शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

बिन मात्रा जग सून -

बिन मात्रा जग सून .

शाम हो रही थी .घर से थोड़ा आगे बढ़ी ही थी कि एक घर के लान में खड़ी आकृति बड़ी परिचित-सी लगी, याद नहीं आ रहा था कहाँ देखा है. बरबस उसकी ओर बढ़ती चली गई.
 चुपचाप खड़ी थी .
'ऐसी चुप-चुप क्या सोच रही हो ? और बिलकुल अकेली! सब लोग कहाँ है?'
'सब घर में हैं. तुम कहाँ जा रहीं थीं?'
'तुम मुझे जानती हो ?'
'रोज पाला पड़ता है तुमसे , जानूँगी नहीं?'
'अरे हाँ, तुम मात्रा हो.'
'रोज ही मिलते हैं कितनी-कितनी बार'.
अब तक मैंने हमेशा उसे किसी स्वर या व्यञ्जन के साथ देखा था.
'अकेली क्या कर रही हो यहाँ ?'
 ' कुछ करने -धरने का मन नहीं था. बड़ी ऊब लग रही थी.सो इधर निकल आई .'
 'आज हम दोनों अकेले हैं ,कुछ देर बैठोगी मेरे साथ.?'
'चलो. झाड़ियों के उधरवाली बेंच पर बैठते हैं . कोई नहीं आता इधर ,चैन से बैठेंगे कुछ देर.. रोशनी भी कम है वहाँ कोई एकदम देख नहीं पायेगा.'
 दोनों बैठ गए .
'बहुत दिनों से तुमसे मिलना चाह रही थी.'
'मेरे साथ हमेशा कोई न कोई साथ लगा रहता है -कभी स्वर ,कभी व्यञ्जन.  अकेले काम नहीं चलता उनका . आज चुपके से निकल आई हूँ ,,यहँ बैठे किसी को पता नहीं चलेगा..'
'तुम्हारे बिना वे चल ही कहाँ पाते हैं. अनुकूल सज्जा दे कर साथ संगति बैठाने के लिये तुम्हीं पर निर्भर हैं. '
'हम मात्राओं को हर समय सावधान की मुद्रा में तैनात रहना पड़ता है.'
'आप इतने सारे भाई-बहन हैं ......'
'हैं. पर हर समय हरएक को कान खड़े रखने पड़ते है ,कभी चैन से नहीं बैठ पाते
ज़रा सी चूक हुई नहीं कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है .हमें तो इतनी भी छूट नहीं कि ह्रस्व और दीर्घ मात्राएँ आपस में भी एवजी पर काम कर  सकें. लोग हल्ला मचा देते हैं. चौबीसों घंटे तैनात रहें उनके लिये...... '
'सही कह रही हो ,अर्थ-संचार करने के लिये उन्हें शब्दायित करना होगा जिसके लिये अक्षर को सज्जित करना आवश्यक. यह और किसी के बस का कहाँ!'
'हमारे घर में  इतने अक्षर हैं ,सारे के सारे  चुप मारे बैठे रहते हैं.उनके सार्थक प्रयोग का सारा ठेका हमारा.. हर मात्रा का एक अलग काम ,अक्षर को शब्द के अनुरूप सज्जा दे ,उसकी भंगिमा बदले .तब वह बाहर के काम के योग्य बने ,नहीं तो जैसा का तैसा पड़ा रहे अपनी चाहार-दीवारी में.'
'अरे हाँ , इतना परिश्रम न करें तो अपनी बात ही न कह सके कोई और  तब कहाँ व्याकरण और कैसा नियम-नियंत्रण !'
वह चुप ही रही,मुझसे रहा नहीं गया -
'सच्ची, इतना सब न हो तो अक्षर व्यवहार में ही न आएँ. भाषा मैं कितना बड़ा रोल है आप लोगों का.'
 'सच तो यह है कि मात्रा के बिना कुछ हो ही नहीं सकता.' जैसे ज्ञान-चक्षु खुल गए हों- अनायास मेरे मुँह से निकला.'
'तभी तो आज चुपके से इधर खिसक आई थी, ... कुछ समझें तो लोग.'
' होता है कभी न कभी सबके साथ ,'
फिर पूछा मैंने ,'आप लोगों की अपनी पूरी व्यवस्था है. इतने लोग पूरा ताल-मेल बना कर कितनी अच्छी तरह रहते हैं. '
'हाँ ,हम नौ भाई-बहन एक ही ढर्रे के हैं. वैसे तो दो और भी हैं.... उनका ढंग कुछ अलग है. .'
कितने समान हैं आप लोग ,कभी-कभी तो भ्रम में पड़ जाते हैं हम .'
 'सब जोड़े से उत्पन्न हुये. फिर बड़ा भाई आ अकेला रह गया .दो जुड़वाँ बहनें हैं - इ-ई ,फिर उ-ऊ,ए-ऐ, ओ-औ .सारे जुड़वां.'
खिड़की की जाली से एक नन्हा सा चेहरा झाँका
मैने कौतुक से देखा, 'कोई बच्चा आया है तुम्हारे घर?'
 'नहीं तो..'
'अभी देखा मैंने, किसी के सिर पर चढ़ा झाँक रहा था.'
'अरे, वह बिन्दु होगा,सबसे छोटावाला...सबसे छोटा हमारा भाई ., लाड़ के मारे सर चढ़ा रहता है .'
'कितना नन्हां सा है, बिन्दु नाम भी वैसा ही प्यारा!'
'नहीं ,नहीं, नाम तो उसका अनुस्वार है. प्यार में  बिन्दु कहते हैं.'
मुझे आनन्द आ रहा था
बताने लगी वह -वाणी में वात्सल्य छलक आया था -
'तिन्नक सा रह गया तो है तो क्या -पूरा नकचढ़ है नाक लगाए बिना आवाज़ नहीं निकालता .क्या करें .करें बाल-हठ को मान दिया सबने -एक ही तो बच्चा है घर में . बंधुओँ के नेह ने कोमलता का संचार दी - उसके स्वर मधुर संगीतमयता से भर मनभावने हो गये . पर कभी जब मूड बदला हुआ हो तो ऐसा नकियाता है कि अनुस्वार ध्वनि ,सानुनासिक बन कर रह जाती है .मुश्किल यह कि नन्हीं-सी जान को  और कितना समेटें ,काट-छाँट संभव नहीं, सो सानुनासिक उच्चारण द्योतित करने के लिये जरा-सा चाप खींच फ़िटकर दिया उसके नीचे.'
' और बिन्दु ने मान लिया? '
'सीधे से मान ले तो बिन्दु कैसा ?एक ही शरारती है वह भी - शुरू कर दिया लातें चलाना -ये क्या लगा दिया ,हटाओ,हटाओ इसे - की रट लगा दी .तब माँ, वर्णमाला ने गोद में लेकर बहलाया,' अरे, ये तो चाँद का टुकड़ा है .तुम्हारे संग खेलने के लिये लाये हैं ',और बब्बू जी मगन हो गये .
