मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

राग-विराग - 9.

*

वापसी में रत्ना बहुत चुप-चुप थी .

 नन्ददास बत करने का प्रयत्न करते, तो हाँ,हूँ में उत्तर दे देती.

वे उसकी मनस्थिति समझ रहे थे..

कुछ देर चुप रह कर उन्होंने नया विषय छेड़ा -

'क्यों भौजी,तुम्हारे पिता ने तुम्हारी शिक्षा पर खूब ध्यान दिया?'

रत्नावली उनकी ओर देखने लगी

'वैसे तो लोग लड़कियों की शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं देते ,जानते हैं पढ़-लिख कर क्या करेगी, अंततः गिरस्थी करना है सो थोड़ा-बहुत पढ़ा कर छुट्टी करते हैं.पर भौजी तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें कितना आगे बढ़ा दिया, पूरी विदुषी बना दिया.' .

रत्ना  के मुख पर चमक आ गई थी  

'हाँ, देवर जी, मेरे पिता का विचार था लड़की की रुचि है तो उसको पूरी शिक्षा मिलनी चाहिये..'कुछ रुक कर बोली, 'माँ कहती भी थी उसे गृहस्थी ही तो करनी है कौन शास्त्रार्थ करना है .उनका उत्तर होता ,क्यों शास्त्रार्थ नहीं कर सकती क्या?भारती का नाम नहीं सुना ?मण्डन मिश्र से कम थी क्या! उसका चाव भी देखो ,उसकी बुद्धि देखो ...'

''तो तुम शुरू से तीव्र बुद्धि रहीँ.. ..'

'मेरा बचपन कुछ अलग-सा रहा. गुड़ियों के खेल मेरा मन नहीं बाँध पाते थे. घर में ग्रंथों पर विवेचन होता मैं ,खेलना छोड़ कर वहाँ जा बैठती थी. देवर जी, बचपन का जीवन में बहुत महत्व होता है ...,संस्कारों की नींव पड़ती है ,सबंधों को पहचानना आता है..मुझे तुम्हारे दद्दा के लिए बहुत लगता है - उन्हें तब भटकना पड़ा. अपनापन पाने को कितना तरसे हैं. वे दुःखद यादें अब भी उनके मन को विचलित करती हैं.' . ..

नन्ददास को सब याद है ,यह भी याद है कि दीनबंधु पाठक अपनी पुत्री को तुलसी से ब्याह कर परम संतुष्ट थे. ,बोले थे -जैसे मण्डन मिश्र और भारती ,ऐसे ही ये युगल- तुलसी और रत्ना .हाँ, कितने अनुरूप ,रूप-गुण विद्या-बुद्धि में सब प्रकार समतुल्य.

कैसी फबती है जोड़ी!

 नज़र लगी थी लोगों की उस पर .

रत्ना से संवाद का तारतम्य जोड़ते हुए बोले.

'हाँ भौजी, लेकिन फिर भी उनने बहुत कर लिया.' 

'बहुत अध्यवसायी हैं वे,क्या स्मरणशक्ति पाई है ,और बुद्धि कितनी तीक्ष्ण .पर कुछ संस्कार बचपन से मिलते हैं...परिवारजनों के साथ रह कर और भी बहुत कुछ..'  कहते-कहते  रत्ना चुप हो गई.

कुछ देर दोनों चुप रहे..नन्ददास ने फिर उनके पीहर की बातें छेड़ दीं. 

रत्ना को याद है, पिता ने कहा था,' अपनी दीप्तिमती कन्या के लिये तुलसी जैसा वर पाकर मैं  संतुष्ट हूँ.'

उसके गौना होने तक उसकी शिक्षा में कोई कसर नहीं रहने दी. 

रत्ना भी पूरे मनोयोग से पढ़ती और ग्रहण कर लेती ,माँ कहतीं उसे गृहस्थी के काम सीखने दो.' 

पिता का उत्तर था ,'सब सीख लेगी .कौन सास-ननद बैठी हैं उसका कौशल देखने को? जमाई के साथ रहना है उन्हीं के अनुरूप बन कर रहे.'

रत्ना बताये जा रही थी

'मेरे पिता! हाँ, मेरे पिता ने मुझ पर बहुत ध्यान दिया. कहते थे मेरी बेटी किसी से कम नहीं है.मेरी रुचि भी थी, ईश्वर कृपा से याद भी जल्दी हो जाता था ..बड़े प्रसन्न होते थे जब मैं धड़ाधड़ उनके सामने पाठ सुनाती थी.

वे कहते थे प्रारंभ से बीज पड़ा है तो फलेगा जरूर ,और मनचाहे पात्र के रूप में अनुकूल परिस्थितियाँ उन्होंने खोज भी लीं.'

रत्ना ही बोलती रही ,' पति, लाखों में एक मिले. उनके सान्निध्य में, उनकी विद्वत्ता और ज्ञान का अंश मैं भी पाना चहती थी. पर उन्हें इतना अवकाश कहाँ रहा!' एक गहरी साँस निकल गई .

 नन्ददास ने कहा, ' मुझे तुम्हारे ब्याह की याद है -

'कुँवर-कलेवा पर तुम्हारी सखियाँ छेड़ रहीं थीं,जमाई राजा ,गुमान मत करना हमारी रतन भी कम नहीं है. कविताई करती है ,छंद-पिंगल जानती है.

वो भूरी आँखोंवाली लड़की थी न खूब बोल रही थी.'

'अच्छा ,गौरी. हाँ, उसे भी पढ़ने-लिखने का चाव था .'..

.'अब कहाँ है वह?' 

'बड़ी दूर ब्याह गई. एक बार मिली थी. बहुत मन करता था मिलने का पर, मै मायके जा ही कहाँ पाती थी.' 

नन्ददास ने टूटती कड़ी जोड़ी, 'कह रही थी ,'दायज में अपने साथ पुस्तकें भी ले कर आयेगी हमारी रतन. तुम्हारे घऱ.

'इस पर कोई बोला - अच्छा है दोनों पढ़ते-पढ़ाते रहेंगे.'

'अरे, इतने साल हो गये ब्याह को.  तुम तो इतने छोटे थे, अभी तक याद है?'

'इतना भी छोटा नहीं था और तुम्हारी शादी तो मेरे लिए खास थी. '

' तुम्हें पता है भौजी, किस ने टोका था - कोहबर के खेल में सावधान रहना दोनों वहीं शास्त्रार्थ न करने लगें!'  

सब लोग खूब हँसे थे.

'सखियाँ मेरे भाग्य पर सिहाती थीं. कहतीं रतन, तुझे तो खुला आकाश मिल गया.' 

रत्नावली का ध्यान अपने विवाहित जीवन पर चला गया -

दस बरस से अधिक पति के साथ अंतरंग रही थी, सोचती थी ,बचपन से तरसा हुआ मन संतुष्ट हो जाये ,अन्य सारे सम्बन्धों की कमी पूरी करना चाहते हैं. विद्वद्चर्चाएं करने का अवकाश कहाँ है उनके पास?  मैं चाहती थी प्रसन्न रहें वे. सुस्वादु भोजन और  प्रेम भरा व्यवहार उन्हें तुष्ट रखे ,तन-मन को तृप्त हो लेने दो,कहाँ भागे जा रहे हैं?'

पर मन तृप्त हुआ है कभी?

