रविवार, 23 मई 2021

राग-विराग -12.

जीवन की लंबी यात्रा कर  वे रामबोला से तुलसी(दास) और तुलसी से गोस्वामी तुलसीदास तक की दूरी तय कर चुके थे .अनेक ग्रंथों का प्रणयन कर लोक में प्रसिद्धि पा चुके थे. उनका व्यक्तित्व यों भी प्रभावशाली था ,गौरवर्ण ,सुगठित लंबी काया अनोखा पाण्डित्य और समर्थ अभिव्यक्ति! वे मितभाषी थे ही, गहनता से पूर्ण-गंभीरवाणी प्रभावित करती थे. वे समाज के उच्चवर्ग में चर्चा पाने के अधिकारी बन गये थे. पूर्वजन्म के संस्कार ही रहे होंगे सब कुछ होते हुए भी उनके मानस में वैराग्य की एक अंतर्धारा निरंतर प्रवाहित थी.

तुलसीदास जी का विरोधियों से पाला पड़ा था. लेकिन जो हितैषी और मित्र मिले उनसे पूरा सहयोग और अनुकूलता मिली, जिसने हर विपरीत स्थिति में उन्हें साध लिया. ऐसे ही मित्र थे ,अब्दुर्रहीम खानखाना और टोडरमल ,जो अकबर के नवरत्नों में गिने जाते थे. 

राजा टोडरमल ने तुलसी की प्रत्येक प्रकार से सहायता की थी पुस्तकों की प्रतियाँ तैयार करना ,उनकी सुरक्षा और विभिन्न अन्य व्यवस्थाओं का दायित्व उन्हीं का होता था. 

रहीम के पिता उनके बचपन में ही छोड़कर स्वर्ग सिधार गए थे. विधवा माता, जो मेवाती राजपूतनी थीं, ने किसी प्रकार से इनका पालन-पोषण किया था. बचपन, कुछ समय के लिये बड़ी विपन्नता में बीता था. अपनी योग्यता के बल पर वे अकबर के प्रिय पात्र बन गये थे पर अकबर के बाद प्रताड़ित होने पर वे मुग़लों की नौकरी छोड़कर चित्रकूट में जा रहे। उनके जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत हुआ. उहोंने इसे इस प्रकार व्यक्त किया -

'चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेस।

जा पर विपदा परत है, सो आवत यहि देस।'

कैसा संयोग- वनवास की अधिकांश अवधि श्री राम ने चित्रकूटमें बिताई, काशी में पण्डितों ने जब तुलसी पर अनेक दूषण लगाए तब विचलितमना तुलसी, चित्रकूट की रमणीयता में शान्ति खोजने पहुँच गये, और जीवन के अन्तिम दिनों में मुसीबतें झेलते अब्दुल रहीम खानखाना ने भी वहीं ठिकाना बनाया.

सन्त के रूप में तुलसी जन-मन में प्रतिष्ठित थे ही. लोगों के मन में यह विश्वास जमने लगा कि वे उन्हें कठिनाइयों से उबार सकते हैं. इसी भ्रम में एक महिला उनके पास अपनी अरदास ले कर आई. पुत्री के विवाह हेतु उसे धन चाहिये था. दीन नारी गिडगिड़ाती, याचना किये जा रही थी. उसे विश्वास था कि ये सिद्ध संत हैं.मेरी विपदा दूर करेंगे. तुलसी, जो स्वयं भिक्षा माँग कर पेट भरते थे, सोच में पड़ गये कि अब क्या करें. कोई उपाय न देख कर एक पुर्ज़े पर कुछ लिख कर खानखाना के पास भेज दिया.रहीम ने पढ़ा वह अधूरा छन्द -

-'सुरतिय,नरतिय नाग तिय,यह चाहत सब कोय'

उन्होंने तुलसी की बात पूरी कर दी - उस स्त्री की आवश्यकता समझ कर उसे पर्याप्त धन दिया और छन्द को पूरा कर तुलसीदास तक पहुँचाने को उस स्त्री को सौंप दिया.

तुलसी ने पढ़ा -

 'सुरतिय,नरतिय नाग तिय,यह चाहत सब कोय',

गोद ,लिये हुलसी फिरे तुलसी सो सुत होय.'