सबने उसे चंद्रबिन्दु कहना शुरू कर दिया. आ गया वह भी चलन में..'
'कितनी सुरुचि और विचारमयी माँ हैं ,तभी तो सारा परिवार इतना व्यवस्थित है . माँ-पिता जी घर में ही होंगे?'
'हैं न, हमारे साथ रहते हैं .'
मन में उमड़ी अकथ सुखानुभूति और जानना चाह रही थी .
मेरी उत्सुकता भाँप गई मात्रा. मंद मुस्कान की महक वाणी में झलक आई   वह आगे बताने लगी -
 'माँ वर्णमाला,उन्हीं ने सँभाला है ये कुटुम्ब. इतना घूमते हैं हमलोग, शक्लें बिगड़ने लगती हैं ,वे ही ठीक किये रहती हैं.'
उन्हीं के नाम पर आपका यह आवास है -वर्णमाला?'
'हमारा निवास ?अरे, हम यायावर लोग हैं .हवा में उड़ते रहते हैं .एक जगह रहने की आदत ही नहीं. टिकने को ये माँ का घर है जरूर .पर देखो न कहाँ-कहाँ पहुँचे रहते हैं '.
'वर्णमाला कितना सुन्दर नाम,  और पिता जी?'
'बड़े व्यस्त हैं पिताजी. दिखाई नहीं देते हैं ,पर हमेशा उनके साथ का अनुभव होता है ,उनसे बल न मिले तो कुछ न कर पायें हमलोग.''
'उनका नाम जान सकती हूँ ?;'
'पिता जी को सब लोग स्वर कहते हैं, वैसे नाम स्वरात्म है .स्वरात्मज हैं हम सब .'
'सबसे बड़ा आ ,एक ही भाई अकेला?'
'अकेला नहीं था ,उससे पहले अ आया ,घर में भी अ का नाम सबसे पहले आता है. उसे अनुशासन की ज़रूरत ही नहीं वहुत संयत है बिलकुल संत स्वभाव का .पिताजी पर गया है सबके साथ हो कर भी कोई शान नहीं बघारता. मात्रा-मुक्त कर दिया इसीलिये उसे .'
परम विस्मित मैं चुपचाप सुन रही थी.
'अ पहली संतान है पिता ने कहा था "वर्णा, यह तुम्हारी  प्रथम संतान सदा निर्लिप्त रहेगी अपने मूल रूप से सब में व्याप्त होगी.'
'अरे, हाँ मैने. तो आज ही ध्यान दिया - अ अपनी मात्रा आरोपित किये बिना ही सबको अपना स्वर देता रहता है.'
'उसे अपना प्रभाव दिखाने का कोई मोह नहीं ,उसके लक्षण पहले ही जान लिये थे पिता ने....'
'सच है. पूत के पाँव पालने में ही दिखाई दे जाते है.'
उन्होंने माँ को उसका महत्व बताया -
'प्रिय वर्णे, इसके देह-रूप का मोह मत करना . यह तुम्हारी हर संतान का परम आत्मीय है. इसे धारे बिना कोई वर्ण मुखर नहीं हो सकेगा. सभी स्वरों ,सभी व्यञ्जनों  में इसकी विद्यमानता के बिना ध्वनि- संचार संभव  नहीं .हमारा अ सर्वव्याप्त होगा.''
 माँ ने तत्परता से उत्तर दिया,
 'स्वरात्म , गोद में आया यह प्रथम आत्मज तुम्हें  समर्पित करती हूँ.'
तब पिता ने वर दिया - 'इसके बिना कोई भी वर्ण जिह्वा पर आ कर भी अवाक् रह जायेगा. फिर आगे कहा. यह अपने जीवन-काल में ही उ औ म् के साथ संयुक्त हो कर परम पद का अधिकारी होगा!'
इस प्रकार प्रथम स्वरात्मज को  माँ ने लोक-हित समर्पित कर दिया.'
कुछ देर हम दोनो अभिभूत से बैठे रहे
अचानक हः-हः की आवाज़ हुई
चौक कर पीछे देखा.
मेरे चेहरे पर अंकित अचरज को पढ़ लिया मात्रा ने.
'वह भी हमारा भाई है ,अनुस्वार के साथवाला. माँ के गर्भ में ही पता नहीं कैसे ग्रोथ रुक गई दोनों की. समुचित आकार नहीं मिल पाया.  ..  .जन्म से बाधित बेचारा विसर्ग, हँसी नहीं कराह निकलती है  उसके मुख से.'
'विसर्ग...' मैने दोहराया '...लेकिन बाधित ?'
' किसी का सहारा लिये बिना खड़ा नहीं हो पाता , उसे पीठ पर लाद कर चलना पड़ता है.'
'वह दो बिन्दुओं से रचित है'
'यही तो अच्छा है ,लादने में संतुलन बना रहता है .नहीं तो पीठ से कहीं लुढ़क जाए तो पता ही न चले.'
'हाँ सो तो है.'
पेड़ों की आड़ रोशनी रोक रही थी .मात्रा की भंगिमा दिखाई नहीं दे रही थी
 ध्यान से देखने का यत्न किया.
 उस हल्के उजास में रूपरेखा अस्पष्ट रही.
उठ के उधर से जायेगी तब रोशनी में ठीक से देख लूँगी -सोचा मैंने.
'अच्छा तो सारी मात्राएं दो ही प्रकार की होती हैं हृस्व और दीर्घ?'
'होती हैं नहीं, अब हैं .पहले हम तीन थीं ,ह्रस्व,दीर्घ (छोटी-बड़ी )और प्लुत.
समय के साथ प्लुत क्षीण होती गई ,कोई उपचार मिला नहीं  .फिर स्वर्गवास हो गया उसका.'
'अच्छा वो जो सबसे लंबी थीं... '
'लंबी होने से क्या... आयु तो नहीं मिली.'
मैं क्या बोलती
 'हमारी सहोदरा थीं ,सोच कर दुख होता है .पर अब उस चर्चा से क्या लाभ?'
  'और आप के साथवाली ?'
'बहनें हम दो ही हैं - इ और ई.'
कुछ कोलाहल की ध्वनियाँ कानो में आने लगीं.
उसने घूम कर देखा, अपने घर की खिड़की की ओर हाथ उठाया -'अरे, वे सब वहाँ खड़े हैं. मेरी ढूँढ पड़ी है...मैं चली ..'
वह उठकर खड़ी हो गई .
मै पलट कर खिड़की की ओर देखने लगी ,
(आ,ई उ,ऊ,ए) ा,ु,ू ेऐ इत्यादि तमाम मात्राएँ खिड़की में उझक रहीं थीं.
 जब मात्रा की ओर घूमी. वह वहाँ थी ही नहीं.
इधर-उधर चारों ओर देखा - पता नहीं कहाँ गायब हो गई .मैं अकेली बुद्धू जैसी उस नीम अँधेरे में बैठी थी . बड़ा विचित्र सा लगा. मैं भी चलूँ.   
उठने लगी
 बेड की कोर पर फैला पाँव झटके से नीचे गया. बैलेंस बिगड़ा - 'उई ईई...'
मैं गिरते-गिरते बची.
बेटी कह रही थी,' सोते-सोते क्या बोल रहीं थीं आप ?'
*
- प्रतिभा सक्सेना.

