बुधवार, 1 जुलाई 2020

कृतार्थता के क्षण -

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 खुले आकाश की झरती रोशनी में नहाए, ये कृतार्थता  के क्षण और मेरा कृतज्ञ मन - लगता है नारी-जीवन का प्रसाद पा लिया मैंने!

कितनी नई फ़सलें फूली-फलीं मेरे आगे ,पुत्री में  पहली बार अपना अक्स  पाया था.आज, वही मातामही बन गई - और  नवांकुर को दुलराने का सुख तन्मय मानस में समो लिया.अपनी निजता की यह व्याप्ति उसकी गोद में प्रतिरूपित होते देखना रोम-रोम को  पुलक  से भर रहा है.
 बीतते जाते समय के तार कैसे परस्पर जुड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता कौन  तन्तु एक नई बुनावट को रूप देता किस दिशा में बढ़ चलेगा.  एक मैं, कितने रूपों में विस्तार पाती जा रही हूँ.  
वर्षों के अंतराल को जोड़ते ये संबंधों के तार - कितने व्यवधान पार कर नित-नवीन रूप धरते कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं. यह है ,मेरी निजता की व्याप्ति ,यहाँ से वहाँ तक ,व्यवधानहीन अटूट यात्रा.
नवजीवन के सुकुमार अंकुर में प्रतिफलन पायी यह नई सृष्टि,मेरा ही तो अंशागमन, मेरा पुनरागमन ,मेरे चित् का नव-नव प्रस्फुटन, हर बार परंपरा को आगे तक ले जाने की आश्वस्ति प्रदान करता मन-प्राङ्गण उद्भासित कर रहा है  .
 अपने बोये बीजों की फ़सल हर बार नये रूप में अँकुआते देख, अंतर्मन गहन संतृप्ति से आपूर्ण हो उठा है 
मैं विद्यमान हूँ अभी , और मेरे कितने प्रतिरूप ,कितने-कितने आकार लिये ,भिन्न नामों में, भिन्न देहों में साकार हो उठे हैं. यहाँ से वहाँ तक मेरा ही स्वत्व नये रूपों में अस्तित्ववान हो प्रकट हो रहा है.मेरे निजत्व कोअमित विस्तार मिल गया. 

नतशीश तुम्हें शत-शत प्रणाम करती हूँ, 
हे सृष्टि के नियन्ता, 
तुम्हारा अनुपम आदान शिरोधार्य कर धन्य हो गई हूँ मैं !
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मंगलवार, 12 मई 2020

का चुपि साध रहेउ बलवाना...'

