मंगलवार, 10 सितंबर 2013

कुछ पंक्तियाँ.


*
हमारे भारत में इधर मनुष्यों की नर-जाति में एक बदलाव नज़र आ रहा है.लगता है पुरुषत्व की परिभाषा ही बदल जाएगी .औसत में जो होता है उसी के आधार पर सामान्य विशेषताओं का निर्धारण होता है .उससे ऊपर-नीचे अनेक स्थितियाँ होना स्वाभाविक हैं .आज के युवा, बल्कि रसिक अधेड़ों की भी लालित्य-भावना और अपने पौरुष-  प्रदर्शन का एक ही क्षेत्र बचा है - नारी की देह . पैंतालीस या पचास पार के कितने ऐसे आदमी होंगे जो परायी लड़कियों को वात्सल्य भरी दृष्टि से देख सकें !और साथ की महिलाओं का  उल्लेख करते समय रस-वृत्ति या  विनोद-भावना से न भर उठें  (शब्द-चयन मनोभावों को उद्घाटित कर देता है.).मानसिकता ऐसी है कि बराबरी का सम्मान देना उनके लिए स्वाभाविक नहीं रहा .अब तो लगने लगा है पौरुष की सारी गरिमा और गाम्भीर्य चुकता  जा रहा है.
मनुष्य सभ्यता की दौड़ में जितना आगे बढ़ रहा है उतना ही उद्दंड  होता जा रहा है.अपने मन का  पुरा नहीं तो दूसरे को चैन से नहीं रहने देंगे .सब पर तो बस चलता नहीं ,अकेली लड़की निशाना बन जाती है.रोज-रोज सुनाई देता है किसी  लड़की पर तेज़ाब टाल दिया ,सड़क पर जला दिया . समाचार पढ़ कर लगता है आज का युवा अपनी इच्छा पूर्ति के लिए जानवर बना जा रहे हैं .बल्कि उससे भी गया -बीता.  वह जो चाहता है उससे लड़की को सहमत हो .नहीं तो जीने नहीं देगा .
 आठवीं कक्षा में एक कविता पढ़ी थी ,'यौवन', जिसकी कुछ पंक्तियाँ. हैं-

'सुन्दरता की जिस पर श्रद्धा,वैभव जिसके चरणों में नत ,
हो शक्ति भक्त जिसकी ,जिपर हो मुग्ध प्रशंसा तन-मन .
जो इन चारों से ऊँचा हो जो इन चारों से युक्त रहे ,
कवि के सपनों की साध वही ,कवि का आराध्य वही यौवन !'

(पता नहीं अब ऐसी कवितायें क्यों नहीं पढ़ाई जातीं?)
चलो, यह तो आदर्श है ,इससे कुछ कम भी  चलेगा .और कुछ नहीं तो इंसान की औलाद हो ,हैवानियत पर तो मत उतरो .
आजकल के युवा बेकार बातों में बहुत कुछ कर गुज़रते हैं इतना ही दम है तो सिर उठा कर कुछ उच्चतर साध्यों की ओर हाथ बढ़ाएँ- बहुत कुछ करने को है परिवार समाज देश  के लिए के लिए.अपनी इच्छा तृप्ति के लिए मरे जा रहे हैं और दूसरे का जीवन नरक बना रहे हैं .ऐसा  समर्थ और सक्षम बनने का दम नहीं बचा कि  नारीत्व स्वयं उनकी कामना करे !
विवाह की कुंकुम पत्रिका में  लड़की को 'सौभाग्यकांक्षिणी' लिखने की परंपरा है .नारीत्व की सफलता हेतु  कन्या अनुरूप वर की कामना करती है.उसके हृदय में जिसके प्रति रुचि नहीं , वह जबरन क्यों अपने को उस पर थोपना चाहता है? भारतीय काव्य-शास्त्र में शृंगार रस की पूर्णता तब होती है जब कामना नारी की ओर से व्यक्त हो.उसी में पुरुषत्व की गरिमा है, रसराज का सच्चा समाहार है, साथ ही जीवन में सुख-शान्ति तथा समाज की मर्यादा भी सुरक्षित है .
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नोट -  आगामी ,जनवरी 2014  तक ब्लाग-जगत से मेरी उपस्थिति बाधित रहेगी . भारत जा रही हूँ .वहाँ  मुझे पता नहीं इन्टरनेट की कितनी सुविधा उपलब्ध हो .आप सब को पढ़ सकूँ यह मेरा पूरा प्रयत्न रहेगा.




शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

सागर-संगम - 4.


लोकमन  - काल की धारा बहती रही .जीवन का क्रम आगे  बढ़ता रहा.
सूत्र - आर्यों ने जो वर्ण व्यवस्था समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिये बनाई थी उसमें पारस्परिक भेद-भाव ,और ऊँच-नीच की भावना नहीं थी,पर बाद में उसका रूप विकृत होता गया -यह मैंने पढ़ा है पर .....
नटी -कवि ने यह अध्याय भी रचा होगा ,है न कवि ?
सूत्र -क्यों, मित्र लोकमन ?
लोकमन - (मुस्कराता है ) धारा बहती जाये ...
धीरे-धीरे जटिल हो चली उनकी वर्ण-व्यवस्था ,
चल निकलीं जातियाँ और फिर बढ़ने लगी विविधता .
ब्राह्मण-जन विद्वान तपी थे ,इसीलिये सम्मानित ,
शस्त्र धार कर रक्षण करते क्षत्रिय शासनकर्ता.
बढ़ा राजमद क्षत्रिय में तो ब्राह्मण भी अकुलाये. धारा बहती जाए ..

ऋषिपुत्रों का हत्याप्रकरण आज याद कर लो तुम ,
परशुराम का महाभयंकर नाद याद कर लो तुम .
माँ इक्कीस बार जब छाती पीट-पीट रोई थी -
क्षत्रिय कुल का तब नृशंस संहार याद कर लो तुम .
किन्तु राम ने सोच समझ कर अपनी नीति बनाई
विप्र पूज्य हैं उनका मान न घटने पाये भाई .

दृष्य - [राम और लक्ष्मण ]
लक्षमण -हाथों में शस्त्र लिये मुनियों का वेश धरे ,
 वे कौन आ रहे हैं भ्राता अति दंभ भरे ?
राम -वे परशुराम हैं लक्ष्मण ,महा प्रतापी मुनि .
 अति क्रोधी हैं ,विनयी हो इन्हें प्रणाम करो .

[परशुराम का रक्तरंजित परशु लिये प्रवेश ,दोनों प्रणाम करते हैं ,वे स्वस्ति का हाथ दिखाते हैं पर मुखमुद्रा कठोर रहती है ]
इक्कीस बार क्षत्रियकुल को संहारा है ,,
स्वर्गस्थ पिता ,देखो प्रतिशोध लिया मैंने
इनके शोणित से तर्पण किया तुम्हारा है .
[शिव का टूटा हुआ धनु देख कर ..]
मेरे आराध्य शंभु का धनु किसने तोड़ा ?
राम -[विनय पूर्वक ]वह एक चुनौती थी, मैंने स्वीकारी थी ,
मुनि, धनुष-यज्ञ की शर्त यही, लाचारी थी .
परशु -रे मूर्ख ,शौर्य की गाथा मेरी भूल गया ?तेरा साहस मेरे गुरु का अपमान करे !
इक्कीस बार चुनचुन संहार किया जिनका ,
वे कायर क्षत्रिय फिर इतना अभिमान करें ?
लक्ष्मण   -हाँ ,हमें याद है .वही शूरता की गाथा 
अपनी जननी का शीष स्वयं जिनने काटा ?
परशु -पापी लक्ष्मण ,यह परशु अभी भी प्यासा है ,
दशरथ के कुल का अभी नाश हो जाता है .
छिप गया तुम्हारा गुरु वह विश्वामित्र कहाँ ,
पाखण्डी क्षत्रिय हो, ब्राह्मण कहलाता है .
लक्ष्मण - अपने को तो देखिये ज़रा ,[राम आँखें दिखाते हैं ],ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय  का बाना धारे .
 अपना बखान हर जगह करें ,हर जगह युद्ध को ललकारें .
परशु -ओ, राम रोक ले भाई को ,
 या इसे काल का ग्रास अभी बनना होगा .
राम -[लक्ष्मण से] तुम शान्त रहो ,
निन्दा करने से पूर्व स्वयं देखें भृगुवर ,
विद्या में ,तप में ,धैर्य ,क्षमा ,निस्पृहता में ,
कल्याण विश्व का करने को  हर पल तत्पर ,
गुण से ही मानव को पहचाना जाता है .
हो शान्त-चित्त आप ही विचार करें मुनिवर .
परशु -हे राम बंधु पर तेरा  आग उगलता है ,
उसका उद्धतपन  देख हृदय यह जलता है .
राम -उसको प्रणाम का मिला नहीं समुचित उत्तर ,
आते ही आते हम पर बरस पड़े मुनिवर ,
शस्त्रों से सज्जित देख और भ्रम हुआ उसे ,
बालक है ,अनुभवहीन, क्षमा कीजे भृगुवर .
 भूसुर हैं आप और हम भू के मनुज मात्र ,
इसलिये हमें कर लीजे अपना कृपापात्र .
परशु -हूँ .शिष्टता तुम्हारी ,मुझे प्रभावित करती है .
राम - ब्रह्मण -क्षत्रिय संघर्ष न हो ,सुविचार करें ,
 हम दोनों ही मिट जायेंगे .इसलिये ,पूज्यवर ,नीति सहित व्यवहार करें .
[परशुराम सोचते रहते हैं ]
नत-मस्तक हैं मुनिवर आशीष दीजिये अब ,हम आज्ञाकारी होंगे अति कृतज्ञ होंगे .
परशु -[कुछ क्षण रुक कर ]तू बहुत कुशल है राम ,विवेकी नीतिवान ,
मर्यादाओं का पालक हो आयुष्यमान !
हो राग-द्वेष से वीतराग मैं वन जाऊँ
धरती का भार उतार हाथ ले धनुष-बाण .
[परशु फेंक कर जाते हैं, दृष्य समाप्त होता है .]
 सूत्र - कैसा भयंकर ! ब्राह्मण और क्षत्रियों की भयानक शत्रुता .इक्कीस बार भीषण नरसंहार .राम ने विवेक से काम न लिया होता तो न जाने क्या होता .
नटी -और उन्होंने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली .उनके निर्देशन में चलने को धर्म मान लिया
 सूत्र -हाँ ,मैंने पढ़ा है.इसके बाद नियमों के जटिल बन्धनों में समाज को जकड़ दिया गया .जन्म से मृत्यु तक कोई न कोई संस्कार .जो जरा हट कर चले, पापी कहलाये और प्रायश्चित के लिये तैयार रहे .
लोक - मार्ग रुद्ध कर दिया बुद्धि का, बाधित कर चिन्तन को ,
अहंकार से भरे मानते भू- देवता स्वयं को ,
पाप ,नरक का भय दिखला कर कुण्ठित कर डाला मन ,
विधि-निषेध के जटिल बंधनों में जकड़ा जीवन को .
सूत्र -  बदलते परिवेश में , उपयोगिता खोती व्यवस्थाएँ  भी रूढ़ होती गईँ , 
लोक . वह संक्रमण का काल था .अनेक संस्कृतियों की टकराहट .  सच है कि दूसरे को नीचा दिखा कर कोई बड़ा नहीं हो जाता .
सूत्र. - ऊँच-नीच की यह भावना समाज का ताना - बाना ढीला करने लगी ,स्त्रियों का गौरव नष्ट हुआ वे भोग्या मात्र रह गईं  .उच्च नैतिक आदर्शों का ह्रास होनो लगा .
  ,भोग-विलास की प्रधानता और उच्चादर्शों का हनन हो  और मानव चरित्र  का पतन परिणाम सामाजिक विग्रह 
नटी - हाँ कवि ,रामायण काल में नारी की अस्मिता क्षीण हो गई थी, मन और आत्मा का नहीं ,  दैहिक शुद्धता  का महत्व  रह गया था .
लोक - नर-नारी की समानता के सारे मान बदलते गए. महाभारतकाल तक वह हरण  और सेवन की वस्तु रह गई.वर्णाश्रम धर्म के दिन बीते .वृद्धावस्था में भी अबाध भोग लालसा वंश-बेलियों को डसने लगी , रोगी, निर्वीर्य संतानें  और अपंग उत्तराधिकारी  जो राज्याधिकार पाकर अपनी प्रतिद्वंद्विता में महाभारत का आवाहन कर बैठीं .महा भयंकर युद्ध जि सने देश के शक्ति-शौर्य और सुख-समृद्धि को निगल डाला परिणाम  बाहरी लोगों को यहाँ घुस-घुस कर आँखें दिखाने  की हिम्मत होने लगी . 
पर एक उपलब्धि उस युग की रही श्रीकृष्ण  का गीता-दर्शन और न दैन्यं न पलायनं का उद्घोष .
सूत्रधार  - वह विनाशकारी महासमर जिसने विध्वंस मचा कर इस वसुंधरा की ऊर्जा और पोषण-क्षमता को भी दग्ध कर दिया . इसी दूषण का परिणाम रहा सदानीरा सरस्वती का लोप . एक भरी-पुरी सभ्यता की जीवनी शक्ति को ग्रहण लग गया  ..
कैसा रहा होगा वह युग -वह राजा ,वह राज सभा जिसमें कुलवधू  का वस्त्रहरण .. ,भ्रूण -हत्या ...

 नटी -  नहीं-नहीं रहने दो ( हाथ हिला कर बरजते हुए ), कवि नहीं .वे दारुण दृष्य मंचित न हों अब . बस हमें तो  उस प्रेमावतार के दर्शन करा दीजिये . हमारे विषण्ण होते मानस को किंचित आश्वस्ति मिले .

( एक सांस भर कर सूत्रधार  सिर झुका लेता है . लोकमन, मौन पृष्ठभूमि पर दृष्टि लगाए  है.  धीरे प्रकाश बढ़ता है और बाँसुरी की मधुर धुन )
*
(क्रमशः)

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

सागर-संगम -3.