प्रतीक्षा ही करती रही रत्ना और समय हाथ से निकल गया.

'क्या सोच रही हो?

देवर जी, थोड़ा-सा अवकाश चाहा था मैंने जिसमें मन के हाथपाव फैला सकूँ. ' 

समझने के प्रयत्न में नन्ददास ने अपना सिर झटका. पल भर में कौंध गया ,दद्दू भौजी से दूर बिलकुल नहीं रह सकते थे.

'थोड़ा अवकाश चाहती थी, लेकिन पूरी छुट्टी हो गई, वे चले गये. यह तो कल्पना भी नहीं की थी कभी.'

नन्ददास क्या कहें? 

उदास-सी चुप्पी छा गई.

घर पहुँच कर रत्ना ने कहा था,' देवर जी, बड़ी बेर हो गई ,भोजन कर के जाना, और हाँ ,चन्दू को भी बुला लो.' 

मर्यादा का कितना ध्यान रखती हैं- नन्ददास ने सोचा था.

उन्हें याद आया रत्ना ने काशी में रहने की इच्छा प्रकट की थी, कहा था,' अपनी रिक्तता भरने के लिए, मन करता है काशी में निवास करूँ, जीवन सार्थक कर लूँ.  परिवार के दायित्व होते तो अपना ध्यान भी न आता. अब यहाँ रहूँ कि काशी में, किसे अंतर पड़ेगा?.. और मैं तर जाऊँगी.'

लेकिन दद्दू को यह उचित नहीं लगा. उन्हें लगा यहाँ सब जाना-पहचाना है, पुराने सम्बन्ध है. नई जगह पता नहीं कैसा क्या हो? रत्ना घर में ही रही है बाहर की दुनिया में कैसे क्या करेगी? और काशी में रह कर करेगी क्या? नहीं-नहीं, वहीं ठीक है वह. व्यर्थ की बातें सोचती है.' 

 फिर कह उठे, ' और मेरी तो सारी  निश्चिंती समाप्त समझो! नहीं नन्दू, मना कर देना, समझा देना उसे!'

नन्ददास के मन में पछतावा जागा,' ओह, भौजी के मन में काशी-सेवन की लालसा मैंने ही जगाई थी. 

'जब जाता था, सुना आता था, दद्दू की कैसे लोगों में पहुँच है, कैसे-कैसे विद्वान, पण्डित,शास्त्र के ज्ञाता हैं जिनकी बातों से मन को समाधान मिलता है.  उनसे कहता था- भौजी ,मैंने भी काशी में रह कर विद्याध्ययन किया है. दद्दू की तो बात ही क्या! गुरु नरहर्यानन्द और शेष सनातन जैसे, जिसे मिल जायँ वह तो लोहा भी कंचन बन जाये, फिर दद्दू तो सजग-सचेत तीव्र बुद्धि-संपन्न हैं, समर्थ हैं. सच में जो ऐसे महापुरुषों के संसर्ग में आये, उसका कल्याण हो जाये!

'कभी गंगा, कभी माँ अन्नपूर्णा और बाबा विश्वनाथ और भी बहुत कुछ सुना-सुना कर पुण्यपुरी काशी का माहात्म्य सुनाता रहता था. और अब, जब कामना जाग गई तो सारी राहें बन्द पड़ी हैं. ज्ञान की पिपासा है उनमें ,गृहस्थी में रमी होतीं ,संतान होती तो ध्यान उधर बँट जाता.

दद्दा कुछ सोचते क्यों नहीं? 

'बुद्धिमती पत्नी भाती है, पर उसका भी अपना व्यक्तित्व अपनी वाँछाएँ हो सकती हैं यह भान क्यों नहीं होता?'

 वे सोच में पड़े थे.

रत्नावली रसोई समेटने का उपक्रम कर रही थी.

रात्रि की अँधियारी घिर आई थी.  

नन्ददास उठते-उठते बोले .'ये चन्दू कहाँ ग़ायब हो गया?'

उसे आवाज़ लगा दी. जाने को खड़े हो गए. जैसे एकदम कुछ याद आया हो , रत्ना की ओर उन्मुख हो पूछा,' अरे हो भौजी, विश्वनाथ बाबा से क्या माँगा तुमने?'

'मुझे कुछ अधिक नहीं चाहिये.'

'फिर भी कुछ प्रार्थना तो की होगी. सच्ची-सच्ची बताना. देखो,भगवान की बात पर

झूठ मत बोलना.' .

'मेरी प्रार्थना? सुनोगे - हर बार एक ही प्रार्थना करती हूँ.'

'बताओ ना.' 

'तो सुनो ,मैं अपने ईश्वर से माँगती हूँ - अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्, देहान्ते तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्!'

*

(क्रमशः)

बुधवार, 24 मार्च 2021

राग-विराग - 8.

राग-विराग - 8.

*

उस दिन रत्नावली ने कहा था ,'मै हूँ न तुम्हारे साथ.' 

'हाँ, तुम मेरे साथ हो.'

पर यहाँ आकर वे हार जाते हैं .अपनी बात कैसे कहें?

 नहीं, नहीं कह सकते.

रत्नावली से किसी तरह नहीं कह सकते 

मन में बड़े वेग से उमड़ता है - 'यहाँ मैं कुछ नहीं कर सकता .मैं नितान्त लाचार हूँ.

 जिस कुघड़ी में जन्मा उसका कोई उपचार नहीं. जो मेरा होगा छिन जायेगा यही देखता आया हूँ. जो मेरे अपने थे काल के ग्रास बन गये .जन्म से भटका हूँ. यही लिखा कर लाया हूँ.'.

मन ही मन कहते हैं ,'नहीं रतन अब नहीं. तुमसे नहीं कह सकता पर तुम्हें  खोना भी नहीं चाहता. मैं निरुपाय हूँ.'

और वे चले गये थे ,रतन से बिना मिले. 

नन्ददास हैं यहाँ, रतन की खोज-खबर रखते हैं, स्थिति सँभाल लेंगे.

रतन ने कहा था - 'राम ने जो दिया, सिर झुका कर ग्रहण कर लिया, उनकी शरण में जाकर उस सब से निस्तार पा लिया. अब काहे का संताप?'

साथ में यह भी कहा

मैं हूँ न तुम्हारे साथ. तुम्हारा  ध्यान रखने को. काहे की चिन्ता?'

और यदि रत्ना भी... नहीं,नहीं. !

और वह उन की थाह  पाना चाहती है. मन को पढ़ना चाहती है. 

उसकी दृष्टि तुलसी अपने मुख पर अनुभव करते हैं.

'क्या देख रही हो, मेरी विपन्नता?'

'नहीं, देख रही हूँ मेरी पूज्या सास कैसी सुन्दर रही होंगी, सब कहते हैं न कि तुम उनकी अनुहार पर हो. तुम्हारा रंग तो,रगड़ खा-खा कर बाहर घूम-घूम कर कुछ झँवरा गया है लेकिन..वे तो ... '

उस दिन  तुलसी जब पूर्व-जीवन की स्मृतियों में भटक रहे थे, बातों बातों में रत्ना के सामने मन की तहें खोलने लगे .

 नीमवाली ताई से उन्होंने  पूछा था, 'मेरी माँ कैसी थी ,ताई'?

