शुक्रवार, 25 मई 2012

कृष्ण-सखी - 41 & 42.



41
 किसी भाँति स्थिर नहीं हो पा रही पांचाली .
पिछली घटनाओं ने झकझोर कर रख दिया है .
सहज तो वे पाँचो भी नहीं - जैसे भीतर ही भीतर जैसे कुछ खटक रहा हो  .
जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ.सारी घटनायें एक-एक कर मस्तिष्क में घूम गईँ . भीम द्वारा दुःशासन की छाती का रक्त पीना- सोच कर ही सिहर उठती है .अर्जुन ने कर्ण का वध किया - रथ का पहिया निकाल रहा था वह .
यह भी जानती है जन्म से प्राप्त उसके कवच-कुंडल, जिनके होते वह अभेद्य था ,किसी छद्मवेशी याचक ने पहले ही उतरवा  कर शरीर छील दिया .
 स्पष्ट है कि अर्जुन के हित में ही किसी ने यह क्रूर कृत्य किया .
वह क्या समझा नहीं होगा?
संतोष के स्थान पर एक तीखी चुभन व्याप गई .
क्यों? मैं क्यों विचलित हूँ -स्वयं से पूछती है ,उत्तर कोई नहीं .
रह-रह कर भीतर से उद्दाम रुदन का वेग उठता है .
कौरवों में कोई नहीं बचा ,अंत में दुर्योधन भी गदा-युद्ध में भीम द्वारा उरु-भंग कर अक्षम कर दिया  गया .
हाँ ,सुना है - नीति के अनुसार , गदा-युद्ध के लिये और किसी को न चुन अपने स्तर के भीम को ही चुना था उसने.
माता गांधारी के एक दृष्टि-पात से अभेद्य  बन गया था उसका शरीर .बस ,कमर के नीचे क्षीण सा आवरण - वही भीम  की गदा से खंडित हो कर भीषण  अपघात का कारण बना.
और तब बलराम भैया अपना आपा खो बैठे  .
दुर्योधन उनका प्रिय शिष्य था .
यह भी सर्व विदित है कि उनकी इच्छा तो उसी से अपनी बहिन, सुभद्रा का विवाह करने की थी .पर अर्जुन उसे पहले ही हर ले गये .
एक प्रश्न उठा था-
  'दाऊ ने भीम से कुछ कहा ?'
मस्तिष्क पर ज़ोर डालती है पांचाली - कहाँ ?किससे सूचनायें मिली थीं ?  याद नहीं आ रहा .
दोनो पक्षों में कार्य करनेवाले ,माली ,रजक ,स्वच्छकार आदि कुछ न कुछ बोलते रहते हैं .अंदर की कुछ सूचनायें सज्जाकारिनें अपने भीतर पचा नहीं पातीं ,अवसर पाते ही मुखर हो जाती हैं .कौन कहाँ आया-गया  उनके पारस्परिक वार्तालाप से कितना-कुछ पता चलता है.
कितने सूत्र हैं ,चर हैं , अनुचर हैं ,बाहर चलती चर्चायें हैं-विमभ्र में पड़ गई .
सिर घूम रहा है .
हाँ ,वह कथन ज्यों का त्यों याद है ,
'कहते क्या? हल ले कर दौड़े थे उसकी ओर ,' रे नराधम ,अभी अनीति का फल चखाता हूँ .'
पर छोटे भाई कृष्ण ने बीच में ही कौली भर ली ,समझाया इसने कैसी अनीति की थी ,कुल-वधू को सभा में अपनी जाँघें खोल कर ....'
' गृहवधू की सम्मान-रक्षा जिनका कर्तव्य था वही बेचने पर उतर आयें तो भी दोष दूसरे का ?दूध के धुले बनते हैं.. .'
उनका रोष बोल रहा था ,'.... प्रारंभ  उन्हीं ने किया, जो धर्मराज कहलाते हैं .मर्यादा किसने भंग की ? कुल-नारी को सामान्या किसने बनाया ? हार गये तो कहाँ रहा उनका अधिकार ?उनके लिये पराई नार हो गई वह ?सभा में बैठे वयोवृद्ध-जन क्या तर्क दे पाते - इसीलिये सब चुप ! फिर किस नाते भीम और पार्थ ने शपथ ली  ,
 वही तो आज्ञा देने वाले बड़े भाई थे .समझाते ,कहते  पांचाली  अब उनकी वस्तु हुई - वे जाने, हमें क्या ?
अरे ,भाइयों को तो पहले ही हार चुके थे ,  वे भी तो सुयोधन के जन हो गये थे .'
पाँचाली वितृष्णा से भर उठी. पत्नी को बलि का बकरा बना देनेवाला  पति कहलाने का अधिकारी ?
किसे क्या कहे ?उस दिन देखा था वहाँ - प्रतापी वीर पति माना था जिन्हें,हीन-वेष धारे सिर झुकाये  बैठे रहे !
कैसा लगा था?
सबसे समर्थ समझा था जिन्हें ,वे  तेज-हत, सबसे विवश.
तीक्ष्ण दृष्टि पतियों पर डाली थी उसने .
एक बार तो  उत्तेजित अर्जुन और भीम ने सारा अनुशासन तोड़ दिया था.
अर्जुन ने आँखें उठा कर युधिष्ठिर को देखा था - वह दृष्टि!  अपमान के दाह से विकृत ,क्रोध और तिरस्कार से कौंधती - द्रौपदी को लगा था  पार्थ अभी कुछ कर डालने को खड़े हो जायेंगे .
पर तभी भीम हाथ मलते बोल पड़े ,'मैं उस हाथ को जला दूँगा जिसने पांचाली को दाँव पर लगाया!'
नकुल-सहदेव अस्थिर हो उठे थे .
 चौंक कर, सब लोग इन भाइयों को ही देखने लगे थे .
दुर्योधन और शकुनि के नयन चार , जिनमें कुछ संकेत करता उपहास भरा था .
 पार्थ ने एकदम अपने को संयत कर सिर झुका लिया .
युठिष्ठिर शान्त निर्विकार .
पांचाली समझ रही है .
समझी थी तब भी , जब सभा में बुलाने आये  दूत को वह प्रश्न दे दे कर  बार-बार लौटा रही थी-
 युधिष्ठिर ने गुप्त रूप से एक विश्वस्त सेवक से कहलाया था 'यद्यपि वह रजस्वला है तथा एक वस्त्र में है,  वैसी ही उठ कर चली आये, सभा में पूज्य- वर्ग के सामने उसका उस दशा में कलपते हुए पहुँचना दुर्योधन आदि के पापों को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त होगा.'
उनके लिये जन की सहानुभूति बटोरने को एक माध्यम भर - मैं !
पत्नी की आर्त-त्रस्त-दीन दशा का प्रदर्शन कर दया पाने की चाह - छिः!
घोर वितृष्णा से भर उठी वह.
वाह रे नीतिज्ञ !
आँखें जल उठीं थीं कृष्णा की - क्रोध या घृणा ?
कौन जाने !
*
42 .
अब भी जब याद आता है सुलग उठती है भीतर ही भीतर .
भूल जाना चाहती है. वह सब कभी याद न आये !
कोई बस नहीं चलता स्मृतियों पर . मन उन्मन होते  ही एक दूसरी को धकेलती चली आती हैं.
शान्त होना चाहती है .बहुत कठिन लगता है इतनी उद्विग्न मनस्थिति को झेलना .
दिन भर की विश्रान्ति के बाद वे सब निद्रा-मग्न , पर उसकी आँखों में नींद कहाँ !
 कितना अशान्त अंतर !बार-बार उठती है  -लेटती है .निद्रा का नाम नहीं .
  पाँच पतियों से रक्षित होने का गर्व पल भर में बिखर गया था .
समझ रही थी इन  कृती पुरुषों से जुड़ कर जीवन की उच्चतर भूमिकाओं में संचरण कर सकेगी . पर पत्नी के संदर्भ में वे नितान्त भोगी निकले .
हाँ, एक !केवल अर्जुन, संयमी -विचारशील ,पर कितना विवश !
यही असंतोष उसे  जीवन भर भटकाता रहा .
 कभी मुख से न कहे तो क्या  याज्ञसेनी जानती है .जिस सान्निध्य के लिये सब कुछ स्वीकार किया, उसी के लिये तरसती रही !
भीम स्नेहिल हैं , मन के भोले .दोनो छोटे अपनी सीमाओं में रहनेवाले .
धर्मराज युधिष्ठिर ? सब के संचालक -तब लगता था मितभाषी हैं ,गूढ़-गंभीर ,उनके मन की थाह कोई नहीं पा सकता .
 संतोष कर लिया था यह सोच कर कि भोग करना पुरुष-स्वभाव का अंग है  , उनका अघिकार है ,संतुष्ट करना मेरा कर्तव्य .पर हर बात की एक सीमा होती है .
और उस दिन सारे भ्रम टूट गये .वह स्मृति ही दग्ध कर देती है .
जिस संबंध को बड़ा सहज-सुन्दर और नितान्त अपना समझे थी,  भरी सभा के बीच, अपनी सारी विकृतियों और कुरूपता  के साथ  उद्घाटित हो गया .
आकाश से एकदम गहरी खाई में जा पड़ी थी वह .
क्यों याद आता है वह .जब भी निराश होती है ,वही सब मन पर घिर आता है.
 किसी एक की नहीं हूँ  -कौन साथ देगा मेरा ?
पाँच लोग ,पाँच तरह के मन .
*
पाँच लोग ,पाँच तरह के मन .
बरस-बरस, एक-एक के साथ पूरी निष्ठा से रहना है .किसी  से अंतरंग नहीं हो सकती .मन की बात किसी से नहीं कह सकती, कहीं परस्पर उनमें  भेद पड़ गया तो ?
नहीं,ऐसी स्थिति कभी न आये- यही संकल्प था मेरा !.
 कितना भी हटाने का यत्न करूँ  वही  बातें ही ध्यान में आई चली जा रही है.
उन्हें तो पाँच वर्ष में एक ही वर्ष उसका तन मिलता है .प्रत्येक का साथ देना है द्रौपदी को .
और मेरा मन ?उसे लगता है - कुछ नहीं ,मन नहीं है मेरे .  ,
उठ कर बैठ गई .बहुत देर से अनुभव कर रही थी वह कहना चाह रही है बहुत कुछ .मन में घुमड़ रहा है   ,संघर्षों को झेलता ,जीवन की तिक्तताओं और विषमताओं  से अनुतप्त शान्ति-हीन जीवन किसी नितान्त अंतरंग से  बाँटना चाहती है . पर किससे कहे ?
 कैसा प्रारब्ध था मेरा !
कैसा महाभारत चल रहा है -एक साथ दो -दो .एक बाहर एक भीतर !
साक्षी केवल पांचाली का मन !

सिर झटक दिया द्रौपदी ने - कुछ याद नहीं करना चाहती ,शून्य हो जाना चाहती है .अपने पर बस नहीं रहता. अस्थिर मन में सब उमड़ता चला आता है .
अंतरात्मा  चीत्कार उठी - यहाँ कोई नहीं मेरा ! क्या करूँ मैं ?
स्मृतियों के दंश  असह्य हो उठते हैं ,तब अंतर्मन से विकल पुकार उठती है -
हे जनार्दन ,परम-आत्मीय ,प्राण-सखा कृष्ण !कहाँ हो तुम ? बस तुम हो और कोई नहीं. किसी के काँधे संतप्त सिर नहीं रख सकती . वे सब एक हैं !
बस एक ही आसरा - मुकुन्द , माधव !
इन दिनों वे भी बहुत व्यस्त .दिन भर सारथी बने साथ देते हैं उन सबका .
 याद करती है उनकी कही बातें .कुछ आश्वस्त होता है मन .
पांचाली ने पूछा था ,'अपना राज-रनिवास छोड़ कर हर समय दौड़े रहते हो सखा .कभी-किसी के लिये, कभी किसी के पीछे .फिर भी कहनेवाले चूकते नहीं .जाने कितनी बार अपयश ही आया हिस्से में . असंतोष नहीं होता .. ?'

 'इसी में  मेरा सुख है ,मेरा संतोष है ।मेरा जीवन इसी के निमित्त है ।पर उस सब में डूबा नहीं अलग रहा ,साक्षी मात्र !'
'हाँ ,तुम तटस्थ रह कर हँसते-गाते  ,नाचते-नचाते रहे !
 वही कर्मयोग जिसे जीवन में उतारते रहे ,रणक्षेत्र में मुखर हो उठा .
वे शब्द कानों में प्रतिध्वनित होने लगे -
एक महानाट्य रचना चल रही है प्रतिपल. इस विराट् पटल पर दिक्-काल को पृष्ठभूमि बनाये परा-प्रकृति का ललित-लेखन ! रंगभूमि में नित नये पात्र ,नित नये प्रयोग. प्रशिक्षण चल रहा है अविराम ! उदाहरण और आत्म-निरीक्षण बस दो साधन, परिष्कार अपना स्वयं करना है यहाँ - स्व-भाव, क्षमतानुसार .अंतिम परीक्षा में कौन खरा उतरेगा  किसी को क्या पता !
* 
(क्रमशः)

बुधवार, 16 मई 2012

कृष्ण-सखी - 39 & 40 .