*
 दृष्य  - 3
सूत्र - कितनी उन्नत सभ्यता ,कैसा आनन्दमय जीवन और अब केवल खँडहर बचे .
लोक -कोई बड़ी भौतिक आपदा .इसके विनाश का कारण बन गई .
नटी - शताब्दियाँ लग जाती हैं जिसे सँजोने में, काल का कोप अचानक ही लील जाता है.
कवि - यह जीवन एक अविराम क्रम है .
(दो क्षण चुप्पी)
नटी -कवि,आपने देव संस्कृति की बात कही थी ,यह संस्कृत जिसे हम देव वाणी  कहते हैं क्या उन्हीं से मिली है .
सूत्र - वेदों की भाषा छंदस् रही थी ,बोलने के क्रम में वह जब अनेर रूपों में विकसित होने लगी तब  अनुशासन में रखने को  पाणिनि ने व्याकरणिक नियमों से उसका संस्कार किया और  वह संस्कृत कहलाई .
नटी -मेरा मतलब नाम से नहीं भाषा के उद्गम से है .विकसित हो रही सभ्यताओं  के उस चरण में ,इतनी पूर्ण और वैज्ञानिक भाषा व्यवहार में आए.और उसके नियम-व्याकरण बाद में बने आश्चर्य है .मुझे लगता है  देवजाति के विनाश में उनकी परंपरागत भाषा किसी तरह बच गई .
सूत्र - हाँ ,आश्चर्य मुझे भी होता है . वेदों को भी तो अपौरुषेय माना गया है  पहले यह श्रुति परंपरा में सुरक्षित रहे  .लेखन बाद में प्रारंभ हुआ .  
नटी -  देव-संस्कृति की अवशिष्ट सामग्री में जो बचा वह वंशधर ने पाया .(लोकमन सुन-सुन कर मौन मुस्करा रहा है ),कवि, तुम हँसे जाओगे या कुछ कहोगे भी ..
लोक - तुम्हारी जिज्ञासा की छूत मुझे भी लग गई, नटी .उन मनु-पुत्रों ने जो पाया ,एक पीढ़ी दूसरी की स्मृति में डालती गई ,
नटी -हाँ और चिन्तक-जन उसी के अनुरूप रच-रच कर उसमें जोड़ते रहे .तो फिर संस्कृत की लिपि ?
हूँ.. ,ये भी विकट प्रश्न है .वेदों को श्रुति परंपरा में सुरक्षित रखा कि उसकी ध्वनियाँ विकृत न होने लगें, अनुकरण में पूर्णता बनी रहे लेकिन ज्ञान के अन्य ग्रंथ लिखित रहे होंगे कुछ  लोगों का जीवित बचना संभव है .सभी कुछ नष्ट नहीं होता .
 सूत्र.- प्रिये , संभावनाओं का कोई अंत नहीं  कवि को आगे बढ़ने दो .हाँ, कवि .
लोकमन -  सभ्यता सिंधु घाटी तक सीमित नहीं थी .इसकी व्याप्ति दूर-दूर तक सरस्वती नदी के पूरा क्षेत्र में तो थी ही. भारत से दूर दूरस्थ भूमियों में भी जो प्राचीन अवशेष मिलते हैं उनमें और इनमें बहुत समानताएं हैं .
सूत्र - और आर्य ?
लोक. - आर्य इसी देश के वासी रहे थे वे एक जगह सीमित हो कर रहनेवालों में नहीं थे  .प्रारंभ में उच्च भूमियों पर निवास करते थे .दूर देशों तक उनका विस्तार रहा था .समय के साथ जन-संख्या का क्षेत्र फैलता गया."
       सूत्र - इनकी श्रेष्ठता का लोहा सबने माना .कुछ विशेषताएँ रही होंगी, मित्र .
लोकमन - वह भी देख लो -
दृष्य -
आर्यों की संस्कृति का विशेष ,था सप्त- सिन्धु अति रम्य देश .
आत्मानुभूति का उषाकाल ,वह वेद ऋचाओं का सुकाल .
मंगल - स्वर से गूँजे जंगल  ,ऋषि रचने लगे वेद मंडल .

[पृष्ठ भूमि से स्वर -
आत्मवत् सर्वभूतेषु ,सर्वभूतानि चात्मनि .
यः पश्यति स पश्यति .]
लोक - विश्वात्मा के अति ही समीप ,मनुजात्मा ज्योतित ज्ञानदीप .
कर्मण्य,समन्वय अनुशासन ,आनन्द उछाह सहज जीवन .
कल्याण विश्व का चरम ध्येय,ऋत और सत्य से युक्त श्रेय .
सबका सुख ही अपना सुख हो ,निष्कलुष ,सन्तुलित जीवन हो .
इच्छा विवेक आधार गहे ,वसुधा कुटुम्ब अविकार रहे .
[पृष्ठभूमि से स्वर -सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः ,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तः,मा कश्चिद् दुःख भाव भवेत् .]

श्रद्धा विवेक आधार रहे ,वसुधा कुटुम्ब अविकार रहे .
मानव ही है सबसे महान् ,इस महासृष्टि का समाधान .
विश्वास युक्त होकर अदीन ,मन रहे सतत आनन्दलीन .

इनका आवागमन दूर-दूर तक चलता था. दृषद्वती,जिसे हम अब दज़ला कहते हैं  (दजला )का क्षेत्र  पुलस्तिन जो पैलेस्टाइन कहलाता है असुरिया या असीरिया तक और उससे आगे भी ..
 सूत्र - आर्य-भाषा और शब्द चाहे विरूप हो गए हों ,उन भाषाओँ में अभी भी खोजे तजा सकते हैं .
नटी -कैसा होगा उनका जीवन ?
दृष्य खुलता है - 
[अपेक्षाकृत मैदानी क्षेत्र ,आर्यों के डेरे गड़े हैं पृष्ठभूमि में बैलगाड़ियाँ ,पशु आदि .आग जल रही है ,जिसके चारों ओर लोग विभन्न क्रिया कलापों में व्यस्त हैं .
एक व्यक्ति - कितना विस्तृत है यह प्रदेश . और कितने भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग यहाँ रहते हैं .
वृद्ध -आश्चर्य हो रहा है सुमेध को . हमें पहले ही आभास था कि यह भू क्षेत्र बहुत बहुत-दूर-दूर तक फैला है  नाग ,गरुड,वानर, किरात ,निषाद मत्स्य आदि जाने कितने कबीले यहाँ बसते हैं .
सुमेध - उधर उत्तर पश्चिमी दिशा हमारी जानी पहचानी रही पर ये जो असुर कहलाते हैं ,वे विचित्र लोग हैं .नाक कान छेद कर स्वर्ण पहनते हैं ,मुझे तो वितृष्णा होती है इनसे .
वृद्ध - वितृष्णा ,भले होती हो पर उनके नगर देखे हैं कभी ?कितने सुव्यवस्थित हैं -उनके भवन ,नालियाँ स्नानागार ,सडकें,तालाब क्या नहीं है ?लो वह अमृताश्व आ गया .
[अमृताश्व आता है ,लगता है दूर की यात्रा से आया है .सूती वस्त्र पहने है एक पोटली उसके पास है,वृद्ध को प्रणाम कर बैठता है ]
वृद्ध -दीर्घायु हो वत्स .आओ विश्रान्त हो .उषा सोम ला .
[इधर -उधर बैठे लोग पास खिसक आते हैं ,एक तरुणी पात्र में सोम ला कर देती है .अमृताश्व पीता है .एक युवक वरुण ,उसके वस्त्र छू कर देखता है ]
वरुण - मित्र ,यह वस्त्र किस प्रकार के ऊन का है ?
अमृ. - यह पशुओं से प्राप्त ऊन नहीं ,वृक्ष पर उगनेवाला रेशेयुक्त फल है .इसे कार्पास कहते हैं .
उषा - तेरी पोटली में क्या है भ्रातर ?ला, मैं देखूँ .
[कुछ और महिलायें उत्सुकता से पास आ जाती हैं ,पोटली का सामान उठ-उठा कर देखती हैं .एक उसमें बँधे मिट्टी के ठीकरे उठती है]
स्त्री -यह क्यों बाँध लाया है .ये मिट्टी के ठीकरे काहे के लिये हैं ?
अमृ. - पटल है माते .रुचि ,रख दे यह तेरे काम का नहीं . ला दे .[वृद्ध की ओर बढा कर ]तात ये असुरों के संकेत-चिह्न हैं.इनके माध्यम से अपनी बात दूसरों से कहने में देश- काल के व्यवधान बीच में नहीं आते .
रुचि -पहेली मत बुझा भ्रातर ,स्पष्ट कह .ये क्या कोई जादू है या मंत्र है ?
अमृ. - इन चिह्नो में जो अंकित किया गया है ,इनका जानकार उन्हें पढ़ कर समझ लेता है .बिना बोले ,बिना सामने आये सब स्पष्ट हो जाता है .
वृद्ध -[हाथ में ले कर ]अद्भुत है ,आश्चर्यजनक .तू बडा चतुर है अमृताश्व ,उनके ये संकेत-चिह्न तू कहाँ पा गया ?
अमृ. - उनमें कुछ से मेरी मित्रता हो गई थी ,उन्हीं से मैंने यह विद्या सीख ली .
वृद्ध - इस विद्या के विषय में मैने सुना था.हमारे आदिपुरुष मनु के पास अंकनो से युक्त कुछ भूर्ज पत्र थे .वे संग्रह में हैं और उनके जानकार भी हैं.
सूत्र -तो नसे यह विद्या सीख लेनी चाहिये थी हमें .
लोक- कौन कहता है नहीं सीखी .पर अभी सर्वसुलभ नहीं हुई .एक जगह शान्ति से रहें तो वह भी हो जाएगी .
[उसा बीच उषा,रुचि आदि महिलाएँ परस्पर वार्तालाप करती हुई आभूषण निकाल लेती है .,कुछ सूती वस्त्र भी निकलते हैं.स्त्रियाँ आभूषण उठा-उठा कर प्रसन्न हो रही हैं .]
रुचि -यह वलय है, मैं लूँगी .
उषा -कितनी तो लाया है भ्रातर .ला मुझे भी दे .
एक महिला -[कर्णफूल उठा कर ]यह क्या है ?
अमृ. - वे लोग नाक -कान छेद कर ये आभूषण पहनते हैं .
वृद्ध -वत्स अमृताश्व ,तूने यह ठीक नहीं किया .पुष्पों से अधिक सुन्दर और सुलभ और कोई  शृंगार हो सकता है क्या ?हमारी स्त्रियाँ आभूषण-प्रिय हो जायेंगी ,अपनी स्वाभाविक गरिमा और शील खो देंगी .यह विलासिता हमें कहीं का नहीं रखेगी .जब तक भुजाओं में बल है यह धरती हमारी है ,नहीं तो कुछ अपना नहीं .रुचि,इषा ,ये आभूषण रख दो .अपना कार्य करो .[वे रख देती हैं ]हमें असुरों से बचकर रहना होगा .वत्स सुमेध ,समस्त गण को इस पवित्र अग्नि के चारों ओर एकत्र करो .
[कुछ युवक उठ कर जाते हैं ,लोग एकत्र होने लगते हैं ]
वृद्ध - जन सुनें ,गण सुनें ,ब्रह्म सुनें, यह धरती हमें आश्रय देती है, कुछ बर्बर लोग जो हमें हटा कर भूमि पर अधिकार करना चाहता है हम उनसे नहीं डरते ,हमारी स्त्रियाँ, बालक सब युद्ध करना जानते हैं.गण के समक्ष हम सब बराबर हैं ....देवों को हव्य मिले ,पितरों को कव्य मिले ,हमारा गण उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हो इसके लिये इस ओर उनकी सब जानकारी करने को अमृताश्व और ऋचीक को भेजा था .अमृताश्व आपके सम्मुख है और ऋचीक भी शीघ्र ही आयेगा .अब हमारा ब्रह्म यह निर्णय करे कि हमें आगे क्या करना है .
एक पुरुष -उचित है तात,भद्र अमृताश्व स्थिति स्पष्ट करें .
अमृताश्व - मैं एक मास के लगभग असुरों के नगर में रह कर आया हूँ .रूप में हमसे हीन होकर भी वे सभ्यता में हमसे आगे हैं .
एक स्त्री -धिक्कार है .तू उन लोगों को हमसे सभ्य कहता है [कोलाहल होता है ]
अमृताश्व -जन सुनें ,गण सुनें ,ब्रह्म सुनें, मुझे जो प्रतीत हुआ वह सबके सम्मुख स्पष्ट रूप में रखना मेरा कर्तव्य है ..
वृद्ध -[खडे होकर ,शान्ति स्थापन का प्रयास करता हुआ ]पहले अमृताश्व की बात को गण सुने .कोई पूर्वाग्रह लेकर निर्णय न किया जाय .वत्स, कहो.....
*

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

सागर-संगम - 2.

*
(पूर्व-दृष्य की निरंतरता . )
लोकमन - बहुत प्रसन्न हो रही हो कि हम देवों की संतान हैं पर उनके पराभव और नाश की गाथा से भी कुछ शिक्षा ले लो नटी ,कुछ विचार करो    बड़ी उन्नत सभ्यता रही थी उनकी वह कैसे मिट गई ?
(सब चुप हैं.)
लोकमन -उनकी घोर विलासिता और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने का अहंकार उन्हे ले डूबा .

सूत्र  -हाँ  जल प्लावन की कथा हमने भी सुनी है.,फिर क्या हुआ ,कवि ?

लोक -उधर सिन्धु की घाटी में थी द्रविड सभ्यता छाई ,
कला-शिल्प -संस्कृति अति उन्नत ,पूरी एक इकाई !
उन टीलों में दबी आज भी टेर-टेर कहती है -
मत अभिमान करो थिर कोई चीज नहीं रहती है !
 इक छोटी सी भूल कभी तो सब चौपट कर जाये !
हम क्या ?बीती संस्कृतियों के मिश्रण एक निराले ,
जिसे काल के दो पाटों ने नये रूप दे डाले !
 भारतवासी अपने को खुद काहे रहो भुलाये !
सूत्र -हाँ , धरती में समाए उस युग के अवशेष आज भी  उस विकसित  सभ्यता  की याद दिलाते हैं .
नटी -कैसी थी वह द्रविड संस्कृति ?हमने क्या कुछ पाया ?
सूत्र -कवि के मनोजगत में उसने कैसा चित्र बनाया ?
[क्षण भर को अंधकार ,फिर दृष्य सामने आता है -मंच पर मातृदेवी और नटराज की प्रतिमायें,दीपाधारों में दीप ,जलती हुई मशालों का प्रकाश वातावरण को रहस्यमय बनाता हुआ .लोक नर्तक और नर्तकियों का एक दल धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा है .उनके अपनी -अपनी स्थिति लेने के साथ ही साथ कवि के स्वर उठ रहे हैं  -]
[प्रकाश मातृदेवी पर ]
तृष्णा ,तुष्टि ,चेतना ,निद्रा ,भ्रान्ति ,बोध सब एकाकार ,
इस अद्वैत इकाई में आ समा गये हो कर अविकार !
जननी ,जन्मभूमि ,जगदम्बा ,माया ,प्रक-ति अनेकों नाम ,
शक्ति स्वरूपा मातृ-देवि जड़ -चेतन का करती कल्याण !
[प्रकाश नटराज पर ]
यह बाल चन्द्र अमृतानन्द,डमरू में सृष्टि प्रवर्तन !
संहार-शक्ति है अग्नि वलय ,शिव नर्तन !
जड़ अपस्मार पर चरण ,अभय कर मुद्रा ,
जिससे कि संतुलित रहे मृत्यु औ'जीवन !
कैसा भरा-पुरा जीवन रहा था जिसकी स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं . [नर्तकियों का नृत्य--]
धन-धान्य भरा आँचल लहराया रे !
धरती की गोद भरी सुख छाया रे !
 पुरवा डोले बन में कोयलिया गाये ,
 मौसम झोली भर-भर आनन्द लुटाये
सब तेरी करुणा ,तेरी माया रे !
 सब विद्या और कलायें रूप तुम्हारे ,
 सारे नारी तन व्यक्त स्वरूप तुम्हारे !
गति ही जीवन है मंत्र सुनाया रे !