'साक्षात् देवी ,इतने कष्टों में रही कभी शिकायत नहीं.

'तेरे मुख में उसकी झलक है. माँ से बहुत मिलता है रे! मुझे तो उसी का ध्यान आता है तुझे  देख कर...'

कई बार बड़े ध्यान से अपना मुख देखते हैं तुलसी. हाँ, दर्पण में देखते हैं,अपने प्रतिबिम्ब के पार खोजते हैं भाल पर सिन्दूर-बिन्दु धारे एक वत्सल मुख को. अंकन झिलमिला कर खो जाते हैं, सब अस्पष्ट रह जाता है.

 रत्ना के नयनों में भीगापन उतर आता है.

स्तब्ध रह जाती है, गहन उदासी की छाया मुखमण्डल पर छा जाती है. मौन सुनती रहती है- भूख से व्याकुल बालक जब किसी द्वार याचना करने जाता तो लोगों की आँखों में कैसे-कैसे भाव तैर जाते थे. सहमा सा, अपना हाथ बढ़ा देता, रूखा-सूखा कुछ डाल दिया जाता, उसके लिये वही छप्पन-भोग होता था, बस एक नीम के नीचेवाली ताई प्यार से कुछ पकड़ा देती -'अरे, बाम्हन का छोरा है ,भाग का दोस कि अनाथ बना भटक रहा है.'

लोग कहते, 'अभागा है, माँ तो जनमते ही सिधार गई.'

'अरे, अभुक्तमूल में जन्मा है,जो इसका अपना होगा ,उस पर संकट पड़ेगा.'

बालक सुनता है ,चुप रहता है. 

कुछ नहीं कर सकता वह 

वे बातें करती है -  

'राम,राम, कैसी साध्वी औरत रही. कभी किसी से किसी की बुराई-भलाई में नहीं पड़ी.  जैसा था चुपचापै गुज़र करती रही.' 

रंबोला को देखो तो माँ का मुख याद आ जाता है, कितना मिलता जुलता है, डील-डौल बाप पर जाता लगता है.' .

'आँखें बिलकुल माँ की पाई हैं.'.

'माँ ,ओ माँ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,' -अंतर चीख़ उठता,' कैसी थी मेरी माँ?' 

उदास बालक मन पर भारी बोझ लिये आगे चल देता,

हताशा छा जाती.कहाँ जा कर रहे? क्या करे? ..पेट की आग चैन नहीं लेने देती .

भूल नहीं पाता वे तीखे वचन ,बेधती निगाहें ..

आज स्थिति बदल गई है. वह सामर्थ्य पा गया है उसे साथी मिल गया है .

रत्ना कहती है तुलसी से,'जहाँ अपना बस नहीं, अपना कोई दोष नहीं उसके लिये हम उत्तरदायी नहीं ,उस पर दुःख और पछतावा कैसा?'.

'बचपन पर किसका बस. सब दूसरों के बस में होते हैं .तुम्हारे करने को कुछ नहीं था, तुम्हारा बस चला तुमने कर के दिखा दिया.

'गुरु ने पहचान ली थी तुम्हारी सामर्थ्य.'

 'हाँ, आज जो कुछ हूँ उन्ही के चरणों की कृपा है.'

'पात्र की उपयुक्तता भी एक कारण है.'

'तुम में निहित था जो कुछ, उसे सामने ला कर निखार दिया उन्होंने. पारखी थे वे. गुरु का महत्व किसी प्रकार कम नहीं.'

''अब काहे का पछतावा?' .

पर जो बात निरन्तर सालती है वही नहीं कह पाते .

मन ही मन समझते हैं - 'हानि-लाभ,जीवन-मरण ,जस-अपजस विधि हाथ! 

अदृष्ट के अपने लेख हैं , वहाँ कोई  उपाय नहीं चलता. 

किसी का कोई बस नहीं.

कभी तुलसी को लगता है रत्ना को अकेला छोड़ दिया, कैसे क्या करती होगी? अपराध-बोध सालता है. मन को समझा लेते हैं ,बुद्धिमती है. किसी-न किसी प्रकार निभा लेगी, मनाते हैं वह सकुशल रहे. 

मेरे मानस में प्रभु राम, माँ-जानकी को नहीं त्यागेंगे ,स्वयं को एकाकी नहीं कर लेंगे. वे चिर-काल साथ रहेंगे, अय़ोध्या के राज-सिंहासन पर और लोक-मानस में, दोनों युग-युग राज करेंगे!

*

(क्रमशः)












*

सोमवार, 8 मार्च 2021

राग-विराग - 7.

*

जब से रत्ना ने तुलसी का सन्देश पाया है,मनस्थिति बदल गई है.कागज़ पर सुन्दर हस्तलिपि में अंकित वे गहरे नीले अक्षर जितनी बार देखती है. हर बार नये से लगते हैं .'रतन समुझि जिन विलग मोहि ..'  -,नन्हा-सा सन्देश  रत्ना के मानस में उछाह भर देता है, मन ही मन दोहराती है.  फिर-फिर पढ़ती है. 

- कितना विरल संयोग कि  समान बौद्धिक स्तर के, एक ही आस्था से संचालित समान विचारधारा के दो प्राणी पति-पत्नी बने .एक सूत्र से संयोजित  दोनों ,गार्हस्थृ धर्म का अनुसरण कर एक नया क्षितिज खोजते जीवन अधिक समृद्ध होता. अंतर से  पुकार उठती है. ‘चल, मिल कर समाधान कर ले, सारे  भ्रम दूर हो जायें.’

उनका तो विद्वानों से वर्तलाप होता होगा ,संत-समागम चलता होगा, अपने कुछ अनुभव मुझसे भी  साझा कर लेते. मैं उनकी सहधर्मिणी हो कर, यहाँ सबसे  अलग-थलग निरुद्देश्य पड़ी हूँ 

मन में तर्क-वितर्क चलते हैं राम की भक्ति, संसार से विमुख नहीं करती, लौकिक जीवन के लिये एक कसौटी बन जाती है. सांसारिकता से कोई अंतर्विरोध नहीं. गृहस्थ के लिये तो राम-भक्ति ही ग्रहणीय है संयम और संतुलन रखते हुए आदर्शों के निर्वाह का संकल्प. राम की भक्ति सदाचार और निस्पृहता का सन्देश देती है. सांसारिक संबंधों रमणीयता ,नैतिकता का उत्कर्ष भावों की उज्ज्वलता, परस्पर निष्ठा और विश्वास और भी कितनी कोमल संवेदनाएँ  समाई है ..

एक बार उनसे भेंट हो जाय. मन को समाधान मिल जाय. 

सियाराममय जग को असार कैसे माना जा सकता है! वह तो विस्तृत कर्मक्षेत्र है. 

पति से पूछना चाहती है रत्नावली कि राम-भक्ति संसार से विरत करने के लिये,या उसमें रह कर उसे अधिक संगत ,संतुलित और सुनियोजित की आयोजना हेतु ?

रत्ना का प्रबुद्ध मन तुलसी से विमर्श करना चाहता है .लेकिन समय व्यर्थ बीतता चला जाता . क्या ऐसे ही जनम बीत जाएगा ? नारी को कैसा बनाया प्रभो,एक ओर बहुत समर्थ और दूसरी ओर एकदम बेबस. बाहरी संसार में कोई पैठ नहीं औरों पर निर्भर रहना ही नियति बन गया है. .