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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

सावधान, वे सड़कों पर घूम रहे हैं.

*

फ़िल्में और उनके गीत ,हमारे शयन-कक्षों और ड्राइँग रूम्स का हिस्सा बन चुके हैं .मुंबइया हिन्दी  हमारी भाषा में छौंक लगाने लगी  है (बिंदास ,मवाली,काय कू आदि  ). देर-सवेर .स्वीकारना पड़ेंगे ही

एक और वर्ग है जो अंदर घुस आनेकी फ़िराक में सड़कों पर पर घूम रहा है .खीसें निपोरते बार-बार अंदर तक चक्कर लगा भी  जाता है  ,वो तो हमीं लोग हैं जो पैठ बनाने नहीं देते ,टरका देते हैं .

इनकी  रूप-रचना  का काम हमारी कामवालियों ने किया है .घर में झाड़ू-पोंछा ,चौका बर्तन ,कपड़े धोना आदि काम ही नहीं सब देखती -समझती हैं .उनकी निरीक्षण क्षमता गज़ब की है और टीवी की कृपा से उनका मानसिक स्तर और विकसित होता जा रहा है ,रहन-सहन बोल-चाल सब पर दूरगामी प्रभाव !

आपने 'फ़र्बट' शब्द सुना है ?

हम तो इनके मुख से बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं .

अपनी कोई साथिन जब उन्हें अपने से अधिक चाक-चौबस्त लगती है तो चट् मनोभाव प्रकट करती हैं ,'अरे, उसकी मत पूछो ,क्या फर्वट है !'

इस युवा पीढ़ी का अर्थ-बोध और मौलिक उद्भावनाएं गज़ब की हैं

फर्वट - इसका मतलब है फ़ारवर्ड !

और फिरंट का मतलब जानते हैं ?

जो अपने से आगे बढ़ी हुई लगे उसे कहेंगी 'फिरंट'(फ़्रंट से बना है)-इसमें थोड़ा तेज़-तर्राक होना भी शामिल है.

'टैम' ने समय को विस्थापित कर दिया है ।और माचिस ! दियासलाई है भी कहीं अब ?

