शुक्रवार, 7 मई 2021

राग-विराग - 11.

 राग-विराग - 11.

अनेकों अवान्तर कथाओं द्वारा रोचकता बढ़ाने के साथ नई-नई जानकारियां देते हुए तुलसीदास का  कथा-क्रम चलने लगा था. बीच-बीच में गाये जानेवाली उनकी स्वरचित स्तुतियाँ और आत्म-निवेदन सुन कर श्रोतागण मुग्ध हो जाते. उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी.लोक ने उन्हें सिर-आँखों पर बैठा लिया था. तुलसी की अनेक कृतियाँ सामने आ चुकी थीं , कथा-क्रम में और पर्वों के अवसर पर तुलसी के मुख से उनकी राग-बद्ध रचनाएँ सुन आनन्दित होते और कंठस्थ कर लेते थे. उनकी वाणी लोक कण्ठ में विराजने लगी. 

पण्डितों में सुगबुगाहट होने लगी, उन्हें लगा यह तो हमारा पत्ता काट देगा. विरोध करनेवाले उठ खड़े हुए. षड्यंत्र रचे जाने लगे, अनेक प्रकार से दूषण लगाए गये. शम्भू पण्डित ने कहा था, 'वह तुलसी! बड़ा पण्डित बना घूमता है. भाखा में लिखता है. अरे, देव-महिमा गान भी देवभाषा में नहीं कर पाता.'

  तुलसी का मन बहुत खिन्न हो जाता. फिर वे स्वयं को समझा लेते ,सोच लेते कि वे लोग अपने हित में बाधा पड़ते देख, मुझ पर दोष मढ़ते है.

लोक-भाषा में रचना को ले कर उनके पाण्डित्य पर कीचड़ उछाली गई किन्तु सनातनजी की आज्ञा शिरोधार्य कर ,संस्कृत में पारंगत होते हुये भी उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया में लोकभाषा को ही प्रमुखता दी .संस्कृत में रचना की थी,लेकिन अपना क्षेत्र लोक-जीवन ही रखा और लोक के बीच रह कर उन्हीं की बोली में भजनों और आत्म-निवेदनों द्वारा अपना रचना-धर्म निभाते रहे. संस्कृत के छुट-पुट छंदों का समय-समय पर प्रयोग उनके  विषय  की गरिमा को वर्धित कर देता था,और उतनी संस्कृत लोगों के गले उतर जाती थी.

गुणग्राही राजा टोडरमल और रहीम से मित्रता का सम्मान उन्हें प्राप्त था और अपनी निर्लोभी ,निस्पृह वृत्ति के कारण वे लोग तुलसी का विशेष सम्मान करते थे. तुलसी की लोकप्रियता बढ़ती रही.उनकी कीर्ति राज दरबार तक जा पहुँची.

एक बार उनके मित्र टोडरमल ने बातों-बातों में कहा,' आप गुसाईं हैं, आपके लिये पत्नी विहित है. अकेले क्यों रहते हैं? और वे भी वहाँ अकेली. सुना है वे भी पण्डिता हैं. उन्हें बुला लीजिये.' . 

तुलसी गंभीर हो गये बोले, 'इतनी दूर निकल आया हूँ ,अब वह सब कहाँ संभव है?'.

लेकिन मन का कोई तार झनझना उठा था. उद्विग्न मन को शान्त करते मर्मस्पर्शी पदों में प्रभु से बार-बार सांसारिक जंजाल से दूर रखने को अनुनय करते रहे. उनके वे निवेदन भक्ति-साहित्य को समृद्ध कर गए.

जब से टोडरमल ने रत्नावली का उल्लेख किया ,तुलसी सोच-मग्न रहने लगे. अनजाने ही उसकी बातें ध्यान में आने लगीं. मन को हटाने का यत्न करते ,रहे .राम के ध्यान में लगाना चाहते हैं पर चंचल मन ,भटक-भटक जाता  रातें को प्रायः अधसोये ही बीत जाती थीं.

उस रात विचित्र-सा स्वप्न आया -

उन्हें लगा रतन आई है. कह रही है ,'मुझे भी कुछ कहना है, कह कर  जाऊँगी .पत्नी हूँ तुम्हारी, मेरा अधिकार बनता है.'

 फिर लगा 

 द्वार के बाहर खड़ी  रत्ना हँस रही है, 'भागते क्यों हो ,मैं तुम्हें रोकती नहीं हूँ, न बाधा डालती हूँ. तुम्हारी सहयोगिनी हूँ. भागो मत, गला और सूखेगा,'

'मैं तुम्हारा बंधन नहीं थी ,रास्ता मैंने ही खोला था. 

'गुसाईं हो तो क्या ? पत्नी, माया नहीं अर्धाङ्गिनी है. तुम्हें भटक जाने देती क्या?

'नाहक भयभीत होते हो.' 

तुलसी गला सूखा जा रहा है, कुछ बोल नहीं पा रहे, जैसे कण्ठ में काँटे उग आए हों.

'अच्छा ठीक है ,तुम नहीं चाहते  तो यही सही.'

वह चली गई थी.

नींद उचट जाती है तुलसी की. वे किससे कहें,क्या कहें!

मन ही मन कहते हैं - रतन, तुमने कहा था ' मैं हूँ न!'

हाँ ,तुम हो.लेकिन. मेरा दुर्भाग्य कहीं तुम्हें भी... ,नहीं,नहीं यहाँ मैं निपट लाचार हूँ. मेरे कारण  कहीं तुम भी ..

 नहीं  खो सकता.! सच यह है कि मैं तुमसे नहीं स्वयं से भागा था. लगा मैं दुर्बल पड़ रहा हूँ, बहक जाऊँगा. दुर्निवार आकर्षण मुझे अपनी लपेट में ले लेगा.'

 पर यह बात रत्ना से नहीं कह पाते. बस एक बात कह पाते है - वे सब मेरे अपने थे ,छोड़ कर चले गये ,मैं कुछ नहीं कर पाया. यहाँ मैं विवश हूँ  मेरा साहस जवाब दे जाता है.' 

*

 .बहुत समय से नन्ददास से भेंट नहीं हुई, न उधर के समाचार मिले . पुराने बांधवों से मिलने-जानने की इच्छा बलवती होने लगी ,काशी जाने का विचार किया. 

कथा के पश्चात् जब अपनी इच्छा जताई तो श्रोता-समूह ने अपने प्रश्न उठा दिए. 

उनका कहना था आपकी कथा, कथा न रह कर साक्षात्कार करा देती है..हमें लगता है सब घटित होते हमने देखा है आस्था दृढ़ होती है .आत्मानन्द मिलता है.

ज़रा, हम लोगों का विचारिये - संस्कृत हमारे लिये वर्जित है. भले ही ज्ञान का भंडार भरा हो ,पर हमें उससे क्या लाभ ? वह सब  विद्वानो और पण्डितों के अधिकार में है. अपनी संस्कृति से परिचित करवानेवाला कोई नहीं .यदि ये कथाएं ,वार्ताएँ नहीं होंगी तो हम अँधेरे में पड़े रहेंगे.आपसे जो शिक्षाएँ मिली हैं, हमारे संस्कार जाग रहे हैं.

हम धर्म की शिक्षा से वंचित हैं, हमारे लिय कोई व्यवस्था नहीं कि अपना उन्नयन कर सकें ,अपनी वृत्तियों का परिष्कार कर सकें.

हमने देखा है और धर्मों में बचपन से बच्चों को उनकी रीति-नीति की बातें सिखायी जाती हैं ,हमारे यहाँ कोई ध्यान नहीं देता, सब अपनी-अपनी में पड़े रहते है. मंदिर में घण्टा बजाने और प्रसाद पाने जाते हैं. नीति- रीति ,और श्रेष्ठ संस्कार सीखने कहाँ जाएँ? 

आपकी संगत में अपार शान्ति मिलती है,जीवन्त आदर्श मिलते हैं. आस्थायें जागने लगती हैं. बहुत कुछ समझने -सीखने को मिलता है ..

तुलसी ने आश्वस्त किया,' 'कुछ दिनों का अवकाश, बस मैं लौट आऊँगा.' 

'तो महाराज हमारे बच्चों के लिए कुछ तो कीजिये .कुछ तो रह जाय हमारे पास .यहाँ तो कहाँ से सीखें जाने कोई बतानेवाला नहीं '.

एक वयोवृद्ध श्रोता बोल उठा 

'आप जो सुनाते हैं उसे लिपि-बद्ध कर दीजिये. क्या बच्चे क्या बड़े सबके लिये एक स्थाई धरोहर हो जाएगी.'

*

बहुत दिनों बाद नन्ददास से भेंट हुई ..

'वाह दद्दू, तुमने तो सब पर अधिकार जमा लिया ,औरों के लिए कुछ छोड़ा नहीं'.

'अरे ,मैने क्या किया?'

'वाह, राम-कथा कहते-कहते ,सब को समेट लेते हो. भगवान शंकर दुर्गा गणेश,सूर्य कोई भी बचता नहीं.' .

'अच्छा, वह बात!'

'मैं समाज में विग्रह नहीं चाहता .शैव-वैष्णव-शाक्त सब परस्पर पूरक ,है अंतर्विरोध कहीं नहीं .संप्रदायों में बांट कर आलोचना करना अनुचित है. 

मैं चाहता हूँ सबकी स्वीकृति, पञ्चदेव की मान्यता. लोग व्यापक परिप्रेक्ष्य में पौराणिक धारणाओं से परिचित हों, अपनी संस्कृति को जाने. मन में जातीय गौरव की भावना उत्पन्न हो.'

'दद्दू तुम्हें सारी दुनिया की चिन्ता है पर भौजी को जीवन से बिलकुल निकाल दिया. वे अपनी बात किससे कहें ?'

नन्ददास का भौजी से ताल-मेल बैठ गया है. कुछ मैत्री भाव जैसा दोनों के बीच.

रत्ना ने कहा था,' लौकिक जीवन को ठीक से जीते नहीं लोग. मैं सोचती हूँ देवर जी, कि उचित-अनुचित का अंतिम निर्णय जिनके हाथ है वे राम, संसार में व्याप्त हैं . उन्होंने जो कृपापूर्वक  प्रदान किया है उसका संयत-भोग करना उसका उचित सदुपयोग ही है .अपने भोगों से भागना क्यों?..जब तक उसे ग्रहण करें, मान लें कि इतना हमारा भाग था, आगे जैसी राम की इच्छा. अपने भोग में औरों का भी  ध्यान ,कि उन्हें कष्ट न हो. संसार की सुन्दरता ,रस, रूप गंध राम के प्रसाद हैं उनके आनन्दमय रूप का प्रसाद! भाग कर क्यों, भोग कर सार्थक माने! नित्य के संबंध  सँवारते चलें ,जग-जीवन सँवर जाय.पर असमय अध्यात्म सिर पर सवार हो जाता है और सारा खेल गड़बड़, जीवन का माधुर्य चौपट ! 

