गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कुँवारे क्यों

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(यह आलेख उस समय लिखा गया था जब कलाम साहब भारत के राष्ट्रपति थे ,अटल जी प्रधान मंत्री और कुमारी मायावती उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री .)
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मेरी मित्र निरुपमा की पुत्री का विवाह था।लडकी की शादी , काम की क्या कमी !हफ्ते भर पहले से हाथ बटानेवालों का आनाजाना शुरू हो गया था ।रिश्तेदार -संबंधियों का आना होने लगा था ।घर में हर समय हलचल मची रहती थी ।नये-नये आने वालों को हर काम तो दिया नहीं जा सकता था ।दुल्हन के जेवर कपडों और सन्दूक सँभालने की जुम्मेदारी निरुपमा ने मुझे सौंप दी थी ।लिस्ट बनाना,हर चीज व्यवस्थित है या नहीं ,कपडों के मैचिंग सेट बनाना ,कहीं कुछ अधूरा तो नहीं रह गया ,क्या -क्या कहाँ-कहाँ से आना है ,भिन्न-भिन्न अवसरों पर दुल्हन क्या पहनेगी उसका पूरा प्रबंध करना मुझे सौंप दिया गया था ।परिवार के दो लडकों और मीता की सहेली शिखा मेरी सहायता के लिये तैनात थीं ।डाइनिंग हाल में एक स्टोर टाइप का कमरा था ,कमरा क्या कोठरी, जिसमें खास-खास सामान रखा जाता था । जेवरों के पिटारे और सन्दूकवाली इस कोठरी की चाबी हमेशा मेरी कमर में खुँसी रहती थी ।डाइनिंग-हाल में हर समय कोई न कोई मौजूद रहता था ,और खाने -नाश्ते के समय तो कुर्सियाँ भरी ही रहती थीं ।मैं अक्सर अपनी चाय नाश्ता अन्दर ले लेती थी ,खुला हुआ सामान बार-बार कौन बन्द करे रितु और निमा मेरी सुविधा का ध्यान रखती थीं ।
परिवार के बुजुर्ग पहले राउंड में भोजन कर जाते थे ,अगली पीढी के खाने का कार्यक्रम बाद में हा-हा हू-हू के साथ देर तक चलता रहता  था । शादी का मस्ती भरा माहौल ,भोजन से ज्यादा रस वे बातों में लेते थे ।।लडके -लडकियाँ मिल कर एक-दूसरे की खिंचाई कर रहे थे ।बात-बात पर ठहाकों का शोर !ऐसे ही चर्चा छिड गई ए.पी.जे. कलाम साहब और अपने वाजपेयी जी की ।उस समय उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं ।
नितिन ने कहा ,'पता नहीं अपने वाजपेयी जी कुँवारे क्यों रह गये ?'
'अरे भई ,हिन्दुस्तान में लडकियों का परसेन्टेज ,लडकों से बराबर कम होता चला जा रहा है ।कुछ को तो कुँवारा रहना ही पडेगा ।वाजपेया जी ने उदाहरण पेश किया है ।'
'ये बात नहीं ,'एक लडकी की आवाज थी ,'वाजपेयी महिला विरोधी हैं ।खाना-आना तो अपना बना ही लेते हैं। ।अपने घर में महिला का शासन उन्हें पसन्द नहीं। पी.एम. हैं ,खुद तो बिजी रहंगे ,घर में पत्नी की ही चलेगी ।'
'वाह री अक्ल की पुटलिया ,पी.एम. तो अब बने हैं शादी की उम्र निकलने के बाद ,' अमन ने टोक दिया
'बात वो नहीं है ।असल में उन्हें बच्चे पसंद नहीं हैं ।शादी की होती तो बच्चे होते ।देखा है कभी उन्हें बच्चों के साथ ?जब कि कलाम साहब को बच्चों के बीच में ही आनन्द आता है ।ये हमेशा बच्चों से बचते हैं ,' बोलनेवाली शिखा थी ।
' नहीं भई ,बात बच्चों से बचने की नहीं है ।आबादी इतनी बढ रही है उस पर भी तो कंट्रोल करना है ।राष्ट्रपति और प्रधान मंक्त्री अगर लालू की राह चल पडें तो सारा देश बिहार बन जायेगा ।'
'तुम गलत सोच रहे हो ।शादी कर ली और बच्चे हुये तो उनके लिये भी ,मेरा मतलब है उनके भविष्य की भी सोचनी पडेगी । देखो न,पंडित नेहरू ने इन्दिरा जी और इन्दिरा जी ने राजीव -संजय को आगे बढाया ।अब सोनिया जी के रहते राहुल-प्रियंका का इन्तजाम हो रहा है ।अपने वाजपेयीजी वंशवाद के खिलाफ़ हैं ।और संतान होगी तो वे खुद नहीं , तो चमचागीरी में  और लोग उसे मिनी वाजपेयी कह कर आगे धकियायेंगे ही ,' चमन ने स्पष्ट किया ।
'बेकार की बात !पहले संघ में थे इसलिये शादी नहीं की ,फिर उमर इतनी हो गई कि सोचा होगा ढंग की लडकी मिल भी गई  तो लोग हँसेंगे ।
'नहीं भई ,जिस लडकी को चाहते थे उसकी शादी कहीं और हो गई ,इसलिये कुँआरे ही जिन्दगी बिता रहे हैं  ,' सूचना देनेवाले बच्चूभाई थे ।
'सच्ची क्या ?तुम्हें कैसे पता लगा ?' शिखा बच्चू की ओर खिसक आई ।
'पता लगने की खूब कही !कई बार ऐसा देखा गया है ।कवि आदमी तो हैं ही स्टूडेन्टलाइफ में ही कोई भा गई होगी !उसी का खामियाजा आज तक भुगत रहे हैं ।'
इसी बीच मोहल्ले की दादी ,बुआ का सहारा लिये डगर-मगर करती आ पहुँचीं थीं।बुआ को पेपर वगैरा पढने का शौक है ,वे बोलीं ,'एक बार पाकिस्तान की कोई  महिला  इनसे शादी करने को तैयार थी -पेपर में पढा था हमने ।'
'तो कहे नाहीं कर ली ,' दादी पोपले मुँह से कहने लगीं ,'बडा अच्छा मऊका रहे ।दोनों देस एक हुइ जाते ।पहले के राजा महराजा अइसे बियाह करके आपुन ताकत बढावत रहे ।'
'ऐसे विवाह राजनीति के हिसाब से बहुत फायदेमन्द हैं । दादी ,तुम्ही समझाओ न !' रितु अपनी हँसी दबाये थी
'लेकिन हमारे राष्ट्र पति भी तो क्वाँरे हैं ।'
' उनकी हेयर स्टाइल ऐसी है कि लडकियों की तरफ निगाह ही नहीं जाती ।उनके लिये एक का पति होना ही काफी है ।'
'पति ?बिना ब्याह के ,किसके पति ?'
'राष्ट्र के ! पर उन्हें बच्चे पसन्द हैं।दुनियादारी छोड़-छाड़ के जुटे रहे शुरू से अपनी धुन में , अब  सारे राष्ट्र के बच्चे उनके बच्चे । '
' पता नहीं आज कल के लडके ,उनसे कुछ सीख क्यों नहीं लेते !स्टूडेन्ट लाइफ में ही गर्ल फ्रेन्ड्स ,और वेलेन्टाइन डे .....।'
'सभी लोग वाजपेयी और कलाम हो गये तो तेरा क्या होगा ,बहना ?'
जोर का ठहाका ! दूसरे ने छौंक लगाया ,' फिर तो इन्हें मायावती बन कर जिन्दगी गुजारनी पडेगी ।'
अब की लडकियाँ शर्माती कहाँ हैं ,चट् से जवाब दिया ,'तब तो सारा बजट बर्थ- डे मनाने में सिमट जायेगा फिर भी कमी पडेगी ।'
दूसरी ने जडा ,'साहूकारों ,अफसरों, बिजनेस और ठेकेवालों से ' लै लै आओ धर-धर जाओ ' वाली नीति लागू कर दी जायेगी ।'
मुक्ता काफी दिन कानपुर में रही थी ,बात का सूत्र उसने अपने हाथ में लिया ,' हम बतायें पूरी बात ?जब अपने पी.एम. अपने पिताजी के साथ कानपुर के डी.ए.वी.कालेज में पढते थे तो इनकी दादी ने इनकी अम्माँ से कहा -काहे अब अटल्लू को बियाह काहे नाहीं करतीं ? घर में बहुरिया आवै ।'
माँ और दादी ने कहा तो कहने लगे अभी तो हमारी और पिताजी की पढाई चल रही है ।पढाई पूरी हो गई । पर ये घर में टिकें तब न ! संघ के स्वयं-सेवक बन कर मारे-मारे घूमते थे ।दादी चाहती थीं पुत-बहू का मुँह देखें ,पडपोता खिलायँ ।कभी इनके पिता से कहें ,कभी माँ से ।माँ की सुनते कहां थे ,भारत माँ के आगे ।
दादी ने एक बार इनके सामने  माँ को टोका तो वे खीझ पडीं ,' नाहीं सुनत तो हम का करैं ?आपुन प्राण दै दें का?'और 'प्राण देने की बात सुन कर अटल्लू उठे और बाहर चल दिये ।
रोहित ने विस्मय से पूछा ,'ये प्राण देने की बात कहाँ से आ गई ?'
'पहले ऐसे ही कहा जाता था -प्राण खाये जा रहे हो ,जान ले लो हमारी ,क्यों प्राण दिये दे रहे हो वगैरा-वगैरा ।'
'किसी को इस पर हँसी नहीं आती थी ?कहते -कहते मुक्ता खिलखिला कर हँस पडी ।
' पहले के बच्चे हमलोगों जैसे नहीं थे ,प्राणों की बात सुनते ही दहल जाते थे ।हमारी खुद की दादी ऐसे बोलती थीं । तब बडी जल्दी प्राणों पर बन आती थी ।'
'अब लोग समझदार हो गये हैं ,प्राणों का लेन-देन इतनी आसानी से नहीं होता ।'
'पर बात तो वाजपेयी जी की हो रही थी ।'
'वही तो ,उन्हें लगा अभी तो दादी प्राण देने को तैयार बैठी हैं,कहीं लेने पर तुल बैठीं तो !बस डर कर भाग लिये ।'
'सच कह रही हो ?तुम्हें कैसे पता ?'
' हमारा अन्दाज है कि ऐसा हुआ होगा ।'
' बेकार बको मत ! संघ मे जाने का शौक इन्हें शुरू से था ।स्वयंसेवक का व्रत लिया था ,शादी कैसे करते ?'
'तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे पूछ कर चले आ रहे हो ?'
'तो पूछ भी लेंगे !अबकी बार इधर आयें तो यही सही ।'
ये मैं पहले बता दूँ कि ये लोग थोडे सिरफिरे हैं ,जो कहते हैं कर गुजरते हैं । एक बार एक मंत्री जी को घेर चुके है । तुले बैठे हैं ,मौका मिला तो पूछने से बाज नहीं आयेंगे ।
वाजपेयी जी कभी इधऱ आयें तो आमने -सामने को तैयार रहें .
सुनने की उत्सुकता हमें भी रहेगी ।

