या कहूँ .
ऊपर से ये दो राजकन्यायें ,मुझ से भी अधिक दारुण स्थिति में जीने को विवश .'
सदा एक दूरी बनाये रखी थी विमाता से .भीष्म को असहज लगने लगता था ,जितना कम हो सके उतना ही सामना हो .
सोचते-सोचते जब थक जाते हैं श्लथ तंद्रिल -से ,शृंखला टूट जाती है कहीं के तार कहीं से जुड़ जाते हैं.
 कितनी बातें कोई तुक की कोई बेतुकी .माँ क्यों चली गईँ? प्रसन्न और तुष्ट होतीं तो क्यों जातीं !पर यहाँ नारी का अस्तित्व ही क्या ? वे नहीं रह पाई होंगी ,चली गईं .कुछ कारण रहा होगा .ये सब राज-परिवार के रहस्य हैं मुझे भी किसी ने नहीं बताया ,कोई क्या जाने !मैं भी पूछ नहीं सका ,जानना चाहता भी नहीं. वैसे ही कौन कम उलझनें हैं !
आज फिर वह अध्याय खोल बैठे.
' क्यों  रूप-यौवन दिया ईश्वर ने? पुरुष स्वयं को बस में रख नहीं पाता और दंडित होना पड़ता है हमें !'
चिन्तन चल रहा है -
सब पुरुष एक से नहीं होते ,
विराट् को जब उन पाँचो के  पांडव होने का पता चला था तो उन्होंने उत्तरा से अर्जुन से विवाह का प्रस्ताव रखा था .अर्जुन ने उत्तरा को पुत्रीवत् कह कर अभिमन्यु के लिये स्वीकार किया .यह है मर्यादा !
और महाराज प्रतीप ने भी गंगा के आग्रह पर भी मर्यादा के ही कारण स्वयं न स्वीकार कर पुत्र के हेतु स्वीकारा .
 पर पिता ?
उद्वेग से होंठ काट लिया भीष्म ने .
 विमाता का प्रश्न था-
'  इन संतानों का क्या होगा .कोई देगा इन्हें अपनी पुत्री ?'
और वे काशिराज की कन्यायें हर लाये -समाधान हो गया समस्या का.पर उससे भी बड़ी समस्या आ खड़ी हुई .
विभ्रम में पड़ जाते है ,विचार भटक जाते हैं .
 क्रम आगे चला .तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाने उनका पुत्र आया . तब भी तुम्हारा व्रत आड़े आ गया ..'.
 और अधिक उद्विग्न हो उठे  पितामह .
कुछ नहीं कर सका ..उन्हें लगता है, समर्थ थे तब अनीति नहीं रोक सके तो अब! अब तो... .
कितनों के साथ अन्याय किया ,अपना कर्तव्य कह कर . क्या-क्या घूमने लगता है जैसे सारा अतीत सामने चक्कर काट रहा हो . .
शून्य कर देना चाहते हैं मन को .शान्त -एकदम शान्त .विश्राम मिल सके इस मनस्ताप से .
सिर चकराने लगता है .आँखें मूँद लेते हैं- एकदम श्लथ..
 इन शरों की चुभन में तन को चैन नहीं .विगत स्मृतियों के दंश से मन को चैन नहीं .
40.
*
हे ईश्वर ,कब होगा सूर्य उत्तरायण !
अब सहा नहीं जाता .विश्रान्त मन विस्मृति में डूब जाना चाहता है .माँ की थपकियों की याद आती है .
हवा तिरपाल से छेड़खानी करने लगी है .माथे पर चुहचुहा आई पसीने की बूँदें -शीतल प्रलेप सा लगाने लगते हैं हवा के झोंके .हाथ-पाँव हिलाने की इच्छा नहीं होती शरों के पृष्ठभाग भी रुक्ष कठोरता से भरे .
सब आते हैं .पर किसी से कुछ कहने-सुनने की इच्छा नहीं होती  . भीतर ही भीतर मौन संवाद चलते हैं -अविराम.
भूल जाते हैं क्या विचार चल रहा था .
मन कहाँ शान्त बैठता है. फिर चिन्तन चल पड़ा - कितना अंतर है इन पांडवों और कौरवों में !
दोनों मातायें श्रेष्ठ कुलों की कुमारियाँ ,पर संतानों में कितना अंतर !
एक निरीह-सी ,उदासीन ! जो आ पड़ा ,स्वीकार करती जा रही है .आँखों पर पट्टी बाँध लेनेवाली .कभी पति और संतान का मुख न देखनेवाली - पतिव्रता ?
और तब सबने  बहुत प्रशंसा की थी .
एक-दूसरे के मन को समझ पाया होगा ?
उसाँस भर कर रह गये भीष्म !
दुर्योधन ! उसकी बात छोड़ो ,जिसने कभी माँ की स्नेहभरी दृष्टि न पाई वह नारी का क्या सम्मान करेगा ?एक के बाद एक  लगभग सारे भाइयों की यही कथा रही .
चाहा था दुर्योधन से सुभद्रा का विवाह होता.हमें यदुकुल का, विशेष रूप से कृष्ण का समर्थन मिलता .बलराम भी तैयार थे . पर नहीं हो सका ..
स्मृतियाँ फिर अतल में डुबाने लगीं
क्या विचार कर  रहे थे सब गडमड हो गया .
हाँ ,कुन्ती की भूमिका ...