39
*
उस दिन जो सुन पाया बार-बार  क्यों  उद्विग्न करता है!
अंतर से कोई बोल उठता है -अब पांचाली के कहने पर चेते हो ,सत्यवती ने भी कुछ कहा था .तब संरक्षक बने चुप बैठे रहे ?
 हाँ ,तब मस्तिष्क का प्रवाह दूसरा था -स्त्रियों की बातें !जैसा रखा जायेगा रहेंगी. नीति क्या उनके कहे चलेगी ?
 एकदम झटका-सा लगा .गंगा-माँ ,अपनी शर्तों पर आईं थीं ,छोड़ कर चली गईँ .पूर्वज पुरूरवा को भी,सुना है,उर्वशी ने इसीलिये त्यागा.
पहले सोचा होता ,कुल-शील की धज्जियाँ ,इतना सर्वनाश और ये विकृतियाँ -  बचा जा सकता था.
यह पांचाली है !वह विमाता थी - सत्यवती .
फिर ध्यान आया .प्रतिज्ञा की मैंने ,पर क्यों ?  विमाता के कारण ही तो .
परिवार में उनका प्रवेश न हुआ होता तो ..
बुद्धि सतर्क हुई -
वे स्वयं नहीं आईँ .मैंने ही रथ भेज कर बुलाया था ,उन्हें  ले कर उनके पिता साथ आये .
शर्तें उनके पिता ने रखी..
अपनी युवा पुत्री एक वृद्ध को ब्याहने के पहले पिता उसका हित सोचता है --स्वाभाविक है .वे भी कहाँ गलत रहे.
और विमाता ?
मन ने प्रश्न किया - सत्यवती संतुष्ट रहीं क्या ?
उन्हीं ने कहा था-
  'मुझे संसार का क्या अनुभव था, पिता का कहना था तुम दुनियादारी नहीं जानतीं .और मैंने मान लिया ,पिता हैं मेरे हित  के लिये कर रहे हैं .राजमाता बनूँगी -कितनी शक्ति कितना वैभव. कहीं न कहीं तो मन का समाधान करना था . वृद्ध से विवाह करना मुझे क्यों रुचता पर पुत्री की बात का महत्व ही क्या? दायित्व पिता का होता है ,मैं क्या कहती ?'
 युवा  कन्या,धीवर की ही सही  बूढ़े के साथ विवाह कर राजमहल में आयेगी.यहाँ के लोग कैसा व्यवहार करेंगे .बड़े घरों की बड़ी बातें ,सब छिपा रह जाता है. फिर यह तो राजमहल ,जहाँ पति का युवा पुत्र ,राज- पद का अधिकारी .और वृद्ध का क्या ठिकाना ?अकेली स्त्री पता नहीं कल को क्या हो? सब अनिश्चित ही तो था .वचन उनके पिता के कहने पर उठाये थे .
उन्होंने कहा था-
'....तुम्हारे पिता मेरे पिता से कम वय के तो नहीं होंगे ! देवव्रत,तुम बीच में साधते गये सब !
दोनों ने मिल कर सब तय कर लिया और यहाँ की मर्यादायें ,वर्जनायें इन सारे बंधनों में जकड़ दिया  .
'जन-जाति की कन्या मैं ,बात को सीधे शब्दों में कह देती हूँ .पुरुष में पकी उम्र में भी ,वात्सल्य नहीं जागता ,लालसा ही जागती है ?
ओह, भीष्म ,किससे कहूँ  पहले वह पराशर ,ऋषि कहाते हैं जो .नदी पार करा रही थी वहीं संयम खो बैठे .मैं तो धीवर पुत्री ठहरी..  कितना
मुक्त जीवन था .क्या मोल इन स्वर्ण -हीरे-मोतियों का .रात-दिन का मनस्ताप और चिन्तायें हैं मेरे लिये  तो .'
 पूछा था उन्होंने -
' तुम्हें क्या सूझा, मेरे पिता की शर्तें मानते गये? तुम्हीं हो इस सब के उत्तरदायी !'
कोई उत्तर नहीं था भीष्म के पास !
'वहाँ निश्चिंत जीवन बिता रही थी ..प्रसन्न थी चाहे नदी पर नाव खेऊँ या वन में विहार करूँ .मैंने तो बता भी दिया था एक पुत्र है मेरा .पर तुम्हारे पिता ..अब मैं क्या कहूँ .
ऊपर से ये दो राजकन्यायें ,मुझ से भी अधिक दारुण स्थिति में जीने को विवश .'
सदा एक दूरी बनाये रखी थी विमाता से .भीष्म को असहज लगने लगता था ,जितना कम हो सके उतना ही सामना हो .
सोचते-सोचते जब थक जाते हैं श्लथ तंद्रिल -से ,शृंखला टूट जाती है कहीं के तार कहीं से जुड़ जाते हैं.
 कितनी बातें कोई तुक की कोई बेतुकी .माँ क्यों चली गईँ? प्रसन्न और तुष्ट होतीं तो क्यों जातीं !पर यहाँ नारी का अस्तित्व ही क्या ? वे नहीं रह पाई होंगी ,चली गईं .कुछ कारण रहा होगा .ये सब राज-परिवार के रहस्य हैं मुझे भी किसी ने नहीं बताया ,कोई क्या जाने !मैं भी पूछ नहीं सका ,जानना चाहता भी नहीं. वैसे ही कौन कम उलझनें हैं !
आज फिर वह अध्याय खोल बैठे.
' क्यों  रूप-यौवन दिया ईश्वर ने? पुरुष स्वयं को बस में रख नहीं पाता और दंडित होना पड़ता है हमें !'
चिन्तन चल रहा है -
सब पुरुष एक से नहीं होते ,
विराट् को जब उन पाँचो के  पांडव होने का पता चला था तो उन्होंने उत्तरा से अर्जुन से विवाह का प्रस्ताव रखा था .अर्जुन ने उत्तरा को पुत्रीवत् कह कर अभिमन्यु के लिये स्वीकार किया .यह है मर्यादा !
और महाराज प्रतीप ने भी गंगा के आग्रह पर भी मर्यादा के ही कारण स्वयं न स्वीकार कर पुत्र के हेतु स्वीकारा .
 पर पिता ?
उद्वेग से होंठ काट लिया भीष्म ने .
 विमाता का प्रश्न था-
'  इन संतानों का क्या होगा .कोई देगा इन्हें अपनी पुत्री ?'
और वे काशिराज की कन्यायें हर लाये -समाधान हो गया समस्या का.पर उससे भी बड़ी समस्या आ खड़ी हुई .
विभ्रम में पड़ जाते है ,विचार भटक जाते हैं .
 क्रम आगे चला .तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाने उनका पुत्र आया . तब भी तुम्हारा व्रत आड़े आ गया ..'.
 और अधिक उद्विग्न हो उठे  पितामह .
कुछ नहीं कर सका ..उन्हें लगता है, समर्थ थे तब अनीति नहीं रोक सके तो अब! अब तो... .
कितनों के साथ अन्याय किया ,अपना कर्तव्य कह कर . क्या-क्या घूमने लगता है जैसे सारा अतीत सामने चक्कर काट रहा हो . .
शून्य कर देना चाहते हैं मन को .शान्त -एकदम शान्त .विश्राम मिल सके इस मनस्ताप से .
सिर चकराने लगता है .आँखें मूँद लेते हैं- एकदम श्लथ..
 इन शरों की चुभन में तन को चैन नहीं .विगत स्मृतियों के दंश से मन को चैन नहीं .
40.
*
हे ईश्वर ,कब होगा सूर्य उत्तरायण !
अब सहा नहीं जाता .विश्रान्त मन विस्मृति में डूब जाना चाहता है .माँ की थपकियों की याद आती है .
हवा तिरपाल से छेड़खानी करने लगी है .माथे पर चुहचुहा आई पसीने की बूँदें -शीतल प्रलेप सा लगाने लगते हैं हवा के झोंके .हाथ-पाँव हिलाने की इच्छा नहीं होती शरों के पृष्ठभाग भी रुक्ष कठोरता से भरे .
सब आते हैं .पर किसी से कुछ कहने-सुनने की इच्छा नहीं होती  . भीतर ही भीतर मौन संवाद चलते हैं -अविराम.
भूल जाते हैं क्या विचार चल रहा था .
मन कहाँ शान्त बैठता है. फिर चिन्तन चल पड़ा - कितना अंतर है इन पांडवों और कौरवों में !
दोनों मातायें श्रेष्ठ कुलों की कुमारियाँ ,पर संतानों में कितना अंतर !
एक निरीह-सी ,उदासीन ! जो आ पड़ा ,स्वीकार करती जा रही है .आँखों पर पट्टी बाँध लेनेवाली .कभी पति और संतान का मुख न देखनेवाली - पतिव्रता ?
और तब सबने  बहुत प्रशंसा की थी .
एक-दूसरे के मन को समझ पाया होगा ?
उसाँस भर कर रह गये भीष्म !
दुर्योधन ! उसकी बात छोड़ो ,जिसने कभी माँ की स्नेहभरी दृष्टि न पाई वह नारी का क्या सम्मान करेगा ?एक के बाद एक  लगभग सारे भाइयों की यही कथा रही .
चाहा था दुर्योधन से सुभद्रा का विवाह होता.हमें यदुकुल का, विशेष रूप से कृष्ण का समर्थन मिलता .बलराम भी तैयार थे . पर नहीं हो सका ..
स्मृतियाँ फिर अतल में डुबाने लगीं
क्या विचार कर  रहे थे सब गडमड हो गया .
हाँ ,कुन्ती की भूमिका ...
 तेजस्विनी ,समर्थ .बढ़ा हुआ मनोबल ,स्वयं वरा था उसने अपनी रुचि से प्रतिष्ठित कुल का कुमार देख कर .कुन्ती ने स्वयं पांडु के कंठ में वरमाला डाली थी.
पांडु की असमर्थता पर वह सचेत रही . काम्य-पुरुष से अंश ग्रहण किया , संतृप्ति के सुख से विह्वल-क्षणों में,नारीत्व की चरम उपलब्धि मातृत्व का भान . स्वस्थ-समर्थ संतान ,
कुन्ती समर्थ और गांधारी विवश -  दोनों में कैसी तुलना ?
कारण केवल मैं -सिहर उठे पितामह !
तभी कुन्ती संस्कार दे सकी ,स्नेह- दृष्टि से सींच सकी ,संतानों में संतुलित  व्यक्तित्व का विकास कर सकी .
 श्रेष्ठ का वरण कर, स्वस्थ आगत जीवन की नींव पड़े -आनन्दमय जीवन-चेतना के  क्रोड़ से नवांकुर फूटें इसीलिये स्वयंवर की प्रथा रखी गई होगी !
एकदम विचार आया ,जिसे हरा जाता है उसे कैसा लगता होगा  ?
 अंतर पड़ जाता है .हरण करनेवाला स्वयं विवाह को तत्पर हो तो कन्या को लगता होगा ,इसके हृदय में मेरे प्रति  इतना चाव है कि सबसे जूझने को प्रस्तुत हो गया  ,प्राणों की बाज़ी लगा कर पाना चाहता है .
अन्यथा लगेगा . मुझमें रुचि नहीं थी लूट में समर्थ थे सो हर लाये ,.,अहंकार के वशीभूत ,किसी को भी सौंप देंगे -कितना उपेक्षित अनुभव करती होगी .
कहाँ से कहाँ भटकने लगते हैं विचार .हाँ ,दोनों का अंतर- कुंती की सामर्थ्य गांधारी की विवशता .केवल वही क्यों कितनी और भी तो.
एक की महानता के अभियान में कितनों को स्वाभाविक जीवन से वंचित होना पड़ा .
कैसी महानता जो सिर्फ अपने को प्रमाणित करने के लिये औरों का अस्तित्व रौंद डाले .  .
अंबा-अंबिका- अंबालिका ?
फिर वही कथा आगे बढ़ चली .वैसे ही अध्यायों की रचना होने लगी .
पश्चाताप से भर उठे . आँखें मूँदे ,अवसन्न से .
लग रहा है बाहर-भीतर  जम-से  गये हैं .लेटने की स्थिति बदल ली .
माँ गंगा का स्मरण हो आया ..वे चली गईँ .
माँ सत्यवती की अपनी शर्तें .
और दोनों के बीच देवव्रत-कितना लाचार !
ऊंह ,कैसे -कैसे विचार आ रहे हैं .उनके विषय में सोचना मेरा काम नहीं .
तो कुन्ती के विषय में ,द्रौपदी के विषय में !
वे अपने ढंग से रहीं .
उन पर बस नहीं चला .इन सब पर चल गया, ये बेबस हो रह गईं  .
तो कैसा होनी चाहिये स्त्री को वैसी या ऐसी ?
तब तो ऐसी चाहिये थी जिसे अपने अनुसार चला लें ,पर अब लग रहा है ,वैसी ही ठीक थी ,समर्थ माता ही संतान को उपयुक्त ढंग से ढाल सकती है .
ओह ,जिस पर कोई बस नहीं उस विषय में सोचे जा रहे हैं .
अपने ऊपर वश ही नहीं . अनजाने ही कितने विचार चले आते हैं ,
करें भी क्या .रात-दिन बस यही करना शेष रह गया है .
नहीं ,अब नहीं  बस बहुत हो गया .कुछ क्षण यों ही-  दिमाग में कुछ नहीं आने देंगे .
अचानक विचार कौंधा -और पुरुष कैसे होने चाहियें?
मेरे जैसे ?
ना ,ना. नहीं . बिलकुल नहीं .क्या किया मैंने ?सब चौपट !
हाँ, विमाता ने कहा था ,'यह  नारी की ही  विवशता है कि समवयस्क को पुत्र माने .पितृ-तुल्य को पति ..पुरुष को खुली छूट !पुत्री की वय की कन्या को विवाह लाये .'
इस प्रकार कभी सोचा नही था.
 पिता शान्तनु ?नहीं ,पद तथा वय की गरिमा - गांभीर्य नहीं निभा सके  .पहले माँ की शर्तें ,फिर सत्यवती-माँ के लिये ....कामना- तृप्ति हेतु औरों से संचालित रहे !
अपना उचित-अनुचित स्वयं निर्धारित न कर सके .
आगे  ,धृतराष्ट्र और उनके सौ पुत्रों की बात !आज लग रहा है जो हुआ प्रारंभ से ठीक नहीं था..
और पांडु काका?हाँ ठीक, पर उनकी अपनी विवशतायें .वंश में जो ग्रहण लगा था उन्हें भी छाये रहा .
कुछ क्षण सोचते रह गये -ग्रहण ?
 मेरे ही कारण !हाय रे दुर्भाग्य !
अनचाही पत्नी से दूर रहने के  सैकड़ों उपाय हैं पुरुष  के पास ,पर विवश हो कर अनचाहे पुरुष से जीवन भर दाम्पत्य निभाना  -ओह,कैसे बिताया होगा जीवन !
गहरी सांस छोड़ी पितामह ने .
कुन्ती ने ठीक ही किया .
मस्तिष्क थक गया .शिथिल हो पड़े रहे .विचित्र विचार आते-जाते रहे .
बचपन में माँ गंगा के साथ की स्मृतियाँ जाग उठीं -बस धुँधली यादें .जैसे तंद्रा में हों .
लगा पहुँच गये अपने गंतव्य पर .अशान्ति मौन  हो गई .
निद्रा ने घेर लिया . .
**
जीवन का लेखा-जोखा पूरा होने जा रहा है .इस जनम के कर्म इसी में भोग लूँ तो यह पीड़ा सार्थक हो !
कर्ण आया था ,कब ,किस दिन ? दिनों की गिनती भी भूल जाते हैं .
उसके शब्द याद आते हैं
'नहीं तात कवच-कुंडलों से बढ़ कर मेरे लिये मेरा व्रत है .
किस बात पर कहा था उसने ?
अभेद्य कवच-कुंडलों की बात पर ?नहीं, कोई गुमान नहीं था उसे .
विनीत है वह !
आकर चुपचाप चरणों की ओर खड़ा हो गया था  .
स्नेह से समीप बुलाया ,वर्तालाप होने लगा.
अब वह सेनापति है.आशीर्वाद लेने आया है .
 'आपको कभी प्रसन्न नहीं कर पाया मैं,मेरा दुर्भाग्य !..'
'नहीं . मैं रुष्ट नहीं तुमसे ,असंतुष्ट भी नहीं .परिस्थितियां ऐसी बनती चली गईँ .तुम दुर्योधन के हित ..'
 पूरी बात याद नहीं कर पाते ,मन  कहाँ-कहाँ भटक जाता है !
'और क्या करता .तात,. अकारण सब ओर से तिरस्कार और वंचनायें मिलीं किसी ने कभी सीधे मुँह बात नहीं की तब , उसी ने बढ़ कर साधा .सब कुछ उसी का दिया - राज्य,मित्रता ,और एक पहचान .वह जो  आज मैं हूँ .'
'तुम कौन हो नहीं जानते ?'.
'अब चाहता भी नहीं , जान कर क्या होगा .जानना तो औरों को चाहिये था ..'
  'मैंने किसलिये युद्ध से रोका ?नहीं ,मुझे तुमसे अरुचि नहीं थी ..इसका कारण था .जो मैं जानता हूँ तुम भी जान लो ...'
कहते-कहते वे कुछ रुके ,कर्ण के मुख की ओर देखते बोले ,
 '..एक ही माता की संतानों को मरने-काटने के लिये आमने-सामने खड़ा कर दूँ  वह मैं नहीं कर  सका .मैं जानता था तुम कुन्ती-पुत्र हो .हाँ वसुषेण ,कुन्ती तुम्हारी भी माता है .'
एकदम विस्मयाभिभूत,'मेरी माता ? वे .?'
 अवाक् कर्ण .
सिर झुकाये अंतर्मंथन में लीन !अचानक मुख तमतमा उठा,
'क्या होता, क्या बना दिया ..' .
पितामह ने हाथ उठा कर सांत्वना देनी चाही ,बोले ,'जो बीत गया सो गया .आगे की सुध लो .युठिष्ठिर तुम्हें माथे चढ़ाकर पूरा अधिकार देंगे .सारे भाई तुम्हारे अनुकूल रहेंगे .जीवन में जो अप्राप्य रहा ,सब तुम्हारे चरणों में होगा .'
स्थिर दृष्टि ,पितामह की ओर देखा उसने .
'अप्राप्य रहा था सब कुछ.उस किशोर वय में बहुत दुखी होता था .अशान्त चित्त दिन-रात चुभते वही वाक्य .हर स्थान पर केवल इस कारण दुत्कार दिया गया. इधर से उधर भागता था .कहीं कोई सहारा मिल जाय, जीवन सँवार लूँ .सब जगह दुरदुरा दिया गया ..मेरी योग्यता का कोई मोल नहीं .आचार्य परशुराम से मिथ्यावाचन  कर शिष्यत्व पाया ,पर सत्य कहाँ छिप सका .अर्जित विद्या निष्फल हो गई .राधेय रहा जीवन भर ,कौन्तेय कभी नहीं .पितामह,उनका बस चलता तो जन्मती ही नहीं .अब पांडव नहीं बनना चाहता .सूत-पुत्र रहा -पग-पग पर प्रताड़ित वंचित .
जिनके लिये मैं कभी था ही नहीं,मेरे हर सच को झुठला दिया गया हो जहाँ ,उनका साथ नहीं दे पाऊँगा .'
जैसे स्वगत कथन कर रहा हो ,'माता ?जिसने जन्मते ही म़त्यु के मुख में धकेल दिया ?अनचाहा था मैं ,अब जब सब बीत गया ,तो जिसने मान दिया ,जिसने जीवन दिया, नेह से पाला उसे कैसे नकार जाऊँ ?'
वहीं धरती पर बैठ कर उसने शर-शैया के किनारे सिर धर  दिया था .पितामह ने ,धरती की ओर मुख किये कोर से टिके  उस शीष पर हाथ रख ,कर्ण को आश्वस्त करने का उपक्रम किया .
   जैसे युग-युग की पीड़ा बाँध तोड़ कर बह निकली हो .आज पहली बार किसी परम मान्य का वात्सल्य उसे सींच रहा था.
'अब सब व्यर्थ लगता है ,तात .मित्र बनाया जिसने ,मान-सम्मान दिया उसे अधर में  नहीं छोड़ सकता .उसका विश्वास नहीं तोड़ूँगा .जिन का ऋण चढ़ा है मुझ पर, अब  चुकाने की बार ,धोखा दे जाऊँ ?
नहीं पितामह ,वसुषेण अभागा है तो क्या ,ऐसा स्वार्थी नीच और कृतघ्न  नहीं है  !  बहुत सम्मान करता हूं आपका आज आपका स्नेह अनुभव कर हृदय विह्वल हो उठा है ..पर यह नहीं कर सकूँगा पूज्य, मुझे क्षमा करें.'
पितामह चुप उसका मुख,देख रहे हैं.
'मरण पर मेरा वश नहीं ,पर जीना अपनी  मान्यताओं पर चाहता हूँ. '
 .शैया से टिके कर्ण के मस्तक पर ,पितामह बड़ी देर हाथ रक्खे रहे थे .
सजल थे दोनों के नेत्र .
रणभूमि के वीभत्स वातावरण में करुणा की क्षीण धारा बह निकली थी .
*
(क्रमशः)



