सोमवार, 8 जुलाई 2013

जागो !तामसी , आज फिर जागो !

*
नाथ पंथी  महायोगी गुरु गोरक्षनाथ भ्रमण करते हुए हिमाचल प्रदेश की  कालीधार पहाड़ी स्थित ज्वाला देवी के स्थान पर पहुँच गये.आदिनाथ शिव के  प्रथम शिष्य को आया देख  देवी ने साक्षात् प्रकट हो कर उनका स्वागत किया और  भोजन हेतु आमंत्रण दिया .
गोरख बोले,' देवी ,तुम्हारा भोजन मेरे वश का कहाँ !मैं भिक्षाटन कर सात्विक भाव से जो अन्न मिलता है वही ग्रहण करता हूँ.
' जानती हूँ गोरक्ष .,तुम मेरे अतिथि हो  ,तुम्हारे अनुरूप ही भोजन प्रस्तुत करूँगी.'
'भोजन में भाव का बड़ा महत्व है .तुम मेरी  पूज्या हो, पर मांस -मदिरा होने के कारण  तुम्हारी रसोई में अनायास तामसी गुणों  का प्रभाव आ जाता है? देवि,मुझे क्षमा करो.'
 देवी विस्मित हो उठीं.
'सृष्टि के तीनों गुण सर्वत्र व्याप्त हैं कैसे बचोगे गोरख, थोड़म-थोड़ा तो सब में सब समाया है ? कोई शुद्ध कहीं नहीं मिलेगा तुम्हें !'
'मैंने वैराग्य लिया है , रज और तम से विरत रहने का मेरा व्रत है  . तभी  तो स्वयं-पाकी रह  भिक्षान्न स्वयं राँधता खाता हूँ.'
'तो तमोगुण संसार की बुराइयों का मूल है?'
'तमस् ही मानस की ज्योति को अवरुद्ध करता है.' गोरख नाथ ने उत्तर दिया ,
 'अपरिग्रही रह कर जीवन बिताऊँगा ,पूर्ण सात्विकता और सिद्धि प्राप्ति से  आगे  ब्रह्मलीनता पाना  मेरे जीवन का उद्देश्य है.'
' ...पूर्ण सत्विकता ,' देवी ने दुहराया ,' ..यहाँ सब सापेक्ष है .तुम्हें विरोधी लगते हैं, पर सारे  ही गुण बिंब-प्रतिबिंब भाव से स्थित हैं.परस्पर  पूरक . समयानुसार सब ग्रहणीय.  शाश्वत होना संसार का धर्म नहीं यहाँ काल निरंतर सक्रिय रहता है .सतत परिवर्तनशील और  क्षण-क्षण क्षयमान है यह  जीवन ..  मन पर संयम रख कर संसार को निभाना क्यों नहीं कर पाते ..केवल आत्म-कल्याण ही उद्दिष्ट..! घोर आसक्ति या  एकदम वैराग्य. हर पल  गिरने की संभावना ,तृप्ति न मन की न तन की . . अतियों में जीना हर पल  गिरने की संभावना .'

 'हम और आसक्ति कैसी बात..' गोरख के मुख से निकला

'याद करो ,अपने गुरु मछिंदर नाथ को तुम्हीं तो उस मोह-कूप से निकाल लाये थे .'

गोरख चुप !

