शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

एक थी तरु - समापन सत्र (36 & 37.)


36.

 आज फिर कनाडा से चिट्ठी आई है
जीजा की चिट्ठी पिछले महीने भी तीनों के पास आई थी कि गौतम की पत्नी ,शन्नो या तरु में से कोई कुछ महींनो के लिये वहाँ चली आये.घर और मन्नो की देख-भाल में उनका हाथ बँटा दे .मन्नो का आपरेशन इतने दिन से टल रहा है ,लेकिन अब तो होना ही है .
संजू के बच्चे इतने छोटे हैं कि रीना के जाने का प्रश्न नहीं उठता ..शन्नो और भाभी अपनी गृहस्थियों से अवकाश नहीं निकाल पा रहीं ,उनके अपने-अपने झंझट हैं .मन्नो की बड़ी बेटी तनु यहीं बम्बई में है .पर वह जा नहीं सकती ,उसकी डिलीवरी होनेवाली है .पहले तो जीजा यही सोच रहे थे कि वह आ जायेगी .स्थितियाँ ऐसी बनती गईं कि अब न ऑपरेशन टाला जा सकता है ,न तनु जा सकती है .
रह गई तरु .उम्मीद उसी से लगाई जा सकती है .
 मायके की बात चलने पर तरु के सामने मन्नो का चेहरा आ जाता है .उनके बारे में बहुत सुना है -सिर्फ अम्माँ ही नहीं औरों से भी .जैसा रूप वैसे ही गुण .औ किस्मत भी वैसी ही मिली .जतीन -जीजा के कान्टैक्ट्स बहुत अच्छे हैं ,पैसे की कमी नहीं अपना बिजनेस है .
 तरु के जन्म के बाद अम्माँ बिस्तर से लग गईं थीं,तो मन्नो ने सारा घर सम्हाला था .तरु को बड़े नेह-से पाला था .रात-रात भर उसे लिये जागती थीं .अम्माँ खुद कहती हैं ,उन्होने तो उसके जीने की उम्मीद छोड़ दी थी ,वो तो मन्नो ने जिला लिया .
तरु सोचती है ,कैसी होंगी वे जो उसे मौत के मुँह से वापस ले आईं ,जिनके गुण गाते अम्माँथकती नहीं .जिनकी कढाई -बुनाई का सामान सहेज कर रखा गया था .उनके साथ रहने का मौका ही कहाँ मिलाथा उसे ?अपने होश सम्हालने के बाद का तो उसे कुछ याद नहीं पड़ता .पहले जब आईं थीं तो तरु घर ंमे नहीं थी ,कहीं और भेज दी गई थी .फिर उनका आना जाना भाग-दौड़ जैसा ही रहा .
 मन्नो जिज्जी पत्रों में हमेशा लिखती हैं-तरु के साथ नहीं रह पाई .उसकी शादी जिस अफ़रा-तफ़री में हुई उसमें वे आ भी नहीं पाईं .उसे अपने साथ रखने को ,वे पहले भी कहती थीं ,पर किसी ने भेजा नहीं .
तरु का मन वहाँ जाने को व्यग्र हो उठा है ,पर चंचल और असित का सोचने लगती है .
फिर यह विचार भी कि ,शन्नो जिज्जी या रेणु भाभी जाने को तैयार हो जायें तो  ठीक .अब तो दोनों ने ही असमर्थता प्रकट कर दी है .
 असित के दौरे, उनके प्रमोशन के बाद से काफी कम हो गये हैं . चंचल घर का काम करने के लायक हो गई है .

 "जिज्जी की बीमारी का सुनकर जाने कैसा लगता है ,"तरु ने कहा था .
 "अब साइन्स काफ़ी आगे बढ गई है और अमेरिका का तो कहना ही क्या !वहाँ जितनी सुविधायें ,जितनी सावधानी मिलेगी उसकी यहाँ कल्पना भी नहीं की जा सकती  तुम बेकार चिन्ता करती हो ."
 इस बार फिर उसने शुरुआत की ,"मुझे तो बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा .अपनी जिन्दगी के लिये मैं उनकी ऋणी हूँ,असित ,वे नहीं होतीं तो आज मैं भी इस दुनिया में नहीं होती --."
 "तो मम्मी,तुम्हीं क्यों नहीं चली जातीं ?मौसी-मौसा इतना तो लिख रहे हैं .तुम्हारी जगह हम होते तो झट् चले जाते .क्यों पापा ,है न ?"
 "हाँ,आज को उन्हें जरूरत है तो किसी को जाना जरूर चाहिये ,"असित ने तरु की ओर देखा ,"तुम्हारे मन पर निर्भर है .जैसा चाहो --."
 "वाह ,मेरा मन क्यों नहीं करेगा ?मैं तो तुम लोगों का सोच कर चुप थी .फिर सोचा शायद कोई और जाने को तैयार हो जाये.'
 "मैं  मना नहीं करूँगा, बशर्ते ,तुम वहाँ जाकर और रुकने को न कहो ....कहीं  वहीं कोई और..'
'बस ,चुप भी करो .'
' हाँ , चंचल को अकेले रहना पड़ेगा और तुम --.'
"अरे ,हम क्या कभी अकेले रहे नहीं ?पिछली बार तो चार दिन अकेले रहे थे ,जब दादी बीमार थीं .सिर्फ रात को महरी आ कर सो जाती थी .मम्मी ,तुम जाओ.अमेरिका रिटर्न्ड  ! वाह , क्या रौब पडेगा मेरी सहेलियों पर  !"
 "वैसे तो रश्मि भी पंद्रह -बीस दिन आसानी से रह सकती है ,राहुल -राजुल को लिखो तो वे भी बारी-बारी से भेज ही देंगे .नहीं तो माँ जी तो हैं ही .वैसे भी आती-जाती बनी रहती हैं ,अबकी से लगकर रह लेंगी ."
 "वह कोई प्राब्लम नहीं .बीच में कितनी छुट्टियाँ पडती हैं,चंचल भी जाकर किसी के साथ रह सकती है .फिर मैं भी तो हूँ ,"असित ने समर्थन दे दिया .
 वह एकदम उमँग उठी .,"तो असित , तुम लिख दो उन्हें -वे  इन्तजाम करें ..मन्नो जिज्जी कितनी खुश होंगी .--."
*
तरु के जाने की तैयारियाँ शुरू .
कोई अपना देश तो है नहीं कि चाहे जब जाओ, चाहे जब लौट आओ .हफ़्तों पहले से बुकिंग और हर तरह की तैयारियाँ . .
चंचल ऐसी मगन जैसे खुद ही जा रही हो .उसने एक लम्बी सी लिस्ट बना ली है  ..
 "मम्मी,ये सामान हमारे लिये लाना है ."
 'ओफ़्फ़ोह चंचल ,तुम्हारा बस चले तो तुम सारा अमेरिका उठवा मँगाओ ,वहाँ से लाना इतना आसान नहीं कि बस गये और खरीद लिया ."
'इसके लिये सबसे अच्छी भेंट क्या होगी मैं बताऊँ ?'
'क्या पापा?'
' कोई योग्य भारतीय लड़का ,जो वहाँ से शिक्षा प्राप्त कर यहाँ आ रहा हो ..'
तरल ने पूरा किया ,'और भारत में सेटल होने का इरादा रखता हो..'
चंचल ने झेंपते हुये कहा ,'आप लोगों को बस यही सूझता है .'वैसे वह सब ख़बर रखती  है कि  कहाँ से पत्र-व्यवहार चल रहा है .

 कुछ फ़र्माइशें वहाँ से भीआई हैं -हरद्वार गंगा-जल ,काँच की चूड़ियाँ ,बिन्दी के पत्ते ,पञ्चदीप आरती ,तुलसी की माला ,सलवर सूट वग़ैरा- वगै़रा .भरतीयों की संख्या वहाँ काफ़ी है और उनके संस्कार भारत की धरती के मोह से मुक्त नहीं होने देते .
 असित के लिये तरु के मन का प्यार उमड पडा है .वैसे तो जब भी वे घर पर नहीं होते उनकी कमी खटकती थी ,वह हर बार तय करती थी अबकी बार उन्हें खूब संतुष्ट कर दूँगी .पर जितना चाव उमड़ता था उतना कर नहीं पाती थी -दुनिया भर के झंझट ,व्यस्तता ,और प्राथमिकतावाले काम .घर में होने पर वैसे भी आवेश ठण्डा ही रहता है .अब मन में जो उत्साह जागा है उसका प्रभाव व्यवहार पर छा गया है ..चंचल का लाड़ भी बढ गया है .उसके मन का सामान वह खुद जाकर दिला लाती है .आगे क्या-क्या करना है सब समझा रही है .
 तरु के भीतर कुछ होने लगा है .
मानवी संबंधों के कौन-कौन से रूप .कैसी-कैसी परिस्थितियां वहाँ के समाज में होंगी ,वह जानने को उत्सुक हो उठी है .वहाँ की जीवन पद्धति कैसी होगी ,तरु सोचती है ,जहाँ इतनी समृद्धि है,इतनी सुविधायें हैं ,उस वर्जनाहीन समाज में ,क्या इसी प्रकार की कुण्ठायें पलती होंगी ?ऐसी विकृतियाँ वहाँ भी होंगी ?कैसे होंगे वहाँ के लोग ?एक ओर यह संस्कृति ,जो व्यक्तित्व की घोर उपेक्षाकर,वर्जनाओं और घुटन का पर्याय बन गई है और जैसा कि सुनती आई है ,ठीक इसके विपरीत वहाँ का उच्छृंखल-संयमहीन और भोगवादी दृष्टिकोण!व्यक्ति ,समाज और परिवार में कितना ताल-मेल है वहाँ ?इन दो छोरों के बीच कोई संतुलन बिन्दु संभव है क्या ?
*
37.
 प्रस्थान का समय जैसे-जैसे पास आ रहा है,तरु की मनस्थिति अजीब होती जा रही है .
 उसके उड़े-उड़े चेहरे को देख कर असित ने कहा ,"तरु, मन न मान रहा हो तो अभी भी लौट चलो ."
 "नहीं , असित , यह कैसे हो सकता है ?जाना तो है ही ."
 "तो निश्चिन्त होकर जाओ,दुविधा से रहित मन से .कौन बहुत दिन रहना है ?तीन -चार महीने निकलते क्या देर लगती है ."

 "हाँ .और क्या ? वहाँ वालों को चिट्ठी समय से डाल देना ."
 तरु का मतलब जहाँ चंचल की बात चल रही है .
 "चिन्ता मत करो ,तुम्हारे  आते-आते तारीख भी पक्की हो जायेगी ."
 चंचल बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई .तीनों एक दूसरे को हिदायतें दे रहे हैं .चंचल ने उसके गले में हाथ डाल दिये और सिर कंधे पर रख दिया ,तरु चुपचाप थपक रही है .

 घोषणायें हो रही हैं .तरु को सुनने की फ़ुर्सत नहीं . ध्यान रखने के लिये असित साथ हैं अभी तो .कोलाहल बहुत बढ़ गया है .
 "अब चलो ,बढ़ो तरु !"
 असित ने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया है ,तरु का हाथ असित के हाथ पर टिकता है -वे एक दूसरे को देखते हैं .असित ने बाँह से समेट लिया उसे ,आँखें मूँद तरु ने सिर टिका लिया उस काँधे पर. बस कुछ क्षण , फिर चंचल का गाल थपथपा कर तरु उसे चूमा  .असित की ओर देखा और आगे बढ़ गई  .
असित और चंचल हाथ हिला रहे हैं ,तरु हाथ में रूमाल पकड़े है , हिलाती है .
 कण्ठ में कुछ उमड़ा चला आ रहा है,दृष्टि धुँधला-सी गई है.असित और चंचल छाया-चित्रों-से प्रतीत हो रहे हैं .
लगेज की चेकिन पहले ही हो चुकी है .तरु के पास बचा है बस एक बैग और एक ओवर कोट .कनाडा में बहुत ठंड होगी .
तमाम हिदायतें दे कर असित और चंचल आँखों से ओझल हो चुके है.कस्टम क्लियर हो चुका है ,लाउंज में इंतज़ार कर रही  तरु , चुपचाप बैठी है .
कुछ एनाउंसमेंट हुये . यात्री लाइन लगा रहे हैं .
उसने टिकट और पासपोर्ट पर्स से निकाल हाथ में पकड़ लिये, लाइन में लग गई .
 *
आगे अकेले ही जाना है.हैंड-केरी घसीटते आगे बढ़ रही है
बस ,घुमाव है आगे ,और बहुतसे लोग .सब अनजाने .इन्हीं के साथ होना है .चलती जा रही है ,जैसे सब कर रहे हैं वैसे ही वह भी.
परिचारिका ने सीट दिखा दी .खिड़की से लगी है .चलो अच्छा है.
स्क्रीन पर जीवन रक्षा के तरीके बताये जा रहे हैं ,
बेल्ट बाँध ली ,एकदम झटका लगा. रन वे पर दौड़ पड़ा है प्लेन -कितनी आवाज़ .कान भड़भड़ा रहे हैं -रूई निकाल कर ठूँस ली उसने. पर्स में रख लाई थी,मन्नो जिज्जी ने पहले से काफ़ी-कुछ बता दिया था .
तीन रातों से बहुत कम सोई है .-जाने की तैयारियाँ ,घर के इंतज़ाम ,मिलने आनेवालों का क्रम और मन की उलझन .असित और चंचल को छोड़ कर अकेले इतनी दूर की यात्रा ,इतने दिन बाहर रहना एक अनजाने देश में .
 अब काफ़ी ऊपर उठ गया है प्लेन.
धरती दूर होती जा रही है .
 लगा सब कुछ नीचे छूटा जा रहा है .जीवन की इतनी भूमिकायें निभाने के बाद एक दीर्घ -विराम !
कितनी भूमिकायें - सबके अलग रंग , अलग ढंग.
इनमें मैं कहाँ हूँ ? मन में प्रश्न उठता है ,
भीतर से कोई कहता है -तरु, अभिनय मे अभिनेता कहाँ होता है ?वेश और रंग धुलने के बाद  पात्रता समाप्त हो जाती है ,संबंध समाप्त हो जाते हैं ,रह जाता है केवल रिक्त मन !
 जीवन का मध्यान्तर हो गया है ,आरोपण हट गये हैं.तरु रह गई है यहाँ अकेली -पहचान रहित .
बैक को पीछे झुका कर सिर टिका दिया  उसने .
.शिथिल हो कर यों बैठना भला लग रहा है अंदर हलकी रोशनियाँ रह गई  हैं केवल .
.थकी हुई आँखें मुँद गई हैं .
पता नहीं कितनी देर .
अचानक कान में आवाज आई -'अब परेशान मत होन तरु,रोना मत !मैं नया जन्म ले रहा हूँ ,बिलकुल सोच मत करना .'
लगा किसी ने सिर हाथ पेरा है हल्के से.
'अरे ,पिताजी !'
चौंककर आँखें खोल दीं उसने.
सजग हो कर चारों ओर देखा .सब अनजान यात्री .
हाथ सिर पर गया बैक का कवर सिर पर आ गया था, हटा दिया .
नहीं, यहाँ किसी ने कुछ नहीं कहा .
झपकी लग गई होगी .
पर कैसा विचित्र अनुभव !
फिर वहीं के बारे मे सोचने लगी है तरु .
 वहाँ  जीवन दूसरी तरह का होगा .
 असित और चंचल के लिये टूटता व्याकुल मन अब थिरा आया है .
 प्लेन की खिड़की से धरती की इमारतें घरौंदों सी दिखाई दे रही हैं और लोगों के चलते-फिरते नन्हे आकार -जैसे गुड्डे-गुड़ियों का खेल चल रहा हो .
और ऊपर से घेरे है आकाश का अन्तहीन विस्तार !
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- प्रतिभा सक्सेना.


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मंगलवार, 20 सितंबर 2011

एक थी तरु - 34. & 35.