  नन्हा-सा सन्देश रत्ना के मानस में फिर-फिर उछाह भर देता है .''रतन समुझि जिन विलग मोहि ..' एक सूत्र दोनों को निरंतर जोड़े है. मगन मन गा उठता है -

 'राम जासु हिरदे बसत, सो प्रिय मम उर धाम।

एक बसत दोऊ बसै, रतन भाग अभिराम।।'

मनोबल बढ़ चला है. अपनी बात किससे कहे!! तुलसी से संवाद करना चाहती है. पर कहाँ मिलेंगे वह!

निरन्तर उठते हुये अनेक प्रश्न रत्ना के मन में हैं पर ऐसा कोई नहीं जिससे पूछ सके. अकेले समझ नहीं पाती, कहाँ सही हूँ कहाँ गलत. कौन बताए! काश,एक दूसरे के पूरक बन बन सके होते. दोनों की एक ही लगन -फिर यह अंतराल क्यों? वह भी खुल कर अपने मन की कहें, खाई भर जाये. उनकी उपलब्धियों का कुछ अंश मुझे भी मिले. 

बार-बार रत्ना के मानस में गूँजता है ''रतन समुझि जिन विलग..'

और कुछ देर को मन सघन आश्वस्ति से भर उठता है. नन्ददास के प्रति कृतज्ञ है वह.

उन्हीं से कभी-कभी समाचार मिल जाते हैं .पर उनका आना ही कितना होता है .

चंदहास से प्रायः ही मिलना हो जाता है.

विदित हुआ तुलसी का डेरा इन दिनों काशी में है,

मिलने की लालसा तीव्र होती जा रही है. एक बार मिल कर अपना समाधान करना चाहती है. मन की शंकाएँ दूर करना चाहती है.

रत्ना ने नन्ददास से पूछा था -

‘मेरे लिये पूछते हैं कभी?’

‘उन्हें चिन्ता रहती है ,तुम्हारी कुशलता बताता हूँ तो उनके मुख पर कैसा भाव छा जाता है भौजी, मैं बता नहीं सकता.’  

नन्ददास और चन्दहास जानते हैं उसके मन की इच्छा. पूरी सहानुभूति भी है उन्हें.लेकिन द्विधा में पड़ जाते हैं 

नन्ददास सोचते हैं इस विषय में दद्दा से बात करें . लेकिन डरते हैं कहीं मना कर दिया तो..!

  उन्हें याद है एक बार तुलसी ने कहा था,' नन्दू यह मन ऐसा ही है ,कस कर रखना पड़ता है नहीं तो जरा ढील पाते ही अपने लिये कहीँ कोई सँध खोज लेता है.

‘जिस जीवन को  पीछे छोड़ आय़ा हूँ अब उस जीवन के विषय में सोचना  नहीं चाहता....

'राम की लौ में वह सब छोड़ आया हूँ ,नन्दू ,अभिमानवश या सुख की -आनन्द की खोज में नहीं.'

दद्दा का मन वे नहीं समझ पाते,.सोच में पड़ जाते .हैं

.रत्नावली एकदम चुप है.

नन्ददास ने बताया था -

‘मैंने उनसे पूछा था दद्दा, कुछ दिन शान्तिपूर्वक एक स्थान पर निवास क्यों नहीं करते? 

कहने लगे जहाँ जहाँ राम के चरण पड़े वहाँ की धूल सिर धर  राम के चरित को गुन रहा हूँ.’ 

अपने ही कहे बोल रत्ना के कानों में बज उठे.अन्तर चीत्कार कर उठा, हाँ, हाँ,तूने ही  कहा था उनके चरण अनुसरे बिना, चरित गुने बिना कैसे राम की थाह मिले ! 

आशा-निराशा में दिन बीतते जाते हैं.

एकान्त उदासी के प्रहरों में निराशा घिर आती है. मन में गहरा पछतावा उठता है, और स्त्रियों को पति के अपने प्रति प्रेम का ,अभिमान होता है कि मेरे प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं ? उन्हीं बातों से मैं अनखाने लगती हूँ .

मैं ऐसी क्यों हूँ ? .

.और फिर अजानी शंकाएँ उठने लगती हैं.

अपने को समझाती है - रतन समुझि जिन विलग मोंहि.

 मैं उनसे अलग नहीं हूँ 

सूचनाएं मिल रही हैं रत्ना को. लगा अनुकूल अवसर आ गया .

भौजी का आग्रह और चंदहास का सहयोग ,नन्ददास की अनुकूलता भी उन्हें प्राप्त है.

रत्नावली के काशी पहुँचने का डौल बन गया. 

*

उस दिन तुलसी ने खीझ कर कह दिया था -

'तो अब तुम्हीं जानो.' 

एकदम नन्ददास का .चेहरा उतर गया था.

फिर मन ने समझाया - 

ये मुझे हड़का रहे हैं ,ऐसा कैसे कर सकते हैं भौजी के साथ ? 

 इतना कठोर हिया नहीं हो सकता!

हो लें मुझ पर गुस्सा ,पहले पूछा नहीं न! इसीलिए...

मन में खटका फिर भी बना रहा.

सुबह-सुवह चक्कर लगाया. डेरे में सन्नाटा पड़ा था.

ओह , चले गये ! 

रत्नावली के यहाँ आने में अप्रत्यक्ष रूप से उनकी भूमिका रही थी. पर क्या सोचा था और क्या हो गया!

 उलझन में पड़े वहीं चक्कर काट रहे हैं...

इतने में देखा हाथ में थैली लिये भौजी चली आ रही हैं.उन्हें देख समीप चली आईँ 

पालागन कर नन्दू बोले,’ रास्ता ठीक रहा?’ .

‘हाँ ,यहाँ सब ठीक है ?’

चारों ओर देख रही हैं.

नन्ददास समझ गये ,कहने लगे,

‘वैसे भौजी ,यह स्थान आपके लिये ठीक नहीं .कहने को साधु संत हैं लेकिन इनके कुण्ठित मनों में दुनिया की कुत्सायें भरी हैं.’ 

‘कौन मुझे यहाँ रहना है!’

क्या कहें .कुछ तो भी बोले जा रहे हैं,

‘दद्दा कहते हैं  जितना समझ में आता है उतना ही समझने को को रह जाता है. आत्म-शुद्धि हेतु तीर्थों का सेवन करता हूँ  साधु-संगति का लाभ पाने का प्रयास करता हूँ.

कैसे एक जगह टिक सकता हूँ?’ 

रत्नावली मौन सुन रही है.

असहाय से खड़े रहे कुछ देर 

‘भौजी, दद्दा को जाना था.’

हत्बुद्ध-सी बोल उठी,' क्या ?वे यहाँ नहीं है?’

‘वे चले गये.’

वैसी की वैसी खड़ी रह गई, एकदम सन्न!

फिर बोल फूटे,

‘देवर जी सच्ची बताओ तुमने उन्हें कब  बताया था ?’

कबूल दिया – ‘कल.’

‘और वे चले गय!. मुझे अपने मार्ग की बाधा समझ कर?.....

क्या बोले थे वे?’ 

‘वे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहते थे जहाँ लोगों की कुत्सा भरी निगाहें हर पल देखती रहें .तुम्हारे लिये दस तरह की बातें उठें .