तामसी देवी ने कहा, 'गोरख,मैं अगर सौम्य ही बनी रही तो तुम्हारी दुनिया का क्या होगा ?समय के अनुसार गुणों का अनुपात बदलता  है .न हीं तो उन विषम स्थितियों से कौन निपटेगा ?
'ये संसार है. यों ही चलेगा..हम जब सारी माया त्याग, सबसे विरत हो गए ,अब क्यों फँसें दलदल में ?  .'
देवी ने प्रबोधने का यत्न किया -
'संसार में जन्मे हो , उसका निर्वाह  कौन करेगा ? जब पतन काल में बर्बर ,अनाचारी और अनीतियों के पोषक तत्व प्रबल होने लगें .,चतुर्दिक पाशविकता का उन्मत्त का नर्तन  हो, दुर्दान्त वृत्तियाँ अबाध विस्तार पाएँ . दंभी अपने अहंकार में किसी को कुछ नहीं समझें तब उनका दलन आवश्यक नहीं क्या? ये कैसी साधना कि व्यक्ति सबसे विरक्त रह कर आत्मोन्नयन में लीन रहे ! '
'विसंगतियों को दूर करने के लिये ही शुद्ध सात्विक धर्म और भोग-प्रधान योग-साधना के स्थान पर हठयोग साधना का प्रचार कर रहा हूँ .'
 'जीवन  कैसे चलता है गोरख, उसे सँवारने के लिए अपने आपको  खपा देना पड़ता है तब एक पीढ़ी खड़ी हो पाती है. गृहस्थाश्रम, जो  नींव है, उसे ही नकार दिया तुमने .जिस  पर सारा  दारोमदार  टिका है उस से बच कर भाग आए ?'
द्वंद्वों से बच कर ही कल्याण-साधना संभव है - सोचा गोरख ने, पर देवी के सामने बोल नहीं पाए .पहले से सावधान हो जाएँ तो सांसारिकता में फँसने की  नौबत ही क्यों आये !'
  देवी मन ही मन विचारती रहीं -
सब एक जैसे ! एक वे शंभु ,कैलास पर जा बैठे ,विष्णु क्षीरसागर में निद्रालीन .ब्रह्मा  सृष्टि रच कर मसट्ट मार गए. सब अपने में मगन ,तैसा ही यह गोरख   .कोई समझना ही नहीं चाहता .अव्यावहारिक आदर्शवाद से कहीं सृष्टि चली है !ये सब तो आत्म-कल्याण के लिये किनारे हो गये .लोगों के विषय में कौन सोचेगा .संसार का क्या होगा किसी ने नहीं सोचा .'
देवी की मौन मुद्रा देख गोरख बोले
'तुम अदहन चढाओ,मैं  भिक्षा लेकर  अभी  लौटता हूँ .पेट भरने को दो मुट्ठी खिचड़ी बस.'
और  चल दिये अपनी झोली उठा कर .
*
साक्षात् अन्नपूर्णा, शंभु-गृहिणि को छोड़ संसार की नारियों से भिक्षा माँगने जा रहे हैं गोरख .
देवी हँस रही हैं .
कह गया है, 'दो मुट्ठी खिचड़ी बस . कोई ममतामयी  गृहिणी दे ही देगी!'
नारी के बिना पेट कौन भरेगा इसका ?माँगेगा अंततः प्रकृति से ही न !
 बड़ा पुरुष बना है, जाने दो !मूढ़ कहीं का.  निवृत्ति मार्ग चलेगा ,परायी गेहिनियों से भिक्षान्न पा कर तृप्त होगा  . माँ-बहिन ,पुत्री किसी की हो -  उसी के रूप हैं सारे .प्रकृति से भिन्न हो कर  पुरुष क्या है -निरा एकाकी,अरूप, बीज सा अव्यक्त-जड़ीभूत,  ,अमूर्त विचार सा निष्क्रिय !
 देवी ने कहा था-
 ' देखो गोरख ,जितने पंथ अकेले पुरुषों को लेकर चले ,अस्वाभाविक होने के कारण अपर्याप्त  रहे .कालान्तर में उनमें विकृतियाँ आईँ ,क्षरण हुआ ,प्राकृतिक जीवन को नकार कर कौन स्वस्थ रह सका ? असंतुलित जीवन  पथ-भ्रष्ट होगा एक दिन!'
 मत्स्येन्द्र की याद कर .तिर्यक् हास मुख पर छा गया .
जाओ गोरख , तम का घेरा जलाने की  सामर्थ्य  कहाँ तुम में ! तभी उससे  भागते हो .सारे संसार में भ्रमण कर जाओ,जहाँ मिले अकेला सत, बटोर लाओ . खोजते रहो  जहाँ  रज-तम का छींटा न पड़ा हो . यहीं बैठी हूँ मैं ..'
*
ज्वालाएँ  प्रज्ज्वलित कर अदहन  चढ़ा दिया देवी ने ,
भूखा प्यासा आयेगा तो झट-पट  सीझ जाएगी  खिचड़ी .
मंदिर में बैठी हैं प्रतीक्षा-रत !
विचार चल रहे हैं -
उसे लगता है , मैं तामसी हूँ ,मद्य-मांस का सेवन करती हूँ
 हाँ ,क्योंकि क्रूरता मेरा  स्वभाव नहीं ,कुछ समय का आरोपण भर है  . कहीं  संहार  करते उद्विग्न न हो जाऊँ  . मद पीती हूँ इसलिये कि, दुर्दान्त दानव का हनन करते विचलित न हो जाऊँ . जो असीमित अधिकार चाहता है  मुझ पर ,पशु बना पड़ा रहे तो भी ठीक, पर चेत आते ही बार-बार सिर उठाएगा.  मैं जो प्रकृति हूँ , मुझे  विरूप करना  शासित करना चाहता है .उस पर वार करते ममत्व  न उमड़ पड़े !
 मद पान करती  हूँ कि संहार-बेला में अंतर की करुणा न जाग उठे ,विकृतियों को  ध्वस्त कर डालूँ  .  .मद पीती हूँ कि संहार में संयत-चित्त रहूं सकूँ .
शोणित-बीज उगें, तो पलने दूँ धरती पर ?विकृतियों का नग्न नृत्य होने दूँ ?कौन  पियेगा रक्त?
  तामसी चामुंडा  ही न !
दंड बिना उपाय नहीं , मैं तामसी देवी, तब रक्तपान से भी नहीं हिचकती.
हाँ ,मद पीती हूँ मैं !
