रविवार, 18 जून 2017

मैं कौआ नहीं बनना चाहती

*
बाहर लान में खुलनेवाली हमारी खिड़की के शेड तले एक भूरी चिड़िया ने घोंसला बनाया है.अब तो अंडों में से बच्चे निकल आये हैं .चिड़िया दूर तक उड़ कर उनके लिये चुग्गा लाती है और वे चारो उसके आते ही चीं-चीं कर अपनी चोंचें बा देते हैं.
मैंने  थोड़ा दाना-पानी यहीं पास में रख दिया .पर चिड़िया ने छुआ तक नहीं, तीन-चार  दिन यों ही रखा रहा . बच्चों के लिये दूर-दूर से चुग्गा लाती है.,घास  झाड़ियों -पेड़ों आदि अपने संसाधनो से अपना खाद्य चुनती हैं.
यहाँ देखती हूँ अनेकानेक पक्षियों को -  चहचहाते हुए,आसमान में उड़ते हुये पेड़ों पर ,लान में फुदकते हुये - पर सब कुछ बड़े करीने से.कोई मौसम हो मुझे तो पत्तों पर मुड़ेरों पर या कहीं भी बीटों का गंदगी नहीं दिखाई देती .बड़े डिसिप्लिंड  लगते हैं .खुले आसमान के नीचे अन्न ,भोजन आदि रखा रहे ,मुगौरियाँ खुली थाली में सूखती रहें चोंचें डालना तो दूर भूखी निगाहों से  देखते तक नहीं.अपने खाने ,अपने दाने से मतलब .मुझे लगता है जैसे जहाँ के लोग होते हैं ,वैसे ही वहाँ के जीव भी हो जाते हैं .
दादी कहती  हैं ,मुँह आई बात रोक लो तो कौए का जनम मिलता है ,और मुझे कौआ नहीं बनना. इसलिये मुँह आई बात कहे डाल रही हूँ .
हाँ ,तो यहाँ खुले में खाने का सामान पड़ा रहे पक्षी चोंच लगाना तो दूर, ललचाई निगाह तक नहीं डालते .उनके लिये अलग से जो दाना होता है वही ग्रहण करते हैं .ये नहीं कि किसी ने खाद्य पदार्थ बाहर या धूप में रखा और मुफ़्तखोरों जैसी इनकी नियत लग गई - खायें सो खायें और बिखेरते हुये उसी में गंदगी मचाते उड़ जायें .न खाने का ढंग ,न बीट करने का..
मैं अमेरिका की बात कर रही हूँ ,भारत का उल्लेख अपने आप हो जाये तो मेरा दोष नहीं.  - हर बात सापेक्ष होती है न.एक के साथ दूसरी लगी-लिपटी .किसी पर दोषारोपण करने का  मेरा इरादा नहीं.बस , मैं कौआ  बन कर जनम नहीं लेना चाहती .
 हाँ ,तो बात गंदगी मचाने की हो रही थी.मुझे लगता है  वातावरण में ही खोट आ जाता है  .देखिये न ,हमारे यहाँ  लोग भी तो पब्लिक के या पराये माल को , मुफ़्त का माल समझते हैं-और हर जगह गंदगी बिखेरना जन्म-सिद्ध अधिकार .वही आदतें पक्षियों में उतर आई
 .पेड़ों के ऊपर के पत्ते तो बीट से पुते ही रहते नीचे की ज़मीन छिंटी हुई - आते-जाते लोगों के कपड़ों और बालों का भी कल्याण हो जाता है कभी-कभी . आजकल सब जगह फ्लैटों वाली  बहुमंज़िली इमारतें खड़ी हैं.बाहर की दीवारों और खिड़कियों के छायादानों पर घने-घने छपके और जमे हुये थक्के जरूर देखे होंगे आपने .पक्षियों की ढेर की ढेर बीट जम कर चिपकी हुई ..  सायबानो के नीचे, मोखों में कितने कबूतर बस जाते हैं कोई गिनती नहीं .रात दिन गुटर-गूँ तो हई .ऊपर से खिड़कियों के शेड बालकनियाँ और छतों की मुँडेरे हर जगह बीटों की सफ़ेदी छाई मिलेगी.खुले में  खाद्य पदार्थ डालकर धूप दिखाना मुश्किल - चोंचें मार-मार कर बिखरायेंगे .खायेंगे सो खायेंगे उसी में अपनी गंदगी छोड़ जायेंगे .बात वहीं आ जाती है , लोगो को जो करते देखते हैं ,वही सीखेंगे.देखते तो होंगे ही  पब्लिक टॉयलेटों,ट्रेनों का हाल,नदी के किनारों पर ,कहाँ तक बताये हर खुली जगह पर .पराये फलों के पेड़ों पर फूलों की क्यारियों पर कैसे हमला बोलते हैं.कोई ढंग की चीज़ देख नहीं सकते अपने सिवा किसी के पास .किसी के घर आम या अमरूद का पेड़ हो ,पत्थर चले आयेंगे बाहर से .दीवार नीची हुई तो फाँदने में कोई परहेज़ नहीं.
मौका मिलते ही दूसरे के उगाये फूल तोड़ लेना स्वभाव में है .बच्चे नहीं बूढ़े तक भगवान के नाम पर परायी फुलवारियों पर हाथ साफ़ करने से चूकते नहीं .उलटा कोई आपत्ति करे तो उसे ही पाप का भागी बनाने पर उतारू..
मुझे लगने लगा है स्वच्छता के भी संस्कार होते हैं जो स्वभाव में बस जाते हैं
और सामाजिक अनुशासन आदत बन कर सहज-व्यवहार में उतरता है.इन चीज़ों का धार्मिकता से कोई लेना-देना नहीं.बल्कि अधिकतर तो धर्म के नाम पर ..., अब आगे क्या कहूँ -जो होता है ,सब को पता है.
*