 तेजस्विनी ,समर्थ .बढ़ा हुआ मनोबल ,स्वयं वरा था उसने अपनी रुचि से प्रतिष्ठित कुल का कुमार देख कर .कुन्ती ने स्वयं पांडु के कंठ में वरमाला डाली थी.
पांडु की असमर्थता पर वह सचेत रही . काम्य-पुरुष से अंश ग्रहण किया , संतृप्ति के सुख से विह्वल-क्षणों में,नारीत्व की चरम उपलब्धि मातृत्व का भान . स्वस्थ-समर्थ संतान ,
कुन्ती समर्थ और गांधारी विवश -  दोनों में कैसी तुलना ?
कारण केवल मैं -सिहर उठे पितामह !
तभी कुन्ती संस्कार दे सकी ,स्नेह- दृष्टि से सींच सकी ,संतानों में संतुलित  व्यक्तित्व का विकास कर सकी .
 श्रेष्ठ का वरण कर, स्वस्थ आगत जीवन की नींव पड़े -आनन्दमय जीवन-चेतना के  क्रोड़ से नवांकुर फूटें इसीलिये स्वयंवर की प्रथा रखी गई होगी !
एकदम विचार आया ,जिसे हरा जाता है उसे कैसा लगता होगा  ?
 अंतर पड़ जाता है .हरण करनेवाला स्वयं विवाह को तत्पर हो तो कन्या को लगता होगा ,इसके हृदय में मेरे प्रति  इतना चाव है कि सबसे जूझने को प्रस्तुत हो गया  ,प्राणों की बाज़ी लगा कर पाना चाहता है .
अन्यथा लगेगा . मुझमें रुचि नहीं थी लूट में समर्थ थे सो हर लाये ,.,अहंकार के वशीभूत ,किसी को भी सौंप देंगे -कितना उपेक्षित अनुभव करती होगी .
कहाँ से कहाँ भटकने लगते हैं विचार .हाँ ,दोनों का अंतर- कुंती की सामर्थ्य गांधारी की विवशता .केवल वही क्यों कितनी और भी तो.
एक की महानता के अभियान में कितनों को स्वाभाविक जीवन से वंचित होना पड़ा .
कैसी महानता जो सिर्फ अपने को प्रमाणित करने के लिये औरों का अस्तित्व रौंद डाले .  .
अंबा-अंबिका- अंबालिका ?
फिर वही कथा आगे बढ़ चली .वैसे ही अध्यायों की रचना होने लगी .
पश्चाताप से भर उठे . आँखें मूँदे ,अवसन्न से .
लग रहा है बाहर-भीतर  जम-से  गये हैं .लेटने की स्थिति बदल ली .
माँ गंगा का स्मरण हो आया ..वे चली गईँ .
माँ सत्यवती की अपनी शर्तें .
और दोनों के बीच देवव्रत-कितना लाचार !
ऊंह ,कैसे -कैसे विचार आ रहे हैं .उनके विषय में सोचना मेरा काम नहीं .
तो कुन्ती के विषय में ,द्रौपदी के विषय में !
वे अपने ढंग से रहीं .
उन पर बस नहीं चला .इन सब पर चल गया, ये बेबस हो रह गईं  .
तो कैसा होनी चाहिये स्त्री को वैसी या ऐसी ?
तब तो ऐसी चाहिये थी जिसे अपने अनुसार चला लें ,पर अब लग रहा है ,वैसी ही ठीक थी ,समर्थ माता ही संतान को उपयुक्त ढंग से ढाल सकती है .
ओह ,जिस पर कोई बस नहीं उस विषय में सोचे जा रहे हैं .
अपने ऊपर वश ही नहीं . अनजाने ही कितने विचार चले आते हैं ,
करें भी क्या .रात-दिन बस यही करना शेष रह गया है .
नहीं ,अब नहीं  बस बहुत हो गया .कुछ क्षण यों ही-  दिमाग में कुछ नहीं आने देंगे .
अचानक विचार कौंधा -और पुरुष कैसे होने चाहियें?
मेरे जैसे ?
ना ,ना. नहीं . बिलकुल नहीं .क्या किया मैंने ?सब चौपट !
हाँ, विमाता ने कहा था ,'यह  नारी की ही  विवशता है कि समवयस्क को पुत्र माने .पितृ-तुल्य को पति ..पुरुष को खुली छूट !पुत्री की वय की कन्या को विवाह लाये .'
इस प्रकार कभी सोचा नही था.
 पिता शान्तनु ?नहीं ,पद तथा वय की गरिमा - गांभीर्य नहीं निभा सके  .पहले माँ की शर्तें ,फिर सत्यवती-माँ के लिये ....कामना- तृप्ति हेतु औरों से संचालित रहे !
अपना उचित-अनुचित स्वयं निर्धारित न कर सके .
आगे  ,धृतराष्ट्र और उनके सौ पुत्रों की बात !आज लग रहा है जो हुआ प्रारंभ से ठीक नहीं था..
और पांडु काका?हाँ ठीक, पर उनकी अपनी विवशतायें .वंश में जो ग्रहण लगा था उन्हें भी छाये रहा .
कुछ क्षण सोचते रह गये -ग्रहण ?
 मेरे ही कारण !हाय रे दुर्भाग्य !
अनचाही पत्नी से दूर रहने के  सैकड़ों उपाय हैं पुरुष  के पास ,पर विवश हो कर अनचाहे पुरुष से जीवन भर दाम्पत्य निभाना  -ओह,कैसे बिताया होगा जीवन !