गृहिणी हूँ मैं , परम गृहिणी -संपूर्ण नारी !इस पूरी सृष्टि को सँभालना है मुझे. शक्ति के साथ सत और तम दोनों की संयुति आवश्यक है  . अहंकारी  दंड को दंड मिले किन्तु  वह भी सद्गति पाये शान्ति पाये !उन्मत्त भटकेगा तो कैसे सृष्टि में शान्ति का विधान होगा .उसे भी होना है,उसे भी  रहना है ,अपने समय पर  दाँव खेलना है - इतना समर्थ होकर कि सत् को भी चुनौती देता ,उसे जाग्रत रखे ,  संतुलन बनता  रहे .जो वीभत्स है , सौंदर्य की खाद बन जाए.
जब समस्त देव-भाव ,आसुरी अतिचारों से हारता है तो शक्ति की गुह़ार लगती है . मैं अवतरित होती हूँ  .सृष्टि के स्वास्थ्य और शुभ के विधान के लिए . सारी क्षमताएँ योजित करने को  निर्बंध  हूँ .तमोगुण  मेरे लिये बाधा नहीं मेरी  व्याप्ति में उसका भी समावेश  है .
उठती-गिरती लपटें रह-रहकर सोच- मग्न मुख को दमका देती  हैं ,
डिब्बी में अदहन चढ़ा  है!
*
 गोरख घूम रहे हैं द्वार-द्वार ,
भिक्षा-पात्र ,में अन्न पड़ता है ,रुकता नहीं . रीता पड़ा है  .
कलयुग बीत रहा है . जब सात्विक अर्जन का श्रद्धामय दान मिलेगा.सज्जन 
मुदित-मन समर्पित करेंगे तब  डिब्बी भरेगी .खौलते अदहन में खिचड़ी बनेगी और देव-गंधर्व मनुज ऋषि-मुनि पंक्ति बद्ध  खड़े होंगे - उस प्रसाद की प्रतीक्षा में!
 युग बीत गये .कब स्वप्न साकार होगा ?
 डिब्बी भरे तब न !
*
भिक्षाटन करते हुए हिमालय की तलहटी में आ गये गोरख .  राप्ती व रोहिणी का  संगम .एक पावन स्थान खोज अपना अक्षय भिक्षापात्र रख दिया और साधना में लीन हो गये।
  एक तेजस्वी योगी का  साधना-स्थल . लोग उमड़ उमड़ कर भिक्षापात्र में अन्न-दान करने लगे, भर-भर भाजन  खिचड़ी पड़ रही है . पर पात्र है कि  भरता नहीं .
 सारा दान-मान व्यर्थ ! लालसाएँ पूर्ण होने के लोभ से दी गई भिक्षा,और पराई भूख की गंध समाये अन्न के दाने  ? सुप्त विकार जगा देने वाला दान ,पात्र कैसे भरे ?
कितनी बार आया-गया खिचड़ी का पर्व . पात्र भरा नहीं , योगी समाधि से जगा नहीं  .
चार पस खिचड़ी ? न्याय-नीति की ,सुकृत कर्मों की कमाई ,सद्भाव से अर्पित हो तो भरे कटोरा ? पर   निष्काम भावेन सहज नेह भरे दाल-चावल के दाने नहीं मिले . कैसे  रिक्ति पूरी हो  ?
 दाता का भाव और मुट्ठी का नाज देख कर ही पता लग जाता है कि  कैसी कमाई है  .यह दूषित अन्न कैसे अर्पण करेंगे ,गौ को ,श्वान को ,पक्षियों को और साधु को ?
बिना खिलाये स्वयं किस विध ग्रहण करे साधक  !
ज्वाला देवी  अदहन चढ़ाए बाट देखती बैठी होंगी .
 रिक्त पड़ा पात्र धरे बैठे हैं.
किस मुँह से जाएँ  - भोग कैसे प्रस्तुत  हो ?
उनका कहा बार-बार ध्यान में आता है -
कितनी असंगतियाँ ,अन्याय अतिचार ! मन में जागते सुप्त विकार !'
सुप्त विकार ?
हाँ, यही कहा था उन्होंने..
विकार हैं मुझमें.सुप्त रूप में ही सही ,विद्यमान हैं  ?
  तामसी के स्वर जागे ,'नहीं होते तो काहे भयभीत हो ? गोरख, संसार में आकर अविकारी रह सका कोई ?'
 लगा देवी हँस उठी हैं .
*
ओह, अदहन खौल रहा है .
युग बीत गए ,चार मुट्ठी अन्न नहीं पा सके ....कोई आशा भी नहीं .
क्षुधा- तृषा से आर्त,  हताश विश्रान्त गोरख  धऱती पर बैठ गए .
अंतर्मन से अनायास पुकार उठी -
माँ !ओ, माँ !!कहाँ जाऊँ ?
 उन्होंने गोरख से कहा था - निवृत्ति जीवन का मार्ग नहीं  .संघर्षों से पलायन उचित नहीं .
जीवन के प्रकाशित, विहित मार्ग पर क्यों नहीं चलना ?
संसार में आया प्राणी, यहाँ का  आचार -व्यवहार  निभाये,  सो  नहीं  .प्राकृतिक जीवन के अनुकूल रह कर पूर्णता और पक्वता पाये, सो नहीं .विपरीत चलने में शान बढ़ती है  !
लेकिन प्रतिकूल हो कर , प्रकृतिके विरुद्ध जाकर कोई पंथ  नहीं चल पायेगा.अहंकार के वशीभूत हो कर नकारने के परिणाम -  अतृप्ति, कुंठा ,और  केवल भटकन!
 चिन्तन चलने लगा -
कौन हैं देवि ?परम ऊर्जामयी .ओह, कृष्ण-भगिनी हैं भगवती!अखिल विश्व को अपने में धारे सब के मंगल का विधान ही उद्देश्य जिनका ,वही निस्पृह कर्मण्यता .
उन्हीं ने कहा था प्रवृत्ति से  जीवन है .निवृत्ति से नहीं
अपने लिये कहाँ जीते हैं ऐसे लोग !  'न दैन्यं न पलायनं' वही कल्याणकारी संदेश!
तब भी हारे हुए देवता पुकार लगाने पहुँच गए  थे - देवि ,दुष्टों का संहार करो, त्राहिमाम् !
शक्ति, तामसी रूप न धरे तो इस रक्तबीज से निपट सकते हो तुम ,तुम्हारे नारायण या शंकर ?
हाँ  ,मैं तामसी हूँ!
याद आ गया, हारे हुए देव-गण एकत्र हुए थे .अपनी शक्तियाँ समर्पित कर प्रार्थना की थी ,दानवों के संहार की .
 आज फिर हारे हुए देवता शरण पाने को  टेर लगा रहे हैं - रह रह कर पुकार उठ रही है. दिशायें गुँजायमान हो उठी हैं,'
 'उठो माँ ,महाकाली ! तामसी देवी ,कृपा करो !! दानवी  बाधायें  चारों ओर व्याप रही हैं ,जागो महारौद्रै , महाघोर पराक्रमे,
चित्ते कृपा समर निष्ठुरता च दृष्टा त्वयैव देवि,वर दे भुवन त्रयेपि !!!.'