सलूका ,अँगिया आदि वस्त्र ग़ायब हो गये उनका स्थान ले लिया है ,ब्लाउज ,आदि ने।

हमारे एक परिचित हैं अच्छे पढ़े-लिखे उनका कहना है स्टोर्स में लेडीजों का माल भरा पड़ा है. एक दिन बोले हमारा पप्पू शूज़ों का बिज़नेस करेगा .

शूज़ों का बिज़नेस - यह भी सही है! शू का मतलब तो एक पाँव का एक जूता जब कि जूते हमेश दो होते है- शूज़ : और उसका बहुबचन शूज़ों ठीक तो है .

लेडीज़ों भी सही -अकेली स्त्रियाँ कहाँ मिलती हैं अब? दो-तीन साथ में. एक झुण्ड में लेडीज़ और  झुण्डों का बहुवचन लेडीज़ों ही तो .

थालियों में कौन खाता हैं सब पलेट में खायेगे ,चाहे फ़ूलप्लेट हो या छोटी पलेट .

अपनी हिन्दी  बदलती जा रही है  अब तो.

अंग्रेज़ी भाषा की तो बात ही मत पूछो ।अनपढ़ लोग, गाँव के वासी यहाँ तक कि महरी ,जमादारिन मालिन सबके सिर चढ़ कर बोल रही है ।

हमारे यहां एक प्रकार का मिल का कपड़ा होता है (लट्ठा).

अंग्रेज़ लोग तब लांग्क्लाथ कहते थे ,अपने देसी लोग 'लंकलाट' कहने लगे . चल पड़ा शब्द.

इसी प्रकार कैंपों में जब अंग्रेज़ संतरियों को किसी के उधर होने का संदेह होता था तो

ज़ोर की  आवाज़ लगाते  ,'हू कम्स देअर ?'

हमारे चौकीदार ने अपने हिसाब से शब्द पकड़ लिये 'हुकम ,सदर !'

एक बार मुझसे किसी ने  कहा - ये 'फ़ालतू' ''अफ़लातून' से बना है ..'

मेरे तो ज्ञान-चक्षु खुलने लगे .

अपने बचपन की बातें भी कोई भूल सकता है

हमें भी याद है - सुनते रहते थे उर्दू और हिन्दी में खास अंतर नहीं है. म.प्र में थे हम . वातावरण में हिन्दी अधिक थी ,उर्दू से दूर का वास्ता और संस्कृत पूजा-पाठ और विशेष अवसरों मंत्र-पाठ स्तुतियों आदि में सुनने को मिल जाती थी..तो हमने समझने का  आसान तरीका निकाला था.--क,ख,ग,ज फ वगैरा के नीचे बिंदी (नुक़्ता) लगा दो ,और गले से ग़रग़रा कर बोलो तो उर्दू होती है .

स्कूल में कोई तर्जनी दिखा कर  कह दे आइन्दा ...'तो दम खुश्क हो जाता था. कि जाने कितनी खतरनाक बात कही गई .

और संस्कृत ! हिन्दी शब्द के अंत में म या न लगा कर उस पर हल लगा दो हो गया काम  (सुन्दरम्,आनंदम् ,वरम्,निकंदनम् सब हलन्त हैं).और उन्हें गा-गा कर पढ़ो तो संस्कृत हो गई .

पर ये तो पुरानी बातें है.

अब देखिए , अच्छे-पढ़े लिखे लोग सफ़ल लिखते हैं ? सफल लिख-बोल कर  कोई अपनी हेठी क्यों कराये ?

अब मालिनें भी फूल नहीं 'फ़ूल' बेचती हैं -फ बोलने से जीभ में झटका लगता है फल नहीं फ़ल खाना सभ्यता का लक्षण है. वैसे कामवालियों को भी अब फ़ूल अधिक पसन्द आते हैं (तुलना शब्द से निकालेजाने वाले दोनों अर्थों की.

अभी से सुनना-समझना शुरू कर दीजिए. नहीं तो पिछड़ जाएंगे .कुछ दिनों में ये शब्द साहित्यिक प्रयोगों में आने लगेंगे .क्योंकि पुराने तो विस्थापित होते जा रहे हैं ,लोगों को दुरूह लगने लगे हैं ,उनकी अर्थवत्तापर संकट आता जा रहा है .और ये नये टटके शब्द जनभाषा के हैं ,साहित्य को जनभाषा में ला कर उसे जनता के लिए अति बोध-गम्य बनाने का प्रगतिशील विचार इन्हीं को सिर-आँखों धरेगा .आपके आस-पास भी कुछ  घूम रहे होंगे, ध्यान दीजिये पकड़ में आ जायेंगे ..

मेरी समझ में एक बात आती है जब तक इस वर्ग की उपस्थिति समाज में बनी रहेगी .भाषा उनके अनुकूल ढलेगी .ढलेगी तो चलेगी ,और चलेगी तो इधर-उधऱ पहुँचेगी .घरों में, बाज़ारों में  वर्ग के साथ वह भाषा आयेगी ज़रूर .

जनता बोले वही असली भाषा - आगे तो वही चलबे करेगी.
(पूर्व रचित)

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

निमंत्रण

*
               भ्रमण के लिये बाहर न जा पाऊँ तो साँझ घिरे ,अपने ही  बैकयार्ड में टहलना अच्छा लगता है . ड्राइव वे तक, मज़े से सवा-सौ  कदम हो जाते है दोनो ओर से ढाई सौ - काफ़ी है कुछ चक्कर लगाने के लिये.धुँधळका छाया होता है ,ऊपर आकाश में तारे ,या चाँद के बढ़ते-घटते टुकड़े . हाँ ,कभी पूरा चाँद या अक्सर ग़ायब भी. चारों ओर हिलते हुये पेड़, क्यारियों के विविधवर्णी फूलों के रंग ईषत् श्यामता लपेटे और मोहक हो उठते हैं.