गुरुवार, 3 मई 2012

कृष्ण-सखी - 37 & 38.


37
 गहराती निशा का नीरव अंधकार समूचे कुरु-क्षेत्र पर छाया है .हवायें गुमसुम .बीच-बीच में उठती शिवाओं और श्वानों की ध्वनियाँ उस घोर गहनता को भयावह बना देती हैं .
आज शर-शैया का तीसरा दिन ,युद्ध का तेरहवाँ .
 .अभिमन्यु-वध का दारुण समाचार सुना - सात महारथियों ने किस प्रकार  बर्बरता से एक निहत्थे बालक को मार दिया !
पितामह काँप उठे ,शरों की पृष्ठ-भाग पीठ में धँसे जा रहे हैं  .पर मन के संताप के आगे चुभन का भान किसे ?गोद में खिलाया था उन्होंने कृष्ण के इस भागिनेय को- कितना चंचल बालक !सुभद्रा के समान गौर ,पार्थ कीअनुहार लिये मुख-छवि !
शर-शैया पर लेटे  पितामह के मुँदे नयनों से अश्रु-बिन्दु टपक जाते हैं .कोई भी अंग हिलते ही शरों के पृष्ठ-भाग पीठ में  और दारुण हो लगने लगते हैं .
तन शैया पर ,किन्तु अशान्त मन थिर नहीं रहता .आगे कुछ करने को नहीं ,पीछे भागता है ,स्मृतियाँ घेर लेती हैं .अविराम चिन्तन चलता है .
 इन लोगों में यह दुर्बुद्धि कैसे उपजी ?
अरे ,दुर्योधन !
कुछ शब्द कानों से टकराते हैं  ,'सचमुच  कुरुकुल के होते तो .. .'
 स्मृति-पटल पर कहाँ- कहाँ के दृष्य उभर आये  .
वे शब्द ,वह दिन कैसे भूल सकते हैं ?
उस दिन जब सबसे गुहार लगा कर याज्ञसेनी हताश हो गई, तब  उसने जनार्दन को पुकारा था .
अपमान और विवशता से विकृत मुख तमतमा रहा था , पूरे आवेग में चीख उठी थी , 'समझ गई हूँ अच्छी तरह , सचमुच  कुरु-कुल के होते तो  कभी ऐसा जघन्य आचरण नहीं करते . पूरी खेती कुत्साओँ और अनीति  की ... '  स्वर- भंग में आगे के शब्द अस्पष्ट ही रहे थे .
सारी सभा स्तब्ध हो गई थी !और पांचाली अचानक चुप .
चीर खींचते उद्धत हाथ एकदम शिथिल पड़ गये . दुर्योधन हतप्रभ .विदुर दूसरी ओर मुख घुमाये जैसे झेल न पा रहे हों .पितामह का  झुका हुआ शीष कुछ और झुक गया था .
कर्ण , अब तक बढ़-बढ़ कर बोल रहा था, एकदम सन्न .आँख उठा कर देख न सका .
और पांचाली दुःशासन के हाथ से वस्त्र का छूटा छोर उसकी ओर खिंच आया था ,उसे समेट स्वयं को आवृत्त कर लेने का प्रयास करती हुई !
सभा  नीरव .कोई किसी को नहीं देख रहा .
'सचमुच  कुरु-कुल के होते तो ..' जैसे उस मौन में यही शब्द समा गये हों.वातावरण का भारीपन असह्य होता जा रहा था .
चौंके हुये धृतराष्ट्र  का विवर्ण मुख ,दृष्टिहीन नेत्र कार्यस्थल की ओर घूम गये ,जैसे देख पाने को आकुल हों  -
 मौन भंग हुआ था धृतराष्ट्र के स्वर से,' वधू, क्षमा करो ,मर्यादा भंग हुई है .'
वह बिलकुल चुप खड़ी है .
जैसे अनुनय कर रहे हों , फिर वे बोले ,'पुत्री , वय में तुमसे बहुत बड़ा हूँ.,पितृतुल्य. .विवश हो गया था.क्षमा कर दो .. इन की मति मारी गई है .'
फिर कहा ' मेरे संतोष हेतु वर माँग लो पुत्री ,जो भी चाहो .'
पांचाली ,मौन .
अब तक जो लोग मुखर थे ,सब चुप्प !
फिर अनुरोध किया था धृतराष्ट्र नें पर स्वरों में गिड़गिड़ाहट भर आई थी.
 कुछ  सजग हुई पांचाली और अति गंभीर स्वर से  पति का गँवाया हुआ सब वसूल लिया .
पर महाराज के  आग्रह  पर भी अपने लिये कुछ नहीं माँगा .
उस सभा में उपस्थित होते हुये भी विषण्ण से बैठे रहे थे भीष्म .
उस दिन को याद कर आज भी असहज हो उठते हैं .
उद्विग्न हो कर गहरी श्वास खींची  -' तुम्हें  दे सके , इतनी सामर्थ्य  कहाँ है किसी में, पांचाली  !'
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
 ध्यान  आया  'यदि सचमुच पुरु-कुल के  होते '  ... .कहाँ है पुरुकुल ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया,....हाँ!
  'सारी उपज  कुत्साओँ और अनीति  की' क्या गलत कहा उसने ?.....
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि यहाँ  अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
   ' सचमुच पुरु-कुल '  ... .पुरु-कुल कहाँ बचा ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया .,
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
चारों ओर परिवार के लोग ,एक दूसरे को मारते-मरते हुये .
उत्तरदायी कौन ?
'क्या कर आये अपने कुल की रक्षा के लिये, प्रतिष्ठा के लिये ?' - पितर पूछेंगे , 'तुम जो इतने सामर्थ्यवान ,इतने दृढ़ और आदर्शवादी थे  ,..?'
कैसा मिथ्याभिमान !
सब नष्ट कर दिया .अनीति -अन्याय का विरोध न कर सका!
कैसा आदर्श .कैसी महानता ?
उसने कहा था ,'मैं  जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ.बड़ी बात नहीं कहूँगी . दुर्बलतायें हैं मुझमें .अपना आक्रोश जीत नहीं पाती.जो अनुभव करती हूँ उसका प्रभाव पड़ता है ,प्रतिक्रिया होती है , सदा गंभीर ,संयत .अकारण मृदु होना मेरे स्वभाव में नहीं . कभी-कभी. आवेग निकाल कर सामान्य हो लेती हूँ .,. महान् नहीं होना चाहती, तात ,स्वाभाविक रहने दीजिये .प्रकृति के नियमानुसार .वही ऋत नियम हमारा धर्म है .'
उस रात्रि को कृष्ण के साथ मार्ग चलते उसने जो कहा था , कानों में गूँजने लगा --' वंश-बेलि सूख कर नष्ट हो रही हो, तो पुत्र का कर्तव्य है उसे सिंचित करना , पल्लवित करना ,औरों के आसरे छोड़ देना नहीं .'
याज्ञसेनी की बात बार-बार याद आती है  .
विचार परंपरा उधर ही चल पड़ती है -
जिसके कारण सब से बडे ऋण -पितृऋण से विरत हो गये थे ,वही अनुरोध करे जब, तब भी कोई बाधा रही क्या  ?  अगर  मानो तो माता की आज्ञा भी .'
द्वैपायन ने वीतराग संसार-त्यागी हो कर भी ,स्थिति की गंभीरता समझी .माँ की विवशता समझी  और अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न किया .
और मैं ?व्रत काहे का लिया था ?
संसार त्यागने का तो नहीं .व्यापक हित या सीमित स्वार्थों का  समर्थन ?
 अब तक कभी नहीं सोचा .
मैं देव-व्रत .दैवव्रत हो गया .
क्या दे जा रहा हूँ ,आगत को कौन सी थाती सौंपे जा रहा हूँ !
काशिराज कन्याओं के विवर्ण मुख याद आये.
 राजमहल के रनिवास में उनका घुटता जीवन याद आया .अनजान-अनचाहे पुरुष से वितृष्णापूर्वक किया गया बलात् संसर्ग याद आया .जिसके विकृत फल... ,हाँ सामान्य नहीं था दोनों में से कोई  ,एक अंधा ,दूसरा पांडुर !
 विवश कर दिया उन बालाओं को .कहाँ जातीं वे ? कहीं और ठिकाना था उनके लिये?
सब तो अंबा नहीं हो सकतीं !
माता सत्यवती को आश्वस्त किया था .नारी वीरभोग्या होती है ,पर वे वीर नहीं थे ,जन्म के रोगी ,निर्वीर्य ! मेरे पिता का पुत्र होना ही उनका  एक मात्र गुण था .'
उस दिन नहीं ,आज समझ में आ रहा है .स्वयं भी जीवन भर विवश रहा अन्याय के पक्ष में बने रहने को ,अनीतियों का मौन समर्थन करने को .मर्यादाहीन व्यवहार सहन करने को .
क्या आशा लगाई थी  उन बेबस नारियों से ,जिनके जीवन की स्वाभाविक इच्छाओं पर भी वर्जनायें ठोंक दी गईँ थीं .कुल के रत्नों को जन्म देंगी ?
विवाह के नाम पर बलपूर्वक स्वस्थ सुन्दर ,सौभाग्यकांक्षिणी ,स्वयंवरा कुमारियों को लाकर जन्म के रोगी असमर्थ भाइयों को सौंप देना ?
मेरी ही योजना थी .जानता था मेरी सामर्थ्य के , मेरे पराक्रम के सामने सब विवश हो जायेंगे .
 मैंने व्रत लिया ,भीष्म कहलाया , यश पाया ,.वे कुमारियाँ जीवन भर वंचित रखी गईँ. विवश कर दिया गया . विरक्ति से भरा मन ले कर जिससे अरुचि हो उससे संसर्ग या बलात्कार! पशुओं से भी गई-बीती रहीं वे .
अंबा के नयनों में प्रश्न था ,'हरण कौन करे और वरण कौन ?'
सब कुछ उलट-पलट गया .
पति बनने में असमर्थ ,पत्नी का पद कैसे दे पाते ,मनोरंजन के लिये स्त्रियाँ चाहिये थीं उन्हें .
गांधार-कुमारी से विवाह का प्रस्ताव मैंने भेजा .अपनी नीति में सफल रहा मैं .
कुरु-साम्राज्ञी जीवन भर आँखों पर पट्टी बाँधे रही .
पतिव्रता ?
कैसा विचित्र सत्य - हँसी हो शायद पाँचाली !
सौ पुत्र जन्म दिये , पति का मुख तक न देखा .माँ की स्नेहमय दृष्टि कभी संतानों पर न पड़ी .कौन संस्कार देता ?संतान का .जीवन सफल रहा क्या ?'
थक गये पितामह .
तंद्रा ने घेर लिया .निस्पंद पड़े हैं .हिलते ही शूलों की चुभन !
जब तक चेतना है निस्पंद कैसे रह सकता है कोई !
मस्तिष्क कुछ सजग हुआ .
सब भूल-भूल जाते हैं .पांचाली ने कहा था या स्वयं की विचारणा - -
'ये  ऋत नियम हैं-प्राकृत. जीवन की  स्थिति ,विकास और  कल्याण के लिये . हठपूर्वक उनके विपरीत आचरण . परिणाम -विषमता और व्यतिक्रम के अतिरिक्त और क्या ? स्वयं को वर्जित कर ,बाधा बन गया वंश के क्रमिक विकास में ..जब भी प्रकृति में  व्यधान पड़ेगा, विकृतियों का समावेश होगा ,जो कुछ अस्वाभाविक है ,कल्याणकारी कैसे हो सकता है .'
हाँ, उसने कहा था -
'तात के संयम से किसका हित हुआ ?किस महान् उद्देश्य की प्राप्ति हुई कौन सा दायित्व, कहाँ पूरा हुआ ?'
उन तीन उछाह-भरी कान्तिमती  स्वयंवराओं के मुख सामने आ जाते हैं ,जिन्हें हर लाया था मैं .बेबस .भयाक्रान्त .विवाह के समय उन के साथ मेरे हतवीर्य रोगी भाई... नहीं, याद नहीं करना चाहता .
उस दिन कृष्ण के साथ मार्ग चलती पांचाली हँसी थी.स्वयं के लिये बोली थी  ,'मेरा कठिन व्रत!क्या हो गया तुम्हें ,जनार्दन ? अपने से तुलना कर देखो ?'
विवश हैं पितामह इस ओढ़ी हुई चादर के नीचे कितनी घुटन है ,पर उतार सकते नहीं ,दुनिया के सामने ओढ़े-ढँके ही ठीक ..