 हुलसी माँ की गोद में तुलसी सा सुत? मन की पीड़ा जाग उठी ,जिसके जन्मते ही परिवार भंग होने लगा था, उस अभागे को माँ की गोद कहाँ? माँ तो सौर-गृह से ही परमधाम प्रस्थान कर चुकी थीं. तुलसी के हिस्से में प्रेम के लिये तरसना जो लिखा था .

लेकिन तुलसी ने  प्रभु के अतिरिक्त अपनी व्यथा किसी के आगे नहीं गाई थी.

रहीम को क्या मालूम कि कैसा-कैसा दुख-दैन्य झेल कर तुलसी इस ठौर पहुँचे हैं .  

चित्रकूट में तुलसी और रहीम सहयात्री थे. इस प्रसंग में अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं। यथा- रहीम और तुलसी के प्रश्नोत्तरवाले  दोहे की , जरा देखें -

'धूर उड़ावत सिर धरत कहु रहीम केहि काज?'-रहीम 

'जेहि रज मुनि पत्नी तरी, सो ढूँढत गजराज।।'-तुलसी.

बाद में नन्ददास ने यह दोहा  रत्नावली को सुनाया था.सुन कर कुछ कहा नहीं उसने, उदास हो गई थी.

नन्ददास को पछतावा हुआ, समझ गये कि काव्य-निपुणा भौजी से कभी तुलसी ने इस प्रकार का बौद्धिक संलाप नहीं किया. 

लोक-मनोविज्ञान के ज्ञाता कवि एक संवेदनशील कवयित्री का, अपनी सहधर्मिणी का  मन क्यों नहीं समझ सके? एक सुन्दर, ललित अनुभव से दोनों वंचित ही रहे .काव्य का एक मनोहर रूप रचे जाने से पहले निर्वाक् हो गया.

रहीम कवि अपनी उदारता और संवेदनशीलता के लिये जाने जाते थे, और दानशीलता में उन्हें कर्ण के समकक्ष कहा जाता था.एक नवपरिणीता सैनिक-पत्नी  ने उन्हें करुणाकुल कर दिया था जब उसने, पति के प्रस्थान के पूर्व उसने बरवै छन्दलिख कर रहीम के पास भेजा था  -

'नेह प्रेम को बिरवा रोप्यो जतन लगाय,

सीचन की सुधि लीजो मुरझि न जाय।'

सैनिक को छः माह की छुट्टी ,वधू को पर्याप्त उपहार तो मिला ही ,वह पुर्जा तुलसी को भिजवा कर उनसे आग्रह किया था कि आप इस छंद में पुन: रामकथा रचें।' 

 रामचरितमानस के लिये रहीम ने कहा था -

 'राम चरित मानस विमल, सन्तन जीवन प्रान,

हिन्दुवान को वेद सम, जमनहि प्रगट कुरान।'


कहाँ की बात कहाँ जा कर किस रूप में प्रतिफलित होती है इसे तुलसीदास जी की वरवै रामायण की रचना में देखा जा सकता है.

तुलसी के परम मित्र रहे रहीम ने श्रोताओं के बीच बैठ कर तुलसी के मुख से निस्सृत कथायें सुन कर अपनी विपत्तियों के दिन गुज़ारे थे ,कई बार तुलसी ने उनके उदास प्रहरों को विनोदपूर्ण बनाया था.

ऐसे ही एक दिन  रहीम भी श्रोताओं में सम्सिलित थे. तुलसी जन का मनोरंजन करते हुए रहीम की उदासी दूर करने का यत्न करते राम-कथा के अंतर्गत नारद-मोह प्रसंग पर बोल रहे थे. काव्य-बद्ध प्रकरण के साथ टिप्पणियाँ करते हुए अपने नाटकीय वर्णनों से उसे जीवन्त बना देते थे.

जब नारद मुनि को अपनी हरि-भक्ति का अहंकार हो गया ,प्रभु ने उन्हें सही मार्ग पर लाने का उपाय किया. भ्रमण करते नारद जी राजा शीलनिधि के राज्य में पहुँचे ,राजा की सुलक्षणी कन्या को देख नारद ऐसे मोहाविष्ट हो गये कि उसे पाने के लिये. हरि से निवेदन करने पहुँच गये. प्रभु को उनका गुमान तोड़ना थ.