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राम कथा के अंतर्गत सुन्दरकाण्ड,  परम सात्विक वृत्तिधारी पवनपुत्र हनुमान के बल,बुद्धि एवं  कौशल की कीर्ति-कथा है, उन्नतचेता भक्त की निष्ठामयी सामर्थ्य का गान है.
किष्किन्धाकाण्ड से तारतम्य जोड़ते हुए इस काण्ड का प्रारम्भ होता है जामवन्त के वचनों के उल्लेख से, जो मूलकथा से घटनाक्रम को जोड़ते हैं  जिन पर सुन्दरकाण्ड का सम्भार खड़ा है.
रामत्व पर आपदा के चरम क्षणों में,आगे बढ़ कर चुनौती को स्वीकार करने का प्रश्न सामने खड़ा और परम समर्थ पवन-पुत्र मौन हैं.
'का चुपि साध रहे बलवाना...,,,,,,,,,'  पवन तनय बल पवन समाना'
जामवन्त की चुनौती भरी ललकार ने वज्राङ्ग को झकझोर दिया. शक्ति-सामर्थ्य का बोध जागा, अपार ऊर्जा तन में लहरा गई.तत्क्षण उन्होंने ठान लिया ,और दृढ़ निश्चय के बोल फूट पड़े -
'तब लगि मोहि परिखहु भाई.....
...........
जब लगि आवहुँ सीतहि देखी.'
इसी शक्ति-जागरण का प्रतिफल है सुन्दरकाण्ड,  सीता को खोजते हुए हनुमान सागर पार कर लङ्कापुरी पहुँचे ,जो तीन शिखरोंवाले(सुबेल,नील और सुन्दर )त्रिकूट पर्वत पर स्थित थी. सुन्दर शिखऱ स्थित अशोक वाटिका में, रावण ने सीता को बन्दिनी बना कर रखा था ,पवन-पुत्र के क्रिया-कलापों का केन्द्र वही रहा इसलिए इस काण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड उचित ही है.
शक्ति का यह उन्मेष किसी अहं की तुष्टि के लिए नहीं अन्याय के प्रतिकार के लिए, नीति ओर मनुज-धर्म की रक्षा के लिये है, स्वयं के मान-अपमान का विचार छोड़,निस्पृह भावेन अनीति के प्रतिकार एवं  शुभकार्यों के प्रति तत्परता के लिए है, इसी निर्वाह के कारण  राम-कथा का यह अंश अमर गाथा की परिणति पा गया है.
अञ्जनी कुमार की भक्ति कोई साधारण भक्ति नहीं थी, उन राम को पूर्णरूपेण समर्पित थी,जो आजीवन अपने सुख अथवा हित-साधना का विचार न कर,कर्तव्य के प्रति सतत तत्पर रहे. .विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने आदर्शों का निर्वाह किया. राम के परम उपासक हनुमान का बल,विवेक ,विज्ञान, रामकाज को ही अर्पित रहा.
रामत्व की विजय-यात्रा के लिये ऐसा ही समर्थ योगदान चाहिये, यही हनुमत् प्रयास,रामत्व को काँधे चढ़ाकर, उसके निर्वहन में सतत संरक्षक बन ,कई-कई आयामों में विस्तार पाता है.
हनुमनत्व की साधना के बिना रामत्व की सिद्धि नहीं होती.
अशोकवाटिका की वानरी कूद-फाँद,मारुतिनन्दन की वर्जना का घोष है कि अनीति से विरत हो, सन्मार्ग ग्रहण करो.
इस वज्राङ्गी क्षमता और शक्ति का उपयोग रामत्व अर्थात् सर्व-कल्याण की सिद्धि के लिये है.निस्वार्थ-निस्पृह भाव से ,उस के फलीभूत होने की साधना है और यही सुन्दरकाण्ड का प्रतिपाद्य है.
हनुमान की भक्ति निष्क्रिय हो कर बैठ जाने के लिए नहीं,अपनी क्षमताओं का समुचित उपयोग कर,अनर्थों के निवारण हेतु सतत प्रयत्नशील रहने की  साधना है, विश्व-कल्याण की प्रयोजना है, अनीति और अन्याय के निवारण का सङ्कल्प है. लोक-कल्याण राम का जीवनादर्श रहा ,और हनुमान,सम्पूर्ण निष्ठा के साथ, आजीवन उनकी कार्य-सिद्धि हेतु तत्पर रहे .
'कौन सो काज कठिन जग माँहीं', का उद्घोष कर जामवन्त ने सोई ऊर्जा को जगा कर ,जो संदेश दिया वह साधक के लिेए  अनुकरणीय है ,अन्यथा  हनुमान भक्ति का ढिंढोरा पीटना दिखावा मात्र है, बुद्धि, विवेक, ज्ञान का होना व्यर्थ है.
हनुमनत्व का सञ्चार ,तभी होगा जब उसका उपयोग अपने स्वार्थ ,के लिए न हो कर अनर्थों के निवारण, नीति और धर्म की रक्षा और सत् के सम्पादन एवं पोषण हेतु हो.जन साधारण सब सुनते समझते भी मौन रह जाय,इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? हनुमान-भक्ति निष्क्रियता की ओर नहीं ले जाती ,रामत्व के धारण एवं पोषण के लिए प्रेरित करती है.
दृष्टा कवि सचेत करता है कि सामर्थ्यवान का निष्क्रिय रहना समाज के लिए हताशाजनक होता है,सङ्कट के समय काम न आ सके उस बल,बुद्धि ,विवेक का होना, न होना बराबर  है.
सुन्दरकाण्ड,राम-कथा का अङ्ग होते हुए,अपना महत्व रखता है,उसका पाठ प्रियकर है क्योंकि उससे आस्थाओँ को बल मिलता है.
अंतर्निहित क्षमताओँ का भान भूले व्यक्ति को चेताने की,उसके सुप्त बोध जगाने की कथा है सुन्दरकाण्ड. और इसका प्रेरक उद्घोष कि तुम तुल जाओ तो 'कौन सो काज कठिन जग माहीं?'  चेतना को उदीप्त  करता है. अपने सीमित स्पेस में कथा-गायक का आशान्वित करता स्वर, भ्रमित मानव-जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने को प्रयासरत है.
सुन्दरकाण्ड का पाठ, साधक की सुप्त ऊर्जा को जगाने का साधन बने और  विश्व-मङ्गल के निर्वहन एवं संरक्षण हेतु तत्पर रहने का विवेक जगा सके तभी सार्थक और कल्याणकारी है महत् उद्देश्य की सिद्धि के लिये,संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए  हनुमनत्व की साधना,निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाने में है, और यही सच्ची वज्राङ्ग-भक्ति है, जिसके होते रामत्व पर आँच आना सम्भव नहीं. साधक का मनोबल उसे निरन्तर आश्वस्त करता, है कि असम्भव का सेतु पाटने को उसका योगदान, चाहे  नन्हीं गिलहरी के परम लघु प्रयास जैसा हो ,स्पृहणीय है.
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सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