शनिवार, 7 अगस्त 2010

भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो.

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मनो जगत में रहनेवाले सूर ,को स्वर्ग में कुछ मज़ा नहीं आ रहा .आँखों से देखने की आदत दुनिया में छूट चुकी थी .कृष्ण की लीलाओं में विभोर मन नित प्रति नई संभावनाओं में खोया रहता था पर स्वर्ग तो स्वर्ग! जो चाहें एकदम हाज़िर .जब कोई अभाव नहीं कोई कमी नहीं तो कल्पनाएं कुंठित होने लगीं. .मनचाहा जब असलियत में सामने आ जाये तो उसमें वह आकर्षण कहाँ !जहाँ कोई कल्पना की चट् साकार ,कोई कामना जागी तुरंत पूर्ण .जब कोई कमी नहीं ,हर चाह उठते ही कामना की पूरी तो तृप्ति का आनन्द कहाँ
आखिर क्या करें .रचें तो कैसे रचें पद ?मनोमय कोष के सारे तंतु व्यर्थ .कृष्ण तो यहीं हैं ,जहाँ याद करो प्रकट ,पर सोचना तो पड़ता है न कि उनके अपने काम-धंधे होंगे यहाँ हर समय याद भी नहीं किया जा सकता .वहाँ के सारे मज़े खतम कि चाहे जो सोचो ,मनचाही कल्पनाएं करों लीन रहो अपने आप में .यहाँ तो ज़रा कोई बात मन में आई सब पर ज़ाहिर .
अपने आप में कुछ कर ही नहीं सकते हुँह यह भी कोई ज़िन्दगी है ?ऐसी सार्वजनिक जीवन में क्या मज़ा !
यहां से तो वो दुनिया अच्छी ,मनमाने ढंग से रह तो सकते थे ..काफ़ी सोच-विचार के बाद पहुँच गए वल्लभस्वामी के पास
बोले , 'प्रभु,मैं बिरज -भूमि जाना चाहत हौं ।'
वल्लभाचार्य जी कुछ चौंके ,'काहे सूर ,जे अचानक का हुइ गयो है ?
सूरदास ने कहा ,' अचानक नाहीं प्रभो , मोहे बहुत दिनन से बिरज की भौत याद आय रही है ।...'
'समय कहूँ रुकत है बीत गयो सब ,बदल गयो है सब अब कुछू नाहीं मिलिहै उहाँ.
काहे ,वह पावन भूमि मोहन को चिर- निवास है ।राधा-मोहन ,गोपी -ग्वाल ,वह जमुना ,वह गोवर्धन गिरि ,सबै कुछ वहीं है । तब भी कल जुग रहे ,तब हतो सो अब कहाँ जैहे .ऊ सब तो चिरंतन है ,बीत कैसे सकित है . मथुरा नगरी तीन लोकन से न्यारी और वृन्दावन ...भावातिरेक से आकुल हो उठे सूर .
वल्लभ स्वामी चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहे हैं सोच रहे हैं इस बावले से कहने से क्या लाभ .
फिर भी कह उठे-

बीत गयो वह जुग ,अब कलजुग ने पग बढाय सब समेट लियो है ।तुम जो चाहत हो कुछू नाहीं बच्यो ।'
वल्लभाचार्य जी बोले ,'जो बीत गयो सो बीत गयो उन युगन में अब काहे जीना चाय रहे हो ?'
वल्लभ सोच रहे थे तब भी प्रज्ञा-चक्षु थे .संसार कितना देखा !जो लिखा वह कितना वास्तविक था कितना अनुमान और कल्पना।मोहित मानस में जो उदित होता गया रचते गये मोहन के आकर्षण की माया में रमा चित्त कमनीय कल्पनाओं में विभोर रहा ,और नये-नये चित्र आँकते गए सूर .
कीर्तन की बेला में नित्य नवीन रूप उदित हो जाता और वाणी संगीत के सुरों में बाँध कर अंकित कर देती . रात-दिन उसी के माधुर्य में डूबे ,मनोजगत में वही दृष्य निहारते ,बाह्य जगत से मतलब कहाँ रहा था .उनकी दुनिया वही थी गोपाल और उनकी लीला-कला .
कुछ समय बीत गया ,फिर एक दिन सूर कह उठे
,प्रभू,बिरज की भूमि- दरसन की चाह चैन नाहीं लेन दै रही .
,च्यों सूर ,का होयगो हुअन जाय के .अब उहां वैसे कुछ नहीं बच्यो है.
हर दूसरे-तीसरे वही राग ,जैसे धुन सवार हो गई हो .
सूर समझते ही नही ,अपना राग पूरे बैठे हैं ।
वल्लभस्वामी परेशान !कैसे प्रबोधें इस बावले को ,जो सोचना-समझना नहीं चाहता ।
बावला हुइ गयो है ,बीते जुगन को जियो चाहत है .जियत तो तबहूं बीते जुगन को हतो ,पर तब सूर रह्यो ,नादान
अब अब बुद्धि आय गई है सोचनकी -विचारन की .
कैसे समझाएं महाप्रभु.यह समझ ही तो है जो कभी चैन नहीं लेने देती .दुख को कारन इहै है .
काल का प्रवाह कहीं रुका है !कितना पानी बह चुका तब से जमुना में ।अब तो लगता है पानी ही चुक गया .जमुना .क्या जमुना रह गई हैं ,?कुछ भी नहीं वैसा !मथुरा -वृंदावन, कुरुक्षेत्र कहीं कुछ हैं ?सब बीत चुका है  .पर ये है कि मानना ही नहीं चाहता और झक्क लगाये बैठा है ।अब कहाँ वह वृन्दावन,और कैसी मथुरा ।कहाँ द्वापर और कहाँ घोर कलियुग ।जो बीत गए उन युगों में जीना चाहता है पागल .बाहर की दुनिया देखी नहीं भीतर उतरते चले गए .
महाप्रभु इन चरनन को मोहे बड़ो भरोसो है ।
'सो तो है सूर .. पर तुम काहे घिघियात हो ।उहां पर तो सूर हते सूरै बन के रहो ।
अब हुआं कछु नाहीं धरो ।'
सारो संसार भीतर समायो है चित्त एकाग्र करो सब मिल जैहे ।' '
महाप्रभु ,मोहे इन चरनन को दृ़ढ भरोसो है ,
सो तो है सूर!
*
अरे भक्ति करो पर ये किसने कहा कि बुद्धि को ताक पर रख दो !कुछ तो संतुलन चाहिये ही ।
पर कौन समझाये उसे !
जब दुनिया में था तब की तरह अब भी सोचता है ।
'ठीक है सूर ,मिल आओ अपने प्रभु से ।कराये देते हैं इन्तज़ाम ।'
ब्रजभूमि ,जमुना तट ,कदंब ,तमाल ।
गोप-गोपी ,राधा अब वहाँ कहां होंगे ।
लीला भूमि तो है न।
'ठीक है सूर ,देख आओ जा कर .कर आओ उस लीला भूमि का साक्षात्कार .कराये देते हैं इन्तज़ाम ।'
ब्रजभूमि ,जमुना तट ,कदंब ,तमाल !
गोप-गोपी ,राधा अब वहाँ कहां होंगे ।सोचते रहे आचार्य .
थे तो तब भी नहीं .पर तब दुनिया वहाँ नहीं थी जहाँ आज पहुँच गई है
लीला भूमि का नाम अभी भी है .
जाने किन सपनों में खो गए सूर .बस अब तो जाना है उसी लीला भूमि में .साक्षात् होगा उन्हीं सबसे जिन्हें छोड़ कर चला आया था .
चलते समय की वह लीला -खंजन नयन रूप रस माते सारी वृत्तियां लीन हो गईं थीं जिसमें .
अब फिर नए सिरे से .
*
आ गए धरती पर .चकराए से खड़े हैं सूर
पता नहीं कहाँ आ गए .
अजीब सी दुर्गंध छाई है -कुछ खट्टरखट्ट बराबर चल रहा है .काहे की आवाज़ें ?
कहीं से उत्तर आया अरे कारखाना लगा है .उसी की महकें और शोर !
हे कृष्ण ,हे मुरारी !