*
कानों में लहरों की मंद्र ध्वनि .
अरे, सरस्वती का प्रवाह इतनी निकट है ,अब तक मुझे पता नहीं था .
मन हुआ उठ बैठें, निकल चलें सरिता तट पर .
माँ की याद आई .गंगा कहाँ यहाँ !
हवाओं की थपक भाल पर अनुभव की .हल्का सा सिर घुमाया .आधी रात के बाद हवा गतिमान हो गई थी.पवन झोंकों से शिविर का पट कुछ सिमट आया है .हवा के झकोरे अंदर तक चले आ रहे हैं .
'सौमित्र ' प्रहरी को पुकारा
 लगता है निद्रामग्न है  .
पड़े रहे चुपचाप .
न सो रहे, न जाग रहे .
रात्रि की नीरवता में जल-तरंगें रह-रह कर बज उठती है ,साथ में सदानीरा से होकर आते शीतल पवन झोंक .
जैसे  कोई हौले-हौले माथे पर थपकियाँ दे रहा है .
अर्ध-निद्रा में लगता है ,माँ  के थपकी देते  करों की चूड़ियाँ बार-बार खनक रही हैं .
'ओ माँ ,मेरी सुध ले रही हो तुम !'
अति क्लान्त नयन , पलकें मुँदने लगीं .
**
38
*
सांध्य-बेला समीप है ,आज के युद्ध का विराम .
किसी-न किसी के द्वारा वहाँ की सूचनायें  मिलती रहती हैं . बाद में विस्तार से वर्णन करते हैं रण-क्षेत्र से लौटे, वे पाँचों .
जयद्रथ-वध का समाचार भी ऐसे ही मिला था .
और आज आचार्य द्रोण का शिरोच्छेदन ! कौरव सेनापति थे वे .
पांचाली चौंक उठी .
रुक न सकी ,द्वार के समीप आच्छादन की ओट से बाहर देखती खड़ी रह गई.
 आते-जाते लोग ,कुछ वाक्यांश, कुछ नई भंगिमायें दिन की एकरसता से कुछ मुक्ति मिलती है .
दो चर वार्तालाप करते जा रहे थे- 'हाँ ,मार दिया आचार्य को .'
' उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया ?'
'प्रतिरोध ?वे जड़ीभूत-से हो गये थे पुत्र-वध का समाचार सुन कर .'
'पर अश्वत्थामा जीवित है !'
'अब क्या कहें ,उन्हें भरमा दिया सब ने मिल कर .'
'तो .मरा तो..हाथी था? '
'उन्हें  भी संदेह था,  धर्मराज से पूछा था.. '
आगे नहीं सुन पाई ,वे दोनों दूर चले गये थे
पांचाली असमंजस में .
इतने  गुणी व्यक्ति का कैसा दुर्भाग्य !
मित्र रह कर भी पिता उसकी योग्यताओं का आकलन नहीं कर  सके .
अनायास कृष्ण -सुदामा  याद आ जाते हैं .
घोर अभावों में पले पिता-पुत्र .
दूध  माँगते  पुत्र को बहलाने के लिये आटा घोल कर देना , करुणा से भर आया था पांचाली का हृदय .
 ओ पिता ,दरिद्र विप्र को  दिया गया वचन पूरा कर देते !
कहाँ हैं अब  पिता ,वे भी  युद्ध की भेंट चढ़ गये .
*
निरंतर बढ़ता वैमनस्य और क्या-क्या दिखायेगा -न्याय-अन्याय ,नीति-अनीति, सब एक हो गये .चल रहा है हिंसा और क्रूरता का नग्न नृत्य !
पार्थ को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का श्रेय आचार्य को है. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये औरों के साथ अन्याय भी कर गये -यह भी जानती है वह!
कंठ सूख रहा है ,देहरी से लौटी  कक्ष में जा कर पात्र भरा.
पीने की मुद्रा में पकड़े अनमनी सी चली आई.दृष्टि द्वार पर गई .पात्र हाथ से छूट पड़ा.
युधिष्ठिर कक्ष में  प्रवेश कर रहे थे .कुछ दूरी से भाइयों के वार्तालाप के स्वर भी .
विस्मित-सी पति का मुख देख रही है .
वे आँखें बचा गये .नीचे झुक कर लुढ़कता पात्र उठाने लगे   .
पीछे आते शेष चारों झिझके से खड़े.
' जा कर जल पी लो, पांचाली .'
'हाँ ..,हो गया आज का संग्राम?'
श्रान्त बैठ गये वे सब.
आज के समाचार सुनाने का उत्साह किसी में नहीं .
भीम कह रहे थे , 'ये अच्छा हुआ.आज बड़े भैया नीति से काम न लेते तो सब चौपट हो जाता .'
पात्र ले कर जाती हुई वह उनकी बातें सुन रही है .
*
बाद में कृष्णा ने पूछा था -
'धर्मराज ,जान बूझ कर या अनजाने में .?'
'मैंने सहज रूप से कहा था .'
'आचार्य ने तुम पर विश्वास किया था, मन में अपराध बोध तो नहीं न ?'
वे एकदम सकपका गये .
'रहने दो मैं समझ गई.'
उन्होंने फिर  स्पष्ट किया -
'मैंनें तो  सच ही बोला था .'
चुप देख रही है पांचाली अर्ध-सत्य -'नरो वा कुंजरो वा' .
'पता तो था न ..?'
'भैया कृष्ण ने कहा था नीति से काम लो ,नहीं तो कोई राह नहीं बचेगी . मैंने ...मिथ्या-भाषण नहीं किया ..'
'अपना मन सबसे बड़ा निर्णायक है धर्मराज ,मेरे -तुम्हारे कहने से क्या .'
कुछ शब्द चुपचाप व्यवधान बन कर दोनों के बीच खड़े रहे.
'बहुत थक गया हूँ .विश्राम करूँगा .
वे चले गये. द्रौपदी उसाँस ले कर रह गई .
भाई ने अपना प्रतिज्ञा पूरी की -समाधिस्थ द्रोणाचार्य का शीश काट कर -
उसके मुख से निकला - ओह, धृष्टद्युम्न ?
*
धर्मराज ?
सत्य और मिथ्या के बीच और क्या होता है - विभ्रम !
सारा दृष्य उसके आगे सजीव हो उठा -
भीम के चिल्लाने पर कि अश्वत्थामा मारा गया ,आचार्य द्रोण को विश्वास नहीं हुआ- इतना समर्थ मेरा पुत्र , भीम के हाथों मारा जाय? यह कैसे संभव है ?
 चारों ओर कोलाहल मचा था .
उन्होंने वास्तविकता जानने को सत्यवादी युधिष्ठिर की ओर देखा .
 ' अश्वत्थामा हतो .' शब्द उनके कानों में  और आगे का वाक्य ... 'नरो वा कुंजरो वा' (अश्वत्थामा मारा गया है, लेकिन मुझे पता नहीं कि वह नर था या हाथी).शंख, घंटा, तुरही और उत्तेजित कंठ-ध्वनियों के कोलाहल में डूब गया .
सुन कर स्तब्ध , एकदम जड़ी-भूत हो गये  द्रोणाचार्य !
और धृष्टद्युम्न ने एक ही वार से उनका शीष,धड़ से छिन्न कर दिया .

यह भी संभव है - कभी सोचा  न था.
अश्वत्थामा जीवित है ,सब देख रहा है ,पिता की जघन्य हत्या .सत्य का मिथ्याकरण .
वह भी क्रोध में अंधा हो गया तो ...?
आचार्य की मृत्यु का श्रेय  -धृष्टद्युम्न को जाये या  धर्मराज को ?
कहाँ जाकर विराम लेगा यह महा-समर !
प्रतिशोध की ज्वाला ने  विवेकहीन कर डाला सबको !
*
38
नीति क्या है ?
जान कर भी अनजान बने रहना !
अर्जुन ने कहा था-
'याद करो, हमारे अभि को इन्हीं के नेतृत्व में कैसी अनीति-अन्याय से मारा  गया .'
'उनका वही स्तर है ,तुम में और दुर्योधन में कोई अंतर नहीं क्या ? फिर वे तो धर्मराज ठहरे. '
नीति की बात एक बार पहले भी उठी थी ,तब पांचाली ने युधिष्ठिर से कहा था -
'जो रीति एक आड़ बन गई हो अपनी चाल को सफल बनाने का ,उसे मानना आवश्यक तो नहीं .आप कह सकते हैं मुझे द्यूत से घृणा हो गई है ,नये मान स्थापित करना समर्थ पुरुषों का काम है .आपको जो अनुचित लगता है वह मानने को आप विवश नहीं  .'
 ''स्त्रियों को इस बहस में पड़ना शोभा नहीं देता .. तुम्हारी सोच ही अलग है ,पत्नी का धर्म है पति के अनुकूल रहना .'
यह भी याद है कृष्ण ने कहा था ,मन की द्विधा ,बात उनकी हो ,तो मत पूछना उनसे . पांचाली ,पुरुष स्त्री के प्रति इतना विचारवान नहीं होता .अधिकार की भावना उसकी मानसिकता में होती है .अपनी दुर्बलतायें उसे सहज स्वभाव लगती हैं . कोई कह दे तो चोट पहुँचती है उसे .पत्नी के सभी गुण उसके निमित्त हैं कोई भी कमी हो तो खटकती है .'
आज उसे किसी के खटकने की चिन्ता नहीं .मर्यादा केवल उसी के बाँटे नहीं आई ,सभी के लिये है.
 वह रुकी, नहीं कहती रही  ,'बुद्धिमान मनुष्य ,अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये  शब्दों के कुशल वार से  मार देता है ,किसी को ख़बर नहीं होती कोई दोष नहीं लगाता .साधारण आदमी सब के सामने खुलकर अपना काम साधता है,  पापी कहलाता है .  छल से शस्त्राघात सबके सामने कर बैठता और धिक्कारा जाता है .बस, बुद्धि का अंतर है.'
 युधिष्ठिर मुँह घुमा कर भीम से बात करने  लगे .
याज्ञसेनी उठ गई .समर से लौटे पतियों के विश्राम -जलपान की व्यवस्था जो करनी थी .
*
 'तो अब निचिंत हैं ?
उत्तर अर्जुन ने दिया ,'अभी कहाँ ,अब कर्ण की बारी है सेनापति बनने की ,सबसे बड़ी बाधा. ...'
'ओह, कर्ण !'पांचाली ने सिर झुका लिया .'
सबके अन्याय और आक्रोश का केन्द्र वही रहा .सुपुरुष हो कर भी, समर्थ हो कर भी ...नहीं.. कर्ण, तुम हट जाओ मेरी स्मृतियों से भी .तुम्हारे दैदीप्यमान व्यक्तित्व पर छाया डालनेवाली एक मैं भी हूँ .मैं क्या करूँ मेरी भी विवशता ! नहीं जाऊँगी उस छोर जहाँ केवल अशान्ति और अशेष ग्लानि है.
नहीं,नहीं सोचना चाहती वह सब .
कितनी विसंगतियों  के पनपने का निमित्त मुझे ही  बनना था !
देखा था उसे पहली बार स्वयंवर की संशय भरी मनस्थिति में .
कुछ क्षणों को अनुभव की थी उछाह भरे ज्योतित नयनों की नेह-भीनी दृष्टि .
पर तभी पिता के कितने कथन ध्यान में आ गये . चिर-संचित आक्रोश उमड़ पड़ा ,अर्जुन के स्थान पर यह कहाँ से आ गया ?
वह वीरासन में बैठ कर नीचे जल में देखते हुये शर-संधान को प्रस्तुत था .
 एक दम ज़ोर से बोल उठी  ,'नहीं,नहीं , रुको ,रुक जाओ !मैं कुलहीन पुरुष का वरण नहीं करूँगी .'
 वे आजानु बाहु एकदम शिथिल हो गये ,सारा उत्साह झप् से बुझ गया .
पांचाली के वचनों के दाह से, नेहमयी दृष्टि ,  सुलग कर भभक उठी .
आज तक पांचाली उस संताप से  मुक्त कहाँ हो पाई और कर्ण भी .आमना-सामना होते ही ,एक आँच सुलग उठती है .
भोजन परोसती द्रौपदी का वह मनोयोग आज कहाँ चला गया !
.कोई कुछ पूछ नहीं रहा , कोई कुछ कह नहीं रहा.  
  चुपचाप भोजन में  लीन ,सब मौन . जैसे आज के घटना-क्रम से निर्लिप्त हों - नितान्त उदासीन .
*
(क्रमशः)




मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी - 35.& 36.


