मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सबसे बड़ा दोष.

हेमा ने सुसाइड कर लिया !
भार्गवी की बात सुन कर सन्न गई हूँ .
अंतरात्मा चीख उठती है ,' नहीं, नहीं, नहीं !'
अभी उसकी उम्र ही क्या थी मुश्किल से तीस पार किये होंगे !
साथ बैठी सरिता ने कहा था 'सुसाइड करना कायरता है .'
कोई पागल हो जाए उससे अच्छा उस अभिशापमय जीवन से मुक्त हो जाना नहीं है क्या ?'
एक और व्यक्तित्व असमय ही निर्ममता से तोड़ डाला गया .
जिनने  उसे मरने के लिए विवश किया और बाद में भी उसे ही दोषी बना रहे हैं वे निरपराध हैं !

हमेशा हँसती रहनेवाली वह लड़की बीमार नहीं थी ,उसका दिमाग़ खराब नहीं था .हाँ, बाद के दिनों में बड़ी हताश और थकी लगती थी
उसे शुरू से ढाला गया था - सीधी बनो ,सुशील बनो ,सब कुछ सह लो ,किसी को जवाब मत दो .लड़की का धर्म है सब के अनुसार चलना,सब चुप रह कर निभाना. .शुरू से कह- कह कर कि अपना मत सोचो ,अपनी इच्छा कुछ नहीं दबा दिया गया था उसका मन .
अंत में  उसे क्या मिला - कुसूर किसका ?
*
वह कर्कशा नहीं थी ,होती तो दूसरों का जीना दूभर कर देती .माँ-बाप ने इतना निरीह बना कर इस क्रूर दुनियां के अयोग्य बना दिया था.सबसे बड़ी जुम्मेदारी उस आदमी की जो माँ-बाप के पास से ले आय़ा था ,जिसमें अपनी कोई  की सामर्थ्य नहीं थी ,अपने को उस पर थोपता चला गया था .वह उसे छोड़ गई क्या बुरा किया ?
यंत्रणा कितनी वीभत्स होती है .
*
वह मेरी छात्रा रही थी ,दस बरस पहले .खूब लंबी-सी साँवली-सलोनी हेमा ! कभी आगे की बेंचों पर नहीं बैठती थी ,और हमेशा हँसी बनी रहती उसके चेहरे पर .मुझे लगता मैं बोल रही हूँ और यह ध्यान नहीं दे रही है , पता नहीं किस बात पर हँसे जा रही है . मैं पूछती ,'क्यों ,क्या बात है हेमा ?'
'कुछ नहीं दीदी 'खड़ी हो कर वह बोलती है .
'तो इतनी हँसी क्यों आ रही है ?'
कोई उत्तर नहीं .
 महादेवी वर्मा का गद्य, पर्वत-पुत्रों की करुण- कथा, कितना गंभीर विषय और ये  हँसे जा रही है !
औरों का ध्यान भी बँटता है .क्लास में हँसी का संक्रमण फैलता है तो पढ़ाई कानों को छू कर निकल जाती है.
पढ़ने में साधारण थी हेमा ,और कुछ गड़बड़ नहीं ,बस डाँटो तो भी हँस रही है, सिर झुकाए भी हँसी से बाज़ नहीं आती .
इसीलिए एक बार बेंच पर खड़ा कर दिया. पर फिर पीरियड की घंटी बज गई थी.
उसकी ओर न देखूँ ,यही कोशिश रहती ,पर बार-बार ध्यान उसी ओर चला जाता.वह सिर झुका लेती ,अक्सर टाल जाती मैं भी .कोर्स पूरा कराना है इस के पीछे क्यों पूरे क्लास का हर्ज करूँ .. .
साल बीत गया . छुट्टियाँ हो गईँ .