तब दृष्टि नहीं थी ,अब दर्शन करना चाहते हैं सूर उस पावन धरा-खंड के .
पर यह क्या ?धूल उड़ रही है चारों तरफ़,हरियाली कहाँ ?जमुना-जल -कैसा धूसर रहा है . क्षीणधारा .जल है या .कैसी हो गई जमुना.  .कहाँ है वह शीतल ,निर्मल पावन जल ?
नहीं यह नहीं ब्रज-भूमि ,कहीं और आ गया हूँ .
*

आँखें बंद कर लीं .नहीं आँखे नहीं खोलूँगा ,अनुभूति हृदय करेगा.
अरे यह मानस में क्या उदितहो रहा है -
मुँह से निकला - हाय रे ,जौ का पहिरे हैं ब्रजराज !जे पहरावा तो हम कबहूँ नाय देखो ।कउन गत को नाहीं ,मोटमोट टाट जइस कपरा मार उड़ोसो रंग और हाथन में जे का है ।बाँसुरी तो लगत नाहीं ।,,'
जौ का पहिरायो है ब्रज राज को ?एक मोटे कपड़े का फटुल्ला-सा चिपका-चिपका पाजामा ,
ऊपर से अजीब शक्लोंवाली सदरी ,सदरी भी नहीं गले पर कुछ उठा-उठा ,औरक्र से कुछ ही नेचा तक का
न पीतांबर ,न बाँसुरी न वैजयन्ती माला ,एक कान में बाली सी पहने ,अरे इनके मकराकृति कुंडल कौनो चुराय लै गया का ?
अंदर से आवाज़ उठी
जीन्स ,टीशर्ट ,हाथ में ये क्या बाँसुरी की जगह सेल-फ़ोन .
नई धज बनाई ब्रजराज की .
चक्क रह गए सूर .
जे जीन्स और सर्ट पहराय दई है ।आजकल के लौंडन की नाईं और हाथ में फ़ोन पकड़ाय दीन्हों ..'
'फोन ,ई का होत कौनो नई बाँसुरी है का ?
'अरे इह में मुंह धर के कोई कित्तेऊ दूर होय बात करि सकत हो ।'
सूर चकित !
मन में उठा - हमसे बात कर सकित हैं ?
समझ गये आचारज -
नहीं सहन हो रहा .नहीं देखा जा रहा .
ई सब देखन से तो अपनी आँखिन को फोड़िबो भलो .
पास पड़ी एक सींक उठा कर आँखस फोड़ने को तत्पर होगए सूर ,
अचानक ही हाथ पकड़ लिया किसीने .'ई का करत हो
खुल गए नेत्र .
तन्द्रा में चले गए थे सूर .कैसा अनुभव -परम विचित्र .
चाह की प्रबलता धरती पर खींच ले गई थी क्या .
नहीं, नहीं अब नहीं जाना है ,नहीं देखना है कुछ .
पर कैसे बदल गया यह सब .
यह तो चिरंतन लीला है काल का दाँव नहीं चलता इस पर .फिर कैसे ..?
इस भौतिक संसार में कहाँ ढूँढ रहे हो सूर, चिरंतन लीला है यह पर मनोमय-कोश की .कौन समझाए तुम्हें !यहां कुछ नहीं मिलेगा .
नहीं ! कभी नहीं !
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कबीर की वापसी - अमेरिका में - भाग 2.

*
आ ही पहुँचे अमेरिका में कबीर ,तो शरीरके धर्म तो निबाहने ही पड़ेंगे ।मन भी बड़ी अजीब चीज़ है ।शुरू-शुरू में जो भाता नहीं जिससे मन बिचकता है ,धीरे-धीरे आदत पड़ते ही उसकी कमी खलने लगती है ।अपने यहाँ देखा करते थे पत्तियां पीली पड़ कर झरने लगती है ।पेड़ झंखाड़ सा खड़ा रहता है ।मन में वैराग्य की लहरें उठने लगती थीं ।वैसे भी कबीर जनम के वैरागी ,अनुराग के लिये न अवकाश न मनस्थिति ।नीरू-नीमा ने दन-रात कपड़े बुनबुन कर जीविका चलाई .
रूखी-सूखी खाते बड़े हुये ।जात-पांत का ठिकाना नहीं.
जात-पाँत ?कबीर कब से जात-पाँत मानने लगे तुम?
यहाँ सब-कुछ निराला ।पतझर क्या आया वनराजि नये-नये रंगों में सजने लगी ।जैसे वनों के अंचल में इन्द्रधनुषी फव्वारे फूट पड़े हों ।पत्ते झरने का उत्सव तना रंगीन ,विषाद की छाया से परे जैसे जाने का कोई ग़म नहीं ।जीवन को पूरी शिद्दत से जीकर जो आत्मतोष मिला उसी उत्साह से यह बिदा बेला उद्दाम आवेग के साथ मनाने को उद्यत हैं ।प्रकृति में मृत्यु से पूर्व जैसे एक महोत्सव का प्रारंभ हो जाता है । .चींटयों- पतंगों के पंख निकल आते हैं ,दीपक की लौ पूरे तेज से उद्दीप्त हो उठती है ,गिरने के पहले पत्ते चटकीले रंगों में रँग जाते हैं ।बिदा लेने से पूर्व जिजीवषा अपने चरम पर होती है ।पूरे तेज और ऊर्जा के साथ उद्दीप्त । और उसके बाद अंत -अवश्यंभावी समापन 1
कबीर बोले ,'यह कैसा उत्सव ?कैसा मरण का आनन्द !दिवस चार का पेखना अंत रहेगी छार !'
स्वर्ग से भेजे गए थे .जिज्ञासा उठी मन में तो समाधान भी होना था .
भीतर से कोई बोल उठा -
'संत जी, छार रहेगी वह तो ठीक पर उससे पहले चार दिन का यह आनन्द क्या परम चेतना की आनन्दानुभूति का नृत्य नहीं ?मृत्यु का सोच-सोच कर आगत की चिन्ता कर जीवन दूभर क्यों करो ?वर्तमान को विषाद का पर्याय बना डालना कहाँ तक संगत है ?मुक्तमना उत्सव के प्रहरो में स्वयं को डुबा दो ।आनन्द क्या कुछ नहीं ! परमात्मा तो स्वयं सत्चित्आनन्द है ।आने और जाने के बीच की हलचल कोलाहल ,जीवन का कल्लोल -विलोल बिल्कुल बेकार है ?वास्तव में वही जीवन है ।आगे पीछे उसी की भूमिका और उसी का उपसंहार ।अस्तित्व पता नहीं कहाँ चला जाता है ,जब पता ही नहीं क्या होगा तो यह बीच का रागरंग क्यों अस्वीकार कर दिया जाय ?बहते चलो जीवन प्रवाह में ।
कबीर चुप रहे ।
'क्यों दार्शनिक, आनन्द क्या सर्वथा त्याज्य है ?महाप्रकृति की लीलामयी क्रीड़ा इसी धारा के प्रवाह में व्यक्त होती है फिर हम कुंठायें क्यों पालें ?ये फूलों के रंग रमणीय प्रकृति का सौंदर्य तुम्हें सर्वथा त्याज्य लगता है ?जीवन भर सूखे पत्ते बने रहें क्योंकि मृत्यु अवश्यंभावी है?'