 नटराज  व्योम बन छाये दिक्पट धारी !
 योगी-भोगी वे सृष्टि प्रवर्तनकारी !
सच -शिव- सुन्दर को हमने पाया रे !
 सूरज पिचकारी भर -भर किरणें मारे ,
 हँस रहीं दिशायें दोनों हाथ पसारे !
उत्सव है जीवन की प्रतिछाया रे !
(पटाक्षेप)
*

बुधवार, 14 अगस्त 2013

सागर-संगम -1 .

[ भारतीय संस्कृति की भावात्मक एकता पर आधारित  नाट्यरूपक.]

(एक मंचन के लिए इस भाव-नाटिका को  काफ़ी  पहले तैयार किया  था , मंचन सफल रहा पर मुझे लगता रहा लेखन में काफ़ी कमियाँ रह गईं हैं  ,उन्हें दूर करने का प्रयत्न करती हुई , अब  प्रस्तुत कर रही हूँ.)

 वक्तव्य - 
 संस्कृतियों का विकास, लोक-मन की अनवरत यात्रा है . लोक-मानस जब तक विवेकशील और सहिष्णु होकर समय की गति के साथ चलता है तब तक संस्कृतियों का विकास होता है अन्यथा विनाश हो जाता है .भारत एक सागर है जिसमें प्रागैतिहासिक युगों से लेकर ,आज तक अनेकानेक संस्कृतियों और धर्मों का संगमन होता आया है .विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियाँ जहाँ काल के प्रवाह में विलीन हो गईं वहीं भारतीय संस्कृति चिर -प्राचीना हो कर भी चिर-नवीना बनी रही - कारण कि सागर के समान अनेकानेक सरिताओं को आत्मसात् कर यह अपनी जीवनी-शक्ति को परिवर्धित करती रही ,साथ ही इसने विभिन्न  धाराओं को धारण कर अपनी विविधता और समग्रता को बनाये रखा .
 धर्मों और भाषाओं का उद्भव मानव समाज के सामंजस्य और कल्याण के लिये होता है ,वैमनस्य के लिये नहीं .आज जब धर्म और भाषा के नाम लेकर कुछ विकृत मन बर्बर्ताओं के नंगनाच में लगे हैं,हम पलट कर देखें कि जीवन-यात्रा के किन पड़ावों से गुज़र कर हम यहाँ तक पहुँच पाये हैं.इक्कीसवीं सदी के बदलते  परिवेश में , विश्व  के मंगल और स्वस्ति  लिये हम ऐसा  संतुलित और स्वस्थ वातावरण निर्मित करें ,जिससे कि आगत  पीढि़याँ समुचित दाय प्राप्त कर  जीवन की महाधारा में  अपना  स्थान निश्चित कर  सकें .
 अविरल काल-धारा से,लोक-मन ,लोक की भाषा में जो वैश्वानर है ,युग-युग के घाटों का रस पान करता है सूत्रधार को अनुभूतिमयी दृष्टि का दान देकर ,सतत प्रवहमान काल-धारा में समाधिस्थ होता है . नश्वर देहों में अनश्वर चैतन्य के सूत्र को धारण करनेवाला सूत्रधार ,चिर सहचरी ,जिज्ञासा नटी के साथ ,लोक मन के रस-ब्रह्म का साक्षात्कार करता है .
 आइये हम भी लोक-मन की रागिनी के अनहद नाद में गूँजते ' विविधता में एकता ' की तान को सुनने और गुनने की चाह में चलें, महामानवता के सागर -संगम  के रंगमंच पर -
(यवनिका उठने के साथ पृष्ठभूमि से शंख -घंटा नाद एवं मंगलाचरण )

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवाभागं यथा  पूर्वे  संजनाना उपासते ।। 

[साथ-साथ चलो ,साथ-साथ बोलो,तुम सबके मन समान जाने जायें.जिस प्रकार से सूर्य,चन्द्र ,पवनादिक देवता  एक दूसरे को समान महत्व देते हुये विद्यमान हैं .]
समानी वा आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।
 
 [तुम सबके अभिप्राय समान हों,तुम सबके हृदय समान हों,तुम सबके मन समान हों ,जिससे सब सुदृढ़ हों सको .]

नर्तकों का एक छोटा समूह प्रवेश कर वंदना करते हुए --
समूह गान -
' शक्ति दो हे शक्तिदायिनि, शक्ति दो !
कामना शुभ और सम परिवृत्ति दो !

हे महा महिमामयी ,उत्सव बने जीवन !
चेतना से पूर्ण हों जड मृत्तिका के कण !
मूढता भागे युगों की ,भ्रम हटे मन का ,
शाप दुख मिट जायँ ,दृढ हों प्रेम के बन्धन !
मनुजता के प्रति सतत अनुरक्ति दो !

ज्ञान औ'विज्ञान साधें विश्व का मंगल ,
कला,विद्या,शिल्प दें ममता भरा संबल !
भारती की गोद खेलें चाँद औ'सूरज,
आशिषों से पूर्ण हो माँ का मधुर आँचल !
स्नेह समता को नई अभिव्यक्ति दो !

वेष अगणित,रूप अगणित ,बोलियाँ अनगिन ,
सप्त-स्वर में बज उठे एकत्व की सरगम !
धरा से आकाश तक दुर्लभ नहीं कुछ भी ,
कोटि कर औ'कोटि पग प्रस्तुत जहाँ प्रतिक्षण !
कलुष से ,तम से असत् से मुक्ति दो !
--
दृष्य  - 1.
दृष्य- सूत्रधार गहन चिन्तन में बैठा है ,चारों ओर पुस्तकें फैली हुई हैं कुछ बिखरी ,कुछ एक के ऊपर एक खुली ,कुछ एक के ऊपर एक .चौकी पर कागज़,कलम .सूत्रधार कभी कोई ग्रंथ उठाता है ,पन्ने पलटता है ,कभी कुछ पढ़ने लगता है ,कुछ लिखता है फिर रख देता है.फिर दूसरा उठा कर ध्यान मग्न हो पढने लगता है .नटी का प्रवेश ,कुछ क्षण खड़ी होकर देखती है फिर समीप आ जाती है .
नटी - आर्यपुत्र ,बड़े व्यस्त प्रतीत होते हैं .इतनी पुस्तकें ...[समीप जाकर पुस्तकें उठा-उठा कर देखती है ]स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास,प्राचीन इतिहास ,धर्म और दर्शन के इतने ग्रंथ ,साहित्य ,संस्कृति समाज-शास्त्र ...क्या खोज रहे हैं ?किसी विशेष आयोजन की पूर्व-भूमिका है ?
सूत्रधार - हाँ प्रिये ,दुनिया का गोला बडा अशान्त है.रोज अखबार बताता है कभी किसी देश में कुछ अकरणीय घट रहा है ,कभी कहीं और कुछ अनर्थ हो रहा है .अन्याय , अनाचार स्वार्थ और अहं का नंगनाच !प्रकृति के साथ अतिचार ,ध्वंस और मृत्यु के भयावह रूपों के आविष्कार !मानवता त्रस्त हो उठी है .दूर क्यों जाओ ..किसी समय जिसने सारे संसार को प्रकास दिया वह हमारा भारत भी आज तेजहत और तमसाच्छन्न हो गया है .पारस्परिक द्वेष ,ईर्ष्या,और भ्रष्टाचार !लगता है इसके अलावा यहाँ और कुछ बचा ही नहीं है .
नटी -
हाँ ,मन तो मेरा भी बार-बार उद्विग्न हो उठता है.हम कहाँ थे कहाँ आ गये और भी कहाँ जा रहे हैं,कुछ समझ में नहीं आता .मेरा तो सिर चक्कर खाने लगता है .
सूत्र - लोक मन की यात्रा-कथा की प्रतीक्षा कर रहा हूँ .
नटी - लोक-मन की यात्रा-कथा !...अच्छा समझी .कवि लोकमन कहिये न !
[बाहर से आवाज आती है 'सूत्रधार हो क्या ?']
नटी - यह तो कवि लोकमन का स्वर है .आ गए ..आ गए ..!
सूत्र - कवि अन्दर आजाओ !चले आओ मित्र लोकमन !
[लोकमन का प्रवेश - धोती ,पगड़ी पहने ,कानों में मुरकियाँ ,हाथ में कविता पोथी ]
लोक - तुम्हारा काम हो गया सूत्रधार आज मैं तैयार होकर आया हूँ .
सूत्र -[प्रसन्न होकर ]तो लोकमन की यात्रा-कथा तैयार हो गई !मैं तो आज बडी उलझन में पडा था .

नटी - आर्यपुत्र बहत व्याकुल थे ,बहुत उद्विग्न , मन तो मेरा भी स्थिर नहीं रह पाता कि इस ऊहापोह को कैसे व्यक्त करें .आपको वाणी  का वरदान मिला है, कवि !हमारा समाधान आप ही कर सकते हैं .
सूत्र - किन शब्दों में स्वागत करूँ मित्र, विराजिये आपके स्वर सुनने को  मन विकल है.

लोक - भूमिका तैयार कर लो सूत्रधार , चलो ,आगे बढ़ चलें .
लोक  -.मंच तैयार है ! कवि की अंतर्यात्रा में हम भी साथ हो जायें ,प्रिये !
सूत्र -चलो ,उतर चलें रंग भूमि में ..
(उठ कर चलने का उपक्रम लोकमन कुले मंच पर स्थान ग्रहण करता है .मंच को प्रणाम और सब को नमन करता है.)
लोकमन -[ लोक शैली में कान पर हाथ रख कर स्वर भरता है ]
धारा बहती जाये रे, धारा बहती जाये !
 जो आये सो चलता जाये बहे काल की धारा ,
सतयुग ,त्रेता ,द्वापर बीता ,छोड़ बढ़ा संसारा !
रूप बदल जाये धरती का सागर पर्वत नदियाँ !
चंचल मनवा थिर न रहा बीतीं यों सौ-सौ सदियाँ !
 इस भारत की धरती पर भी युग आये,युग जाये !

आदिम लोग यहाँ जंगल में जगह-जगह रहते थे,
गरुड,नाग औ'मत्स्य आदि वे अपने को कहते थे ,
यक्ष,निषाद सभ्यता के उनसे कुछ और निकट थे ,
असुर रक्ष गंधर्व धनी थे विद्याओं में पटु थे !

नटी.-कुछ आभास दो कवि ,आदिम लोग जो जंगल में जगह-जगह रहते थे,
गरुड,नाग और मत्स्य आदि कहलाते थे उनका जीवन कैसा था ?
लोकमन - उस अतीत को कौन जाने नटी, पर मानव-मेधा प्रयास कर सकती है .

(दृष्य खुलता है -  नाग युवती ,सुनागा  आती है ,हाव-भाव से लगता है किसी की प्रतीक्षा कर रही है .)
सुनागा -अभी तक सुपर्ण नहीं आया !आ रहा है ..,वह आ रहा है .
[एक गरुड़ युवक का प्रवेश दोनों एक दूसरे को देख कर प्रसन्न हो जाते हैं .]
सुनागा - आ गया सुपर्ण ,मैं तेरी राह देख रही थी .कहाँ था अब तक ?[बैठते हैं ]
सुपर्ण -हाँ सुनागा ,मुझे देर हो गई .पाती नहीं आने दे रही थी .
सुनागा -[सशंकित होकर ]फिर तू क्या करेगा ?
सुपर्ण -तुझे अपने साथ रखूँगा .
सुनागा -मुझे तो अब तक कोई बच्चा नहीं हुआ ,मुझे कौन साथ रखेगा !
सुपर्ण -फिर मैं क्या करूँ ?बच्चा तो अपने आप होता है ,मैं भी क्या कर सकता हूँ ,तू भी क्या कर सकती है !
सुपर्णा - नहीं हुआ तो मुझे नदी में डुबो देंगे .तू तो पाती के साथ रह जायेगा .
सुपर्ण -मुझे तू अच्छी लगती है .
[अस्तव्यस्त वेषभूषा में बच्चे को गोद में लिये एक गरुड़ युवती का प्रवेश ]
सुपर्ण -अरे पाती क्या हुआ ?
पाती -भाग ,जल्दी भाग !निषाद आ रहे हैं .
सुपर्ण -कहाँ से ?हम उन्हें लड़ भगायेंगे .अब तो गरुड़ और नाग मित्र हैं ,दोनों मिल कर लडेंगे .
[हलचल और कोलाहल भाग दौड की आवाजें ]
पाती -सुनागा, भाग जल्दी से ,सुपर्ण तू क्यों खडा है ?
सुपर्ण -मैं अपना तीर-कमान ले आऊँ ; औरों को भी बुला लूँ .
[सुनागा भागने की उतावली नहीं दिखाती , उठ कर खडी हो जाती है ]
पाती -तू नहीं भागेगी सुनागा ?
सुनागा - मैं भाग कर कहाँ जाऊँ /मुझे बच्चा नहीं होगा तो ये सब मार डालेंगे .सुना है निषाद औरतों को मारते नहीं .
पाती -क्यों दुष्मन तो स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं ?
सुनागा - नहीं वे किसी भी जाति की स्त्री को ले जाते हैं और अपने घर में रखते हैं .
पाती -अजीब लोग हैं दुष्मन की स्त्री को भी रखते हैं !
सुनागा -मैंने सुना है वे कहते हैं पुरुष झगड़ा करते हैं स्त्री नहीं करती .
पाती -अच्छा !वहाँ भी उन स्त्रियों के बच्चे होते होंगे .
सुनागा -और क्या !औरत चाहे अकेली रहे, बच्चे तो होंगे ही .
पाती -और नाग औरत के नाग बच्चे होंगे उन्हें भी पालेंगे ?
सुनागा -वे जादू मन्तर से उन्हें निषाद कर लेते हैं .
[कोलाहल बढता है दोनों भागती हैं .काले,छोटे कद के निषाद एक नाग और गरुड़ को बाँध कर ला रहे हैं ,कुछ स्त्रियाँ भी घेर कर लाई जा रही हैं .उनके पीछे निषाद स्त्रियाँ हैं ]
एक निषाद -[पाती और सुनागा को देख कर ]कैसी सफेद हैं ये औरतें !
निषाद स्त्री - यह भी कोई रंग है ?राख जैसा !
[एक निषाद बढ़ कर बंदी स्त्री के कंधे पर हाथ रखता है ,निषाद स्त्री उसे लात मार कर धकेल देती है और उसका हाथ अपने कंधे पर रख लेती है ]
निषाद स्त्री - नहीं ,नहीं .वह सिर्फ काम करने के लिये है .तेरी साथिन मैं हूँ .[बंदी स्त्रियों से ]जा,जा दूर हो यहाँ से .लकड़ी काट कर ला .
निषाद -हाँ ठीक है .ये लोग काम करेंगी .जा जा ,लकड़ी काट कर रख .[स्त्रियाँ जाती हैं ]
(पटाक्षेप )
 नटी- तो जीवन का यह ढर्रा रहा था!.
लोक -
आर्य इसी देश के वासी रहे थे .प्रारंभ में उच्च भूमियों पर निवास करते थे .दूर देशों तक उनका विस्तार रहा था .
कृषि योग्य भूमि की खोज में वे अन्य भू-भागों की ओर बढ़ते रहे .