कुछ पुराने पन्ने -

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विवाह के बाद,  प्रारंभिक वर्षों में दीवाली हर साल अम्माँ-बाबूजी के साथ (ससुराल में)होती थी. सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी.
हमारे यहाँ दीवाली पर दो दिन डट कर बाज़ी जमती थी .कई संबंधी आ जाते थे.  
बराम्दे में गद्दों पर चादरें बिछा कर बीच मे एक बड़ा सफ़ेद मेज़पोश फैला , चारों ओर महफ़िल जम जाती. ताश की एक गड्डी से कहाँ काम चलता दो मिलानी पड़ती थीं .
लड़के -बहुएं देवर-जेठ सब को बाबूजी बैठा लेते थे .
मेरी पहली दीवाली थी .मुझे खेलना नहीं आता था.
अरे, तुम्हें फ़्लश नहीं आता...कोई बात नहीं ..चलो, हम सिखाए देते हैं.
ससुर जी ने कहा था.
उन्होंने एक गड्डी ताश की उठा ली. हुकुम, पान, ईँट, चिड़ी बता कर तीन इक्के निकाले. वैसे पत्तों की थोड़ी-बहुत  जानकारी मुझे थी.     
अब आगे  देखो दुल्हन ,
यह सबसे बड़ी ट्रेल,फिर रन बताए फिर सीक्वेंस ,कलर .
तीन-चार बाज़ी खेल कर बाबूजी उठ गये  
खेलने के लिये रुपये दिये थे उन्होंने ,कहा अब खेलो -पैसा सब सिखाय देगा.'
 उठते-उठते कह गये ,दिन्ने ,इनको बताते रहना ..
हाँ हाँ बाबूजी ,आप निश्चिंत रहिये,हम सब बता देंगे.
फिर भी वे मुझसे कह गये समझ में न आए तो अपने पत्ते दिखा कर दूसरे से मिल लेना. .
अब सब खेलने बैठ जाएँगे तो चाय कौन बनाए ?
नहीं ,इन दो दिन बहुएँ उधर नहीं लगेंगी .ताईजी और अम्माँ हैं न,वे बनाएँगी चाय.
विधवा ताई जी सबसे विरक्त-सी रहती हैं,अम्माँजी .चूल्हे पर भगोने में चाय का पानी चढ़ा देती हैं. 
कुछ देर बाद आवाज़ लगती है ,अरे मनुआ की दुलहिन ,कित्ती पत्ती पड़ेगी ,अंदाज बताय जाओ .
जिठानी उठती हैं 
वे कहती हैं सक्कर तो डाल दी .बस चाय कित्ती पड़ेगी? .
कित्ती डाली शक्कर ?
दुई लोटा पानी धरा था,सो कटोरी भर डाल दी.उसकी चिन्ता मत करो ,हमने पानी चख कर देख लिया .
उन्होंले चीनी घुलने के बाद ,चमचे निकालकर ,मिठास चख ली है.
कटोरे में चाय की पत्ती जिज्जी ने निकाल दी.
दूध की कोई चिन्ता नहीं .डालते जाओ ,रंग आ जाए तब तक .(वाह ,क्या चाय बनाई है अम्माँजी ने ,खूब औटी हुई गाढ़ी चाय उसमें दूध की बहार -चीनी भी खूब मन से डाली है ). 
हम लोग उठे पानी निकालनेवाली डोई से निकाल-निकाल,  चाय कपों मे छानी और ट्रे मे रख कर ले आए.
अम्माँ जी कप या शीशे बरतन में कुछ खाती पीती नहीं ,उनका काँसे का गिलास चलता है,जिसमें दूध और चीनी उनके हिसाब से, ढंग से पड़ी हो .
चार प्लेटों में दीवाली की पापड़ियाँ -अजवाइन हींग-मिर्च की बेसनवाली ,मैदा की नमक-ज़ीरे वाली और गुड़वाली मीठी पहले से चल रहीं थीं .
खेल जारी था.
हाँ, तो उसमें क्या हुआ?
 मैंने कई बार चाल चली .
इनने टोका , ए क्या कर रही हो ?
मैं हँस कर रह गई .
और एक चाल चल दी.
 अपने पत्ते फेंककर ये मेरे पास चले आए 
अरे वाह, कमाल करती हो तुम..
तीन इक्कों ने खूब जिताया मुझे उस दिन .
मैं सबके सामनेअधिक बोलती नहीं .घर में सबसे छोटे हैं मेरे पति ,छोटे जेठजी से नौ साल छोटे .अम्माँ कहती हैं , जौ तो हमारो पेट-पुँछना है .