उन्होंने उत्तर दिया मेरे होते हुए तुम्हारा परम मनोरथ भंग नहीं होगा .सबविधि तुम्हारा कल्याण करने को तत्पर हूँ.

निश्चिंत हो गए मुनि कि मन की इचिछा अवश्य पूरी होगी.

और हरि की लीला देखिये - उन्हें बानर का रूप दे दिया.

स्वयंवर सभा में नारद जी अपनी सुन्दरता के प्रदर्शन के लियेबार-बार अकुला कर उचकते है, चाहते हैं किसी प्रकार कन्या उन्हें देख ले .

लोगों को उस दृष्य की कल्पना कर बड़ा आनन्द आ रहा था, कुमारी  स्वयंवर  के 

पात्रों में वानरमुखी नर को देख जितना मुख फेरती ,मुनि उतने ही उद्धत होकर उचकते. वहाँ और तो किसी को वह रहस्य पता नहीं था, लेकिन दर्शकों में बैठे दो हरिगणों से कैसे यह बात छिप सकती थी?

 वे दोनों हँस-हँस कर पूरा मज़ा ले रहे थे. 

नारद जी को पूरा विश्वास था कि कन्या उन्हें देखते ही वर लेगी. व्याकुल मुनि बार-बार उचकते और दोनों हरिगण यह देख-देख ,हँसी सेलोट-पोट हुए जाते. 

स्वयंवर का कार्यक्रम चल रहा था.

 इसी बीच हरि स्वयं वहाँ पहुँच गये. कन्या ने तुरन्त उन्हें वर रूप में चुन लिया.

 हताश मुनि  श्री हरि पर बरसने को तैयार हो गये.  तब हरि के गणों ने कहा,' उनका क्या दोष ज़रा जा कर अपनी शक्ल  दर्पण में देखो!'

हताश मुनि ने जब अपना प्रतिबिंब देखा. हरिगणों पर तो क्रोध आया ही, हरि पर बहुत कुपित हुये और दोनों को शाप दे दिया, 'तुम भी नारि-विरह में व्याकुल घूमोगे और वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे.'.

एक साथ कई कण्ठों से 'आ' निकल पड़ा.

पुनः वर्तमान मे खींच लाए तुलसी अपने श्रोताओं को - देखा! कैसी मोहिनी है प्रभु की माया कि बड़े-बड़े मुनियों की बुद्धि भी मोहाच्छन्न कर देती है!' 

इस विषय में दोनों मित्र एकमत थे कि  सदुद्देश्यो से पुरुष के विचलित होने का मूल कारण नारी है.

तुलसी ने सबको सचेत करते हुए निष्कर्ष दिया, 'इससे बचने के लिये  पल-पल सावधान रहना ही एकमात्र उपाय है.'

उन्होंने उपकथा का रामकथा से  तारतम्य जोड़ा  -  'हाँ तो...

  'राम जी वनों में भटकते सीता को खोज रहे हैं बानर सेना सहायता में लगी है...' 

उस दिन तुलसी का अद्भुत वर्णन-कौशल और हास्यमय प्रकरण के जीवन्त चित्रण से

लोगों का अभूतपूर्व मनोरञ्जन तो हुआ ही, तुलसी के मित्र रहीम भी अपनी दुष्चिन्ताएं भूल ,उसी में रमे रहे.

कथा का समापन हुआ. 

आरती के बाद तुलसी ने घोषणा की -

'कथा विसर्जन होत है ,सुनहुँ वीर हनुमान ,

जो जन जहँ ते आय हो ,सो तहँ करहु पयान.'

जयजयकारों के पश्चात्  सत्संग-सभा विसर्जित हुई.

छोट-छोटे समूहों में लोग जाने लगे बाातें होने लगीं .'आज की कथा बड़ी ज़ोरदार रही.'

'देखो नारद जैसे मुनि भी माया से नहीं बच पाये. '

'उन्हें अभिमान हो गया, सो ठिकाने लगाना ही था.' 