और हाँ ,एक उन्नत जाति जो अपने को  देव कहती थी ,वह भी यहाँ निवास करती थी .पहले उसके बारे में जान लो .
 सूत्र- हाँ,हाँ अवश्य .

लोकमन -
 धारा बहती जाए...
 एक जाति थी और कि जिसके लोग देव कहलाये !
दिवलोकों के वासी हम इस धरती के रखवाले ,
सभी तत्व  हों वशवर्ती वे   यही चाहनेवाले  !
सुरापान अति प्रिय उनको उन्मुक्त भोग करते थे .
कर्महीन हो बस विलास वे जीवन में करते थे !
 आज नाम भर शेष रह गया चिह्न न बचने पाये !
सभी शक्तियों को बस में कर की ऐसी मनमानी,
डूब गई पूरी धरती यों बढ़ा प्रलय का पानी.,
कर्महीन के लिये यहाँ  पर जगह नहीं होती है ,
दैविक-भौतिक विपदायें ही उसे मिटा देती हैं !
 सिर्फ प्रजापति मनु नौका में कसी तरह बच पाये !

सूत्र - उन्हीं मनु के नाम पर तो हम मानव कहलाये
नटी - तो हम उन्हीं देवों की सन्तान हैं !
*
सूचना- इस नाटिका में व्यक्त अवधारणाओं के लिए अनेक  विद्वानों के कथ्य  और उनकी पुस्तकों की पृष्ठभूमि रही है .मैं उन सबकी आभारी हूँ .
(क्रमशः)


मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सबसे बड़ा दोष.

हेमा ने सुसाइड कर लिया !
भार्गवी की बात सुन कर सन्न गई हूँ .
अंतरात्मा चीख उठती है ,' नहीं, नहीं, नहीं !'
अभी उसकी उम्र ही क्या थी मुश्किल से तीस पार किये होंगे !
साथ बैठी सरिता ने कहा था 'सुसाइड करना कायरता है .'
कोई पागल हो जाए उससे अच्छा उस अभिशापमय जीवन से मुक्त हो जाना नहीं है क्या ?'
एक और व्यक्तित्व असमय ही निर्ममता से तोड़ डाला गया .
जिनने  उसे मरने के लिए विवश किया और बाद में भी उसे ही दोषी बना रहे हैं वे निरपराध हैं !

हमेशा हँसती रहनेवाली वह लड़की बीमार नहीं थी ,उसका दिमाग़ खराब नहीं था .हाँ, बाद के दिनों में बड़ी हताश और थकी लगती थी
उसे शुरू से ढाला गया था - सीधी बनो ,सुशील बनो ,सब कुछ सह लो ,किसी को जवाब मत दो .लड़की का धर्म है सब के अनुसार चलना,सब चुप रह कर निभाना. .शुरू से कह- कह कर कि अपना मत सोचो ,अपनी इच्छा कुछ नहीं दबा दिया गया था उसका मन .
अंत में  उसे क्या मिला - कुसूर किसका ?
*
वह कर्कशा नहीं थी ,होती तो दूसरों का जीना दूभर कर देती .माँ-बाप ने इतना निरीह बना कर इस क्रूर दुनियां के अयोग्य बना दिया था.सबसे बड़ी जुम्मेदारी उस आदमी की जो माँ-बाप के पास से ले आय़ा था ,जिसमें अपनी कोई  की सामर्थ्य नहीं थी ,अपने को उस पर थोपता चला गया था .वह उसे छोड़ गई क्या बुरा किया ?
यंत्रणा कितनी वीभत्स होती है .
*
वह मेरी छात्रा रही थी ,दस बरस पहले .खूब लंबी-सी साँवली-सलोनी हेमा ! कभी आगे की बेंचों पर नहीं बैठती थी ,और हमेशा हँसी बनी रहती उसके चेहरे पर .मुझे लगता मैं बोल रही हूँ और यह ध्यान नहीं दे रही है , पता नहीं किस बात पर हँसे जा रही है . मैं पूछती ,'क्यों ,क्या बात है हेमा ?'
'कुछ नहीं दीदी 'खड़ी हो कर वह बोलती है .
'तो इतनी हँसी क्यों आ रही है ?'
कोई उत्तर नहीं .
 महादेवी वर्मा का गद्य, पर्वत-पुत्रों की करुण- कथा, कितना गंभीर विषय और ये  हँसे जा रही है !
औरों का ध्यान भी बँटता है .क्लास में हँसी का संक्रमण फैलता है तो पढ़ाई कानों को छू कर निकल जाती है.
पढ़ने में साधारण थी हेमा ,और कुछ गड़बड़ नहीं ,बस डाँटो तो भी हँस रही है, सिर झुकाए भी हँसी से बाज़ नहीं आती .
इसीलिए एक बार बेंच पर खड़ा कर दिया. पर फिर पीरियड की घंटी बज गई थी.
उसकी ओर न देखूँ ,यही कोशिश रहती ,पर बार-बार ध्यान उसी ओर चला जाता.वह सिर झुका लेती ,अक्सर टाल जाती मैं भी .कोर्स पूरा कराना है इस के पीछे क्यों पूरे क्लास का हर्ज करूँ .. .
साल बीत गया . छुट्टियाँ हो गईँ .

*
विभाग में नई लेक्चरर आई थीं  - भार्गवी .
उस दिन उनके घर हमलोग चाय पी रहे थे ,सामने की छत पर हेमा दिखाई दी.
'अरे , ये तो हेमा है ,'मेरे मुँह से निकला .'
उसने बताया पड़ोस का परिवार उसकी भाभी के रिश्तेदार है .
फिर सुना हेमा की शादी तय हो रही है, ससुरालवाले आगे पढ़ाना नहीं चाहते .
शादी हो गई होगी. अगले साल एक बच्चे की माँ बन गई कच्ची-सी हेमा.
 भार्गवी के घर मिली थी .पीली-सी ,दुबली-सी .पर चेहरे पर उसी हँसी की झलक
मेरे सामने आते शर्मा रही थी .मैंने ही आवाज़ दे कर बुलाया था.पास बैठी तो मन उमड़ आया .
'हेमा,ससुराल में भी ऐसी ही हँसती हो न?'
'नहीं दीदी ,हर समय दाँत खोले रखना वहाँ किसी को अच्छा नहीं लगता.'
मैं  धक् से रह गई.
सबसे पहले हँसने पर मैंने ही टोका था इसे .
उसके आदमी ने भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी.पिता की दुकान पर बैठने लगा था.यार-दोस्तो में तो शुरू से ही उसका अधिकतर समय बीतता था.
हेमा दो बच्चों की माँ बन गई .
फिर एक एक्साडेंट में उसके ससुर की मृत्यु की ख़बर सुनी.
*
दुकान की सारी जिम्मेदारी हेमा के पति पर .पर वह मन मौजी आदमी. दोस्तबाज़ी और खाने-पीने का शौकीन .माँ समझातीं तो भी नहीं सुनता .
हेमा कुछ कहती तो चिल्लाता ,'तुझसे क्या मतलब सुसरी ,खाने-पहनने को  मिलता है और क्या चाहिए? .हमारे ऊपर सासन करना चाहेगी तो जूता लगा देंगे .'
एक बार एक काली-सी औरत को घर भी ले आया था .बहुत दिनों से उससे संबंध था ,पड़ोसियों से पता लगा था.
बच्चों के लिए हेमा जुम्मेदार थी .जिसके अत्याचार सहती रही ,बच्चों को धारण किया , उसके साथ क्या कभी सहज जीवन जी पाई होगी  !और जब-तब वह आदमी हाथ भी उठाने लगा था.
*
एक बार हेमा मायके भाग आई थी , बिना किसी को बताए .
पर यहाँ माँ-बाप भाई-बहिनों के घर में कैसे खपती ?अब तो भाभी भी आ गई थीं?
फिर भी   दोष हेमा का है ,जिस आदमी ने कभी उसके साथ न्याय नहीं किया वह निर्दोष है !

भार्गवी उनकी संबंधी थी हम दोनों ने सलाह कर उसकी माँ से कहा था,'मत भेजो इसे वहाँ .पढ़ने का खर्च हम देंगे .पढ़ा कर नौकरी करने दो .'
हेमा ने मेरे पाँव पकड़ लिए थे .'दीदी,मुझे वहाँ  मत भेजो .'
माँ रो रही थी ,'आप समझती क्यों नहीं ?हमें और भी लड़कियाँ ब्याहनी हैं .
इससे तो मर जाती तो झंझट खत्म होता !.
और फिर इसका आदमी छोड़ेगा इसे ?जरा में कह दिया ये बच्चे ही मेरे नहीं हैं तो हम क्या कर लेंगे उसका ?इतना कलंक लेकर कहाँ जी पाएगी यह !'
फिर सुना वह अपने रिश्तेदारों के साथ आय़ा था और हेमा को साथ ले जाने को घसीटा था .
उसके बाप को धमका गया तुम कुछ भी बोले तो हवालात में बंद करवा दूंगा .
उसके बाद चार बरस हेमा मायके नहीं आई थी.
*
जिसे हँसने पर डाँटती थी वह हेमा कितने साल बिलकुल नही हँसी होगी !
अब वह कभी नहीं हँसेगी . इस हास और रुदन से मुक्त हो गई वह .
मेरी आँखें क्यों भरी आ रही हैं ?मेरा उसका कोई संबंध नहीं था .कुछ साल मेरे क्लास में रही थी , अपने हँसते चेहरे पर डाँट खाती .
 बार-बार आँसू उमड़े आ रहे हैं .

उन स्थितियों में जीना ,किसी के लिए संभव नहीं .जो विद्रोह करता है वह जी लेता है ,जो नहीं कर पाता वह मरने पहले बार-बार मरता है .
जीवन भर कुढ़-कुढ़ कर रहने से अच्छा एक बार मर जाना या डट कर लड़ना .प्रकृति में सदा से यह होता आया है ,जो समर्थ है जीता है ,असमर्थ मिट जाता है ,चाहे वह स्वयं को मिटा ले या दूसरे उसे मिटा दें .
क्वाँरी लड़की से माँ कहती है ,अपने घर जाकर अपना मन पूरा करना .पर अपना घर मिलता है क्या ? कहीं कोई अधिकार होता है क्या ?

पत्नी के जीवन पर और मृत्यु के बाद भी पति का अबाध अधिकार ! जब सीमा पार हो गई होगी मन ने विद्रोह किया होगा , तब उसे बता दिया गया होगा कि मुझसे बच कर जी नही सकतीं .
वह चली गई है ,चार दिन में सब ठीक हो जाएगा .मुझे नहीं सोचना चाहिए,रो-धो कर सब शान्त हो जाएँगे.आदमी दूसरा ब्याह कर लेगा ,बच्चे रो-झींक किसी तरह जी लेंगे. 

पर ध्यान उधर से हटता ही नहीं
दारुण से दारुण वेदना सह कर भी आदमी थोड़ा और जी लेना चाहता है .
 अपने-आप को कोई मार लेता है क्या ?
नहीं, ऐसी हँसनेवाली लड़की आवेश में अपने को नहीं मार सकती .
इसके पीछे बड़ी लंबी विचारणा होगी .पहले तो अपने न रहने की कल्पना कर वह रोई होगी .अपने बच्चों का सोच-सोच कर व्याकुल हुई होगी .उनकी निरीह दशा पर कितनी अशान्ति झेली होगी !
और रास्ते भी ढूँढे होंगे .
जब कुछ न कर पाई होगी ,सब कुछ असहनीय हो उठा होगा तब हार कर उसने यह कदम उठाया होगा .
मन की पीर हो या तन की सहने की एक सीमा है .आदमी  के साथ ऐसा होता तो वह बौखला जाता  .उन्मत्त हो चीख-पुकार करता  मुक्त होने को क्या-क्या नहीं करता!
 जीवन का अंत भी कितना कठिन  हो सकता है ?भीषण हा-हाकार ,रुदन से भऱपूर !
कैसा था प्रारंभ और कैसा अंत - दोनों दुखमय ! और इसके मध्य में क्या रहा ?
उफ़,सोच कर  कैसा लगता है !

और क्या पता हेमा ने खुद न किया हो, किसी और ने ही उसे ...
पर किसी को कुछ पता नहीं .किसी को क्या पड़ी है जो खोज-बीन करे !
जो हुआ वह क्यों हुआ? किसी ने रोकने की कोशिश क्यों नहीं की .यहाँ-वहाँ बहुत लोग थे ,सब मौन देखते रहे .स्त्री होना ही उसका सबसे बड़ा दोष था ?
हाँ, हाँ, हाँ !!!

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

भानमती बोलती है ...