मैने कभी इस दृष्टि से सोचा नहीं ।मेरा तो जीवन वंचनाओं में बीता। विधवा ब्राह्मणी ने जाया और छोड़ दिया लहरतारा के किनारे । रंगरेज दंपति ने उठाया ।संतान का पूरा दायित्व उय़ाया ।अभावों मे सारा जीवन बीता निम्नवर्ग की कुंठायें ओढे-ओढे बड़ा हुआ ।ताना-बाना तानते ,चदरिया बुनते उमर निकल गई ।पढने-लिखने का न अवकाश था न सुविधा ।ऊपर से कितनी कटुतायें कतने अवरोध सामने खड़े। सिर झुका कर रहना स्वभाव में नहीं था दुनिया के रंगढंग से जी उचटने लगा। कितने आडंबर ,झूठ,स्वार्थ की पूर्ति के लिये आत्मा को गिरवी रख देना । थोड़ा सा महत्व पाने के लिये लोगों को धोखे में रखना .वासनातृप्ति के लिये संसार को गुमराह करना ।यह सब मिथ्याचार और आडंबर मुझसे सहम नहीं होते थे ।मैने नहीं जाना सुख-चैन क्या है ,आनन्द क्या है ।
आसक्तियों से दूर रहने की चेष्टा की .नारी से दूर भागता रहा .
कोई हँसा -क्यों दूर भागते रहे -सर्वथा हेय है नारी?
'दुनिया के झंझटों में नहीं फँसना चाहता था... .'
अचानक एक विधवा ब्राह्मणी का ध्यान आ गया , .यौवन में विधवा लुंचित केश,व्रत और श्रम करते दुर्बल शरीर पर ,अपने आप को सबकी निगाहौं से बचाती , अस्तित्वहीना सी  ,अमंगल की आशंका से ,मोटी सफ़ेद धोती तन पर लपेटे .लहरतारा के किनारे आई है आंचल में छिपाई एक बंडल किनारे पर धरा पल भर खड़ी रही फिर ,आँसू पोंछती मुड कर चल दी.
इसी झंझट से बचना चाहता होगा वह आदमी ,
शुरू से देखा ,नारी का तिरस्कार ,पैर की जूती !
कैसे जी होगी कैसे रहती होगी .अपराधिनी वही थी ?
नारी के मन उसकी आत्मा नहीं होती ?
बार-बार उस बेबस असहाय नारी का ध्यान आता है.

जीवन लड़ते ही बीता हिन्दू-मुसलान ,ऊँच -नीच ,धनी- -निर्धन लगातार द्वंद्व ।ऊपर से अज्ञानी लोगों ने प्ने जाल पसार रखे थे ।साधारण मनुष्य विभ्रमित हुआ जा रहा था ।मैं क्योंकि उनमे नहीं था अलग खड़ा रह गया था इसलिये सब देख पा रहा था ।देखने और सोचनेवाला दुखी होता है ।दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवे ।मैं अपने दुख पर नहीं संसार की मूढता पर रोया था ।अगर सोच लें जीवन चार दिन का है तो सुखपाने के लिये अकार्य न करें वासनाओं से दूर रहे ।
न कभी अवकाश मिला न धरती के सोच से ऊपर उठने का वातावरण ।जीवन में कला सोंदर्य का महत्व कैसे पता चलता जब रोज़-रोज़ से झंझटों से ही छुटकारा न मिले ।
'अब धरती के दुखों-अभावों की छाया से मुक्त क्यों नहीं होते ?जीवन का यह दूसरा पक्ष जीने का मौका भी देगा करतार ,जरूर देगा .
पूरे पाठ पढे बिना छुटकारा नहीं पाओगे अभी कितना पढ़ना-गुनना है तुम्हें ,कबीर !चाहे जित्ती चीख-पुकार मचा लो !काहे को लाद लाए हो सिर पर वहाँ की गठरिया.मुक्त होना चाहते थे न! मन को तो मुक्त करो पहले . मँजना होगा रगडे-खा-खा कर हर जनम.वहाँ से ठेले जाते रहोगे, जब तक स्वच्छता से दमक नहीं उठते .'
पढ़ना-गुनना ?हाँ, अभी हुआ कहाँ
?!बहुत कुछ बाकी रह गया है .

सिर झुकाए बैठे हैं सोच-मग्न कबीर !

*

बुधवार, 14 जुलाई 2010

प्राइवेसी कहाँ !

*
(व्यंग्य)
प्राइवेसी कहाँ !

