बुधवार, 17 जुलाई 2013

राम-रजाई.

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अम्माँ सुबह पूजा के समय एक दोहा बोलती हैं -
'राम रजाई रावरी ,है सब ही का हेत ..'
उनकी पूजा लम्बी चलती है , बोलते-बोलते ध्यान और चीज़ों पर भी तो देना पड़ता है .जितनी स्तुतियाँ आदि याद हैं इधऱ का उधर जोड़-तोड़ कर पूरा कर लेती हैं, जो शब्द जहाँ  समा जाये बस, उनका मन भक्ति-विभोर है .कोई हँसे हँसता रहे .सारे शब्द राम के ,सारे अर्थ राम के. क्या फ़र्क पड़ता है - भाव तो उनके मन में  है .
भक्ति का सब का अपना-अपना ढंग !
चेतन सुनता रहता है. मतलब भी अपने अनुसार लगा लेता है .अभी बारह बरस का हुआ है . अम्माँ की रजाई को 'राम रजाई' कहता 'है और जाड़ों में कहीं से आते ही ठण्डे हाथ-पाँव  ले कर उसमें घुस जाता है .
कोई टोके,' अरे बाहर से आया वैसे ही हाथ-पाँव उनकी  रजाई में घुस गया .'
' ये तो राम रजाई है सब के भले के लिये ! क्यों अम्माँ, तुम्हीं तो रोज कहती हो ?'
अम्माँ क्या कहें , हँस देती हैं.
अब क्या कर लेगा कोई ?
'कितने ठण्डे हो रहे हैं हाथ-पाँव.'
 अपने हाथों में ले कर गरम करने लगती हैं
'अरे, रहन देओ , मार ठण्डाय गौ है लरिका.  उघार उतार के धुइ जइ है .'
तो अम्माँ की रजाई ,राम-रजाई बना डाली  उसने .
तुलसीदास जी होते तो कैसा लगता उन्हें !
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10 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति है
    राम रजाई-मन भाई-
    सादर-

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  2. जहां राम का भाव है वहाँ सब बढ़िया है ...

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  4. आपकी यह रचना दिनांक 19.07.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  5. हां- हा .... अम्मा के बोले दोहे का चेतन का अपना ट्रांसलेशन वाकई मजेदार है ! एकदम निर्दोष ट्रांसलेशन :)

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  6. वाह ! रोचक पोस्ट..जो है सब राम का ही तो है..

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  7. तुलसीदासजी क्या कहते …सबके अपने -अपने राम !!
    राम रसोई तो सुना था ,राम रजाई पहली बार जाना !

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  8. वाह !बहुत सुन्दर है आंचलिक भाषा प्रयोग और मर्म

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  9. ग्राम्य भाषा का प्रयोग कर रची सुन्दर रोचक प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी ...

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  10. बहुत उम्दा, भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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