'वैसे ये तो सच है स्त्री का मोह ही माया जाल में फँसाता है ..ज़िन्दगी भर कोल्हू के बैल बने जुते रहो .'.

'हाँ, ये तो है, उसके कारन ही सारी जरूरतें ,जितना कमाओ गिरस्थी की भट्टी में झोंक दो.'

'कबीर बाबा तो कह ही गए हैं - नारी विष की बेल!'

प्रत्युत्तर में ,कोई युवक चलते-चलते बोल पड़ा,' और हम उस विषबेल के फल !'

कुछ लोगों ने ने मुड़ कर देखा. 

फिर सब तितर-बितर हो गये.  .

*

(क्रमशः)


शुक्रवार, 7 मई 2021

राग-विराग - 11.

 राग-विराग - 11.

अनेकों अवान्तर कथाओं द्वारा रोचकता बढ़ाने के साथ नई-नई जानकारियां देते हुए तुलसीदास का  कथा-क्रम चलने लगा था. बीच-बीच में गाये जानेवाली उनकी स्वरचित स्तुतियाँ और आत्म-निवेदन सुन कर श्रोतागण मुग्ध हो जाते. उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी.लोक ने उन्हें सिर-आँखों पर बैठा लिया था. तुलसी की अनेक कृतियाँ सामने आ चुकी थीं , कथा-क्रम में और पर्वों के अवसर पर तुलसी के मुख से उनकी राग-बद्ध रचनाएँ सुन आनन्दित होते और कंठस्थ कर लेते थे. उनकी वाणी लोक कण्ठ में विराजने लगी. 

पण्डितों में सुगबुगाहट होने लगी, उन्हें लगा यह तो हमारा पत्ता काट देगा. विरोध करनेवाले उठ खड़े हुए. षड्यंत्र रचे जाने लगे, अनेक प्रकार से दूषण लगाए गये. शम्भू पण्डित ने कहा था, 'वह तुलसी! बड़ा पण्डित बना घूमता है. भाखा में लिखता है. अरे, देव-महिमा गान भी देवभाषा में नहीं कर पाता.'

  तुलसी का मन बहुत खिन्न हो जाता. फिर वे स्वयं को समझा लेते ,सोच लेते कि वे लोग अपने हित में बाधा पड़ते देख, मुझ पर दोष मढ़ते है.

लोक-भाषा में रचना को ले कर उनके पाण्डित्य पर कीचड़ उछाली गई किन्तु सनातनजी की आज्ञा शिरोधार्य कर ,संस्कृत में पारंगत होते हुये भी उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया में लोकभाषा को ही प्रमुखता दी .संस्कृत में रचना की थी,लेकिन अपना क्षेत्र लोक-जीवन ही रखा और लोक के बीच रह कर उन्हीं की बोली में भजनों और आत्म-निवेदनों द्वारा अपना रचना-धर्म निभाते रहे. संस्कृत के छुट-पुट छंदों का समय-समय पर प्रयोग उनके  विषय  की गरिमा को वर्धित कर देता था,और उतनी संस्कृत लोगों के गले उतर जाती थी.

गुणग्राही राजा टोडरमल और रहीम से मित्रता का सम्मान उन्हें प्राप्त था और अपनी निर्लोभी ,निस्पृह वृत्ति के कारण वे लोग तुलसी का विशेष सम्मान करते थे. तुलसी की लोकप्रियता बढ़ती रही.उनकी कीर्ति राज दरबार तक जा पहुँची.

एक बार उनके मित्र टोडरमल ने बातों-बातों में कहा,' आप गुसाईं हैं, आपके लिये पत्नी विहित है. अकेले क्यों रहते हैं? और वे भी वहाँ अकेली. सुना है वे भी पण्डिता हैं. उन्हें बुला लीजिये.' . 

तुलसी गंभीर हो गये बोले, 'इतनी दूर निकल आया हूँ ,अब वह सब कहाँ संभव है?'.

लेकिन मन का कोई तार झनझना उठा था. उद्विग्न मन को शान्त करते मर्मस्पर्शी पदों में प्रभु से बार-बार सांसारिक जंजाल से दूर रखने को अनुनय करते रहे. उनके वे निवेदन भक्ति-साहित्य को समृद्ध कर गए.