*
विभाग में नई लेक्चरर आई थीं  - भार्गवी .
उस दिन उनके घर हमलोग चाय पी रहे थे ,सामने की छत पर हेमा दिखाई दी.
'अरे , ये तो हेमा है ,'मेरे मुँह से निकला .'
उसने बताया पड़ोस का परिवार उसकी भाभी के रिश्तेदार है .
फिर सुना हेमा की शादी तय हो रही है, ससुरालवाले आगे पढ़ाना नहीं चाहते .
शादी हो गई होगी. अगले साल एक बच्चे की माँ बन गई कच्ची-सी हेमा.
 भार्गवी के घर मिली थी .पीली-सी ,दुबली-सी .पर चेहरे पर उसी हँसी की झलक
मेरे सामने आते शर्मा रही थी .मैंने ही आवाज़ दे कर बुलाया था.पास बैठी तो मन उमड़ आया .
'हेमा,ससुराल में भी ऐसी ही हँसती हो न?'
'नहीं दीदी ,हर समय दाँत खोले रखना वहाँ किसी को अच्छा नहीं लगता.'
मैं  धक् से रह गई.
सबसे पहले हँसने पर मैंने ही टोका था इसे .
उसके आदमी ने भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी.पिता की दुकान पर बैठने लगा था.यार-दोस्तो में तो शुरू से ही उसका अधिकतर समय बीतता था.
हेमा दो बच्चों की माँ बन गई .
फिर एक एक्साडेंट में उसके ससुर की मृत्यु की ख़बर सुनी.
*
दुकान की सारी जिम्मेदारी हेमा के पति पर .पर वह मन मौजी आदमी. दोस्तबाज़ी और खाने-पीने का शौकीन .माँ समझातीं तो भी नहीं सुनता .
हेमा कुछ कहती तो चिल्लाता ,'तुझसे क्या मतलब सुसरी ,खाने-पहनने को  मिलता है और क्या चाहिए? .हमारे ऊपर सासन करना चाहेगी तो जूता लगा देंगे .'
एक बार एक काली-सी औरत को घर भी ले आया था .बहुत दिनों से उससे संबंध था ,पड़ोसियों से पता लगा था.
बच्चों के लिए हेमा जुम्मेदार थी .जिसके अत्याचार सहती रही ,बच्चों को धारण किया , उसके साथ क्या कभी सहज जीवन जी पाई होगी  !और जब-तब वह आदमी हाथ भी उठाने लगा था.
*
एक बार हेमा मायके भाग आई थी , बिना किसी को बताए .
पर यहाँ माँ-बाप भाई-बहिनों के घर में कैसे खपती ?अब तो भाभी भी आ गई थीं?
फिर भी   दोष हेमा का है ,जिस आदमी ने कभी उसके साथ न्याय नहीं किया वह निर्दोष है !

भार्गवी उनकी संबंधी थी हम दोनों ने सलाह कर उसकी माँ से कहा था,'मत भेजो इसे वहाँ .पढ़ने का खर्च हम देंगे .पढ़ा कर नौकरी करने दो .'
हेमा ने मेरे पाँव पकड़ लिए थे .'दीदी,मुझे वहाँ  मत भेजो .'
माँ रो रही थी ,'आप समझती क्यों नहीं ?हमें और भी लड़कियाँ ब्याहनी हैं .
इससे तो मर जाती तो झंझट खत्म होता !.
और फिर इसका आदमी छोड़ेगा इसे ?जरा में कह दिया ये बच्चे ही मेरे नहीं हैं तो हम क्या कर लेंगे उसका ?इतना कलंक लेकर कहाँ जी पाएगी यह !'
फिर सुना वह अपने रिश्तेदारों के साथ आय़ा था और हेमा को साथ ले जाने को घसीटा था .
उसके बाप को धमका गया तुम कुछ भी बोले तो हवालात में बंद करवा दूंगा .
उसके बाद चार बरस हेमा मायके नहीं आई थी.
*
जिसे हँसने पर डाँटती थी वह हेमा कितने साल बिलकुल नही हँसी होगी !
अब वह कभी नहीं हँसेगी . इस हास और रुदन से मुक्त हो गई वह .
मेरी आँखें क्यों भरी आ रही हैं ?मेरा उसका कोई संबंध नहीं था .कुछ साल मेरे क्लास में रही थी , अपने हँसते चेहरे पर डाँट खाती .
 बार-बार आँसू उमड़े आ रहे हैं .