35
*
सुभद्रा का पुत्र ,कृष्ण का भागिनेय - अभिमन्यु !
रह-रह कर पार्थ का हृदय  तड़प उठता है, उन सात महारथियों ने कैसे  घेर कर मारा होगा अभिमन्यु को !
सोच-सोच कर विकल हैं अर्जुन .वह जघन्य कृत्य अंतर में शूल सा चुभा है .पीड़ा अधिक या क्रोध -विचलित हैं पार्थ !
दो-दो प्रतापी पुत्र युद्ध की भेंट चढ़ गये -पहले इरावान, उलूपी की एकमात्र संतान ,और आज अभि !
शोक-मग्न चारों भाई धीर बँधाना चाहते हैं ,पर जो मन को कुछ शान्त कर सकें वे शब्द  कहाँ से लायें  !
व्याकुल अर्जुन बार-बार स्मरण करते ,बोलने लगते हैं -
'भीम भैया ने कहा था उस अंतिम द्वार को मैं अपनी गदा से तोड़ दूँगा पुत्र, तू निचिंत रह .आचार्य द्रोण ने उसके लिये पहले ही कह दिया था जब तक इस बालक के करों में धनुष-बाण हैं कोई उससे जीत नहीं सकता ,..'
'उन सात महारथियों ने अनीति और अन्यायपूर्वक  उसे अकेला पा कर घेर लिया  .उनकी छलभरी चाल से  जूझता रहा मेरा पराक्रमी पुत्र.उस धूर्त जयद्रथ ने किसी पांडव को टूटे व्यूहमें घुसने नहीं दिया .अकेला पड़ गया था वह. और सारी रीति-नीति -औचित्य  को भुला वे इकट्ठे उस बालक पर टूट पड़े .वह निहत्था हो गया ,रथ से नीचे गिर गया तब भी वे वार करते रहे .मेरा वीर पुत्र रथ के टूटे पहिये से अंत तक लोहा लेता रहा पर....ओह. ..विद्या और पराक्रम में वह सबसे बढ़ कर था... .अंतिम  क्षण तक ....' .अर्जुन का कंठावरोध हो  आया .
आवेश में आ कर खड़े हो गये पार्थ ,'उस पापी जयद्रथ का वध कल सूर्यास्त तक नहीं कर दिया तो मैं स्वयं को चिताग्नि में भस्म कर डालूँगा !'
पाँचाली अवाक् ,चारों भाई हतप्रभ ,'अरे यह क्या किया ?'
'बस, अब कल यही होना है .'.भाइयों की सांत्वना काम नहीं कर रही , पितृ-हृदय की वेदना  किसी प्रकार शान्त नहीं होती.
आर्द्र-नयन पांचाली पास आ बैठी .
अब सँभाल लेगी ,चारों बंधु इधर-उधर हो गये .
बार-बार ध्यान आ रहा है -
वह चक्र-व्यूह के छः द्वार तोड़ चुका था . हाँ, सातवाँ द्वार तोड़ना उसे नहीं आता था ,'ओ,सुभद्रे तुम क्यों सो गईँ ?वही नींद मेरे अभि का काल बन गई ...'
'समझ रही हूँ मैं ,.'याज्ञसेनी बोली,'  हमारा पुत्र कोई साधारण बालक नहीं था .
कर्ण ,दुर्योधन, शल्य, अश्वत्थामा,शकुनि दुर्योधन सब उससे परास्त हुये थे.प्रतिशोध की अंधी आग में जल रहे थे वे ...'
'ओह, कैसा कारुणिक अंत..वधू उत्तरा गर्भवती और ....' अर्जुन फफक पड़े .
पति का हाथ पकड़ लिया पांचाली ने .बार-बार भर आये अपने नयन पोंछ लेती है .
*

'अभि..की.- एक बात पार्थ ,मैंने तुम्हें नहीं बताई थी...' ,
'हाँ,हाँ ,क्या? कहो पांचाली ,' विह्वल से बोल उठे ,'क्या बात ..?'
'वासुदेव का भागिनेय तुम्हारा अंश.उसके जन्म की बात ...मैं बता नहीं सकी थी ..चाह कर भी अब तक नहीं कह सकी ..'
'क्या .कहो तो ...'
' सब देवों ने अपने पुत्रों के अवतार रूप में अभिमन्यु को धरती पर भेजा था .तब चन्द्रदेव ने कहा वे अपने पुत्र का वियोग अधिक सहन नहीं कर सकते .अतः वह मानव- योनि में 16 वर्ष पर्यंत ही रह सकेगा.'
दोनों चुप !
'और उसके उतने जीवन का अधिकांश भी  ननिहाल में बीता !'
'वही क्यों ,हमारी सारी संतानें !केवल जन्म देने की दोषी हूँ मैं तो , लालन-पालन किसने किया ?सुभद्रा ने ...अभि के साथ शिक्षा-दीक्षा  वहीं ननिहाल में हुई .यहाँ वनवास में क्या होता .उनके पालनहार कृष्ण रहे .उधर इरावान और बभ्रु .अपने ननिहालों में ..'
'ओह, अपनी संतानों को भी समुचित संरक्षण न दे सका कैसा अभागा ..'
'चुप.चुप .अभागे तुम नहीं ,अपनी ही दुर्बलता से बनाई गई परिस्थितियाँ  हैं ये ...तुम्हारा किया  नहीं ...'
लंबी सांस खींची द्रौपदी ने .
' अपनी सपत्नियों की ऋणी हूँ .मेरे पति, और पुत्रों को भी उन्होंने अपना दायित्व बना लिया ...'
अर्जुन ने स्वीकारा ,'हाँ उनके बिना क्या होता, हमारी अगली पीढ़ी का ? उन सबकी तो योजना यही थी कि हम सब वनों में पड़े रहें .'
पति के मन का आवेग बाहर निकलवाना चाहती है वह ,'हां ,पार्थ,अपनी सुभद्रा ,हमारे पुत्रों को उसी ने तेरह वर्षों तक स्नेह संरक्षण दिया -बाल्यावस्था से युवा हो जाने तक .
सखा कृष्ण की भगिनी  -उन्हीं के अनुरूप निस्स्वार्थ ,स्नेहमयी , हम सुभद्रा के ही नहीं उस पूरे परिवार के ऋणी हो गये,जहाँ हमारी संतानों को ठौर मिला .समुचित शिक्षा-दीक्षा से संपन्न किया ,भ्राता अभि ने उन्हे पग-पग पर संरक्षण दिया .
और आज हमारा दुर्भाग्य ...मैं नौ पुत्रों की माता थी .वीर घटोत्कच ने बंधु-वध सुन कौरव सेना में प्रलय मचा दिया था . दो को खोने का महादुख है .,..पर गर्व भी ...
सचमुच धनंजय, मेरी सपत्नियाँ मेरा सहारा रहीं  .मेरी अकेली के बस का कहाँ था तुम्हें सँभाले रखना ..'
' किसे सुखी रखा मैंने , क्या दे सका किसी को ?उलूपी, चित्रा दोनों एकाकी जीवन बितातीं रहीं ...और तुम्हें आजीवन विभाजित रहने का  का संताप !'
उसके नेत्र झुक गये , ' शिकायत नहीं कर रही फिर भी .तुम्हारे लिये  जितना चाहती हूँ नहीं कर सकती .'
'समझता हूँ  ..कह नहीं सकता प्रतिबंध है मेरे ऊपर, पांचाली ,अपने ढंग से नहीं जी सकता मैं ! '
' कोई तो समझता है ,यही बहुत है  मेरे लिये .'
'तुम्हें पुत्र-वध का बदला चुकाना है ,हताश हो कर मनोबल हत न होने दो .'
बातों-बातों में द्रौपदी ने अर्जुन के सम्मुख धीरे से पक्वान्न और पेय प्रस्तुत कर वार्तालाप के क्रम में ही उदरस्थ करा दिया .
'अपना प्रण पूरने के लिये ,दुख सहन करने के लिये, शरीर की  सामर्थ्य होना भी आवश्यक है ! '
***
 इरावान की मृत्यु पर भी व्याकुल हुये थे अर्जुन .पर आज उनकी पीड़ा सारे बाँध तोड़ बह निकली थी .
पाँच ही दिन तो हुये , राक्षस अलंबुश ने उलूपी-पुत्र का वध कर दिया था .
पुत्र-शोक के पहले अनुभव ने  उन्हें झकझोर दिया था.
युधिष्ठिर धैर्य देने का प्रयत्न कर रहे थे ,पार्थ के कान कुछ नहीं सुन रहे थे .भीम ,नकुल-सहदेव क्या कहें, क्या करें .हत्बुद्ध हो अपने आपको दोष देने लगते थे .
पार्थ चुप हो गये थे बिलकुल !

*36

उस दिन भी भाइयों के जाने के बाद पांचाली ही सँभाले रही थी.
सबसे बड़ी चिन्ता थी '  कैसा लग रहा  होगा उलूपी को !सांत्वना  देने भी नहीं जा सकता ..'
पांचाली  समझ रही है -उलूपी के प्रति अपराध-बोध जाग उठा है .
'इरावान , चंद्र-वंश और नागवंश का विलक्षण संयोग था उसमें. माँ हूँ मैं भी उसकी.'
शोक-ग्रस्त पत्नी का मुख कृतज्ञता से देख रहे हैं पार्थ !
अब तक कभी सपत्नियों के विषय में विस्तार से नहीं पूछा ,पर आज  वह सब कुछ कहलवा लेना चाहती है .चाहती है वे मन खोल कर अपनी बात कहें  .
उलूपी के साथ बीते पलों की स्मृति ताज़ा कराना चाहती है.कुछ तो आवेग शान्त हो मन का !
' सदा उत्सुकता रही थी जानने की कि कैसे तुम्हारा नाग-कन्या से मिलन हुआ ? वह तो ऐरावत वंश के कौरव्य नाग की अनुपम सुन्दरी पुत्री थी?तुम्हें कैसे हृदय समर्पित कर बैठी?'
विगत के पृष्ठ खुलने लगे -
'हाँ , उसका पिता कौरव्य , तक्षक नाग के अधीन था , वह कभी उलूपी को मुझ से  विवाह की सहमति नहीं देता. उलूपी यह समझती थी.
  पिता का विरोध जानते हुये भी उसने मुझे ,पाताल लोक ले जा कर  विवाह रचा लिया . ....और उस मानिनी ने कभी साथ रहने का आग्रह नहीं किया .अनुमान था उसे  पिता  किसी प्रकार  अनुमति नहीं देंगे .पांचाली ,काश ,अपने बाहु-बल से उसे ला सका होता .'
'स्वयं को दोष मत दो प्रिय, समय अनुकूल होता तब न !
हम लोग स्वयं ही वनवासी ,अज्ञातवासी रहे ....सोच भी कैसे सकते थे ,फिर तुरंत युद्ध की हलचल .. '
'सच में तो तुम गये ही थे शस्त्र और सहयोग की प्राप्ति हित .तुम्हारा यह बारह वर्ष का तप था.'
'फिर भी उसके साथ अन्याय हुआ ,उसका पहला विवाह निष्फल रहा था . पति की गरुड़ों ने हत्या कर दी थी.युवावस्था में एकाकिनी .और  फिर मेरे साथ  भी... कहाँ रह सकी ! '
'ओह,तो क्या कभी दाम्पत्य सुख न पा सकी उलूपी !' द्रौपदी करुणा से द्रवित .
आज सब कुछ पूछ लेगी ! पार्थ के मन की गहराइयों में दबी स्मृतियों को
उभारे बिना आवेग शान्त नहीं होगा .
कैसे मिलन हुआ था.उससे ,तुम तो तीर्थाटन पर थे ?'
 ' मैं तीर्थाटन करता हुआ गंगासागर पहुँचा था ,विश्रान्त ,अकेला ,इतना थकित-विभ्रमित कि गंगासागर तक पहुँच कर कहाँ बैठ गया या निद्रालीन हो गया मुझे कुछ सुध नहीं .
उस  अवसन्न स्थिति से उसने उबारा .
जब चेतना सजग हुई तो पाया किसी अद्भुत , विलक्षण सौंदर्य से युक्त, निराले सुख-सुविधापूर्ण कक्ष में पर्यंक पर .चारों ओर विलक्षण शान्ति ,संगीत लहरियाँ ,कैसे दृष्य और रंग जो कभी इस धरती पर नहीं देखे .चकित विस्मित मैं .तभी उसे देखा .वह सब कहने का विषय नहीं .नहीं ,नहीं व्यक्त कर पाऊंगा ,पांचाली ...'
उसने कहा ,'मैं तुम्हें यहाँ लाई हूँ ,वहाँ मगर-मच्छों ,या वन्य-पशुओं के ग्रास बन जाते ,या ..किसी वनचरी , निशाचरी ..को भा गये तो... '
पांचाली मुस्कराई  ,'भा तो तुम उसे गये थे .'
'बहुत मादक सौंदर्य था उसका .इतने दिन तपोवनों- पर्वतों की धूल फाँकने बाद ,विश्राम मिला था .मैं मुग्ध देखता ही रह गया .'
'बहुत स्वाभाविक है. कोई अपने आप को कितना बाँध कर रखेगा !'
मेरे प्रति प्रेम के कारण उसने सारे विरोध झेले ,मेरे मार्ग की बाधा कभी नहीं बनी  .अपने पिता के विरोध और तक्षक के कोप  को जानते हुये भी मुझसे विवाह किया .जानती थी कहीं से समर्थन नहीं मिलेगा ....कभी नहीं कहा कि वह क्या चाहती है.निस्स्वार्थ   !.अपने लिये कुछ नहीं चाहा..उसने कहा था ' यह मत समझना पार्थ, मैं तुमसे प्रेम का प्रतिदान मांगूँगी . कुछ नहीं चाहती तुमसे मैं ,बस मेरा मान रखना ...नागलोक के कितने वरदान सहज ही उपलब्ध कराये उलूपी ने .कभी भूल सकता हूँ ?'
'मैं प्रसन्न हूँ ,कोई तो है तुम्हारे प्रति पूर्ण समर्पित ..'
'बस अपने से तुलना नहीं, परोक्ष रूप में भी नहीं .मेरे ही कारण ..'
बीच में  बोल बैठी ,'इतना  संतुलन और संयम किसी पुरुष में दुर्लभ है  ,
'भाग्यशाली हो धनंजय .,तुम में  सामर्थ्य है वह सब धारण करने की ,' गहरी सांस लेकर बोली , ' तभी तो तुम्हें  सुलभ हो सका . '
धीर बँधाते बोली ,'तुम्हारे संकट काल में तुम्हारी रक्षा की ,तुम्हारी पत्नी थी ,मेरी भगिनी तो हुई .उस समय वह नहीं होती तो मेरा पार्थ..भटकते-भटकते कहीँ खो न जाता ..'
कुछ देर चुप ही रह गये वे फिर द्रौपदी बोली,
' चित्रा ने वभ्रुबाहन को वहाँ भेजा था , स्वागत के लिये ?
'हाँ वभ्रुवाहन ,मेरा पुत्र.मणिपुर नरेश  का उत्तराधिकारी वभ्रु ,उलूपी ने उसका मातृवत् सत्कार किया  .जननी के रूप मे उसकी जो देख-रेख की चित्रा भी उपकृत हुई .और वभ्रु उसे मातृवत् ..उतना ही मान देता है.'
वार्तालाप के बीच बार-बार  इरावान की चर्चा आती है ,द्रौपदी विह्वल हो उठती है.
आँखों के आँसू रुक नहीं पा रहे .पोंछती हुई कहती है
'नहीं  रोऊँगी , नहीं दुर्बल होने दूँगी तुम्हें .विश्वास करो उलूपी को यहाँ लाना है मुझे वीर-पुत्र की  जननी ..'.
 अंतस का हर भार बँटा लेना चाहती है . हाँ , कुछ भी गोपन न रह जाये !
 देर तक वह पूछती रही ,वह बताते रहे.
 पता नहीं कितनी रात बीत गई.
अंत में  पांचाली ने ही कहा,' कल का संग्राम सम्मुख है .उसका घात करनेवालों को पाठ पढ़ाना है.,अब शयन करो, सव्यसाची .'
*
(क्रमशः)



शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी - 33 & 34 .

33

*
साक्षात् काल- रूप धरे हैं भीष्म !
तुले हुये ,जैसे ललकार रहे हों पार्थ को .कब तक संयत रहोगे ? आज मुझसे निपटना ही पड़ेगा .पांचाल और मत्स्य सेना का भयंकर संहार .
दुर्योधन ने कहा था ,' पितामह, आप सेनापति हैं पर उनमें से एक का भी बाल बाँका नहीं हुआ अब तक..अगर आप के बस के बाहर हैं वे लोग, तो कर्ण को अनुमति दीजिये .कम पराक्रमी नहीं है वह ,साथ आने पर एक-एक ग्यारह हो जायेंगे .'
पितामह की मुद्रा बदल गई .
अनायास तीव्र हो उठे वे ,'बस अधिक मत बोलो ,सुयोधन .कोई आवश्यकता नहीं कर्ण की.या तो वे  पाँचो नहीं बचेंगे आज या स्वयं कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को विवश होना पड़ेगा .'
और वही कर दिखाया था पितामह ने .अद्भुत पराक्रम से भयानक संहार मचा दिया. पांडव सैन्य का अधिकांश नष्ट कर डाला .
रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं .जाने कहाँ की विद्युत्-गति समा गई है, जैसे आज ही सब कुछ निबटा देंगे .
कृष्ण विस्मित हैं !
अर्जुन को  प्रबोधित किया . वह पूरी  तत्परता और समग्र एकाग्रता से  नहीं डट सका.
 विवश कृष्ण उत्तेजित हो उठे 'ठीक है तुम नहीं तो मैं ही ..' और सुदर्शन धारण कर प्रस्तुत हो गये  .
अर्जुन को चेत आया ,अभिमंत्रित पाँच शरों का ध्यान आया .
'नहीं ,वासुदेव .विरत हो जाओ तुम रण से .मैं तत्पर हूँ . बस अब आगे नहीं , कोई सोच नहीं अब ....  पितामह का वचन पूरा हो .'
उनके तीर से छूटा एक बाण पितामह के चरण परसता सर्र से निकल गया .
जाग गये  जैसे ,मुख से निकला 'ओह ,तो आ गया पार्थ !'
सिर उठाकर देखा -
शिखंडी को आगे किये वो रहा अर्जुन !
शिखंडी सामने - उन्हें लगा अंबा खड़ी है .
कुछ स्वर कानों में गूँजने लगे -
'तुमने मेरे दो जन्म निष्फल कर दिये.मेरा नारीत्व दो कौड़ी भर भी नहीं तुम्हारे लिये .बड़ा अभिमान है अपने पौरुष का ?'
विगत घटनाक्रम नयनों के आगे घूम गया .
उसने कहा था ,'नारी तुम्हारे इंगितों पर नाचनेवाली कठपुतली नहीं है .स्त्री-पुरुष का संबंध क्या है ,तुम क्या जानो ! विरक्ति ओढ़नेवाले ,तुम क्या जानो प्रेम क्या होता  है !'
हाँ ठीक तो .कहाँ सफल होने दिया था स्वयंवर !
ऐसे ही तो अंधे धृतराष्ट्र के लिये सुदूर देश की विवशा गांधार-कुमारी  खोज ली.
 ये कन्यायें क्या चाहती हैं कभी जानने का प्रयत्न किया ?
 वे अध्याय सदा को अंकित हो गये, छप गये कथा की एक शृंखला बन कर .
पर अब जीवन से  बीत चुका है वह सब .
अनायास हाथ उठकर हिल गया जैसे पट पर अंकित अंक मिटा रहे हों !
असार है यह संसार ,माया के आवरणों से घिर कर कैसी  परिणति हो गई ,
 -सूर्यपुत्र ग्रहण-ग्रस्त .अग्निसंभवा- धूम्राच्छदित.श्यामांगिनी !
 स्वयं को  कौन जान पाता है -प्रभास नामी वसु की देवव्रत में परिणति और आगे निरंतर  बदलती  भूमिकायें !
  उन्होंने  क्षण भर कृतज्ञ नेत्रों से  देखा - तो कुन्ती-पुत्र मुक्ति दिलाने आ गये तुम !
ईषत् हास्य झलका अधर-कोरों पर .
*
पार्थ और शिखंडी तत्पर हैं .
पितामह ने संधान हेतु कोई प्रयास नहीं किया .
'सावधान !'
स्वर कानों से टकराये, उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ा . जस के तस.
 किसी ने पूछा ,'क्यों तात?'
'एक स्त्री  पर शस्त्र प्रयोग करे भीष्म ऐसी अनीति नहीं कर सकता .इतना.नीचे नहीं गिर सकता वह !'
शांत खड़े रहे पितामह .
फिर उन्होंने अस्त्र-शस्त्र रथ में डाल दिये  .
पार्थ और शिखंडी घनघोर  शर- वर्षा कर रहे हैं
शिखंडी आगे कवच बना-सा .
निरंतर आघातों से क्षत-विक्षत होता शरीर!
 भीष्म खड़े हैं ,प्रहारों के वेग से ,हिल जाते हैं बार-बार .झुक जाते हैं कभी दायें कभी बायें .
बस, अब अपने कर्मों का दण्ड ग्रहण कर ,शाप-मुक्त होने जा रहे हैं , तन के घोर कष्ट और मन की अशान्ति में भी एक अजाना-सा संतोष व्याप गया है.
रक्त-स्रवित व्रणों से श्लथ जीर्ण काया ! रण-भूमि में गिरने लगे वे ,किन्तु भू- लुंठित नहीं हुए  ,पार्थ के  संधान से अविरल शरों के पृष्ठों पर सध गये , मानो अर्जुन के धनुष से छूटे निकले शरों ने धरती में गड़ कर  उन्हें  शैयावत्  आधार दे दिया हो !
आठवें वसु  का नर-रूप !
वे सातों मुक्ति  पा गये ,माँ-गंगा ने उन्हें तुरंत शाप-मुक्त कर दिया .पिता शान्तनु ने मोह-डोर में बाँध जिसे  रोक लिया .वही अष्टम् वसु -देवव्रत !
 दीर्घ काल तक भीष्म बने , पितामह कहाते कुल के सूत्र सँभाले रहे . आज उस  अभिशप्त जीवन की अवधि पूरी होने जा रही है .
लगा नेत्रों में गंगा का जल लहरा आया  .
निश्चेत-से भीष्म शरों की नोकों पर पर टिके हैं.
हा-हाकार मच गया .
सेनापति विहीन कौरव सेना हतोत्साह  तितर-बितर होने लगी .
दुर्योधन को सूचना मिली .
जो कान सुनने को उत्कंठित थे कि पांडव मारे गये,उन्होंने सुना सेनापति पितामह घायल हत-चेत पड़े हैं.  कैसी अनहोनी!
 दुर्योधन  स्तब्ध !
*
34
युद्ध-क्षेत्र की संध्या -
पक्ष-विपक्ष के रथी-महारथी ,उपस्थित हैं -
रक्त-क्षीण भीष्म शर-शैया पर टिके हुये बार-बार शीष उठाते हैं कंठ उस भार से थकित बार-बार झुक जाता है .प्रयास पूर्वक साध लेते हैं वे .
'अब शीष साधे नहीं सध रहा. उसे भी अवलंब चाहिये .'
दुर्योधन ने आज्ञा दी उसके शिविर से  तुरंत  राजसी शिरोपधान लाया जाये .'
'नहीं !रण-क्षेत्र है यह.जैसी मेरी शैया है उसी के अनुरूप ....'
अर्जुन की ओर दृष्टि डाली .'मेरे शिर को भी साध दो , वत्स ,'
तुरंत धरती की ओर तीन शर छोड़े पार्थ ने ,और धरती में धँसे उन शरों के पृष्ठों पर  भीष्म ने शीष टिका दिया .
' बस अब कुछ नहीं चाहिये .'
सब धीमे स्वरों में अपनी-अपनी कह रहे हैं .
सुन रहे हैं वे ,स्वयं भी जानते हैं सेनापति के बिना सैन्य -संचालन असंभव है .दुर्योधन की दृष्टि कर्ण पर गई .कर्ण ने कुछ कहा .उसने आचार्य द्रोण की ओर संकेत किया - कुछ वार्तालाप मंद स्वर में .
द्रोणाचार्य सेनापति  बन उनके सम्मुख आये ,हाथ उठा कर आश्वस्त,किया पितामह ने .
शिविर में नहीं जायेंगे पितामह,वैद्य की भी कोई आवश्यकता नहीं .
इच्छा-मृत्यु का वर पाया है ,बस अब प्रतीक्षा -सूर्य के उत्तरायण होने की .
*
यहाँ आ कर किसे स्मरण रहता है कि वह क्या है !संसार के आवरण चारों ओर से लपेट लेते हैं और वह कर्तव्य समझ कर निर्वाह करने लगता है .
उन्हें कैसे ध्यान आयेगा पूर्व का वह घटना क्रम जब द्यौ, प्रत्यूष,प्रभास आदि आठों वसु भ्रमण करते करते ,वशिष्ठ मुनि के आश्रम पहुँच गये थे .
वहाँ की मनोरम दृष्यावली ने मन मोह लिया .
'कितनी सुन्दर गौ ,' द्यौ की पत्नी अचानक कह उठी .
 उस श्वेत सौम्य सुन्दर गौ को अपलक निहार रही थी वह.
'यही तो है ,मुनि की नन्दिनी ,जो भी माँगो प्रस्तुत कर देती है .मनोकामना पूर्ण करती है .'
'कैसी लुभा गई है ,'पत्नी को निर्निमेष उसे ही देखते पा द्यौ ने छेड़ा.
'हाँ लुभा गई हूँ !तुम ,वसु कहलाते हो ,ऐसी गौ मुझे नहीं दे सकते और वे मात्र मानव , उदासीन मुनि होकर भी उसके अधिकारी बन गये !'
 प्रभास सहानुभूतिपूर्वक बोले ,'तुम्हें चाहिये ?'
सातवें  प्रत्यूष का साहस बढ़ा ,'वनवासी, उदासी मुनि को इससे क्या काम ? चलो, हम लिये चलते हैं इसे .'
शेष पाँचो का हँसते हुये समर्थन - मुनि हैं,ऐसी ऐश्वर्यदायिनी,कामदा  गौ का क्या करेंगे !
प्रभास ने आगे बढ़ नंदिनी की पीठ थपथपाई ,कंठभाग पर हाथ फेरते ,पुचकारते रहे .फिर उसे आगे हाँक ले चले.
शेष सब उनके साथ चल पड़े .
जब मुनि को नंदिनी के ले जाने का समाचार मिला ,वे व्याकुल हो गये .
जानकारी मिली कि आठों वसु आये थे, हाँक ले गये . तब क्रोधित हो कर शाप दिया ,' जाओ,अब तुम सब जा कर मृत्युलोक में  जन्म लो.'
वसुओं को  शाप की बात पता लगी ,घबरा गये .दौड़े मुनि के पास .
बहुत अनुनय-विनय, क्षमा-याचना  करने पर उन्होंने  समाधान दिया - 'यदि कोई नारी तुम्हें गर्भ में धारण कर जन्म लेने के बाद  जल में बहायेगी तब तुम्हारी मुक्ति होगी .पर सबसे उत्पाती वसु प्रभास को मृत्यलोक में बहुत दिन रहना होगा .'
वही प्रभास .गंगा के आठवें पुत्र !
सात वसुओं को जन्म देकर वे प्रवाहित कर चुकी थीं .आठवीं बार ,राजा शान्तनु सह न सके .अधीर हो  मार्ग रोक कर खड़े हो गये,' नहीं .इसे नहीं .छोड़ दो इसे .पुत्र है मेरा, नहीं ,जल-समाधि नहीं देने दूँगा .'
रुक गईं गंगा और वचन-भंग के परिताप के कारण  पुत्र को ले  उन्हें त्याग कर चली गईँ.
कुछ समय बीता ,शान्त होने पर शान्तनु के बहुत अनुनय करने पर गंगा ने  पुत्र उन्हें प्रदान कर दिया -यही देवव्रत!
देवव्रत ,घोर प्रतिज्ञा-बद्ध  भीष्म !
उन्हें कहाँ कुछ  भान होगा कि वे अष्टम् वसु हैं ,अभिशप्त जीवन व्यतीत करने धरातल पर आये हैं .
 जिस आठवें वसु को गंगा-माँ ने देवव्रत अभिधान दिया था ,संसार  की रीति-नीति और आदर्शों से आवेष्टित होने लगा .पितृ-मोह ने उसे भीष्म बना दिया और अगली पीढ़ियों ने पितामह - तथाकथित  कुरु-कुल के सिंहासन का संरक्षक !
वही आज शर- शैया पर  पड़े हैं ,
सबसे बोलते-बात करते हैं ,लेकिन मन का एक भाग कहीं खोया रहता है .
कभी अचानक चौंक उठते हैं .
*
इस लोक में आकर देवव्रत को संबंधों का भान हुआ. सांसारिक कर्तव्यों का चेत जागने लगा,वंशानुक्रम और वातावरण के निरंतर लगते ढबकों से ढलने लगे वे.यहाँ तो व्यवस्था-व्यथा ही व्यक्ति की निर्धारक हो जाती है.सोच भी उसी अनुरूप बनने लगता है .
एक बार प्रारंभ हो जाये परिवर्तन का क्रम, तो रुकता कहाँ है.अपनी  ही मान्यताओं में रमा , अपनी औचित्य-नीति  से संचलित कार्य-व्यापार बढ़ता चला जाता है .
कोई बड़ा झटका अंतरात्मा को झकझोर दे तो चौंक कर चेतने लगता है प्राणी !
 वही हुआ गंगापुत्र के साथ .
पांचाली के शब्द -उन्हें याद आ रहे हैं -
 'कठिन व्रत पाला उन्होंने ,लेकिन किसका हित संपादित हुआ ?कौन से उच्च उद्देश्य की पूर्ति हुई ? वृद्धावस्था में पिता की भोग-लिप्सा पूरी करना यही महत् उद्देश्य !उस तृप्ति के लिये कितने निरपराधों को वंचित किया ....'
उसी ने कहा था -
 'एक के महानता -अर्जन के लिये कितनों को अपनी स्वाभाविकताओं की आहुति देनी पड़ती हैं ,.कितने पात्रों को रिक्त रह जाना पड़ता है .कितनों को बलि का बकरा बनना पड़ता है. ''
और आज शर-शैया पर ..
प्रायश्चित करते पितामह पड़े हैं - सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में .
*
(क्रमशः)