जब से टोडरमल ने रत्नावली का उल्लेख किया ,तुलसी सोच-मग्न रहने लगे. अनजाने ही उसकी बातें ध्यान में आने लगीं. मन को हटाने का यत्न करते ,रहे .राम के ध्यान में लगाना चाहते हैं पर चंचल मन ,भटक-भटक जाता  रातें को प्रायः अधसोये ही बीत जाती थीं.

उस रात विचित्र-सा स्वप्न आया -

उन्हें लगा रतन आई है. कह रही है ,'मुझे भी कुछ कहना है, कह कर  जाऊँगी .पत्नी हूँ तुम्हारी, मेरा अधिकार बनता है.'

 फिर लगा 

 द्वार के बाहर खड़ी  रत्ना हँस रही है, 'भागते क्यों हो ,मैं तुम्हें रोकती नहीं हूँ, न बाधा डालती हूँ. तुम्हारी सहयोगिनी हूँ. भागो मत, गला और सूखेगा,'

'मैं तुम्हारा बंधन नहीं थी ,रास्ता मैंने ही खोला था. 

'गुसाईं हो तो क्या ? पत्नी, माया नहीं अर्धाङ्गिनी है. तुम्हें भटक जाने देती क्या?

'नाहक भयभीत होते हो.' 

तुलसी गला सूखा जा रहा है, कुछ बोल नहीं पा रहे, जैसे कण्ठ में काँटे उग आए हों.

'अच्छा ठीक है ,तुम नहीं चाहते  तो यही सही.'

वह चली गई थी.

नींद उचट जाती है तुलसी की. वे किससे कहें,क्या कहें!

मन ही मन कहते हैं - रतन, तुमने कहा था ' मैं हूँ न!'

हाँ ,तुम हो.लेकिन. मेरा दुर्भाग्य कहीं तुम्हें भी... ,नहीं,नहीं यहाँ मैं निपट लाचार हूँ. मेरे कारण  कहीं तुम भी ..

 नहीं  खो सकता.! सच यह है कि मैं तुमसे नहीं स्वयं से भागा था. लगा मैं दुर्बल पड़ रहा हूँ, बहक जाऊँगा. दुर्निवार आकर्षण मुझे अपनी लपेट में ले लेगा.'

 पर यह बात रत्ना से नहीं कह पाते. बस एक बात कह पाते है - वे सब मेरे अपने थे ,छोड़ कर चले गये ,मैं कुछ नहीं कर पाया. यहाँ मैं विवश हूँ  मेरा साहस जवाब दे जाता है.' 

*

 .बहुत समय से नन्ददास से भेंट नहीं हुई, न उधर के समाचार मिले . पुराने बांधवों से मिलने-जानने की इच्छा बलवती होने लगी ,काशी जाने का विचार किया. 

कथा के पश्चात् जब अपनी इच्छा जताई तो श्रोता-समूह ने अपने प्रश्न उठा दिए. 

उनका कहना था आपकी कथा, कथा न रह कर साक्षात्कार करा देती है..हमें लगता है सब घटित होते हमने देखा है आस्था दृढ़ होती है .आत्मानन्द मिलता है.

ज़रा, हम लोगों का विचारिये - संस्कृत हमारे लिये वर्जित है. भले ही ज्ञान का भंडार भरा हो ,पर हमें उससे क्या लाभ ? वह सब  विद्वानो और पण्डितों के अधिकार में है. अपनी संस्कृति से परिचित करवानेवाला कोई नहीं .यदि ये कथाएं ,वार्ताएँ नहीं होंगी तो हम अँधेरे में पड़े रहेंगे.आपसे जो शिक्षाएँ मिली हैं, हमारे संस्कार जाग रहे हैं.

हम धर्म की शिक्षा से वंचित हैं, हमारे लिय कोई व्यवस्था नहीं कि अपना उन्नयन कर सकें ,अपनी वृत्तियों का परिष्कार कर सकें.