  भानमती बोलती है ,बिना कामा-फ़ुलस्टाप लगाए .उसकी चलती गाड़ी  मैं  रोक नहीं पाती ,लोक-जीवन के तमाम अनुभव वहाँ बैठे हैं, गठरी-मुठरी बिखेरे - झटका न  खा जाएँ कहीं!
 हमारी कामवाली रुकमा खूब सध गई थी ,अब ब्याह हुआ तो छुट्टी ली , तब से नहीं  आई.
 'अब वो ना आने की ,' भानमती का कहना है ,' सुखदेई को रख लो,एक तो कामचोर नहीं  .फिर हमारे  हमारे गाँव की है- जानी-बूझी .'
  'एक दिन एवजी पर काम किया था उसने. पता है क्या कह रही थी - हरामजादा  मरद ही ठीक होता तो काहे का दुख ...'
'दीदी जी ,गाली ही तो दी कोई  छोड़-छुट्टा तो नहीं किया.तीन-तीन बच्चन का और उस चार हाथ  के निखट्टू धींगड़ का पेट भरना  आसान है का? उस पर का बीत रही है सो हम जानित हैं .
 'हाड़-तोड़ काम करती है आदमी जो कमाता है खा-उड़ा देता है कभी कुछ दे दिया तो जइस एहसान कर दिया .
कल हम गए रहे उसके घरे , रोटियां सेंक रही थी .सो हम बाहर पड़ोसन से बात करत रहे .
तीनों बच्चे और आदमी  ,खाने बैठे .जब तीसरी बार उसने परसी ,दाल की बटलोई में चमचा खटखटाने लगा.उसने टेढ़ी कर ली और निकाल कर कटोरे में डाल दी ..रोटी सेंक-सेंक कर देती रही. सब खाय चुके  उठ गए ,किसी का ध्यान नहीं गया कितना बचा उसके लै.'
खाना खा कर आदमी बोला ,' ला पानी दे .'
उसने गिलास भर दिया, पानी पी कर डकार लेता निकल गया .
बटलोई  मे बची दाल उसी थाली में उँडेल ली उसने बचे आटे का टिक्कड़ सेंक कर आ बैठी . खा कर ऊपर से दो गिलास पानी पी कर उठ गई .
लौट कर आदमी ने पूछा,'सुन,कल पाँच रुपए दिये थे कुछ बचा?'
'कहाँ नमक-मिरच-तेल सबै खतम हो गया था .अभी दो रुपए उधार के बाकी रह गए .'
'तो उधार भी कर आई! हाथ समेट कर खरच किया कर री .'
'हर चीज में आग लगी है ,दुकानवाला देने को भी तैयार नहीं होता ,बड़ी चिरौरी के बाद तो सौदा देता है .अब वो क्या फालतू है जो जरा-जरा सा तोल के अपना  काम खोटी करे .उसके तो बड़े-बड़े गाहक हैं ...'
'बेसी बकबक मत कर ,बड़ी आई  गाहकवाली !कोई एहसान नहीं करता पैसा पकड़ता है तब देता है.. और तेरे गाहक नहीं का ,उनके घरै से खाय-पी के आती है, सुसरी. '
भानमती ने बताया था -
कौन खाना खिलाता है ?जरा बहुत बचा-बचाया मिल गया तो उससे कहूँ  पेट भरता है .और जानती हो दीदी जी उसकी छोटी तो अभी दूध-पीती  है .
और भी सुनो ,कोई अच्छी चीज कभी मिल जाय तो बच्चन के लै बाँध लाती है ,आदमी भी हिस्सा पा लेता है सोई ताने सुनाता है .'..
'काहे को ले जाती है फिर घर?'
'इहै हमने  कहा  तो कहे लगी  बच्चन का चेहरा सामने आय जावत है ,गले से कइस उतरे !'
'....हाँ तो उस दिन सुख देई चुप ना रही. बोल पड़ी ,खुद लै आया करो तौन पता लगे ..'
 आदमी गारी दे के चिल्लाय परा ,'जित्ती छूट मिलती है सिर पे चढ़ी आती है...' और बाही-तबाही बकन लगा.
  दिन भर की थकी देह ,ऊपर से अधपेट खाना. .ऊ भी चुप्पै न रही ,
बाहर सुने वालेन को लगा ऊ करकसा है. मरद  से जुबान लड़ाती है .ओहि पर का बीती किसउ ने जानी ?सुनन को कान सबन के ,बोलन को मुँह सबन के  .देखन को सबन की आँखी काहे बंद हुइ जाती हैं?'
सुन रही हूँ चुप, उत्तर नहीं मेरे पास.
 *
भानमती ने बताया ,उसने भी एक बार  टोका था,' ओहिका गरियाय के खुद काहे बदनाम होती हो?'
 ऊ  कहै लाग , दिमाक मार हौहियान लगत है जिउ में आवत है  आपन मूड़ पटक लेई.
गरियाय के चिल्लाय के हड़क निकारित हैं .हम पगलाय गइन तो ई बच्चन का का होई ? और कुछू बस में नहीं,तौन  गरियात हैं ....होय बदनामी तो होय  .पैदा करि के धरे हैं तिनकी बर्बादी तो न होय !'
कहो भानमती, मैं तुम से हारी हूँ !
सारे आदर्श लाद दो उन पर , औरते चुप रहेंगी हैं .सारे उपदेश उन्हीं के लिए .पत्नी हर कीमत पर सुशील और मदुभाषी हो .नहीं हो सके तो मर जाए ,नीतिकार कवि ने कहा है -'मरै करकसा नारि ,मरै वह खसम निखट्टू .'
पर निखट्टू खसम मनमाना रहेगा.
कह लो कवि, तुम्हारी भी दृष्टि उसके  बाह्य तक सीमित रह गई !
*
लेकिन  हारना मत सुखदेई ,तुम रहो !
  लड़ लेना ,गाली दे लेना .कर्कशा ही सही ,
तुम बिन बच्चों का यहाँ कोई नहीं,तब उनकी बर्बादी कोई नहीं रोक पाएगा .
और सुनो ,पगलाना भी मत तुम ,कोई देखने-सुननेवाला नहीं होगा !
और सुखदेई ,तब ,तुम्हारे नारी-तन की दुर्गत,और बेसहारा बच्चों का हाल सोच कर ही जी काँप जाता है .
इसलिए सुनो, जी का गुबार निकाल लेना !
 कहने दो कर्कशा, पर  होश मत खोना .औरत का मरना उन लोगों के लिए सिर्फ़ एक तमाशा है पर सुखदेई ,तुम जीवित रहना !
 **

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है !

 *
हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है !

लेकिन काहे पर ? 
सब को पता तो चलें हमारी ख़ूबियाँ जिन्हें हम सिर उठा कर गिना दें  , अपने  भारतीयता के एहसास को और हवा दें !
 कहीं पसोपेश में न पड़ना पड़े इसलिये लगे हाथ हिसाब करते चलें  सारे  प्लस और माइनस प्वाइंट्स का ! 

शर्त बस इतनी कि वर्तमान की बात करें .हम ऐसे थे ,हम वैसे थे यह  हाँकने से क्या लाभ ?जब थे  तब थे  ,देखना तो यह है कि अब क्या हैं और किस ओर जा रहे हैं ! प्राचीन संस्कृति की बात उन्हें नहीं शोभती , जिन्हें हिन्दी महीनों के  नाम नहीं पता , गिनती करते समय हिन्दी के अड़तालीस-अट्ठावन ,उनसठ.उन्हत्तर आदि सुनते ही छक्के छूटने लगें . और भी कहाँ तक बखाने, हिन्दी की वर्णमाला का सही क्रम भी पता न हो जिन्हें !
ये जोड़-घटा वाले हिसाब पहले आपस में कर लें ,संभव है कुछ सफलता हाथ लगे और हम सामूहिक रूप से  अपने पर गर्व कर सकें ! 
यहाँ अमेरिका में मैंने देखा है कि पाकिस्तानी रेस्त्राओँ  में कभी अकेला पाकिस्तान नाम नहीं होता ,इंडिया का नाम जोड़े बिना उन्हें लगता है, सरे बाज़ार लँगड़ाने लग जाएँगे .और  यह भी , कि लोगों को अपनी सही  पहचान बताने में संकोच होता है .परिचय  में  अपनी असलियत छिपा कर  खुद को हिन्दुस्तान से आया  बताते हैं  , अगर बाद में  पता लग भी जाए तो  सफ़ाई यह , कि बाबा तो हिन्दोस्तान में ही रहे थे (  'भारत' से उन्हें परहेज़ है ,हिन्दोस्तान या इंडिया का प्रयोग करते हैं , हमारी सरकार ने इसीलिेए ये नाम रख छोड़े हैं.) शताब्दियों पहले  के अपने पुरखों को पहचाने भी  या ख़ुद  को कहीं और की उपज बता दें तो कोई क्या कर लेगा उनका  . यह उनकी  समस्या है वे जाने ,पर चेत हमें भी जाना चाहिये ! 
हाँ , बात है अपनी ख़ूबियाँ गिनाने की , तो समझ में नहीं आ रहा  कि कहाँ से चालू करें  -  शुरूआत कराने की कृपा करे कोई, तो क्रम आगे बढ़ता चले !
 सहायता की अपेक्षा  सभी से  !
*

रविवार, 21 जुलाई 2013

पंचायत का निर्णय.

( इस लघुकथा को आपसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ .हमारे जिन मित्र ने यह  भेजी थी उन्हें धन्यवाद तथा अज्ञात लेखक के प्रति हार्दिक आभार सहित-)
*
एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये ! 
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं ! यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा ! भटकते २ शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज कि रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था  वह जोर २ से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो। हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद !
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो। हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है !
उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये ! बोले, भाई किस बात का विवाद है ? लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है !
लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पञ्च लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है ! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है !
यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली ! रोते- चीखते जब वहआगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको ! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी ! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है ! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है । यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पञ्च रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं !
शायद ६५ साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश की बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं।
*

बुधवार, 17 जुलाई 2013

राम-रजाई.

*
अम्माँ सुबह पूजा के समय एक दोहा बोलती हैं -
'राम रजाई रावरी ,है सब ही का हेत ..'
उनकी पूजा लम्बी चलती है , बोलते-बोलते ध्यान और चीज़ों पर भी तो देना पड़ता है .जितनी स्तुतियाँ आदि याद हैं इधऱ का उधर जोड़-तोड़ कर पूरा कर लेती हैं, जो शब्द जहाँ  समा जाये बस, उनका मन भक्ति-विभोर है .कोई हँसे हँसता रहे .सारे शब्द राम के ,सारे अर्थ राम के. क्या फ़र्क पड़ता है - भाव तो उनके मन में  है .
भक्ति का सब का अपना-अपना ढंग !
चेतन सुनता रहता है. मतलब भी अपने अनुसार लगा लेता है .अभी बारह बरस का हुआ है . अम्माँ की रजाई को 'राम रजाई' कहता 'है और जाड़ों में कहीं से आते ही ठण्डे हाथ-पाँव  ले कर उसमें घुस जाता है .
कोई टोके,' अरे बाहर से आया वैसे ही हाथ-पाँव उनकी  रजाई में घुस गया .'
' ये तो राम रजाई है सब के भले के लिये ! क्यों अम्माँ, तुम्हीं तो रोज कहती हो ?'
अम्माँ क्या कहें , हँस देती हैं.
अब क्या कर लेगा कोई ?
'कितने ठण्डे हो रहे हैं हाथ-पाँव.'
 अपने हाथों में ले कर गरम करने लगती हैं
'अरे, रहन देओ , मार ठण्डाय गौ है लरिका.  उघार उतार के धुइ जइ है .'
तो अम्माँ की रजाई ,राम-रजाई बना डाली  उसने .
तुलसीदास जी होते तो कैसा लगता उन्हें !
*

सोमवार, 8 जुलाई 2013

जागो !तामसी , आज फिर जागो !

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नाथ पंथी  महायोगी गुरु गोरक्षनाथ भ्रमण करते हुए हिमाचल प्रदेश की  कालीधार पहाड़ी स्थित ज्वाला देवी के स्थान पर पहुँच गये.आदिनाथ शिव के  प्रथम शिष्य को आया देख  देवी ने साक्षात् प्रकट हो कर उनका स्वागत किया और  भोजन हेतु आमंत्रण दिया .
गोरख बोले,' देवी ,तुम्हारा भोजन मेरे वश का कहाँ !मैं भिक्षाटन कर सात्विक भाव से जो अन्न मिलता है वही ग्रहण करता हूँ.
' जानती हूँ गोरक्ष .,तुम मेरे अतिथि हो  ,तुम्हारे अनुरूप ही भोजन प्रस्तुत करूँगी.'
'भोजन में भाव का बड़ा महत्व है .तुम मेरी  पूज्या हो, पर मांस -मदिरा होने के कारण  तुम्हारी रसोई में अनायास तामसी गुणों  का प्रभाव आ जाता है? देवि,मुझे क्षमा करो.'
 देवी विस्मित हो उठीं.
'सृष्टि के तीनों गुण सर्वत्र व्याप्त हैं कैसे बचोगे गोरख, थोड़म-थोड़ा तो सब में सब समाया है ? कोई शुद्ध कहीं नहीं मिलेगा तुम्हें !'
'मैंने वैराग्य लिया है , रज और तम से विरत रहने का मेरा व्रत है  . तभी  तो स्वयं-पाकी रह  भिक्षान्न स्वयं राँधता खाता हूँ.'
'तो तमोगुण संसार की बुराइयों का मूल है?'
'तमस् ही मानस की ज्योति को अवरुद्ध करता है.' गोरख नाथ ने उत्तर दिया ,
 'अपरिग्रही रह कर जीवन बिताऊँगा ,पूर्ण सात्विकता और सिद्धि प्राप्ति से  आगे  ब्रह्मलीनता पाना  मेरे जीवन का उद्देश्य है.'
' ...पूर्ण सत्विकता ,' देवी ने दुहराया ,' ..यहाँ सब सापेक्ष है .तुम्हें विरोधी लगते हैं, पर सारे  ही गुण बिंब-प्रतिबिंब भाव से स्थित हैं.परस्पर  पूरक . समयानुसार सब ग्रहणीय.  शाश्वत होना संसार का धर्म नहीं यहाँ काल निरंतर सक्रिय रहता है .सतत परिवर्तनशील और  क्षण-क्षण क्षयमान है यह  जीवन ..  मन पर संयम रख कर संसार को निभाना क्यों नहीं कर पाते ..केवल आत्म-कल्याण ही उद्दिष्ट..! घोर आसक्ति या  एकदम वैराग्य. हर पल  गिरने की संभावना ,तृप्ति न मन की न तन की . . अतियों में जीना हर पल  गिरने की संभावना .'

 'हम और आसक्ति कैसी बात..' गोरख के मुख से निकला

'याद करो ,अपने गुरु मछिंदर नाथ को तुम्हीं तो उस मोह-कूप से निकाल लाये थे .'

गोरख चुप !