उन स्थितियों में जीना ,किसी के लिए संभव नहीं .जो विद्रोह करता है वह जी लेता है ,जो नहीं कर पाता वह मरने पहले बार-बार मरता है .
जीवन भर कुढ़-कुढ़ कर रहने से अच्छा एक बार मर जाना या डट कर लड़ना .प्रकृति में सदा से यह होता आया है ,जो समर्थ है जीता है ,असमर्थ मिट जाता है ,चाहे वह स्वयं को मिटा ले या दूसरे उसे मिटा दें .
क्वाँरी लड़की से माँ कहती है ,अपने घर जाकर अपना मन पूरा करना .पर अपना घर मिलता है क्या ? कहीं कोई अधिकार होता है क्या ?

पत्नी के जीवन पर और मृत्यु के बाद भी पति का अबाध अधिकार ! जब सीमा पार हो गई होगी मन ने विद्रोह किया होगा , तब उसे बता दिया गया होगा कि मुझसे बच कर जी नही सकतीं .
वह चली गई है ,चार दिन में सब ठीक हो जाएगा .मुझे नहीं सोचना चाहिए,रो-धो कर सब शान्त हो जाएँगे.आदमी दूसरा ब्याह कर लेगा ,बच्चे रो-झींक किसी तरह जी लेंगे. 

पर ध्यान उधर से हटता ही नहीं
दारुण से दारुण वेदना सह कर भी आदमी थोड़ा और जी लेना चाहता है .
 अपने-आप को कोई मार लेता है क्या ?
नहीं, ऐसी हँसनेवाली लड़की आवेश में अपने को नहीं मार सकती .
इसके पीछे बड़ी लंबी विचारणा होगी .पहले तो अपने न रहने की कल्पना कर वह रोई होगी .अपने बच्चों का सोच-सोच कर व्याकुल हुई होगी .उनकी निरीह दशा पर कितनी अशान्ति झेली होगी !
और रास्ते भी ढूँढे होंगे .
जब कुछ न कर पाई होगी ,सब कुछ असहनीय हो उठा होगा तब हार कर उसने यह कदम उठाया होगा .
मन की पीर हो या तन की सहने की एक सीमा है .आदमी  के साथ ऐसा होता तो वह बौखला जाता  .उन्मत्त हो चीख-पुकार करता  मुक्त होने को क्या-क्या नहीं करता!
 जीवन का अंत भी कितना कठिन  हो सकता है ?भीषण हा-हाकार ,रुदन से भऱपूर !
कैसा था प्रारंभ और कैसा अंत - दोनों दुखमय ! और इसके मध्य में क्या रहा ?
उफ़,सोच कर  कैसा लगता है !

और क्या पता हेमा ने खुद न किया हो, किसी और ने ही उसे ...
पर किसी को कुछ पता नहीं .किसी को क्या पड़ी है जो खोज-बीन करे !
जो हुआ वह क्यों हुआ? किसी ने रोकने की कोशिश क्यों नहीं की .यहाँ-वहाँ बहुत लोग थे ,सब मौन देखते रहे .स्त्री होना ही उसका सबसे बड़ा दोष था ?
हाँ, हाँ, हाँ !!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. क्या दोष था उसका , सोचते ही रहे !

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  2. ओह , बहुत मार्मिक .... मरने से पहले न जाने सोच की कितनी यंत्रणा से गुज़री होगी हेमा ।

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  3. जाने कितनी स्त्रीयां ऐसी पीड़ा झेलती हैं ..... मार्मिक, पर प्रश्न तो उठता है कि उसका दोष था ही क्या ...?

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  4. अत्यंत मार्मिक ....यही सोच रही हूँ मैं भी ...उसका दोष क्या था ....??

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  5. बहुत सुंदर मार्मिक प्रस्तुति ,,

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,

    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

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