हमने देखा है और धर्मों में बचपन से बच्चों को उनकी रीति-नीति की बातें सिखायी जाती हैं ,हमारे यहाँ कोई ध्यान नहीं देता, सब अपनी-अपनी में पड़े रहते है. मंदिर में घण्टा बजाने और प्रसाद पाने जाते हैं. नीति- रीति ,और श्रेष्ठ संस्कार सीखने कहाँ जाएँ? 

आपकी संगत में अपार शान्ति मिलती है,जीवन्त आदर्श मिलते हैं. आस्थायें जागने लगती हैं. बहुत कुछ समझने -सीखने को मिलता है ..

तुलसी ने आश्वस्त किया,' 'कुछ दिनों का अवकाश, बस मैं लौट आऊँगा.' 

'तो महाराज हमारे बच्चों के लिए कुछ तो कीजिये .कुछ तो रह जाय हमारे पास .यहाँ तो कहाँ से सीखें जाने कोई बतानेवाला नहीं '.

एक वयोवृद्ध श्रोता बोल उठा 

'आप जो सुनाते हैं उसे लिपि-बद्ध कर दीजिये. क्या बच्चे क्या बड़े सबके लिये एक स्थाई धरोहर हो जाएगी.'

*

बहुत दिनों बाद नन्ददास से भेंट हुई ..

'वाह दद्दू, तुमने तो सब पर अधिकार जमा लिया ,औरों के लिए कुछ छोड़ा नहीं'.

'अरे ,मैने क्या किया?'

'वाह, राम-कथा कहते-कहते ,सब को समेट लेते हो. भगवान शंकर दुर्गा गणेश,सूर्य कोई भी बचता नहीं.' .

'अच्छा, वह बात!'

'मैं समाज में विग्रह नहीं चाहता .शैव-वैष्णव-शाक्त सब परस्पर पूरक ,है अंतर्विरोध कहीं नहीं .संप्रदायों में बांट कर आलोचना करना अनुचित है. 

मैं चाहता हूँ सबकी स्वीकृति, पञ्चदेव की मान्यता. लोग व्यापक परिप्रेक्ष्य में पौराणिक धारणाओं से परिचित हों, अपनी संस्कृति को जाने. मन में जातीय गौरव की भावना उत्पन्न हो.'

'दद्दू तुम्हें सारी दुनिया की चिन्ता है पर भौजी को जीवन से बिलकुल निकाल दिया. वे अपनी बात किससे कहें ?'

नन्ददास का भौजी से ताल-मेल बैठ गया है. कुछ मैत्री भाव जैसा दोनों के बीच.

रत्ना ने कहा था,' लौकिक जीवन को ठीक से जीते नहीं लोग. मैं सोचती हूँ देवर जी, कि उचित-अनुचित का अंतिम निर्णय जिनके हाथ है वे राम, संसार में व्याप्त हैं . उन्होंने जो कृपापूर्वक  प्रदान किया है उसका संयत-भोग करना उसका उचित सदुपयोग ही है .अपने भोगों से भागना क्यों?..जब तक उसे ग्रहण करें, मान लें कि इतना हमारा भाग था, आगे जैसी राम की इच्छा. अपने भोग में औरों का भी  ध्यान ,कि उन्हें कष्ट न हो. संसार की सुन्दरता ,रस, रूप गंध राम के प्रसाद हैं उनके आनन्दमय रूप का प्रसाद! भाग कर क्यों, भोग कर सार्थक माने! नित्य के संबंध  सँवारते चलें ,जग-जीवन सँवर जाय.पर असमय अध्यात्म सिर पर सवार हो जाता है और सारा खेल गड़बड़, जीवन का माधुर्य चौपट ! 

'कितनी शंकाएँ उठती हैं मन में, पर किससे पूछूं ? समाधान कैसे हो?. 

अच्छा देवर जी , तुम्हीं बताओ ,रामजी की  जीवन शैली से प्रेरणा लेकर अपना कर्तव्य करते हुए जीवन-यापन भक्ति नहीं कहलायेगी क्या?'

फिर रत्ना ने कहा था,' अपने विद्वान पति का थोड़ा सहयोग चाहती थी, दुनिया भर के लिये कथा-प्रवचन हैं ,एक अकेली स्त्री समाधान के लिये किसके पास जाय?' 