मैं भी कौन सा राग छेड़ कर बैठ गई. बड़ी लंबी गाथा है उन दिनों की जो आज के लिये अजनबी हो गए है .
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बुधवार, 11 दिसंबर 2019

जब अक्ल घास चरने निकल जाय...

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रात के दस बजकर अट्ठावन मिनट हो चुके हैं ,मुझे उत्सुकता है यह जानने की, कि  इस घड़ी में अंकों का रूप एकदम से कैसे बदल जाता है .
हुआ यह कि बेटे ने मेरे मुझसे पूछा ,'आपके बेडरूम में प्रोजेक्शन-क्लाक लगा दूँ?' 
'वह क्या होती है ?
बेड पर लेटे-लेटे देख सकती हैं कितने बजे हैं.ऊपर छत पर टाइम रिफ़्लेक्ट होता रहेगा .जब चाहें आधी आँख खोली और देख लिया.' 
'नहीं मुझे नहीं चाहिये फ़ालतू की चीज़ें, मैं मज़े से खुद देख लेती हूँ.' 
'अरे वाह, सुविधा है तो आराम उठाइये,' और उसने लाइट लगा कर कनेक्ट कर दी.
हल्का अँधेरा होते ही  कमरे की छतपर ए एम ,पी एम सहित समय के अंक उभऱ आते हैं.
सच में है तो मज़ेदार चीज़.समय देखने को हिलना भी नहीं पड़ता.  

 पलक झपकते संख्या कैसे बदल जाती है,पता ही नहीं लगता. बड़ा विस्मय होता है मुझे.
फिर मैंने निश्चय कर लिया आज देख कर ही रहूँगी.