सोमवार, 9 अप्रैल 2012

सावधान ,वे सड़कों पर घूम रहे हैं


*
फ़िल्में और उनके गीत ,हमारे शयन-कक्षों और ड्राइँग रूम्स का हिस्सा बन चुके हैं .मुंबइया हिन्दी  हमारी भाषा में छौंक लगाने लगी  है (बिंदास ,मवाली,काय कू आदि  ). देर-सवेर .स्वीकारना पड़ेंगे ही
एक और वर्ग है जो अंदर घुस आनेकी फ़िराक में सड़कों पर पर घूम रहा है .खीसें निपोरते बार-बार अंदर तक चक्कर लगा भी  जाता है  ,वो तो हमीं लोग हैं जो पैठ बनाने नहीं देते ,टरका देते हैं .
इनकी  रूप-रचना  का काम हमारी कामवालियों ने किया है .घर में झाड़ू-पोंछा ,चौका बर्तन ,कपड़े धोना आदि काम ही नहीं सब देखती -समझती हैं .उनकी निरीक्षण क्षमता गज़ब की है और टीवी की कृपा से उनका मानसिक स्तर और विकसित होता जा रहा है ,रहन-सहन बोल-चाल सब पर दूरगामी प्रभाव !
आपने 'फर्बट' शब्द सुना है ?
हम तो इनके मुख से बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं .
अपनी कोई साथिन जब उन्हें अपने से अधिक चाक-चौबस्त लगती है तो चट् मनोभाव प्रकट करती हैं ,'अरे, उसकी मत पूछो ,क्या फर्वट है !'
इस युवा पीढ़ी का अर्थ-बोध और मौलिक उद्भावनाएं गज़ब की हैं
फर्वट - इसका मतलब है फ़ारवर्ड !
और फिरंट का मतलब जानते हैं ?
जो अपने से आगे बढ़ी हुई लगे उसे कहेंगी 'फिरंट'(फ़्रंट से बना है)-इसमें थोड़ा तेज़-तर्राक होना भी शामिल है.
'टैम' ने समय को विस्थापित कर दिया है ।और माचिस ! दियासलाई है भी कहीं अब ?
सलूका ,अँगिया आदि वस्त्र ग़ायब हो गये उनका स्थान ले लिया है ,ब्लाउज ,आदि ने।
हमारे एक परिचित हैं अच्छे पढ़े-लिखे उनका कहना है स्टोर्स में लेडीजों का माल भरा पड़ा है. एक दिन बोले हमारा पप्पू शूज़ों का बिज़नेस करेगा .
शूज़ों का बिज़नेस - यह भी सही है! शू का मतलब तो एक पाँव का एक जूता जब कि जूते हमेश दो होते है- शूज़ : और उसका बहुबचन शूज़ों ठीक तो है .
लेडीज़ों भी सही -अकेली स्त्रियाँ कहाँ मिलती हैं अब? दो-तीन साथ में. एक झुण्ड में लेडीज़ और  झुण्डों का बहुवचन लेडीज़ों ही तो .
थालियों में कौन खाता हैं सब पलेट में खायेगे ,चाहे फ़ूलप्लेट हो या छोटी पलेट .
अपनी हिन्दी  बदलती जा रही है  अब तो.
अंग्रेज़ी भाषा की तो बात ही मत पूछो ।अनपढ़ लोग, गाँव के वासी यहाँ तक कि महरी ,जमादारिन मालिन सबके सिर चढ़ कर बोल रही है ।
हमारे यहां एक प्रकार का मिल का कपड़ा होता है (लट्ठा).
अंग्रेज़ लोग तब लांग्क्लाथ कहते थे ,अपने देसी लोग 'लंकलाट' कहने लगे . चल पड़ा शब्द.
इसी प्रकार कैंपों में जब अंग्रेज़ संतरियों को किसी के उधर होने का संदेह होता था तो
ज़ोर की  आवाज़ लगाते  ,'हू कम्स देअर ?'
हमारे चौकीदार ने अपने हिसाब से शब्द पकड़ लिये 'हुकम ,सदर !'
एक बार मुझसे किसी ने  कहा - ये 'फ़ालतू' ''अफ़लातून' से बना है ..'
मेरे तो ज्ञान-चक्षु खुलने लगे .
अपने बचपन की बातें भी कोई भूल सकता है
हमें भी याद है - सुनते रहते थे उर्दू और हिन्दी में खास अंतर नहीं है. म.प्र में थे हम . वातावरण में हिन्दी अधिक थी ,उर्दू से दूर का वास्ता और संस्कृत पूजा-पाठ और विशेष अवसरों मंत्र पाठ स्तुतियों आदि में सुनने को मिल जाती थी..तो हमने समझने का  आसान तरीका निकाला था.--क,ख,ग,ज फ वगैरा के नीचे बिंदी (नुक़्ता) लगा दो ,और गले से ग़रग़रा कर बोलो तो उर्दू होती है .
स्कूल में कोई तर्जनी दिखा कर  कह दे आइन्दा ...'तो दम खुश्क हो जाता था. कि जाने कितनी खतरनाक बात कही गई .
और संस्कृत ! हिन्दी शब्द के अंत में म या न लगा कर उस पर हल लगा दो हो गया काम  (सुन्दरम्,आनंदम् ,वरम्,निकंदनम् सब हलन्त हैं).और उन्हें गा-गा कर पढ़ो तो संस्कृत हो गई .
पर ये तो पुरानी बातें है.
अब देखिए , अच्छे-पढ़े लिखे लोग सफ़ल लिखते हैं ? सफल लिख-बोल कर  कोई अपनी हेठी क्यों कराये ?
अब मालिनें भी फूल नहीं 'फ़ूल' बेचती हैं -फ बोलने से जीभ में झटका लगता है फल नहीं फ़ल खाना सभ्यता का लक्षण है.
अभी से सुनना-समझना शुरू कर दीजिए. नहीं तो पिछड़ जाएंगे .कुछ दिनों में ये शब्द साहित्यिक प्रयोगों में आने लगेंगे .क्योंकि पुराने तो विस्थापित होते जा रहे हैं ,लोगों को दुरूह लगने लगे हैं ,उनकी अर्थवत्तापर संकट आता जा रहा है .और ये नये टटके शब्द जनभाषा के हैं ,साहित्य को जनभाषा में ला कर उसे जनता के लिए अति बोध-गम्य बनाने का प्रगतिशील विचार इन्हीं को सिर-आँखों धरेगा .आपके आस-पास भी कुछ  घूम रहे होंगे, ध्यान दीजिये पकड़ में आ जायेंगे ..
मेरी समझ में एक बात आती है जब तक इस वर्ग की उपस्थिति समाज में बनी रहेगी .भाषा उनके अनुकूल ढलेगी .ढलेगी तो चलेगी ,और चलेगी तो इधर-उधऱ पहुँचेगी .घरों में, बाज़ारों में  वर्ग के साथ वह भाषा आयेगी ज़रूर .
जनता बोले वही असली भाषा - आगे तो वही चलबे करेगी !
*
- प्रतिभा सक्सेना.

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी .31 & 32 .