तामसी देवी ने कहा, 'गोरख,मैं अगर सौम्य ही बनी रही तो तुम्हारी दुनिया का क्या होगा ?समय के अनुसार गुणों का अनुपात बदलता  है .उन विषम स्थितियों से कौन निपटेगा ?
'ये संसार है. यों ही चलेगा..हम जब सारी माया त्याग, सबसे विरत हो गए ,अब क्यों फँसें दलदल में ?  .'
देवी ने प्रबोधने का यत्न किया -
'संसार में जन्मे हो , उसका निर्वाह  कौन करेगा ? जब पतन काल में बर्बर ,अनाचारी और अनीतियों के पोषक तत्व प्रबल होने लगें .,चतुर्दिक पाशविकता का उन्मत्त का नर्तन  हो, दुर्दान्त वृत्तियाँ अबाध विस्तार पाएँ . दंभी अपने अहंकार में किसी को कुछ नहीं समझें तब उनका दलन आवश्यक नहीं क्या? ये कैसी साधना कि व्यक्ति सबसे विरक्त रह कर आत्मोन्नयन में लीन रहे ! '
'विसंगतियों को दूर करने के लिये ही शुद्ध सात्विक धर्म और भोग-प्रधान योग-साधना के स्थान पर हठयोग साधना का प्रचार कर रहा हूँ .'
 'जीवन  कैसे चलता है गोरख, उसे सँवारने के लिए अपने आपको  खपा देना पड़ता है तब एक पीढ़ी खड़ी हो पाती है. गृहस्थाश्रम, जो  नींव है, उसे ही नकार दिया तुमने .जिस  पर सारा  दारोमदार  टिका है उस से बच कर भाग आए ?'
द्वंद्वों से बच कर ही कल्याण-साधना संभव है - सोचा गोरख ने, पर देवी के सामने बोल नहीं पाए .पहले से सावधान हो जाएँ तो सांसारिकता में फँसने की  नौबत ही क्यों आये !'
  देवी मन ही मन विचारती रहीं -
सब एक जैसे ! एक वे शंभु ,कैलास पर जा बैठे ,विष्णु क्षीरसागर में निद्रालीन .ब्रह्मा  सृष्टि रच कर मसट्ट मार गए. सब अपने में मगन ,तैसा ही यह गोरख   .कोई समझना ही नहीं चाहता .अव्यावहारिक आदर्शवाद से कहीं सृष्टि चली है !ये सब तो आत्म-कल्याण के लिये किनारे हो गये .लोगों के विषय में कौन सोचेगा .संसार का क्या होगा किसी ने नहीं सोचा .'
देवी की मौन मुद्रा देख गोरख बोले
'तुम अदहन चढाओ,मैं  भिक्षा लेकर  अभी  लौटता हूँ .पेट भरने को दो मुट्ठी खिचड़ी बस.'
और  चल दिये अपनी झोली उठा कर .
*
साक्षात् अन्नपूर्णा, शंभु-गृहिणि को छोड़ संसार की नारियों से भिक्षा माँगने जा रहे हैं गोरख .
देवी हँस रही हैं .
कह गया है, 'दो मुट्ठी खिचड़ी बस . कोई ममतामयी  गृहिणी दे ही देगी!'
नारी के बिना पेट कौन भरेगा इसका ?माँगेगा अंततः प्रकृति से ही न !
 बड़ा पुरुष बना है, जाने दो !मूढ़ कहीं का.  निवृत्ति मार्ग चलेगा ,परायी गेहिनियों से भिक्षान्न पा कर तृप्त होगा  . माँ-बहिन ,पुत्री किसी की हो -  उसी के रूप हैं सारे .प्रकृति से भिन्न हो कर  पुरुष क्या है -निरा एकाकी,अरूप, बीज सा अव्यक्त-जड़ीभूत,  ,अमूर्त विचार सा निष्क्रिय !
 देवी ने कहा था-
 ' देखो गोरख ,जितने पंथ अकेले पुरुषों को लेकर चले ,अस्वाभाविक होने के कारण अपर्याप्त  रहे .कालान्तर में उनमें विकृतियाँ आईँ ,क्षरण हुआ ,प्राकृतिक जीवन को नकार कर कौन स्वस्थ रह सका ? असंतुलित जीवन  पथ-भ्रष्ट होगा एक दिन!'
 मत्स्येन्द्र की याद कर .तिर्यक् हास मुख पर छा गया .
जाओ गोरख , तम का घेरा जलाने की  सामर्थ्य  कहाँ तुम में ! तभी उससे  भागते हो .सारे संसार में भ्रमण कर जाओ,जहाँ मिले अकेला सत, बटोर लाओ . खोजते रहो  जहाँ  रज-तम का छींटा न पड़ा हो . यहीं बैठी हूँ मैं ..'
*
ज्वालाएँ  प्रज्ज्वलित कर अदहन  चढ़ा दिया देवी ने ,
भूखा प्यासा आयेगा तो झट-पट  सीझ जाएगी  खिचड़ी .
मंदिर में बैठी हैं प्रतीक्षा-रत !
विचार चल रहे हैं -
उसे लगता है , मैं तामसी हूँ ,मद्य-मांस का सेवन करती हूँ
 हाँ ,क्योंकि क्रूरता मेरा  स्वभाव नहीं ,कुछ समय का आरोपण भर है  . कहीं  संहार  करते उद्विग्न न हो जाऊँ  . मद पीती हूँ इसलिये कि, दुर्दान्त दानव का हनन करते विचलित न हो जाऊँ . जो असीमित अधिकार चाहता है  मुझ पर ,पशु बना पड़ा रहे तो भी ठीक, पर चेत आते ही बार-बार सिर उठाएगा.  मैं जो प्रकृति हूँ , मुझे  विरूप करना  शासित करना चाहता है .उस पर वार करते ममत्व  न उमड़ पड़े !
 मद पान करती  हूँ कि संहार-बेला में अंतर की करुणा न जाग उठे ,विकृतियों को  ध्वस्त कर डालूँ  .  .मद पीती हूँ कि संहार में संयत-चित्त रहूं सकूँ .
शोणित-बीज उगें, तो पलने दूँ धरती पर ?विकृतियों का नग्न नृत्य होने दूँ ?कौन  पियेगा रक्त?
  तामसी चामुंडा  ही न !
दंड बिना उपाय नहीं , मैं तामसी देवी, तब रक्तपान से भी नहीं हिचकती.
हाँ ,मद पीती हूँ मैं !
गृहिणी हूँ मैं , परम गृहिणी -संपूर्ण नारी !इस पूरी सृष्टि को सँभालना है मुझे. शक्ति के साथ सत और तम दोनों की संयुति आवश्यक है  . अहंकारी  दंड को दंड मिले किन्तु  वह भी सद्गति पाये शान्ति पाये !उन्मत्त भटकेगा तो कैसे सृष्टि में शान्ति का विधान होगा .उसे भी होना है,उसे भी  रहना है ,अपने समय पर  दाँव खेलना है - इतना समर्थ होकर कि सत् को भी चुनौती देता ,उसे जाग्रत रखे ,  संतुलन बनता  रहे .जो वीभत्स है , सौंदर्य की खाद बन जाए.
जब समस्त देव-भाव ,आसुरी अतिचारों से हारता है तो शक्ति की गुह़ार लगती है . मैं अवतरित होती हूँ  .सृष्टि के स्वास्थ्य और शुभ के विधान के लिए . सारी क्षमताएँ योजित करने को  निर्बंध  हूँ .तमोगुण  मेरे लिये बाधा नहीं मेरी  व्याप्ति में उसका भी समावेश  है .
उठती-गिरती लपटें रह-रहकर सोच- मग्न मुख को दमका देती  हैं ,
डिब्बी में अदहन चढ़ा  है!
*
 गोरख घूम रहे हैं द्वार-द्वार ,
भिक्षा-पात्र ,में अन्न पड़ता है ,रुकता नहीं . रीता पड़ा है  .
कलयुग बीत रहा है . जब सात्विक अर्जन का श्रद्धामय दान मिलेगा.सज्जन 
मुदित-मन समर्पित करेंगे तब  डिब्बी भरेगी .खौलते अदहन में खिचड़ी बनेगी और देव-गंधर्व मनुज ऋषि-मुनि पंक्ति बद्ध  खड़े होंगे - उस प्रसाद की प्रतीक्षा में!
 युग बीत गये .कब स्वप्न साकार होगा ?
 डिब्बी भरे तब न !
*
भिक्षाटन करते हुए हिमालय की तलहटी में आ गये गोरख .  राप्ती व रोहिणी का  संगम .एक पावन स्थान खोज अपना अक्षय भिक्षापात्र रख दिया और साधना में लीन हो गये।
  एक तेजस्वी योगी का  साधना-स्थल . लोग उमड़ उमड़ कर भिक्षापात्र में अन्न-दान करने लगे, भर-भर भाजन  खिचड़ी पड़ रही है . पर पात्र है कि  भरता नहीं .
 सारा दान-मान व्यर्थ ! लालसाएँ पूर्ण होने के लोभ से दी गई भिक्षा,और पराई भूख की गंध समाये अन्न के दाने  ? सुप्त विकार जगा देने वाला दान ,पात्र कैसे भरे ?
कितनी बार आया-गया खिचड़ी का पर्व . पात्र भरा नहीं , योगी समाधि से जगा नहीं  .
चार पस खिचड़ी ? न्याय-नीति की ,सुकृत कर्मों की कमाई ,सद्भाव से अर्पित हो तो भरे कटोरा ? पर   निष्काम भावेन सहज नेह भरे दाल-चावल के दाने नहीं मिले . कैसे  रिक्ति पूरी हो  ?
 दाता का भाव और मुट्ठी का नाज देख कर ही पता लग जाता है कि  कैसी कमाई है  .यह दूषित अन्न कैसे अर्पण करेंगे ,गौ को ,श्वान को ,पक्षियों को और साधु को ?
बिना खिलाये स्वयं किस विध ग्रहण करे साधक  !
ज्वाला देवी  अदहन चढ़ाए बाट देखती बैठी होंगी .
 रिक्त पड़ा पात्र धरे बैठे हैं.
किस मुँह से जाएँ  - भोग कैसे प्रस्तुत  हो ?
उनका कहा बार-बार ध्यान में आता है -
कितनी असंगतियाँ ,अन्याय अतिचार ! मन में जागते सुप्त विकार !'
सुप्त विकार ?
हाँ, यही कहा था उन्होंने..
विकार हैं मुझमें.सुप्त रूप में ही सही ,विद्यमान हैं  ?
  तामसी के स्वर जागे ,'नहीं होते तो काहे भयभीत हो ? गोरख, संसार में आकर अविकारी रह सका कोई ?'
 लगा देवी हँस उठी हैं .
*
ओह, अदहन खौल रहा है .
युग बीत गए ,चार मुट्ठी अन्न नहीं पा सके ....कोई आशा भी नहीं .
क्षुधा- तृषा से आर्त,  हताश विश्रान्त गोरख  धऱती पर बैठ गए .
अंतर्मन से अनायास पुकार उठी -
माँ !ओ, माँ !!कहाँ जाऊँ ?
 उन्होंने गोरख से कहा था - निवृत्ति जीवन का मार्ग नहीं  .संघर्षों से पलायन उचित नहीं .
जीवन के प्रकाशित, विहित मार्ग पर क्यों नहीं चलना ?
संसार में आया प्राणी, यहाँ का  आचार -व्यवहार  निभाये,  सो  नहीं  .प्राकृतिक जीवन के अनुकूल रह कर पूर्णता और पक्वता पाये, सो नहीं .विपरीत चलने में शान बढ़ती है  !
लेकिन प्रतिकूल हो कर , प्रकृतिके विरुद्ध जाकर कोई पंथ  नहीं चल पायेगा.अहंकार के वशीभूत हो कर नकारने के परिणाम -  अतृप्ति, कुंठा ,और  केवल भटकन!
 चिन्तन चलने लगा -
कौन हैं देवि ?परम ऊर्जामयी .ओह, कृष्ण-भगिनी हैं भगवती!अखिल विश्व को अपने में धारे सब के मंगल का विधान ही उद्देश्य जिनका ,वही निस्पृह कर्मण्यता .
उन्हीं ने कहा था प्रवृत्ति से  जीवन है .निवृत्ति से नहीं
अपने लिये कहाँ जीते हैं ऐसे लोग !  'न दैन्यं न पलायनं' वही कल्याणकारी संदेश!
तब भी हारे हुए देवता पुकार लगाने पहुँच गए  थे - देवि ,दुष्टों का संहार करो, त्राहिमाम् !
शक्ति, तामसी रूप न धरे तो इस रक्तबीज से निपट सकते हो तुम ,तुम्हारे नारायण या शंकर ?
हाँ  ,मैं तामसी हूँ!
याद आ गया, हारे हुए देव-गण एकत्र हुए थे .अपनी शक्तियाँ समर्पित कर प्रार्थना की थी ,दानवों के संहार की .
 आज फिर हारे हुए देवता शरण पाने को  टेर लगा रहे हैं - रह रह कर पुकार उठ रही है. दिशायें गुँजायमान हो उठी हैं,'
 'उठो माँ ,महाकाली ! तामसी देवी ,कृपा करो !! दानवी  बाधायें  चारों ओर व्याप रही हैं ,जागो महारौद्रै , महाघोर पराक्रमे,
चित्ते कृपा समर निष्ठुरता च दृष्टा त्वयैव देवि,वर दे भुवन त्रयेपि !!!.'

*


शनिवार, 15 जून 2013

स्वीकारे बिना निस्तार नहीं .

 'बड़ी माँ, मेरी मामी चादर को चद्दर कहती हैं,और चाकू को चक्कू!'
मेरा पोता अपने ननिहाल से आया था .शाम को आकर मेरे पास बैठ गया .
बहू सुन रही थी ,' कैसा भोला बना बैठा रहता है जैसे कुछ सुन ही न रहा हो ,और सब नोट करता रहता है .'
मन-मन हँस रही हूँ मैं .
पोते से कहा मैंने , 'हाँ, हर जगह अपने ढंग से बोलते हैं लोग.'
   मुझे याद है हमारे ताऊ जी -पिताजी वगैरा ख़तों में कन्नौज में क के नीचे नुक्ता लगा कर 'क़न्नौज' लिखते थे . देसी बोलियाँ घर में बोलने की आदत थी .खड़ी बोली घर से बाहर ही रहती थी .पिछली पीढ़ी तक घरों में अपने-अपने क्षेत्र की बोली चलती रही.पारिवारिक समारोहों उत्सवों आदि में देसी बोलियों का ही बोल-बाला रहता था ,विवाह,मुंडन कनछेदन आदि पर गीत भी - लोक-जीवन के रंगों में रचे रस-सिक्त गीत. खड़ी बोली अधिकतर बाहर बोलने में  प्रयुक्त होती थी .
 लोग चिट्ठियाँ फ़ारसी या उर्दू में लिखते थे ,पराधीन जनों के  औपचारिक- सामाजिक व्यवहारों में  शासकीय भाषा-अनुशासन का प्रभाव आ ही जाता है . या फिर पंडिताऊ ढंग पर 'अत्रकुशलम् तत्रास्तु' से शुरू कर बँधी-बँधाई पारंपरिक शब्दावली में . आगे चल कर चिट्ठी-पत्री अंग्रेजी में होने लगी..इस पीढ़ी के लोग अब घर में भी खड़ी बोली बोलते हैं पर बोलने और लिखने में   टोन थोड़ी बदल जाती है 
 हमारे पिता जी कन्नौज के थे ,माताजी हरदोई की .हम लोग मध्य-भारत की ग्वालियर स्टेट में . कन्नौज जाते वहां घरों में कन्नौजी बोली जाती  ,माता जी के घर की बोली में थोड़ा फ़र्क था ,और मध्य-भारत में मालवी चलती थी.मराठी भाषा भी खूब सुनने को मिलती थी. स्कूलों में किताबें खड़ी बोली में पढ़ाई जातीं था पर समझाने और बोलने में क्षेत्र का पूरा प्रभाव भी रहता था.
 हिन्दी बोलने में  भी हर प्रान्त के अपने शब्द-रूप और बोलने की अपनी टोन  एक अपना फ़्लो  है -स्थानीय शब्द तो होते ही हैं .समय के साथ नये शब्द भी सम्मिलित होते हैं और भाषा में उतनी एक रूपता नहीं रह पाती. इसे भाषा-विकास भी कह सकते हैं भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक होने पर कुछ कारणों से -स्थानीय प्रभावों आदि के कारण ,शब्दों के रूप ,प्रयोग में अंतर आता जाता है .ब्लागों पर 'रायता फैलने' की बात ,चौचक,आदि और बहुत से शब्द  शुरू में मेरी समझ नहीं आते ,झकास,बिंदास . इसी प्रकार स्थानीय शब्द धीरे-धीरे  मुख्य भाषा में आ जाते हैं .और अब ब्लागों पर तो क्षेत्रीय भाषाएँ बहुत मुखर हो गई हैं - जवार,एकदम्मै,जोगाड़,मारू,पट ठेलना,मनई  सारे अपनी-अपनी भंगिमा लिये मंच पर उपस्थित हैं. जीवित भाषाओं की इस प्रवृत्ति को रोका नहीं जा सकता ,हिन्दी भाषा के क्षेत्र में बड़ी उठा-पटक चल रही है. कभी भी इस पर बड़ा भूचाल आ सकता है.
भाषा का सतत गतिशील रूप ही उसका जीवन है .कोई कितनी भी हाय-हाय मचाये दूसरे को गलत बताता रहे.मानक भाषा अपनी जगह चलती रहेगी लोक-जीवन यों ही चलता रहेगा और उसके साथ-साथ भाषा भी .कोई कुछ नहीं कर पाएगा .स्वीकारे बिना निस्तार नहीं .