उत्सुकता यह है कि  तत्क्षण बदलाव कैसे हो जाता है- अंक का भाग इधर से उधऱ खिसकता है या  दूसरा अंक एकदम  प्रकट होता है.
इस समय रात के दस अट्ठावन हो चुके हैं.लो,इधऱ मैं बोलती रही उधर  उनसठ हो गये. बस, अब देखकर ही रहूँगी. पलक भी नहीं झपकना, लगातार देखे जाना है .
सावधान हूँ पूरी तरह, कहीं चूक न जाऊँ. नहीं झपकूंगी,बिल्कुल नहीं.आज देख कर ही रहूँगी उनसठ के साठ एकदम कैसे हो जाते हैं . बराबर देख रही हूँ ,दृष्टि वहीं टिकी है.
  जबरन आँखें खोले हूँ .उफ्फ़, अभी तक नहीं हुए .एक मिनट कितना लंबा हो रहा  है .खोले हूँ आँखें बिलकुल नहीं झपने दीं. 
अरे, ये क्या हो गया? . उनसठ के दो ज़ीरो रह गए , साठ हुए बिना - दस के ग्यारह हो गए.  . मेरी सारी मेहनत बेकार!
अब समझ गई हूँ कि उनसठ के साठ कोई घड़ी नहीं करेगी ,मामला उनसठ पर ही रुक जाएगा ,परिणाम में मिलेंगे केवल दो शून्य. 

ओह, मेरी भी अक्ल घास चरने चली गई थी क्या ! 
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- प्रतिभा सक्सेना.

बुधवार, 13 नवंबर 2019

मैं, अश्वत्थामा बोल रहा हूँ - 3.

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द्वापर युग बीत गया. मानव के मान-मूल्यों के क्षरण की गाथा रच, मानव चरित्र का वह अद्भुत आख्यान,अपने अध्याय पूरे कर, छोड़ गया अंतर्चेतना के मंथन से प्राप्त नवनीत - गीता का जीवन-बोध!
संसार की उपेक्षा झेलते बड़ा हुआ मेरा मन कटु हो उठता है .एक पिता ही तो थे मेरे अपने   जो उस धर्मधारी की बलि चढ़ गये.

 तब आदर्शों से व्यावहारिकता का पलायन पहली बार देखा था.फिर तो सहस्राब्दियों लंबा जीवन जीते मानव मानों की घिसावट कितनी बार देख चुका. अपने विचारों में बार-बार वहीं पहुँच जाता हूँ. उस पुराने जीवन में जिसके लिये मुझमें उत्कट जिजीविषा थी , जिसे बहुत पास से देखता रहा था. प्रारंभ से तरसा था हर  वस्तु के लिए, जब राजसी वातावरण में गुरु-पुत्र का का मान पाकर प्रत्येक सुविधा का भागीदार बन गया,तब आगे बढ़ते ,अचानक ही सब छिन गया. पिता की नेह छाया के लपेटे में सब चला गया और दे गया अंतहीन, एकाकी अशान्त व्यथाएँ.


लगता है,वह महागाथा अभी पूरी नहीं हुई. मसि की तरल श्यामता लेखनी की जिह्वा रँग  देती है,पुकार उठती है ,'समर शेष है लेखक,स्याही सूखी नहीं है.' और तब कोई आकुल अंतर से नये पृष्ठ  जोड़ता हैं,जैसे  क्रमशः की एक और  आवृत्ति हुई हो.
  
 प्रायः जिन्हें महान् समझा  जाता है उनकी दुर्बलताएं उन पर आरोपित  प्रभामंडल में ओझल रह जाती हैं. लोक-धारणा अपने  विपरीत किसी बात को सहज स्वीकार नहीं पाती, जिसका प्रतिफल झेलते हैं, कुछ लपेटे में आए बेबस लोग ,जो अपनी बात न खुल कर कह पाते,न अपनी मान्यताएँ बदल पाते हैं. कभी कोई आवाज़ उठे भी तो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ किसे सुनाई दे!
जन साधारण  अपने आप में व्यस्त,जो सामने आ गया ठीक, न सच्चाई जानने में रुचि ,न अवकाश,और न साधन. वास्तविकता पर इतने आरोपण कि असली रंग जानना मुश्किल. शासक-शासित के बीच संवाद वाले तत्व,अपने हित या राजहित की करने में लीन ,जानते हैं कि जन में न इतनी क्षमता है ,न चेतना. विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं उसके पास .स्पष्ट दृष्टि ही नहीं जहाँ ,वहाँ विवेक की बात करना व्यर्थ है. अपने तात्कालिक हानि-लाभ,हित-अनहित की बात उसकी समझ में आती है, दूरगामी परिणाम में कोई रुचि नहीं उसकी.
यही तब था और अब भी वही. तब का साक्षी रहा  मैं  था और आज भी दर्शक रूप में विद्यमान हूँ ,