'कितनी शंकाएँ उठती हैं मन में, पर किससे पूछूं ? समाधान कैसे हो?. 

अच्छा देवर जी , तुम्हीं बताओ ,रामजी की  जीवन शैली से प्रेरणा लेकर अपना कर्तव्य करते हुए जीवन-यापन भक्ति नहीं कहलायेगी क्या?'

फिर रत्ना ने कहा था,' अपने विद्वान पति का थोड़ा सहयोग चाहती थी, दुनिया भर के लिये कथा-प्रवचन हैं ,एक अकेली स्त्री समाधान के लिये किसके पास जाय?' 

गृहस्थ जीवन में तुलसी को अनेक बार लगा था कि रतन कुछ कहना चाहती है .रात को विश्राम के समय शैया पर करवटें बदलती है ',पूछती है ,'सो गये क्या ?'

किन्हीं विशेष अवसरों पर जब वे कथा सुना कर लौटते हैं तो पूछती है,' काशीवाले पण्डित इस विषय में क्या कहते हैं?'

 प्रखर बुद्धि है.प्रश्नोत्तर करने से चूकेगी नहीं.विचारशीला है वह बहुत कुछ जानना चाहती है. 

 पर वे अपनी ही धुन में कुछ कहते, कुछ टाल देते हैं. 'थक गया हूँ' ,'नींद आ रही है' .

दुनिया भर के विवाद-विमर्श का यहाँ क्या काम ? 

घर, घर की तरह होना चाहिये- तुष्टि-पुष्टिप्रद, विश्राममय! 

*

तुलसी को जो खटक रहा था ,मुँह पर आ गया -

बहुत दिन हो गये नन्दू, पहले तुम समाचार देने को उत्सुक रहते थे,अब क्या बताने को कुछ नहीं रहा? मैं समझ रहा हूँ, इधऱ तुम्हारा व्यवहार बदल गया है.'

'क्या लाभ ,वह सब कहने से ?'

'ऐसी बात नहीं नन्दू ,मुझे जानने की चाह होती है.' 

'तुम्हें व्यर्थ परेशान क्यों करूँ ? रहेगा सब वैसा ही .क्या अन्तर पड़नेवाला है? तुम्हारा इतना जस फैल रहा है ,बड़े-बड़े लोगों से तुम्हारी मित्रता है हमलोग तुम्हारे आगे कहाँ ठहरते हैं....'

'बस करो ,बस करो नन्दू..जानता हूँ तुम क्यों कह रहे हो. दुनियावालों के लिये मैं कुछ भी होऊं ,घरवालों के लिये क्या हूँ ?जानता हूँ ,मैं भी समझता हूँ.और तो और, अब तुम भी मुझे गलत समझने लगे.' 


बहुत व्यथित हो गए थे.बोलते-बोलते चुप हो गये.

नन्ददास कुछ नहीं बोले ,जस के तस बैठे रहे.

तुलसी फिर कहने लगे, ' तुम भी असंतुष्ट हो.एक व्यक्ति मुझे समझता था अब वह भी ...मैं जान गया हूँ . 

नन्दू , तुम्हें सब-कुछ बता दूँगा  कुछ भी नहीं छिपाऊँगा.'   

 नन्ददास चुप बैठे ,सुने जा रहे हैं.         

'दोष किसी को नहीं दे रहा अपनी करनी का फल भोग रहा हूँ .कौन मुँह लेकर मैं अब वहाँ जाऊँ?' 

'क्यों ?कितना तो आदर-मान है तुम्हारा ..कथा सुनने भीड़ उमड़ती है .तुम्हारे  भजन गली-गली गाये जाने लगे है .तुम क्या हो .ये समाचार क्या वहाँ नहीं पहुँचते?'

'तुम नहीं समझोगे भाई, मैं जनम का अभागा, उनके सामने पड़ने जोग नहीं रहा. कैसा भूत सवार हो गया था. कुछ नहीं सूझ रहा था. मैं क्या कर बैठा!

'उस दिन घर में पाँव रखते ही रतन को न देख कर मैं समझ गया मायके गई होगी. बहुत दिनों से कह रही थी .

बावला सा उसे लौटा लाने को उतारू हो गया. 

बरसात की तूफ़ानी रात ,जमुना चढ़ी हुईं थीं.'

बोलते-बोलते थक गए हों जैसे ,कुछ सुस्ता कर बोले-

'नहीं भूल सकता हूँ. 

'वे लोग जान गये कितना खोखला हूँ मैंने अपने साथ उसकी गरिमा भी चौपट कर दी. उनके लिये मैं क्या रह गया? अब तो मुझे अपने पर भी विश्वास नहीं रहा.

'और मैं किस वेष में था, जानते हो?

उमड़ती लहरों में ,गाँठ खुल कर धोती न जाने कब  बह गई पता नहीं चला. सिर का अँगौछा कमर में बाँधे, केशों में तिनके उलझे, सर्वाङ्ग से पानी टपक रहा ,कुछ काई जैसा हरापन यहाँ-वहाँ चिपका - विचित्र वेश . पाँव में जूते होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.

उस समय जिस जुनून में था ,सिर पर पागलपन सवार था.

उनके द्वार जा पहुँचा. 

 खुलवाने की हिम्मत नहीं पड़ी थी.

रतन के कमरे में कुछ रोशनी लगी. खिड़की खुली थी .यही विचार कर रहा था कि कैसे चढूँ ,इतनें में एक रस्सी सी झलकी ,हवा में हिल रही थी ,मुझे ध्यान ही नहीं कैसे चढ़ा और अन्दर कूद गया. .' 

गला कुछ अटका, रुक गए तुलसी..साँस ले कर फिर बोलने लगे-

'.धमाके की आवाज़ हुई होगी .'कौन है ?' ,'क्या हुआ'?' पूछते घर के लोग दौड़े आए 

- 'क्या हुआ?'  'क्या हुआ?'

उस अश्लील,कुवेश में, हतबुद्ध -सा हो गया मैं, सामने था. 

सबकी दृष्टियाँ मुझ पर टिक गईं..  

एक ही प्रश्न - पाहुना! इस कुबेला? ,कैसे इतनी बुरी दशा में? खिड़की से कैसे?

जो ध्यान आया ,बता दिया .

तब देखा गया, रस्सी कहाँ से आई? वहाँ तो एक अधमरा साँप पड़ा था.


रतन अपने घर में किसी से आँखें नहीं मिला पा रही थी.

झुका सिर, वह मुख जैसे किसी ने खड़िया पोत दी हो.

कितना प्रसन्न रहती थी! घर भऱ की लाड़ली,मानिनी पुत्री एकदम हतप्रभ,विवर्ण !

जिसकी पत्नी होने का गर्व था, उसी के कारण लज्जा से गड़ी जा रही थी.

प्रारंभिक प्रश्नोत्तरों में मेरे उत्तर कितने अपर्याप्त ,कितने संदिग्ध,कितने भ्रामक!

कोई कितना समझा, पता नहीं पर चुप रह गये थे वे लोग. 

बस एक दृष्टि बहिन पर डाली थी फिर बात को सँभालते हुए बड़े साले ने कहा- 'उन्हें सहज हो लेने दो.' 

और वे सब वहाँ से चले गये थे.

 एक धोती और उपरना भेज दिया था.


सारे आदर-मान पर पानी फिर गया .

सोचते होंगे ऐसी कुवेला में, मलीन-गर्हित रूप धरे मैं, सीधे रास्ते न आकर क्यों अनिष्ट जैसा  खिड़की से आ घुसा ?

-  आशंका से भरे कैसे देख रहे थे मुझे! 

उनके कुल में आ मिले दूषण सा, मलीन कुवेशी, अवाञ्छित प्रसंग का प्रश्न बना मैं, वहाँ सिर झुकाए खड़ा था .

वह निन्दित अध्याय फिर स्मरण न हो- मैं कभी सामने ही न पड़ूँ.

इतने बरस हो गये ,गुरुदेव ने संस्कारित किया था, दीक्षा दी थी.

कभी-कभी लगता है उस सब का लोप कर एक अश्लील-अमंगल पहेली  रह गया हूँ मैं.

'भान होता है, बचपन का कौपीनधारी राम्बोला ,हीन-मलीन वेष में,सबकी तिरस्कारपूर्ण दृष्टियाँ झेलता, वंश का कलंक बना. वहीं का वहीं खड़ा है!' 

वह दैन्य और वाणी का निरीह कम्पन नन्ददास  को स्तब्ध कर गया.

लेकिन उनका अंतिम वक्तव्य सुनना अभी शेष था.

तुलसीदास ने कहा था - 

'जिसने वह अशुभ-अपावन गर्हित वेष देखा वही जानता होगा कि कितने बड़े मर्यादा-भंग का दोषी हूँ मैं !'

*

(क्रमशः)


  








बुधवार, 28 अप्रैल 2021

राग-विराग - 10.

*      

            उस दिन हड़बड़ा कर तुलसीदास बड़े भिनसारे ही काशी से निकल पड़े थे. अंतर्मन से पुकार उठ रही थी - 'हे राम , अपनी शरण में ले लो!' 

'अपने ऊपर बस नहीं रह गया. कुछ सोचना चाहता हूँ कुछ ध्यान में चला आता है. मन थिर नहीं होता, कहाँ-कहाँ भटक जाता है .

'ऐसा उचाट मन ले कर कैसे रहूँ मैं? अधिक परीक्षा मत लो प्रभु!'

 बहुत अशान्त हो उठते है वे - हर समय लगता है कुछ छूट गया,कुछ रह गया. 

फिर भी पग चलते चले जा रहे हैं.

    रास्ते के ग्राम-नगर उजाड़ हुए-से पड़े हैं, सर्वत्र भूख और अकाल की गहरी छायायें डोल रही हैं.सब कुछ श्री-हीन हो उठा है.

देश में घोर दुर्भिक्ष का ताण्डव.गाँवों से उमड़-उमड़ कर लोग नगरों की ओर पलायन कर रहे हैं ,पर सब साधनहीन हो गये. खोजने पर आजीविका नहीं मिलती,.कैसे जियेँ?

 व्यापार ठप्प पड़े हैं, कारीगर बेकार -कोई उपाय नहीं. चाकरी तक का जुगाड़ नहीं हो पाता. किसी को अपना ही पूरा नहीं पड़ता, दूसरे को क्या दे? इस दुष्काल में भिक्षा भी सहज नहीं. कैसा समय आ गया है, हर व्यक्ति असन्तोष से भरा, अभाव, स्थाई-भाव बन कर मनों में बस गया है. हर जगह वही हाय-हाय!