बुधवार, 12 जून 2013

मन की मौज

*
बिस्तर पर लेट जब मन अपनी मौज में होता है और मुक्त विचार परंपरा चल निकलती है तब  प्रायः ही कुछ मज़ेदार बातें ध्यान में आने लगती है.सोच-सोच कर हँसी भी आती है.ऐसी ही एक बात कल याद आ गई -
बहुत पहले की घटना  है - तब कानपुर में थे हम , बच्चे छोटे थे.
उस दिन हम लोग अस्सी फ़ुट रोड़ से हो कर पनकी जा रहे थे .दोंनो बच्चे साथ में थे सोचा एक बिस्किट का पैकेट यहीं से खरीद लें .गाड़ी साइड में रुकवा ली .मैं नीचे उतरी थी .
 पति ने कहा ,'वो उधर ज़रा बढ़ कर दो पैकेट ग्लूकोज़वाले ले लो,' साथ ही जोड़ दिया  'देख कर पार करना !'
 दस का एक नोट बढ़ाते हुए दुकान का ओर इशारा कर  दिया .मैं लेकर चल दी .उस   पार थी दुकान. मैं उधर ही बढ़ गई .
पहुँच कर मैंने वही दस का नोट दुकानदार को पकड़ाया ,'दो पैकेट ग्लूकोज़ वाले बिस्किट!'
बड़े ताज्जुब से उसने मेरी ओर देखा ,और साइडवाली दुकान की ओर इशारा कर दिया .
अब मेरा ध्यान गया - अरे, यहाँ तो  होम एप्लाइन्सेज़ भरे हैं !
एकदम उससे नोट  लिया मैंने और साइडवाली  की दुकान की ओर बढ़ गई .
सड़क के उस पार से बैठे-बैठे देख रहे थे .
मेरे पहुँचते ही पूछा,' क्यों , तुम उस दुकान पर बिस्कुट माँग रहीं थीं ?'
'तुम्हीं ने तो  इशारा कर के बताई थी सीधी वहीं चली गई.'
 ' तो क्या कहा उसने ?
'कहता क्या उसने सही दुकान दिखा दी .तुम्हें पहले ही ठीक बताना चाहिए था .'
*

शनिवार, 8 जून 2013

चैलेञ्ज का नतीजा .


आज मैंने एक समाचार पढ़ा - लोक-प्रिय के अंतर्गत .पढ़ कर मुझे बड़ी खुशी हुई .लोग महिलाओं को कमज़ोर आदि जाने क्या-क्या समझते हैं .खतरनाक और हिम्मतवाले कामों पर अब तक  अपना एकाधिकार समझ रखा था पुरुषों ने.

लीजिये, पढ़िए पूरी ख़बर -

महिलाओं ने फैक्ट्री की दीवार फाँद उड़ाया सामान .
(है न हिम्मत का काम !)
 लुधियाना .शिकायतकर्ता जोगिंदर सिंह ने बताया कि 30 मई को अपनी लोहे की फ़ैक्ट्री फैक्ट्री बंद करने के बाद घर चला गया. इसी दौरान कुछ अज्ञात महिलाएं फैक्ट्री की दीवार फाँद कर अंदर आई और अंदर से 15 क्विंटल लोहे का सामान चोरी कर फरार हो गईं. इसकी कीमत 75 हजार रुपये हैं। 31 मई सुबह जब जोगिंदर ने फैक्ट्री में आकर देखा, तो अंदर से सारा सामान गायब था.पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति ने बताया कि उसने फैक्ट्री में से कुछ महिलाएँ सामान ले जाते देखी थीं.
*
दीवार फाँदना कोई आसान काम है क्या ? पर हो गई शुरुआत. आज एक फाँदी है कल को दूसरी दीवारें फाँदेंगी .हर तरह की दीवारें .
हमेशा चैलेंज देते रहते हैं आदमी ,मनमाना आचार-व्यवहार  उन्हें लगता है अपना अधिकार .अब  देख लो नतीजा.अगर तुल जाएँ तो क्या नहीं कर सकतीं महिलाएँ !
  हिकारत से मत देखो उन्हें ,ज्यादा मीन-मेख मत निकालो. सहज रूप से रहने दो .नहीं तो पछताओगे बैठ कर.
वैसे एक अनुमान और है किसी महिला के पति को पुलिस पकड़ ले गई होगी .अब छुड़ाने को रिश्वत माँग रहे हैं .पति ने कहलवाया कहीं से इंतज़ाम करो नहीं तो मैं बेमौत मारा जाऊँगा .
क्या करती बेचारी ?आपस में सलाह कर  डट कर लोहा लिया .मजबूरी रही होगी सो काँटे से काँटा निकाल लिया . 

सोमवार, 3 जून 2013

भक्ति या आसक्ति ?

आदिकालीन कवियों में विद्यपति,मेरे प्रिय कवि रहे हैं.पर मैं आज तक निर्णय नहीं कर पाई कि उनके काव्य में शृंगार की प्रधानता है या भक्ति-भाव की.अन्य कवियों में स्पष्ट पता चल जाता है .सूर तुलसी आदि कवियों का मूल स्वर भक्ति का है  .पर विद्यापति ने अपने काव्य में दोनों का  मिश्रण कर ऐसा टाफ़्टा बुन डाला कि पता ही नहीं लगता कौन सा स्वर अधिक मुखर है , कठिन है तय करना कि वे कि मूलतः वे  भक्ति के  कवि हैं या शृंगार के .
शृंगार की गहन रूपासक्ति में भक्ति की उज्ज्वलता ऐसी घुली कि
विलगाना मुश्किल हो गया -
'गिरिवर गरुअ पयोधर परसित गिम गज-मोतिक हारा ,
काम कंबु भरि कनक-संभु पर ढारत सुरधुनि-धारा .'

और ऐसे एक नहीं अनगिनत उदाहरण .
यों तो भक्ति में आराध्या का शृंगार वर्णन  मर्यादा के अंतर्गत नहीं आता पर सभी तुलसी नहीं होते .कालिदास ने  कुमार-संभव में कोई बाधा नहीं मानी ,सूर कृष्ण के सखा रहे तब वहाँ परदे की गुञ्जाइश कहाँ ?उनके लिये सब जायज़ हो गया .और रीति काल को तो एक आड़ चाहिये थी घोर दैहिकता के लिये .
सौन्दर्य का वर्णन करते समय कवि की भावना भक्ति का भाव धरे है या आसक्ति का - लगता है, फिर से पढ़ना पड़ेगा विद्यापति को !

बुधवार, 1 मई 2013

हमारा सेंसर-बोर्ड.


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भारत में सिनेमा और टीवी सीरियलों को प्रदर्शित होने से पहले सेंसर से गुज़रना पड़ता है .पर ऐसा लगता है कि कोई सुविचारित अनुशासन- व्यवस्था,या कला.संस्कृति,भाषा आदि के मानदंड निर्धारित नहीं हैं, जन-सामान्य पर उसका प्रभाव क्या पड़ेगा इसका कोई विचार नहीं, क्या संदेश जा रहा है इस ओर से भी उदासीन. सड़क चलता मनोरंजन और वैसी ही भाषा .इनके गानो और संवादों की सस्ते मनोरंजन वाली छँटी हुई शब्दावली पूरे देश (और विदेशों तक भी)पहुँच कर व्यवहार में आने लगती है .ऐसे उत्तेजक और सस्ते गाने जो संगीत कला को भी कलंकित  कर रहे हैं . . 
आज के अधिकांश चल-चित्र सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं .मनोरंजन के इन साधनों को नाट्यकला की आधुनिक परिणति मानें तो उसकी भी कुछ मान्यतायें और अपनी कुछ परंपराएं हैं जो समाज के हित-संपादन के लिए निर्धारित की गई हैं .लोक रुचि का विरेचन , परिमार्जन  और उन्नयन करने के साथ मानसिक आनन्द के स्थान पर उसे विद्रूप कर मर्यादाहीनता का पाठ पढ़ाया जा रहा है.भाषा भ्रष्ट हो रही है ,बज़ारूपन ,सस्तापन .क्रूरता और भोगवाद सब जगह हावी हो रहा है. यह मनोरंजन का साधन  न रह कर बाज़ारवाद का वाहन बन गया है .इन्द्रिय-बोधों को ऐसा  ग्रसता  हैं कि अनायास अपने प्रभाव में ले लेता है .परिणाम है संस्कार-हीनता और चारित्रिक- गिरावट ,जिसकी कोई सीमा नहीं .
अक्सर ही ऐसे चल-चित्र खूब चलते हैं जो स्वस्थ मनोरंजन देने और समाज में  जागरूकता लाने के बजाय मन की विकृतियों को हवा देते हैं  और भाषा-भूषा,आचार-विचार  पारिवारिक और सामाजिक व्यवहारों की जड़ें खोदते हैं.न सौन्दर्य ,न संदेश ,न सच ,बस उत्तेजित करना और इच्छाओं को हवा देना.
 इनके भोंडेपन और उद्देश्यहीनता पर नियंत्रण लगाना क्या सेंसर का काम नहीं है? .मनोरंजन के नाम पर कोई प्रस्तुतीकरण क्या ऐसा होना चाहिये जो सामाजिक और संस्कृतिक , मूल्यहीनता को प्रोत्साहन दे?  उसकी स्तरीयता और उद्देश्यपरकता  के साथ लोक जीवन पर उसके प्रभाव के आकलन  से सेंसर-बोर्ड का कोई वास्ता नहीं?यह भी कि इन्हें पास करनेवालों की  समाज और संस्कृति के क्षेत्रों में कितनी पैठ है जो इस पर गहराई से   विचार करें.
आखिर सेंसर काहे के लिये है?
 अगर आज हम यह प्रश्न नहीं उठायेंगे तो मूल्यहीनता के भंवर में डोलते आज के समाज को बाहर आने  में पता नहीं कितनी देर होती चली जायेगी .

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

हिन्दी की जान !

*
सुन रही हूँ पूर्ण-विराम की खड़ी पाई या डंडा हिन्दी की जान है,उसके बिना उस की मौत हो जाएगी.बचपन  में कहानियाँ सुनी थीं परियों की ,राक्षसों की ,जादूगरनियों की ,उनमें से किसी- किसी की जान ,कहीं पिंजरे के तोते में ,किसी छिपी डिब्बी में बंद माला में  या ऐसे ही कहीं एक जगह रखी रहती थी. तब बड़ा कौतुक होता था सुनकर .उसके पीछे खूब तमाशे होते थे. कोई पूरी तैयारी से उसे मारने पर तुला होता था. बचानेवाला तो हीरो होगा ही  पर दुष्ट लोग उसे अपने वश में करने के पूरे यत्न करते रहते थे.
आज वही हिन्दी के साथ हो रहा है. इतनी प्राचीना,आयु-प्राप्ता हो गई, पहले भरा कुटुम्ब रहा - सब एक साथ मैथिली ,मगही ,भोजपुरी ,राजस्थानी ,बुंदेली ,अवधी ,ब्रज ,बाँगड़ू ,और भी कितनी ,सब एक परिवार रहे .कोई बोली लिखें-बोलें हिन्दी होती थी. यह भी सबके साथ मिल कर चलनेवाली ,उदार-मना ,आपसी लेन-देन में विश्वासवाली .
समय बदला, मन बदल गये. कमरों में रहनेवाली बोलियाँ बाल-बच्चोंवाली हुईं . अपना -अपना अलग करने लगीं. उनके बच्चे तू-तू ,मैं-मैं पर उतर आये. अलगौझा होने लगा बँटवारे की नौबत आ गई .रह गई खड़ी बोली .अकेली क्या करे !जो अपनेवाले थे, घर से ,बाहर निकले तो अंग्रेज़ी के सम्मोहन में ऐसे फँसे कि मुँह चुराने लगे ,उपेक्षा करने लगे. जैसे हिन्दी के होने से उनकी शान घटती हो.
यों समय के साथ चलती आई है हिन्दी, तमाम नये चिह्नों को ग्रहण किया है ,बढ़िया निभ रहा है.बवाल है फ़ुल-स्टाप पर . सबके साथ उसका प्रवेश भी हुआ.पर उसे देख लोग भड़क गये .कबीर के शब्दों में कहें तो 'उनहिं  अँदेसा और .. ' एक  बिन्दु  आयेगा तो साथ लायेगा नौ सौ जोखिम . यहाँ लोग दीवार देख कर रुकते हैं ,छोटी-सी बिन्दी किनारे कर देते हैं. हर छोटी-छोटी बात पर  कौन ध्यान देगा ? नई पीढ़ी भी साथ छोड़-छोड़ भाग रही हैं.जब अपने ही कन्नी काटने लगें,कैसे सधेगी भाषा बिना डंडे के !जिस डंडे के कारण अब तक जमी हुई है, चलती-फिरती है ,वही छीनने पर उतारू हैं लोग , कैसे सँभलेगी, कहाँ तक अपना भार ढोयेगी .एक ही तो सहारा है .
 सो  वही डंडा पकड़ाये दे रहे हैं !
भाई लोगन का कहना है हिन्दी अब पुरनिया भईं ,इनके पास अपने ज़माने का एक ही तो निशान बचा -डंडा , सबसे निराला! उसे काहे हटाय दें ?  ई और लोग ,उहै डंडा खींचन पे उतारू .छोटी सी बिन्दी से साधना चाहते हैं. जो हिन्दी की राह का  रोड़ा है.वैसे ही कमज़ोर ठहरी लड़खड़ा कर लुढ़क जाएगी .अंग्रेजी आदि  भाषाओँ ने इसे खूब साधा. उन में इतनी व्याप्ति और मज़बूती है ,ऊपर से सब मिलकर साध लेते हैं- कितने भी रोड़े डाल कर देख लो !
इधर अपनी साथिन मराठी भी समर्थ है.उसने  विश्राम-सूचक लघु बिन्दु उत्साह से स्वीकारा ,मज़े से धार लिया .उसके अपने लोग हाथों-हाथ लेते हैं.
मतलब यह कि डंडा होगा, किसी की मनमानी नहीं चलेगी. हम तो कहते हैं हालातों ने जो नई ध्वनियाँ डाल दीं -ऑ,क़,ख़,फ़,ज़ आदि उन्हें भी धकिया दो ,पराई आवाज़ों की कोई जरूरत नहीं . हिन्दी हमारी माँ है ,जैसी है बढ़िया है .बुढ़िया है फ़ैशनेबल मत बनाओ(बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम वाली नौबत न आये) .हिलती-डोलती-चलती रहे बस!. ये  सब अविचारी उसका विराम-दंड छीन, फ़ुलस्टाप पर टिकाना चाहते हैं .अगर   माई भरभरा कर गिरी , तो कौन सेवा-सुश्रुषा करेगा? गिरी-पड़ी यों ही बिदा हो जाएगी..और तब सारा पाप-दोष ,देख लेना, इन्हीं डंडा छीननेवालों के सिर पड़ेगा!
तो फ़ुल-स्टॉपवाली बिन्दी को गोली मारो,बस डंडा उसके हाथ पकड़ा कर निचिंत हो जाओ !
समझदार को इशारा काफ़ी! 
*
(हमारी मातृभाषा इतनी विवश और दुर्बल नहीं कि ,विराम का डंडा हटाने से धराशायी हो जाये .फ़ुलस्टाप लगाने से उसकी गतिशीलता किसी प्रकार कम नहीं हो सकती .हिन्दी ने भी अन्य भाषाओं की तरह बिन्दु के प्रयोग को जहाँ स्वाभाविक रूप में ग्रहण किया वहाँ उसकी गतिशीलता किसी प्रकार बाधित नहीं हुई . )

रविवार, 14 अप्रैल 2013

एक मोहक लोक-विधा की जीवन-यात्रा : नचारी .