मेरा जीवन पूरा कहाँ हुआ. मेरे अतिरिक्त सब बीतता चला गया,  मेरा अपना कोई नहीं है अब. तब भी एक पिता ही तो थे. कैसे छल से जग-विदित धर्मात्मा ने उनकी  हत्या करवा दी. मेरे पिता, जो उन सबके मान्य गुरु थे, पूज्य थे. अपने गुरुत्व से  कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया था अपने शिष्यों को .उन्हीं के साथ ऐसा गर्हित कृत्य.अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु सच के खोल में  सफ़ेद झूठ बोल गये वे, वे जो धर्मराज कहलाते रहे  ?
 हाँ,उन सब की दुरभिसंधि रही थी, मानता हूँ. लेकिन जिसकी येन केन प्रकारेण स्वयं को सही सिद्ध करने का स्वभाव बन गया हो, वह दूसरों की  सुनता कहाँ है !
हाँ, वही युधिष्ठिर,जो  भाइयों को अपने अनुसार चलाता रहा था.
 अब भी याद है मुझे उस दिन दुःशासन ने कहा था-
 'और भाई तो फिर भी किसी न किसी अर्थ  के हैं ये किस अर्थ के? ' शकुनि हाथ नचाते बोल उठा था, 'द्यूत पुरुष हैं वे,कोई अवसर छोड़ेंगे नहीं.भाइयों की कौन सुनता है.सदा अपनी चलाता है वह महा अदूरदर्शी.'
दुर्योधन ने तुरत कहा  - 'वह पत्नी जो पूरी उसकी है ही नहीं, न नीति से न रीति से,जरा-सा चढ़ा दो तो उसे भी दाँव पर लगा देगा .'
शकुनि उछल पड़ा था,'क्या निरीक्षण शक्ति पाई है भागिनेय, रास्ता दिखा दिया तुमने.मिल गई चाबी उसे चलाने की...'
'क्या हुआ मामाश्री?'
'बस अब पूछो मत ,देखे जाओ. भाई कसमसाते रहें ,स्त्री कुढ़ती रहे पर ये वही करेगा जो झक चढ़ गई ,और किसी की सुनेगा नहीं.
अब जीजाश्री को साधे रहना तुम्हारा काम.'

दुर्योधन की बात मुझे  सही लगी. मुझे भी उनके सब कार्य अपनी सुख -सुविधा से प्रेरित लगते हैं, चाहे पांचाली का विभाजन हो चाहे द्यूत के दाँव .दूसरों को माध्यम बनाता स्वार्थी व्यक्ति,जिसमें दूरदर्शिता का लेश नहीं. उनका किया-धरा भुगतने को शेष चार हैं ही,उन्हें काहे की चिन्ता.हर ओर से सुरक्षित . बस अँगूठे दादा बने चारो अँगुलियां नचाते रहने के अभ्यस्त.

वह समय बीत चुका  है ,शेष रह गई कथाओं को आगत जन अपने अनुसार व्याख्यायित करेंगे. कोई निष्कर्ष निकालना असंभव,क्योंकि वह काल खण्ड,अपनी सीमाओं सहित सदा को पहुँच से बाहर हो चुका है. महाप्रयोगशाला की घड़ी के गत-आगत के बीच  डोलते हुये लोलक सा रह गया - मैं अश्वत्थामा!
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बुधवार, 30 अक्तूबर 2019