शुक्रवार, 5 मई 2017

ज्ञान की आँधी -

*
 बाह्य संसार से जब कोई परेशान हो जाता है, उबरने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता   तो उस झींकन के साथ  उसके अंतःचक्षु खुलने लगते हैं.नई-नई बातें सूझती हैं॒. अगर कहें सहज ज्ञान उत्पन्न होने लगता है तो भी गलत न होगा. नवोत्पन्न  ज्ञान बाह्य जगत की अनेक गर्म-ठंडी स्थितियों से गुज़रते सघन होता जाता है. व्यक्ति में नये बोध जागते हैं ज्ञान चेतता है . उसकी उमड़न तेज़ हो तो आँधी जैसे झकोरे उठने लगते हैं .ऐसा अक्सर कबीर , पलटू दास जैसे अकाम लोगों के साथ होता है और वे सांसारिक जीवन से विरक्त हो ,आत्म-कल्याण की राहें खोजने चल पड़ते हैं .ज्ञान की आँधी उन्हें झकझोरती है, नया चेत स्फुटित होता है और नये पंथों की नींव पड़ती है. 
ऐसे ही बोध के पलों में सिद्धार्थ बुद्ध हुए होंगे. 
तब उन्हें दिखती है एक ही बाधा .ठीकरा स्त्री के सिर फूटता है .और किसी पर तो उनका बस नहीं - धर्म-संकट एक ही -स्त्री. वह आई कि धर्म का आधार खिसका. 
बुद्ध ने स्पष्ट कह दिया था -आनन्द, स्त्री आ गई, अब सद्धर्म केवल 500 वर्ष ही रह पायेगा! 
कितने त्याग-तप-साधना के बाद सद्धर्म विकसता है ,और एक अनचाही वस्तु उसे संकट में डाल देती है. सन्मार्ग की  चाहवाले आदमी के लिये भगवान ने भी कैसी-कैसी -बाधायें रच दी हैं. .स्त्री के मारे धर्म संकट में पड़ा रहता है . 
अपने तुलसी दास ये सब भोगे बैठे थे,उनके अपने अनुभव का सार , या भव पारावार को उलँघि पार को जाय, तिय छबि छाया ग्राहिनी गहै बीच ही आय  - बेचारा बेबस आदमी . करे तो क्या करे?
ईश्वर पर अपना बस नहीं ,कसर स्त्री से निकालो ,पूरी तरह वश में रखने के उपाय खोजो.इसके बस दो उपयोग ठीक -जन्म दे कर पाल-पोस दे ,और भूख लगे तो पेट भर दे -माँगने पर भिक्षा देती रहे . (संतों,भिक्षा तो वह देगी -ऐसा कंडीशंड कर रखा है-कहीं आत्म कल्याण की बात उसके भी मन में आ गई, उसने भी सांसारिकता को गौण समझ लिया तो ग़ज़ब ही हो जायेगा )-देगी ,अपने लिये रखा होगा उसमें से भी देगी- कम खाना गम खाना ,अपनी किस्मत समझ कर. 