34.
कभा-कभी जब कुछ करने को नहीं होता मन जाने किन पुरानी गलियों में भटक जाता है .एक से एक बेमेल स्मृतियाँ ,कोई तुक नहीं जिनकी आज के जीवन से ,अनायास जाग उठती हैं .
एक हरषू था .आज सड़क पर  जाते एक लड़के को  देख कर लगा वही जा रहा है .नहीं वह कहाँ .दस साल पहले की बात है अब कहाँ वह नितांत अनुभवहीन ,दुनिया भर की उत्सुकता आँखों में समेटे  लजाता-सा युवक .
समय के साथ अधेड़ तो हो  गया होगा ही और परिस्थितियाँ ऐसी कि और दस साल बड़ा लगता हो तो ताज्जुब नहीं .,
वही हरषू जिसने अपनी चाची से कहा था ,'चाची ,ये तरु बी.ए. का फ़ारम भऱ रही है ...ये पढ़ेगी  इम्तहान में बैठेगी ..'
उसकी आँखों में ईर्ष्या की कौंध देखी थी तरु ने  .
वह लड़का था . उसे लगता होगा ज़रूरत उसे अधिक है पढ़ने की ,बढ़ने की आगे का रास्ता बनाने की और तरु तो लड़की है शादी हो जायेगी क्या करेगी डिग्री का ?
.पर उसे कोई सुविधा नहीं मिली आगे पढ़ना एक सपना बन कर रह गया .चाचा इतना खर्चा क्यों करेंगे उस पर .दसवीं पास कर रह जायेगा .
हाँ ,मैं लड़की हूँ .
- पर मैं ..मैं..नहीं पढ़ती तो ?
कैसा होता जीवन .बिलकुल परवश.कुछ नहीं कर पाती ..कहीं ब्याह दी जाती -घुट जाती बिलकुल .कुंठित ,वर्जित ,विवश ,
जैसे अम्माँ !कितनी बेबस थीं वे !बेबस कोई  होता नहीं बना दिया जाता है -शुरू से ,कि  स्वतंत्र व्यक्तित्व विकस ही न पाये ,जैसा चलाया जाय बस उतना ही.सारी ऊर्जा घुट-घुट कर नकारात्मक हो जाय चाहे .हताशा का ओर-छोर नहीं ,उबरने का कहीं  रास्ता नहीं .
दोष उन स्त्रियों का नहीं जिनकी क्षमताओं को नकार दिया सबने ,अपने ही खाँचों  में फ़िट करने के लिये  .बस गृहस्थी की गाड़ी घसीटते उसी लीक पर चलना है तुम्हें .ऊपर से अपेक्षा कि सहज-समान्य बनी रहो. जिनके लिये सारे रास्ते बंद हो .,कैसा लगता होगा उन्हें ? .अम्माँ  की तरह !
अम्माँ की यादें ऐसी मनस्थिति के साथ लगी चली आती हैं.
उनकी की मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले तरु भाई के घर गई थी .उसे लग रहा था भाभी पर बहुत बोझ पड़ गया है ,कुछ सहायता पहुँचा सके और अम्माँ के साथ कुछ दिन बिता ले .
उस दिन कामवाली नहीं आई थी .झाडू-पोंछा ,चौका-बर्तन सब पड़ा हुआ था .रीना वैसे ही व्यस्त है ,चलो मैं ही करवा दूँ - सोचा तरु ने और लग गई .
चौके में झाडू लगाते समय पटे के नीचे ढँका कुकर का पुराना एल्यूमीनियम का डिब्बा झाडू के धक्के से बाहर खिसक आया .
'अरे, ये कल सुबहवाले कढ़ी-चावल यहाँ किसने मिला कर रखे हैं ?कुत्ते  को डालने के लिये दिये रखे होंगे' ,तरु ने सोच लिया .उसने डब्बा वहीं खिसका दिया .
 बाद में जब  नहाकर निकली तो  देखा अम्माँ घिसटती हुई चौके में पहुँच गई हैं और और पटे के नीचे  से वे बासे कढ़ी-चावल निकाल कर वहीं जमीन पर बैठ कर खाने लगी हैं.
 'अरे अम्माँ ,ये क्या खा रही हो ?'
 'अमाया ऐ---बअ जाआ ऐ ,वो अहीं अक ऐती हैं ---.'
 अम्माँ अब रुक-रुक कर ऐसे ही बोल पाती हैं .सुबह से उनने कुछ खाया नहीं था .
 पूछने पर रीना ने कहा था ये कुछ समझती नहीं ,इन्हें कैसे खिलाना- रखना है मुझे पता है .नहीं तो पेट भराब हो जाये तो कौन समेटता फिरेगा !
 स्तब्ध तरु देख रही है ,जिसे देख कर ही खाने की इच्छा खत्म हो जाये ,कितनी भूख के बाद वह गले से उतरता होगा !
कितना तरसी होंगी ये ,कैसे गु़ज़रे होंगे इनके दिन .कितनी शौकीन थीं स्वादिष्ट चीजें बनाने की - खाने और खिलाने की!
 शाम को तरु ने अपनी लाई मिठाई में से दो पीस फ्रिज में से निकाले और लाकर अम्माँ को पकड़ा दिये .
रीनी ने खाते देख लिया ,बोली ,'दीदी, हमारा इतना बस नहीं कि इतना सब इन्हें खिलायें .बेकार आदतें बिगा़ड रही हो .'
 क्या कमी है इस घर में ?क्या नहीं बनता यहाँ ?पर हाँ ,घर तुम्हारा है मैं कौन होती हूँ किसी से कुछ कहने- करनेवाली !
 यहाँ तो शुरू से ही यह चल रहा है .कभी कोई बात होने पर रीना फट् से कहती है ,'इनने हमें क्या दिया ?'
ठीक है ,इस दुनिया में अपनापन ,लिहाज ,संबंध सब खोखले शब्द हैं।पहले इस हाथ से ले ले तब उसी हिसाब से उस हाथ से दे .
यहाँ किसी से कुछ कहना बेकार है ,तरु जानती है नहीं तो बहुत कुछ सुनने को मिल जायेगा .शादी के पहले इन के पति ने जो कमाई की थी उसे किस-किस पर कितना खर्च किया, इन्हें तो इसका भी हिसाब रखना है और जितना हो सके उसे बराबर कर लेना है .
उस दिन सबके साथ खाने बैठ कर  तरु उन कौरों को कड़वे घूँटों की तरह हलक से उतारती रही।

  फिर उनकी मृत्यु की सूचना आई थी .
चलो, अच्छा हुआ मुक्ति पा गईं वे .यहीं के यहीं प्रायश्चित हो गया .
ओ माँ ,चलते समय कोई भी बोझ तुम्हारी छाती पर नहीं रहा होगा ! सब धुल-पुँछ गया .कोई पछतावा लेकर नहीं गई होगी तुम !
विश्राम करना ,निश्चिन्त होकर माँ ,और निर्मल स्वच्छ मन लेकर फिर आना तुम !
जाने कितनी विवशताओँ से कुण्ठित अपनी जो ममता अपनी संतान को नहीं दे पाईं, फिर आकर स्नेह से सींच देना ।औरों का मैं नहीं जानती लेकिन मेरा तृषित मन तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा .तुम्हारे अन्तर्मन में भी कुछ खटक रह गई होगी- अपने बच्चों पर अपना ममत्व लुटाये बिना तुम भी कहाँ चैन पाओगी !
हमने जाने में - अनजाने ,गुस्से में या  रिक्त मन  में घुमड़ती असंतोष की अभिव्यक्ति के कारण ,जो अनुचित किया हो उसे भी क्षमा कर देना माँ ,,सोच लेना कि इतनी बुद्धि हममें विकसित नहीं हो पाई थी !
मन ही मन कहती है तरल - इस नाम और रूप की मूल निर्मिति तुम्हारी है .जीवन के प्रति जो दृष्टि विकसी है इसके मूल में भी कहीं तुम हो ! आज मैं जो हूँ तुम्हारी देन है .तुमसे भिन्न कर इसे देखना संभव नहीं .

 और मन की उद्विग्नता जब असहनीय हो उठती है तब अपने भीतर किसी को पुकारती है तरु ,कहती है -ओ मेरे अंतर्यामी ,जीवन का जो ज़हर मेरे हिस्से में आया है उसे पचाने की सामर्थ्य देना !तुमने जो दिया, मुझे स्वीकार , पर उसे अंत तक निभा सकूँ ऐसी  क्षमता भी तुम्हीं  प्रदान करते रहना !
*
विपिन की खोज-ख़बर लेती रहती है तरल .

उसके माता- पिता रिटायर हो गये, अपने गाँव में रहने चले गये हैं वे लोग.
इलाज  चल रहा है  . बिलकुल नॉर्मल नहीं हो पाया अभी तक .दाहिने हाथ की  सूजन बड़ी मुश्किल से कम हुई है ,अब भी किसी  मौसम में दर्द होने लगता है .सूजन भी बढ़ जाती है और  उठा नहीं पाता हाथ.कभी-कभी एकदम उत्तेजित हो जाता है . यहाँ के  वातावरण से दूर रहना ही उसके हित में है .
नहीं ,तरु नहीं जा सकती उसे देखने .
नहीं तो फिर वही सब घिर आयेगा उस पर ,उत्तेजना नुक्सानदेह हो जायेगी .कहीं फिर दिमाग़ पर वही सब चढ़ गया या अवसाद में लौट गया तो !
 नहीं   .चिट्ठी-पत्री करने की भी ज़रूरत नहीं ,असित का कहना है जिस स्थिति से निकालना है उससे बच कर रहना ही ठीक होगा .लिखने- पढ़ने से तो वही सब फिर उभर आयेगा .दिमाग़ पर और ज़ोर पड़ेगा .नहीं ,उसे वहीं रहने दो ,यहाँ क्या बचा है उसके लिये !इसी में उसका भला है .
 हाँ ,इसी में उसका भला है !
34.
दिन बड़े खाली-खाली से हो गये हैं  -बड़े उचाट से !
लगता है करने को कुछ नहीं ,एक बँधा हुआ  ढर्रा चलता जा रहा है .समय बीतता चला जा रहा  है.  .
चंचल एम.ए. में आ गई है.असित ने बड़े-बड़े मंसूबे पाल रखे हैं - मेरी बेटी ये बनेगी ,वो बनेगी .
तरु को हँसी आती है .पहले यह भी तो देख लो बेटी का झुकाव किस ओर है .
असित का कहना है अभी शादी की क्या जल्दी है ,उसे कुछ बन लेने दो
.तरु कुछ और सोच रही है .लड़की अपना केरियर बनाना चाहे तो इन्तज़ार किया जाय नहीं तो सही उम्र पर विवाह ठीक.जीवन के उल्लास और उमंगें उम्र के बढ़ने साथ ,  कभी-कभी दूध में उफान की तरह बैठने लगती हैं .सही उम्र से उसका मतलब है बीस से तेईस तक-लडकियों के मामले में .लव मैरिज पर उसका विश्वास नहीं.खास कर नई उम्र की लडकियाँ .जो दुनियादारी के अनुभव से बिल्कुल कोरी हों,इस मामले मे भावुकता  या कोरे आदर्शवाद से भर निर्णय ले लेती हैं फिर उम्र भर पछताती हैं .
 "आज की दुनिया बड़ी खराब है ." वह असित से कहती है ,"फिर हमारे सामने ही ,चंचल भी सेटल हो जाय तो निश्चिन्ती हो ."
 अन्दर वाले कमरे में चंचल  पढ रही है,बाहरवाले में असित और तरु हैं.उनकी बातों के कुछ अंश उसके कान तक आ जाते हैं .
असित ने आवाज देकर इनलैंड लाने को कहा .
'अच्छा तो कहीं चिट्ठी लिखी जा रही है '! कौतूहल से ,कुछ देर वहीं खडी रही .फिर लौट गई .

 चंचल की कुछ साथिनें ब्याह गईं ,कुछ  विभिन्न प्रतियोगिताओं की तैयारी, और कुछ निरुद्देश्य पढ़ रही हैं.
विवाह की बात उसके मन मे पुलक भर देती है .घर में अब यह चर्चा  होने लगी है .
 कान लगा कर बाहर की बातें सुनने की कोशिश करती है .एकाध शब्द के अलावा कोई कुछ बोल ही नहीं रहा .
वैसे तो पापा बार-बार मम्मी से  पूछते हैं 'क्या लिखें ?'और मम्मी बताती हैं. दोनों सलाह -मशविरा करते हैं  .आज इतने चुप कैसे हैं ?
उसे ताज्जुब हो रहा है .....हो सकता है मन्नो मौसी को लिख रहे हों. उनकी तबीयत खराब थी ,आपरेशन होना है .वे चाहती है हिन्दुस्तान से कोई कुछ महीनों के लिये उनके पास चला जाय .हाँ, मम्मी जा सकती हैं .पर वहाँ का इन्लैंड थोड़े ही लिखा जायेगा .
 उँह ,उसने सोचा अभी लिख कर रख देंगे तब देख लूँगी .चिट्ठी के मामले में पापा बडे आलसी हैं,एक तो उनकी चिट्ठी एक बार में पूरी होती नहीं और फिर दो-तीन दिन से पहले डाक में नहीं जाती .
 फिर भी उसका मन नहीं माना ,तो किताब उठाने बहाने फिर वहाँ जा घुसी .रैक पर किताबें खड़बड़ करती रही -शायद कुछ शब्दों को पकड़ कर मतलब समझ में आ जाय .
 कोई कुछ नहीं बोल रहा .किताबें उठाने में भला कतनी देर लगाई जा सकती है !फिर अन्दर आ गई पर उसके कान उधर ही लगे हैं .
 असित की आवाज  ,"देखो ठीक है ."
 "हाँ और क्या ?" कुछ देर में मम्मी की आवाज .
 अजीब बात है .घूमकर आये दोनों जने और चिट्ठी लिखने बैठ गये .ऐसी क्या जरूरी थी .वैसे तो मम्मी दस बार रटती हैं तब दो-चार दिन टाल-मटोल कर लिखते हैं
.---ऊँह होगा ,मुझे क्या ?
 पर किसी तरह चैन नहीं पड़ रहा , अन्दर सुगबुगाहट हो रही है  - लिखा किसे है ?क्या लिखा है ?कुछ मुझसे संबंधित है ?--कहाँ के लिये हो सकती है ?वह लाख सिर मारती है ,कुछ समझ नहीं आता .न बेकार कमरे में जाना ठीक लग रहा है ,न कुछ पूछना -चंचल परेशान है .
 एक बार सोचा पापा को आवाज़ देकर कहे बंबई चिट्ठी लिख रहे हों तो मैं भी लिखूँगी जीजा जी को .मन्नो मौसी की बेटी आज कल वहीं है न .पर कहने की हिम्मत नहीं पडी .डर लगा मम्मी टोक देंगी ,"पढ़ रही हो या इधर  ध्यान लगाये हो /"
 चंचल फिर पानी पीने निकली .असित अब चिट्ठी मोड़ रहे हैं .
 "पता तो लिखो तरु ने कहा ."
 हाँ ,वहीं  जा रही है -चंचल समझ गई .
 फिर तरु की आवाज आई ,"पीछे अपना पता भी पूरा लिख दो ."
 "रहने दो ,वे गेस करें ."
 अब रहा नहीं गया चंचल से. बाहरवाले कमरे में फिर आ गई ,"पापा ,कहाँ चिट्ठी लिखी ?"
बढ़ कर चिट्ठी उठा ली उसने  ,"अच्छा ,जीजा जी को लिखी है !लाइये हम अपना नाम लिख दें पीछे ."
 "नहीं,नहीं ,तुम अलग लिखना ." असित ने फौरन टोका .उन्होंने पीछे अपना पता भी लिख दिया ..
 तरु अखबार की गड्डी लिये ,किसी खास तारीख का ढूँढ रही है .असित बाथरूम चले गये .चंचल ने धीरे से चिट्ठी उठा ली और दूसरे कमरे में घुस गई .
 चलो... मोड़ी है अभी ,चिपकाई नहीं है !
क्या करे ?कमरा बन्द कर ले ?पर इस समय कमरा बन्द करने की क्या तुक ?मम्मी समझ गईं तो ! रक्खी रहने दो यहीं ,रात में अभी काफ़ी देर जग कर पढ़ाई करनी है,मौका लग ही जायेगा .
  'अरे, जब लिख ही ली है तो डाल क्यों नहीं आते. सुबह निकल जायेगी  ? " तरु की आवाज आई.
 असित चिट्ठी ढूँढ रहे हैं
 "अभी तो यहीं रखी थी ,कहाँ गई ?"
 तरु झुक कर पीछे दीवाल की तरफ़ झाँकती है ,मेज पर रखी किताबें ,पत्रिकायें पलटती है ..
 "तरु ,तुमने उठाई ?"
 "नहीं ,मैंने नहीं उठाई .तुम पता लिख रहे थे तभी से मै तो अखबारों में वह तुलसी के उपयोग वाला लेख खोज रही हूँ .पता नहीं किस दिनके पेपर में था .पिछले हफ्ते आया था शायद .."
 इधर -उधर ढूँढ- खखोर मच रही है. फिर असित ने आवाज लगाई ,"चंचल ,तुमने चिट्ठी उठाई ?"
 चंचल धक् से रह गई .-अब क्या करे ?
 वह फौरन चली आई .
 "नहीं ,हमने नहीं उठाई ."
 "तुम मालिनी की चिट्ठी के धोखे में तो नहीं ले गईं ?"
 मालिनी उसकी फ्रेंड का नाम है .
 "मालिनी की तो ये पड़ी है ."तरु ने एक इन्लैंड उठाकर आगे रख दिया .
 "हमने उठाई ही नहीं,हम क्या करते उस का ?"
 "फिर गई कहाँ ?"
 फिर सब ढूँढा गया.अखबार हटा कर दीवान पर पड़ी चादर फटकारी गई .
 "यहाँ से कहां जायेगी ?तुम्हीं कहीं रख कर भूल गये हो."

 "मैं तो सिर्फ़ बाथरूम गया था.वहाँ क्यों ले जाता?"
 'मैंने तो छुई भी नहीं.'-तरल का तर्क.
 मेज़ की बिताबें फिर  उल्टी-पल्टी गईं,अखबार झाड़-झाड़ कर देखे गये.फिर तरु उठ कर अन्दर के कमरे  में गई.
वहाँ अल्मारी मे रखी मिल गई चिट्ठी.
 "क्यों,चंचल,तुमने ले जा कर रखी?"
 हड़बड़ा गई वह ,"हमने नहीं रखी ,मम्मी,"

 "तो और किसने रक्खी? मैं तो यहाँ से उठ कर कहीं गई नहीं.पापा बाथरूम गये थे , बस ."
 "हमें नहीं पता ."
 चंचल को देख कर असित मुस्करा रहे हैं.
 'तुम्हीं ने रखी होगी चिट्ठी के तो पाँव लग नहीं गये कि उठ कर चली जाती ."
 खिसियाहट के मारे वह रुआँसी हो आई ,"हमने नहीं रखी .हम क्यों रखते ?"
 "तुम यहाँ से कुछ सामान ले गईं थीं ?"
 "हाँ ,सामान तो ठिकाने से रख दिया था ."
 "अच्छा " तरु ने कहा ,उसकी हँसी स्पष्ट नहीं है ,."और सब सामान पड़ा रह गया ,ये मालिनी की चिट्ठी , ग्रीटिंग कार्ड ,गिलास ,चम्मच ,हेल्मेट , रूमाल और तुम सिर्फ़ चिट्ठी ठिकाने से रख आईं ?"
 "वाह क्या बात है !"
 असित हो-हो करके हँस पडे .
 "बेकार में ही --"खिसियाई चंचल कमरे से बाहर निकल गई
**
35.
 गीता में जिसे ' जल मे कमल पत्र - वत् ' कहा गया है ,वह स्थिति क्या ऐसी ही होती होगी जैसी आज मेरे मन की हो गई है !
तरु सोचती है,जिसे सुख कहते हैं वह सब कुछ है मेरे पास ,पर मन उसमें डूबता नहीं .कुछ पाकर  खुशी से नाच नहीं अठता .सबसे अलग-थलग रह जाता है . क्या यही कहलाती है निर्लिप्त मनस्थिति ?
अरे नहीं , कैसे हो सकती है मेरी वह स्थिति ?वह तो वैराग्य से उत्पन्न ,निस्पृहता से पुष्ट परम शान्तिमय स्थिति है ,जहाँ सांसारिकता की ओर प्रवृत्ति ही नहीं होती .और मेरा घोर सांसारिक, माया -मोह से आच्छन्न मन ! जिससे मेरा कोई मतलब नहीं ,उससे भी कहीं न कहीं से जुड़ जाती हूँ !
 लेकिन फिर भी ,हमेशा नहीं ,पर कभी-कभी लगता है ये सारे सुख,ये सारे दुख निरर्थक हैं .इनकी भोक्ता होकर भी मैं इनसे अलग रह जाती हूँ ,असंपृक्त!.
वहाँ जहाँ मैं हूँ सिर्फ़ ,और कुछ नहीं  .सबसे अलग, निर्लिप्त .सुख- नहीं ,दुख नहीं ,राग नहीं ,द्वेष नहीं ,अपना नहीं, पराया नहीं .कैसी विलक्षण है वह अनुभूति जिसे व्यक्त नहीं कर पाती .वहाँ ये चीज़ें बहुत छोटी ,बहुत सतही रह जाती हैं.कैसी है वह अनुभूति जहाँ मै भोक्ता होकर भी साक्षी रह जाती हूँ .निन्दा-स्तुति ,उचित-अनुचित,पाप-पुण्य की सीमायें कहीं पीछे रह जाती हैं और मैं सबसे तटस्थ !
वह क्या है जो मुझे सबसे दूर कर देता है ?कोई प्रश्न जहाँ नहीं ,ऐसी स्थिति में मन कभी-कभी कैसे पहुँच जाता है !बस यही बोध शेष रहता है कि जो करना है वह करना है,उससे कहीं निस्तार नहीं .
- मन की जड़ता है क्या, या रिक्तता का बोध?
 पर अकेली कहाँ हूँ मैं ?हर जगह सब से जुड़ी. हुई .हर्ष -शोक ,हानि-लाभ सभी कुछ तो औरों से जुड़ा  है .फिर मेरा अपना है क्या ?