‘इतनी बड़ी नगरी में छोटी-सी भेंट के लिए कहीं निरापद  स्थान  नहीं रहा?’

‘यहाँ के अधिकतर साधु-सन्न्यासी , जानती हो –दद्दा अच्छी  तरह  समझ गये हैं.'नारि मुई गृह संपति नासी, मूड़ मुड़ाए भए सन्न्यासी'. मानसिकता वही है.’

‘जिसकी जैसी वृत्ति होगी उसी राह जायेगा -उन सब के लिये पत्नी के न होने से कोई रास्ता बंद नहीं होता ,और भी राहें खुल जाती हैं पर अकेली स्त्री के लिए सारे रास्ते बन्द  हो जाते हैं , वहीं पड़े-पड़े दिन काट दो.उनके लिये सब विहित,  उसके लिये सब वर्जित .. 

‘हमारा संबंध ऐसा कच्चा  तो नहीं था कि सामने  आ कर 

 मन की बात सीधे  कह क्यों  नहीं सके.

‘मेरे लिये यहाँ तक आ पाना कितना कठिन था और वे जान कर एकदम चले गये!

 कुछ तो होगा उनके मन में  मुझसे कह जाते.

एक ही मार्ग के राही -सहयोगिनी बनना संभव नहीं  हो सका,तो ,उनकी दुर्बलता नहीं बनूँगी.’ ,नन्ददास असहाय से हो उठे. मुख से निकला ,’अरे हाँ, कहीं और मिल लेते.’

‘नहीं, नहीं उन्हें दोष मत दो ,मानव स्वभाव बड़ा विचित्र होता  है.’

‘अपनी गृहस्थी के सपने देखना तो कब का छोड़ दिया था,थोड़ा मानसिक संबल ..मिल जाता ,.

उनके सत्संग की, ज्ञान की ऊँचाइयों की थोड़ी छाँह मिल जाती.मेरा जीवन सफल होता

पर....मुझे तो वहीं का वहीं पड़े रहना है.’

‘अरे भौजी,मैने तुम्हें अब तक पानी को भी नहीं पूछा.’

‘नहीं , मेरा व्रत है आज.’

‘ऐसा कैसे? माँ अन्नपूर्णा के द्वारे से कोई रीता नहीं जाता. प्रसादी तो ग्रहण करनी ही पड़ेगी .

यहाँ तक आई हो तो तो माँ अन्नपूर्णा, और बाबा विश्वनाथ के दर्शन बिना चली जाओगी?

चलो भौजी, माँ के दरबार में हाज़िरी दिला कर ,तुम्हें घर पहुँचा आता हूँ.’. 

**

(क्रमशः)

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

राग - विराग : 6.

6.

.नन्ददास तुलसी से काशी में प्रायः ही भेंट करते रहते थे.

'कुछ दिन टिक  कर एक स्थान पर रहो दद्दू, आराम रहेगा और लिखने-पढ़ने में भी सुविधा रहेगी.'

'समाज की वास्तविक दशा को जाने बिना लिखना उद्देश्यपूर्ण कैसे हो सकता है नन्दू? तीर्थयात्रा करता ही इसलिये  हूँ कि देश के सुदूर स्थानों तक पहुँचूँ,लोक-जीवन को पास से देखूँ, वास्तविकता समझूँ. और पुनीत स्थानों में जा कर मन का कलुष धो सकूँ.'

नन्ददास को चुप देख फिर बोले,' उन्होने सारा जीवन लोक-कल्याण में लगा दिया उनका भक्त अपना सुख ही देखेगा क्याचरण-चिह्न छोड़ गये हैं, अनुसरण करना हमारा धर्म.' 

'महान् हो दद्दा, मैं तो तुम्हारी छाया भी नहीं.'

'कुछ नहीं हूँ मैं, बस रामकाज में लगा हूँ. '

एक  दिन नन्ददास ने पूछा था,' दद्दूभौजी से नाराज हो?सच्ची बताना.... ,उस दिन .. तुम्हें झटका लगा था?'

तुलसी सिर झुकाए कुछ क्षण सोचते रहे ,फिर बोले,' झटका नहीं लगा, यह कैसे कहूँ ? लगा और बड़े जोर का लगा.लेकिन उस झटके से हिय के नयन खुल गये. जो मेरे भाग्य में नहीं वो कैसे मिलेगा! उसने तो मुझे चेता दिया.सच में नन्दू जो-जो मुझसे जुड़े सब असमय छोड़ गये. अब तुम्हीं विचारो जिसके बिना एक दिन में इतना व्याकुल हो गया, वह देह भी भंगुर है, मेरा जनम का अभुक्त दोष, उसे भी ले बैठे तो....

अपने ऊपर बड़ा पछतावा हुआ उस दिन. अब उसी से संबंध जोड़ूँगा जिससे कभी नहीं  टूटे.'

 'लेकिन भौजी बहुत पछताती हैं, उन्हें लगता है कि उन्हें संयम रखना चहिये था.'.

'रतन ने वही किया जो उचित था. हृदय में जो उमड़ती हुई बात परस्पर भी न बता सकें तो काहे का दाम्पत्य! अंतर्मन से जो कुछ राम जी की प्रेरणा से उमड़ा वह नहीं कहती तो मन निरन्तर कचोटता, अपराध-बोध सालता.'

 उनके मुख का भाव गहन हो उठा था

'बाल्यवस्था में जिनने भटकने से त्राण दिलाया, मैंने विवाह कर उन्हें बिसरा दिया.

नन्दू, मुझे भान हो गया है, संसार के सुख मेरे लिए नहीं है.'

कुछ क्षण सोचते रहे फिर तुलसी ने पूछा,

'तुम उनसे मिलते हो?'

'हाँ क्यों नहीं ?और चन्दू पर तो उनका अनूठा वात्सल्य है.'

चन्दू?नन्दास का छोटा भाई, नाम है- चंदहास.

'इस परिवार की बड़ी बहू हैं हमारी माननीया हैं. खोज-खबर रखना हमारा धरम.'

 और चन्दू, वह भी उधर गये पर मिले बिना नहीं रह सकता. भौजी के लिये सबसे लड़ जाता है.'

दोनों देवरों को रत्ना से बहुत सहानुभूति है. बड़ाई करते नहीं अघाते. उनकी निष्ठा और त्यागपूर्ण जीवन ने उनके वैदुष्यपूर्ण, संयत जीवन को और दीप्त कर दिया है.

पीहर और ससुराल के संबंधियो में रत्नावली का बहुत सम्मान है.

अचानक नन्ददास ने पूछा,'दद्दा, भौजी यहाँ आयें तो ...?'

तुलसी चौंके.

'कैसी बात करते हो?!

'नहीं सच में .उनकी बड़ी इच्छा है एक बेर तुम्हारे दरसन करें .'

'यह कैसे हो सकता है?'

काहे नहीं हो सकता ? आखिर को तुम्हारी पत्नी हैं . भइया, तुम भी तो कभी उन्हें सोचते होगे.'

'हाँ, बस यही मनाता हूँ कि वह सकुशल रहे ,कोई कष्ट न हो.' ..

' पर, वे तो यहाँ आ रही हैं '

वे चौंके ,' कब?'

'बस एक-दो दिन में यहाँ पहुँच जायेंगी.'