*


17 टिप्‍पणियां:

  1. संसार से विरक्त हो कर केवल अपना ही आत्मोत्थान ... बहुत सी गहन बातें आपने इस कथा में सहजता से कह दी हैं .... नारी के बिना पुरुष नीरा एकाकी , अरूप ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. satya hai nari bina purush aur vah bhi sugrahni bina purush bhatkne ke sivay aur kar hi kya sakta hai nitant akela hai vah aur kuchh nahi .

    उत्तर देंहटाएं
  3. मीठे के साथ कडवे का अनुपात स्वाभाविक है , आवश्यक बी ....समयनुसार परिवर्तन आवश्यक है , यदि सैनिक युद्धक्षेत्र में शांति की बात करेगा तो कायर कहलायेगा ...
    व्यवहारिकता पर अच्छा विमर्श देवी के माध्यम से !
    आपकी लेखनी कमाल है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. थोड़ा सत रज तम मिले, भिन्न भिन्न अनुपात |
    प्रस्तुति शुभ-गंभीर अति, महत्वपूर्ण दिन रात |
    महत्वपूर्ण दिन रात, एक बिन अन्य अधूरा |
    घटती बढ़ती ज्योति, योग पर पूरा पूरा |
    गोरख कर बदलाव, खाव खिचड़ी जो छोड़ा |
    रखना तू समभाव, नहीं कुछ थोड़म-थोड़ा ||