 गीली घास पर नंगे पाँव कब से चले जा  रही है .
.
विपिन के जाने के बाद तरु की अन्यमनस्कता और बढ़ गई है .
 उम्र का कितना रास्ता पार कर आई केशों मे झलकती सफ़ेदी और आँखों से बारीक चीजों का न दिखाई देना. चश्मा जरूरी होता जा रहा है .
 पर क्या उम्र को सिर्फ वर्षों से ही मापा जा सकता है अनुभवों से नहीं ?
 अपने विगत पर विचार करती है तो लगता है यह जीवन निष्फलताओं का दस्तावेज़ है .जो करना चाहा कभी न हो सका .संभव है इसीलिये इतनी रिक्तता भर गई है .
 वह मन ही मन कहती है ,'मैं तुम्हारी आभारी हूँ असित ,कि तुमने मुझे प्यार किया ,मेरा साथ दिया ,कितनी बार ,'कैसे तर हैं  तुम्हारे बाल,जिस करवट लेटती हो उधर के !कितना पसीना ..इतनी गर्मी तो नहीं है,'  कहते हुये,नीम अँधेरे में अपने से सटा कर 'तुमने मेरे आँसुओँ का गीलापन पोंछा है.

पर मैं तुम्हारे साथ अभिन्न कहाँ हो सकी . मुझे क्षमा करना .मैं निरुपाय हूँ .मैंने जो किया उसका परिणाम मुझे ही भोगना है .उसके बिना मेरा निस्तार नहीं .वहाँ मैं बिल्कुल अकेली हूँ .तुम भी मेरे साथ नहीं  .मैं विवश हूँ इन विषमताओँ को झेलने के लिये .जिस अन्याय में मेरा साझा है उसका दण्ड मुझे ही भोगना है -अकेले ,तुमसे अलग . अपने ही ताप से दग्ध  .मेरी समझ में नहीं आता ,मुझसे जो हुआ ,उसका निराकरण किस प्रकार करूँ !
 मैं क्या थी ,क्या हूँ,और क्या हो जाऊँगी .मुझे खुद पता नहीं .जीवन की कटुताओँ का तीखापन जिसमें समा गया है,वह तरु . .,कितने-कितने अभिशाप जिसके पल्ले में बँधे हैं वह तरु ,सब कुछ पाकर भी जो  मन से वंचित रह गई है .निरर्थक  जीवन जीनेवाली तरु !

कभी-कभी कितनी ऊब लगती है.इच्छा होती है चली जाय कहीं जहाँ यहाँ का कोई न हो .न विपिन न असित, न नाते-रिश्ते ,और कोई स्मृति नहीं .कोरा हो जाय मन बिलकुल - कुछ दिनों को ही सही!
..कहीं अजाने देश की धरती पर ,अनजाने लोगों के बीच जहाँ न कोई अपना हो ,न पराया .एक नई यात्रा की शुरुआत करने .
पर वहाँ भी आज तक के जीवन को नकारा जा सकेगा क्या ?आज तक के संबंधों की अब तक की स्थितियों की जो परिणतियाँ , और  परिष्कृतियाँ  मेरे निजत्व में समाहित हो गई है ,उनसे छुटकारा हो सकेगा क्या ?

 तरु को लगता है वह बहुत थक गई है, अब रुक कर आराम करना चाहती है .
 कैसी विडंबना है ,वह जो जानती है उसे सिर्फ वही जानती है ,दूसरा कोई नहीं ,जान सकता भी नहीं .
        और लोग भी कैसी-कैसी धारणायें बना लेते  हैं .पर किसी का क्या दोष !    जल की सतह पर जो होता है वही तो दिखाई देता है सबको . डूबनेवाला ही जानता है अस्लियत तो.

.
 असित के दोस्त उससे कहते हैं ,"यार ,तुम लकी हो ."
घर -बाहर हर जगह निभाव कर लेती है ,तमाम बातों में दखल दे लेती है .उनकी समस्याओं को सुन कर सहानुभूति-सुझाव भी .लोगों को लगता है बौद्धिकता में उनसे  पीछे नहीं है .सिर्फ़ घर की औरत न होकर उसके सिवा भी बहुत कुछ है.

उनकी पत्नियां समझती हैं कि उसने जीवन मे बहुत सफलतायें पाईँ हैं.सफलता के भी सबके अपने-अपने माप-दण्ड.कोई किसी को नहीं समझ सकता.हँसी आती है कभी-कभी. .
"देखो ,तरु दीदी कैसे करती हैं." "तरु भाभी आप ग्रेट हैं ." " भई , हम आपकी तरह नहीं कर पाते "  ईर्ष्या की पात्र तरु !
 वह सुनती है और चुप रहती है .मन ही मन कहती है 'मेरी तरह कोई न हो इस दुनिया में .इतना अशान्त और उद्विग्न मन लेकर किसी को न जीना  पड़े !'
 इस प्रशंसा की ,असित जैसा पति और भरे-पुरे घर की स्वामिनी होने की सार्थकता उसके लिये क्या है ?और जिसे लोग उसकी कुशलता और सफलता रहते है ,उसे कहाँ तक लादे रहे - जब मन कहीं टिकता नहीं ,कुछ स्वीकारता नहीं,निर्लिप्त भटकता है ?
अब सहन शक्ति जवाब देने लगी है ,वह इस ज़िद्दी मन से भी छुटकारा पाना चाहती है,जो स्थितियों से पटरी बैठा लेना नहीं जानता ,जो किसी प्रकार चैन लेने नहीं देता .इस दारुण मन्थन से,चेतनायें श्रमित और,लड़ने की सामर्थ्य क्षीण हो चली है .मन ही मन कहती है ,'असित ,तुमसे जुड कर मैंने इस ज़िन्दगी को जिया कहाँ, बेगार सी टाली है .
यह उद्विग्नता और अशान्ति जब असह्य हो उठती है,तनी हुई शिरायें जब चटक कर टूट जाना चाहती हैं,तब उसके भीतर कोई जागता है ..उसे साधनेवाला ,चरम निराशा से उबारनेवाला .उन विषम क्षणों में संतप्त मन को चेताता है ,पूछता है ,'बस ,इतने में घबरा गईं?इसी बल-बूते पर संसार की अथाह वेदना को मापने का दम भरा था ?"
'नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं  ,' वह अपने आप से कहती है , 'दुख तो मैने स्वयं माँगे थे ,और जैसा मेरा स्वभाव है शान्ति मुझे मिलेगी नहीं ,'

और मन की विश्रान्ति कुछ शान्त होने  होने लगती है .

तरु जब चलती है तो एक खूब चमकीला तारा उसके साथ-साथ चलता है .उसकी दृष्टि आकाश की ओर उठी .आज वह सितारा कहाँ चला गया ?वह सारे आकाश में खोजती है .घने पेडों की आड मे कभी-कभी वह छिप जाता है ,परउसकी झिलमिलाहट हिलते पत्तों की सँध से झलक ही जाती है .आज कोहरा है ,या इतनी देर हो गई है कि वह सितारा डूब गया है .
*


(क्रमशः)


बुधवार, 7 सितंबर 2011

एक थी तरु - 32. & 33.


32

विपिन के माता-पिता आ गये हैं .उसे साथ लेकर जायेंगे .स्थान परिवर्तन से उसके मानसिक संतुलन पर अनुकूल प्रभाव होने की संभावना है .डॉक्टरों ने आवश्यक हिदायतों के साथ अस्पताल से छुट्टी देने की अनुमति दे दी है .
 "अच्छा है ,यहाँ से चला जाय .यहाँ उसकी जान को खतरा है ,"असित ने कहा ,"फिर माँ-बाप की बात ही और होती है .उसका यहाँ से जाना ही ठीक है ."
शाम की गाड़ी से रिज़र्वेशन हो गया है उनका ..
 असित और तरु अलग से जा रहे हैं विपिन को सी-ऑफ करने .
कहने-सुनने को है ही क्या ?विपिन को शान्त रखना है .,उत्तेजना से बचाना है .सब चुप-चुप से .
वह  बहुत शिथिल - जो कहो चुपचाप  कर लेता है .भान नहीं है शायद कि क्या हो रहा है-दवाओं के असर में . .
पानी ,फल ,बिस्किट सब सँभलवा रही है तरु .
'भाभी ,संकोच मत करना कभी भी कुछ ज़रूरत पड़े तो .

असित बाहर विपिन के पिता से कुछ चर्चा कर रहे हैं ....'
'हाँ ,आप ही लोग तो हैं .दवायें वगैरा यहीं से मँगानी पडेंगी वहाँ  छोटे शहर में .. पता नहीं ....'
'उसकी चिन्ता मत कीजिये हम तो चाहते थे यहीं रहते पर..'
'अब यहाँ रहने का तो सोच भी नहीं सकते ...बस किसी तरह ठीक हो जाये .हमारे बुढ़ापे का एक ही तो सहारा..'
आँखें भर आई हैं .
'ठीक हो जायेगा .थोड़ा समय लगेगा .पर मझे विश्वास है .'
'बस ,भगवान से यही मनाना.'
ट्रेन ने सीटी दे दी .
तरु खड़ी हो गई  ,चलते-चलते विपिन को देखा .एकदम चुपचाप -शिथिल  .
अंतर से हूक सी उठी .
वह नीचे उतर गई .
विपिन के पापा आ गये थे .
गाड़ी चल दी . .
तरु खड़ी-खड़ी एक के बाद एक डब्बों का निकलना देखती रही .साथ में असित .
'अब चलो तरु .'

बिना कुछ कहे-सुने ,रिक्शा कर बैठ गये दोनों .

 असित कोई बात कह रहे हैं .
तरु कभी हाँ-हूँ करती है कभी सिर हिला देती है .उसके दिमाग तक कुछ नहीं पहुँच रहा .असित के उत्तर की अपेक्षा करने पर 'और क्या ' 'अच्छा ' बिना सोचे-समझे बोल देती है .असित इशारा कर कुछ दिखाते हैं उस दिशा में देख भर लेती है ,और सिर हिला देती है .
 किसी बात के उत्तर के लिये असित ने उसकी ओर देखा .
 "क्या कहा तुमने ,मैं सुन नहीं पाई ."
 असित फिर कुछ कह रहे हैं ,वह मन-ही-मन  खीझ रही है - ये आखिर इतना बोलते क्यों हैं  ?
और बोलते भी हैं तो उत्तर की अपेक्षा क्यों करते हैं ?

**33.
चंचल बेटा ,एक गिलास पानी तो पिलाना "
पानी टपकाता गिलास लाकर उसने पकड़ा दिया .
असित ने अख़बार से सिर उठाये बिना पी कर वहीं मेज़ पर रखी चंचल की किताब पर रक दिया.और वहीं पड़ा फ़ुटा जो गिलास रखते समय उनके हाथ से टकराया उठा लिया और और उँगलियों में फँसा कर नचाने लगे .
'पापा,गिलास हमारी किताबपर मत रखिये ,कवर खराब हो जायेगा.'
वे फ़ुटा नचाते अखबार पढ़े जा रहे हैं .चंचल की आवाज़ उनके कानों तक नहीं पहुँची.
,उधऱ आई हुई तरु ने सुनी ,चंचल से बोली,'तुम्हीं उठा कर नीचे रख दो .'
फिर खुद ही उठाया और रखने नीचे झुकी.
नाचता हुआ फ़ुटा सिर से टकराया .तरु ने सिर उठा कर असित की ओर देका ,'ये क्या..?'
तभी असित का ध्यान अख़बार से हटा ,समझे क्या हुआ नोले ,'ईश्वर ग़लती का नतीजा हाथों-हाथ देता है ,देखा तुमने ?.'चंचल हँसी ,'मम्मी ने क्या ग़लती की थी ?'
'ज़रूर की होगी ,नहीं तो फ़ुटा क्यों लगता ?'
'अच्छा तो अब तुम्हें फल मिलता है ..' कहते हुये तरु ने मेज़ पर पड़े कागज़ को गुड़ी-मुड़ी कर गोला बनाया और तान कर असित पर फ़ेंका .
असित ने हाथ से झटका वह चंचल पर जा गिरा .'असली ग़लती तो तुम्हारी थी .'
गोला उसके गाल से टकराया ता ,वह सहला रही थी .तरु ने सहानुभूति प्रकट की 'मुझ पर बस नहीं चला तो उसे छेड़ने लगे धोबी पर बसनहीं चले  तो गधइया के कान उमेठे.'
इसी बीच असितने फिर गोला चंचल पर उछाला
बह बचती हुई घूम कर बोली,'हमें गधइया कहा !'
असित ने ठहाका लगाया और उसे चढ़ाया,'देख लो !और मम्मी-मम्मी कह कर उनसे चिपको जा कर.'
तरु हँस पड़ी,'तुम जित्ता चाहे चढ़ाओं वह भड़कनेवाली नहीं.'ॉ
चंचल समझ नहीं पा रही ,गधइया की बात पर मुँह चढाये या मजाकर माँ से चिपक जाये ?'
*

(क्रमशः)

बुधवार, 31 अगस्त 2011

पुकार .


*
लगभग दो वर्ष बाद भारत लौट रही हूँ ,सानफ़्रान्सिस्को एयरपोर्ट से दो दिन के उबाऊ सफ़र के बाद नई दिल्ली आ कर देश की धरती का परस मिला .
परिचित चेहरे -परिचय कोई नहीं पर भारतीय रंग-ढंग में रँगे लोग नये नहीं लग रहे . .एयरपोर्ट की व्यवस्था बहुत अच्छी हो गई है . अप्रैल बीत रही है ,उतनी गर्मी नहीं लग रही इस बार जैसी हमेशा लगा करती थी .वैसे मौसमों का ढर्रा हर जगह बदल रहा है .सामान उठवाने में लोग आगे बढ़ आते हैं .
रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ है पर पहले जितना नहीं .
वही चिर-परिचित वनस्पतियाँ . सुनहरे झूमरों से लदा इठलाता आरग्वध(अमलतास)आँखें जुड़ा गईं .
गुलमोहर  लाल-लाल हँसी बिखेरते जहाँ-तहाँ खड़े हैं .सड़क के किनारे वही पेड़-पौधे -आक ,धतूरा ,अरंड.शीशम और बबूल ,ऊँचे घने पाकड़ ,जिन पर झूला बहुत सजता है  ..पीपल के चंचल पत्ते और गंभीर खड़े नीम ,और किनारे की घास भी तो. इन्हें देखने को आँखें तरस गईँ थीं.
सब के नाम नहीं मालूम, जैसे आस-पास रहनेवाले बहुत लोगों से देखा-देखी का परिचय है - नाम जाने बिना.  इन सबको खूब पहचानती हूँ  कुछ के नाम भी मालूम हैं ,याद नहीं आ रहे.  मन पुलक उठा .

वहाँ बहुत सुन्दर वनस्पतियाँ थीं सब-कुछ स्वच्छ सुनियोजित .,लेकिन इनका मेरा जन्म का साथ है -लगाव है,इनके साथ पली बढ़ी हूँ .. मन करता है इनके पास चली जाऊँ .बचकानी-सी इच्छा जागती है नन्हीं-नन्हीं शाखें जो कँप रही हैं -रोमांचित-सी.   जा कर हाथों से छू लूँ .
हवा के झोंके बार-बार गंध-भरे संदेश ले कर आ रहे हैं तुलसी की सुवास ,बेला की मदिर गंध इधऱ के घरों के आंगन ,अब आँगन कहाँ ,लान से चुरा कर ले आये होंगे  .  .
हरियाली दिख रही है  चारों ओर .
डर रही थी ,धूल की पर्त ओढ़े सूखे पेड़ इधर-उधर  खड़े होंगे .वैसा कुछ नहीं .हर जगह हर-भरे पल्लव- कर हिलाती डालें  लहरा रहे हैं .अच्छा लग रहा है इन हवाओं का परस,इन राहों का दरस .बहुत दिनों के छूटे अपनों से मिलने को मन उमग रहा है
दो दिन बाद है हरिद्वार का आरक्षण - परम आत्मीय गंगा का सान्निध्य और हिमालय की छाँह पाने  हेतु .अभी नहीं गई तो सांसारिक प्रतिबद्धताओँ में टलता चला जायेगा जाने कब तक .
अभी उधर मौसम भी अच्छा होगा . बौरों से लदे आम या नन्हीं-नन्हीं अमियाँ .  गंगा की जलधार में उत्तरी हिमानियों का स्वच्छ-शीतल जल , मार्ग में पड़ती गिरि की  नेह-धाराओँ से मिलता बहा आ रहा होगा .
शीघ्र ही वर्षा ऋतु आकाश छा लेगी .ग्रीष्म के ताप से विकल वृक्ष  पर्ण- आच्छादन उतार मुक्त स्नान करेंगे ,शाखायें हिल-हिल कर जल बिखेरेंगी.पर्वतों की रुक्ष हुई देह  सिक्त  करती धारायें बह निकलेंगी  . गंगा रजस्वला हो रहेंगी ,तीन महीने तक .उससे पहले ही देव-दर्शन का सौभाग्य पा लूँ .

देवतात्मा हिमालय की दुर्निवार पुकार ,कैसे अनसुनी करूँ . जाना तो वहीं होगा - बारंबार !
**

बुधवार, 24 अगस्त 2011

एक थी तरु - 30. & 31.