'यहाँ कहाँ रहेगी ?.मेरे पास कुछ भी तो नहीं उसके लिये.यह जगह उसके रहने जोग है ?जानते हो इन लोगों को ?कैसे कैसे साधु हैं यहाँ एक से एक गँजेड़ी ,भँगेड़ी. नारि मुई गृह संपति नासी ,मूँड़ मुँड़ाये भए सन्न्यासी. और कैसी-कैसी विकृत मानसिकता! .

नन्ददास क्या बोलें !

तुलसी कहते रहे ,'जैसी कुत्सा मनों में भरी  है, वैसी ही बातें करेंगे. रतन यहाँ आई तो कैसे देखेंगे उसेक्या कहने से छोड़ देंगे? जीभ पर लगाम देना तो जानते नहीं.

फिर एक चुप्पी.

' नन्दू ,तुम्हीं ने यह किया होगा .ऊँच-नीच कुछ नहीं सोचा.अरे, एक बार मुझसे ही पूछ लेते.'

मन में आया इनसे पूछना इतना आसान है क्या.

पर नन्ददास बोले कुछ नहीं.

तुलसी ने पूछा -' बताया किसने कि मैं यहाँ हूँ ?'

'तुम्हारी खबर रखती हैं वे , पिछली बार तुम्हार सँदेसा पा मगन हो गईं थीं भौजी,आनन्दाश्रु

 छलक आये थे. बोली थीं ,तुम्हारे दद्दा मुझे अपने से अलग नहीं मानते.'

झूठ नहीं बोलूँगा तुम्हारे आगे. उछाह केआवेश में मैं ही बता आया था .भौजी के मुख को देख कर मैं अपने को रोक न सका, '

सिर झुका कर बोले ,' पर हमने आने को नहीं कहा  था. वे तो कब से चाह रहीं थीं बस मौका नहीं मिला था.'

'और इस बार मिल गया?'

'हम तो वहाँ जाते ही कितना है! चंदहास से बात-चीत होती रहती है उनकी . चंदू वहीं रहता है न ..

हमें तो उसी से पता चला .'

'वह आयेगी यहाँ मिलने ?इस खुले डेरे में ,चारों ओर विकृत चर्चाओं की हवा में ...

ऐसे लोगों के बीच न आये रतन, लोग तो भद्दीबातें फैलाने को उधार खाये बैठे होते हैं .'

नन्ददास स्तब्ध .

'रतन यहाँ आयेगी, कहाँ टिकेगी ?'

तुलसी आवेश में बोले जा रहे हैं , 'मैं सब प्रकार से साधन हीन. भिक्षा माँग कर पेट भरता हूँ .मंदिर में उनने मस्जिद बना डाली. मैं राम का नाम लेकर वहीं कहीं सो जाता हूँ कि कपटी साधुओँ की चर्चा में न पड़ूँ. किसी से लेना एक न देना दो. लेकिन लोगों की कुत्सित दृष्टियाँ उस तक पहुँचेंगी.  कौन रोक लेगा?

'मुझे ही धूर्त,जुलाहा ,रजपूत जाने क्या-क्या कहते फिरते हैं .मुझे तो कोई अंतर नहीं पड़ता,  पर उसका क्या कोई मान-सम्मान नहीं?  कैसे-केसे विकृत आरोपण करते हैं लोग ,सोचा है कभी? अपनी कुत्सा के आरोपण में चूकेंगे नहीं. रतन के लिये ये स्थान नहीं .सब की कौतुकी दृष्टियों का केन्द्र होगी वह,यहाँ सब कैसे-कैसे सन्यासी हैं जानता हूँ मैं, पराई स्त्रियों को  लोग  कैसी निगाहों से दखते हैं .यहाँ तो सब ओर यही लोग हैं.  कौन साधु हैं ,कौन असाधु, कौन जाने !

'अपने मन की कुत्साएँ निकालने का एक मार्ग मिल जायेगा उन सबको . रसभरी चर्चा के लिये एक मसाला मिल जायेगा.रतन के साथ ऐसा हो, नहीं  नन्दू ,वह नौबत न आये .उसे मान न दे सका पर  दूषणों  से तो बचा ही सकता हूँ .'

 

तुलसी को इतना उत्तेजित पहली बार देख रहे थे.लगता है उनका अंतर्मन तक दहल गया हो जैसे.

क्या केवल उत्तेजना थी, आँखो में जो छलकन  उतर आई वह भी तो एक सच है.....

'तुमने बताया कि आजकल  यहाँ हूँ ?'

'  बातों  बातों में मैं ही कह बैठा था,तुम्हारे बारे में बहुत बातें पूछती हैं .'

मन ही मन पछता रहे थे नन्ददासरत्ना के प्रति सहानुभूति भरे मन ने बिना सोचे-विचारे ,चंदहास की बातों में आ, भावुकता में यह क्या कर डाला ?

लेकिन अब ... नन्द दास का चेहरा उतर गया.

' अब? वे तो आ रही हैं ,कल ....' नन्ददास घबरा कर कह उठे

'अब बता रहे हो जब  पानी बिलकुल सिर से ऊपर आ गया.'

'तो अब तुम्ही जानो!'

*

'तुम्हीं जानो' कहने भर से क्या मन शान्त रहता है!

ओह,रतन यहाँ ! आँखों के सामने !मैं सोच भी नहीं सकता!

 जीवन में बहुत तरसा हूँ , वहाँ से विरत हो कर चला आया .अब बस मन  पर संयम रहे  ,नारद जैसा मुनि ,विचलित हो सकता है फिर मेरी क्या विसात! 

प्रभु, अब परीक्षा न लो.रक्षा करो ! अपने आश्रय में पड़ा रहने दो. बुद्धि चेताती है किन्तु  मन के उत्पातों  से भय खाता हूँ . किसी दुर्बल क्षण में  सारे भान खो कर ,संयत न रह पाऊँ  ....

नाथ, तुम तो अंतर्यामी हो!

नहीं होगा, नहीं होगा मुझसे, फिर मिलना और फिर दूर हो जाना.

मुझे साहस दो प्रभु!

मानव बन कर अवतार लिया तुमने ,मानवी संवेदनाओं को भोगा, निभाया,

अब तुम्हीं मेरा मार्ग दर्शन करो! 

मैं आज जान पा  रहा हूँ वह कारण कि  माँ जानकी को,भवन से निर्वासित कर  वन पहुँचाने का, निर्मम दायित्व अनुज को सौंप दिया , क्यों स्वयं सम्मुख  नहीं आ सके थे !

और कोई मार्ग नहीं सूझ रहा प्रभु. इस समय की विचारणा जो  कहे वही स्वीकारता हूँ , उचित-अनुचित जो समझो -  मुझे क्षमा कर देना!

और अगली भोर, तुलसी बिना किसी को  बताए वहाँ से  प्रस्थान .कर गये.

*

(क्रमशः)

*


 

 

 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

छोटे मियाँ सुभानअल्लाह!

 छोटे मियाँ सुभान अल्लाह. 

बचपन  में मेरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अक्लमन्द था..बाल की खाल निकाल देता था. एक बार उसकी एक चप्पल कहीं इधर-उधर हो गई ,वह एक ही चपप्ल पहने खड़ा था.मैने देखा तो कहा अच्छा एक ही पहने हो दूसरी खो गई ? और हमलोग इधऱ-उधर डूंढने लगे.