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब, खूबशूरत अहसाह सार्थक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (10-07-2013) के .. !! निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा मंच अंक-१३०२ पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

    उत्तर देंहटाएं
  8. -----यह इतना सुगम विषय नहीं है कि ...नारी के बिना नर कुछ नहीं कर सकता ...
    ---मूलतः नर ..ब्रह्म स्वरुप है दृष्टा, उपदेस्टा,विचारक एवं इच्छाकर्ता ...उसी के इन क्रियाओं के पश्चात ही आदेश पालन कर्ता प्रकृति अपना कार्य कर पाती है....
    ----प्रकृति कभी ब्रह्म या पुरुष को उपदेश नहीं करती क्योंकि सिर्फ सत का विचार, उपदेश, या भाव-उत्थान भी अत्यावश्यक है( यथा योगी,साधू-संत,उपदेष्टा,विचारक आदि का कर्म)...,अन्यथा लोग और आगे जाकर इन सब को निठल्ला व सिर्फ शारीरिक-श्रम को ही कर्म मानने लगेंगे और समाज में वैचारिक शून्यता व अश्रेष्ठता उत्पन्न होने लगेगी ..
    ---देवी मद पीती है =अधर्मी का गर्व नाश ...वह मदिरा नहीं पीती ...रक्त पीती है = जड़ मूल से विनाश ...रक्त नहीं पीती...मांस भक्षी है = समाज के समस्त प्रकार के हर अंग के अधर्म का विनाश ...मांस भक्षी नहीं...ये रूपक कथन हैं ...
    --- निश्चय ही प्रकृति रज व तम का रूप है परन्तु तामस नहीं ,वह प्रत्येक अति को सामंजस्य हेतु है स्वयं कभी तामस भाव ग्रहण नहीं करती...
    ----ये सारी निर्मूल कथाएं तो वैदिक-तत्व धर्म के विरोध में भ्रष्ट साक्त व अघोरी सम्प्रदाय वालों व मांस-मदिरा के प्रेमी धूर्त लोगों ने स्वार्थवश खडी की हुई हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. मैने युग के परिप्रेक्ष्य में विषय को लिया है और मेरा दृष्टिकोण प्रचलित पुरा-कथाओं में युगीन समस्याओं के समाधान की खोज का है,साथ ही धर्म-सिद्धान्तों का निरूपण और शास्त्रीय गूढ़ता के स्थान पर व्यावहारिकता और सहज-ग्राह्यता बनी रहे यह मेरा प्रयत्न रहा. दर्शन और धर्म के गूढ-गहन तत्वों की विवेचना और व्याख्या मेरा उद्देश्य नहीं. पुरुष ब्रह्म स्वरूप है- दृष्टा, उपदेष्टा ,विचारक ,इच्छाकर्ता और प्रकृति मात्र आदेश-पालनकर्त्री- यह जान कर आज का पुरुष जो कर रहा है वह व्यवहार में सामने आ रहा है. वहाँ भी थोड़ा अंकुश लगना चाहिये वैसे सबका अपना दृष्टि-कोण- अपनी सोच. पुराकथाओं के प्रचलित रूप को सुधारने के लिये और धार्मिक-दार्शनिक पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या के लिये अलग से पोस्ट लिखी जा सकती है. जागो !तामसी , आज फिर जागो ! पर

      हटाएं
  9. बहुत सी गहन बातें कह दी हैं आपने

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपका आलेख कई बार पढ़ा, हरेक बार और भी सार्थक लगा और एक नया विचार दे गया...गहन दर्शन को रोचकता से प्रस्तुत करने में आपकी लेखनी का ज़वाब नहीं...बहुत उत्कृष्ट प्रस्तुति...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  11. गहन दार्शनिक विचारपूर्ण अभिव्यक्ति।।।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आदरेया आपकी यह अप्रतिम प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है। कृपया http://nirjhar-times.blogspot.in पर अवलोकन करें,आपका स्वागत है।
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  13. आदरेया आपकी यह अप्रतिम प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है। कृपया http://nirjhar-times.blogspot.in पर अवलोकन करें,आपका स्वागत है।
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  14. apne aap se bhi samjota koi jaan kar kese karle....chandra ka adha bhaag poonam ko bhi andhere me rahta hai magar chndra dekhta surya ko hi hai...rat ke andhere me bhi...keval chandra ko hi dikhta hai suraj...or fir wo apne prakash se puri prithvi ko prakashit karta hai...wo bhi andhere me doob jaye to puri prithvi par sada hi amavas rahe...

    उत्तर देंहटाएं