गहरी सांस छोड़ी पितामह ने .
कुन्ती ने ठीक ही किया .
मस्तिष्क थक गया .शिथिल हो पड़े रहे .विचित्र विचार आते-जाते रहे .
बचपन में माँ गंगा के साथ की स्मृतियाँ जाग उठीं -बस धुँधली यादें .जैसे तंद्रा में हों .
लगा पहुँच गये अपने गंतव्य पर .अशान्ति मौन  हो गई .
निद्रा ने घेर लिया . .
**
जीवन का लेखा-जोखा पूरा होने जा रहा है .इस जनम के कर्म इसी में भोग लूँ तो यह पीड़ा सार्थक हो !
कर्ण आया था ,कब ,किस दिन ? दिनों की गिनती भी भूल जाते हैं .
उसके शब्द याद आते हैं
'नहीं तात कवच-कुंडलों से बढ़ कर मेरे लिये मेरा व्रत है .
किस बात पर कहा था उसने ?
अभेद्य कवच-कुंडलों की बात पर ?नहीं, कोई गुमान नहीं था उसे .
विनीत है वह !
आकर चुपचाप चरणों की ओर खड़ा हो गया था  .
स्नेह से समीप बुलाया ,वर्तालाप होने लगा.
अब वह सेनापति है.आशीर्वाद लेने आया है .
 'आपको कभी प्रसन्न नहीं कर पाया मैं,मेरा दुर्भाग्य !..'
'नहीं . मैं रुष्ट नहीं तुमसे ,असंतुष्ट भी नहीं .परिस्थितियां ऐसी बनती चली गईँ .तुम दुर्योधन के हित ..'
 पूरी बात याद नहीं कर पाते ,मन  कहाँ-कहाँ भटक जाता है !
'और क्या करता .तात,. अकारण सब ओर से तिरस्कार और वंचनायें मिलीं किसी ने कभी सीधे मुँह बात नहीं की तब , उसी ने बढ़ कर साधा .सब कुछ उसी का दिया - राज्य,मित्रता ,और एक पहचान .वह जो  आज मैं हूँ .'
'तुम कौन हो नहीं जानते ?'.
'अब चाहता भी नहीं , जान कर क्या होगा .जानना तो औरों को चाहिये था ..'
  'मैंने किसलिये युद्ध से रोका ?नहीं ,मुझे तुमसे अरुचि नहीं थी ..इसका कारण था .जो मैं जानता हूँ तुम भी जान लो ...'
कहते-कहते वे कुछ रुके ,कर्ण के मुख की ओर देखते बोले ,
 '..एक ही माता की संतानों को मरने-काटने के लिये आमने-सामने खड़ा कर दूँ  वह मैं नहीं कर  सका .मैं जानता था तुम कुन्ती-पुत्र हो .हाँ वसुषेण ,कुन्ती तुम्हारी भी माता है .'
एकदम विस्मयाभिभूत,'मेरी माता ? वे .?'
 अवाक् कर्ण .
सिर झुकाये अंतर्मंथन में लीन !अचानक मुख तमतमा उठा,
'क्या होता, क्या बना दिया ..' .
पितामह ने हाथ उठा कर सांत्वना देनी चाही ,बोले ,'जो बीत गया सो गया .आगे की सुध लो .युठिष्ठिर तुम्हें माथे चढ़ाकर पूरा अधिकार देंगे .सारे भाई तुम्हारे अनुकूल रहेंगे .जीवन में जो अप्राप्य रहा ,सब तुम्हारे चरणों में होगा .'
स्थिर दृष्टि ,पितामह की ओर देखा उसने .
'अप्राप्य रहा था सब कुछ.उस किशोर वय में बहुत दुखी होता था .अशान्त चित्त दिन-रात चुभते वही वाक्य .हर स्थान पर केवल इस कारण दुत्कार दिया गया. इधर से उधर भागता था .कहीं कोई सहारा मिल जाय, जीवन सँवार लूँ .सब जगह दुरदुरा दिया गया ..मेरी योग्यता का कोई मोल नहीं .आचार्य परशुराम से मिथ्यावाचन  कर शिष्यत्व पाया ,पर सत्य कहाँ छिप सका .अर्जित विद्या निष्फल हो गई .राधेय रहा जीवन भर ,कौन्तेय कभी नहीं .पितामह,उनका बस चलता तो जन्मती ही नहीं .अब पांडव नहीं बनना चाहता .सूत-पुत्र रहा -पग-पग पर प्रताड़ित वंचित .
जिनके लिये मैं कभी था ही नहीं,मेरे हर सच को झुठला दिया गया हो जहाँ ,उनका साथ नहीं दे पाऊँगा .'
जैसे स्वगत कथन कर रहा हो ,'माता ?जिसने जन्मते ही म़त्यु के मुख में धकेल दिया ?अनचाहा था मैं ,अब जब सब बीत गया ,तो जिसने मान दिया ,जिसने जीवन दिया, नेह से पाला उसे कैसे नकार जाऊँ ?'
वहीं धरती पर बैठ कर उसने शर-शैया के किनारे सिर धर  दिया था .पितामह ने ,धरती की ओर मुख किये कोर से टिके  उस शीष पर हाथ रख ,कर्ण को आश्वस्त करने का उपक्रम किया .