31.
 व्यग्रता  से  पांचाली के पीछे बारादरी में निकल आये थे पितामह.
 जनार्दन को देख विस्मयाभिभूत  से  कुछ  पल  खड़े रह गये . आगे के  घटनाक्रम की भावाकुलता में अभिव्यक्ति का लोभ संवरण न कर सके .
कृष्ण के साथ पांचाली बाहर निकल गई,यंत्र-चालित से वे द्वार तक आ पहुँचे .
प्रहरी द्विधा में .
'विश्राम करें ,पूज्यवर ,'
'हूँ ऊँ ,' वे खोये-से बाहर देख रहे हैं .
पितामह की देह-यष्टि सीधी ,प्रलंब भुजायें ,केशों का रजतवर्ण और स्थिर नेत्र-दृष्टि .अभी भी इतने सबल कि दो योद्धाओं को एक साथ पटक दें .
वे दोनों  आगे मोड़ पर ओझल हो गये  .
पितामह .कुछ क्षण चुप रहे ,फिर बोले ,'बड़ी घुटन है शिविर में ,ज़रा बाहर खुले में भ्रमण करना चाहता हूँ.''
'मैं साथ चल रहा हूँ पूज्यवर ,अंधकार बढ़ रहा है .'
'नहीं तुम  रुको .,मैं यहाँ आस-पास ही हूँ .'
वे निकल गये.
बाहर तारों का मद्धिम उजास .
वे मंद  स्थिर पग धरते बढ़ चले .
युद्धक्षेत्र से हट कर पगडंडी ,आगे दूसरे शिविर की ओट से घूम कर आगे बढ़े .कुछ वार्तालाप की ध्वनियाँ कानों से टकराईं .
मन का कौतूहल जाग उठा .
  वृक्षों की छाँह से भरा  अँधियारा और  सघन हो आया था .युद्ध-भूमि में रात्रि का सुनसान प्रहर .कभी-कभी  किसी घायल के कराहने की ध्वनि पवन के झोंकों के साथ तैर आती थी .
पास ही मानव-स्वर सुनाई दे रहा है -मध्यम ध्वनि में अस्पष्ट से संवाद .
 वे सतर्क हुये - इस बेला यहाँ क्या चल रहा है ?
संशय में  तेज़ी से पग बढ़ाते वे उधर बढ़े .
मुकुन्द और पांचाली ,वार्तालाप में लीन मंद गति से बढ़े जा रहे थे .ध्वनियाँ पहचान में आने लगीं .
..'नहीं..नहीं तो ,मैं  महान् नहीं बनना चाहती ! सहज- सामान्य नारी  रहने दो मुझे ....'
 हवा के झोंकों में हिलते पत्तों की झर-झर में आगे की कुछ बातें बात अस्पष्ट रह गई .
फिर कृष्ण के  स्वर --
'...क्या कुछ नहीं करना पड़ा  ! पितामह की  निष्ठा ...उनका कठिन व्रत !'
'पितामह' सुन कर वे चेत गये .उत्सुकता से कान उधर ही लगा दिये .
कृष्णा बोल रही थी ,' कठिन व्रत पाला उन्होंने ,लेकिन किसका हित संपादित हुआ ?कौन से उच्च उद्देश्य की पूर्ति हुई ? वृद्धावस्था में पिता की भोग-लिप्सा पूरी करना- यही महत् उद्देश्य !उस तृप्ति के लिये कितने निरपराधों को वंचित किया ....'
 'वंचित किया. किसकी बात कर रही हो ?'
'माधव !अधिक कहलवाओ मत ,प्रकृति के नियमोल्लंघन का यही परिणाम होता है .'
परिणाम से क्या तात्पर्य है तुम्हारा..?'
'बुढ़ापे की बढ़ती असंयमित वासना पूर्ति-हित युवा पुत्र का ब्रह्मचर्य व्रत !  प्रकृति के प्रतिकूल जाने से  विकृति ही पनपेगी ! इसी अस्वाभाविकता में आगत संतानें तन-मन दोनों से अस्वस्थ रहीं .अनिष्ट की भूमिका तो वहीं से बनने लगी.उस के साथ जुड़ते   कितनों के आचरण कलुषित हुये, बुद्धि भ्रष्ट हुई , इस सबका दायित्व किसका ?'
चुपचाप सुने जा  रहे हैं भीष्म !
'...और अब ,पीढ़ियाँ उस महानता का मूल्य चुका रही हैं.
नारी पर अन्याय होते देख तुम्हारा हृदय विचलित हो जाता है गोपेश ,.तुम्हें कभी नहीं लगा कि यह अनुचित है अन्याय है ? उन तीन कुमारियों का स्वयंवर  विद्रूप बन कर रह गया. नारी की बात आती है तो तात किस किस सीमा तक संवेदनाहीन हो जाते हैं .'
कुछ क्षणों की चुप्पी असह्य लगने लगी भीष्म को, वे अस्थिर हो उठे.
' अब मौन क्यों हो ,पार्थसारथी .'
'वहाँ मेरा कोई वश नहीं था पांचाली .पर देखो  न आज वही नारी पितामह से प्रतिशोध लेने आई है . अब उनका पौरुष उसके सम्मुख लाचार है .'
द्रौपदी ,चुप नहीं रही -
' न  स्वयं स्वीकार किया ,न किसी के योग्य रहने दिया .निष्फल नारीत्व. देख लो ,क्या  बन बैठा .किसके कारण ?'
पितामह का शीष झुका है . दीर्घ निश्वास छोड़ा उन्होंने .
मन किया लौट चलें .पाँव मन-मन भर के हो गये .
नहीं,सुन लूँ ,ये कटु सत्य भी ..
गिरिधारी ने कुछ कहा  ,हवा के झोंकों और तरु पातों की मर्मर में स्वर डूब से गये  .
' महानता का लोभ !मुझे लगता है जीवन की  स्वाभाविकता ही सबसे बड़ा वरदान ..
सृष्टि संचालन के   ऋत नियम का उल्लंघन करके क्या मिलेगा !'
तात विचार मग्न थे -ऋत नियम!
पांचाली के बोल हैं या तात का अपना अंतर गुंजित हो रहा है -
'हाँ  सृष्टि के रक्षण-पोषण और विकास के लिये  .जीवन की निरंतरता  के साथ उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये   .उनके विपरीत हठ , सहज  प्रवाह में व्यतिक्रम तो आयेगा ही.. '
 बुद्धिमती है याज्ञसेनी.
यह बात मन में उठी थी क्या पहले कभी ?
'एक के महान् बनने का मूल्य कितनों से वसूला जाता है .और क्या उपलब्धि रहती है उस  की ?
कृष्णा कहे जा  रही थी -
'.अविकृत वंश-बेल चलाने का दायित्व किसका था ?पुत्र का कर्तव्य निबाहते.
पिता के प्रति निष्ठा थी तो माता की बात मान कर स्वयं नियोग करते. मैंने तुमसे ही सीखा है रणछोड़ ,किसी बड़े कल्याण के  हेतु वचन-भंग  में अहं को आड़े न आने देना  ?...कभी अपने यश-अपयश की चिन्ता की तुमने ? सचमुच , उनकी महानता से बड़े मुझे तुम लगते  हो .'
'मैं और यश ! ' लगा कृष्ण हँस रहे हैं,
' मेरे लिये तुम्हारा पक्षपात बोल रहा है .'
'नहीं खरी बात.'
भीष्म भीतर तक हिल गये !
 हवा चलते ही पत्तों की मर्मर  में शब्द खो जाते हैं.
सुनने में बार-बार व्यवधान आ जाता है .
' दोनों लाचार  अभागी वधुयें प्रसन्नता से स्वागत करतीं ,समर्थ संतान जन्म लेती .कुल की रक्षा होती .पर वहाँ प्रण आड़े आ गया . महानता  बाधित हो जाती न !'
ओह पांचाली !
वह बोल रही थी-
'कौरवों के लिये भी तो पितामह का संरक्षण ,चाहे विवशतावश ही किये हों, उनके अनुमोदन , उन्हें किन राहों पर ले गये ?'
कृष्ण चुप हैं .नहीं कुछ बोल रहे हैं .
वार्तालाप की ध्वनियाँ अति  मंद हो गईं .
अंधकार सघन हो उठा था
दूर से आती श्वानों और सियारों की आवाज़ें रह-रह कर सुनसान  को भयावह बना रहीं थीं.
किसी पाहन  से पग टकराया,.पितामह सँभले,.कुछ पल खड़े रहे अंधकार तकते,
फिर लौट पड़े .
*
32.
'आपने स्मरण किया था  तात ?'
 शिविर में प्रवेश कर अभिवादनपूर्वक प्रणत हो धनंजय ने पितामह को संबोधित किया.
 'हाँ पुत्र .जब भी अपने हित का कुछ करवाना चाहता हूँ तुम्हें स्मरण करता हूँ... .
और सब तो यहाँ  अपने-अपने में लीन ,किसे अवकाश है इस वृद्ध की सुध लेने का !'
'आज्ञा दें पितामह .'
भीष्म उन्मुख हो कर भी मौन, कुछ द्विधा में .'
प्रतीक्षा कर रहे हैं अर्जुन .
कल रात्रि ही  द्रौपदी ने  सूचना दी थी कि पितामह ,स्मरण कर रहे थे .
रात्रि को बिदा लेते समय कृष्ण  ने भी कहा था, 'मित्र,पितामह तुमसे कुछ कहना चाहते हैं .'
उन्हें आभास था द्रौपदी को दिये गये वचन की डोर में बँधे  पितामह अब स्वयं पार्थ को उचित उपाय बतायेंगे .
'अच्छा हो कि कल प्रातः ही... .'
और अर्जुन उपस्थित थे पितामह के शिविर में
भावाकुल शब्द पितामह के मुख से निस्सृत होने लगे -
'बहुत बड़ा भार  है मन पर .किसी से बाँट नहीं सकता ,कह नहीं सकता .पुत्र, मैं तो किसी के सामने अपना पछतावा भी व्यक्त नहीं कर सकता .'
 विस्मित-से अर्जुन .
'आप जैसे ,दृढ़ संकल्पी इस प्रकार विचलित न हों .आपने कब अपना स्वार्थ  साधा ?  सब के हित-संपादन में जीवन लगा दिया  .यह सोच आपके  उपयुक्त नहीं .'
'किसका हित संपादित कर पाया ?...क्या सार्थक किया मैंने ?जब  विचार करता हूँ तो निराशा ही हाथ आती है .'
'सब-कुछ आपका ही किया हुआ है तात,किस में इतनी सामर्थ्य थी कि इतना शक्तिशाली ,सुदृढ़ साम्राज्य खड़ा करता .कोई आँख टेढ़ी कर देख नहीं सकता .सब आप का ही प्रताप .'
'मेरा प्रताप?मैं विगत पीढी़ ,अगली पीढ़ी अधिक समर्थ और तेजस्वी हो यह व्यवस्था कर पाया क्या ?..जिसके हाथों  सब सौंप जाने का विचार करता हूँ वह इस योग्य है क्या --अब तो यही प्रश्न बारंबार कुरेदता है .मेरी  सारी दृढ़ता भरभरा कर ढह जाती है, वत्स.'
पार्थ का शीष झुका रहा.
'मेरे संरक्षण में कितने कार्य मर्यादा के अनुकूल हुये कितने प्रतिकूल !सब में मेरी मौन सम्मति .दायित्व मेरा था .किस दिशा में घटना-क्रम ले गया . मैं रोक सकता था .मैं अड़ जाता .मैं साक्षी नहीं बनता .कह देता अन्याय नहीं देख सकता .चला जाऊंगा.  तो औरों का साहस कितना था ? पर ..
पर ,अब कुछ नहीं .अब घटना-क्रम मोड़ना मेरे हाथ में नहीं.फिर भी अनर्थ रोकना चाहता हूँ .'
गला कुछ भर- सा आया  ,गीलापन घुटक कर बोलने लगे ,
' तुमसे विनती करता हूँ... , '
पार्थ  बीच में बोले बिना न रह सके , 'नहीं तात आज्ञा .आपकी आज्ञा ..'
बोलने से पहले गले में फँसी साँस को सहज किया तात ने ,
'मैं स्वयं बताना चाहता था ,वत्स .'
मनोयोग से सुन रहे हैं अर्जुन .
'बहुत जीवन जी लिया...देख लिया बहुत कुछ ..मृत्यु अवश्यंभावी  है,'
 वे चुप हुये कुछ क्षण,
'प्रस्थान से पूर्व कुछ प्रायश्चित कर सकूँ, पांचाली के प्रति अपराध-बोध भी कम होगा ,और जिनके साथ अन्याय कर बैठा हूँ ,उन्हें भी कुछ शान्ति मिले ..'
अर्जुन स्तब्ध .ऐसा तो कभी नहीं देखा था.कुछ नहीं बोलते थे तो भी उनकी मुद्रा सभी के  नियंत्रण हेतु पर्याप्त होती थी  .वह तेजस्वी व्यक्तित्व कैसा निरीह-सा हो उठा है .क्या हो गया पितामह को ?
 आज स्वयं को संयत नही कर पा रहे ,क्या हो गया तात को ..?.
'बैठे रहो  पुत्र,..तुमसे बहुत कुछ कहना है आज.'
चुप बैठे हैं  पार्थ .
युद्ध के सेनापति ,ऐसे हताश-विवश  जब कि रण-भेरी बजते ही सन्नद्ध हो कर नेतृत्व करना ,संचालन की बागडोर सँभालना उन्हीं का दायित्व !
और फिर एकदम  याद आया पार्थ को , तात का प्रण .पाँच अभिमंत्रित  तीर और पाँच पांडव!
हत्बुद्ध हो देखते रहे .
  ..इतना म्लान और हत कभी नहीं देखा था उन्हें.
मन उमड़ पड़ा,चुप न रह सके -
'कुछ अस्वस्थ  हैं पितामह ?'
 दोनो हाथों की  अँगुलियाँ आपस में फँसाये वे  बार-बार चलाने लगते हैं .
बड़े अस्थिर लग रहे हैं .
अर्जुन उत्तर  सुनने की  प्रतीक्षा में.
'सुनो पुत्र ,आज तुमसे बहुत आवश्यक बात कहनी है ...मैं दोंनो ओर से  वचन बद्ध हूँ .'
मुझे क्या आज्ञा है पितामह?'
'सुनो अर्जुन .मेरा वचन तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक मैं युद्ध में डटा हूँ .
मुझे इच्छा-मृत्यु का वर प्राप्त है ..युद्ध से मेरा मन विरत हो गया है .
जीवन में बहुत से अकार्य किये अब कुछ प्रायश्चित करना चाहता हूँ .'
'तात ,अस्वस्थ हैं आप ?'
'पुत्र ,मन अत्यंत अस्वस्थ है .अब कुछ मत पूछो .मैं कहता हूँ वह सुनो .'
कुछ थम गये वे , फिर तत्पर हो आगे बोलने लगे-
' शिखंडी नारी है .अंबा अपना प्रतिशोध लेने जन्मी है .मुझे उसके नयनों में  वही भाव , वही दृष्टि दिखाई देती है ,मुझसे शिकायत करती  हुई ,,मुझे धिक्कारती हुई  ..मैं नहीं शस्त्र उठा सकूँगा उस पर .'
थक गये थे वे .विश्राम हेतु रुके ,
जीवन भर अंतरात्मा की पुकार दबाकर जिसके संरक्षण का व्रत लिया ,आज उसकी व्यर्थता समझ में आ रही है .अब मुक्ति चाहता हूँ .
'शिखंडी ..' उनने कहा फिर चुप हो गये कंठ को खखार कर साफ किया ,'शिखंडी पूर्वजन्म  में नारी था ,काशिराज की कन्या अंबा .मेरे कारण  उसका जन्म व्यर्थ गया .वही शिखंडी हो कर जन्मी है . मैं जानता हूँ , मुझे उसमें वही अंबा दिखाई देती है .मैं उस पर शस्त्रघात नहीं कर पाऊँगा . कल उसे सामने कर देना पुत्र ,तभी तुम ...तभी तुम मुझे गिरा पाओगे .अन्यथा ...'
व्याकुल से पार्थ बोल उठे ,'नहीं ,तात ,मुझसे नहीं होगा ...'
'तुम्हें करना होगा.मुझे मुक्ति दिला दो पार्थ.जीवन की अस्वाभाविकताओं से ऊब चुका हूँ .
और मुझे अपने उन ,माता सत्यवती को दिये, वचनों की रक्षा हेतु .जो  करना होता है  अंतरात्मा उसकी  गवाही नहीं देती .मुझे छुटकारा चाहिये अब .'
अर्जुन स्तब्ध .क्या बोलें समझ नहीं पा रहे .
'नहीं, अब सहन नहीं होता ..पुत्र...कल वही करना है तुम्हें जो मैंने कहा .'
चुप हैं अर्जुन .
'मौन रहने का समय नहीं है . बोलो , पार्थ,बोलो .'
वे जानते हैं अगर कल उन्होंने पांडवों को नहीं गिराया तो दुर्योधन का सामना कैसे कर पायेंगे ,.और इधऱ द्रौपदी को दिया अमोघ आशीष !
'अब मुझे मुक्ति चाहिये .बहुत बोझ है ,कुछ प्रयश्चित कर लेने दो  .मुझे कुछ तो हल्का होने दो! वचन दो मुझे ,तभी निचिंत हो पाऊँगा .'
तुम पाँचो को जीवित रहना है भविष्य के लिये , न्याय -नीति के संरक्षण के लिये ...मेरा आशीर्वाद फलेगा  तभी न..'
'तात..'
विवश से बोल फूटे ,'करूँगा पूज्य .आपकी आज्ञा पूरी करूँगा .'
उदास सी स्मिति भीष्म के अधरों पर झलकी .'
'विजयी हो पुत्र,चिरायु हो !'
*
 संध्या होते ही  परिचारिका के साथ भानुमती आई थी तात सरस्वती के तट पर संध्या-वंदन कर लौटे नहीं थे .कुछ देर शिविर में बैठी रही  फिर लौट गई .
दुर्योधन निश्चिंत था ,बस दो दिन की बात .
*
(क्रमशः)