कैसा विषम काल है!


       संतप्त मन ले आगे चल पड़ते हैं अंतर्मन पुकार उठता है-

'हे राम, कहाँ हो ?अपनी करुणा-दृष्टि इधर फेरो? कृपा करो, प्रभु!'

  अनेक नगर-ग्राम घूमे,.कहीं विश्राम नहीं. 

मार्ग में कितने जनों से मिलना हुआ. सबकी अपनी दुख गाथा. मिथिला के एक साधु से मन कुछ मिला.उसी से बातें होने लगीं,

.'कलयुग में हमारे अधिकांश धर्मस्थल दूषित कर दिये गये ,बड़ा दुख होता है देख कर,' तुलसी ने कहा, 'आस्थाहीन जीवन हो गया,  धर्म-कर्म सब भ्रष्ट. सब-कुछ भूल कर मनुष्य अंधाधुन्ध दौड़ में लगा है.

'धरती संतप्त. बारंबार महामारी और, अकाल का फेरा. कितने तीरथ ,कितने देस, नगर देखे, मन को कहीं चैन नहीं.' 

वह बताने लगा, 'ऐसा ही अकाल मिथिला में पड़ा था ,तब राजा जनक थे वहाँ थे. मैं जा रहा हूँ वहीं, जहाँ भूमि से सीता देवी प्रकटी थीं, प्राकट्य तो वास्तव में भूमिजा का हुआ था और सब ने अपनी-अपनी माताओँ के उदर से जन्म लिया था.' 

माँ जानकी के प्राकट्य-स्थल दर्शन के लिये वे उसी के साथ सीतामढ़ी चल दिये. 

अपने स्थान पर पहुँच कर वह अपने समाज से जा मिला.

उसने तुलसी से पूछा था,'तुम कहाँ रहोगे ?हमारे समाज में शामिल हो जाओ.' 

तुलसीदास किसी नियंत्रण में नहीं रहना चाहते थे ,

मन ही मन सोचा -

'माँ जानकी की  भूमि है ,जैसा रखेंगी, रहूँगा.'  

 एक दिन मन्दिर के चबूतरे पर बैठे-बैठे अपने आराध्य के साथ माँ सीता के विवाह की कल्पना करने लगे. उस दिन सुबह से भिक्षान्न नहीं मिला था, शरीर शिथिल होने लगा, पलकें मुँद गईं.

अचानक कानों में आवाज़ आई,'लो प्रसाद ,ले लो.'

तुलसी सजग होते उससे पहले ही उस नारी-मूर्ति ने उनके हाथ में एक दोना थमाया और पलट कर चल दी. दोनों हाथों से प्रसाद का दोना माथे से लगाया. 

 उन्होंने देखना चाहा पर दृष्टि में केवल नीली साड़ी की सुनहरी किनारी से झलकती महावर रंजित एड़ियाँ देख सके, नूपुरों की हल्की सी खनक वातावरण में समाई थी.

नारी-मूर्ति  मन्दिर में प्रविष्ट हो गई थी .

प्रसाद पर दृष्टि गई - दोने में दो पुए!

.मन पुलक उठा, 'वाह, पुए !'

 कितने दिनों बाद वह स्वाद उन्हें याद आ गया .

      पहली बार नीमतलेवाली ताई ने पुआ दिया था - कितना स्वाद! कितना रस!

छः-सात बरस के रहे होंगे ,पुनिया-माँ भी राम जी के पास सिधार गईं थी ,अकेला गलियों में भटकता बालक, जो मिल जाय खा लिया. कोई मुँह लगाने को तैयार नहीं. सब जानते हैं यह बालक अशुभ है, जिसके पास रहेगा उसी का अनिष्ट करेगा.

इतनी बड़ी दुनिया, पर अपना कोई नहीं- अकेला, अनाहूत, त्याज्य!

'राम्बोला' कहते थे सब उसे

नीमतलेवाली ताई कहतीं,' अरे बेचारा ब्राह्मण बालक ,काहे दुरदुराते हो!जियेगा तो वह भी न!' ,

प्रायः वही दिन में एक बार खाने को कुछ दे देतीं.

अरे हाँ पुआ ?

सारी स्मृतियाँ पृष्ठभूमि में जमा हो गई हैं, मौका मिलते ही झाँक जाती हैं.

         नवरात्र जैसे कुछ गिने-चुने दिन होते थे जब भूख से अकुलाता बालक पेट भर स्वादिष्ट भोजन पाता था..

      ऐसा ही एक बस्योढ़ा का पर्व था, सुहागिन  महिलाएँ वस्त्राभूषणों से सज कर नीमवाले चबूतरे पर एकत्र हो, शीतला माता को पूजती थीं. वृक्ष के थाँवले में कुछ मूर्तियाँ और सुगढ़-अनगढ़ प्रस्तर पिंडियाँ रखी रहती थीं . 

वही उनकी पूजनीय थीं. देवी के गीत गाती वे प्रसाद की डलियाँ जिसमें पूड़ी, पुए काले चने आदि का प्रसाद होता, थाँवले से सटा कर रख देतीं. और पूजा की वस्तुएँ रख कर बैठ जातीं, माँ को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रशंसा में गीत गातीं. उनके कण्ठों से निकले देवी के गीतों के बोल वातावरण में गूँजने लगते. 

माँ से प्रार्थना करते हुये धूप-दीप जला कर पूजतीं ,आँचल पसार कृपा की याचना हेतु, चरणों में झुकतीं. 

चबूतरे के एक कोने में बैठा रामबोला रुचिपूर्वक देखता रहता.,

ताई एक पूरा पुआ और चने के साथ हलवा-पूड़ी का प्रसाद उसे बुला कर देतीं .अन्य,स्त्रियों से भी प्रसाद पा कर वह अपना भरा हुआ दोना ढककर रख देता. जानता था  नीम पर बैठे कौए ताक लगाए हैं.

वे सब थोड़ी देर बैठतीं. उनके बच्चे प्रसाद खाते  चारों ओर मँडराते रहते.  दूध-पूत के असीस अपने आँचल में समेट, वे धोक दे पूजा का समापन करतीं. 

सब चले जाते, तब नीम तले के उस एकान्त में रामबोला निःशंक हो कर थाँवले के समीप आ बैठता.

       हल्दी-कुंकुम लिपटी पिण्डियाँ विराजी रहतीं, धूपबत्ती से उठता धूम  लहराता हुआ हवा में गमक भरता, पूजा के दीप थोड़ी देर जल कर बुझने लगते. हर दिये की बात्ती बुझने से पहले, सारा तेल खींच कर लौ उठाती फिर एक चिंगारी छोड़ शान्त हो जाती. अंतिम धूम-रेखा के साथ जो सोंधी गन्ध नासापुटों में समाती वह रामबोला को बहुत भाती थी, दीपों के बुझने तक वह वहीं बैठा रहता. फिर अपना प्रसाद उठा कर .देवी माँ के फैले आँचल तले, नीम की छाँह में फसक कर बैठ जाता और परम सन्तुष्ट भाव से  वह विपुल प्रसाद जीमता. पेट भर कर वह अभी-अभी सुनी हुई लय-तान वाला कोई गीत गाते-गाते परम तृप्ति से वहीं सो जाता. 

बरसों बाद आज फिर भूख से शिथिल रामबोला तुलसीदास बना, पुओं का प्रसाद  पा गया है!.

कुएँ पर जाकर दोना आड़ में रख हाथ धोये और पुए का टुकड़ा तोड़ कर मुँह में चाला .

'अहा!' 

निराला ही स्वाद था उन पुओं का, जैसे अमृत घोल कर बनाए हों.

परम सन्तोष से खाता रहा वह. लगा जन्म-जन्मान्तर की क्षुधा शान्त हो गई. मन अनूठी तृप्ति पा गया.लगा तन में नई ऊर्जा लहरा उठी.

हृदय अपार कृतज्ञता से भर आया.

       चलते समय मन्दिर के खुले द्वार से दृष्टि भीतर गई, हल्की रोशनी में आसन पर विराजमान माँ की झलक मिली. उन्होंने शीष झुकाया विनती की - 'माँ, इस दीन अनाथ पर अपनी करुणा-दृष्टि बनाए रखना!' 

  चलने के लिेए मुड़ने लगे तो, लगा कोई कह रहा है - 'यहाँ क्या कर रहा है, वे तो अवधपुरी में हैं.'

    * .

 वे अयोध्या चले आये.

तभी वसन्त-पञ्चमी का पर्व पड़ा. दुष्काल की मार ऐसी कि अन्नदान कर पुण्य बटोरने के अवसरों पर भी जब लोग स्नान कर पुण्य कमाना चाहते हैं तो लाई गई खिचड़ी आधे याचकों के लिये भी पूरी नहीं पड़ती. अनगिनती हाथ फैले रह जाते हैं.

      खिन्न मन से वे घाट पर बैठे सरयू का प्रवाह देखते रहे - 'प्रभु, इस सरयू में प्रवेशकर तुम अपने धाम चले गये, इन दुखी जीवों को क्या चिरकाल इसी प्रकार दग्ध होते रहना है?'

मन ही मन सोच रहे थे - जिसने आपना सारा जीवन लोक-रक्षा और कल्याण के लिये अर्पित कर दिया, उसके भक्त, लोक से विमुख हो अपने लिये सुख खोज रहे हैं.धर्म पर आधात पर आघात हो रहे हैं  और वे अन्याय और अनीति का चारों ओर बोलबोला देखते हैं और अपने रस-रंग में मग्न हो जाते हैं,स्वाभिमान का क्षरण हो गया है. अपमान और दुर्दशा झेलते रह कर जीना जैसे नियति बन गया हो,समर्थ जन भी जातीय पराभव से उदासीन अपनी सुख-लालसा पूरी करने में लगा है.

 तट पर मेला लगा था स्नानार्थियों से दक्षिणा पाने के लिये अनेक कथा-वाचक अपनी चौकियाँ सजाये बैठे थे.

तुलसीदास वहीं आँखें मूँद कर प्रभु का स्मरण करने लगे , लोक-दशा  देख मन उद्विग्न हो रहा था.

 वे आँखें मूँदे गुनगुनाने लगे - उस भाव-लीन अवस्था में अनायास उनका स्वर मुखर होता गया ,जैसे अंतर्मन से अनवरुद्ध पुकार उठ रही हो  गहन-गंभीर स्वर गूँज उठा -

'खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,बलि, 

बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। 

जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, 

कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ 

बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, 

साँकरे सबै पै, राम! रावरे कृपा करी। 

दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! 

दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥'


अंतिम पंक्तियाँ उन्होंन दोहरा कर गायीं,जैसे जन के दुख सुनाकर राम को अनवरत टेर रहे हों .

       आसपास के लोग शान्त हो कर सुनने लगे थे. सामयिक दशा का सहज लोक-भाषा में चित्रण जिसके कानों में पड़ा खिंचा चला आया .

.स्वर थमने के बाद कुछ क्षण चुप्पी छाई रही. फिर कुछ लोग समीप आ गए.

'महाराज आप बहुत गुणी लगते हैं.'

'रामप्रभु का साधारण सा सेवक हूँ, उन्हीं के गुण गाता हूँ .सब कुछ देखता हूँ और उन्हीं से कृपा की याचना करता हूँ.' 

'फिर तो हमें आपको सुनने का आनन्द मिलता रहेगा?'  

'अवश्य, यह तो मेरा प्रिय कार्य है'. 

'वैसे आप क्या करते हैं महाराज?'

'कथावाचन करता रहा हूँ ,ज्योतिष की भी थोड़ी जानकारी है वही करता था अब सांसारिकता से वैराग्य ले कर अपने प्रभु के चरणों में चला आया.'

'तब तो हमारा भी भला हो जायेगा.'

       और तुलसी रामघाट पर कथा सुनाने लगे. अपने वर्णन-कौशल से साक्षात् चित्रण करने मे सिद्धहस्त थे,.पर्वों के अनुरूप कथायें और अपने रचेी स्तुतियों एवं आत्म-निवेदन के पदों का सुमधुर गायन उनके कथ्य में  प्रामाणिकता का संचार कर देता था.


उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था .

 संगीत का ज्ञान था,कंठ में स्वर था जो बरबस ही मन को खींच लेता था.संवेदनशीलता और विद्वत्ता ,के साथ,श्रेष्ठ गुरुओं से मिले संस्कार उनके औदात्य को उजागर करते थे. व्यक्तित्व सुदर्शन था ही.अपने वस्त्रों के लिये कभी सचेत नहीं रहे थे तुलसी पर विवाह के बाद रत्ना ही उनकी सँवार का ध्यान रखती थी, कहती थी - कथावाचक की वेष-भूषा का प्रभाव पड़ता है , व्यास पीठ पर बैठें तो सुवेश धारण कर माथे पर तिलक-चन्दन से सज्जित हो कर.पवित्र रुचिर वेष सुननेवालों को प्रभावित करता है.  

.दस वर्ष से भी अधिक  रत्ना के साथ रह कर वे इस ओर भी सावधान रहने लगे थे. 

उसी ने काँधे पर उत्तरीय सँवारना सिखा दिया था.

एक बार उन्होने नन्ददास से कहा था-

'सच कहूँ नन्दू ,तुम्हरी भौजी ने सिखा दिया कि वाणी के अनुकूल भूषा भी सुरुचिपूर्ण होना वांछित है..

'मुझे कपड़े की पहचान आज भी नहीं है ,दूकानदार ठग ले तो पता भी न  चले ,पर मुझे खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती, यजमानी में मिल जाते हैं,' 

         कथावाचक बहुतेरे थे पर नोन-चून के लिए दक्षिणा की आग्रही और निस्पृह-निष्ठा से प्रेरित वाचन में ज़मीन-आसमान का अन्तर होता है.

प्रथम दिवस से ही तुलसीदास लोक-प्रिय होने लगे थे. 

जब व्यासपीठ से कथा का प्रारंभ हुआ ,गणेश-वन्दना के स्वर गूँजने लगे -'गाइये गणपति जग वंदन...'

श्रोताओं का हृदय आनन्द से भर गया .एकदम नई स्तुति!

 किसी ने कहा,हाँ, वे अपनी स्तुतियाँ और निवेदन स्वयं रचते है.'

लोगों की दृष्टियों में उनका सम्मान बढ़ गया.

फिर कथा की भूमिका बँधने लगी.

 सर्वप्रथम राम-कथा किसने -किसे सुनाई - शंकर-पार्वती का उल्लेख कर तुलसी रुच-रुच कर काकभुषुण्डि,की कथा सुनाने लगे. पूरे मनोयोग से रसास्वादन करते श्रोता सुन रहे थे. भक्तिरस से भावित.गहन-गंभीर स्वर, और पुराण-सम्मत विद्वत्तापूर्ण व्याख्या से विभोर थे

अनायास तुलसी ने नई बात कह दी ,'लगता है हमारे भुषुण्डि जी को दही पुआ बहुत प्रिय है.

माँ जानकी के प्रसादामृत का स्वाद तुलसी कैसे भूलते?

 बोले,' पुआ कैसा लगता है आप लोगों को?'

श्रोताओं का कौतूहल जाग उठा.

 एक साथ अनेक स्वर उठे -'हमें तो बहुत भाता है'.

तुलसीदास मुस्कराये.सब के मुखों पर स्मिति छा गई. 

'बालरूप प्रभु राम को माता कौशल्या ने गाढ़ा-गाढ़ा दही रख कर पुआ पकड़ा दिया .'

'और हमारे भुषुण्डि जी? काग-देह तो थी ही, भरी उड़ान और प्रभु के हाथ से छीन लाये.

देखा आपने, भक्त कैसे अपने को अपने आराध्य की लीला से जोड़ लेता है?'

'और जब उन्होंने कृष्णावतार लिया तब भी चूके नहीं ,उसी काग-रूप में बालकृष्ण के हाथ से माखन रोटी झपट लाये.'

श्रोताओं को संबोधित कर बोले,' कल्पना कीजिये उस दृष्य की ,काग महाराज आनन्द से सामने बैठे स्वाद ले ले कर, मानो कह रहे हों, 'लो प्रभु हम हैं तुम्हारे भक्त ,उच्छिष्ट पा कर तृप्त हो रहे हैं,'

और प्रभु चकित-विस्मित भाव से हाथ से इशारा कर माँ को दिखा रहे हैं - 'वो मेरा पुआ .ले गया..!'

आनन्दित श्रोता झूम उठे..

अंत में समापन -- तुलसीदास जी के स्वर गूँजने लगे - 

'मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥ '

और श्रोताओं ने पंक्तियाँ दोहराते हुए उस स्तुति में अपना स्वर मिला दिया! .

पूरा रामघाट और सरयू के दोनों तट श्रीराम के महिमा-गान से गूँजने लगे ..

*

(क्रमशः)

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

राग-विराग - 9.

*

वापसी में रत्ना बहुत चुप-चुप थी .

 नन्ददास बत करने का प्रयत्न करते, तो हाँ,हूँ में उत्तर दे देती.

वे उसकी मनस्थिति समझ रहे थे..

कुछ देर चुप रह कर उन्होंने नया विषय छेड़ा -

'क्यों भौजी,तुम्हारे पिता ने तुम्हारी शिक्षा पर खूब ध्यान दिया?'

रत्नावली उनकी ओर देखने लगी

'वैसे तो लोग लड़कियों की शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं देते ,जानते हैं पढ़-लिख कर क्या करेगी, अंततः गिरस्थी करना है सो थोड़ा-बहुत पढ़ा कर छुट्टी करते हैं.पर भौजी तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें कितना आगे बढ़ा दिया, पूरी विदुषी बना दिया.' .

रत्ना  के मुख पर चमक आ गई थी  

'हाँ, देवर जी, मेरे पिता का विचार था लड़की की रुचि है तो उसको पूरी शिक्षा मिलनी चाहिये..'कुछ रुक कर बोली, 'माँ कहती भी थी उसे गृहस्थी ही तो करनी है कौन शास्त्रार्थ करना है .उनका उत्तर होता ,क्यों शास्त्रार्थ नहीं कर सकती क्या?भारती का नाम नहीं सुना ?मण्डन मिश्र से कम थी क्या! उसका चाव भी देखो ,उसकी बुद्धि देखो ...'

''तो तुम शुरू से तीव्र बुद्धि रहीँ.. ..'

'मेरा बचपन कुछ अलग-सा रहा. गुड़ियों के खेल मेरा मन नहीं बाँध पाते थे. घर में ग्रंथों पर विवेचन होता मैं ,खेलना छोड़ कर वहाँ जा बैठती थी. देवर जी, बचपन का जीवन में बहुत महत्व होता है ...,संस्कारों की नींव पड़ती है ,सबंधों को पहचानना आता है..मुझे तुम्हारे दद्दा के लिए बहुत लगता है - उन्हें तब भटकना पड़ा. अपनापन पाने को कितना तरसे हैं. वे दुःखद यादें अब भी उनके मन को विचलित करती हैं.' . ..

नन्ददास को सब याद है ,यह भी याद है कि दीनबंधु पाठक अपनी पुत्री को तुलसी से ब्याह कर परम संतुष्ट थे. ,बोले थे -जैसे मण्डन मिश्र और भारती ,ऐसे ही ये युगल- तुलसी और रत्ना .हाँ, कितने अनुरूप ,रूप-गुण विद्या-बुद्धि में सब प्रकार समतुल्य.

कैसी फबती है जोड़ी!

 नज़र लगी थी लोगों की उस पर .

रत्ना से संवाद का तारतम्य जोड़ते हुए बोले.

'हाँ भौजी, लेकिन फिर भी उनने बहुत कर लिया.' 

'बहुत अध्यवसायी हैं वे,क्या स्मरणशक्ति पाई है ,और बुद्धि कितनी तीक्ष्ण .पर कुछ संस्कार बचपन से मिलते हैं...परिवारजनों के साथ रह कर और भी बहुत कुछ..'  कहते-कहते  रत्ना चुप हो गई.

कुछ देर दोनों चुप रहे..नन्ददास ने फिर उनके पीहर की बातें छेड़ दीं. 

रत्ना को याद है, पिता ने कहा था,' अपनी दीप्तिमती कन्या के लिये तुलसी जैसा वर पाकर मैं  संतुष्ट हूँ.'

उसके गौना होने तक उसकी शिक्षा में कोई कसर नहीं रहने दी. 

रत्ना भी पूरे मनोयोग से पढ़ती और ग्रहण कर लेती ,माँ कहतीं उसे गृहस्थी के काम सीखने दो.' 

पिता का उत्तर था ,'सब सीख लेगी .कौन सास-ननद बैठी हैं उसका कौशल देखने को? जमाई के साथ रहना है उन्हीं के अनुरूप बन कर रहे.'

रत्ना बताये जा रही थी

'मेरे पिता! हाँ, मेरे पिता ने मुझ पर बहुत ध्यान दिया. कहते थे मेरी बेटी किसी से कम नहीं है.मेरी रुचि भी थी, ईश्वर कृपा से याद भी जल्दी हो जाता था ..बड़े प्रसन्न होते थे जब मैं धड़ाधड़ उनके सामने पाठ सुनाती थी.