*
[कुछ प्रतिक्रियायें पढ़ कर लग रहा है कि 'नचारी ' का स्वरूप स्पष्ट हो सके इसके लिए कोई उदाहरण (हिन्दी भाषा में)सामने हो तो अधिक सुविधा होगी .एक नचारी -]

नोक -झोंक
'पति खा के धतूरा ,पी के भंगा ,भीख माँगो रहो अधनंगा ,
ऊपर से मचाये  हुडदंगा , ये सिरचढ़ी गंगा !'
फुलाये मुँह पारवती !
'मेरे ससुरे से सँभली न गंगा ,मनमानी है विकट तरंगा ,
मेरी साली है, तेरी ही बहिना,देख कहनी-अकहनी मत कहना !
समुन्दर को दे आऊँगा !'
'रहे भूत पिशाचन संगा ,तन चढ़ा भसम का रंगा ,
और ऊपर लपेटे भुजंगा ,फिरे है ज्यों मलंगा !'
सोच  में है पारवती !
'तू माँस सुरा से राजी ,मेरे भोजन पे कोप करे देवी .
मैंने भसम किया था अनंगा ,पर धार लिया तुझे अंगा !
शंका न कर पारवती !'
'जग पलता पा मेरी भिक्षा ,मैं तो योगी हूँ ,कोई ना इच्छा ,
ये भूत औट परेत कहाँ जायें ,सारी धरती को इनसे बचाये  ,
भसम गति देही की !
 बस तू ही है मेरी भवानी ,तू ही तन में औ' मन में समानी ,
फिर काहे को भुलानी भरम में ,सारी सृष्टि है तेरी शरण में !
कुढ़े काहे को पारवती !'
'मैं तो जनम-जनम शिव तेरी ,और कोई भी साध नहीं मेरी !
 जो है जगती का  तारनहारा , पार कैसे मैं पाऊँ  तुम्हारा !' 
मगन हुई  पारवती !]
*

हिन्दी के पाठकों के लिए 'नचारी' एक अल्प-ज्ञात विधा रही है ,जिसका  आगमन आदि-कालीन कवि ,मैथिल-कोकिल विद्यापति के काव्य में समारोहपूर्वक पूरी विदग्धता और रसात्मकता के साथ  होता है और फिर उन्हीं के साथ प्रस्थान भी.शासन बदले,नई चुनौतियाँ सामने आईं भक्ति की वह मस्ती गई जो विद्यापति और कबीर के स्वभाव में थी ,शौर्य और शृंगार की कदमताल रुक गई .बदलते परिप्रेक्ष्यों में ,कभी-कोई भूला बिसरा कवि ही 'आज मैं एकु-एकु करि टरिहौं.' कह कर आराध्य को ललकारने का साहस कर सका. दैन्य का विस्तार होने लगा. कविता की उमड़ती लहरें मर्यादा के बाँधों में सीमित हो दीन मुद्रा दिखाने लगीं, फिर 'नचारी' जैसी उन्मुक्त विधा की गुज़र कहाँ होती! 
  आदिकाल की काव्यधाराएं  क्षीण पड़  गईँ थीं .साहित्य-मंच पर मुख्य भूमिका निभाने अन्य भाषाएँ अपने संस्कारों सहित आ विराजीं. ब्रज और अवधी का प्राधान्य हो जाने से मूलरूप में मैथिली में रची जानेवाली यह  विधा  विद्यापति के बाद साहित्य-जगत से लुप्त हो गई, यहाँ तक कि ''नचारी'' संज्ञा  भी लोगों के लिए अपरिचित हो गई . लेकिन उसका लोप नहीं  .सीमित क्षेत्र में ही सही, 'नचारी' ने अपनी उपयोगिता बनाए रखी  ,और जन-जीवन से जुड़ी रही .हिन्दी का सामान्य पाठक भले ही परिचित न हो पर अपने क्षेत्र में इसने असीम लोक-प्रियता पाई और अभी भी लोक-जीवन को रस-विभोर कर रही है .
 'नचारी' को मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है. इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' में प्राप्त होता है. इसकी रचना में लोक-भाषा (देसिल बयना ) का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण विदग्धता , रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं. आराध्य की परम निकटता से प्रेरित, निश्छल मन की अंतरंगता और लोक-मन की बेधड़क उक्तियाँ , मुँह लगे सेवक के समान कहा-सुनी पर भी उतारू हो जाए पर उसके महत्व की स्वीकृति 'नचारी' का सर्वोपरि तत्व है- हँसी-ठिठोली ,उपालंभ ,शिकायत ,सब-कुछ ,निष्ठा के अटूट तार में पिरोया हुआ .'नचारी' भक्ति- काव्य का ही एक रूप है . 
 'नचारी' का संबंध नाच से भी जोड़ा जाता है .आराध्य के आगे अपनी लाचारी एवं विवशता को वर्णित करते हुए ,अपनी मनोभावनाओं  को बिना किसी लाग-लपेट के  प्रभु के सम्मुख नाच-गा कर प्रस्तुत कर देना इनका उद्देश्य है.अन्य देवताओं के लिये  और सामाजिक थीम पर भी नचारियाँ प्राप्त होती हैं .नेपाल में 'नचारी' की धुन पर भक्ति-गीतों का लेखन पर्याप्त मात्रा में होता रहा  है . विष्णु और गणेश,सूर्य,दुर्गा  की नचारियाँ मिल जाती हैं.
हिन्दी के शैव-साहित्य में नचारियों का विशेष स्थान है,इनमें आराध्य के प्रति भक्त की  भावनाओं का उद्रेक सर्वत्र विद्यमान रहता है. लिखित से पहले मौखिक परंपरा में प्रचलित रही हो यह संभव है क्योंकि नृत्य और गान के साथ उसकी स्वीकृति और लोक-प्रियता, दरबारी कवि के जीवन-काल में ही इतना व्यापक रूप पा ले यह बहुत आसान  नहीं लगता -विशेष रूप से जब प्रकाशन और प्रसारण के साधन विकसित न हुए हों . 'नचारी' का विस्तार सुदूर नेपाल से लेकर उत्तर भारत के पूर्वी क्षेत्रों तक है.. बिहार ,बंगाल, उड़ीसा, असम और नेपाल के साथ ही साथ अवध के भी ज्‍यादातर हिस्‍सों में  लोक-गीतों के रूप में  इसकी व्याप्ति रही है.अबुल फ़ज़ल के 'आईने अकबरी' में इनका उल्लेख होना ,इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है.
मौखिक परंपरा में 'नचारी'-गीत मिथिला के घर-घर में प्रचलित हैं .विद्यापति(14 वीं शताब्दी)प्रथम 'नचारी' लेखक माने जाते हैं .अन्य कुछ नाम हैं परमहंस विष्णु पुरी(1425-1500),गोविन्द,कामश्याम,उमापति(1570-1650),लाल लक्ष्मीनाथ गोसाईं,कान्हा रामदास और चंद झा(1831-1907,.संस्कृत के  पंडित होते हुए भी विद्यापति का  ‘भाखा प्रेम’ अद्वितीय था.  देशी भाषाओं की लहर जब पूरे देश में फैल रही थी तो उन्होंने ही  अगुआई की थी. ' देसिल बयना सब जन मिट्ठा' कह कर वे भारतीय भाषाओं को सादर आमंत्रण दे रहे थे.राज-दरबार में रहते हुये भी उन्होंने समझ लिया था कि जन-रुचि के परिष्करण और रस के संस्कार देने के लिए लोक-भाषा के महत्व और साहित्य का समाजिक-जीवन से जुड़ाव कितना आवश्यक  है .लोक-शैली और लोक-भाषा में रचित नचारियाँ मन  का रंजन करती हुई , जन-जीवन में इतनी रमी हैं कि  तीज-त्यौहार,सामाजिक और धार्मिक उत्सव .विवाह जनेऊ आदि और लोकाचार के हर अवसर पर इनका गायन नये रंग और उल्लास भरने लगा  .
विद्यापति का काव्य सरस, मधुर एवं देसिल बयना में होने के कारण इतना लोक-प्रिय हो गया कि उनके जीवनकाल में ही  लोक-कंठ का शृंगार बन गया और समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे अपनी जीवन-पद्धति में शामिल कर लिया . 
 मैथिल-कोकिल ने तत्कालीन समाज की स्थितियों को अनदेखा नहीं किया था.महेशवाणी और 'नचारी' के माध्यम से  गरीबी, पराधीनता और विभेद को जिस कौशल से उन्होंने सामने रखा वह दृष्टव्य है- वे ही अपने अराध्य शिव से कह सकते हैं कि ‘क्यों भीख मांगते फिर रहे हो, खेती करो इससे गुण गौरव बढ़ता है.’ (बेरि बेरि अरे सिब हमे तोहि कइलहूँ, किरिषि करिअ मन लाए/ रहिअ निसंक भीख मँगइते सब, गुन गौरब दुर जाए).
उनकी उक्तियों में 
 मध्ययुग के समाज की दशा के साथ सामंती समाज के नारी-मन की वेदना बोल उठी है 
- 'कौन तप चूकल हूँ भेलहूं जननी गे (हे विधाता, तपस्या में कौन सी चूक हो गई कि स्त्री होके जन्म लेना पड़ा!)'
 यह काव्य-विधा आज भी अप्रासंगिक नहीं हुई है ,लोक-जीवन और उत्सव-परंपराओं में में रसी-बसी है . बाबा नगरी देवघर में बसंत पंचमी के मेले की परंपरा  प्राचीन काल से चली आती है.है. उत्तरवाहिनी गंगा से कांवर लेकर बाबाधाम पहुँचे काँवरियों को 'तिलकहरू' कहा जाता है. इसमें मिथिला प्रांत के भक्तों द्वारा बाबा बैद्यनाथ का तिलकोत्सव  होता है. वे पार्वती  के मायके वाले हैं अतः शिवरात्रि के पूर्व यहाँ आ कर बाबा बैद्यनाथ का तिलक कर विवाह का न्योता देते हैं. 'नचारी' और महेसबानी गा कर वे मगन-मन नत्य करते हैं और उत्सव मनाते हैं.मिथिलांचल में भी सावन महीने में मधुश्रावणी पर्व पर नव-विवाहिताओं के  'नचारी' गायन से घर आँगन और बगीचे गुंजायमान होने लगते हैं 
 'नचारी' विधा का यही स्वर  30-32 के अवज्ञा आन्दोलन में एक नया रूप धरता है .
समय के अनुरूप मैथिल कवियों ने अपना कथ्य इस शैली में सँवार लिया .चारों ओर के आघात झेलती बिहार की धरती  लोक-गीतों में अपनी व्यथा उँडेल देती है .एक किशोर कवि  'प्रलयंकर'के कंठ से 'नचारी' में ढल  कर अत्याचार के विरुद्ध  आक्रोश फूट निकला -
'दुर दुर कहेन छे सरकार,
आपन बैसल मौज करे छै,
प्रजा करे हाहाकार
दुर दुर कहेन छे सरकार,'
  जनता को सचेत करते एक मुसलमान कवि की शिकायत,   'अल्हुआ(शकरकंद) भ गेल साबूदाना'
बिहार के किसान- आन्दोलन में लोक-कवि का स्वर पुकार कर पूछता है-
'क्यों बाबू साहेब,क्यों गरीब
क्यों बागमंत क्यों कमनसीब
सब बैसय हमरी छाती पर ,
कटहर हो अथवा नारिकेर .'
और भी -
'हम भार सम्हारी सबहि केर,
खाम्ही खुट्टा लरबर लरबर,
जे करइत हो चरमर चरमर
हम ओ भरिगर पुरना मचान' .
इसके साथ ही -
'पीसे अछि हमरा जमिंदार,
सोके अछि हमरा सूदवाला ,'
उधर नदियों की बाढ़ चैन नहीं लेने देती-
'चौपट्ट करे छवि साल-साल 
जीवछ करेह कोसी कमला,'
दुर्भाग्य यह कि उन्हें कोई भी  नहीं बख़्शता, 
'कुश तिल लै आवति ओझा जी,
हंटर लै घुमति दरोगा जी'
और तो और देवता भी लेवता बन गया है.
-हम से वे भी अपना मतलब साधने लगे हैं -
'रहता प्रसन्न बरहम बाबा,जो दूध बहावैं भरि छावा.'
   बिहार के मिथिला क्षेत्र में एक पमरिया नामक समुदाय, निवास करता है. जो इस्लाम का अनुयायी है. पर बच्चे के जन्म के मौके पर ये लोग हिंदू समुदाय के भजन, लोकगीत आदि गाते हैं.अगुआ अपने पुरुषोचित माने जाने वाले वस्त्रों को बदलकर घाघरा चुनरी आदि पहन ढोलकी और झालर के साथ शुरू करते हैं .'आहे दुर्गा जी के नामे,' 'आहे भोला बाबा के नामे', दोहराते दोहराते, नाचना गाना शुरू करते इस्लाम को मानने वाले ये तीनों 'नचारी', महेशवाणी गाने लगते हैं और बच्चे को  दुआ देते हैं. कुछ समय पहले तक ऐसा दृश्य सचमुच घर-आंगनों में दिखाई दे जाता था . डमरू ध्वनि के साथ 'नचारी' के स्वर, देवधर से भागलपुर और काशी में भी अब तक सुनाई देते हैं . 
आज के साहित्य के लिए यह भले ही अप्रचलित विधा हो गई हो लेकिन अपनी जीवंत अनुभूतियों ,सहज भंगिमाओं , ताज़े रंगों सतत प्रवाहित भाषा और अनूठी शैली के साथ ''नचारी'', साहित्य-मंच पर अवतरित हो कर प्रतिष्ठित हो जाए तो हिन्दी और उसकी सहयोगिनी भाषाओँ में एक नयी प्रतीति जगा सकती है. 
(मिथिला और बिहार के रचनाकारों से विशेष आग्रह - अगर 'नचारी', अपनी अनूठी भंगिमाओं सहित, हिन्दी मंच पर  जम गई तो यह उस अंचल का अमूल्य उपहार होगा - प्रतिभा.)
- उदाहरण ,उद्धरण आदि में सहायता हेतु गूगल का आभार .