स्त्र ही है जो माया-जाल में फँसाती है .भटकाती है ,दुख का कारण है.छोड़ दो सारी चिन्तायें उस पर.   
ओह, कितने-कितने रूप धरती हैं यह, नटिनी है न, नचाना चाहती है हमें भी. 
हमारे मतलब का सिर्फ माँ का रूप है .  बच्ची-बूढ़ी जवान सब में वही रूप मानेंगे .अरे दुनिया है. यहाँ फिसलता कौन नहीं .जब बोध जागे सब धोड़-छाड़ के निकल आओ.साथ रखो यह जादू की छड़ी है 'माँ' शब्द .  तुम बालिका या युवती से माँ कह दो और आशा लगाए लगो उससे कि वैसी ही ढल जाएगी . हाँ, किसा छोटे लड़के से पिता कहना या ,उसमे पितृत्व की संभावना करना  सोच कर ही हँसी आती है न!
तुलसी जब नारी से दूर आगये तो सारी कमियाँ याद आने लगीं. घर-परिवार से वंचित रहे थे ,दुनियादारी में पड़े नहीं पर नारी की अस्लियत पर प्रामाणिक वचन कह गये - 'अवगुन आठ सदा उर रहहीं '.हाँ , नर तो परफ़ेक्ट है. 
अपने  पलटू जी तो किसी महावृद्धा तक का विश्वास नहीं करते ,  साफ़ कहते हैं- अस्सी बरस की बूढ़ी सो , पलटू ना पतियाय !
कारण  है-
साँप बीछि को मंत्र है , माहुर झारे जात ,
विकट नारी पाले परी , काटि करेजा खात
देखा,साँप-बिच्छू से भी ज़हरीली महासंकटा को? सबसे गई-बीती है स्त्री -
नारी की झांई पडत,
अंधा होत भुजंग ।
कह कबीर तिन की गति,
जो नित नारी संग ।।
आगे अपनी कुशलता की चिन्ता ,हरएक को  खुद करनी चाहिये .मलूकदास ने इसी की पुष्टि की है -‘‘एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटमार। मिसरी की छुरी गर लायके, इन मारा संसार।। 
संत सुन्दर दास ने इस के प्रत्येक अंग को नरक के समान कहने में भी तनिक संकोच नहीं किया है- 
‘उदर में नरक, नरक अध द्वारन में, कुचन में नरक, नरक भरी छाती है। 
कंठ में नरक, गाल, चिबुक नरक किंब, मुख में नरक जीभ, लालहु चुचाती है 
नाक के नरक, आँख, कान में नरक ओहै, हाथ पाऊँ नख-सिख, नरक दिखाती है। 
सुन्दर कहत नारी, नरक को कुंड मह, नरक में जाइ परै, सो नरक पाती है’। 
नारी की बुराइयों के अनुभवी ये संत लोग किसी और तत्व के होते होंगे ,इनकी देहें इऩ सब तत्वों से परे रहती होंगी. हाँ ये बताओ संतों, उसी पर गुर्राओगे .फिर उसी गृहस्थिन के दुआरे भीख माँगने पहुँचोगे .. हाथ फैलाओगे ,उसका राँधा खाओगे ?
पर करें क्या ?उनका आदर्श वाक्य है -
अजगर करे न चाकरी .पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गये सबके दाता राम .पेट भरने का श्रेय भिक्षादात्री को नहीं राम को.
वैसे संत लोग बहुत भले हैं. 
खूब अच्छी-अच्छी बातें करते हैं लेकिन नारी की बात आते ही  एकदम कांशस हो जाते हैं. ऐसी भड़कते हैं, सारा संयम बिला जाता है.तो आपा खो कर  गाली-गलौच पर उतारू हो जाते हैं ,ये ऐसी है वैसी है ,इससे दूर ही रहो ,तुम्हारा जाने क्या-क्या अनिष्ट कर देगी .. इस विषय पर सहज रूप से बात नहीं कर पाते.कुछ-कुछ होने लगता हो जैसे.वे संतई से च्युत नहीं होना चाहते ,पर स्त्री उनके पीछे पड़ी है .सो बेचारे बमक पड़ते हैं.  स्त्री नाम की बला संसार की सारी बुराइयों की जड़ है .पर इससे बचा नहीं जा सकता. कबीर के शब्दों में कहें तो'रुई पलेटी आग' है
पहले तो वे उससे दूर भागने का प्रयास करते हैं ..फिर  बार-बार उझक कर देख  लेते हैं -अब ये क्या कर रही है?अरे, ये ऐसे क्यों कर रही है?इसे ऐसे नहीं वैसे रहना चाहिये .संत जी, तुम दूर चले गये तो छुट्टी करो. मन काहे उसके आस-पास ही मँडराता रहता है? संत हो संतई करो ,दुनिया से तुम्हें क्या मतलब  अपने काम से काम रखो .तुमने नारी-मात्र को सुधारने का ठेका ले रखा है ? क्या संत क्या भक्त दोनो के यही हाल.
 मुझे लगता है यह भारतीय स्त्रियों की विशेषताएँ हैं. विदेशी साहित्यों में  ऐसी शिकायतें मेरे सुनने में नहीं आई. .हाँ, इस्लाम का पूरा पता नहीं  पर उनने पूरी घेराबंदी कर रखी है औरत की - पर नहीं मार सकती.भारत के पुरुष जितने त्यागी  महात्मा, आदर्शवादी,सहनशील महान् आदि आदि होते हैं  ,स्त्रियाँ उतनी ही ..अब .आगे क्या बताऊं, संतजन औऱ भक्तलोग इतना धिक्कारते हैं ,उपदेश देते हैं - लेकिन औंधे घड़े पर कभी कुछ टिका है जो अब टिकेगा?
बाकी आप खुद समझदार हैं.
- प्रतिभा सक्सेना.
*