अपनी अपनी पैकिंग -


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बड़ा लोभी है मन ,कहीं सुन्दरता देखी नहीं कि अपने भीतर संजो लेने को उतावला हो उठता है. और तो और प्लास्टिक के सजीले पारदर्शी लिफ़ाफ़े जिसमें कोई आमंत्रण-अभिन्दन या कोई और वस्तु आई हो फेंकने को सहज तैयार नहीं होता. इसे लगता है कितना स्वच्छ है इसमें अपने लिखे-अधलिखे बिखरे पन्ने सहेज लें,जो अन्यथा दुष्प्राप्य हो जाते हैं. जब ऊपरसे ही दिख जायेगा तो खोज-बीन करते मूड चौपट होने की नौबत नहीं आएगी.
अब तो सामान्य प्रयोग का सामान, और-तो-और नित्य प्रयोग  की छोटी-मोटी वस्तुएँ भी ,बेचने के लिये ,ऐसी आकर्षक पैकिंग में रखी जाती हैं जैसे संग्रहणीय वस्तुएँ हों.ये नहीं कि कागज़ में लपेटा और पकड़ा दिया.पैकिंग के लिये मैंने हिन्दी भाषा का शब्द खोजा तो कोई पर्याय,या समानार्थक शब्द नहीं मिला. वैसे भी समय के साथ नया ट्रेंड चलने पर नये शब्दों की आवश्यकता पड़ती है,तो यही सही!
कभी-कभी तो स्थिति ऐसी, जैसे विगत-यौवना को दुल्हन बना कर उस पर आवरण डाल दिया गया हो.अंदर का माल का पता ही नहीं चलता कि कैसा है.जैसा है किस्मत पर संतोष करिये. व्यवसायी का उद्देश्य कि बैग कहीं से पारदर्शी न छूटे जो अंदर की अस्लियत देख गाहक बिदक जाय. तो यह उपाय सबसे आसान. सावधानी इतनी कि कहीं जरा सी  संध से भंडाफोड़ न हो जाय. 
कितना पैसा खर्च होता होगा इस टीम-टाम में !
लेकिन पुराना माल भी तो निकालना आवश्यक है.
हाँ तो ,सामग्री से अधिक महत्व है उसकी पैकिंग का. अब वे दिन लद गए कि दूकान पर गए, हाथ में लेकर माल परखा और  सामने बैग में नाप-जोख कर डलवा लिया. 
हर क्षेत्र में यही हाल है अब तो. फ़ोटो में जो सुन्दर दिखे, वास्तविकता में वहाँ  कितना मेकप थोपा गया है आप नहीं जान सकते .समाचार पत्र में जो पढ़ रहे हैं उसके बैकग्राउंड में क्या-क्या समाया है कहीं स्पष्ट नहीं किया जायेगा. क्योंकि सामान से अधिक महत्व उसकी पैकिंग का है उसे मन लुभाऊ होना चाहिये.  ठीक भी है सामान कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाएगा पैकिंग रहेगी चिरकाल तक. इसीलये गाहक को लुभाने में ऊपरी टीम-टाम अर्थात् पैकिंग का बड़ा महत्व है.  
केवल व्यवसायी ही नही लाभ के लिये ये उपाय सभी आज़माते हैं. उनके व्यापार का प्रश्न है तो इनके सहचार की ये रीत है. अपने स्वयं को एक आवरण के साथ प्रस्तुत करना- पैंकिंग नहीं तो और क्या है? और हम कौन इस से अलग हैं, हम सब पैकिंग में रहनवाले लोग हैं. जो जानते हैं आवरण ऊपरी वस्तु है ,आवश्यकता पड़ने पर बदला भी जा सकता है. 
हम वैसे के वैसे रहेंगे. किसी को आभास तक नहीं होगा कि अंदर क्या-क्या भरा है. 
ओढ़े रहिये चाहे जितनी पैकिंग ,अंदर के माल पर कोई आँच नहीं, बिलकुल निश्चिंत रहिये!
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रविवार, 20 अक्तूबर 2019