हमारे देश के कवियों का भी जवाब नहीं ।नारी से संबद्ध रीति-नीति का जितना ज्ञान उन्हें है और किसी देश के कवि में मैने नहीं पाया ।वैसे अन्य देशों के कवियों के बारे में मेरा ज्ञान सीमित है ,किसी को पता हो तो सूचित करे । हाँ, तो नारी तन के समग्र-वर्णन और उसके क्रिया-कलापों के सूक्ष्म-चित्रण में एक से एक पहुँचे हुये मर्मज्ञ यहाँ मिलेंगे ।यह परंपरा संस्कृत से शुरू हो जाती है ,उसके पहले से भी हो सकती है ,पर मुझे पता नहीं । वैसे कवि और नारी का संबंध जन्मजात है -किसी अच्छे-खासे व्यक्ति के भीतर कवि तब जन्मता है जब उसका नारी से साबका पड़ता है ।और यह संबंध हर चरण में किसी न किसी प्रकार व्यक्त होता रहता है । अपने महाकवि कालिदास, गोस्वामी तुलसीदास किनकी प्रेरणाओं  से कवि बने कोई छिपी बात नहीं है ।जिन्हें कविकुल-गुरु की उपाधि प्राप्त है उन कालिदास के सूक्ष्म वर्णनों की दाद देनी पडेगी। पार्वती तपस्या में लीन हैं,वर्षा का जल उन्हें भिगो रहा है ।जल की बूँदें कहाँ-कहाँ कैसे -कैसे गिर कर कहाँ -कहाँ तक क्या रूप ले रही हैं ,कवि की दृष्टि-.यात्रा में कोई ब्योरा छूटा नहीं है,इतना सब तो स्वयं पार्वती को अपने बारे में पता नहीं होगा ।सचमुच सूरज की भी जहाँ पहुँच नहीं कवि वहाँ भी ताक-झाँक करने की धृष्टता पर उतारू रहता है ।अभिज्ञान शाकुन्तल में कुमारी कन्या की साँसों का शारीरिक चित्रण तो  रसिक राजा दुष्यंत के मुख से करवाया है ,गनीमत है।आगे के कवियों की क्या कहें गुरु गुड़ ही रह गये चेले शक्कर हो गये- कम से कम इन मामलों में ।
बचपन से मेंरा मन अपने कोर्स की किताबें पढने में नहीं लगता था ।बडे भाई-बहिन की किताबें चुपके से उठा लाती थी (सामने लाने की हिम्मत नहीं थी )और पढा करती थी ।किसी से समझाने को कहूँ इतना साहस कहाँ था मनमाने अर्थ लगाया करती थी ।तब विद्यापति की सद्य-स्नाता नायिका का वर्णन पढा ।मुझे बड़ा विस्मय हुआ -ये कवि लोग क्या छिप-छिप कर महिलाओं के स्नानागारों में झाँकते थे ।और नहीं तो इतना सांगोपांग चित्रण कैसे कर पाते ? इसके बाद तो वर्षों मैं बड़े ऊहापोह में रही ।कहीं जाती थी तो बाथरूम में घुस कर सबसे पहले दीवारों -दरवाज़ों का निरीक्षण करने के बाद स्नान करने का उपक्रम करती थी।मन बराबर भय- संशय में पड़ा रहता था कि कहीं कोई कवि टाइप आदमी सँधों से आँखे चिपकाये तो नहीं  खड़ा है !
उससे आगे चलिये और देखिये -एक बालिका ,जिसे हमारे यहाँ कन्या कह कर मान दिया जाता है । पर इनकी खोजी निगाहें उसे भी नहीं बख्शतीं ।क्या कपड़ा-फाड़ दृष्ट पाई है -
'पहिल बदरसन पुनि नवरंग ।
मैंने नख-शिख वर्णन पढे और दंग रह गई ।सब स्त्रियों के शरीर पर आधारित थे ।बहुत खोजा पुरुषों का नख-शिख वर्णन कहीं नहीं मिला । नारी के'नख-शिख' वर्णन की परंपरा में निष्णात कवि पुरुष के प्रति इतने उदासीन क्यों रहे मैं कोशिश करके भी समझ नहीं पाई ।किसी से पूछने की हिम्मत पड़ी नहीं ।मन में एक काम्प्लेक्स सा समाया हुआ है। लड़कों और आदमियों के विषय मे जानने को बेहद उत्सुक होने पर भी कभी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी ।अपनी सखियों से बात की पर उनका भी वही हाल था जो मेरा ।मन मार कर रह गये ।
अधिकार पूर्वक स्वयं को प्रस्तुत करने का साहस करते तो पुरुष तन और मन में पैठने का अवसर सबको मिलता ।वय के साथ होनेवाले शारीरिक-मानसिक परवर्तनो में नर का चित्रण भी उतनी ही रुचिपूर्वक करना साहित्य और समाज के लिये उपादेय सिद्ध होगा ।मैं आशा करूंगी कि अब कोई पुरुष आगे बढ़ कर इस शुभ-कार्य का श्रीगणेश करेगा ।
उधर बिहारी भी शैशव से यौवन तक होनेवाले परिवर्तनों पर अपनी  'गृद्धदृष्टि' जमाये बैठे हैं ।इन लोगों से कुछ भी बचा नहीं रहता ,नारी की प्राइवेसी खत्म । उनके  'बडो इजाफाकीन 'जैसे रुचिबोध पर मुझे बडी कोफ्त होती है ।ऐसे तो नीति के पद लिखने में भी माहिर हैं पर वैसे रीतिनीति सब ताक पर रख आते हैं।
कवियों की उक्तियाँ समाज की बहुत सी समस्याओं का हल भी प्रस्तुत कर देती हैं । बिहारी ने अपने एक दोहे में बताया है -
'वधू अधर की मधुरता कहियत मधु न तुलाय ,
लिखत लिखक के हाथ की किलक ऊख ह्वै जाय ।'
धन्य है ऐसी वधू और धन्य है ऐसा कवि !जिससे कलम बनती है वे सारे किलक अगर ऊख हो जायँ तो देश की चीनी की आवश्यकता तो पूरी हो ही ,इतनी बची रहेगी कि उसके निर्यात से विदेशी मुद्रा के भंडार भर जायेंगे ।और भी --
 ' पत्रा ही तिथि पाइये वा घर के चहुँ पास ,
नित प्रति पून्यो ही रहे आनन ओप उजास ।'
हर मोहल्ले में ऐसी दो-चार नायिकायें बस जायँ तो बिजली का संकट खत्म
उनके सौंदर्य-बोध का क्या कहना ! दुनिया भर के लुच्चे-लफंगे उनकी दृष्टि में रसिक हैं।श्लीलता ,शालीनता ,शोभनीयता सब बेकार की बातें हैं । प्रस्तुत है एक बानगी -
'लरिका लेबे के मिसन लंगर मो ढिग आय ,
गयो अचानक आँगुरी छाती छैल छुआय।'
बताइये भला लडकी ,भतीजे को गोद में खिलाती -बहलाती बाहर निकल आई है।यौवन का प्रारंभ है ।बच्चे को उछाल उछाल कर खिलखिला रही है।वह लफंगा बाहर खड़ा है। ताक लगाये रहता है लड़की कब बाहर निकले ।बच्चे से बोलने के बहाने पास आ गया ।बोल रहा है बच्चे से निगाहें लड़की पर हैं। बस मिल गया मौका ।बच्चे को गोद लेने के बहाने हाथ बढाया उद्देय़्य था लड़की के शरीर से छेड़खानी ।दाद देनी पड़ेगी कवि के मन में क्या-क्या भरा पड़ा है।
इस समय  बिहारी का नीति-बोध कहाँ बिला गया ? जरूर उस लफंगे को लडकी से लिफ्ट मिली होगी ,नहीं तो इतनी हिम्मत नहीं पडती ।पडती भी तो दुत्कार खाकर भागता ।बिहारी जानते होंगे कि कुछ लगा-लिपटी चल रही है ,नहीं तो वह बेहया लडकी भी इतना रस लेकर लफंगे को छैल कह कर उन्हं न बता पाती ।चलो, मान लिया ऐसा कुछ था तो कवि का क्या कोई दायित्व नहीं बनता !
 पर जब घर की महिलायें अपने कार्य में व्यस्त हैं ,उन पर भी ये कवि महोदय अपनी लोलुप दृष्टि डाल रहे हैं --
'अहे,दहेडी जिन धरे ,जिन तू लेइ उतारि ,
नीके छींके ही छुयै,ऐसी ही रहु नारि !'
इनके आगे तो भले घर की औरतों का काम करना चलना-फिरना मुश्किल ।उससे कह रहे हैं ऐसे ही खडी रह ।कहीं के राजा -महाराजा होते तो चारों ओर छींके लटकवा कर सुन्दरियों को उसी तरह खडा रखते ।
मुझे याद है ,जब मै ब्याह कर ससुराल आई तो सबसे छोटी बहू होने के कारण ,मुझे बहुत छूट मिली हुई थी।रसोई में देखलें तो ससुर जी फ़ौरन टोकते थे ,' अरे,उसे कहाँ चौके में घुसा दिया?
सास जी चिल्ला कर कहती थीं ,  'नहीं चूल्हे के पास बैठाय रही हैं ।सबसे पहले नहाय कर तैयार हुई जात है सो  अदहन में दार  डारै अपने आप चली गई है। महराजिन आय रही हैंगी।'
और किसी बहू से नहीं बोलेते थे पर मुझे पास बिठा कर बात करते थे ।सास जी ने भी सिर्फ़ एक रोक लगाई थी -जब  रिश्तेके एक विशेष ननदोई ,उम्र पचास से ऊपर ही रही होगी उनकी,आँगन में बैठे हों तो अपने कमरे में रहा करूँ ।
मैने अपनी जिठानी से पूझा था,मेरी तीनों जिठानियाँ ,मुझसे 10 से 25 साल तक बड़ी थीं ।उन्होंने हँसते हुये बताया,'बे मन्दिरऊ जात हैंगे तो  भगवान की बनाई की मूरतन को निहारत रहत हैं।
उन्होंने एक बार किसी से कहा भी था ,'उसकी गढ़ी सूरतें देखते हैं।'
बाद में मेरी समझ में आ गया विधि की रची मूरत- अर्थात् भगवान की बनाई नारी देह! इन कवियों की रसिकता उनसे किस अर्थ में कम है?भगवान की बनाई मूरत उनके लिये अधिक स्पृहणीय है,आदमी ने पत्थर से जो मूर्ति गढ़ी उसमें ऐसा लीला-लालित्य कहाँ !
 हाँ ,आज की विज्ञपनबाजों के लिये उपरोक्त  मुद्रा बहुत आकर्षक और उपयोगी  सिद्ध हो सकती है ।
'नासा मोरि सिकोरि दृग ,करत कका की सौंह '
क्य कह रही है यह सुनने की फ़ुर्सत कहाँ ,अपने बिहारी कवि को लड़की के चेहरे से आँखें हटाना गवारा नहीं।सोचने समझने की जरूरत किसे है।
गोरी गदकारी हँसत परत कपोलन गाड़,
कैसी लसति गँवारि यह सुनकिरवा की आड़ !
नागरी हो या गँवारी क्या फ़र्क पड़ता है ,आँखों को चारा दोनो से मिलेगा ।
एक और दृष्य देखिये !युवती नदी किनारे आई है, स्नान करना है ।पर नदी का पानी ठंडा है ।स्पर्श करती है तो शरीर में फुरहरी उठती है पानी में घुसने की हिम्मत नहीं पडती ,तट पर खडे लोगों को देखती है(हो सकता उन में उसका प्रेमी भी खड़ा हो,कवि को ज्यादा पता होगा ) सोचती है क्या करूँ स्वयं पर हँसी आ रही है,घर भी ऐसे कैसे चली जाये!.
 नहिं नहाय नहिं जाय घर ,चित चिहट्यौ उहि तीर ,
परसि फुरहरी लै फिरति ,विहँसति धँसति न नीर!
इन कवियों की महिमा अपार है ।लिखने बैठो को ग्रंथ के ग्रंथ भर जायें ।
पर बाकी फिर कभी ।