30.
तरल का मन विवाह के कार्यों से बार-बार उखड़ जाता है .
एक डर सा बैठ गया  मन में .
बार-बार विपिन का ध्यान आता है .
एक हफ़्ता हो गया कोई खबर नहीं .
आई थी तब स्थितियाँ अच्छी नहीं थी .
बस बुरी-बुरी बातें ध्यान में आती हैं .
अख़बारों में ,कहानियों में जाने कितने ऐसे किस्से पढ़े हैं .ये साधन-संपन्न लोग अपने मतलब के लिये कुछ भी कर गुज़रते हैं -इन्सान का कोई मोल नहीं इनके लिये .फिर विपिन तो अकेला है ,साधनहीन !
 और लवलीन ?सुकुमार सी युवती ,जिसने अभी दुनिया का क्या  देखा ?पाँचवाँ महीना चढ़ चुका होगा,जरा-जरा बात में घबराने लगती है  .
कौन है वहाँ देखनेवाला ?
मायकेवाले उदासीन  ,कहते हैं अपने मन से शादी की है अब तुम जानो .जैसा है अपने आप भुगतो . ससुराल में करने वाला है ही कौन -सास-ससुर और दो ब्याही बहने !भाई को अपनी गृहस्थी से छुट्टी नहीं .
सोच कर  जी उचाट होने लगता है.
अखबार  भी नहीं देख पाती इन दिनों -बाहर ही बाहर आदमियों के पढ़ते  दोपहर होते-होते ,इधऱ़-उधऱ हो जाता है .वैसे ही चीख-पुकार मची रहती है ,बैठ कर इत्मीनान से पढ़े कोई मौका नहीं .
उस दिन  की बात ध्यान आते ही व्याकुल हो उठती है .
किसी लड़की को दरिन्दों ने रौंद डाला ?
.काँप उठती  है तरु -
किसकी बात है ? चुनिया?
 हाँ, विपिन ने ही तो बताया था .
बार-बार  लवलीन का चेहरा आँखों के आगे आ जाता है.

फिर समझाती है अपने को -नहीं, वह नहीं हो सकती .
ये तो रोज़ की खबरें हैं ,जाने कितनी बार ...जाने कितनी स्त्रियाँ .
.बस आगे नहीं सोच पाती..नहीं नहीं ,लवलीन तो किसी के तीन-पाँच में नहीं .उससे क्या मतलब किसी को ?
नहीं ,वह नहीं , यह बिलकुल नहीं हो सकता  ?

डर तो विपिन के लिये है .उसी के पीछे पड़े हैं लोग.
 अब  नहीं रुक पा रही  यहाँ .
निपट जाय शादी औऱ चलें अपने घर .
पर अभी तो दो दिन बाकी हैं .

हे भगवान ,ठीक रखना विपिन को !
*
घर में शादी का माहौल .और दन्नू जैसा कैरेक्टर सामने .कुछ शग़ल तो चाहिये ही ,
होने लगीं चर्चायें .
और सुनो एक किस्सा - सुनाने में राहुल निपुण है ,शुरू हो गया जैसे सामने घट रहा हो .

 तो हुआ ये -
'मामा आये, मामा आये .'
बच्चे चिल्लातेहुये सुशीला के पास भागे .
'कौन मामा ?'
दन्नू मामा ,तुम्हारेवाले .'
आकर देखा दन्नू खड़े सास से बातें कर रहे हैं .
- न बक्सा न बिस्तर,खाली हाथ -.कड़कड़ाते ,ठिठुरते हुये
भरे जाड़े में शरीर पर कोई ऊनी कपड़ा  नहीं .

सास ने सुशीला को आवाज़ लगा कर कहा ,'बिचारे का बकसा चुर गया .उसी में सारा सामान धरा हता .'
मज़ा आ रहा  है सबको .राहुल चालू है -
बड़े विस्तार से दन्नू ने बताया बस ज़रा-सा उठ कर गुसलखाने गये थे ,लौट कर आये देखा बक्सा गायब .
उसके ऊपर धरा हुआ पूरी बाँह का स्वेटर और कोट भी गायब!सबसे पूछा-ताछा ,हल्ला मचाया भाग -दौड़ की सब बेकार !
इसके पास कोट था कहाँ - सुशीला सशंकित नेत्रों से देख रही है .
'अब उसे स्वेटर लाय के देओ,दुलहिन, मार जड़ाया जाय रहा है लरिका .'

सुशीला ने पति का स्वेटर ला कर पकड़ा दिया पहन लिया दन्नू ने .
श्रोता पूरा मज़ा ले रहे हैं.
'ज़रा रुको,राहुल, हम बस एक मिनट में आये '
..श्यामा के दूल्हा ने अल्प-विराम लगवा दिया .

लौटे वे ,फिर कहानी शुरू हुई -
जिठानी का भी तो भाई लगा -उनने आकर सिर पर हाथ फेरा,'कहाँ जाय रहे थे भइया ?'
दन्नू बैठ के रोने लगे .'अरे जिज्जी ,हम तो सरम के मारे मरे जाय रहे हैंगे .जेब न कट जाय इस लै सारे रुपये संदूक में धर दिये थे .अब एक नोट भर बचा है .बच्चन के लै मिठाई तक न लाय पाये .'
उन्होंने जेब उलटी , एक दस का नोट निकाल कर दिखा दिया .

घर के लोग इकट्ठे होकर 'चच् चच्'करने लगे
 .
दन्नू फिर शुरू हुये ,'हमारे जो बड़के भैया हैं उन्हई के दोस्त ने मुरादनगर की मिल में नौकरी लगवाय दी थी...समझ में नहीं आता अब का करें ..
एक मन करता है घर लौट जायँ .'
 मज़ा आ रहा है सबको-समझ रहे हैं दन्नू कौशल
सुशीला की सास ने दिलासा दिया ,'अपसोच न करो बेटा ,कभी-कभी अइसा भी हुइ जाता है .जो तुम्हें चाहिये यहाँ से लै जाओ ,बहिनी का घर सो अपना घर .'
सास ने कह-सुन  कर  कोट दिलवाया ,अटैची और कुछ कपड़े भी निकाले .बिस्तरा  बँधवा दिया सो अलग !-रुपये तो पास में कुछ होने ही चाहियें ,'नई जगह में क्या करेगा बेचारा ,मुसीबत का मारा .'
जिठानी ने भी कहा ,'अऊर का ! सब वापस कर देगा .बहिनी का कौन रखता है !फिर उसकी तो नौकरी लग गई है .मुसीबत में साथ हमीं लोग तो देंगे .'
हफ़्ते भर बाद शुक्लाइन की लिखाई चिट्ठी आई कि दन्नू आठ-दस दिन से लापता हैं .फिर ख़बर मिली कि खाली हाथ घर पहुँच गये हैं .
  अब तो  जिसे देखो दन्नू का बखान कर सुशीला को छेड़ रहा है , अरे अम्माँ ,उनका एक टिपिन काहे नाहीं दै दिया !'
'दादी को सबसे जियादा तरस आय रहा था ,और सौ का नोट पकड़ाय देतीं मामा को ?'
सुशीला के लिये मुँह छिपाने की जगह नहीं .
दूल्हा ने अकेले में चुटकी ली ,'काहे ,तुमने अपने भैया का जस पहले नहीं बताया .हमारी जेब से सौ का नोट कहाँ ग़ायब हुआ था ,अब समझ में आय रहा है .'
रो-रो आती है .बोले क्या बिचारी !
किसी ने रिमार्क कसा ,'कैसा राढ़ा है ,इत्ता पिटता है फिर भी..'

राहुल  ने  छौंक लगाई -जित्ता पिटता है  उत्ता और मज़बूत होता जाता है .
सब हँस पड़े ..
वाह ,आनन्द आ गया .

'अरे चलो रे ,सब लोग !वहाँ मंडप गाड़ा जा रहा है .'
अब पड़ेंगे हल्दी के छापे !
*
गाने होंगे आज सारी रात .
तैयार हो रहे हैं सब.
चंचल में बड़ा उत्साह है .पहली बार मौका मिला है उसे  घर की शादी में शामिल होने का .

लंबी हो गई है -पतली-सी, प्यारी सी !

'काहे दुलहिन 'माँ जी ने तरु से पूछा,'पजारूी धोतिन के जोड़ा कहाँ धरे हैं /'
'अरे ,'तरु के मुँह से निकला ,'वो पैकेट तो वहीं भूल आई ,उस कमरे में .'
हाय राम. दन्नू के हाथ तो नहीं पड़ गये !
जाकर देखा जस के तस रखे थे .
दन्नू हैं कहाँ ,दो दिन से ग़ायब हैं वो तो !

चंचल को  भी  सजने का शौक है.हर चीज़ चाहिये उसे .दौड़-भाग लगाये है

' मम्मी ,हमारी काजल की डिब्बी तुमने कहाँ रख दी ?'
'मैनें काहे को रक्खी ,मैं क्या लगाती हूँ काजल?तुम्हीं ने कहीं डाली होगी .'
मम्मी की बनारसी साड़ी हाथ में लिये निकल आई है .
'उफ़्फोह ,अब मेरी साड़ी नहीं बचेगी चंचल.तुमसे सम्हलेगी नहीं ,लँहगा क्यों नहीं पहन लेती ?'
'हाँ ,हर जगह वही लँहगा लटका कर चल दें !'
 हवा के झोंके की तरह निकल गई वह .
*
कुछ देर बाद ,श्यामा और तरु बच्चों के साथ बाहर निकलीं .
तरु की निगाहें चंचल और साड़ी पर लगी हैं .,'अरे चंचल,ज़रा ऊँची करो ,..और पल्ला इतना लंबा झाड़ू लगाता चल रहा है .'
'वो इधर खिंच आया होगा ,हमने तो छोटा लिया था मम्मी.'
'ज़रा ढंग से चलो वो उधर से लिथड़ रही है .'
'मम्मी ,तुम तो सबके सामने टोके जा रही हो !'
'सात सौ की मेरी नई बनारसी ,तुम लथेड़ रही हो और मैं टोकूँ भी नहीं ?अभी सैंडिल में उलझ गई तो ज़री नुचने लगेगी .'
चंचल साड़ी सम्हालती आगे लड़कियों में भाग गई .
अब मम्मी के सामने ही नहीं पड़ेगी .

*
उसकी की रंग-बिरंगी, बोलती चमकीली तस्वीरोंवाली किताबें सबके आकर्षण की केन्द्र हैं ,मन्नो ने अमेरिका से चंचल के लिये भेजी हैं .
श्यामा के बच्चे बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं .

दन्नू ने पीछे से आकर झाँका बोले ,'जे का है ?जे तो बहुत बढ़िया किसम की चीज है .'
'हमारी मौसी ने सात समुंदर पार से हमारे लिये भेजी है ,' चंचल ने रौबदार आवाज़ में कहा ,पता है कहाँ है कनाडा ? हवाई जहाज़ से जाओ तो तीसरे दिन पहुँचते हैं .'
'जे तो बहुत काश्टली हुइ हैं.'
एक किताब हाथ में उठा ली दन्नू ने ,उलट-पलट कर देखने लगे .बच्चे एक दूसरे को देखने-दिखाने में लगे हैं
उन्होंने धीरे से कमीज़ के नीचे छिपाने की कोशिश की
'ये क्या कर रहे हो दन्नू मामा ?'श्यामा की लड़की चिल्लाई.
'' अरे ,कुछू नाहीं जरा खुजलाय रहे थे ...' किताब हाथ में पकड़े रहे,' जे वाली हम लै जाय रहे हैं पढ़ के वापस दै जइहैं ,तुम्हारे पास तो इत्ती सारी हैं .'
वे ले कर चलने लगे ,
'नहीं हमारी किताबें यहीं रक्खो, तुम्हें अंग्रेजी पढ़ना आता भी है ' ,चंचल झपटी ,' तुम ले जा कर बेच आओगे .'
बच्चों को बता दिया गया है दन्नू चोट्टे हैं ,उनसे सावधान रहें .
अनसुनी करते हुये वे तेज़ी से चले जा रहे हैं ,चंचल ने पास पड़ी खुरपी उठा ली ,और दन्नू पर तानती हुई पीछे दौड़ी ,'देखो, हमारी किताबें उठाये लिये जा रहा है ..'
उसने किताब वहीं फेंकी और तेज़ी से निकल गया .
अपनी किताब पोंछती -सहलाती ,चंचल बुआ के बच्चों को बताने लगी ,'ये दन्नू बड़ा चोर है .घर का सामान बेच देता है और खूब पिटता है .'
अंदर से आवाज आई ,'अरे तुम लोग तैयार हो जाओ ,बुलावा शुरू होनेवाला है .

'लाओ,किताबें अल्मारी में रख दें ,दन्नू के हाथ पड़ गईं तो समझो गईं .'
*
31.

.इतनी सहन शक्ति कहाँ से आ जाती है इन्सान में ?
तरु बहुत छोटी थी,तब याद करती थी-सी.ए.एन. कैन ,कैन माने सकना .
उसकी समझ में नहीं आता था 'सकना ' क्या होता है .
तरु और उसी के बराबर का  - मोहन,पड़ोस के पोस्ट-मास्टर का बेटा .दोनो बैठे मीनिंग रट रहे हैं .रटते-रटते तरु चुप हो गई .
"याद करो तरु ,नहीं तो डाँट पड़ेगी ."
फिर वे शुरू हो जाते हैं -सी.ए.एन. कैन,कैन माने सकना .
"मोहन ,ये सकना क्या होता है ?"
"ये तो हमें भी नहीं मालूम ."
मैन ,रैट,कैट ,फैट सब समझ मे आते हैं ,पर कैन का सकना क्या होता है ,दोंनो मे से किसी को नहीं मालूम .बस रटे जा रहे हैं
'सकना ' क्या होता है ,यह जानने की उम्र तब उनकी थी भी नहीं .
बड़ा होकर इन्सान जब घबराता है ,सोचता है नहीं ,नहीं कर सकता .तब कोई अदृष्ट व्यंग्य से हँस पडता है
,'नहीं सकता क्या ,यही करना होगा !'
और तब सकना का अर्थ समझ में आने लगता है .

विपिन के बारे में सोच कर वह दहल उठती है .
यह क्या हो गया ,जिसकी कल्पना भी नहीं की थी !
लिली ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?वह बेचारी तो क्या चल रहा है यह भी नहीं जानती थी.

*

विपिन के भीतर प्रचण्ड दावाग्नि धधक उठी है .
लवलीन का ध्यान आता है तो  पागल सा हो उठता है .
रात-रात भर चक्कर काटता है,बाल नोचता है ,सिर पटकता है ,चिल्लाता है ,"उसने क्या बिगाड़ा था उनका ?उसने क्या किया था ?
पहले ही घबराती थी .वह इस सब के बीच में थी ही कहाँ ?
फिर रोने लगता है बुदबुदाने लगता है ,"--क्या-क्या अत्याचार किये होंगे तुझ पर ?--सिर्फ मेरी वजह से --मुझे एक बार बतला दे लिली ---मैं एक-एक से बदला लूँगा . तड़पा-तड़पा कर मारूँगा .---एक बार बता जा लिली ,बस एक बार --."
पर उसकी लिली कहाँ है इस दुनिया में ?
विपिन के सिर पर वार कर ,वे लोग लिली को उठा ले गये थे .उसके बाद वह नहीं मिली .दो दिन बाद नहर के किनारे उसकी लाश मिली -नग्न ,वीभत्स !
बदला किस-किस से लोगे विपिन ,यहाँ तो सारी व्यवस्था एक सी है  ?
तरु के मन में प्रश्न ही प्रश्न चीख़ते हैं .
वह हर बार धीरज देना चाहती है ,पर वह कुछ नहीं समझता .
लोग आते हैं पूछते हैं -वह लाल आँखें किये देखता रहता है .
तरु अपने घर ले आई उसे .यत्नपूर्वक रखा ,पर मौका पाते ही विपिन ग़ायब हो गया .
असित दौड-धूप कर रहे हैं ,तरल बहुत उद्विग्न है सब जगह हल्ला मचा है .
पत्रकार हर तरफ विरोध कर रहे हैं ,अखबारों मे अपीलों पर अपीलें निकल रही हैं प्रदर्शन हो रहे हैं ,पुलिस दौड़ रही है ,और सरकार निष्पक्ष पूरी जाँच का आश्वासन दे रही है .
 पर कुछ होगा क्या ?
हल्ला मचानेवाले कुछ कर पायेंगे ?
एक और घर बनते-बनते बिग़ड गया .लवलीन मार डाली गई .विपिन विक्षिप्त सा घूम रहा है .
दोष किसका है ?
अतीत की स्मृतियाँ तरु को बहा ले गईं .विपिन को भूली कभी नहीं थी .पर आज उसके लिये मन में सोया मोह उमड़ पडा है.
*
बुआ कहता था विपिन !
कितना अपनापन पाया था -कितनी सहज सहानुभूति और निश्छल प्रेम  ! कितना विश्वास करता था ,कितना महत्व देता था मुँह से निकली एक-एक बात को ! तरु को लग रहा है -मैंने ही उसे झोंक दिया जलते अंगारों में.