गृहस्थ जीवन में तुलसी को अनेक बार लगा था कि रतन कुछ कहना चाहती है .रात को विश्राम के समय शैया पर करवटें बदलती है ',पूछती है ,'सो गये क्या ?'

किन्हीं विशेष अवसरों पर जब वे कथा सुना कर लौटते हैं तो पूछती है,' काशीवाले पण्डित इस विषय में क्या कहते हैं?'

 प्रखर बुद्धि है.प्रश्नोत्तर करने से चूकेगी नहीं.विचारशीला है वह बहुत कुछ जानना चाहती है. 

 पर वे अपनी ही धुन में कुछ कहते, कुछ टाल देते हैं. 'थक गया हूँ' ,'नींद आ रही है' .

दुनिया भर के विवाद-विमर्श का यहाँ क्या काम ? 

घर, घर की तरह होना चाहिये- तुष्टि-पुष्टिप्रद, विश्राममय! 

*

तुलसी को जो खटक रहा था ,मुँह पर आ गया -

बहुत दिन हो गये नन्दू, पहले तुम समाचार देने को उत्सुक रहते थे,अब क्या बताने को कुछ नहीं रहा? मैं समझ रहा हूँ, इधऱ तुम्हारा व्यवहार बदल गया है.'

'क्या लाभ ,वह सब कहने से ?'

'ऐसी बात नहीं नन्दू ,मुझे जानने की चाह होती है.' 

'तुम्हें व्यर्थ परेशान क्यों करूँ ? रहेगा सब वैसा ही .क्या अन्तर पड़नेवाला है? तुम्हारा इतना जस फैल रहा है ,बड़े-बड़े लोगों से तुम्हारी मित्रता है हमलोग तुम्हारे आगे कहाँ ठहरते हैं....'

'बस करो ,बस करो नन्दू..जानता हूँ तुम क्यों कह रहे हो. दुनियावालों के लिये मैं कुछ भी होऊं ,घरवालों के लिये क्या हूँ ?जानता हूँ ,मैं भी समझता हूँ.और तो और, अब तुम भी मुझे गलत समझने लगे.' 


बहुत व्यथित हो गए थे.बोलते-बोलते चुप हो गये.

नन्ददास कुछ नहीं बोले ,जस के तस बैठे रहे.

तुलसी फिर कहने लगे, ' तुम भी असंतुष्ट हो.एक व्यक्ति मुझे समझता था अब वह भी ...मैं जान गया हूँ . 

नन्दू , तुम्हें सब-कुछ बता दूँगा  कुछ भी नहीं छिपाऊँगा.'   

 नन्ददास चुप बैठे ,सुने जा रहे हैं.         

'दोष किसी को नहीं दे रहा अपनी करनी का फल भोग रहा हूँ .कौन मुँह लेकर मैं अब वहाँ जाऊँ?' 

'क्यों ?कितना तो आदर-मान है तुम्हारा ..कथा सुनने भीड़ उमड़ती है .तुम्हारे  भजन गली-गली गाये जाने लगे है .तुम क्या हो .ये समाचार क्या वहाँ नहीं पहुँचते?'

'तुम नहीं समझोगे भाई, मैं जनम का अभागा, उनके सामने पड़ने जोग नहीं रहा. कैसा भूत सवार हो गया था. कुछ नहीं सूझ रहा था. मैं क्या कर बैठा!

'उस दिन घर में पाँव रखते ही रतन को न देख कर मैं समझ गया मायके गई होगी. बहुत दिनों से कह रही थी .

बावला सा उसे लौटा लाने को उतारू हो गया. 

बरसात की तूफ़ानी रात ,जमुना चढ़ी हुईं थीं.'

बोलते-बोलते थक गए हों जैसे ,कुछ सुस्ता कर बोले-

'नहीं भूल सकता हूँ. 

'वे लोग जान गये कितना खोखला हूँ मैंने अपने साथ उसकी गरिमा भी चौपट कर दी. उनके लिये मैं क्या रह गया? अब तो मुझे अपने पर भी विश्वास नहीं रहा.

'और मैं किस वेष में था, जानते हो?