   जैसे युग-युग की पीड़ा बाँध तोड़ कर बह निकली हो .आज पहली बार किसी परम मान्य का वात्सल्य उसे सींच रहा था.
'अब सब व्यर्थ लगता है ,तात .मित्र बनाया जिसने ,मान-सम्मान दिया उसे अधर में  नहीं छोड़ सकता .उसका विश्वास नहीं तोड़ूँगा .जिन का ऋण चढ़ा है मुझ पर, अब  चुकाने की बार ,धोखा दे जाऊँ ?
नहीं पितामह ,वसुषेण अभागा है तो क्या ,ऐसा स्वार्थी नीच और कृतघ्न  नहीं है  !  बहुत सम्मान करता हूं आपका आज आपका स्नेह अनुभव कर हृदय विह्वल हो उठा है ..पर यह नहीं कर सकूँगा पूज्य, मुझे क्षमा करें.'
पितामह चुप उसका मुख,देख रहे हैं.
'मरण पर मेरा वश नहीं ,पर जीना अपनी  मान्यताओं पर चाहता हूँ. '
 .शैया से टिके कर्ण के मस्तक पर ,पितामह बड़ी देर हाथ रक्खे रहे थे .
सजल थे दोनों के नेत्र .
रणभूमि के वीभत्स वातावरण में करुणा की क्षीण धारा बह निकली थी .
*
(क्रमशः)



गुरुवार, 3 मई 2012

कृष्ण-सखी - 37 & 38.


37
 गहराती निशा का नीरव अंधकार समूचे कुरु-क्षेत्र पर छाया है .हवायें गुमसुम .बीच-बीच में उठती शिवाओं और श्वानों की ध्वनियाँ उस घोर गहनता को भयावह बना देती हैं .
आज शर-शैया का तीसरा दिन ,युद्ध का तेरहवाँ .
 .अभिमन्यु-वध का दारुण समाचार सुना - सात महारथियों ने किस प्रकार  बर्बरता से एक निहत्थे बालक को मार दिया !
पितामह काँप उठे ,शरों की पृष्ठ-भाग पीठ में धँसे जा रहे हैं  .पर मन के संताप के आगे चुभन का भान किसे ?गोद में खिलाया था उन्होंने कृष्ण के इस भागिनेय को- कितना चंचल बालक !सुभद्रा के समान गौर ,पार्थ कीअनुहार लिये मुख-छवि !
शर-शैया पर लेटे  पितामह के मुँदे नयनों से अश्रु-बिन्दु टपक जाते हैं .कोई भी अंग हिलते ही शरों के पृष्ठ-भाग पीठ में  और दारुण हो लगने लगते हैं .
तन शैया पर ,किन्तु अशान्त मन थिर नहीं रहता .आगे कुछ करने को नहीं ,पीछे भागता है ,स्मृतियाँ घेर लेती हैं .अविराम चिन्तन चलता है .
 इन लोगों में यह दुर्बुद्धि कैसे उपजी ?
अरे ,दुर्योधन !
कुछ शब्द कानों से टकराते हैं  ,'सचमुच  कुरुकुल के होते तो .. .'
 स्मृति-पटल पर कहाँ- कहाँ के दृष्य उभर आये  .
वे शब्द ,वह दिन कैसे भूल सकते हैं ?
उस दिन जब सबसे गुहार लगा कर याज्ञसेनी हताश हो गई, तब  उसने जनार्दन को पुकारा था .
अपमान और विवशता से विकृत मुख तमतमा रहा था , पूरे आवेग में चीख उठी थी , 'समझ गई हूँ अच्छी तरह , सचमुच  कुरु-कुल के होते तो  कभी ऐसा जघन्य आचरण नहीं करते . पूरी खेती कुत्साओँ और अनीति  की ... '  स्वर- भंग में आगे के शब्द अस्पष्ट ही रहे थे .
सारी सभा स्तब्ध हो गई थी !और पांचाली अचानक चुप .
चीर खींचते उद्धत हाथ एकदम शिथिल पड़ गये . दुर्योधन हतप्रभ .विदुर दूसरी ओर मुख घुमाये जैसे झेल न पा रहे हों .पितामह का  झुका हुआ शीष कुछ और झुक गया था .
कर्ण , अब तक बढ़-बढ़ कर बोल रहा था, एकदम सन्न .आँख उठा कर देख न सका .
और पांचाली दुःशासन के हाथ से वस्त्र का छूटा छोर उसकी ओर खिंच आया था ,उसे समेट स्वयं को आवृत्त कर लेने का प्रयास करती हुई !
सभा  नीरव .कोई किसी को नहीं देख रहा .
'सचमुच  कुरु-कुल के होते तो ..' जैसे उस मौन में यही शब्द समा गये हों.वातावरण का भारीपन असह्य होता जा रहा था .
चौंके हुये धृतराष्ट्र  का विवर्ण मुख ,दृष्टिहीन नेत्र कार्यस्थल की ओर घूम गये ,जैसे देख पाने को आकुल हों  -
 मौन भंग हुआ था धृतराष्ट्र के स्वर से,' वधू, क्षमा करो ,मर्यादा भंग हुई है .'
वह बिलकुल चुप खड़ी है .
जैसे अनुनय कर रहे हों , फिर वे बोले ,'पुत्री , वय में तुमसे बहुत बड़ा हूँ.,पितृतुल्य. .विवश हो गया था.क्षमा कर दो .. इन की मति मारी गई है .'