क्या ज़रूरत थी  आदर्शवाद  की पट्टी पढ़ाने की ?
और वह भी जब यह पता हो कि उसे इस घोर भ्रष्टता के संजाल में जीना है ?पैने नखों और विषैले दाँतों वाले पशुओं के बीच  एक अकेला आदमी कैसे जी पायेगा अपने सिद्धान्तों को ले कर ?
उसके विश्वास का क्या प्रतिफल दिया मैंने ?
वह और उसकी लिली .एक दूसरे के अनुरूप ,एक दूसरे के पूरक .कितना शान्त ,संतुष्ट जीवन जी रहे थे ! तरु को सब याद आ रहा है -
उसने विपिन से कहा था ,"तुम पत्रकार हो .तुम अनुचित को संकेतित नहीं करोगे ,अन्याय के विरोध में खड़े नहीं होगे ,तो और कौन होगा ?  इस महाभारत के संजय हो तुम ! निष्पक्ष ,निर्द्वंद्व, सत्यान्वेशी . पत्रकार बन कर  वरदान मिला है तुम्हें , सजग दृष्टा और समर के साक्षी होने का .अपना कर्तव्य करो विपिन .बड़ा दायित्व है तुम्हारे ऊपर !"
"पर ,बुआजी ,सब एक से हैं .हम कुछ करेंगे ,तो हमारा ही पत्ता काट देंगे .."
"नहीं विपिन ,सत्य और न्याय का मूल्य कभी कम नहीं होता .आज के युग में तो और भी नहीं ,क्यों कि ,ये इतने दुर्लभ हैं .ये छोटे-छोटे टुटपुँजिये लोग उन्हें अपने अधिकार मेंकर लें ,और समाज का सबसे जाग्रत  वर्ग ,तुम पत्रकार लोग ,चुप बैठे देखते रहो तो देश का क्या बनेगा ?मैनें तो ऐसे पत्रकार देखे हैं ,जो जान जोखिम में डाल कर झूठ का पर्दा फाश करते हैं .वही सच्ची पत्रकारिता है .पत्रकार जैसा सत्य की तह तक पहुँच जानेवाला प्रबुद्ध ही जब विवेकहीन और पथ-भ्रष्ट हो जायेगा ,तो वही होगा जो आज हमारे देश  मे हो रहा है ."
और आज विपिन सिर पर पट्टियाँ बाँधे पागल सा घूम रहा है ,भ्रष्टाचार का पर्दापाश करने की कीमत चुका रहा है .उसकी प्रिया को गुण्डों ने उड़ाया ,दरिन्दे बन कर   नोच-नोच कर मार डाला .उसका अजन्मी सन्तान को गर्भ मे ही रौंद दिया .
विपिन चिल्लाता है ,"मेरी लिली ,मेरे कारण तुझे लूटा गया ,तुझे नोचा-खसोटा गया .ओ,मेरे बच्चे मैंने तुझे देखा भी नहीं .--उस अजन्मे को दाँव पर लगा दिया मैंने ..."
तरु का मन लगातार धिक्कार रहा है ,'मैंने ही आग सुलगाई थी .एक सुखी परिवार को झोंक दिया उसमें .सब नष्ट कर दिया .मैंने किया यह ,मैं ने .उन लोगों को झोंक दिया  हवन-कुण्ड में और आराम से घर  बैठी ताप रही  हूँ ..'
दर्द करते सिर को वह हाथ से दबाती है .
ओह , क्या करूँ मैं ?--वह कहाँ भटक रहा होगा !
न स्वयं चैन लेती हूँ ,न दूसरों को लेने देती हूँ .
चार दिन बाद असित विपिन को लेकर  लौटे .
"ये ,तुम्हारा भतीजा .वहाँ स्टेशन पर बैठा था .मुझे भी नहीं पहचाना .बड़ी मुश्किल से लाया हूँ ."
तरु को देख विपिन की आँखों पहचान उभरी ,अचानक वह सीने पर हाथ दबा कर झुक गया .
"क्या हुआ विपिन .क्या हुआ तुम्हें ?"
तरु ने उसे लिटा दिया .तकिया सिर के नीचे लगाया और हाथ सीधा करने लगी तो हाथ झटक दिया उसने .दर्द के मारे कराह उठा .
हाथों पर इंजेक्शनके निशान हैं .बार-बार बेहोश हो जाता है .बड़ी मुश्किल से एक गिलास दूध पिला पाई .तब तक असित डॉक्टर को ले आये .
""ये बाँह पर किसका इंजेक्शन दिया है ,बड़ी सूजन है ?"
"विपिन बोलो ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
बड़ी कोशिशों के बाद ,टूटे- उखड़े शब्दों मे उसने जो बताया उससे पता लगा उसे पकड़ ले गये थे ,कार में डाल कर ले गये थे .कमरे में बन्द कर दिया ,फिर इन्जेक्नश लगाये ,बडा दर्द--आह...
विपिन का चेहरा ज़र्द होता जा रहा है .अटक-अटक कर शब्द मुँह से निकलते हैं ..
"वो कौन थे ?"
"वो पाँच --."
तरु बार-बार सजग कर पूछती है ,"नाम बताओ ,कौन थे ?"
डॉक्टर ने रोक दिया ,"अभी मत पूछिये ,उत्तेजित हो जायेंगे ."
बाद में भी तरु धीरे-धीरे निकलवाने की कोशिश करती रही .
" विपिन ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
"उनने.उनने--कह रहे थे --कह रहे थे --."
साँस धीरे-धीरे चल रही है .
"इन्हें अस्पताल ले चलिये ."डॉक्टर ने कहा .
डॉक्टरों ने जाँच की .कितनी सुइयां भोंकी हैं .शरीर के साथ दिमाग पर भी असर है .
तरु रो रही है बराबर .असित चुप हैं .एस.पी को ,निशान्त के सम्पादक को फ़ोन किये जाते हैं ..बहुत लोग इकट्ठा हैं . भीड उत्तेजित है .
सब आये और सब चले गये .केस सी .आई. डी को सौंप दिया गया .
कुछ हो पायेगा ?
जहाँ हर चीज पैसे और प्रभाव से तोली जाती हो ,वहाँ न्याय कौन करेगा ?
जो लोग मिलने आते हैं,विपिनसे खोद-खोद कर पूछने का प्रयत्न करते हैं.
तरु  बार-बार रोकती है ,"स्वस्थ हो लेने दीजिये .अभी उत्तेजित होना नुक्सानदेह है ."
बेसुधी मे वह 'लिली,लिली ' चीखता है .उसकी हालत गंभीर है .सीने मे दर्द ,सिर में चक्कर ,बार-बार बेहोशी . मुँह से कुछ शब्द निकलते हैं --एम्बेसेडर कार ,अँधेरा .,हाय ,मार डाला  ,भयानक यातना .कुछ कागजों पर जबरन हस्ताक्रष भी कराये हैं .
कौन हैं यह सब करनेवाले ?
शान्ति -व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदार पुलिस ?जनता का पैसा लूटनेवाला ठेकेदार ?गुण्डों के सरदार ,हमारे नेता ?
कोई अकेला नहीं ,सब मिले-जुले हैं .
अकेला है विपिन ,बस .जो सच का साथ दे रहा है !
*
डॉक्टरों ने व्यवस्था कर दी है ,रात को आराम से सोयेगा विपिन .
तरु का मन उसे कटघरे में खडा कर  उत्तर माँगना शुरू कर देता है
.बहुत दुःसह होती है वह स्थिति !
तुम्हें क्या पडी थी ?
अब उसे कौन सम्हालेगा ?
वह तुम्हारा अपना होता ,तो भी तुम ऐसा ही कर पातीं ?
अपना कोई होता ?
तरु के मुँह पर थप्पड़ सा पडा .विपिन कितना अपना है कैसे बतायेगी? जिसे कोई नहीं समझ सकता कैसे समझाये वह ?
और--- ग़लत को सही कैसे कह पाती ?
किसी भी कीमत पर .चाहे वह स्वयं हो ,असित हो ,बेटी हो ,बेटा हो ?और तब तो अन्दाज भी नहीं था कि इतना कुछ हो जायेगा .अपने पराये की क्या परिभाषा है ?मन को चीर कर तो नहीं दिखाया जा सकता .
भीतर ही भीतर एक अँधड़ सा चल रहा है ..दिमाग ठिकाने नहीं रहता .

सब्जी छौंकने बैठी थी .चूल्हे पर कढाही रख कर तेल की बोतल उठा लाई और गर्म कढाही पर उँडेल दी .
एकदम खूब जोर से उछलती लपट और मिट्टी के तेल  का तेज़ भभका !
फ़ौरन पीछे हटी तरु .बोतल दूर हटा दी उसने .
ओफ़ ,क्या हो गया है मुझे ? कडुये तेल और मिट्टी के तेल की पहचान नहीं रही ?
जलते-जलते बच गई,साड़ी भी सिन्थेटिक  .कुछ हो जाता तो ?
 लोग दस तरह की बातें करते .कोई कहता - सुसाइड .कोई कहता हत्या .
और मेरी बच्ची ?कौन सम्हालता उसे ?
नहीं -नहीं  !कोई बच्चा ऐसे न जिये जैसे असित या.. बस आगे नहीं सोच पाती .
इन लोगों को मँझधार में छोड़ कर कहीं शान्ति नहीं पा सकती तरल -मरने बाद भी नहीं !


अस्पताल और घर दोनों के बीच चक्कर काट रही है.-
लोग आते हैं ,जाते हैं .तरह-तरह के लोग .बातें ही बातें !
कब तक? कैसे ?
चंचल से काफी मदद मिलने लगी है ,पर उसे भी कालेज जाना ,अपनी पढ़ाई  .असित का सहयोग मिल रहा है .पर उनका अपना काम भी तो है .तरु को मना नहीं करते,रोकते नहीं ,खुद भी जितना हो सकता है कर देते हैं .
विपिन कभी थोड़ा सम्हलता है ,तो कभी एकदम उन्मत्त सा हो जाता है .तब उसे नियंत्रण मे रखना मुश्किल हो जाता है .
सिर का घाव भर आया है,स्वास्थ्य पहले ले ठीक है ,जीवन खतरे ले बाहर हो गया है ,पर मन और मस्तिष्क में संतुलन  नहीं आया .
तरु के मन में निरंतर एक मंथन चलता है -भीतर ही भीतर कुछ उमड़ता घुमड़ता अपने साथ बहा ले जाता है .क्या होगा विपिन का ?इन अपराधियों को कौन दण्डित करेगा ?
अपराधी ?
 हाँ,अपराधी .
मन के दर्पण में उसे अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा है-पर दर्पण चटका हुआ है .
चेहरा एक नहीं अनेक हैं -आधे-अधूरे   ,विद्रूप करते से !
*

च्चों को बताने लगी ,'ये दन्नू बड़ा चोर है .घर का सामान बेच देता है और खूब पिटता है .'
अंदर से आवाज आई ,'अरे तुम लोग तैयार हो जाओ ,बुलावा शुरू होनेवाला है .

'लाओ,किताबें अल्मारी में रख दें ,दन्नू के हाथ पड़ गईं तो समझो गईं .'
*
31.

.इतनी सहन शक्ति कहाँ से आ जाती है इन्सान में ?
तरु बहुत छोटी थी,तब याद करती थी-सी.ए.एन. कैन ,कैन माने सकना .
उसकी समझ में नहीं आता था 'सकना ' क्या होता है .
तरु और उसी के बराबर का  - मोहन,पड़ोस के पोस्ट-मास्टर का बेटा .दोनो बैठे मीनिंग रट रहे हैं .रटते-रटते तरु चुप हो गई .
"याद करो तरु ,नहीं तो डाँट पड़ेगी ."
फिर वे शुरू हो जाते हैं -सी.ए.एन. कैन,कैन माने सकना .
"मोहन ,ये सकना क्या होता है ?"
"ये तो हमें भी नहीं मालूम ."
मैन ,रैट,कैट ,फैट सब समझ मे आते हैं ,पर कैन का सकना क्या होता है ,दोंनो मे से किसी को नहीं मालूम .बस रटे जा रहे हैं
'सकना ' क्या होता है ,यह जानने की उम्र तब उनकी थी भी नहीं .
बड़ा होकर इन्सान जब घबराता है ,सोचता है नहीं ,नहीं कर सकता .तब कोई अदृष्ट व्यंग्य से हँस पडता है
,'नहीं सकता क्या ,यही करना होगा !'
और तब सकना का अर्थ समझ में आने लगता है .

विपिन के बारे में सोच कर वह दहल उठती है .
यह क्या हो गया ,जिसकी कल्पना भी नहीं की थी !
लिली ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?वह बेचारी तो क्या चल रहा है यह भी नहीं जानती थी.

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विपिन के भीतर प्रचण्ड दावाग्नि धधक उठी है .
लवलीन का ध्यान आता है तो  पागल सा हो उठता है .
रात-रात भर चक्कर काटता है,बाल नोचता है ,सिर पटकता है ,चिल्लाता है ,"उसने क्या बिगाड़ा था उनका ?उसने क्या किया था ?
पहले ही घबराती थी .वह इस सब के बीच में थी ही कहाँ ?
फिर रोने लगता है बुदबुदाने लगता है ,"--क्या-क्या अत्याचार किये होंगे तुझ पर ?--सिर्फ मेरी वजह से --मुझे एक बार बतला दे लिली ---मैं एक-एक से बदला लूँगा . तड़पा-तड़पा कर मारूँगा .---एक बार बता जा लिली ,बस एक बार --."
पर उसकी लिली कहाँ है इस दुनिया में ?
विपिन के सिर पर वार कर ,वे लोग लिली को उठा ले गये थे .उसके बाद वह नहीं मिली .दो दिन बाद नहर के किनारे उसकी लाश मिली -नग्न ,वीभत्स !
बदला किस-किस से लोगे विपिन ,यहाँ तो सारी व्यवस्था एक सी है  ?
तरु के मन में प्रश्न ही प्रश्न चीख़ते हैं .
वह हर बार धीरज देना चाहती है ,पर वह कुछ नहीं समझता .
लोग आते हैं पूछते हैं -वह लाल आँखें किये देखता रहता है .
तरु अपने घर ले आई उसे .यत्नपूर्वक रखा ,पर मौका पाते ही विपिन ग़ायब हो गया .
असित दौड-धूप कर रहे हैं ,तरल बहुत उद्विग्न है सब जगह हल्ला मचा है .
पत्रकार हर तरफ विरोध कर रहे हैं ,अखबारों मे अपीलों पर अपीलें निकल रही हैं प्रदर्शन हो रहे हैं ,पुलिस दौड़ रही है ,और सरकार निष्पक्ष पूरी जाँच का आश्वासन दे रही है .
 पर कुछ होगा क्या ?हल्ला मचानेवाले कुछ कर पायेंगे ?
एक और घर बनते-बनते बिग़ड गया .लवलीन मार डाली गई .विपिन विक्षिप्त सा घूम रहा है .
दोष किसका है ?
अतीत की स्मृतियाँ तरु को बहा ले गईं .विपिन को भूली कभी नहीं थी .पर आज उसके लिये मन में सोया मोह उमड़ पडा है.
*
बुआ कहता था विपिन !
कितना अपनापन पाया था -कितनी सहज सहानुभूति और निश्छल प्रेम  ! कितना विश्वास करता था ,कितना महत्व देता था मुँह से निकली एक-एक बात को ! तरु को लग रहा है -मैंने ही उसे झोंक दिया जलते अंगारों में.

क्या ज़रूरत थी  आदर्शवाद  की पट्टी पढ़ाने की ?
और वह भी जब यह पता हो कि उसे इस घोर भ्रष्टता के संजाल में जीना है ?पैने नखों और विषैले दाँतों वाले पशुओं के बीच  एक अकेला आदमी कैसे जी पायेगा अपने सिद्धान्तों को ले कर ?
उसके विश्वास का क्या प्रतिफल दिया मैंने ?
वह और उसकी लिली .एक दूसरे के अनुरूप ,एक दूसरे के पूरक .कितना शान्त ,संतुष्ट जीवन जी रहे थे ! तरु को सब याद आ रहा है -
उसने विपिन से कहा था ,"तुम पत्रकार हो .तुम अनुचित को संकेतित नहीं करोगे ,अन्याय के विरोध में खड़े नहीं होगे ,तो और कौन होगा ?  इस महाभारत के संजय हो तुम ! निष्पक्ष ,निर्द्वंद्व, सत्यान्वेशी . पत्रकार बन कर  वरदान मिला है तुम्हें , सजग दृष्टा और समर के साक्षी होने का .अपना कर्तव्य करो विपिन .बड़ा दायित्व है तुम्हारे ऊपर !"
"पर ,बुआजी ,सब एक से हैं .हम कुछ करेंगे ,तो हमारा ही पत्ता काट देंगे .."
"नहीं विपिन ,सत्य और न्याय का मूल्य कभी कम नहीं होता .आज के युग में तो और भी नहीं ,क्यों कि ,ये इतने दुर्लभ हैं .ये छोटे-छोटे टुटपुँजिये लोग उन्हें अपने अधिकार मेंकर लें ,और समाज का सबसे जाग्रत  वर्ग ,तुम पत्रकार लोग ,चुप बैठे देखते रहो तो देश का क्या बनेगा ?मैनें तो ऐसे पत्रकार देखे हैं ,जो जान जोखिम में डाल कर झूठ का पर्दा फाश करते हैं .वही सच्ची पत्रकारिता है .पत्रकार जैसा सत्य की तह तक पहुँच जानेवाला प्रबुद्ध ही जब विवेकहीन और पथ-भ्रष्ट हो जायेगा ,तो वही होगा जो आज हमारे देश  मे हो रहा है ."
*

और आज विपिन सिर पर पट्टियाँ बाँधे पागल सा घूम रहा है ,भ्रष्टाचार का पर्दापाश करने की कीमत चुका रहा है .उसकी प्रिया को गुण्डों ने उड़ाया ,दरिन्दे बन कर   नोच-नोच कर मार डाला .उसका अजन्मी सन्तान को गर्भ मे ही रौंद दिया .
विपिन चिल्लाता है ,"मेरी लिली ,मेरे कारण तुझे लूटा गया ,तुझे नोचा-खसोटा गया .ओ,मेरे बच्चे मैंने तुझे देखा भी नहीं .--उस अजन्मे को दाँव पर लगा दिया मैंने ..."
तरु का मन लगातार धिक्कार रहा है ,'मैंने ही आग सुलगाई थी .एक सुखी परिवार को झोंक दिया उसमें .सब नष्ट कर दिया .मैंने किया यह ,मैं ने .उन लोगों को झोंक दिया  हवन-कुण्ड में और आराम से घर  बैठी ताप रही  हूँ ..'
दर्द करते सिर को वह हाथ से दबाती है .
ओह , क्या करूँ मैं ?--वह कहाँ भटक रहा होगा !
न स्वयं चैन लेती हूँ ,न दूसरों को लेने देती हूँ .
चार दिन बाद असित विपिन को लेकर  लौटे .
"ये ,तुम्हारा भतीजा .वहाँ स्टेशन पर बैठा था .मुझे भी नहीं पहचाना .बड़ी मुश्किल से लाया हूँ ."
तरु को देख विपिन की आँखों पहचान उभरी ,अचानक वह सीने पर हाथ दबा कर झुक गया .
"क्या हुआ विपिन .क्या हुआ तुम्हें ?"
तरु ने उसे लिटा दिया .तकिया सिर के नीचे लगाया और हाथ सीधा करने लगी तो हाथ झटक दिया उसने .दर्द के मारे कराह उठा .
हाथों पर इंजेक्शनके निशान हैं .बार-बार बेहोश हो जाता है .बड़ी मुश्किल से एक गिलास दूध पिला पाई .तब तक असित डॉक्टर को ले आये .
""ये बाँह पर किसका इंजेक्शन दिया है ,बड़ी सूजन है ?"
"विपिन बोलो ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
बड़ी कोशिशों के बाद ,टूटे- उखड़े शब्दों मे उसने जो बताया उससे पता लगा उसे पकड़ ले गये थे ,कार में डाल कर ले गये थे .कमरे में बन्द कर दिया ,फिर इन्जेक्नश लगाये ,बडा दर्द--आह...
विपिन का चेहरा ज़र्द होता जा रहा है .अटक-अटक कर शब्द मुँह से निकलते हैं ..
"वो कौन थे ?"
"वो पाँच --."
तरु बार-बार सजग कर पूछती है ,"नाम बताओ ,कौन थे ?"
डॉक्टर ने रोक दिया ,"अभी मत पूछिये ,उत्तेजित हो जायेंगे ."
बाद में भी तरु धीरे-धीरे निकलवाने की कोशिश करती रही .
" विपिन ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
"उनने.उनने--कह रहे थे --कह रहे थे --."
साँस धीरे-धीरे चल रही है .
"इन्हें अस्पताल ले चलिये ."डॉक्टर ने कहा .
डॉक्टरों ने जाँच की .कितनी सुइयां भोंकी हैं .शरीर के साथ दिमाग पर भी असर है .
तरु रो रही है बराबर .असित चुप हैं .एस.पी को ,निशान्त के सम्पादक को फ़ोन किये जाते हैं ..बहुत लोग इकट्ठा हैं . भीड उत्तेजित है .
सब आये और सब चले गये .केस सी .आई. डी को सौंप दिया गया .
कुछ हो पायेगा ?
जहाँ हर चीज पैसे और प्रभाव से तोली जाती हो ,वहाँ न्याय कौन करेगा ?
जो लोग मिलने आते हैं,विपिनसे खोद-खोद कर पूछने का प्रयत्न करते हैं.
तरु  बार-बार रोकती है ,"स्वस्थ हो लेने दीजिये .अभी उत्तेजित होना नुक्सानदेह है ."
बेसुधी मे वह 'लिली,लिली ' चीखता है .उसकी हालत गंभीर है .सीने मे दर्द ,सिर में चक्कर ,बार-बार बेहोशी . मुँह से कुछ शब्द निकलते हैं --एम्बेसेडर कार ,अँधेरा .,हाय ,मार डाला  ,भयानक यातना .कुछ कागजों पर जबरन हस्ताक्रष भी कराये हैं .
कौन हैं यह सब करनेवाले ?
शान्ति -व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदार पुलिस ?जनता का पैसा लूटनेवाला ठेकेदार ?गुण्डों के सरदार ,हमारे नेता ?
कोई अकेला नहीं ,सब मिले-जुले हैं .
अकेला है विपिन ,बस .जो सच का साथ दे रहा है !
डॉक्टरों ने व्यवस्था कर दी है ,रात को आराम से सोयेगा विपिन .
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तरु का मन उसे कटघरे में खडा कर  उत्तर माँगना शुरू कर देता है
.बहुत दुःसह होती है वह स्थिति !
तुम्हें क्या पडी थी ?
अब उसे कौन सम्हालेगा ?
वह तुम्हारा अपना होता ,तो भी तुम ऐसा ही कर पातीं ?
अपना कोई होता ?
तरु के मुँह पर थप्पड़ सा पडा .विपिन कितना अपना है कैसे बतायेगी? जिसे कोई नहीं समझ सकता कैसे समझाये वह ?
और--- ग़लत को सही कैसे कह पाती ?
किसी भी कीमत पर .चाहे वह स्वयं हो ,असित हो ,बेटी हो ,बेटा हो ?और तब तो अन्दाज भी नहीं था कि इतना कुछ हो जायेगा .अपने पराये की क्या परिभाषा है ?मन को चीर कर तो नहीं दिखाया जा सकता .
भीतर ही भीतर एक अँधड़ सा चल रहा है ..दिमाग ठिकाने नहीं रहता .