सोमवार, 20 मार्च 2017

एक बार फिर ...

*

     हे अपार करुणामय अमिताभ बुद्ध ,क्षमा करना -मैं एक मंद-मति  नारी हूँ, जो नर के समान  सहज मानव के रूप में तुम्हें भी स्वीकार्य नहीं थी. तुम्हारा सद्धर्म  मेरे  
लिये निषिद्ध रहा ,और जब महाप्रजापति गौतमी के आग्रह पर स्त्रियों को  प्रवेश दे कर इस धर्म ने जो कुठाराघात झेला उससे उसकी जीवनावधि आधी रह गई -तुमने कहा था,“हे आनन्द! यदि मातुगण स्त्रियों ने गृहत्याग कर प्रवज्या अपना तथागत के बताये धम्म और विनय का मार्ग अङ्गीकार न किया होता तो ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचरिय) चिरजीवी होता, सद्धर्म एक हजार वर्ष तक बना रहता। किंतु हे आनन्द! चूँकि स्त्रियाँ इस मार्ग पर आ गयी हैं इसलिये ब्रह्मचर्य चिरजीवी नहीं होगा और सद्धर्म केवल पाँच सौ वर्षों तक चलेगा।“
 राजपुत्र सिद्धार्थ ,
बहुत सुख-विलास में पले थे तुम ,जीवन के दुखों से, कष्टों से नितान्त अपरिचित ,हर इच्छा पूरी होती थी तुम्हारी .संसार की वास्तविकताएँ तुम्हारे लिये अनजानी थीं
 , किन्तु जीवन के कटु यथार्थ से कौन बच सका है .राजपुत्र होने से यहाँ अंतर नहीं पड़ता .सच सामने आयेंगे ही -झेलने भी पड़ेगे .जब वे सामने आए तुम दहल गए .उनसे छुटकारा पाने का उपाय खोजने का विचार बहुत स्वाभाविक था .अच्छा किया मार्ग ढूँढ लिया तुमने - साधना सफल हुई, बुद्ध हुए तुम! 
  हे प्रबुद्ध,
 संसार को दुखों से मुक्त करने का निश्चय तुम्हारे जैसे महामना ही कर सकते हैं. हे ज्ञानाकार, दुख और कष्ट क्या केवल पुरुषों को ही व्यापते हैं, नारी को नहीं ?आत्म-कल्याण के पथ पर बढ़ने के लिये सहधर्मिणी को झटक कर , गृहस्थी के सारे दायित्व त्याग अपनी मुक्ति का मार्ग पकड़ ले यही थी सद्धर्म की पहली शर्त .स्त्रियों की मुक्ति पुरुष के लिये बाधक बन जाती है इसलिये उन्हें अपनी मुक्ति की चाह न कर, उसे पुरुष का अधिकार मान, सारी सुविधायें देना अपना कर्तव्य समझना चाहिये.वृद्धावस्था रोग और मृत्यु नारी पुरुष का भेद नहीं करते. मुझे लगता है स्त्री-पुरुष दोनों को समान चेतना-संपन्न मान कर वांछित न्याय कोई कर्मशील कृष्ण ही दे सकता है, वही अपने व्यवहार से भी सुख-दुख दोनो को समान भाव से ग्रहण करने ,कर्ममय संसार में डटे रहने का संदेश  दे सकता है.
 सर्वदर्शी,