वे कहते थे प्रारंभ से बीज पड़ा है तो फलेगा जरूर ,और मनचाहे पात्र के रूप में अनुकूल परिस्थितियाँ उन्होंने खोज भी लीं.'

रत्ना ही बोलती रही ,' पति, लाखों में एक मिले. उनके सान्निध्य में, उनकी विद्वत्ता और ज्ञान का अंश मैं भी पाना चहती थी. पर उन्हें इतना अवकाश कहाँ रहा!' एक गहरी साँस निकल गई .

 नन्ददास ने कहा, ' मुझे तुम्हारे ब्याह की याद है -

'कुँवर-कलेवा पर तुम्हारी सखियाँ छेड़ रहीं थीं,जमाई राजा ,गुमान मत करना हमारी रतन भी कम नहीं है. कविताई करती है ,छंद-पिंगल जानती है.

वो भूरी आँखोंवाली लड़की थी न खूब बोल रही थी.'

'अच्छा ,गौरी. हाँ, उसे भी पढ़ने-लिखने का चाव था .'..

.'अब कहाँ है वह?' 

'बड़ी दूर ब्याह गई. एक बार मिली थी. बहुत मन करता था मिलने का पर, मै मायके जा ही कहाँ पाती थी.' 

नन्ददास ने टूटती कड़ी जोड़ी, 'कह रही थी ,'दायज में अपने साथ पुस्तकें भी ले कर आयेगी हमारी रतन. तुम्हारे घऱ.

'इस पर कोई बोला - अच्छा है दोनों पढ़ते-पढ़ाते रहेंगे.'

'अरे, इतने साल हो गये ब्याह को.  तुम तो इतने छोटे थे, अभी तक याद है?'

'इतना भी छोटा नहीं था और तुम्हारी शादी तो मेरे लिए खास थी. '

' तुम्हें पता है भौजी, किस ने टोका था - कोहबर के खेल में सावधान रहना दोनों वहीं शास्त्रार्थ न करने लगें!'  

सब लोग खूब हँसे थे.

'सखियाँ मेरे भाग्य पर सिहाती थीं. कहतीं रतन, तुझे तो खुला आकाश मिल गया.' 

रत्नावली का ध्यान अपने विवाहित जीवन पर चला गया -

दस बरस से अधिक पति के साथ अंतरंग रही थी, सोचती थी ,बचपन से तरसा हुआ मन संतुष्ट हो जाये ,अन्य सारे सम्बन्धों की कमी पूरी करना चाहते हैं. विद्वद्चर्चाएं करने का अवकाश कहाँ है उनके पास?  मैं चाहती थी प्रसन्न रहें वे. सुस्वादु भोजन और  प्रेम भरा व्यवहार उन्हें तुष्ट रखे ,तन-मन को तृप्त हो लेने दो,कहाँ भागे जा रहे हैं?'

पर मन तृप्त हुआ है कभी?

प्रतीक्षा ही करती रही रत्ना और समय हाथ से निकल गया.

'क्या सोच रही हो?

देवर जी, थोड़ा-सा अवकाश चाहा था मैंने जिसमें मन के हाथपाव फैला सकूँ. ' 

समझने के प्रयत्न में नन्ददास ने अपना सिर झटका. पल भर में कौंध गया ,दद्दू भौजी से दूर बिलकुल नहीं रह सकते थे.

'थोड़ा अवकाश चाहती थी, लेकिन पूरी छुट्टी हो गई, वे चले गये. यह तो कल्पना भी नहीं की थी कभी.'

नन्ददास क्या कहें? 

उदास-सी चुप्पी छा गई.

घर पहुँच कर रत्ना ने कहा था,' देवर जी, बड़ी बेर हो गई ,भोजन कर के जाना, और हाँ ,चन्दू को भी बुला लो.' 

मर्यादा का कितना ध्यान रखती हैं- नन्ददास ने सोचा था.

उन्हें याद आया रत्ना ने काशी में रहने की इच्छा प्रकट की थी, कहा था,' अपनी रिक्तता भरने के लिए, मन करता है काशी में निवास करूँ, जीवन सार्थक कर लूँ.  परिवार के दायित्व होते तो अपना ध्यान भी न आता. अब यहाँ रहूँ कि काशी में, किसे अंतर पड़ेगा?.. और मैं तर जाऊँगी.'

लेकिन दद्दू को यह उचित नहीं लगा. उन्हें लगा यहाँ सब जाना-पहचाना है, पुराने सम्बन्ध है. नई जगह पता नहीं कैसा क्या हो? रत्ना घर में ही रही है बाहर की दुनिया में कैसे क्या करेगी? और काशी में रह कर करेगी क्या? नहीं-नहीं, वहीं ठीक है वह. व्यर्थ की बातें सोचती है.' 

 फिर कह उठे, ' और मेरी तो सारी  निश्चिंती समाप्त समझो! नहीं नन्दू, मना कर देना, समझा देना उसे!'

नन्ददास के मन में पछतावा जागा,' ओह, भौजी के मन में काशी-सेवन की लालसा मैंने ही जगाई थी. 

'जब जाता था, सुना आता था, दद्दू की कैसे लोगों में पहुँच है, कैसे-कैसे विद्वान, पण्डित,शास्त्र के ज्ञाता हैं जिनकी बातों से मन को समाधान मिलता है.  उनसे कहता था- भौजी ,मैंने भी काशी में रह कर विद्याध्ययन किया है. दद्दू की तो बात ही क्या! गुरु नरहर्यानन्द और शेष सनातन जैसे, जिसे मिल जायँ वह तो लोहा भी कंचन बन जाये, फिर दद्दू तो सजग-सचेत तीव्र बुद्धि-संपन्न हैं, समर्थ हैं. सच में जो ऐसे महापुरुषों के संसर्ग में आये, उसका कल्याण हो जाये!

'कभी गंगा, कभी माँ अन्नपूर्णा और बाबा विश्वनाथ और भी बहुत कुछ सुना-सुना कर पुण्यपुरी काशी का माहात्म्य सुनाता रहता था. और अब, जब कामना जाग गई तो सारी राहें बन्द पड़ी हैं. ज्ञान की पिपासा है उनमें ,गृहस्थी में रमी होतीं ,संतान होती तो ध्यान उधर बँट जाता.

दद्दा कुछ सोचते क्यों नहीं? 

'बुद्धिमती पत्नी भाती है, पर उसका भी अपना व्यक्तित्व अपनी वाँछाएँ हो सकती हैं यह भान क्यों नहीं होता?'

 वे सोच में पड़े थे.

रत्नावली रसोई समेटने का उपक्रम कर रही थी.

रात्रि की अँधियारी घिर आई थी.  

नन्ददास उठते-उठते बोले .'ये चन्दू कहाँ ग़ायब हो गया?'

उसे आवाज़ लगा दी. जाने को खड़े हो गए. जैसे एकदम कुछ याद आया हो , रत्ना की ओर उन्मुख हो पूछा,' अरे हो भौजी, विश्वनाथ बाबा से क्या माँगा तुमने?'

'मुझे कुछ अधिक नहीं चाहिये.'

'फिर भी कुछ प्रार्थना तो की होगी. सच्ची-सच्ची बताना. देखो,भगवान की बात पर

झूठ मत बोलना.' .

'मेरी प्रार्थना? सुनोगे - हर बार एक ही प्रार्थना करती हूँ.'

'बताओ ना.' 

'तो सुनो ,मैं अपने ईश्वर से माँगती हूँ - अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्, देहान्ते तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्!'

*

(क्रमशः)

बुधवार, 24 मार्च 2021

राग-विराग - 8.

राग-विराग - 8.

*

उस दिन रत्नावली ने कहा था ,'मै हूँ न तुम्हारे साथ.' 

'हाँ, तुम मेरे साथ हो.'

पर यहाँ आकर वे हार जाते हैं .अपनी बात कैसे कहें?

 नहीं, नहीं कह सकते.

रत्नावली से किसी तरह नहीं कह सकते 

मन में बड़े वेग से उमड़ता है - 'यहाँ मैं कुछ नहीं कर सकता .मैं नितान्त लाचार हूँ.

 जिस कुघड़ी में जन्मा उसका कोई उपचार नहीं. जो मेरा होगा छिन जायेगा यही देखता आया हूँ. जो मेरे अपने थे काल के ग्रास बन गये .जन्म से भटका हूँ. यही लिखा कर लाया हूँ.'.

मन ही मन कहते हैं ,'नहीं रतन अब नहीं. तुमसे नहीं कह सकता पर तुम्हें  खोना भी नहीं चाहता. मैं निरुपाय हूँ.'

और वे चले गये थे ,रतन से बिना मिले. 

नन्ददास हैं यहाँ, रतन की खोज-खबर रखते हैं, स्थिति सँभाल लेंगे.

रतन ने कहा था - 'राम ने जो दिया, सिर झुका कर ग्रहण कर लिया, उनकी शरण में जाकर उस सब से निस्तार पा लिया. अब काहे का संताप?'

साथ में यह भी कहा

मैं हूँ न तुम्हारे साथ. तुम्हारा  ध्यान रखने को. काहे की चिन्ता?'

और यदि रत्ना भी... नहीं,नहीं. !

और वह उन की थाह  पाना चाहती है. मन को पढ़ना चाहती है. 

उसकी दृष्टि तुलसी अपने मुख पर अनुभव करते हैं.

'क्या देख रही हो, मेरी विपन्नता?'

'नहीं, देख रही हूँ मेरी पूज्या सास कैसी सुन्दर रही होंगी, सब कहते हैं न कि तुम उनकी अनुहार पर हो. तुम्हारा रंग तो,रगड़ खा-खा कर बाहर घूम-घूम कर कुछ झँवरा गया है लेकिन..वे तो ... '

उस दिन  तुलसी जब पूर्व-जीवन की स्मृतियों में भटक रहे थे, बातों बातों में रत्ना के सामने मन की तहें खोलने लगे .

 नीमवाली ताई से उन्होंने  पूछा था, 'मेरी माँ कैसी थी ,ताई'?

'साक्षात् देवी ,इतने कष्टों में रही कभी शिकायत नहीं.

'तेरे मुख में उसकी झलक है. माँ से बहुत मिलता है रे! मुझे तो उसी का ध्यान आता है तुझे  देख कर...'

कई बार बड़े ध्यान से अपना मुख देखते हैं तुलसी. हाँ, दर्पण में देखते हैं,अपने प्रतिबिम्ब के पार खोजते हैं भाल पर सिन्दूर-बिन्दु धारे एक वत्सल मुख को. अंकन झिलमिला कर खो जाते हैं, सब अस्पष्ट रह जाता है.