सब्जी छौंकने बैठी थी .चूल्हे पर कढाही रख कर तेल की बोतल उठा लाई और गर्म कढाही पर उँडेल दी .
एकदम खूब जोर से उछलती लपट और मिट्टी के तेल  का तेज़ भभका !
फ़ौरन पीछे हटी तरु .बोतल दूर हटा दी उसने .
ओफ़ ,क्या हो गया है मुझे ? कडुये तेल और मिट्टी के तेल की पहचान नहीं रही ?
जलते-जलते बच गई,साड़ी भी सिन्थेटिक  .कुछ हो जाता तो ?
 लोग दस तरह की बातें करते .कोई कहता - सुसाइड .कोई कहता हत्या .
और मेरी बच्ची ?कौन सम्हालता उसे ?
नहीं -नहीं  !कोई बच्चा ऐसे न जिये जैसे असित या.. बस आगे नहीं सोच पाती .
इन लोगों को मँझधार में छोड़ कर कहीं शान्ति नहीं पा सकती तरल -मरने बाद भी नहीं !


अस्पताल और घर दोनों के बीच चक्कर काट रही है.-
लोग आते हैं ,जाते हैं .तरह-तरह के लोग .बातें ही बातें !
कब तक? कैसे ?
 चंचल से काफी मदद मिलने लगी है ,पर उसे भी कालेज जाना ,अपनी पढ़ाई  .असित का सहयोग मिल रहा है .पर उनका अपना काम भी तो है .तरु को मना नहीं करते,रोकते नहीं ,खुद भी जितना हो सकता है कर देते हैं .
विपिन कभी थोड़ा सम्हलता है ,तो कभी एकदम उन्मत्त सा हो जाता है .तब उसे नियंत्रण मे रखना मुश्किल हो जाता है .
सिर का घाव भर आया है,स्वास्थ्य पहले ले ठीक है ,जीवन खतरे ले बाहर हो गया है ,पर मन और मस्तिष्क में संतुलन  नहीं आया .
तरु के मन में निरंतर एक मंथन चलता है -भीतर ही भीतर कुछ उमड़ता घुमड़ता अपने साथ बहा ले जाता है .क्या होगा विपिन का ?इन अपराधियों को कौन दण्डित करेगा ?
अपराधी ?
 हाँ,अपराधी .
मन के दर्पण में उसे अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा है-पर दर्पण चटका हुआ है .
चेहरा एक नहीं अनेक हैं -आधे-अधूरे   ,विद्रूप करते से !
*

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

'ज' के साथ 'जी'.


*
बात उन दिनों की है जब हँसी आती थी तो आये चली जाती  रुकने का नाम नहीं .
और हर बात पर,चाहे तुक की हो चाहे बेतुकी, एक दूसरे की खिंचाई करने की आदत .
मेरी मित्र विशाखा और मैं .नामों को लेकर, उच्चारणों को ले कर अक्सर उलझ जाते.
उन्हीं दिनों हमारे यहाँ एक शिक्षिका आईं - 'गिरिजा देवी शर्मा' . विशाखा ने जब कहा 'गिरिजा जी '.
 लगा कह रही है 'गिरजा जी .'
मुझे हँसी आ गई .
बस, होने लगी बहस .
तय पाया नाम में अगर एक 'ज' आ गया तो आगे 'जी' लगाना उचित नहीं.
और वे 'गिरजा जी' के बजाय 'गिरजा देवी' बनी रहीं  .
 विशाखा के एक संबंधी थे ब्रजेश . अक्सर आ जाते थे .
मैंने कहा तो अब उनके  आगे 'जी' मत लगाना .
'फिर ?'
'बाबू' लगा दो .
बन गई बात .
अब मेरी बारी आई .राजेश ,उसका पड़ोसी , वह तो बचपन से नाम लेती थी.  
चाय बनाई विशाखा ने .
राजेश सुड़क-सुड़क कर  पीने लगा .
हम दोनों ने एक दूसरे को देखा .हँसी बार-बार आ रही थी.
'क्या हुआ ?'
अब क्या कहें उससे !
विशाखा ने मेरे ऊपर डाल दिया ,'इसकी आदत ही ऐसी है.और इसे देख कर मुझे हँसी आ जाती है .'
'राजेश जी ,बात ये है ...'
'क्यों फिर वही..' विशाखा ने टोका ,'फिर तूने जी लगाया ?'
'देखो राजेश तुम्हारे नाम में एक 'ज' है .अब उसमें एकौर 'जी' लग देंगे तो कुछ जमेगा नहीं.  बेतुका लगने लगेगा !'
वह सोच में पड़ गया ,'तो 'जी' मत न लगाओ .'
'फिर क्या लगायें ?'
'कुछ मत लगाओ .'
'कुछ तो लगाना है .तुम्हारी तो अम्माँ भी खाली नाम नहीं लेतीं 'राजेश कुमार' कह के बुलाती हैं ..''
'इत्ता बड़ा कुमार ?ये हमसे नहीं होने का.'
 तो सीधे नाम लो '
'अरे वाह .'
'बस 'बाबू' लगा दे ,और बाबू तो वो हई .'
'हाँ ठीक .अब मैं कहूँगी ,राजेश बाबू .'
-
फिर विवाह के बाद. नये नामों से वास्ता पड़ा ,-
राजू ,अज्जू ,विजय...
जहाँ 'ज' आया ,जी लगाते-लगाते रुक जाती  फ़ौरन बाबू निकल पड़ता मुँह से ,अपने आप ही, अनायास - विशाखा जैसे सिर पर सवार हो .
-
अब विशाखा नहीं है ,पर उसकी बात तो है .
'ज्योति' के आगे 'जी' लगाने में ज़ोर पड़ता है.लगता है कुछ गड़बड़ हो गया  . 'ज्योति जी' -निकलता नहीं मुँह से .'ज्योति बाबू' बिलकुल सही लगता है - संतोषप्रद !
'जीवन जी' और 'जीवन बाबू' ?
मुझे दूसरा ठीक लगता है - नाम में 'ज' है आगे भी 'जी' ,कुछ बेतुका-सा लगता है मुझे तो !

वैसे  जैसे जिसका मन !
***

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

एक थी तरु - 28 & 29.


28 .
अन्दर घुसते ही तरु को  महक लगी जैसे कुछ जल रहा हो .कुछ देर में महक और तेज़ हो गई .
"चंचल , कुछ जल रहा है क्या?"
"नहीं तो मम्मी ."
"बड़ी महक आ रही है ."
"हाँ,हमें भी लग रही है .इनके घर से आ रही होगी ." चंचल ने पड़ोस के घर की ओर इशारा करते हुए कहा .
"अरे ,ये धुआँ भी आने लगा .ये तो अपने घर के अन्दर से आ रहा है .".
"उन्हीं के यहाँ से धुआँ भी आ रहा होगा .मम्मी .अपने यहाँ घुस आया होगा ."
आजकल श्यामा का बेटा सौरभ आया हुआ है .चंचल से खूब पटरी बैठती है उसकी .
चंचल फिर भाग गई सौरभ से गप्पें लगाने .
महक और धुआँ बढता जा रहा है .
तरु से रहा नहीं गया .उठकर भीतर गई .देखा टोस्टर में से आग की लपटें उठ रही थीं .उसने़ फ़ौरन स्विच आ़फ़ किया .
जोर से आवाज लगाई ,"चंचल .ऐ चंचल ."
मम्मी बार-बार आवाज़ दे देती हैं .खेल मे डिस्टर्ब होता है .दो-तीन आवाजें अनसुनी कर चंचल वहीं से चीखी ,"क्या है मम्मी ?"
"क्या है की बच्ची ,यहाँ आकर देख ." उसने माँ को जले हुये टोस्ट निकालते देखा तो घबरा कर बोली ,"अरे, हम लगा के भूल गये ."
"हमेशा यही करती है . टोस्ट लगा देती है और जाकर ही-ही करने लगती है.यहाँ टोस्ट जल कर कोयला हो गये लपटें उठ रही हैं और वह कहे जा रही थी पड़ोस से महक आ रही है ...पड़ोस से धुआँ आ रहा है .."
चंचल क्या बोले ?मम्मी ने कहा था विपिन दादा के लिये टोस्ट भून लो उसने लगा दिये .विपिन दादा चले गये तो वह टोस्ट लगा कर भूल गई .
तरु कहे जा रही है ,"...उस दिन भी फुँक गये थे .मैं न देखूँ तो ये लड़की जाने क्या दुर्घटना कर डाले .---ये ऊपर ही अरगनी पर कपड़े टँगे हैं जिनमें टेरेलीन की साडियाँ और फ्राकें भी हैं --एक बार आग पकड़ लें तो बुझाना मुश्किल ... .
...कल भी यही हुआ दूध उबल-उबल कर गिरता रहा .जल कर भगोना कोयला हो गया,और वह बाहर खड़ी ही-ही- करती रही ."
चंचल विवश सुन रही है .
बिचारी क्या करे .दूध चढ़ा कर सोचती है अभी तो उबलने में बहुत देर है,ज़रा सा चक्कर बाहर का मार ले और बाहर जाकर बिल्कुल ध्यान से उतर जाता है .जब मम्मी चिल्लाती हैं तब होश आता है .
तरु को बड़ा गुस्सा चढ़ा है,
"इतना कहती हूँ पर इस पर कोई असर नहीं .कहा था विपिन के लिये टोस्ट भून ले ,सौरभ के लिये भी.. और भूख खुद को भी लगी होगी  पर ही-ही,खी-खी में उसे खाने का होश कहाँ....
इतनी बार प्यार से समझाया.डाँटा ,,हर तरह से कहा कि दूध चढ़ा कर और टोस्ट लगा कर वहीं खड़ी रहो .पर वह हमेशा चल देती है ... और सौरभ कहाँ है ?"
"बाहर ,बैडमिन्टन खेलने ."
टोस्ट कितने भून लिये ?किसी ने खाये कि नहीं ?"
"अभी कहाँ ?पहले ही तो लगाये थे ."
तरु और बिगड़ी .
चंचल खिसक ली .सामने खड़ी रहेगी तो मम्मी बराबर डाँटती रहेंगी .
चुप होकर तरु ने इन्जार किया .न सौरभ आया न चंचल .अब ये भी नहीं कि दोनों जने कुछ खा लें !
वह उठी  दूध में कार्नफ्लेक्स डाले .
बाहर से बोलने की आवाजें आ रही हैं
उसने आवाज़ लगाई ,"चंचल ."
कोई जवाब नहीं .चंचल ने सोचा मम्मी फिर डाँटने को बुला रही हैं . चुप लगा गई .
"चुड़ैल ,वहां जा कर बैठ गई .बहरी कहीं की .."
चुड़ैल आ कर मुँह फुलाये खड़ी हो गई .
गुस्सा आता है तो आता ही चला जाता है .
"अब क्या कर रहीं थीं ?"
भइया ने बुलाया था .खेल रहे थे ."
"भइया कहे कुएँ में गिर पडो ,तो गिर पड़ना जा के ."
बिचारी चंचल ,क्या बोले !
दो कटोरियों में कार्नफ्लेक्स उसने चंचल को पकड़ा दिये .
वह लेकर झट से चल दी .
भीतर दोनों भाई -बहिन खा रहे हैं .हँसने-बोलने की आवाज़ें बाहर तक  आ रही हैं .

उसने फिर आवाज नहीं लगाई ,दो गिलास पानी अन्दर पहुँचा दिया .
दोनों के ही-ही,खी-खी की आवाजें बाहर तक आती रहीं .
***
पूरे एक सप्ताह बाद असित अटैची लटकाये रिक्शे से उतरे .
आना था परसों ,पर दो दिन पहले अचानक आकर तरु को सरप्राइज़ देना चाहता है .उतावले कदमों से घर की ओर बढ़ते हुए  उसे बंद दरवाज़े पर ताला लटकता दिखाई दिया .
'अरे, 'उसके मुँह से निकला , सात बज रहे हैं ऑफ़िस से तो कब की लौट आई होगी .

आहट सुन कर पीछे के क्वार्टरों से महरी की लड़की शोभा निकल आई .
'बाबू जी ,दीदी तो गई हैं ,'
''कहाँ?'
'एक बाबू जी और बीबी जी आए रहे उनहिन के साथ.'

अटैची रख चाबी निकाली असित ने ,घर की एक चाबी उसके पास रहती है .

ताला खोल कर कमरे में जा बैठा .
पानी लेने उठ कर रसोई में गया ,लगता है आज सुबह से खाना नहीं बना .
न खाना बनने का कोई चिह्न ,न सिंक में जूठे बर्तन.
फ़्रिज खोला ,दो स्लाइस के साथ मक्खन जैम निकाला ,बैठक में ला कर खाने लगा .

फिर उठा- चाय का पानी गैस पर रख आया .दूध है थोड़ा-सा .गैस धीमी कर दी शायद तब तक तरु आ जाय !

वह चाय पी चुका.
तरु अभी भी नहीं आई .सात ,फिर आठ बज गये.
बड़ी खीझ लग रही है -क्यों चला आया बेकार में !

नौ बज चुके देखा तरु चली आ रही है ,. 'अरे ,तुम कब आये ?'

असित का चढ़ा मुँह देख सफ़ाई देती-सी बोली ,' जितेन्द्र का मीना से झगड़ा हो गया ,वह मिट्टी का तेल डाल कर आग लगाने को तैयार थी .वो अपनी बहिन के साथ मुझे लेने आया .'
'हाँ ,तुम्हें औऱों के झगड़े से कहाँ फ़ुर्सत है .हमारी ही ग़लती है जो समय से पहले घऱ चले आए.'

'ग़लत मत समझो .यह बात नहीं .लेकिन कोई बुलाने आए तो कैसे मना कर दूँ .वह तुम्हारा ही दोस्त है .कितनी मदद करता है तुम्हारी ...मजबूरी में रुकना पड़ा..' वस्तुस्थिति पर ध्यान जाते ही वह शान्त हो गया .'
'फिर क्या हुआ सब ठीक है न ?'
'बड़ी मुश्किल से समझाया है .जितेन्द्र की माँ उससे बहुत असंतुष्ट है .हमेशा शिकायतें करती है, उसे भरती रहती हैं.''
'अब बस भी करो. वो जाने उसका काम जाने .जिसे देखो मदद के लिये चला आ रहा है .सब के लिये तुम्हारा घर खुला है एक मेरे लिये छोड़ कर .'
'तुमने कुछ खाया कि नहीं ..'तभी उसकी दृष्टि चाय के प्याले और प्लेट में पड़े ब्रेड की कोरों पर गई .
'अभी खाना तैयार करती हूँ ,भूख लगी होगी तुम्हें .'
वह झट-पट किचेन में जा घुसी .फ्रिज में से गुँधा हुआ आटा निकाला  और अंडे लेने फिर बाहर आई ,असित वैसा ही कुर्सी पर बैठा है .
'अब उठो  न ,हाथ-मुँह धो  कर कपड़े बदल लो .'
आमलेट बना कर पराँठे सेंकते-सेंकते उसने प्लेट असित के आगे रख दी .
'लो शुरू करो .'
'तुम भी आ जाओ .आज सुबह तो खाना बना नहीं था?'
सुबह ,हाँ ,सुबह  -
नहीं बनाया था कुछ . चंचल को स्कूल भेज कर कुछ बनाने का मन नहीं किया .शाम को लवलीन  ,चंचल को ले जाने को कह गई थी,अकेले मन नहीं लग रहा था उसका .