*****

सोमवार, 12 जुलाई 2010

भगवान जाने

*
संदीप बाबू बड़ी तेज़ी में बढ़े जा रहे थे ।जल्दी से आगे बढ़ कर मैंने आवाज़ लगाई ,'संदीप बाबू ,रुको ज़रा ।'
रुके नहीं वे ,बस चाल ज़रा धीमी कर ली ।
'ये आज क्या हो गया इन्हें 'सोचा मैंने और अपने कदम तेज़ कर लिये ।
'क्या हुआ ?कुछ खास बात है ?'
'आज मंगल है न !बजरंगबली को प्रसाद चढ़ाना है ।आज देर हो गई ।'
हाथ मे प्रसाद का डब्बा था ,बोले बस अभी दस मिनट में लौटता हूँ ,तुम घर चलो ।'
पता लगा लड़के ने किसी प्रतियोगिता का फ़ार्म भरा है ।हर मंगल और शनि को मंदिर में लड्डू चढाते हैं ।
*
आजकल इम्तहानों का मौसम है । मंदिरों में बड़ी भीड रहने लगी है।भगवान को प्रसन्न करने के चक्कर में हैं सब लोग ।बिना उसकी मर्जी के कुछ नहीं होता !छात्र तो छात्र उनके माता पिता भी अधिक आस्तिक होकर भक्ति प्रदर्शित करने लगे हैं ।कोई हनुमान जी को लड्डू चढ़ा रहा है कोई शुक्रवार व्रत रख रहा है कोई वृहस्पतिवार को पीले खाने की तलाश में है ।श्रद्धा की बाढ आ गई है चारों तरफ़ । अंतःकरण शुद्ध हुये जा रहे रहे होंगे,सारी मलीनता धुल जायेगी।
पर कहां? यह सब तो अपना मतलब साधने को हो रहा है। नहीं यह वह असली श्रद्धा नहीं है उस पवित्र भवना को भी प्रदूषित कर डाला है इन लोगों ने । रिश्वतें दी जा रही है भगवान को अपने अनुकूल बनाने के लिये ।
भगवान से अपने मन की चाह पूरी कराने के सारे हथकंडे अपनाये जा रहे हैं।,रिश्वत पूरी , मेहनत अधूरी !
और भगवान ?वह क्या समझते नहीं ?सब जानते हैं वह !अंतर्यामी है न - इसलिये खूब मज़े लेते हैं ।
हर चीज़ को अपने हिसाब से मोल्ड कर लेते हैं ।
पूछिये वह कैसे ?
नहीं मालूम न ?
दैत्यराज बलि का नाम सुना है ?
,महादानी ,परम श्रेष्ठ इन्सान ,विष्णु भक्त ,प्रजा को अति प्रिय ।दक्षिण में तो लोग अब तक उसके नाम पर दीवाली मनाते हैं ,उनकी मान्यता है कि उस दिन वह अपनी प्रिय प्रजा का हाल लेने आते हैं ।
हाँ ।वही बलि ।अपने इन भगवान महोदय ने क्या किया उनके साथ ?
दान माँगा था ,बावन अँगुल का बन कर ।
हाँ ।बौने बन कर दान माँगने पहुँच गये ।उसने याचक का पूरा सम्मान किया और उसकी इच्छा पूछी ।इनने तीन पग धरती माँगी ।राजा बालि को हँसी तो आई होगी -क्या जरा सा बौना ,मुझसे माँगा भी तो क्या तीन पग ज़मीन ।शायद संदेह जागा हो कि ज़रूर दाल में कुछ काला है ।पर व्रती था ,व्रत तो पूरा करना ही था । आगे जो हो मंजूर ! बिल्कुल वही जो आगे कर्ण के साथ हुआ।और इन महाशय ने चाल खेल डाली ।रूप विस्तार कर दो पगों सारी धरती आकाश माप लिया और तीसरी बार उसके सिर पर पाँव रख उसे पाताल भेज दिया ।
असल में यह इन्द्रासन का झगड़ा था ।इन्द्र बड़ा कपटी है इन्द्रासन को किसी भी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देना चाहता ।उसी ने तो गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या से कपट किया था ।फिर भी ये उसका हमेशा फ़ेवर करते हैं ।
इन्द्र ने तो हद कर दी भी फिर भी पद नहीं छीना गया !
पद न छिन जाये इसीचिये तो इन्हें हमेशा पटाये रखता है ।और ये दूसरे की अच्छाई और सज्जनता को हथियार बना कर उसी के खिलाफ़ स्तेमाल करते हैं ।
इनकी कुछ मत पूछो ।पाँण्डवों को तो जानते ही हो पाँचों के पिता अलग अलग थे इसीचिये वह चिन्तित रहती थी क कहीं कि कहीं आपस में फूट न पड़ जाये ।तभी द्रौपदी को कॉमन पत्नी बना दिया ।कुन्ती का एक पुत्र उसकी कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न हुआ था ।कुन्ती ने उसे नदी में बहा दिया था अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने उसका पालन-पोषण किया था ।वह कौन्तेय से राधेय बना और जीवन भर अपमान झेलता रहा ।दुर्दम,अपराजेय योद्धा ,परम श्रेष्ठ धनुर्धर ! लेकिन जीवन भर विडम्बनायें झेलता रहा ।कुन्ती ने जानते हुये भी कुछ न किया,बल्कि उसने भी अपने विहित पुत्रों की सुरक्षा के लिये उससे उस मातृत्व की कीमत माँग ली कृष्ण के कहने पर , जिसने उसे सदा वंचित रख कर जीवन अभिशप्त बना दिया था ।
और स्वार्थी इन्द्र की करतूत और स्वार्थपरता देखो, अपने पुत्र अर्जुन की कुशलता के लिये अपने ही सहयोगी देवता सूर्य के पुत्र कर्ण से उसके शरीर से चर्मवत् संयुक्त कवच - कुण्डल दान में माँग कर उसकी मृत्यु का प्रबन्ध कर दिया ।सद्भावना ,औचित्य , न्याय सबको अँगूठा दिखा दिया ।वह तो इन्द्र ने किया । विष्णु का जालंधर को शक्तिहीन बनाने के लिये उसका परम साध्वी पत्नी तुलसी को उसी के पति का रूप धर कर छलपूर्वक अपनी अंकशायिनी बनाना नैतिकता की किस श्रेणी में गिना जाय ?!
वह यह सब अपने लोगों के इन्टरेस्ट में करते हैं ।
इसीलिये तो ! इसीलिये तो हम हमेशा भगवान को याद करते हैं ।बस वह अपने बने रहें और किसी के साथ कुछ होता रहे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।उचित हो अनुचित हो कोई अन्तर नहीं पड़ता ।बस , अपना उद्देश्य सिद्ध होना चाहिये ! भगवान को अनुकूल बना लो -येन केन प्रकारेण !चाहे प्रसाद बोल कर ,भजन-पूजन कर ,या और किसी कर्म काण्ड के सहारे !और फिर दुनिया को रक्खो ठेंगे पर !
कर्मों का फल मिलता है न?
कर्मों का फल ?हो सकता है वह भी उनकी सुविधा पर निर्भर है ।तपस्या का फल हमेशा कल्याणकारी नहीं होता यह तो हम प्रमाण दे सकते ।
क्या कहा तप का फल हमेशा अच्छा ही मिलेगा ?
यह मत कहो।रामकथा की ताड़का का नाम सुना है ?वह सुकेतु यक्ष की पुत्री थी ।उसके पिता ने संतान के लिये घोर तप किया ।ब्रह्मा जी प्रसन्न हुये । उसे ऐसी पुत्री प्राप्त होने का वर दिया जिसमें हज़ार हाथियों का बल हो और यही उसके लिये शाप बन गया। बताओ भला सहज जीवन कहाँ रह गया?।फिर उसे और उसके पति को मुनियों ने शाप दे दे कर चैन से जीना दुश्वार कर दिया ।अगर यह वरदान है तो शाप क्या है ?
फिर तो हम इन्हीं की आराधना करेंगे ।हम गलत हों चाहे सही हमारे फ़ेवर में रहेंगे तो फ़ायदा हमारा ही होगा ।औरों से हमें क्या ?
सच्ची उसकी माया हम नहीं जान सकते ,वही जाने ।
हम भारतवासी उसकी आदत से अच्छी तरह परिचित हैं ।जब देखते हैं काम नहीं निकला तो --
और किसी दूसरे देवता को मनाना शुरू कर देते हैं । इतने सारे देवता हैं कोई तो झाँसे में आ ही जायेगा !
यही तो मुश्किल है ।इतने सारे देवता हैं ।
एक को खुश करो और दूसरा बीच में टाँग अड़ा दे तो गये काम से ।कभी कभी बड़ा गड़बड़ हो जाता है उनके आपसी चक्कर मं ।
हुआ ऐसा कि एक हिन्दू ,एक मुसलमान और एक ईसाई नाव में जा रहे थे नाव बीच भँवर में फँस गई ।हिन्दू राम-राम करने लगा ,मुसलमान अल्ल्ह अल्लाह ,और ईसाई ईशू ईशू टेरने लगा ।अल्लाह दौड़े अपने भक्त को बचा लया ,ईशू दौड़े अपने भक्त को बचाया ,हिन्दू की पुकार सुन राम आ ही रहे थे कि वह अधीर होगया कि अभी तक आये क्यों नहीं और कृष्ण ,हाय कुष्ण चिल्लाने लगा ।कृष्ण दौड़े पर वे पहुँचें इसके पहले ही वह बेसब्रा भोलेनाथ भोलेनाथ पुकारने लगा ।कृष्ण बेचारे जहाँ थे वहीं रुक गये ।और भोले नाथ पहुँचते उसके पहले ही बजरंगवली की पुकार लगा दी ।भोलेनाथ ने सोचा हनुमान दौड़ेंगे और हनुमान ने सोचा शंकर जी पहुँच ही रहे हैं हम बेकार जा कर क्या करें और इस बीच वह पानी में गुड़ुप हो गया ।
दिन पर दिन मेरा विश्वास बढता जा रहा है कि भगवान अपनी शरण में आने वालों का कल्याण करता है -चाहे वे लोग उचित मौकों पर ,या जब जरूरत पड़े तब थोड़ी देर के लिये ही शरण में जायें।रोज़ देखती हूँ ,ऑफ़िसों में जो लोग प्रार्थना पत्र पर पूजा-पत्र चढवाये बिना आगे नहीं बढने देते ,अपना हिस्सा वसूले बिना किसी का काम नहीं करते शनिवार या मंगलवार को भगवान के दरबार में उपस्थित हो टीका लगा कर गिड़गिड़ा कर क्षमा मांग लेते हैं ,ऊपर की वसूली का दशमलव ज़ीरो एक परसेन्ट प्रसाद में व्यय कर उसे जायज़ बना लेते है ,दिन पर दन मोटे और सर्व- सुविधा सम्पन्न होते जा रहे हैं।कैसे संभव होता है यह? हर हफ़्ते भगवान से माफ़ी माँग कर ,प्रसाद प्रार्थना से ही तो ।अगर पाप ही न करें तो ये सब करने की ज़रूरत ही क्या ?
मुझे याद आगया ,बड़ी पुरानी बात है ,आठवीं कक्षा को रहीम दोहे पढा रही थी । समझाने के बाद बीच बीच में बच्चों से अर्थ पूछ लेती थी ।उस दिन ' क्षमा बड़ेन को चाहिये छोटेन को उत्पात' का अर्थ पूछने पर बच्चा बोला -बड़ों को क्षमा और छोटों को उत्पात करना चाहिये !छोटों को उत्पात क्यों करना चहिये पूछने पर बोला चाहिये शब्द दोनों के लिये है ।अगर छोटे उत्पात नहीं करेंगे तो बड़े क्षमा कैसे करेंगे ?उसके तर्क का कोई उत्तर मेरे पास नहीं था ।ऐसे ही हत्बुद्धि मैं रह गई थी जब 'सूर दास तब विहँसि जसोदा लै करि कंठ लगायो' का अर्थ एक लड़की ने बताया -तब सूर दास जी नें हँस कर यशोदा जी को गले से लगा लिया । मैं उसे समझाती रही ,पर बाल बुद्धि ठहरी ।सामने तो कुछ नहीं बोला पर उसे लगा कि एक बात साफ़-साफ़ लिखी है और ये टीचर उसे घुमा-फिरा कर बता रही हैं । कभी कभी तो मैं भ्रम में पड़ जाती हूँ कि मैं ही तो गलत नहीं हूँ !वैसे सब का अपना-अपना सोच !सबको भगवान बुद्धि देते हैं ।
हमारे एक अभिन्न मित्र हैं,लोगों की जेब से पैसा कैसे खींचा जाता है यह बताते रहते है ।एक दिन मैंने पूछा ग़रीबी में जिनका आटा वैसे ही गीला है उन को ते बख़्श दिया करो ।बड़े दार्शनिक अन्दाज़ में बोले -गरीब अमीर ऊँच-नीच हमारे लिये सब बराबर। हम ये भेद-भाव नहीं करते!भगवान की बनाई दुनिया सब अपना अपना भाग्य लेकर आते हैं ,इसके लिये हम क्या कर सकते हैं ?
ऐसे ऐसे फ़ितरती लोग कि भगवान को ही चपत लगा दें ! भगवान भी क्या करें, उन को भक्तों का सहारा है !दोनों के काम चलते हैं ।कितनी भी अति करो उसकी आड़ ले लो ,वही रक्षा करेगा !
जय हो ,जय हो भगवान ,तुम्हारी जय जयकार हो !