          कहीं कोई भूला-भटका पंछी बोल जाता है ,नहीं तो केवल झिल्लियों की झंकार और रात्रि के निश्वास .लकड़ी के फट्टों की बाड़ के उस ओर ऊँचे वृक्ष-लताओं की भीड़ के पार थोड़ी निचाई पर क्रीक है ,जिसके पूरे विस्तार में दोनों ओर पेड़-पौधों का साम्रज्य.थोड़ा आगे चल कर क्रीक का घुमाव से रचित , घर से लगते इस छोर पर ओक तथा अन्य जंगली गुल्म-लताओं से मर्मरित वन-खंडिका .रात्रि  की माया में डूबा रोज़ का परिचित परिवेश नवीनता ओढ़ लेता है .
                ये लोग कहते हैं अँधेरे में क्यों घूमती हूँ  ,लाइट जला  लेना चाहिये .ये चाहियेवाली बातें गले से जल्दी उतरती नहीं .अस्तु,सबके अपने-अपने औचित्य. पर जब कभी खुद जला  देता है कोई हैं तो तीव्र प्रकाश पड़ते ही सारा माया-लोक ग़ायब.लोगों का तर्क है ,अँधेरे में कीड़े काँटो का डर  .मुझे मन ही मन हँसी आता है .वे लोग कोई तुले तो बैठे नहीं होंगे कि मैं आनेवाली हूँ एकदम हमला कर दें ,बेचारे तो खुद ही हम लोगों से  बचते-भागते  हैं.और इस हल्के-हल्के उजास झुटपुटी रोशनी में सीमेंट की श्वेत पगडंडी साफ़  झलक जाती है, आगे का सारा अंदाज़ अपने आप होता चलता  है.
                नीम अँधेरे की माया ही कुछ और है , सच और स्वप्न की झिलमिली, एक  आभास  का अवतरण  जिसमें इस दुनिया के बोध अधडूबे-से तिरते हैं. किरणों की द्युति निमीलित होते ही  दिशाएं ऐसी जैसे किसी ने किसी ने रंगीन चित्र पर झीना आवरण डाल दिया हो .उन श्याम-श्वेत आभासों में नये बिंब उतराते हैं. 
क्रमशः सारे रंग गहराई में डूबते विलीन होने लगते हैं ,एक लहर सब पर श्याम आवरण चढ़ा ,दुनिया को छाया-चित्रों में परिणत कर देती है.आकाश औऱ दिशाओँ की पृष्ठभूमि में जीवंत श्याम-श्वेत अंकन, कलाकार की कला का कमाल दिखाते हैं. दिन भर की भटकी, तपी  हवाओँ में शीतलता घोलती नित नई छापोंवाली ओढनी लपेटे रात उतरती है  दिन भर गरमाया  सूरज ढला कि ,बची बिखरी  किरणें समेट.रंगीन पाल फैलाये नौकायें उतर आती हैं नभ के नील-जल में .  गहराती छायायें वृक्षों से उतरती   ,जल-कण छींटती मंत्र सा बुद्बुदाती अपने जादू से ,दृष्य-अदृष्य को एक करने पर तुली रहती हैं. संकुल परिवेश विजन होने लगता है , चारों ओर वनस्पतियों का ऊँघ भरा  झुक-झुक जाता है   ,और चाँद नित नई  चंदन-टिकुलिया सा  दिशा के भाल पर सज जाता है
सजीली  साँझ  मुझसे मिलने आती है
                   तरुओं की छायाओँ और सघन झाड़ियों के फैलाव में श्यामल पट लहराती ,अलकों में हरसिंगार -जुही की गंध बसाये अभिन्न अनुचरी रात्रि संग ,उतरती चली आती है ..झिल्लियों के झनक उठते  स्वर ,जैसे  नूपुर बज उठे हों .विजन की स्तब्धता को थपक निद्रा-कर फिराती , सम्मोहित धरा पर आसीन होने को प्रस्तुत  . नील से अवतरित हो  रही , ऐसी सुहानी सखी को, द्वार बंद कर बाहर से  लौटा देना अपराध ही तो है.
                     इन शान्त क्षणों  में प्रकृति में बिखरे आनन्द -समारोह का साक्षी बनने को, श्यामा सुन्दरी का निमंत्रण,  मन का लोभ-संवरण नहीं हो पाता . इस गहन बेला में   पुलक से भर देने का उपक्रम , और फिर गहरी रात का आगमन .
चन्द्रमा की कलायें शनैः शनैः घटना फिर  क्रम-क्रम बढ़ना ॒, एक दिन एकदम विलीन  और   एक दिन अपनी सोलहों कलाओं के साथ  पूर्ण बिंब का ,निस्सीम आकाश से आ-समुद्र धरती  को स्नात करता, ज्योत्स्ना का ज्वार उठा देना ,प्रकृति के रमणीय आयोजन हैं. बहुत गहरा संबंध है हमारा इन से ,सागर से ,धरती से हवाओँ से और जल से भी.
                   कृत्रिम रोशनी के तीखे शरों से सलोनी संध्या और शान्त-शीतल रात्रियों के विलक्षण बोधों एवं सृष्टि के  मनोहर क्रिया-कलापों का  विलय , उचित है क्या ? कमरों में बंद रखने के बजाय  इस उद्धत दुराग्नही को  पशु-पक्षियों  को भरमाने के लिये खुला छोड़ देना जड़-जंगम पर अन्याय नहीं  तो और क्या है ? 