 रत्ना के नयनों में भीगापन उतर आता है.

स्तब्ध रह जाती है, गहन उदासी की छाया मुखमण्डल पर छा जाती है. मौन सुनती रहती है- भूख से व्याकुल बालक जब किसी द्वार याचना करने जाता तो लोगों की आँखों में कैसे-कैसे भाव तैर जाते थे. सहमा सा, अपना हाथ बढ़ा देता, रूखा-सूखा कुछ डाल दिया जाता, उसके लिये वही छप्पन-भोग होता था, बस एक नीम के नीचेवाली ताई प्यार से कुछ पकड़ा देती -'अरे, बाम्हन का छोरा है ,भाग का दोस कि अनाथ बना भटक रहा है.'

लोग कहते, 'अभागा है, माँ तो जनमते ही सिधार गई.'

'अरे, अभुक्तमूल में जन्मा है,जो इसका अपना होगा ,उस पर संकट पड़ेगा.'

बालक सुनता है ,चुप रहता है. 

कुछ नहीं कर सकता वह 

वे बातें करती है -  

'राम,राम, कैसी साध्वी औरत रही. कभी किसी से किसी की बुराई-भलाई में नहीं पड़ी.  जैसा था चुपचापै गुज़र करती रही.' 

रंबोला को देखो तो माँ का मुख याद आ जाता है, कितना मिलता जुलता है, डील-डौल बाप पर जाता लगता है.' .

'आँखें बिलकुल माँ की पाई हैं.'.

'माँ ,ओ माँ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,' -अंतर चीख़ उठता,' कैसी थी मेरी माँ?' 

उदास बालक मन पर भारी बोझ लिये आगे चल देता,

हताशा छा जाती.कहाँ जा कर रहे? क्या करे? ..पेट की आग चैन नहीं लेने देती .

भूल नहीं पाता वे तीखे वचन ,बेधती निगाहें ..

आज स्थिति बदल गई है. वह सामर्थ्य पा गया है उसे साथी मिल गया है .

रत्ना कहती है तुलसी से,'जहाँ अपना बस नहीं, अपना कोई दोष नहीं उसके लिये हम उत्तरदायी नहीं ,उस पर दुःख और पछतावा कैसा?'.

'बचपन पर किसका बस. सब दूसरों के बस में होते हैं .तुम्हारे करने को कुछ नहीं था, तुम्हारा बस चला तुमने कर के दिखा दिया.

'गुरु ने पहचान ली थी तुम्हारी सामर्थ्य.'

 'हाँ, आज जो कुछ हूँ उन्ही के चरणों की कृपा है.'

'पात्र की उपयुक्तता भी एक कारण है.'

'तुम में निहित था जो कुछ, उसे सामने ला कर निखार दिया उन्होंने. पारखी थे वे. गुरु का महत्व किसी प्रकार कम नहीं.'

''अब काहे का पछतावा?' .

पर जो बात निरन्तर सालती है वही नहीं कह पाते .

मन ही मन समझते हैं - 'हानि-लाभ,जीवन-मरण ,जस-अपजस विधि हाथ! 

अदृष्ट के अपने लेख हैं , वहाँ कोई  उपाय नहीं चलता. 

किसी का कोई बस नहीं.

कभी तुलसी को लगता है रत्ना को अकेला छोड़ दिया, कैसे क्या करती होगी? अपराध-बोध सालता है. मन को समझा लेते हैं ,बुद्धिमती है. किसी-न किसी प्रकार निभा लेगी, मनाते हैं वह सकुशल रहे. 

मेरे मानस में प्रभु राम, माँ-जानकी को नहीं त्यागेंगे ,स्वयं को एकाकी नहीं कर लेंगे. वे चिर-काल साथ रहेंगे, अय़ोध्या के राज-सिंहासन पर और लोक-मानस में, दोनों युग-युग राज करेंगे!

*

(क्रमशः)












*

सोमवार, 8 मार्च 2021

राग-विराग - 7.

*

जब से रत्ना ने तुलसी का सन्देश पाया है,मनस्थिति बदल गई है.कागज़ पर सुन्दर हस्तलिपि में अंकित वे गहरे नीले अक्षर जितनी बार देखती है. हर बार नये से लगते हैं .'रतन समुझि जिन विलग मोहि ..'  -,नन्हा-सा सन्देश  रत्ना के मानस में उछाह भर देता है, मन ही मन दोहराती है.  फिर-फिर पढ़ती है. 

- कितना विरल संयोग कि  समान बौद्धिक स्तर के, एक ही आस्था से संचालित समान विचारधारा के दो प्राणी पति-पत्नी बने .एक सूत्र से संयोजित  दोनों ,गार्हस्थृ धर्म का अनुसरण कर एक नया क्षितिज खोजते जीवन अधिक समृद्ध होता. अंतर से  पुकार उठती है. ‘चल, मिल कर समाधान कर ले, सारे  भ्रम दूर हो जायें.’

उनका तो विद्वानों से वर्तलाप होता होगा ,संत-समागम चलता होगा, अपने कुछ अनुभव मुझसे भी  साझा कर लेते. मैं उनकी सहधर्मिणी हो कर, यहाँ सबसे  अलग-थलग निरुद्देश्य पड़ी हूँ 

मन में तर्क-वितर्क चलते हैं राम की भक्ति, संसार से विमुख नहीं करती, लौकिक जीवन के लिये एक कसौटी बन जाती है. सांसारिकता से कोई अंतर्विरोध नहीं. गृहस्थ के लिये तो राम-भक्ति ही ग्रहणीय है संयम और संतुलन रखते हुए आदर्शों के निर्वाह का संकल्प. राम की भक्ति सदाचार और निस्पृहता का सन्देश देती है. सांसारिक संबंधों रमणीयता ,नैतिकता का उत्कर्ष भावों की उज्ज्वलता, परस्पर निष्ठा और विश्वास और भी कितनी कोमल संवेदनाएँ  समाई है ..

एक बार उनसे भेंट हो जाय. मन को समाधान मिल जाय. 

सियाराममय जग को असार कैसे माना जा सकता है! वह तो विस्तृत कर्मक्षेत्र है. 

पति से पूछना चाहती है रत्नावली कि राम-भक्ति संसार से विरत करने के लिये,या उसमें रह कर उसे अधिक संगत ,संतुलित और सुनियोजित की आयोजना हेतु ?

रत्ना का प्रबुद्ध मन तुलसी से विमर्श करना चाहता है .लेकिन समय व्यर्थ बीतता चला जाता . क्या ऐसे ही जनम बीत जाएगा ? नारी को कैसा बनाया प्रभो,एक ओर बहुत समर्थ और दूसरी ओर एकदम बेबस. बाहरी संसार में कोई पैठ नहीं औरों पर निर्भर रहना ही नियति बन गया है. .

  नन्हा-सा सन्देश रत्ना के मानस में फिर-फिर उछाह भर देता है .''रतन समुझि जिन विलग मोहि ..' एक सूत्र दोनों को निरंतर जोड़े है. मगन मन गा उठता है -

 'राम जासु हिरदे बसत, सो प्रिय मम उर धाम।

एक बसत दोऊ बसै, रतन भाग अभिराम।।'

मनोबल बढ़ चला है. अपनी बात किससे कहे!! तुलसी से संवाद करना चाहती है. पर कहाँ मिलेंगे वह!

निरन्तर उठते हुये अनेक प्रश्न रत्ना के मन में हैं पर ऐसा कोई नहीं जिससे पूछ सके. अकेले समझ नहीं पाती, कहाँ सही हूँ कहाँ गलत. कौन बताए! काश,एक दूसरे के पूरक बन बन सके होते. दोनों की एक ही लगन -फिर यह अंतराल क्यों? वह भी खुल कर अपने मन की कहें, खाई भर जाये. उनकी उपलब्धियों का कुछ अंश मुझे भी मिले. 

बार-बार रत्ना के मानस में गूँजता है ''रतन समुझि जिन विलग..'

और कुछ देर को मन सघन आश्वस्ति से भर उठता है. नन्ददास के प्रति कृतज्ञ है वह.

उन्हीं से कभी-कभी समाचार मिल जाते हैं .पर उनका आना ही कितना होता है .

चंदहास से प्रायः ही मिलना हो जाता है.

विदित हुआ तुलसी का डेरा इन दिनों काशी में है,

मिलने की लालसा तीव्र होती जा रही है. एक बार मिल कर अपना समाधान करना चाहती है. मन की शंकाएँ दूर करना चाहती है.

रत्ना ने नन्ददास से पूछा था -

‘मेरे लिये पूछते हैं कभी?’

‘उन्हें चिन्ता रहती है ,तुम्हारी कुशलता बताता हूँ तो उनके मुख पर कैसा भाव छा जाता है भौजी, मैं बता नहीं सकता.’  

नन्ददास और चन्दहास जानते हैं उसके मन की इच्छा. पूरी सहानुभूति भी है उन्हें.लेकिन द्विधा में पड़ जाते हैं 

नन्ददास सोचते हैं इस विषय में दद्दा से बात करें . लेकिन डरते हैं कहीं मना कर दिया तो..!

  उन्हें याद है एक बार तुलसी ने कहा था,' नन्दू यह मन ऐसा ही है ,कस कर रखना पड़ता है नहीं तो जरा ढील पाते ही अपने लिये कहीँ कोई सँध खोज लेता है.

‘जिस जीवन को  पीछे छोड़ आय़ा हूँ अब उस जीवन के विषय में सोचना  नहीं चाहता....

'राम की लौ में वह सब छोड़ आया हूँ ,नन्दू ,अभिमानवश या सुख की -आनन्द की खोज में नहीं.'

दद्दा का मन वे नहीं समझ पाते,.सोच में पड़ जाते .हैं

.रत्नावली एकदम चुप है.

नन्ददास ने बताया था -

‘मैंने उनसे पूछा था दद्दा, कुछ दिन शान्तिपूर्वक एक स्थान पर निवास क्यों नहीं करते? 

कहने लगे जहाँ जहाँ राम के चरण पड़े वहाँ की धूल सिर धर  राम के चरित को गुन रहा हूँ.’ 

अपने ही कहे बोल रत्ना के कानों में बज उठे.अन्तर चीत्कार कर उठा, हाँ, हाँ,तूने ही  कहा था उनके चरण अनुसरे बिना, चरित गुने बिना कैसे राम की थाह मिले ! 

आशा-निराशा में दिन बीतते जाते हैं.

एकान्त उदासी के प्रहरों में निराशा घिर आती है. मन में गहरा पछतावा उठता है, और स्त्रियों को पति के अपने प्रति प्रेम का ,अभिमान होता है कि मेरे प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं ? उन्हीं बातों से मैं अनखाने लगती हूँ .