उसके पापा ने आवाज़ लगाई , 'आओ जल्दी..'

मैने उत्तर दिया,'उसकी एक चप्पल नहीं मिल रही है ,देख रही हूँ ..'

वह सतर्क हुआ बोला,' मम्मी एक तो है दूसरी नहीं मिल रही है.'

मैं खोजने में लगी रही ध्यान नहीं दिया .

देर होती देख उसके पापा चले आए.

'क्या हुआ ?' 

'इसकी एक चप्पल नहीं मिल रही .'

वह फिर बोला, ' एक तो पहने हूँ, दूसरी नहीं मिल रही.'

मेरे मुँह से निकला, 'अच्छा..'

नीचे से माली की आवाज़ आई - 

'ये एक चप्पल किसकी नीचे गिरी पड़ी है ?'

इन्होंने कहा, ' देखो एक नीचे गिरा दी है .'

उसने  फिर स्पष्ट किया,' एक नहीं वह दूसरी है .'

ताज्जुब से उसे देख कर बोले , 'हाँ,हाँ एक नीचे पड़ी है.' 

उसने ज़ोर से प्रतिवाद किया, ' एक नहीं  दूसरी नीचे पड़ी है '

'हाँ ,हाँ एक तुम्हारे पाँव में और एक नीचे' -मैंने समझाया .

वह क्यों समझता ,खीझता हुआ बोला दूसरीवाली नीचे है ,एक तो ये हैं.

हमलोगों ने आश्चर्य से एक-दूसरे को देखा .

मैंने फिर समझाने की कोशिश की 

'हाँ ,हाँ एक तुम पहने हो और एक नीचे '.

वह जोर से बोला -

'एकवाली तो मैं पहने हूँ नीचे  दूसरीवाली है .' .

हम दोनों निरुत्तर.

हम समझा रहे हैं,वह हमारी बात कब समझेगा आखिर!

कोई एक बार की बात थोड़े ही .आये दिन कुछ-न-कुछ

दशहरे पर रामलीला के बाद इन लोगों को रावण -दहन दिखाले ले चले.

रावण का पुतला देख कर मुझसे पूछा ,मम्मी ये सच्ची का रावण है 

'नहीं.'

'तो इसे जलाते क्यों हैं ?'

मैं चुप रही .

 'इसे जलाते क्यों हैं, मम्मी ?'

मैं कहूँ तो क्या कहूँ .

फिर वही, 'क्यों मम्मी?'

अच्छा अभी तो चलो .

लेकिन वह पूछे जायेगा जब तक समाधान नहीं हो जाये,पूछता रहेगा .

हार कर कह दिया, 'अभी चलो बाद में बताऊँगी .'

और कुछ भी सुन लीजिये- बिजली का बिल जमा कराना था. कहीं रख दिया था और मिल नहीं रहा था.

ढूँढ पड़ी थी - बिजली का बिल कहाँ है ?

 

वह बोला यहाँ है बिजली का बिल .

खुश हो कर हम लोग दौड़े ,'कहाँ ?' 

वह ले गया ,मिक्सी चलाने के लिये जहाँ से प्लग को कनेक्ट करते हैं उन सूराखों को दिखा कर बोला,ये है बिजली का बिल.'

बिजली का बिल? 

हम दोनों एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं. 

अब तक चूहे का बिल देखा होगा ,अब बिजली का भी देख लीजिये - यहाँ रहती है बिजली.

वाह रे भगवान, इन छोटी खोपड़ियों में दूसरों का दिमाग़ चाटने की अक्ल  भरने में तुम खूब एक्सपर्ट हो!

*



मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

राग-विराग -5.

 *

हिमाचल-पुत्री गंगा, शिखरों से उतर उमँगती हुई सागर से मिलने चल पड़ती है. लंबी यात्रा के बीच मायके की याद आती है तो मानस लहरियाँ उस ओर घूम जाती हैं.  इस स्थान पर आकर उन्होंने दक्षिण से उत्तर की ओर  प्राय: चार मील का घुमाव लिया है. परम पुनीता, उत्तरमुखी सुसरिता के इसी उमड़ते स्नेहाँचल के, आग्नेय कोण में स्थित है अनादि नगरी-  काशीपुरी! काशी शब्द का अर्थ ही है, प्रकाश देने वाली - जहाँ ब्रह्म प्रकाशित हो. समय-समय पर महान् चिन्तकों और आध्यात्मिक विभूतियों ने इसकी चैतन्यता को उद्दीप्त रखा है 

बालपन की दारुण दशा के बाद, भूख से बिलबिलाते,परित्यक्त बालक ने माँ अन्नपूर्णा  की छाँह में शरण पाई थी. तुलसी की सारस्वत-साधना की केन्द्र भी यही नगरी रही. गुरु नरहर्यानन्द जी के सान्निध्य और शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया था, यहीं रह कर  भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हुये थे. दोनों सद्पुरुषों की परिष्कृत, उदात्त मानसिकता और सजग चेतना का प्रभाव तुलसी का कायाकल्प कर, उनके व्यक्तित्व में दीप्ति भर गया. शेष जीवन काशी से उन्हें विशेष लगाव रहा था.

उनके चचेरे भाई नन्ददास (जीवाराम के पुत्र)  भी युवा होने पर  काशी में  विद्याध्ययन करने आये. दोनों की परस्पर भेंट होती रहती थी. यहाँ रह कर परस्पर आत्मीयता विकसित हुई. नन्ददास, अग्रज  तुलसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते थे,और उनसे प्रायः सलाह-मशविरा करते रहते थे. कालान्तर में नन्ददास कृष्ण-भक्ति में दीक्षित हो, अष्टछाप के कवियों में गण्य हुये. 

एक बार वैष्णव भक्तों का एक दल द्वारका प्रस्थान करनेवाला था, नन्ददास भी जाने को उत्सुक थे.उन्होंने अग्रज से पूछा,बड़ा सुन्दर अवसर मिला है .हम भी उसके साथ जाना चाहते हैं.

काहे वहाँ क्या है ?

भगवान रणछोड़ के दर्शन का लाभ मिलेगा .उस पुनीत पुरी के वास का सौभाग्य मिलेगा. 

दल  के साथ जाओगे ? 

अपने समाज के साथ आनन्द ही आनन्द रहेगा. मस्ती में नाचते-गाते पहुँच जायेंगे.सब साथ होंगे ,किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं.

कुछ क्षण चुप रहे तुलसी.फिर बोले ,उसमें कुछ जोखिम भी है.

जोखिम ?

'तियछवि छाया ग्राहिनी' बीच में ही गह ले, तो...?

तुलसी  उनके  मस्तमौला, रसिक स्वभाव से भलीभाँति परिचित थे.

नन्ददास संकेत समझ गये . एक रूपवती खत्रानी पर रीझ कर कैसे सारी लोक-लाज छोड़ उसके घर के चक्कर लगाने लगे थे, परेशान होकर उसके परिवार जन गोकुल चले गये, तो वहाँ भी जा पहुँचे थे.

बात तुलसी तक पहुँची, उनकी धिक्कार और  गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से मोह-भंग हुआ. उन्हें कृष्णभक्ति रास आ गई ,कालान्तर में वे अष्टछाप के कवियों में मान्य हो गए.