शुक्रवार, 18 मई 2018

हरफ़नमौला -

*
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं-  आपकी तारीफ़ ? 
भला कोई अपने मुँह से अपनी तारीफ़ करता है?
अब क्या-क्या कहूँ अपने बारे में, मुझे तो शरम आती है.
फिर भी बताना तो पड़ेगा ही  .लेकिन  तारीफ़ नहीं ,असलियत ही कुबूलूँगा.
हाँ, मैं हरफ़नमौला आदमी हूँ .बहुत काम कर-कर के छोड़ चुका . कुछ पढ़ाकू किस्म का भी रहा .अपने आप अनुभव करने में विश्वास है मेरा .कही-सुनी बातें दिमाग से निकल जाती है .ख़ुद करके देखना मुझे ठीक लगता है.
इन्टरनेट का ज़माना है . जानकारी के समुद्र भरे पड़े हैं, ऊपर से लोगों के अपने वक्तव्य भी .व्यक्ति के अनुभव व्यक्तिगत न रह कर उनका सामाजीकरण होता जा रहा है.दुनिया भर के तमाम जानकारियाँ हम एक क्लिक में पा सकते हैं.स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिये एक से एक पते की बातें तुरंत सामने.राजीव दीक्षित जी से लेकर पड़ोस के जगमोहन जी के टिप्स तक
सुबह खजूर खाने के फ़ायदों के विषय में मैंने कंप्यूटर पर पढ़ा तभी  खजूरो से संबंधित खूब जानकारी खोजी और प्रभावित हुआ .कितने प्रकार के होते हैं किसकी क्या ख़ूबी है  ,कहाँ के अधिक फ़यदेमंद हैं .पता चला आपको बहुत एनर्जी देते हैं खजूर ,तभी तो रोज़े के पहले इसे ही खाकर शुरुआत करते हैं लोग.और फ़ायदों का तो कुछ पूछिये मत पूरी लिस्ट की लिस्ट है.काफ़ी-कुछ कापी करके रख भी ली है.
और रोज सुबह दो खजूर खाने लगा  .
फिर किसी  जानकार ने अंजीर के गुण गिनाए.पढ़ा उसके बारे में भी और मैनै अंजीर खाना शुरू कर दिया था.रोज़ दो अंजीर ,रात को भिगो कर सुबह खाली पेट .कभी दूध में डाल कर  भी कम फ़ायदेमंद नहीं . हर तरह का फ़ायदा पाना पाना चाहता हूँ न .कितने दिन खाया यह तो ठीक से याद नहीं ,हो सकता है 
  3-4 महीने खाया हो -अभी भी एक पैकेट पड़ा है मेरे पास.क्योंकि फिर अमरूद के फ़ायदे सामने आ गये .बड़े विस्तार से लिखा गया था. इतना सस्ता फल और सेव से बढ़ कर गुणी. 
अमरूद 
पूरे मौसम खाती रही 
लेकिन जब फ़सल के दिन पूरे होने लगे  ,एकाध बार फलों में कीड़े दिखाई दे गये  ,देख कर पहचान में ही नहीं आते कि अंदर कीड़े भरे हैं मीठे भी ख़ूब थे.पर फल के अन्दर कुलबुलाते दिखाई दिये तो मेरा तो जी घिना गया .
इससे तो  भुने चने अच्छे . किसी गुणज्ञ ने आत्मानुभव के आधार पर खूब वाहवाही की थी .वह  भी खूब खाये मैंने. 

एक चीज खाता हूँ मन भर जाता है तो दूसरी का लग्गा लगता है ,कोई डाक्टर ने तो कहा नहीं कि  खाओ तो खाते चले जाओ.,आखिर को इतनी चीज़े हैं दुनिया में एक से एक बढ़ कर  .हरेक का अपना फ़ायदा. और शरीर को सभी तत्व चाहिये. फिर एक पर ही क्यों अटके रहें हम?
इसी क्रम में सेव,आँवला,हल्दी अजवाइन मेथी ,ज़ीरा और जाने क्या-क्या खा -खा कर छोड़ दिये 
सारी चीज़ेों के नाम भी अब तो याद नहीं ,कौन-सी कित्ते दिन खाई यह भी याद नहीं. कहाँ तक याद रखे कोई .
पर लिस्टें मेरे पास बहुत -सी चीज़ो के लाभों की  हैं और उनके बारे में पूरी जानकारी भी .किसी को चाहिये तो बताए. मिलेगा सब इंटर नेट पर परह बिखरा-बिखरा ,अलग-अलग ढूँढते फिरो ,मैंने एक जगह इकट्ठी कर रखी है .जिसमें सबका भला हो .  
"अपना स्वास्थ्य बनाओ,लोगों ,दुनिया  भर के अनुभव  पाओ . इन्टरनेट का लाभ उठाओ !"
*