 तुम्हारा वक्तव्य पढ़ कर (चूँकि स्त्रियाँ इस मार्ग पर आ गयी हैं इसलिये ब्रह्मचर्य चिरजीवी नहीं होगा और सद्धर्म केवल पाँच सौ वर्षों तक चलेगा.“)पहले तो मैं यह समझने का यत्न करती रही कि इसके लिये दोषी किसे मानें -स्त्रियों को, सद्धर्म में दीक्षित ब्रह्मचर्य निभानेवाले को , या मानव की स्वाभाविक वृत्तियाँ को ?
सोच लेना कितना  चलेगा वह धर्म जिसमें सहधर्मिणी की भी  सहभागिता न हो .जो प्राकृतिक स्वाभाविक जीवन के अनुकूल न हो जो समाज के केवल एक  वर्ग के कल्याण का ही विधान करता हो . 
हे सुगत,
 ऋत सृष्टि के नियमन का,उसके सुव्यवस्थित संचालन का हेतु है, प्रकृति की अपनी योजना है रचना-क्रम एवं पोषण -संरक्षण की, प्राणी  की मूल वृत्तियों का अपना महत्व है. इनसे विमुख होना विकृतियों का कारण बनता है अतः शोधन  के द्वारा  वृत्तियों का ऊर्ध्वीकरण  -संयम और नियमन -जिसके संस्कार हमारी संस्कृति में प्रारंभ से विद्यमान हैं .उनके दमन के बजाय उनका नियमन जो व्यक्ति और समाज  दोनों के उन्नयन में सहायक हों. 
सिद्धार्थ, 
मेरे पापी मन में कौंधता है  अगर स्त्रियों के लिये  भी ऐसे धर्मों या संप्रदायों का चलन होने लगे जिनमें सबसे निरपेक्ष रह कर अपना ही कल्याण देखें तो...
पर उन्हें छूट देने के पक्ष में तुम हो ही कहाँ ?कभी कोई नहीं रहा .गृहस्थ जीवन का पूरा अनुभव था तुम्हें.चिन्तक भी थे तुम. स्त्री- कुछ माँगे नहीं,पूरी तरह समर्पित हो , कभी शिकायत न करे तो उसके हित का विचार किस का दायित्व है? तुम्हारी करुणामय दृष्टि  भी नर का दुख देखकर विचलित हो गई, नारी तक उसकी पहुँच नहीं हुई .
   किसी पीपल तले एक बार फिर ध्यानस्थ होकर बैठो सिद्धार्थ, शायद मानव-मात्र(जिसमें नारी की सहभागिता हो) के लिये सम्मत,समाज के लिये कल्याणकारी , कोई पूर्णतर मार्ग कौंध जाये जो एक सहस्त्र या पाँच सौ वर्षों की सीमा से बहुत  आगे जा सके और तुम्हारी तथागत संज्ञा सार्थक हो सके.
*



रविवार, 29 जनवरी 2017

लिये लुकाठी हाथ !

  
*
बहुत समय बाद कबीर भारत आये  तो  देश में अंगरेजी की शान देख कर चकित हो गये  .
गुण-गान सुनते रहे  .... कैसा साहित्य -कैसी अधिकारमयी, ज्ञन-विज्ञान के क्षेत्र में में सबसे बढ़ी-चढी दुनिया की निराली  भाषा - पढ़नेवाले का दिमाग़ भी झक्क कर देती है .
 जानने  की इच्छा बलवती हुई . -भाग-दौड़ कर एक शिक्षक ,अरे हाँ मास्टर , जुगाड़  लिया.