कुछ खिसियाते-से नन्ददास बोले,अब वे बातें काहे बीच में लाते हो दद्दा, तु्म्हारी बात सुनी नहीं क्या हमने ? हमने विट्ठलस्वामी से दीक्षा ले ली है.अब तो ब्रजराज श्याम ही हमारे सर्वस्व हैं. 

नन्दू,अकेले भ्रमण में व्यक्ति अपनी खुली आँखों के चतुर्दिक् देखता-समझता चलता है. और साधु तो सबका कल्याण चाहता है. हमने तो तुम्हें चेता दिया है.

नन्ददास चुप सुनते रहे.

तुमने कबीर जी की वह उक्ति सुनी है 'लालन की नहिं बोरियां...'..?

हाँ,हाँ यों है - 

'सिंहन के नहीं लेहड़े ,हंसन की नहिं पाँत,

लालन की नहिं बोरियाँ साधु न चले जमात.'

कैसा गूढ़ अर्थ छिपा है इसमें .

समझ रहे हैं , लेकिन हम तो कृष्ण प्रेम के मार्गी हैं. निचिंत रहे दद्दू,सप्ताह -दस दिन में हम लौट आयेंगे.

तुलसी दास ,लघु भ्राता को प्रोत्साहित करने में कभी पीछे नहीं रहे

 उन्होंने कहा था नन्दू ,तुम भी कुछ कम विद्वान नहीं हो .अपने अनुभवों का पाठ भावसंपदा  भी बढ़ाएगा ,तुम कुशल हो.जहाँ अन्य कवि  कवित्त गढ़ते हैं तुम उक्ति को ऐसे जड़ देते हो जैसे स्वर्ण में रत्न. और अभी तो निखर रहे हो .

अपने भ्रमण-क्रम में तुलसीदास जी ,वृन्दावन पहुँचे. तब तक वे राम-भक्त के रूपमें पर्याप्त ख्याति पा चुके थे. वृन्दावन श्रीकृष्ण की लीलाभूमि रहा है तुलसी ने अनुभव किया कि  यहाँ के आम, ढाक, खैर भी राधा-राधा का जाप करते हैं.

जब वे ज्ञान गुदरी में श्री मदन मोहन के परिसर में पहुँचे  तब भक्तमाल के रचयिता नाभादास तथा कुछ अन्य जन भी वहाँ उपस्थित थे.रामभक्त, तुलसी के आगमन की सूचना सबको हो गई थी.

मन्दिर के पुजारियों में परशुराम नाम का एक पुजारी बोला ये तो मदन-गोपाल की लीलाभूमि है, यहाँ रामभक्त कैसे पधार गये?

और तुलसी को देख हँस कर बोला, आपके इष्ट तो राम जी हैं !

 'बिना आपुने इष्ट के नवै सो मूरख होय.'

तुलसी दास जी ने सुना ,शान्तिपूवर्क विग्रह के हाथ जोड़े, विनत हो कर बोले- 

'कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ,

तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान ल्यो हाथ.'

.अचानक श्याममूर्ति में मुद्रा-परिवर्तन का आभास हुआ सबके विस्मित नयनों में धनुर्धारी की ओजपूर्ण मुद्रा झलकी, 

और गद्गद् तुलसी ने भूमिष्ठ हो दण्डवत् प्रणाम किया.

घटना की स्मृति-स्वरूप यह दोहा प्रचलित हो गया -

 ‘मुरली मुकुट दुराय कै, धर्यो धनुष सर नाथ। तुलसी लखि रुचि दास की, कृष्ण भए रघुनाथ।.’  

इतिहास साक्षी दे या न दे , लोक-श्रुति साक्षी है कि भक्त की मान-रक्ष हेतु, कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में परिणत हो  गई थी.

(क्रमशः)

*


शनिवार, 30 जनवरी 2021

चित्रगुप्त जी की बेरुख़ी -

*

 जब श्रीराम लंका विजय कर अयोध्या लौट रहे थे, उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे, भरत जी ने सोचा कि उनका राज्य उन्हें अर्पण कर अब यथाशीघ्र भार-मुक्त हो जाऊं. गुरु वशिष्ठ की सहमति से , वे राम जी के राज्याभिषेक की व्यवस्था मे लग गए.भरत जी ने गुरु से उस अवसर पर सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का निवेदन किया. प्रसन्न मन गुरु वशिष्ठ ,आमंत्रण भेजने का काम शिष्यों को सौंप गुरु अन्य कार्यों में व्यस्त हो गये.

राजतिलक के समय जब श्रीराम ने आगत देवी देवताओं में श्री चित्रगुप्त जी को नहीं देखा तब भरतजी से पूछा कि वे क्यों नहीं पधारे. खोज-बीन करने पर पता चला की गुरु वशिष्ठ के शिष्यों द्वारा उन तक निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं गया.

 श्री चित्रगुप्तजी सब-कुछ जान चुके थे उन्होंने इस भूल को अक्षम्य मानते हुए सभी प्राणियों का लेखा-जोखा बही सामने से खिसका दी और लेखनी क़लमदान पर रख दी . 

जब सारे देवी-देवता राजतिलक से लौटे तो पाया कि बहुत अव्यवस्था मची हुई है. प्राणियों के कर्म का लेखा-जोखा हुआ ही नहीं.और यह निश्चित करना संभव नहीं कि किसकी कौन-सी गति हो. फलस्वरूप  स्वर्ग-नरक के सारे काम रुक गये हैं. 

 सारा मामला श्री राम की समझ में आ गया. इस भारी चूक के परिमार्जन के लिए श्रीराम  गुरु वशिष्ठ के साथ  अयोध्या में श्री चित्रगुप्त जी के स्थान श्री धर्म-हरि मंदिर गये और उनकी स्तुति की.तत्पश्चात चूक के लिये क्षमा-याचना करते हुए उनसे सृष्टि-संचालन में सहयोग देने की प्रार्थना की.

श्री चित्रगुप्त जी ने राम का आग्रह स्वीकार कर लिया. उन्होंने  प्रातःकाल   विधिपूर्वक मसि-पात्र सहित लेखनी की पूजा कर उसे ग्रहण किया प्राणियों के कर्मों का विवरण सूची-बद्ध करने के लिए बही उठा ली और लेखन-कार्य पुनःआरम्भ कर दिया. सृष्टि का कार्य विधिवत् चलने लगा.

लेकिन इस बीच चौबीस घण्टे उनकी लेखनी निष्क्रिय रही थी. कायस्थ समाज ने इसका संज्ञान लिया और तभी से पूरी दुनिया में कायस्थ-जन  दीपावली पर 24 घंटों के लिए क़लम रख देते है और अगले दिन क़लम- दावात के पूजन के बाद ही उसका प्रयोग करते हैं.

प्रायः ही हमारे रीति-रिवाज़ ,किसी घटना या मान्यता से जुड़े होते हैं ,कालान्तर में लोग कारण भूल जाते हैं. और पूछने पर

युवा पीढ़ी  कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती. 

(अयोध्यापुरी में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित श्री चित्रगुप्त मन्दिर को 'श्री धर्म हरि मंदिर' कहा गया है. धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उन्हें तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होगा. अयोध्या माहात्म्य में भी यह उल्लेख मिलता है).

- प्रतिभा सक्सेना.