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

और अम्माजी जीत गईं --

अम्माँ जी को आते देख मैने सिर पर पल्ला डाला ही था कि उन्होने टोक दिया ,' बहू ,सिर ढाँकने की कोई जरूरत नहीं । अरे ,सिर ढाँकने के दिन अब हमारे हैं कि तुम्हारे ? '
मैं एकदम अचकचा गई , क्या कुछ गलती हो गई मुझसे ?
पूछ बैठी ,' हम तो शुरू से ढाँकते आ रहे हैं ,अम्माँ जी ! पहले तो घूँघट --- ।'
' कहा न अब कोई जरूरत नहीं है ।'
लगता है बहुत नाराज हैं !
मै तो हमेशा ध्यान रखती हूँ । हाँ ये कनु जब गोदी मे होता है तो हाथ- पाँव चलाता रहता है और मै खुला सिर ढँक नहीं पाती ।
' अम्माँ जी ,मै तो यहाँ घर के बाहर भी सिर पर पल्ला लिये रहती हूँ ।आप के पोते के मारे भले ही कभी ---।'
' सो सब हमे पता है, पर अब दताए देती है कि इस सब की कोई जरूरत नहीं ।'
' लेकिन अभी तक तो आपको कायदा पसन्द था --?'
भहुओं के सिर ढके रहने ,सबके सामने चारपाई पर न बैठने , दब ढँक कर रहने आदि को कायदा कहा जाता है ।
' ज्यादा इन्दरा गान्धी बनने की कोसिस मत करो बहू ,इतना तो तुम भी समझती हो कि सिर ढाँकने का क्या मतलब है ।'
मेरी कुछ समझ मे नहीं आया । सिर ढाँकने का भला क्या मतलब हो सकता है ? आदि काल से भरतीय बहुएँ यही सब करती आई हैं । अभी तक तो अम्मा जी को कायदा पसंद था ,खुद भी साड़ी की किनार माथे से एक इंच आगे निकाले रखती थीं -कहती थी इससे चेहरे की आब बनी रहती है। ' बच्चों के मारे या काम -धाम मे हम बहुओं का कभी पल्ला इधर-उधर हो जाय़ तो कहती थीं ,' हमें का ,तुम उघारी नाचो !'
और आज ?
मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा । वे समझ गईं । स्पष्ट करने लगीं ,' देखो बहू ,पालिटिक्स करने के दिन तुम्हारे हैं कि हमारे ? अरे तुम कल की आई अभी से सिर ढँक कर पालिटिक्स करोगी और हम सिर खोले देखते रहेंगे ?'
मै चकित सी उनका चेहरा देख रही थी । उन्होने आगे समझाया ,' इन्दरा जी जब पालिटिक्स मे आईं ,उनका सिर ढँका रहने लगा ।अब सोनिया जी को ही देख लो ,सिर पर पल्ला डाले कैसी शालीनता की मूरत लगती हैं !जनम से विदेसी पर पालिटिक्स का पूरा कायदा करती हैं ।'
अम्मा जी की प्रखरता मैं आज देख पाई थी ।
वे आगे बताने लगीं ,' कायदा पसन्द था जब की बात और थी । सबन के घर यही होता था । तब मेहरारुन के लै तैंतीस परसेन्ट रिजरवेशन की बात नहीं थी ।'
मेरे ज्ञान चक्षु खुलने लगे! अम्मा जी के सिर का पल्ला धरे-धीरे खिसकता हुआ ढाई इ़ञ्च पीछे यानी कानों तक आ गया था !शरीर पर हल्के-फुल्के गिनती के आभूषण रह गए थे ,अब तक वे पहनने-ओढ़ने की बड़ी शौकीन थीं ! मै उसी पुरानी दुनिया मे खोई रही ,बाहर तो बाहर , घर मे क्या परिवर्तन हो रहा है यह भी मुझे नहीं दिखाई दिया ? अम्मा जी की तो इस बीच भाषा ही बदल गई थी १ इस परिवर्तन की शुरुआत काफ़ी पहले हो गई थी - वे चाय के साथ अख़बार पढने लगीं थीं ,मोहल्ले की महिलाओं के साथ बात-चीत के उनके टापिक बदल गए थे ।
हमारी अम्माजी आठवीं जमात तक पढ़ी है उस जमाने की जब लड़कियों को पढ़ाने की जरूरत नहीं समझी जाती थी ,उनके मामा की शादी निकल आई तो इम्तहान नहीं दे पाईं ।अपनी क्लास टीचर की चहेती थीं ,लड़कियों पर उनका रौब था ।
अब उनकी बातों के विषय होने लगे हैं -बिट्टन देवी को काला अक्षर भैंस बराबर ,पर अपने वार्ड से सभासद के चुनाव में खड़ी हो रही हैं -अपनी इसकूल जाएवाली बिटिया से अक्षर लिखना सीख रही हैं ,अब अपना नाम लिख लेती हैं । हमारे सामने बियाह के आई परसादी की बहू घूँघट उतार कर अपने लै वोट माँगने सारे दिन बाहर घूमती है ,भासण देना भी सीख गई है ।
अम्मा जी भी हैणडलूम की किनारीदार साड़ी खरीद लाई हैं ,कहती हैं ,'पब्लिक के बीच अइसे ही अच्छा लगता है ।'
'देखो दुलरिया अब सिरीमती सियादुलारी कहाती हैं ! ढंग से कपड़े पहनने का सहूर नहीं था - अब करारी सूती साड़ी पे मैचिंग ब्लाउज़ पहनती हैं -क्या ठसके हैं !
चुनाव का मौसम है ! नगर सभासद के चुनाव मे कई महिलाएँ खड़ी हुई हैं । बिट्टन देवी कल रास्ते मे मिल गईं बोलीं , 'हमका वोट देना १'
अम्माँ मुझसे बोलीं ,' न पढ़ी न लिखी !इनका कउन वोट देगा !'
अम्माजी के बेटे ने कहा ,' वो जीत जाएँगी तुम देख लेना !पार्टी की रिज़र्व सीट है ! राबड़ी देवी कौन लिखी-पड़ी है , मुख्यमंत्री बनी बैठी हैं ।'
हालात अचालक ऐसे बदले कि हमने कभी सोचा भी नहीं था । ।बिट्टन देवी सीढियों से लुढ़क पड़ीं , पाँव की हड्डी टूट गई । लोगों को हमारी अम्मा से योग्य कोई जँचा नहीं । तमाम कोशिशों कर उनकी जगह नामाँकन करवा दिया ।
जीतना तो था ही!अम्मा जी इलेक्शन जीत गईं । गट्ठर भर फूल मालाओं से लाद दिया गया उन्हें । उन्होने पहले ही मुझसे कह दिया था ,'बहू ममारे भासण लिखने की जुम्मेदारी तुम्हारी ।'
' हम तो तैयार हैं ,अम्मा जी , लेकिन पिताजी ज्यादा अच्छी तरह --'
' ना बहू ,अब उनका मुँह नहीं तकना.। सिर झुकाए-झुकाए घर की चाहारदीवारी मे इतनी जिन्दगी गुजार दी ,अब सिर उठाने का मौका आया है --- बस तुम नेक मदद कर देना , फिर तो धीरे- धीरे हम भासण भी सीख जाएंगी । पर सुरू से अपनी हँसी हो अइसा नहीं करेंगी ।'
अपने पहले वक्तव्य पर सफल होकर बहुत खुश हुईं ,मुझे गले लगा लिया ,' अब देखो,बहू हम कैसी मुस्तैदी ले काम कराती हैं ।अभै तक तो इनके असिस्टन बने रहे --'
'क्या ,अम्मा जी ?'
'अरे वही जो हमेसा काम कराते हैं ।'
'एसिस्टेन्ट ?'
'हाँ,हाँ ,वही ।'
देसी मुहावरों का तो पहले ही उनके पास भणडार था अब अंग्रेजी के शब्दों का भी खुल कर प्रयोग करने लगी हैं ।
हमारे सलवार- कुर्ता पहनने पर भी अब कोई रोक नहीं रही । लोगों से कहती हैं, 'हमने तो बहुअन - बिटियन मे कभी फ़रकै नहीं माना ।'
ताज्जुब तब ङुआ था जब उस दिन पूजा के मौके पर अम्मा जी ठेठ देसी लहज़े मे बोलने लगीं ,' अरे हमार बिटवा -बहुरिया नीक रहैं ! ऊ न करित तो हम ई सब कहां कर पाइत ?'
इनहोने फ़ौरन टोका ,'अम्मा ,अब तुम माननीय सदस्य हो ठेठ देसी भाषा भूल जाओ !'
'अरे ,बिटवा तुम लोगन के साथ इहै भासा बोल के हमार जिउ जुड़ात है ।'
हालात कितने भी बदल जायँ वे रहेंगी हमारी अम्माजी ही !
उनकी की पूछ बहुत बढ़ गई है । रोज ही से समारोहों के आमंत्रण मिलते हैं । दो-चार लोग उन्हे पूछते चले आते हैं । वे मुस्कराती हुई ,गौरव से भरी दालान मे कुर्सी पर जा बैठती हैं ।सबकी सहायता करने को तत्पर रहती हैं । कल ही कामवाली को समझा रही थीं ,'----देखो , कम तुम भी नहीं हो ।जाहिल औरतन की तरह उघटियाँ - पैचियाँ बन्द करो । काहे रोज लड़ाई पे तुली रहती हो ?'
और तो और अब बाबूजी की दृष्टि भी बदल गई है । अम्माजी के आत्म- विशवास भरे चेहरे को ऐसे देखते हैं जैसे किसी नई महिला के दर्शन कर रहे हों। अब कदर होने लगी है , घर की मुर्गी दाल बराबर नहीं रहेगी ।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