मैं ऐसी क्यों हूँ ? .

.और फिर अजानी शंकाएँ उठने लगती हैं.

अपने को समझाती है - रतन समुझि जिन विलग मोंहि.

 मैं उनसे अलग नहीं हूँ 

सूचनाएं मिल रही हैं रत्ना को. लगा अनुकूल अवसर आ गया .

भौजी का आग्रह और चंदहास का सहयोग ,नन्ददास की अनुकूलता भी उन्हें प्राप्त है.

रत्नावली के काशी पहुँचने का डौल बन गया. 

*

उस दिन तुलसी ने खीझ कर कह दिया था -

'तो अब तुम्हीं जानो.' 

एकदम नन्ददास का .चेहरा उतर गया था.

फिर मन ने समझाया - 

ये मुझे हड़का रहे हैं ,ऐसा कैसे कर सकते हैं भौजी के साथ ? 

 इतना कठोर हिया नहीं हो सकता!

हो लें मुझ पर गुस्सा ,पहले पूछा नहीं न! इसीलिए...

मन में खटका फिर भी बना रहा.

सुबह-सुवह चक्कर लगाया. डेरे में सन्नाटा पड़ा था.

ओह , चले गये ! 

रत्नावली के यहाँ आने में अप्रत्यक्ष रूप से उनकी भूमिका रही थी. पर क्या सोचा था और क्या हो गया!

 उलझन में पड़े वहीं चक्कर काट रहे हैं...

इतने में देखा हाथ में थैली लिये भौजी चली आ रही हैं.उन्हें देख समीप चली आईँ 

पालागन कर नन्दू बोले,’ रास्ता ठीक रहा?’ .

‘हाँ ,यहाँ सब ठीक है ?’

चारों ओर देख रही हैं.

नन्ददास समझ गये ,कहने लगे,

‘वैसे भौजी ,यह स्थान आपके लिये ठीक नहीं .कहने को साधु संत हैं लेकिन इनके कुण्ठित मनों में दुनिया की कुत्सायें भरी हैं.’ 

‘कौन मुझे यहाँ रहना है!’

क्या कहें .कुछ तो भी बोले जा रहे हैं,

‘दद्दा कहते हैं  जितना समझ में आता है उतना ही समझने को को रह जाता है. आत्म-शुद्धि हेतु तीर्थों का सेवन करता हूँ  साधु-संगति का लाभ पाने का प्रयास करता हूँ.

कैसे एक जगह टिक सकता हूँ?’ 

रत्नावली मौन सुन रही है.

असहाय से खड़े रहे कुछ देर 

‘भौजी, दद्दा को जाना था.’

हत्बुद्ध-सी बोल उठी,' क्या ?वे यहाँ नहीं है?’

‘वे चले गये.’

वैसी की वैसी खड़ी रह गई, एकदम सन्न!

फिर बोल फूटे,

‘देवर जी सच्ची बताओ तुमने उन्हें कब  बताया था ?’

कबूल दिया – ‘कल.’

‘और वे चले गय!. मुझे अपने मार्ग की बाधा समझ कर?.....

क्या बोले थे वे?’ 

‘वे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहते थे जहाँ लोगों की कुत्सा भरी निगाहें हर पल देखती रहें .तुम्हारे लिये दस तरह की बातें उठें .

‘इतनी बड़ी नगरी में छोटी-सी भेंट के लिए कहीं निरापद  स्थान  नहीं रहा?’

‘यहाँ के अधिकतर साधु-सन्न्यासी , जानती हो –दद्दा अच्छी  तरह  समझ गये हैं.'नारि मुई गृह संपति नासी, मूड़ मुड़ाए भए सन्न्यासी'. मानसिकता वही है.’

‘जिसकी जैसी वृत्ति होगी उसी राह जायेगा -उन सब के लिये पत्नी के न होने से कोई रास्ता बंद नहीं होता ,और भी राहें खुल जाती हैं पर अकेली स्त्री के लिए सारे रास्ते बन्द  हो जाते हैं , वहीं पड़े-पड़े दिन काट दो.उनके लिये सब विहित,  उसके लिये सब वर्जित .. 

‘हमारा संबंध ऐसा कच्चा  तो नहीं था कि सामने  आ कर 

 मन की बात सीधे  कह क्यों  नहीं सके.

‘मेरे लिये यहाँ तक आ पाना कितना कठिन था और वे जान कर एकदम चले गये!

 कुछ तो होगा उनके मन में  मुझसे कह जाते.

एक ही मार्ग के राही -सहयोगिनी बनना संभव नहीं  हो सका,तो ,उनकी दुर्बलता नहीं बनूँगी.’ ,नन्ददास असहाय से हो उठे. मुख से निकला ,’अरे हाँ, कहीं और मिल लेते.’

‘नहीं, नहीं उन्हें दोष मत दो ,मानव स्वभाव बड़ा विचित्र होता  है.’

‘अपनी गृहस्थी के सपने देखना तो कब का छोड़ दिया था,थोड़ा मानसिक संबल ..मिल जाता ,.

उनके सत्संग की, ज्ञान की ऊँचाइयों की थोड़ी छाँह मिल जाती.मेरा जीवन सफल होता

पर....मुझे तो वहीं का वहीं पड़े रहना है.’

‘अरे भौजी,मैने तुम्हें अब तक पानी को भी नहीं पूछा.’

‘नहीं , मेरा व्रत है आज.’

‘ऐसा कैसे? माँ अन्नपूर्णा के द्वारे से कोई रीता नहीं जाता. प्रसादी तो ग्रहण करनी ही पड़ेगी .

यहाँ तक आई हो तो तो माँ अन्नपूर्णा, और बाबा विश्वनाथ के दर्शन बिना चली जाओगी?

चलो भौजी, माँ के दरबार में हाज़िरी दिला कर ,तुम्हें घर पहुँचा आता हूँ.’. 

**

(क्रमशः)

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

राग - विराग : 6.

6.

.नन्ददास तुलसी से काशी में प्रायः ही भेंट करते रहते थे.

'कुछ दिन टिक  कर एक स्थान पर रहो दद्दू, आराम रहेगा और लिखने-पढ़ने में भी सुविधा रहेगी.'

'समाज की वास्तविक दशा को जाने बिना लिखना उद्देश्यपूर्ण कैसे हो सकता है नन्दू? तीर्थयात्रा करता ही इसलिये  हूँ कि देश के सुदूर स्थानों तक पहुँचूँ,लोक-जीवन को पास से देखूँ, वास्तविकता समझूँ. और पुनीत स्थानों में जा कर मन का कलुष धो सकूँ.'

नन्ददास को चुप देख फिर बोले,' उन्होने सारा जीवन लोक-कल्याण में लगा दिया उनका भक्त अपना सुख ही देखेगा क्याचरण-चिह्न छोड़ गये हैं, अनुसरण करना हमारा धर्म.' 

'महान् हो दद्दा, मैं तो तुम्हारी छाया भी नहीं.'

'कुछ नहीं हूँ मैं, बस रामकाज में लगा हूँ. '

एक  दिन नन्ददास ने पूछा था,' दद्दूभौजी से नाराज हो?सच्ची बताना.... ,उस दिन .. तुम्हें झटका लगा था?'

तुलसी सिर झुकाए कुछ क्षण सोचते रहे ,फिर बोले,' झटका नहीं लगा, यह कैसे कहूँ ? लगा और बड़े जोर का लगा.लेकिन उस झटके से हिय के नयन खुल गये. जो मेरे भाग्य में नहीं वो कैसे मिलेगा! उसने तो मुझे चेता दिया.सच में नन्दू जो-जो मुझसे जुड़े सब असमय छोड़ गये. अब तुम्हीं विचारो जिसके बिना एक दिन में इतना व्याकुल हो गया, वह देह भी भंगुर है, मेरा जनम का अभुक्त दोष, उसे भी ले बैठे तो....

अपने ऊपर बड़ा पछतावा हुआ उस दिन. अब उसी से संबंध जोड़ूँगा जिससे कभी नहीं  टूटे.'

 'लेकिन भौजी बहुत पछताती हैं, उन्हें लगता है कि उन्हें संयम रखना चहिये था.'.

'रतन ने वही किया जो उचित था. हृदय में जो उमड़ती हुई बात परस्पर भी न बता सकें तो काहे का दाम्पत्य! अंतर्मन से जो कुछ राम जी की प्रेरणा से उमड़ा वह नहीं कहती तो मन निरन्तर कचोटता, अपराध-बोध सालता.'

 उनके मुख का भाव गहन हो उठा था

'बाल्यवस्था में जिनने भटकने से त्राण दिलाया, मैंने विवाह कर उन्हें बिसरा दिया.

नन्दू, मुझे भान हो गया है, संसार के सुख मेरे लिए नहीं है.'

कुछ क्षण सोचते रहे फिर तुलसी ने पूछा,

'तुम उनसे मिलते हो?'

'हाँ क्यों नहीं ?और चन्दू पर तो उनका अनूठा वात्सल्य है.'

चन्दू?नन्दास का छोटा भाई, नाम है- चंदहास.

'इस परिवार की बड़ी बहू हैं हमारी माननीया हैं. खोज-खबर रखना हमारा धरम.'

 और चन्दू, वह भी उधर गये पर मिले बिना नहीं रह सकता. भौजी के लिये सबसे लड़ जाता है.'

दोनों देवरों को रत्ना से बहुत सहानुभूति है. बड़ाई करते नहीं अघाते. उनकी निष्ठा और त्यागपूर्ण जीवन ने उनके वैदुष्यपूर्ण, संयत जीवन को और दीप्त कर दिया है.

पीहर और ससुराल के संबंधियो में रत्नावली का बहुत सम्मान है.

अचानक नन्ददास ने पूछा,'दद्दा, भौजी यहाँ आयें तो ...?'

तुलसी चौंके.

'कैसी बात करते हो?!

'नहीं सच में .उनकी बड़ी इच्छा है एक बेर तुम्हारे दरसन करें .'

'यह कैसे हो सकता है?'

काहे नहीं हो सकता ? आखिर को तुम्हारी पत्नी हैं . भइया, तुम भी तो कभी उन्हें सोचते होगे.'

'हाँ, बस यही मनाता हूँ कि वह सकुशल रहे ,कोई कष्ट न हो.' ..

' पर, वे तो यहाँ आ रही हैं '

वे चौंके ,' कब?'

'बस एक-दो दिन में यहाँ पहुँच जायेंगी.'