रविवार, 13 मई 2018

गुड़ - शक्कर


 कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ ! एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त, सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला, पुटलिया सा भेली बना गँवार अक्खड़  ठस जैसा गुड़?
पर क्या किया जाय पहले उन्हीं बुढ़ऊ को याद करते हैं लोग.
 इस चिपकू बूढ़-पुरान के चक्कर में, चंचला किशोरी-सी शक्कर किस चक्कर में पीछे कर देते हैं लोग! माँ की लोरी में गुड़ का गुण-गान है -'निन्ना आवे ,निन्ना जाय निन्ना बैठी घी-गुड़ खाय.,गुड़ खाय.' यों कहावतों में शक्कर अब गुड़ से टक्कर लेने लगी है- तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर  ,शक्क्रर में कुछ मक्कर ध्वनि साम्य होने से कुछ लोगों ने शकर कहना शुरू कर दिया, एक  छोटा, प्यारा-सा नाम चीनी भी दे दिया.  विदेशी नाम पाकर वह और इठलाने लगी.. स्वाद की बात कह  रहे हैं आप ? हाँ क्यों नहीं आयेगा स्वाद ,गोरी छरहरी के नखरे भरे अंदाज. रस देंगे ही .खुदा जब हुस्न देता है नज़ाकत आ ही जाती है.
तो यह भी जान लीजिये शक्कर के रूप के पीछे बड़ा भारी केमिकल लोचा है, फार्मलीन काम आता है  उसके लिये . और फर्मिलिन जैसी मारक चीज़ की अस्लियत आप केमिस्ट्री की डिक्शनरी में देख सकते है. जो इसमें  रूप का गुरूर भरती है, उस फार्मलीन का 0.5 मिलीग्राम किसी भी आदमी को कैंसर से मार देने के लिए पर्याप्त है. तो ,शक्कर का रूप सँवारने में  23 हानिकारक रसायनों का प्रयोग होता है .तभी न  जानलेवा स्वाद पाती है
 सच्ची बात तो यह है कि शक्कर से रोटी खाना चाहो तो मिठास देने से पहले पहले दाँतो के नीचे पहुँचते ही करकराने लगती है ,कण बिखेरने लगती हैं .कितना भी घी लगा लो ,पकड़ से छूट निकलने में माहिर है.  झऱ-बिखर कर भागती है, जैसे विद्रोह पर उतारू हो.
ऊपर से  इस नखरीली को पचाने में  500 केलोरी खर्च करना पड़ता है.  , इसको बनाने की पक्रिया में इतना अधिक तापमान होता है कि फास्फोरस जल कर  खतरनाक हो जाता है. ऊपर से अपने ताव में हमारे भोजन के प्राकृतिक शक्कर को शरीर के उपयोग में आने से रोक देती है . वैज्ञानिको ने एक स्वर से चीनी को  इसके लिये दोषी माना है -जी हाँ, वही चीनी जो आप बड़े चाव से मिठा3ई ,चाय. शर्बत सब में खाते हैं.
 गुड़ में लोच-लचक है ,अपने हिसाब से मोड़-माड़ कर रोटी मे लपेट लो ,काट-काट कर खाते रहो, ,कोई डर नहीं कि  बाहर निकलने की कोशिश करेगा.  रोटी से बाहर भी आ गया तो मुँह में चिपका रहेगा ,कहीं जायेगा नहीं धीरे-धीरे घुलता, मिठास देता रहेगा .चीनी तो एकदम बिखरने पर उतारू हो जाती है. पहले कर्रकर्र टर्रायेगी फिर  जहाँ मौका लगा छूट भागेगी.
रोटी पर दानेदार घी लगा हो और उस पर लाली लिये सुनहरा गुड़, लंबाई में लगा  चोंगा-मोंगा बना  हाथ में पकड़ कर मौज से खाते रहो - घी और गुड़ मिल कर विलक्षण स्वाद-सृष्टि करेंगे .बातों -बातों में मुँह खुल भी जाए  पर साथ नही छोड़ेंगे.
 मुझे तो तिल की पट्टी और रेवड़ी भी शक्कर से  गुड़ की अधिक स्वादिष्ट लगती है .मलाईदार गर्म दूध हो और गुड़ की रेवड़ी साथ में. मुंह में रेवड़ी रहे साथ में दूध के घूँट भरते जाओं .संतुष्टि और पोषण पूरा मिलेगा.उसके आगे कौन चीनी घोल कर दूध घूँटना चाहेगा !रही तृप्ति और स्वाद की बात ! सो पूछिये मत ,स्वयं अनुभव कर  लीजिये
सीधा-सादा ,शरीफ़-सा गुड अकेला ऐसा है जो बिना किसी जहर के  बनता है गन्ने के रस को गर्म करते जाओ, गुड बन जाता है. इसमे कुछ मिलाना नही पड़ता.  ज्यादा से ज्यादा उसमे दूध मिलाते है और कुछ नही मिलाना पड़ता.धरती से जुड़ा है गुड़ उसी का सोंधापन  समाया है इसमें ,चीनी मैं कहाँ  वह अपनापा ,रसायनों की रसाई पूरी है वहाँ
 तो अब आप गुड़ खाइये और गुलगुलों का भी स्वाद लीजिये .याद रखिये - शक्क्रर में शक करने की बात यों ही नहीं है , चीनी नाम पाया है ,तो असलियत भी जान लीजिये .  मीठी-मीठी बन कर जान ले बैठेगी एक दिन - चीनी जो ठहरी !