 नौकरी छोड़ चुकी थी तरु .चंचल के साथ ,गृहस्थी के साथ न्याय नहीं हो पाता था .
एक तो ढंग के नौकर नहीं मिलते ऊपर से रोज-रोज की किच-किच .पैसा खर्च हो सो अलग और निश्चिन्ती  का नाम नहीं .असित का प्रमोशन हो गया  ,घर का खर्च अच्छी तरह चल रहा़ है फिर बेकार की दौड़-भाग से क्या फ़ायदा  ?
चंचल स्कूल चली जाती है और असित दौरे पर . घर पर अकेली रह गई तरु . कुछ करने का मन नहीं हो  रहा

अकेले खाना खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं .पर अब खा लेना चाहिये,यह सोच कर उठी .खास भूख तो है नहीं .थाली परोस कर क्या करना .उसने फ्रिज में से सब्जी निकाली रोटी पर रक्खी और कौर तोड़ती हुई कमरे में आ गई
कद्दू की सब्जी !
पिता को तरु की बनाई कद्दू की सब्जी बहुत अच्छी लगती थी. बहुत साल पहले की एक घटना मस्तिष्क में कौंध गई --
तरु चौके में बैठी ,कड़ाही से कटोरे में सब्जी निकाल रही है ,बाहर किसी के आने की आहट हुई .जाली में से दिखाई दिया पिताजी ते़ज़-तेज़ कदमों से आ रहे हैं .
कुण्डी खटके इसके पहले ही वह दरवाज़ा खोल आई .
"तरु ,तुमने आज कद्दू की तरकारी बनाई है न ?"
"हाँ ,पिता जी ."
वे चौके के दरवाजे पर खड़े हो गये .तरु ने दाल छौंकने के लिये चमचा अंगारों पर रख दिया .
"रोटी सेंक चुकीं ?"
"बस सेंकने जा रही हूँ ."
तरु ने थाली परसी .पहली रोटी सेंक कर थाली में रखी और थाली उन्हें पकड़ा दी .
अम्माँ पूजा कर अपने कमरे से बाहर निकल रही हैं
"आ गये तुम !जानती हूँ , कोई बिना खाये कैसे रह सकता है."
पिता चेहरा स्याह पड गया है .
"अम्माँ." तरु चिल्ला पडी .
"चुप रह ! बड़ी खैरख्वाह बनी है ."
हाथ का टूटा हुआ कौर उन्होने थाली में ही फेंक दिया है ,"रोटी मैं नहीं खाता , वह मुझे खाती है ."
वे थाली पटक कर चले गये .
तरु रोटी सेंक रही है .आँसू टप-टप कर गिर रहे हैं .वह बाँहे उठा कर पोंछ लेती है फिर रोटी बेलने लगती है .
ऐसा घर होता है ?उसने सोचा था ऐसा घर मुझे नहीं चाहिये .वे भूखे लौट गये ,परसी हुई थाली फेंक कर .यह नरक है .मुझे नरक नहीं चाहिये .
कद्दू की सब्जी वाला कौर हाथ में पकडे तरु कुर्सी पर बैठी है .आँसू भरी आँखों की दृष्टि धुँधला गई है .हाथ उठाकर ब्लाउज की बाँह से  आँखें पोंछ लीं .

आज भी उसे स्वप्न आता है -पिता आये हैं ,चुपचाप खडे उसकी ओर देख रहे हैं
"पिताजी ,खाना ."वह कहती है . और वे लौट कर चले जाते हैं .वह आवाज नहीं दे पाती .चुपचाप देखती रहती है .कितने घरों मे ,कितने लोग ऐसे भूखे रहते होंगे ?बिना किसी से कहे ,बिना किसी के जाने ,यों ही तिल-तिल कर समाप्त हो जाते होंगे ?
ये कैसे व्यवहार हैं दुनिया के ,जहाँ जीवन भर साथ रह कर भी आदमी एक दूसरे को समझ नहीं पाता ?अकेले बैठे-बैठे तरु को लगने लगा है सारा जीवन व्यर्थ बीता जा रहा है .लेखा-जोखा करने बैठती है ,कुछ भी हात नहीं आता .उसने कभी सोचा था जिन्दगी का क्या है ,यों ही बीत जायेगी .दूसरे की जान का जंजाल बन कर घर क्यों बसाया जाय १पर घर के लोग पीछे पडे ,असित को लेकर मन दुर्बल हो गया और अब यह गृहस्थी .क्वाँरी रहती तो भी सबकी सुनती ,इतराती किसके बल पर ?रूप उसके पास था नहीं ,स्वभाव सदा का ऐसा ,जिसकी सदा आलोचना ही सुनती आई -सोच समझ कर बोलना नहीं आता ,लट्ठ सा मारती चलती है .
पर जो लगता है वही तो कहती है .अगर न कहे और कुछ और बना कर कह दे तो भीतर -भीतर कुछ कचोटता रहता है,अन्दर ही अन्दर उफान साउठता रहता है .उस स्थिति को वह किसी तरह सहन नहीं कर पाती .सारी दुनिया धिक्कारती रहे वह चुप सनती है  पर अपने ही भीतर से उठती धिक्कार उससे सही नहीं जाती .
मन क् उद्वेग बार-बार जागता है.तरु को बराबर लगता है,जिसने हमे दुनिया मे सिर उठा कर जीने योग्य बनाया ,हमने उसे जीने नहीं दिया .समने कोशिस की होती तो वे इतनी जल्दी न मरते .यह क्या उनके मरने की उम्र थी ?
भीरे-धीरे मौत की ओर बढते हुये उनके कदमो को देखा है तरु ने  .मृत्यु से पहले ही उनकी जीने की इच्छा समाप्त हो गई थी .गड्ढे मे धँसी आँखें और निष्प्राण सी देह .अच्छा हुआ जो मर गये वे .उस कष्टमय जीवन से मुक्ति पाली उन्होने ..नहीं तो कितना और घिसटते ?
उसकी समझ मे आ गया है कि जीवन के सुख बहुत सतही होते हैं और दुख अपने मे पूरी तरह डुबो लेने मे समर्थ .
  और अम्माँ !उनका अन्त भी कैसा हुआ !आधे शरीर को लकवा मार गया था .जुबान बन्द  हो गई थी .हमेशा कुछ नकुछ कहती रहने वाली जीभ पूर्णतः शान्त हो गई थी .आँखों से देखती रहती थीं ,इशारे करती रहती थीं ,कभी समझ मे आते कभी नहीं ,जितने दिन घसटीं साक्षात् नरक .न स्वयं को चैन न दूसरों को . भाभी को क्यों दोष दे .उन्होने जो किया बहुत किया ,कोई दूसरा शायद उतना भीन करता .उस अन्तिम सप्ताह मे तरु ने एक दिन उनके साथ बिताया था ..फिर वह चली गई थी और उसे तार द्वारा हा ही उनकी मृत्यु की सूचना मिली थी .अन्त काल मे उन्होनेयाद किया होगा .शायद किया हो १मस्तिष्क सारी शक्तियांतो पहले ही जवाब दे गईँ थी
तरु की कहीं नहीं चल सकी थी .उसके ऊपर भीकितने आरप लगे थे .मां कुपित रहतीं थीं ,बहिनअसंतुष्ट.विवाह के ाद शन्नो की तरु से उम्मीदें और बढ गईं थीं .उन्हें लगता था वे तो अब मेहमान बन कर आती हैं ,तरु को उनकी हर तरह से खातिर करनी चाहिये ,आराम देना चाहिये .वे कहती भीथीं मै आती हूं पर इसे अपनीपढाईऔर घूमने से ही छुट्टी नहीं -घर का काम किसी तरह निपटा दिया और चल दी .
"कहाँ जाती है रोज-रोज ?घर मे नहीं बैठा जाता ?"शन्नो जवाब तलब करतीं तो वह कुछ नहीं बोलती .
तरु आवारा है ,घंटों घर से बाहर रहती है ,किस-किस के साथ जोड दिया था उसका नाम उन्होने .घर मे रिस्तेदारों के आने पर तीखी -तीखी आलोचनायें होतीं .रिश्तेदार थे कौन /मौसी ,मामा और उनके बाल-बच्चे .वे तो बहुत पहले से ही तरु को अपनी नजरों से रृगिरा चुके थे .अब वह उनकी परवाह नहीं करती थी .
उसे वह सब बद -दिमाग और स्वेच्छाचारी कहते थे ,पर उसने कभी सफाई देने का प्रयत्न नहीं किया उसे लगता था सफाई देने से वह और नीचे गिर जायेगी .
हां ,रोज जाती थी वह .दो आठवीं की ट्यूशने की थीं उसने ,मीना ने दिलाई थीं .कुल तीन महीने वह ट्यूशनकर पाई थी ,बिना किसी को बताये .बताने पर घर मे हल्ला मच जायेगा ..पर पिता की भी कुछ जरूरतें हैं यह कोई नहीं समझता !
तरु बता देगी तो अम्मआँ नाराज होंगी ,कहेंगी हां ,तुम्हीं तो एक लगी हो उनकी !मेरे लिये तो आज तक कुछ नहीं सोचा ,और रुपये उनके पास चले जायेंगे .अपने मायकेवालों के लिये अभी बहुत कुछ करना है उन्हे .शन्नोकहेंगी -मेरे बच्चों के लिये कभी कुछ लाने का मन नहीं हुआ तेरा ?
पिता की चाय की आदत थी .जब मां आस-पास नहीं होतीं  तो चुपके से बना कर दे आती वह .वे तरु के लाने पर मना नहीं कर पाते थे चाय उनकी कमजोरी थी ,उनकी तलब थी उनकी शक्ति थी .पर मां बहुत कटु थीं .कुसी बात पर तिनक कर बोलींथीं ,"तुम अपनी चाय छोड सकते हो ?"
"तुम्हें इतनी ही दुश्मनी है तो वह भी छोड दूँगा ."उन्होने भी ताव मे आकर कहा था .
तलब लगती है तो उन्हें कितना कष्य होता है तरु जानती थी परवे जिद के मारे पीते नहीं थे . दो-चार बार फपनेदफ्तर जाते समय उन्होने तरु से पूछा था ,"एकाध रुपया है तुम्हारे पास ?"
उन्हे मालूम था ,गौतम भइया जब-तब तरु को कुछ दे जाते हैं .जब तक रहे वह पकडा देती थी पर अब कुछ नहीं है उसके पास .पिता की जेब मे कुछ पडा रहे तो अच्छा है .वे चाहें तो चाय पी सकते हैं ,चाहें तो रिक्शा ले सकते हैं .वे एक बार रास्ते मे गिर पडे थे ,उन्होने बताया नहीं पर उसे मलूम है .
उसी बीच मौसी अपने लडके नवीन के साथ आई थीं .नवीन उससे कुछ बडा था .तरु की आलोचना सुनकर उसने जानना चाहा था .
नवीन का समाधान कर रही थी वह .घर आकर रहनेवाला वैसे भी घर की स्थितियों का अन्दाज लगा लेता है ,उससे सब कुछ तो छिपा भीनहीं सकती थी .
उसे धीमे-धीमे बता रही थी ,मां की कठोरता के बारे मे नहीं ,पिता की जिद के बारे मे नहीं ,वह बता रही थी आजकल मै खाली हूँ ,कई साथिने भी अच्छे-खासे घरों की होकर ट्यूशन करती हैं .
बातों के बीच मेअम्मांकी जरदार आवाज आईथी ,"बेशरमकहीं की ,नवीन से घुट-घुट कर क्या बातें किया करती हो ?समझ लिया कि हम लोग बेवकूफ है !"
मौसी ने तेज स्वर मे नवीन को आवाज दे ली थी .जब उसने तरु की वकालत की तो बात और बिगड गई .मौसी ने तिरस्कार से कहा ,"भाई को भी नहीं छोडा ."
अगले दिन नवीन वापस लौट गया था .चलते-चलते वह शन्नो को बता गया था ,"वह ऐसी नहीं है .उसने बच्चों की ट्यूशने की हैं इसमे क्या बुराई है ."
शन्नो ने तरु से पूछा ,"कितने रुपये कमा लिये ?मेरे बच्चों के लिये तो कभी कुछ किया नहीं .ट्यूशन की थी तो कह कर करती .बहाने बनाने और झूठ बोलने मे तू शुरू से होशियार है ."
फिर सन्देह भरी द-ष्टि से देखते हुये बोलीं थीं ,"अच्छा ,मीना का भाई नहीं होता था वहां ?"
"मीना का भाई ?वह तो उनबच्टों की बहनविभा से मिलने आता था .अब उनदोनो की शादी हो रही है ."
"तू चाहेगी भी तो तुझे लिफ्ट देगा कौन ?"
शन्नो हमेशा चुभनेवाली बात कहती हैं .पर तरु से कुछ कहते नहीं बनता ,वह चुपचाप उठ कर चली जाती है ,इन झूठे आरोपों का खण्डन कर अपले को और कितना गिरा ले!वह हमेशा की अडियल है शन्नो ठीक कहती हैं .
मुझे कोी नहीं चाहता पर इसमे मेरा क्या दोष !तरु सोचती है पर समझ नहीं पाती .,जो ठीक समझ कर करती है वह भीसबको गलत लगने लगता है .
पर पिता ?उन्हें कुछ हो गया तो? कहो जिसे कहना हो कहो ,पर मेरे पिता का कुछ अनिष्ट न हो !
पर अनिष्ट कहां रोक सकी थी ?कुछ नहीं कर पाी तरु .जो सोचती है कभी नहीं होता .उनकी निर्बलता बढती गई ,वे बिस्तर पर पड गये ,उन्होने खाना-पीना बिल्कुल बंद कर  दिया  उठना मुँह धोना कुल्ला करना छोड दिया .बोलना छोड दिया ,सुनना छोड दिया और तरु बेबस देखती रही .उस असह्य स्थिति का साझीदार तब कोईनहीं था ,फिर अब उसकी स्मृति का साझा करके क्या होगा ?
डॉक्टरों का क्का ?कोई भीबीमारी बता देंगे ,दवा लिख देंगे ,उनके बूते का कुछ नहीं .
जिन्गीमे क्या -कुच जायेगा पहले से कुच मालूमनहीं पडता .बडी-बडी घटनायें अनायास ही घट जाती हैं .मनजाने कितनी योजनायें बनाता है ,उन्हे साकार करने को एडी-चोटी का जोर लगा दिया जाता है ,पर सारे किये धरे पर पानी फेर देनेवाली घटनायें अनायास ही घट जाती हैं .तरु का मन सुन्न सा हो गया है
भीतर से कोई पूछता है ,"किसी के सही गलत का निर्णय करनेवाली तू कौन ?तूने क्या किया ?मां को फालिज गिरा तेरे ही कारण .?
वह अपने से कहती है -मै अपराधी हूं ,मै पापी हूं ,हाँ ,पापी हूँ !
---------

'फिर तुमने क्या खाया ?'असित का स्वर सुन वह चौंकी-सी वर्तमान में लौट आई .

असित  उत्तर की प्रतीक्षा में. .

'रखा था .शाम का काफ़ी बच गया था.फिर अकेले के लिये बनाने का मन नहीं हुआ .तुम शुरू करो ,बस मैं अभी आई .'
वह फिर चौके में जा घुसी .

खा-पी कर सोते-सोते ग्यारह बज गए .
'मुझे घर चाहिये और तुम चाहिये .तुम नहीं होतीं तो मुझे घर अच्छा नहीं लगता .तरु, मुझे हर पल तुम्हारा साथ चाहिये .बाहर से भटक कर आता हूँ तुम्हारी बाहों में शान्ति पाने के लिये .तुम सिर्फ़ मेरी हो और किसी की नहीं '
'हाँ ,मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ .'
'तुम्हें अपने से बिलकुल अलग नहीं रहने देना चाहता ....'असित तरु को अपने में समेट लेना चाहता है ,'तरु तुरइया ..'
'तरुइया क्या होती है ,जानते हो ?'
'क्या?'
'तुरई को लोग तरुइया भी कहते हैं .'
'सच में तुम तरुइया होतीं तो मैं तुम्हें खा जाता.तरुई..तुरई.तुरई ..'
यों ही लेटे-लेटे ,असित का सामीप्य. अनुभव करते वह बहुत बातें करना चाहती है .बहुत-कुछ है कहने को उसके पास ,बहुत कुछ असित से पूछना है .पर बात करने का अवकाश वह नहीं देता .इस समय नहीं ,बिलकुल नहीं .तरु के बोलने पर मुँह बंद कर देना उसे आता है .
***


राहुल के तिलक से शादी तक के लिए भी मकान मालिक से इधऱ के दो कमरे और एक बराम्दा ले लिया गया है .इसी के पाँच-सौ रुपए माँग लिये उन्होने - सिर्फ़ पन्द्रह दिन के .
माँजी ने ना-नुकुर की पर सबकी सलाह हुई कि कहीं और जाने में परेशानी बहुत होगी और खर्च अलग से, सो यहीं ले लिया जाय .सामान उठाये-उठाये इधर-उधऱ भागना तो नहीं पड़ेगा .इस खिड़कीवाले कमरे के उस तरफ़ शुक्लाइन का चौका है ,और पीछे एक कुठरिया जिसमें उनके बक्से धरे हैं .
उनकी बड़ी बेटी सुशीला जब से ससुराल से आई है उसे हिदायत दे दी गई है -गहना-गुरिया उतार के संदूक में मती धरियो .कहूँ दन्नू के हाथ परिगौ तो हम तो मुँह दिखाबे के लायक नाहीं बचिंगे .
और सुशीला हर बखत झुमकी, कंगन ,हार और अँगूठियाँ पहने रहती है .
एक दिन घर के सब लोग कहीं गये थे ,सुशीला चौके में खाना बना रही थी.आँगन से दन्नू कमरे में जाते दिखाई दिये .सारे घर का चक्कर लगाने के बाद सुशीला से पूछा कौन ,कहाँ गया है ,कब तक आयेगा.
फिर वे चुपचाप कुठरिया में जा घुसे .
थोड़ी देर बाद सुशीला का ध्यान गया  - जे दन्नू इत्ती देर से कुठरिया में का कर रहा है?
तवा उतार कर वह उधर गई.
देख कर सन्न !
'जे का कर रहे हो , दन्नू?चोरी कर रहे हो,?..हाय..हाय हमार बकसा .'वह चिल्लाई.
चीख की आवाज़ सुनकर रश्मि दौड़ी ,पीछे-पीछे तरु भी चली आई.
दन्नू सुशीला के बकसे से जूझ रहे थे .बड़ी करुण दृष्टि से ताकने लगे .