फिर कहा ' मेरे संतोष हेतु वर माँग लो पुत्री ,जो भी चाहो .'
पांचाली ,मौन .
अब तक जो लोग मुखर थे ,सब चुप्प !
फिर अनुरोध किया था धृतराष्ट्र नें पर स्वरों में गिड़गिड़ाहट भर आई थी.
 कुछ  सजग हुई पांचाली और अति गंभीर स्वर से  पति का गँवाया हुआ सब वसूल लिया .
पर महाराज के  आग्रह  पर भी अपने लिये कुछ नहीं माँगा .
उस सभा में उपस्थित होते हुये भी विषण्ण से बैठे रहे थे भीष्म .
उस दिन को याद कर आज भी असहज हो उठते हैं .
उद्विग्न हो कर गहरी श्वास खींची  -' तुम्हें  दे सके , इतनी सामर्थ्य  कहाँ है किसी में, पांचाली  !'
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
 ध्यान  आया  'यदि सचमुच पुरु-कुल के  होते '  ... .कहाँ है पुरुकुल ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया,....हाँ!
  'सारी उपज  कुत्साओँ और अनीति  की' क्या गलत कहा उसने ?.....
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि यहाँ  अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
   ' सचमुच पुरु-कुल '  ... .पुरु-कुल कहाँ बचा ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया .,
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
चारों ओर परिवार के लोग ,एक दूसरे को मारते-मरते हुये .
उत्तरदायी कौन ?
'क्या कर आये अपने कुल की रक्षा के लिये, प्रतिष्ठा के लिये ?' - पितर पूछेंगे , 'तुम जो इतने सामर्थ्यवान ,इतने दृढ़ और आदर्शवादी थे  ,..?'
कैसा मिथ्याभिमान !
सब नष्ट कर दिया .अनीति -अन्याय का विरोध न कर सका!
कैसा आदर्श .कैसी महानता ?
उसने कहा था ,'मैं  जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ.बड़ी बात नहीं कहूँगी . दुर्बलतायें हैं मुझमें .अपना आक्रोश जीत नहीं पाती.जो अनुभव करती हूँ उसका प्रभाव पड़ता है ,प्रतिक्रिया होती है , सदा गंभीर ,संयत .अकारण मृदु होना मेरे स्वभाव में नहीं . कभी-कभी. आवेग निकाल कर सामान्य हो लेती हूँ .,. महान् नहीं होना चाहती, तात ,स्वाभाविक रहने दीजिये .प्रकृति के नियमानुसार .वही ऋत नियम हमारा धर्म है .'
उस रात्रि को कृष्ण के साथ मार्ग चलते उसने जो कहा था , कानों में गूँजने लगा --' वंश-बेलि सूख कर नष्ट हो रही हो, तो पुत्र का कर्तव्य है उसे सिंचित करना , पल्लवित करना ,औरों के आसरे छोड़ देना नहीं .'
याज्ञसेनी की बात बार-बार याद आती है  .
विचार परंपरा उधर ही चल पड़ती है -
जिसके कारण सब से बडे ऋण -पितृऋण से विरत हो गये थे ,वही अनुरोध करे जब, तब भी कोई बाधा रही क्या  ?  अगर  मानो तो माता की आज्ञा भी .'
द्वैपायन ने वीतराग संसार-त्यागी हो कर भी ,स्थिति की गंभीरता समझी .माँ की विवशता समझी  और अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न किया .
और मैं ?व्रत काहे का लिया था ?
संसार त्यागने का तो नहीं .व्यापक हित या सीमित स्वार्थों का  समर्थन ?
 अब तक कभी नहीं सोचा .
मैं देव-व्रत .दैवव्रत हो गया .
क्या दे जा रहा हूँ ,आगत को कौन सी थाती सौंपे जा रहा हूँ !
काशिराज कन्याओं के विवर्ण मुख याद आये.
 राजमहल के रनिवास में उनका घुटता जीवन याद आया .अनजान-अनचाहे पुरुष से वितृष्णापूर्वक किया गया बलात् संसर्ग याद आया .जिसके विकृत फल... ,हाँ सामान्य नहीं था दोनों में से कोई  ,एक अंधा ,दूसरा पांडुर !
 विवश कर दिया उन बालाओं को .कहाँ जातीं वे ? कहीं और ठिकाना था उनके लिये?
सब तो अंबा नहीं हो सकतीं !
माता सत्यवती को आश्वस्त किया था .नारी वीरभोग्या होती है ,पर वे वीर नहीं थे ,जन्म के रोगी ,निर्वीर्य ! मेरे पिता का पुत्र होना ही उनका  एक मात्र गुण था .'
उस दिन नहीं ,आज समझ में आ रहा है .स्वयं भी जीवन भर विवश रहा अन्याय के पक्ष में बने रहने को ,अनीतियों का मौन समर्थन करने को .मर्यादाहीन व्यवहार सहन करने को .
क्या आशा लगाई थी  उन बेबस नारियों से ,जिनके जीवन की स्वाभाविक इच्छाओं पर भी वर्जनायें ठोंक दी गईँ थीं .कुल के रत्नों को जन्म देंगी ?
विवाह के नाम पर बलपूर्वक स्वस्थ सुन्दर ,सौभाग्यकांक्षिणी ,स्वयंवरा कुमारियों को लाकर जन्म के रोगी असमर्थ भाइयों को सौंप देना ?