शनिवार, 5 मई 2018

व्यक्ति की स्वाधीनता -

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कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के लिए दुनिया के दूसरे छोर के लिए रवाना हो गए.
उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन वे अपने जीवन का सम्मानजनक अंत चाहते हैं. उनका कहना हैं कि उनकी आज़ादी छिन रही है और इसीलिए उन्होंने ये फ़ैसला लिया .
(लंबे वक्त तक चले विवाद के बाद, गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया के एक राज्य ने 'असिस्टेड डाइंग' को कानूनी मान्यता दे दी है. लेकिन इसके लिए किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार होना चाहिए.)
गुडऑल ने अपनी ज़िंदगी को ख़त्म करने का फ़ैसला एक घटना के बाद लिया. एक दिन वे अपने घर पर गिर गए और दो दिन तक किसी को नहीं दिखे. इसके बाद डॉक्टरों ने फ़ैसला किया कि उन्हें 24 घंटे की देखभाल की ज़रूरत है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना होगा.डॉ गुडऑल कहते हैं, "मेरे जैसे एक बूढ़े व्यक्ति को पूरे नागरिक अधिकार होने चाहिए जिसमें 'असिस्टेड डेथ' भी शामिल हो."
उन्होंने एबीसी को बताया, "अगर कोई व्यक्ति अपनी जान लेना चाहता है तो किसी दूसरी व्यक्ति को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."
उनके इस निर्णय पर विभिन्न मत हो सकते हैं लेकिन
औरों पर पूरी तरह निर्भर होकर एक लाचार शरीर के साथ जीना - अपनी अस्मिता का क्षरण होते देखते रहना - एक सचेत प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये इससे से बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती.
और सच्चे अर्थों में वह जीवंत कहाँ रहा - 'औरों के सहारे तो ज़नाज़े उठा करते हैं.'
मैं, तुम्हारे लिये शान्ति की कामना करती हूँ ,डॉ. गुडऑल, तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारा ऊर्जस्वित जीव , संपूर्ण मानवी गरिमा सहित अपने विश्रामगृह में निवास करे !
फिर पुनर्नवीन हो ,नवोर्जा और नये उत्साह के साथ लौट आना अपनी कर्मभूमि में, जहाँ मानव-जीवन की निरंतरता और उत्तरोत्तर पूर्णता, फलीभूत हो सके !
तुम्हें मेरा नत-मस्तक प्रणाम !
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शनिवार, 17 मार्च 2018

मैं अश्वत्थामा बोल रहा हूँ --



शप्त मानवता के  विषम व्रण माथे पर लिये मैं,अश्वत्थामा ,युगान्तरों से  भटक रहा हूँ .चिर-संगिनी है  वह अहर्निश वेदना जिसकी यंत्रणा से विकल ,मैं वहाँ से भागा था .कितना लंबा विरामहीन जीवन जी आया ,अनगिनती पीढ़ियों को  बनते-बिगड़ते देखा .कितने युगों का साक्षी  मेरा मौन अभी तक नहीं भंग हुआ. 
समर  बीता कहां है सत-असत् का युद्ध हर जगह चल रहा है- व्योम में ,जल में ,थल में .
दृष्टा नहीं बन पाता ,भोक्ता रहा हूँ जिसका ,जिसके बहते घाव लिये चिरकाल यही सब देखने को अभिशप्त हूँ उससे निर्लिप्त रहना कहाँ संभव? वह दारुण युग जाते-जाते गहरे अवसाद की छायायें छोड़ गया - हर जगह विषाद के घेरे ,कहीं प्रसन्नता नहीं .बहुत समय लगा मुझे संयत होने में . 
 बीतती शताब्दियों के बीच एकदम चुप , बहुत  कुछ है कहने को मेरे पास ,पर कैसे , किससे कहूँ.  किसे अवकाश है ,और कहाँ धीरज ?
 मेरे जीवन में विसंगतियों का अंत कहाँ ,जीवन भर का उपेक्षित मैं.हँसी आती है सोच कर कि जब गोकुल में दूध-दही की नदियाँ बह रहीं थीं एक गुण संपन्न सद्विप्र का पुत्र दूध के धोखे आटे का घोल पिला कर बहलाया जाता रहा था.  
  जनो में,निर्जनो में ,देश-विदेश के पहचाने-अजाने लोगों के बीच चलता-फिरता हूँ .हाँ ,पहचाने लोग भी  हैं ,सामान्य जन नहीं जानते तो क्या,मैं चीन्हता हूं जिनके साथ रहा हूँ.काल के दीर्घ अंतराल के बीच जनमते हैं ,एक दूसरे से अनजान -पर मैं पहचान लेता हूं,अश्वत्थामा हूँ न .जी चुका हूँ कृष्ण के साथ उन्हीं के युग में,भीष्म,कर्ण,दुर्योधन,युधिष्ठिर, पार्थ,द्रौपदी ,कुन्ती, जो आज सब से अतीत हैं ,मेरे समकालीन थे.  युग-युग की पीर भरी ,यात्रा करते युग पर युग बीतते चले गये पर मेरा जीवन नहीं बीता, मेरा मौन नहीं टूटा .
विस्तृत काल खण्डों में बिखरे ,अधिकांश लोग जन्म लेते हैं ,परस्पर मिलते भी हैं- अपना देन-लेन पूरा करना है अभी .पर हिसाब की बही में नये अध्याय जुड़ने लगते हैं .फिर छुटकारा कहाँ?सांसारिकता में ,अपने राग द्वेष में ऐसे डूब जाते हैं कि भान नहीं रहता किधर बहे जा रहे हैं .पहचानते नहीं एक-दूसरे को  लेकिन पिछले संस्कारों से प्रेरित परस्पर जुड़ते - टूटते रहते हैं..इसी जग-बीती का एक भाग मैं भी .

ओह, आज कह रहा हूँ, उत्तेजित मन अपने अस्थिर आवेश में उतावला हो  सारा सोच-विचार खो बैठा था ,मैंने भी यही किया था.
(क्रमशः)