फ़ैसला सुरक्षित है

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अक्सर अख़़बारों में पढने को मिलता है और ख़बरों में भी सुनाई देता हैं, कि कोर्ट में किसी केस का फैसला सुरक्षित कर लिया गया ।हमें तो बड़ा ताज्जुब होता है ।बडा बहुमूल्य फ़ैसला होगा जो उसे सुरक्षित रखे बैठे हैं ।अभी तक हीरे जवाहरात ,पुरातत्व की चीजें, मरनेवाले की विल आदि सुरक्षित रखे होने की बात सुनी थी ।'फैसला सुरक्षित रखा गया' जब पहली बार सुना तो हम चौंके ।हमने तो सोचा था कि फैसले सुनाये जाने को होते हैं ,जिससे सब लोग जानें ,समझें , उससे कुछ सीख ग्रहण करें। फैसला किया गया और सुरक्षित रख दिया गया! किसी को दिया या बताया नहीं गया तो फैसला करने से क्या फायदा हुआ ?वैसे तो लोग इन्तजार करते हैं ,कब फैसला होगा,क्या होगा?सुनते हैं,जानते हैं तो लोगों पर असर पडता है। एक उदाहरण सामने रहता है कि ऐसा करने पर उसका यह नतीजा हो सकता है ।मेरा विचार था कि फैसले इसीलिये सुनाये जाते हैं कि जनता पर उसका असर पडे ,वह चेत जाये ।नहीं तो किया फैसला और दे दी सजा ,लोगों को इन्वाल्व करने की क्या जरूरत ! लेकिन अब मानसिकता बदल गई है ।हो सकता है पुरातत्व की वस्तु बन जाने पर उसे उद्घाटित करें ।
हमें जहाँ तक याद है पहले ऐसा सुनने में नहीं आता था कि फ़ैसला नहीं बतायेंगे । अल्मारी में सीलबन्द किया रख रहेगा ।हो सकता है होता हो ।पर सुरक्षित रखने का रिवा़ज अब बढता जा रहा है ।मैंने सोचा कि पब्लिकली न बतायें ,व्यक्तिगत रूप से पूछे जाने पर तो बता देंगे कि क्या निर्णय किया ।
हमने जाकर पता किया ।कोई कुछ बताने को तैयार नहीं ।बेकार दुनिया भर को क्यों बीच में डालें अकेले जाकर जज साहब से पूछ लें।हमने अर्दली से कहा कि इस मामले में हम उनसे बात करना चाहते हैं । उत्तर मिला -साहब सिर्फ मुजरिमों -अपराधियों से मिलते है ,वह भी कोर्ट-रूम में। कान खोल कर सुन लो वे सुनते हैं सिर्फ मुजरिमों ,वादियों ,प्रतिवादियों और अनुवादियों की !तुम जैसे लल्लू-पंजू , प्रवादियों से बात नहीं करते ।
'तो फ़ैसला कैसे पता लगे ?'
'नहीं जान सकते ।फ़ैसला सुरक्षित है ।'
'अरे हम जानना ही तो चाहते हैं ।कोई उनके फैसले को लूट थोडे ही लेंगे ।'
'यही तो खतरा है ।इसीलिये नही खुलासा किया ।'
'पर वह है कहाँ ?'
'कहा न, बता कर रिस्क नहीं लेना । लिफ़ाफे़ में सीलबन्द कर ,अल्मारी में लॉक कर दिया है ।ज्यादा हल्ला मचाओगे ,बहसबाजी करोगे तो कमरा बन्द करके उसमें भी ताला डाल देंगे ।सुरक्षित रखना हमारा काम है ।'
'पर मालूम तो पडॉना चाहिये ।जब केस सबकी जानकारी में हुआ ,तो फैसले का खुलासा क्यों नहीं ?'
' क्यों प्राण खाये जा रहे हो ?समझते क्यों नहीं जो चीज सुरक्षित है उसके पीछे क्यों पडे हो ?आखिर तुम्हारी मंशा क्या है ?'
'यह लोक- तंत्र है ,हमे जानने का हक है ।'
'अजीब लोगों से पाला पडा है !अरे उसी की नज़रों से तो बचाना है ।जनता के बीच हर चीज अरक्षित हो जाती है ।हमारा काम न्याय की सुरक्षा है ।फैसला न्याय है इसलिये बन्द कर दिया है ,जिसमें सुरक्षित रहे ।'
हमने फौरन उसके लिये चाय -नाश्ता मँगवाया ।थोडा ढीला पडा वह ।बताने लगा -जानते हो कितना टाइम लगता है एक -एक मुकद्दमें के फैसले में ?दस-दस,बीस-बीस साल तो मामूली बात है ।इतने सालों की मेहनत उनकी ।उसे भी सबके बीच अरक्षित छोड दें तो साहब की तो सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा ।'
हमारे एक संबंधी के रिश्तेदार न्यायाधिकरण में कार्यरत हैं।उनसे चर्चा हुई ।उन्होंने पहले ही सावधान कर दिया कि हम लोग वैसे ही जनता से बचते रहते हैं ।यह हमारी-उनकी आपसी बात है ,सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं । अगर लोगों को पता लग गईं तो छीछालेदर होने लगेगी
।साराँश यह था -न्याय चुप रहता है ।पहले वारदातें होती हैं ।जब हो चुकती हैं तो पुलिस हरकत में आती है ।धर-पकड करती है ।फिर हमसे गुहार की जाती है ,शिकायत लाई जाती है .सबूतों सहित विधिपूर्वक वाद खडा किया जाता है ।तब हम न्याय का उपक्रम करते हैं ।न्याय करने के लिये पूरे प्रमाण चाहिये और वे तब मिलते हैं जब ,अपराधी का काम पूरा हो जाये ।जब माँगा जाता है तब न्याय दिया जाता है ।हमने सब बताया ,' हम कबसे माँग रहे हैं। फ़ैसला हो गया ,पर दिया नहीं गया ।'
वे कुछ ताव में आगये,'फिर वही धुन पूर दी ! न्याय कर दिया गया है।सुरक्षित रखी गई चीज,किसी के सामने नहीं लाई जा सकती ।'
हम सोचते रहे ,सोचते रहे ,जज साहब न्यायविद् हैं ।जानते है जनता के बीच न्याय अरक्षित है ।उसके बीच फ़ैसला गया तो उसे भी चोट पहुँचाने की कोशिश की जायेगी ।जज साहब को भी चोट पहुँचेगी ।चलने दो जैसा चलता है ।होने दो जो होता है ,होनी को कौन रोक पाया है
कभी तो यह फ़ैसला लोगों के सामने आयेगा ।आज नहीं तो कल ,कल नहीं तो परसों ,मेरा मतलब है ,लम्बे समय के उपरान्त यह उद्घाटित होगा ।होगा ,अवश्य होगा ! कल को हम नहीं होंगे ,जज साहब और वादी -प्रतिवादी भी पता नहीं कहाँ होंगे ।पर फ़ैसला रहेगा ।हम अरक्षित है पर वह सुरक्षित है ।अभी अल्मारी में बन्द है यह फ़ैसला इतिहास बनेगा । पुरातात्विक वस्तुओं के साथ रखा जायेगा ।और उस समय जो लोग होगे ,जानेगे कि हमारे यहाँ का न्याय कितना सजग सचेत है ।कितने अलभ्य फ़ैसले हैं और कितने सुरक्षित ।