उमड़ती लहरों में ,गाँठ खुल कर धोती न जाने कब  बह गई पता नहीं चला. सिर का अँगौछा कमर में बाँधे, केशों में तिनके उलझे, सर्वाङ्ग से पानी टपक रहा ,कुछ काई जैसा हरापन यहाँ-वहाँ चिपका - विचित्र वेश . पाँव में जूते होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.

उस समय जिस जुनून में था ,सिर पर पागलपन सवार था.

उनके द्वार जा पहुँचा. 

 खुलवाने की हिम्मत नहीं पड़ी थी.

रतन के कमरे में कुछ रोशनी लगी. खिड़की खुली थी .यही विचार कर रहा था कि कैसे चढूँ ,इतनें में एक रस्सी सी झलकी ,हवा में हिल रही थी ,मुझे ध्यान ही नहीं कैसे चढ़ा और अन्दर कूद गया. .' 

गला कुछ अटका, रुक गए तुलसी..साँस ले कर फिर बोलने लगे-

'.धमाके की आवाज़ हुई होगी .'कौन है ?' ,'क्या हुआ'?' पूछते घर के लोग दौड़े आए 

- 'क्या हुआ?'  'क्या हुआ?'

उस अश्लील,कुवेश में, हतबुद्ध -सा हो गया मैं, सामने था. 

सबकी दृष्टियाँ मुझ पर टिक गईं..  

एक ही प्रश्न - पाहुना! इस कुबेला? ,कैसे इतनी बुरी दशा में? खिड़की से कैसे?

जो ध्यान आया ,बता दिया .

तब देखा गया, रस्सी कहाँ से आई? वहाँ तो एक अधमरा साँप पड़ा था.


रतन अपने घर में किसी से आँखें नहीं मिला पा रही थी.

झुका सिर, वह मुख जैसे किसी ने खड़िया पोत दी हो.

कितना प्रसन्न रहती थी! घर भऱ की लाड़ली,मानिनी पुत्री एकदम हतप्रभ,विवर्ण !

जिसकी पत्नी होने का गर्व था, उसी के कारण लज्जा से गड़ी जा रही थी.

प्रारंभिक प्रश्नोत्तरों में मेरे उत्तर कितने अपर्याप्त ,कितने संदिग्ध,कितने भ्रामक!

कोई कितना समझा, पता नहीं पर चुप रह गये थे वे लोग. 

बस एक दृष्टि बहिन पर डाली थी फिर बात को सँभालते हुए बड़े साले ने कहा- 'उन्हें सहज हो लेने दो.' 

और वे सब वहाँ से चले गये थे.

 एक धोती और उपरना भेज दिया था.


सारे आदर-मान पर पानी फिर गया .

सोचते होंगे ऐसी कुवेला में, मलीन-गर्हित रूप धरे मैं, सीधे रास्ते न आकर क्यों अनिष्ट जैसा  खिड़की से आ घुसा ?

-  आशंका से भरे कैसे देख रहे थे मुझे! 

उनके कुल में आ मिले दूषण सा, मलीन कुवेशी, अवाञ्छित प्रसंग का प्रश्न बना मैं, वहाँ सिर झुकाए खड़ा था .

वह निन्दित अध्याय फिर स्मरण न हो- मैं कभी सामने ही न पड़ूँ.

इतने बरस हो गये ,गुरुदेव ने संस्कारित किया था, दीक्षा दी थी.

कभी-कभी लगता है उस सब का लोप कर एक अश्लील-अमंगल पहेली  रह गया हूँ मैं.

'भान होता है, बचपन का कौपीनधारी राम्बोला ,हीन-मलीन वेष में,सबकी तिरस्कारपूर्ण दृष्टियाँ झेलता, वंश का कलंक बना. वहीं का वहीं खड़ा है!' 

वह दैन्य और वाणी का निरीह कम्पन नन्ददास  को स्तब्ध कर गया.

लेकिन उनका अंतिम वक्तव्य सुनना अभी शेष था.

तुलसीदास ने कहा था - 

'जिसने वह अशुभ-अपावन गर्हित वेष देखा वही जानता होगा कि कितने बड़े मर्यादा-भंग का दोषी हूँ मैं !'

*

(क्रमशः)