मेरी ही योजना थी .जानता था मेरी सामर्थ्य के , मेरे पराक्रम के सामने सब विवश हो जायेंगे .
 मैंने व्रत लिया ,भीष्म कहलाया , यश पाया ,.वे कुमारियाँ जीवन भर वंचित रखी गईँ. विवश कर दिया गया . विरक्ति से भरा मन ले कर जिससे अरुचि हो उससे संसर्ग या बलात्कार! पशुओं से भी गई-बीती रहीं वे .
अंबा के नयनों में प्रश्न था ,'हरण कौन करे और वरण कौन ?'
सब कुछ उलट-पलट गया .
पति बनने में असमर्थ ,पत्नी का पद कैसे दे पाते ,मनोरंजन के लिये स्त्रियाँ चाहिये थीं उन्हें .
गांधार-कुमारी से विवाह का प्रस्ताव मैंने भेजा .अपनी नीति में सफल रहा मैं .
कुरु-साम्राज्ञी जीवन भर आँखों पर पट्टी बाँधे रही .
पतिव्रता ?
कैसा विचित्र सत्य - हँसी हो शायद पाँचाली !
सौ पुत्र जन्म दिये , पति का मुख तक न देखा .माँ की स्नेहमय दृष्टि कभी संतानों पर न पड़ी .कौन संस्कार देता ?संतान का .जीवन सफल रहा क्या ?'
थक गये पितामह .
तंद्रा ने घेर लिया .निस्पंद पड़े हैं .हिलते ही शूलों की चुभन !
जब तक चेतना है निस्पंद कैसे रह सकता है कोई !
मस्तिष्क कुछ सजग हुआ .
सब भूल-भूल जाते हैं .पांचाली ने कहा था या स्वयं की विचारणा - -
'ये  ऋत नियम हैं-प्राकृत. जीवन की  स्थिति ,विकास और  कल्याण के लिये . हठपूर्वक उनके विपरीत आचरण . परिणाम -विषमता और व्यतिक्रम के अतिरिक्त और क्या ? स्वयं को वर्जित कर ,बाधा बन गया वंश के क्रमिक विकास में ..जब भी प्रकृति में  व्यधान पड़ेगा, विकृतियों का समावेश होगा ,जो कुछ अस्वाभाविक है ,कल्याणकारी कैसे हो सकता है .'
हाँ, उसने कहा था -
'तात के संयम से किसका हित हुआ ?किस महान् उद्देश्य की प्राप्ति हुई कौन सा दायित्व, कहाँ पूरा हुआ ?'
उन तीन उछाह-भरी कान्तिमती  स्वयंवराओं के मुख सामने आ जाते हैं ,जिन्हें हर लाया था मैं .बेबस .भयाक्रान्त .विवाह के समय उन के साथ मेरे हतवीर्य रोगी भाई... नहीं, याद नहीं करना चाहता .
उस दिन कृष्ण के साथ मार्ग चलती पांचाली हँसी थी.स्वयं के लिये बोली थी  ,'मेरा कठिन व्रत!क्या हो गया तुम्हें ,जनार्दन ? अपने से तुलना कर देखो ?'
विवश हैं पितामह इस ओढ़ी हुई चादर के नीचे कितनी घुटन है ,पर उतार सकते नहीं ,दुनिया के सामने ओढ़े-ढँके ही ठीक ..
*
कानों में लहरों की मंद्र ध्वनि .
अरे, सरस्वती का प्रवाह इतनी निकट है ,अब तक मुझे पता नहीं था .
मन हुआ उठ बैठें, निकल चलें सरिता तट पर .
माँ की याद आई .गंगा कहाँ यहाँ !
हवाओं की थपक भाल पर अनुभव की .हल्का सा सिर घुमाया .आधी रात के बाद हवा गतिमान हो गई थी.पवन झोंकों से शिविर का पट कुछ सिमट आया है .हवा के झकोरे अंदर तक चले आ रहे हैं .
'सौमित्र ' प्रहरी को पुकारा
 लगता है निद्रामग्न है  .
पड़े रहे चुपचाप .
न सो रहे, न जाग रहे .
रात्रि की नीरवता में जल-तरंगें रह-रह कर बज उठती है ,साथ में सदानीरा से होकर आते शीतल पवन झोंक .
जैसे  कोई हौले-हौले माथे पर थपकियाँ दे रहा है .
अर्ध-निद्रा में लगता है ,माँ  के थपकी देते  करों की चूड़ियाँ बार-बार खनक रही हैं .
'ओ माँ ,मेरी सुध ले रही हो तुम !'
अति क्लान्त नयन , पलकें मुँदने लगीं .
**
38
*
सांध्य-बेला समीप है ,आज के युद्ध का विराम .
किसी-न किसी के द्वारा वहाँ की सूचनायें  मिलती रहती हैं . बाद में विस्तार से वर्णन करते हैं रण-क्षेत्र से लौटे, वे पाँचों .
जयद्रथ-वध का समाचार भी ऐसे ही मिला था .
और आज आचार्य द्रोण का शिरोच्छेदन ! कौरव सेनापति थे वे .
पांचाली चौंक उठी .
रुक न सकी ,द्वार के समीप आच्छादन की ओट से बाहर देखती खड़ी रह गई.