अक्ल की बाढ़

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यह अक्ल नाम की बला जो इन्सान के साथ जुड़ी है बड़ी फ़ालतू चीज़ है. बाबा आदम के उन जन्नतवाले दिनों में इसका  नामोनिशान नहीं था. मुसम्मात हव्वा की प्रेरणा से अक्ल का संचार हुआ, परिणामस्वरूप हाथ आई  ख़ुदा से रुस्वाई. इसीलिये इंसान को  अक्ल आये यह कुछ को तो बर्दाश्त ही नहीं, उनका कहना है इंसान को खुद सोचने-विचारने की जरूरत ही नहीं . ख़बरदार! अपनी अक्ल कहीं भिड़ाई तो समझो गए दोज़ख में. और अक्ल के पीछे लट्ठ लिये घूमते हैं.
 मुझे अक्ल की दाढ़ ने बड़ा परेशान किया था. जब अच्छी तरह सिर उठा चुकी तब पता लगा. समझ में नहीं आता जब अक्ल आने की उम्र होती है तब यह  क्यों नहीं निकलती.पढ़ाई और एक्ज़ाम का समय था तब  हाथ नहीं आती थी बाद मे अचानक निकल कर तमाशे दिखाने लगी  .
अति सर्वत्र वर्जयेत् - मानी हुई बात है. अक्ल बढ़ेगी तो कुछ न कुछ गज़ब करेगी. तो इस अक्ल की दाढ़ को क्या कहा जाय?  अचानक कोई चीज़ बढ़ जाय तो बैलेंस बिगड़ जाता है. केवल अक्लमंद हो यह किसी के बस में नहीं - बैलेंस बराबर करने को बेवकूफ़ियाँ  लगी-लिपटी रहती हैं.सामने आने से कितना भी रोको ,जरा ढील पाते ही पाते ही प्रकट हो जाती हैं .
फ़ालतू की अक्ल ही सारी खुराफ़ातों की जड़ है जीना हराम कर देती है औरों का और अपना भी अचानक बाढ़ आती है तो दिमाग़ का बैलेंस बिगड़ने लगता है, अनायास अजीब वक्तव्य मुखर होने लगते हैं. एक उदाहरण लीजिए-   छत्तीसगढ़ के एक मंत्री महोदय का बैग चोरी हो गया. नाराज होते हुए उन्होंने कह डाला, ‘‘मोदी जी रेलवे में मंत्रियों के बैग चोरी करवा रहे हैं। 100 दिन के कार्यकाल पूरे होने की ये उनकी उपलब्धि है.'' यही कहलाता है- अक्ल का विस्फोट .
 वैसे तो दिमाग़ की कमी नहीं इस दुनिया में,ढूँढ़ने चलो हज़ार मिलते हैं, अपने बिहार की खासूसियतें तो जग-ज़ाहिर हैं. वहीं के एक मुख्यमंत्री जी की  ज़ुबान ज़रा फिसल गई ,फिर क्या था ,मीडियावाले तो इसी  ताक में रहते हैं. ले उड़े. तमाशा बनने लगा तो महोदय भड़क गए, 'बोले हमें  गलत ढंग से पेश किया गया.' खिसियाहट में पत्रकारों को उचक्का कह डाला.यों उनका कथन ग़लत भी नहीं था -ये लोग भी तो कच्ची-पक्की हर बात उचक लेते हैं. मंत्री जी आवेश में थे ही, आगे कहते चले गए,'हम तो लात खाने के लिए ही बैठे हैं, कोई इधर से मारता है तो कोई उधर से..' ज़ुबान कुबूलती चली गई. सच ही तो बोल रहे थे - बेचारे!
जानवरों में नहीं होती . कैसी शान्ति से रहते हैं .और ये फ़ालतू अक्लवाले !कभी इधर की कमी निकाली कभी उधर की चूक. न अपने को चैन, न दूसरों को चैन लेने दें.   .
अरे, पर मैं ये सब क्यों कहे जा रही हूँ? दुनिया जैसी है, वैसी रहेगी हमारे रोने-झींकने से कोई बदल थोड़े न जायगी.
अपने को क्या!

कबीर सही कह गए हैं -
'सुखिया सब संसार है खाये अरु सोवे ,
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै.'
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