ताला मज़बूत था उसे तोड़ने की कोशिश उनने नहीं की ,ढक्कन के साइड की एक कील निकाल दी थी ,और उसे उचका कर बकसे में हाथ घुसा दिया था.लेकिन भारी ढक्कन ऊपर उठा नहीं  हाथ बीच में फँस गया .दूसरे हाथ से दन्नू दूसरा जोड़ खोलने के चक्कर में थे ,उधर फँसा हुआ हाथ बाहर निकल नहीं रहा था ,पीरता जकड़ा हाथ फँसाये जस के तस बैठे रह गये .
'चोट्टा कहूँ को ,काहे तोड़ रहो है हमार बकसा ?'
परिश्रम से लाल मुँह घुमा कर दन्नू बोले ,'जौ बकसा कैसो टूटो धरो है .हम सँभार रहे हते सो हाथ फँस गौ. हाय..हाय टूटो जात है .'
'अच्छा होय टूट जाय हाथ ! बकसा अपने आप जाय के जूझ गौ तुझ से ,हरामी ,चोर दुस्मन कहूँ को ..'
सुशीला ने भुनभुनाते हुये ढक्कन उचकाया .
हाथ खींच कर सहलाते हुये दन्नू बाहर भागे .
रश्मि और तरल हँसते-हँसते दोहरी हो गईं.
***
आज शुक्लाइन सफ़ाई पर तुल गई हैं.
इधऱवाले कमरे में भारी-भारी धन्नियां रखी हैं और ईंटं सीमेन्ट की बोरियाँ वगैरा भी.
कोई नहीं आता इधऱ .

इधर से तरु को आवाज़ देकर उन्होंने कहा ,'दुलहिन ,नेक धन्नी उचकाय देओ,नीचे मार दलिद्दर जमा है .ऊपर को खंड बनन की नौबत ही नाहीं आय रही है .मार घुनाय जाय रही है लकड़ी .'
उन्होंने झाड़ू से नीचे का कूड़ा खींचा तरु हाथ से ज़ोर लगा कर धन्नी उचकाये है .
कूड़े के साथ फड़फड़ा कर आते नोट देख तरु चौंक कर बोली,' अरे,अरे ,यह क्या ?चाची जी आपके यहाँ धन्नियों के नीचे नोट रखते हैं ?'

धन्नी के नीचे से निकले मुट्ठी भर नोट देख शुक्लाइन ने आँखें फाड़ दीं .
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हँसी को तरु ने भरसक दबा लिया
.दस-दस के पाँच-छः के दो-दो के ,एक-एक के नोट बिखरे पड़े थे .
'उसई हरामजादे की करतूत  है,' खिसियाई-सी चाची बोलीं ,'उहै है जान को दुसमन .मरत भी तो नाहीं अभागो .हियन छिपाय के धरे हैं.'
 दन्नू के लिये मुँह से गालियों और बद्दुआओं की बौछार  फूट पड़ी.
झाड़ू डाल कर फिर खींचा तो कुछ नोट और चिल्लर और निकली.गिने कुल सड़सठ रुपये सैंतालिस पैसे .
'हाय सुसीला ,' सिर पीट लिया शुक्लाइन  ने.
सुसीला के दूल्हा की जेब से उसई ने चुराय के धरे हैं .माता खायें ,हरामी के कोढ़ फूटे .कौन पापन को फल है जो हियन आय के पैदे भओ है ...'
सुशीला के दूल्हा जब बिदा कराने आये थे तो बाहर टँगे उनके कोट की जेब से सौ का नोट ग़ायब हो गया था .इधर-उधऱ सबसे पूछा ,ढूँढा पर नोट न मिलना था न मिला .
सुशीला समझ गई पर नई-नई शादी ,बिचारी क्या कहे !
उलटा उसने अपने दूल्हा से ही पूछा,'नोट धरो थो कि कहूँ और निकरवाय आये ?'

'हाँ,हाँ खूब धरो थो ,सुबे दन्नू के सामने धरो थो .'
तब तो हुइ गौ कल्याण ,सुशीला ने मन -ही-मन सिर पीट लिया .वह चोट्टा काहे को छोड़ेगा .पर चुप लगा गई .

दन्नू की करतूतें सब के मनोरंजन का साधन बनी हैं .
असित कहते हैं ,'जैसी कमाई बाप की वैसे ही तो जायगी .दूसरों का ख़ून चूस-चूस कर दौलत जोड़ी .तभी तो लड़के उड़ा रहे हैं .कोई भी ढंग का न निकला ..अब तो बहुयें भी आपस में खूब लड़ती-झगड़ती हैं .हमेशा कुछ-न-कुछ कोहराम मचा रहता है .
इधर बहुत दिनों से पिटे नहीं हैं दन्नू .आने दो शुक्ला जी को फिर उधेड़े जायेंगे .
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29..
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मिले-मिले घर ,ऊपर से इधर शुक्ला जी के पोर्शन में अबाध आवागमन -आपस में  एक-दूसरे का पूरा हाल पता रहता है.मेहमान अभी कोई खास नहीं बस श्यामा का परिवार वह भी पूरा नहीं .माँजी की एक बहिन भी आई हैं.तरु की जिम्मेदारी बढ़ गई है .उसका काम अधिक तर इस कमरे में ही चलता है ,जोशादी के लिये लिया गया है . उसके कमरे से लगा हुआ है और इधर सामने चतबूतरा ,-सब दिखाई सुनाई देता है - बस खिड़की का परदा   ज़रा- सा खींचने  भर की देर है .

.मकान-मालिक शुक्ला जी ने सुबह-सुबह दन्नू की जम कर धुनाई की और गरियाते हुये बाहर चबूतरे पर निकल आये ,
 इतवार का दिन है नहीं तो साइडवाले मकान के बाहरी कमरे में ध्यानू मास्टर लड़कों को ट्यूशन पढ़ा रहे होते ' शुक्ला जी से 'जै राम जी' के बाद दोनों बाहर चबूतरे पर पड़ी बेंच पर जम गये .
'देखा आज का पेपर ?नैनीताल के एक इँग्लिश स्कूल में हिन्दी फ़िल्म देखने पर दसवीं के पाँच स्कूली छात्रों को स्कूल से निकाल दिया गया .और उनमें गूजरमल मोदी का एक पोता भी है .'
'अउर का होयेगा ,' शुक्ला जी हथेली पर तंबाकू रगड़ते बोले ,'सुसरे अँगरेज चले गये औलाद छोड़ गये .हिन्दी बोलने पर सजा मिलती है .चले जाओ किसी कॉन्वेंट स्कूल में हिन्दी बोला बच्चा कि पड़ी एक छड़ी .न माँ ,माँ रहे न बाप,बाप .आपुन सब भुलाय जात हैंगे .'
और मास्टर साहब ?
बड़ी-बड़ी शिकायतें हैं उन्हें सरकार से ,समाज से ,शिक्षा प्रणाली से .पर सुनता कौन है यहाँ उनकी !बस कह-सुन कर भड़ास निकाल लेते हैं .बोले ,'अरे, सब सरकार की कमज़ोरी है ,किसी देश में ऐसा हो सकता है क्या ?'
'सरकार-उरकार क्या होता है ,'मुँह में तंबाकू दबाये शुक्ला जी शुरू हुये ,'वोट पक्के रहें इनके ,ये लोग पहले ही अलग-अलग बाँट कर कुछ को मनमानी छूट दिये रहते हैं जिसमें उनके सारे वोट इन्हई को मिलें .'
सब्ज़ी का झोला पकड़ेउधरवाले वर्मा जी दिखाई दिये ,उन्हें भी पुकार लिया गया .
'नहीं भई ,अभी बैठेंगे नहीं,नहाया भी नहीं है कहते-कहते वे भी वहीं आ जमे ,'किसके वोट गिने जा रहे हैं मास्साब?'

जवाब दिया शुक्ला जी ने ,' अरे वोट हम का गिनेंगे ?ऊ गिनेंगें सुसरे जो सबका ठीका लिये बैठे हैं .उहै तो खरीद रहे हैं .'
'खरीद काहे उनके हितन की रच्छा कर रहे हैं .'

ध्यानू मास्टर थोड़ा तेज़ पड़े, 'सिर्फ़ उनका हित न ! देश का काहे में हित है सो कोई नहीं देखता .'

'अपना तर गये तो समझो देश का उद्धार हो गया. ' वर्मा जी ने आगे बढ़ कर चबूतरे के नीचे पान की पीक थूकी .,'कोउ नृप होय हंमे का हानी  !साले सब एक से हैं जैसे साँपनाथ उइसेइ नागनाथ.'

'सेक्यलरिज़म तो खाली नारा है ,अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग लालच देते हैं रोज़गार भी संप्रदाय के आधार पर बाँट दें इनका बस चले तो .सब को अलग-अलग के सिर पे चढ़ाये ले रहे हैं इकतीस साल बीत गये अभी निपल लगा के दूध पिलाये रहे हैं जाने अपने पाँव पे कब खड़े हो पायेंगे .'
-बोलते-बोलते मास्टर का मुँह लाल पड़ गया था .
'और खुद का हैं ?अपने मतलब पूरन के लै  जो बीच में आय जाये उसई  को ठिकाने लगाय देते हैं .सुसरे .इन्सान की जान की कोई कीमतै नहीं .'

'वो देखो न कल के  पेपर में रहे ,जो इनकी पोल खोले उसे कैसे उखाड़ देते  हैंगे ..'
 .
तरु कान लगा कर सुनने लगी .
'गुंडागीरी की तो हद है .ऊ केस भया था बड़े-बड़े लोगों की फँसत भयी . फिर एक अपहरण अउर हत्या !'

तरु हाथ में पैकेट पकड़े वैसे ही खड़ी ,कान उधऱ ही लगे हैं
'गरीब मेहरिया की आबरू कहूँ सुरच्छित नहीं.'
  मन में अजीब सी हलचल होने लगी .
दो-तीन लोग एक साथ बोल देते हैं -कुछ समझ में नहीं आ रहा.चुनिया के केस  की बात है क्या?
'दुस्मनी होय आदमी से ,खींची जाय मेहरिया ..'
'इहै होता है दुनिया में .करै आदमी भरै मेहरिया .''

जी धक् से हो गया .
नहीं , वह नहीं हो सकती .उसकी किसी से क्या दुश्मनी !
एकदम लिली का ध्यान क्यों आ गया.
औरत ब्याही हुई होगी नहीं तो लड़की कहते न.
तो भी .वह नहीं हो सकती .धमकियाँ विपिन को मिल रही हैं . लवलीन की किसी को क्या दुश्मनी .



उसने आगे बढ़ कर पैकेट मेज़ पर रख दिये .


इतने में गली से आगेवाली सड़क पर कुछ हल्ला उठा .लोग खड़े होकर देखने लगे .
चबूतरे से झुक कर सड़क पर झाँकते वर्मा जी बोले ,' अभी सब्ज़ी खरीदते सब ठीकै-ठाक था .'
वर्मा जी सब्ज़ी भूल थैला साइड में रख कर बैठ गये शुक्ला जी ने बनियान की जेब से चूने-तंबाकू की डिबिया निकाल ली.
'जीप, टैक्सी ,स्कूटर,बैंड-बाजा सब है .अरे ,लड़िकन का जलूस है !'
'डीएवी कालेज का इलेक्सन है ,दोनउ उम्मीदवार जान की बाजी लगाय दिये हैं .पिछलीबार तो छुराबाजी भई थी.'सूचना देनेवाले शुक्लाजी हैं ,'अबके गोलियाँ तो एक बार चल चुकीं ,आगे देखो का होय?'
'कालिजन का चुनाव और सहर भर में हल्ला ...',वर्मा जी ने फिर पान पीका .
'पढ़ाई-लिखाई सब भाड़ में ,अभै से नेतगीरी सीख लेत हैंगे.कोई इनसे पूछे वोट देनेवाले -लेनेवाले उसी कालिज के फिर काहे दुनिया भर में फैन मचाये हो ?पाप का पैसा है ,लुटाय रहे हैं .'

मास्टर जी ने स्पष्टीकरण दिया ,' कराता है नेता .वो पार्टीवाले इन्हें संरक्षण देते हैं और स्कूल कालेज में अपनी पालिटिक्स चलाते हैं .यहाँ भी वोई होता है ,गुटबंदी ,मारपीट और गुंडई.'
'अभै से से टिरेनिंग दे रहे हैं कि बेटा आगे येई करना है .'
मास्टर का लड़का डी.ए.वी. से बीएस .सी. कर रहा है -जुलूस की आवाज़ सुन बाहर निकल आया .
'काहे बबुआ ,ई सब का करवाय रहे हो ?और कऊन-कऊन हैं इन लोगन में ?'
'हम लोग साइन्साइ़ के हैं हमारे पास इतना टाइम ही कहाँ ?प्रतापसिंह,और सुमेर  दोनो ही मैदान में हैं -बराबर की टक्कर है .सुमेर ने तो चालीस हजार लगा दिये .'
वर्मा को ताज्जुब हुआ ,'बाप ने इत्ता रुपैया दै दिया ?'
'उसे कांग्रेस का सपोर्ट मिला है .अभी एक मकान बेचा था उसी का पैसै मिला सो इलेक्शन में लगा दिया '
'अरे चालीस हजार खर्च किये ,'मास्टर ने बात समझाई,'जीत गये तो समझो आ गये राजनीति में ,फिर तो पचासगुने कमा लेंगे .लग्गू-भग्गू अभी से साथ लग जायेंगे .सारे दंद-फंद अभी से सीखते चलेंगे .'
'काहे,तुम किसे वोट दे रहे हो बबुआ?'
'हम तो सुमेर को ही देंगे ,कह रहा है जीत गये तो छात्रों के हित के लिये लड़ेंगे .,पोस्टों में रिज़र्वेशन खतम करायेंगे .छात्र-वृत्ति योग्यता और आर्थिक स्थिति के हिसाब से मिलेगी ..और भी बहुत से प्लान्स हैं '
'करा लिये भइय़े,करा लिये .सब करा लिये .,'वर्मा जी उठकर खड़े हो गये ,'सरू-सुरू में सब ऐसे ही डकराते हैं .'
और अपना झोला उठा कर चल दिये .
बताइये चाचा जी ,एक तिहाई कोटा रिज़र्व हो जायेगा तो हम लोग क्या करेंगे ?
इसीलिये लड़के इतना शोर मचा रहे हैं .'

तरु का मन उधऱ ही लगा है -पर उस बारे में कोई बात नहीं हो रही .टॉपिक ही बदल गया है

क्या सुना था अभी थोड़ी देर पहले ?

इतने दिन हो गये  चुनिया के केस को चलते , वही या फिर कुछ हुआ   ?
फिर किसी लड़की को .....
.स्तब्ध-सी  बैठी है .
बाहर  वार्तालाप चल रहा है , आवाज़ें कान तक पहुँच रही हैं कि नहीं !

'लड़कों  इसमें नहीं पड़ना चाहिये ,'ध्यानू मास्टर ने ज़ोर से कहा ,'तुम अपनी पढ़ाई लग कर करो ,तुम्हें औरों से क्या ?'
'हमें कुछ क्यों नहीं ,बाऊ जी ?हम फस्ट डिवीजन लायें ,तो भी हमें कोई नहीं पूछेगा और वो चार साल में सरकारी मदद से थर्ड ले आये तो पहले नौकरी उन्हें मिलेगी ,पहले प्रमोशन उनका होगा चाहे करना-धरना कुछ न आये .ज्यादा तो हमें ही मतलब है .'
मास्टर जी की पत्नी कूड़ा फेंकने निकली थीं ,वहीं रुक कर सुनने लगीं .
उन्होंने लड़के की बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त की ,'ये तो बहोत गलत बात है .'
शुक्लाजी और मास्टर जी चौंक कर उधर देखने लगे ..
वे कह रहीं थीं ,'लायकियत पे देना चाहिये काम .ये क्या कि वो ऐसी जात के हैं तो वो ज्यादा सगे हो गये .और हमारे बच्चे लायक हो कर भी नालायक हो गये !'
'वजीफ़े उन्हें अलग से ,उमर में छूट अलग से ..'बबुआ ने जोड़ा .'
मास्टर जी को बड़ा नागवार गुज़र रहा था ,पर चुप लगाये रहे .मास्टरनी को अपने होनहार पूत पर बड़ी उम्मीदें थीं .सरकार की नाइन्साफ़ी सबसे ज्यादा उन्हें खटकी ,'हमारे बच्चे पैसा लगाय के मेहनत करके पढ़ें और सब बेकार जाय,फिर ये करेंगे क्या ?'
' डंडे चटखायेंगे ,बेकार घूमेंगे. अऊर का ?' शुक्ला जी अपनी बीती बोले .
'वो थर्ड डिवीजन में हो के अच्छा काम कर लेंगे ? मास्टरनी के मन में द्विविधा थी.


'लड़के कह रहे हैं आग लगा देंगे .'बबुआ ने सनसनीखेज़ सूचना दी .

मास्टर जी चौंक गये ,'कहां लगा देंगे आग?'
'ये हमें नहीं मालूम. पर  कह रहे थे कुछ करेंगे ज़रूर.'
'तुम मत पड़ना इस सब में .तोड़-फोड़.आगज़नी,लूट-पाट,क्या होगा इससे ?'
शुक्ला जी तंबाकू दबाये सुनते रहे .
'फिर काहे से होगा ?ये लोग तो इलेक्सन के पहले ही वादे करके वोट माँगेंगे ,और फिर हमारा क्या होगा ?'
'तुम चुपचाप पढ़ो बैठ के ,'मास्टर जी रोष में आ गये ,'चलो अंदर ,तुम इस सब में नहीं पड़ोगे .'
बबुआ को घर चलने का इशारा करते हुये वे उठ पड़े .
मास्टरनी पहले ही चल दी थीं ,पीछे-पीछे जाता हुआ बबुआ कह रहा था ,'किसी को कुछ नहीं करना तो कौन आगे आयेगा क्या ? क्या फ़ायदा इस पढ़ने-लिखने से ?.हमारे लिये कोई कुछ नहीं करेगा ,हमें अपने आप लड़ना पड़ेगा .'

मास्टर जी अंदर जा कर आँगन में खड़े हो गये और अंदर आते लड़के को डाँटा ,'अच्छा ज्यादा ज़बान मत चलाओ ,हमारी अपने बाप के आगे बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती थी.अभी किसी लायक नहीं तब ये हाल हैं .'

'अरे , तो क्या कह रहा है ,'माँ ने बेटे का पक्ष लिया ,'भुगतना तो उसी को पड़ेगा ...और अपनी सोचो सुराज के पीछे तुमने नहीं पढ़ाई छोड़ी ?नहीं तो आज मास्टरी करते न झींकते होते .'
'मास्टर जी की दुखती रग छू दी थी उनने ,एकदम बौखला गये ,'तुम और ओरी ले ले के बिगाड़ो.कहो जा के लगाये आग गिरफ़्तार होये जाके ,फिर मुझसे मत कहना लाओ छुड़ा के .'
'काहे गिरफ़्तार होगा शान्ति से सब समझ जायेगा .'
मन का आक्रोश दबाये लड़का चुप खड़ा रहा .

अंदर से आवाज आई ,'दुलहिन हो ..कहाँ बैठ गईँ जाय के?'
अरे, मैंतो भूल गई ,माँजी बुला रहीं  थी .
'आई'.वह हड़बड़ा कर चल पड़ी . पैकेट वहीं रखे रह गये .


*
(क्रमशः)