 आते-जाते लोग ,कुछ वाक्यांश, कुछ नई भंगिमायें दिन की एकरसता से कुछ मुक्ति मिलती है .
दो चर वार्तालाप करते जा रहे थे- 'हाँ ,मार दिया आचार्य को .'
' उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया ?'
'प्रतिरोध ?वे जड़ीभूत-से हो गये थे पुत्र-वध का समाचार सुन कर .'
'पर अश्वत्थामा जीवित है !'
'अब क्या कहें ,उन्हें भरमा दिया सब ने मिल कर .'
'तो .मरा तो..हाथी था? '
'उन्हें  भी संदेह था,  धर्मराज से पूछा था.. '
आगे नहीं सुन पाई ,वे दोनों दूर चले गये थे
पांचाली असमंजस में .
इतने  गुणी व्यक्ति का कैसा दुर्भाग्य !
मित्र रह कर भी पिता उसकी योग्यताओं का आकलन नहीं कर  सके .
अनायास कृष्ण -सुदामा  याद आ जाते हैं .
घोर अभावों में पले पिता-पुत्र .
दूध  माँगते  पुत्र को बहलाने के लिये आटा घोल कर देना , करुणा से भर आया था पांचाली का हृदय .
 ओ पिता ,दरिद्र विप्र को  दिया गया वचन पूरा कर देते !
कहाँ हैं अब  पिता ,वे भी  युद्ध की भेंट चढ़ गये .
*
निरंतर बढ़ता वैमनस्य और क्या-क्या दिखायेगा -न्याय-अन्याय ,नीति-अनीति, सब एक हो गये .चल रहा है हिंसा और क्रूरता का नग्न नृत्य !
पार्थ को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का श्रेय आचार्य को है. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये औरों के साथ अन्याय भी कर गये -यह भी जानती है वह!
कंठ सूख रहा है ,देहरी से लौटी  कक्ष में जा कर पात्र भरा.
पीने की मुद्रा में पकड़े अनमनी सी चली आई.दृष्टि द्वार पर गई .पात्र हाथ से छूट पड़ा.
युधिष्ठिर कक्ष में  प्रवेश कर रहे थे .कुछ दूरी से भाइयों के वार्तालाप के स्वर भी .
विस्मित-सी पति का मुख देख रही है .
वे आँखें बचा गये .नीचे झुक कर लुढ़कता पात्र उठाने लगे   .
पीछे आते शेष चारों झिझके से खड़े.
' जा कर जल पी लो, पांचाली .'
'हाँ ..,हो गया आज का संग्राम?'
श्रान्त बैठ गये वे सब.
आज के समाचार सुनाने का उत्साह किसी में नहीं .
भीम कह रहे थे , 'ये अच्छा हुआ.आज बड़े भैया नीति से काम न लेते तो सब चौपट हो जाता .'
पात्र ले कर जाती हुई वह उनकी बातें सुन रही है .
*
बाद में कृष्णा ने पूछा था -
'धर्मराज ,जान बूझ कर या अनजाने में .?'
'मैंने सहज रूप से कहा था .'
'आचार्य ने तुम पर विश्वास किया था, मन में अपराध बोध तो नहीं न ?'
वे एकदम सकपका गये .
'रहने दो मैं समझ गई.'
उन्होंने फिर  स्पष्ट किया -
'मैंनें तो  सच ही बोला था .'
चुप देख रही है पांचाली अर्ध-सत्य -'नरो वा कुंजरो वा' .
'पता तो था न ..?'
'भैया कृष्ण ने कहा था नीति से काम लो ,नहीं तो कोई राह नहीं बचेगी . मैंने ...मिथ्या-भाषण नहीं किया ..'
'अपना मन सबसे बड़ा निर्णायक है धर्मराज ,मेरे -तुम्हारे कहने से क्या .'
कुछ शब्द चुपचाप व्यवधान बन कर दोनों के बीच खड़े रहे.
'बहुत थक गया हूँ .विश्राम करूँगा .
वे चले गये. द्रौपदी उसाँस ले कर रह गई .
भाई ने अपना प्रतिज्ञा पूरी की -समाधिस्थ द्रोणाचार्य का शीश काट कर -
उसके मुख से निकला - ओह, धृष्टद्युम्न ?
*
धर्मराज ?
सत्य और मिथ्या के बीच और क्या होता है - विभ्रम !
सारा दृष्य उसके आगे सजीव हो उठा -
भीम के चिल्लाने पर कि अश्वत्थामा मारा गया ,आचार्य द्रोण को विश्वास नहीं हुआ- इतना समर्थ मेरा पुत्र , भीम के हाथों मारा जाय? यह कैसे संभव है ?
 चारों ओर कोलाहल मचा था .
उन्होंने वास्तविकता जानने को सत्यवादी युधिष्ठिर की ओर देखा .
 ' अश्वत्थामा हतो .' शब्द उनके कानों में  और आगे का वाक्य ... 'नरो वा कुंजरो वा' (अश्वत्थामा मारा गया है, लेकिन मुझे पता नहीं कि वह नर था या हाथी).शंख, घंटा, तुरही और उत्तेजित कंठ-ध्वनियों के कोलाहल में डूब गया .
सुन कर स्तब्ध , एकदम जड़ी-भूत हो गये  द्रोणाचार्य !
और धृष्टद्युम्न ने एक ही वार से उनका शीष,धड़ से छिन्न कर दिया .

यह भी संभव है - कभी सोचा  न था.