'यहाँ कहाँ रहेगी ?.मेरे पास कुछ भी तो नहीं उसके लिये.यह जगह उसके रहने जोग है ?जानते हो इन लोगों को ?कैसे कैसे साधु हैं यहाँ एक से एक गँजेड़ी ,भँगेड़ी. नारि मुई गृह संपति नासी ,मूँड़ मुँड़ाये भए सन्न्यासी. और कैसी-कैसी विकृत मानसिकता! .

नन्ददास क्या बोलें !

तुलसी कहते रहे ,'जैसी कुत्सा मनों में भरी  है, वैसी ही बातें करेंगे. रतन यहाँ आई तो कैसे देखेंगे उसेक्या कहने से छोड़ देंगे? जीभ पर लगाम देना तो जानते नहीं.

फिर एक चुप्पी.

' नन्दू ,तुम्हीं ने यह किया होगा .ऊँच-नीच कुछ नहीं सोचा.अरे, एक बार मुझसे ही पूछ लेते.'

मन में आया इनसे पूछना इतना आसान है क्या.

पर नन्ददास बोले कुछ नहीं.

तुलसी ने पूछा -' बताया किसने कि मैं यहाँ हूँ ?'

'तुम्हारी खबर रखती हैं वे , पिछली बार तुम्हार सँदेसा पा मगन हो गईं थीं भौजी,आनन्दाश्रु

 छलक आये थे. बोली थीं ,तुम्हारे दद्दा मुझे अपने से अलग नहीं मानते.'

झूठ नहीं बोलूँगा तुम्हारे आगे. उछाह केआवेश में मैं ही बता आया था .भौजी के मुख को देख कर मैं अपने को रोक न सका, '

सिर झुका कर बोले ,' पर हमने आने को नहीं कहा  था. वे तो कब से चाह रहीं थीं बस मौका नहीं मिला था.'

'और इस बार मिल गया?'

'हम तो वहाँ जाते ही कितना है! चंदहास से बात-चीत होती रहती है उनकी . चंदू वहीं रहता है न ..

हमें तो उसी से पता चला .'

'वह आयेगी यहाँ मिलने ?इस खुले डेरे में ,चारों ओर विकृत चर्चाओं की हवा में ...

ऐसे लोगों के बीच न आये रतन, लोग तो भद्दीबातें फैलाने को उधार खाये बैठे होते हैं .'

नन्ददास स्तब्ध .

'रतन यहाँ आयेगी, कहाँ टिकेगी ?'

तुलसी आवेश में बोले जा रहे हैं , 'मैं सब प्रकार से साधन हीन. भिक्षा माँग कर पेट भरता हूँ .मंदिर में उनने मस्जिद बना डाली. मैं राम का नाम लेकर वहीं कहीं सो जाता हूँ कि कपटी साधुओँ की चर्चा में न पड़ूँ. किसी से लेना एक न देना दो. लेकिन लोगों की कुत्सित दृष्टियाँ उस तक पहुँचेंगी.  कौन रोक लेगा?

'मुझे ही धूर्त,जुलाहा ,रजपूत जाने क्या-क्या कहते फिरते हैं .मुझे तो कोई अंतर नहीं पड़ता,  पर उसका क्या कोई मान-सम्मान नहीं?  कैसे-केसे विकृत आरोपण करते हैं लोग ,सोचा है कभी? अपनी कुत्सा के आरोपण में चूकेंगे नहीं. रतन के लिये ये स्थान नहीं .सब की कौतुकी दृष्टियों का केन्द्र होगी वह,यहाँ सब कैसे-कैसे सन्यासी हैं जानता हूँ मैं, पराई स्त्रियों को  लोग  कैसी निगाहों से दखते हैं .यहाँ तो सब ओर यही लोग हैं.  कौन साधु हैं ,कौन असाधु, कौन जाने !

'अपने मन की कुत्साएँ निकालने का एक मार्ग मिल जायेगा उन सबको . रसभरी चर्चा के लिये एक मसाला मिल जायेगा.रतन के साथ ऐसा हो, नहीं  नन्दू ,वह नौबत न आये .उसे मान न दे सका पर  दूषणों  से तो बचा ही सकता हूँ .'

 

तुलसी को इतना उत्तेजित पहली बार देख रहे थे.लगता है उनका अंतर्मन तक दहल गया हो जैसे.

क्या केवल उत्तेजना थी, आँखो में जो छलकन  उतर आई वह भी तो एक सच है.....

'तुमने बताया कि आजकल  यहाँ हूँ ?'

'  बातों  बातों में मैं ही कह बैठा था,तुम्हारे बारे में बहुत बातें पूछती हैं .'

मन ही मन पछता रहे थे नन्ददासरत्ना के प्रति सहानुभूति भरे मन ने बिना सोचे-विचारे ,चंदहास की बातों में आ, भावुकता में यह क्या कर डाला ?

लेकिन अब ... नन्द दास का चेहरा उतर गया.

' अब? वे तो आ रही हैं ,कल ....' नन्ददास घबरा कर कह उठे

'अब बता रहे हो जब  पानी बिलकुल सिर से ऊपर आ गया.'

'तो अब तुम्ही जानो!'

*

'तुम्हीं जानो' कहने भर से क्या मन शान्त रहता है!

ओह,रतन यहाँ ! आँखों के सामने !मैं सोच भी नहीं सकता!

 जीवन में बहुत तरसा हूँ , वहाँ से विरत हो कर चला आया .अब बस मन  पर संयम रहे  ,नारद जैसा मुनि ,विचलित हो सकता है फिर मेरी क्या विसात! 

प्रभु, अब परीक्षा न लो.रक्षा करो ! अपने आश्रय में पड़ा रहने दो. बुद्धि चेताती है किन्तु  मन के उत्पातों  से भय खाता हूँ . किसी दुर्बल क्षण में  सारे भान खो कर ,संयत न रह पाऊँ  ....

नाथ, तुम तो अंतर्यामी हो!

नहीं होगा, नहीं होगा मुझसे, फिर मिलना और फिर दूर हो जाना.

मुझे साहस दो प्रभु!

मानव बन कर अवतार लिया तुमने ,मानवी संवेदनाओं को भोगा, निभाया,

अब तुम्हीं मेरा मार्ग दर्शन करो! 

मैं आज जान पा  रहा हूँ वह कारण कि  माँ जानकी को,भवन से निर्वासित कर  वन पहुँचाने का, निर्मम दायित्व अनुज को सौंप दिया , क्यों स्वयं सम्मुख  नहीं आ सके थे !

और कोई मार्ग नहीं सूझ रहा प्रभु. इस समय की विचारणा जो  कहे वही स्वीकारता हूँ , उचित-अनुचित जो समझो -  मुझे क्षमा कर देना!

और अगली भोर, तुलसी बिना किसी को  बताए वहाँ से  प्रस्थान .कर गये.

*

(क्रमशः)

*


 

 

 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

छोटे मियाँ सुभानअल्लाह!

 छोटे मियाँ सुभान अल्लाह. 

बचपन  में मेरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अक्लमन्द था..बाल की खाल निकाल देता था. एक बार उसकी एक चप्पल कहीं इधर-उधर हो गई ,वह एक ही चपप्ल पहने खड़ा था.मैने देखा तो कहा अच्छा एक ही पहने हो दूसरी खो गई ? और हमलोग इधऱ-उधर डूंढने लगे.

उसके पापा ने आवाज़ लगाई , 'आओ जल्दी..'

मैने उत्तर दिया,'उसकी एक चप्पल नहीं मिल रही है ,देख रही हूँ ..'

वह सतर्क हुआ बोला,' मम्मी एक तो है दूसरी नहीं मिल रही है.'

मैं खोजने में लगी रही ध्यान नहीं दिया .

देर होती देख उसके पापा चले आए.

'क्या हुआ ?' 

'इसकी एक चप्पल नहीं मिल रही .'

वह फिर बोला, ' एक तो पहने हूँ, दूसरी नहीं मिल रही.'

मेरे मुँह से निकला, 'अच्छा..'

नीचे से माली की आवाज़ आई - 

'ये एक चप्पल किसकी नीचे गिरी पड़ी है ?'

इन्होंने कहा, ' देखो एक नीचे गिरा दी है .'

उसने  फिर स्पष्ट किया,' एक नहीं वह दूसरी है .'

ताज्जुब से उसे देख कर बोले , 'हाँ,हाँ एक नीचे पड़ी है.' 

उसने ज़ोर से प्रतिवाद किया, ' एक नहीं  दूसरी नीचे पड़ी है '

'हाँ ,हाँ एक तुम्हारे पाँव में और एक नीचे' -मैंने समझाया .

वह क्यों समझता ,खीझता हुआ बोला दूसरीवाली नीचे है ,एक तो ये हैं.

हमलोगों ने आश्चर्य से एक-दूसरे को देखा .

मैंने फिर समझाने की कोशिश की 

'हाँ ,हाँ एक तुम पहने हो और एक नीचे '.

वह जोर से बोला -

'एकवाली तो मैं पहने हूँ नीचे  दूसरीवाली है .' .

हम दोनों निरुत्तर.

हम समझा रहे हैं,वह हमारी बात कब समझेगा आखिर!

कोई एक बार की बात थोड़े ही .आये दिन कुछ-न-कुछ

दशहरे पर रामलीला के बाद इन लोगों को रावण -दहन दिखाले ले चले.

रावण का पुतला देख कर मुझसे पूछा ,मम्मी ये सच्ची का रावण है 

'नहीं.'

'तो इसे जलाते क्यों हैं ?'

मैं चुप रही .

 'इसे जलाते क्यों हैं, मम्मी ?'

मैं कहूँ तो क्या कहूँ .

फिर वही, 'क्यों मम्मी?'

अच्छा अभी तो चलो .

लेकिन वह पूछे जायेगा जब तक समाधान नहीं हो जाये,पूछता रहेगा .

हार कर कह दिया, 'अभी चलो बाद में बताऊँगी .'

और कुछ भी सुन लीजिये- बिजली का बिल जमा कराना था. कहीं रख दिया था और मिल नहीं रहा था.

ढूँढ पड़ी थी - बिजली का बिल कहाँ है ?

 

वह बोला यहाँ है बिजली का बिल .

खुश हो कर हम लोग दौड़े ,'कहाँ ?' 

वह ले गया ,मिक्सी चलाने के लिये जहाँ से प्लग को कनेक्ट करते हैं उन सूराखों को दिखा कर बोला,ये है बिजली का बिल.'

बिजली का बिल? 

हम दोनों एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं. 

अब तक चूहे का बिल देखा होगा ,अब बिजली का भी देख लीजिये - यहाँ रहती है बिजली.

वाह रे भगवान, इन छोटी खोपड़ियों में दूसरों का दिमाग़ चाटने की अक्ल  भरने में तुम खूब एक्सपर्ट हो!

*