अश्वत्थामा जीवित है ,सब देख रहा है ,पिता की जघन्य हत्या .सत्य का मिथ्याकरण .
वह भी क्रोध में अंधा हो गया तो ...?
आचार्य की मृत्यु का श्रेय  -धृष्टद्युम्न को जाये या  धर्मराज को ?
कहाँ जाकर विराम लेगा यह महा-समर !
प्रतिशोध की ज्वाला ने  विवेकहीन कर डाला सबको !
*
38
नीति क्या है ?
जान कर भी अनजान बने रहना !
अर्जुन ने कहा था-
'याद करो, हमारे अभि को इन्हीं के नेतृत्व में कैसी अनीति-अन्याय से मारा  गया .'
'उनका वही स्तर है ,तुम में और दुर्योधन में कोई अंतर नहीं क्या ? फिर वे तो धर्मराज ठहरे. '
नीति की बात एक बार पहले भी उठी थी ,तब पांचाली ने युधिष्ठिर से कहा था -
'जो रीति एक आड़ बन गई हो अपनी चाल को सफल बनाने का ,उसे मानना आवश्यक तो नहीं .आप कह सकते हैं मुझे द्यूत से घृणा हो गई है ,नये मान स्थापित करना समर्थ पुरुषों का काम है .आपको जो अनुचित लगता है वह मानने को आप विवश नहीं  .'
 ''स्त्रियों को इस बहस में पड़ना शोभा नहीं देता .. तुम्हारी सोच ही अलग है ,पत्नी का धर्म है पति के अनुकूल रहना .'
यह भी याद है कृष्ण ने कहा था ,मन की द्विधा ,बात उनकी हो ,तो मत पूछना उनसे . पांचाली ,पुरुष स्त्री के प्रति इतना विचारवान नहीं होता .अधिकार की भावना उसकी मानसिकता में होती है .अपनी दुर्बलतायें उसे सहज स्वभाव लगती हैं . कोई कह दे तो चोट पहुँचती है उसे .पत्नी के सभी गुण उसके निमित्त हैं कोई भी कमी हो तो खटकती है .'
आज उसे किसी के खटकने की चिन्ता नहीं .मर्यादा केवल उसी के बाँटे नहीं आई ,सभी के लिये है.
 वह रुकी, नहीं कहती रही  ,'बुद्धिमान मनुष्य ,अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये  शब्दों के कुशल वार से  मार देता है ,किसी को ख़बर नहीं होती कोई दोष नहीं लगाता .साधारण आदमी सब के सामने खुलकर अपना काम साधता है,  पापी कहलाता है .  छल से शस्त्राघात सबके सामने कर बैठता और धिक्कारा जाता है .बस, बुद्धि का अंतर है.'
 युधिष्ठिर मुँह घुमा कर भीम से बात करने  लगे .
याज्ञसेनी उठ गई .समर से लौटे पतियों के विश्राम -जलपान की व्यवस्था जो करनी थी .
*
 'तो अब निचिंत हैं ?
उत्तर अर्जुन ने दिया ,'अभी कहाँ ,अब कर्ण की बारी है सेनापति बनने की ,सबसे बड़ी बाधा. ...'
'ओह, कर्ण !'पांचाली ने सिर झुका लिया .'
सबके अन्याय और आक्रोश का केन्द्र वही रहा .सुपुरुष हो कर भी, समर्थ हो कर भी ...नहीं.. कर्ण, तुम हट जाओ मेरी स्मृतियों से भी .तुम्हारे दैदीप्यमान व्यक्तित्व पर छाया डालनेवाली एक मैं भी हूँ .मैं क्या करूँ मेरी भी विवशता ! नहीं जाऊँगी उस छोर जहाँ केवल अशान्ति और अशेष ग्लानि है.
नहीं,नहीं सोचना चाहती वह सब .
कितनी विसंगतियों  के पनपने का निमित्त मुझे ही  बनना था !
देखा था उसे पहली बार स्वयंवर की संशय भरी मनस्थिति में .
कुछ क्षणों को अनुभव की थी उछाह भरे ज्योतित नयनों की नेह-भीनी दृष्टि .
पर तभी पिता के कितने कथन ध्यान में आ गये . चिर-संचित आक्रोश उमड़ पड़ा ,अर्जुन के स्थान पर यह कहाँ से आ गया ?
वह वीरासन में बैठ कर नीचे जल में देखते हुये शर-संधान को प्रस्तुत था .
 एक दम ज़ोर से बोल उठी  ,'नहीं,नहीं , रुको ,रुक जाओ !मैं कुलहीन पुरुष का वरण नहीं करूँगी .'
 वे आजानु बाहु एकदम शिथिल हो गये ,सारा उत्साह झप् से बुझ गया .
पांचाली के वचनों के दाह से, नेहमयी दृष्टि ,  सुलग कर भभक उठी .
आज तक पांचाली उस संताप से  मुक्त कहाँ हो पाई और कर्ण भी .आमना-सामना होते ही ,एक आँच सुलग उठती है .
भोजन परोसती द्रौपदी का वह मनोयोग आज कहाँ चला गया !
.कोई कुछ पूछ नहीं रहा , कोई कुछ कह नहीं रहा.  
  चुपचाप भोजन में  लीन ,सब मौन . जैसे आज के घटना-क्रम से निर्लिप्त हों - नितान्त उदासीन .
*
(क्रमशः)