कबीर से खार खाये बैठे  कुछ लोग मास्टर को भड़काने लगे ,
' ये आदमी बड़ा खुड़पेंची है ,मार बहस कर कर के दिमाग़ चाट डालेगा.अपने आगे किसी की सुनता नहीं .'.
लेकिन मास्टर भी एक ही राढ़ा .कहने लगा , 'एक से एक उजड्ड लड़कों से पाला पड़ चुका .ठीक करके छोड़ा है .
. पर ये है कौन ?'
'अरे, वही कबीर  .'
'तुम कैसे जानते हो ?'
'हम नहीं जानेंगे ? .हमारे बाप-दादे   और उनके भी बाप दादे जमाने से जानते आए हैं.'
'अच्छा !'
'हमेशा अपनी  लगाये रहता है ..कहता था पोथी-पढ़ि पढ़ि जग मुआ ,और  पुस्तक देओ बहाय...वो तो 
राम-राम रट के  स्वर्ग पहुँच गया था. '
'...तो अब कहाँ से प्रकट हो गया .'

'वहाँ भी चैन नहीं पड़ा . हमेशा अपनी तीन-पाँच लगाता  सो यहाँ ठेल दिया गया -जाओ बच्चू बदली हुई दुनिया की हवा खा आओ  .' ,
' हाँ ,लग  तो एकदम ठेठ रहा है .  पर  पहले से काहे हार मान लें ..जो होयगी देखी जायगी . ..'
और  बैठा लिया अंग्रेजी पढ़ाने .

चेता पहले ही दिया  ,'देखो कबीर,
 बहसबाज़ी मत लगाना .ये जैसी है वैसी है. नई भाषा की बाराखड़ी शुरू कर रहे हैं  अंगरेजी के अक्षर हैं ,
उनके हिसाब से चलना पड़ेगा तुम्हारे हिसाब से वो नहीं हँकेगे. '
हुँकारा भर लिया कबीर ने . 
दो दिन में सारे आखर सीख डाले. 
थोड़ा बिचके थे एकाध बार, 
पूछ बैठे थे,'ये एच डबलू ,वाई ज़ेड इनमें कई आवाज़ें हैं कौन सा सुर निकलेगा ?'.
'वो सब बाद में पता चलेगा .अंग्रेजी है कौनो देसी भाषा नहीं कि तुम अपने हिसाब से चला लो.'
जब आये कैपिटल लेटर, बड़े अक्षऱ .
कबीर बोले ,'गुरू जी, इहै अच्छर बड़े करके लिख दें तो ..?'

'अपनी टाँग बीच में मत अड़ाओ , जानते नहीं का बड़ेन का  का ढंग ही अलग होता है.सारा नकशा  बदल जाता है .'
कांप्लेक्स तो शुरू से रहा था कबीर में . सुन कर सिर झुका लिया,
'हम छोटे आदमी -बड़ेन के लच्छन का जाने !'
फिर शब्दों की बारी आई .
'ये स्पेलिंगें है -रटनी पड़ेंगी .'.
रट्टमपट्टा करना पड़ता है संस्कृतवालों को देख चुके थे कबीर .

 रैट मैन रैन  से आगे डाग पाट कार फ़ार तक आते कैच सुन सोच मे पड़ गए  ये फ़लतू का टी कहाँ से आय गया ? .थोड़ी के बाद - वूमेन,वीमेन में गड़बड़ा गए ,'ये  ई आवाज  पीछे वाले अच्छऱ पर है, पहले वाले से कैसे जोड़ी जाई ?'
 'ऐसा  ही होता हैं .'
'कइस बोलना है  ई कौन तय करता है ?'
'पता नहीं, पर सब मानते हैं.'
'किसउ ने तो तय किया ही होयगा .वाकी बात दुनिया भर ने मानी .तभै काहे नाहीं साफ़ बात कर ली,जिसकी आवाज़ लगी उहै बोले ... ?'
 मास्टर ने धमका दिया .लिहाज़ कर गये गुरु का . 

फिर  आगये ,वी -डबलू ई,नी -के एन ई ई ,,ज़ू ज़ेडओओ. वी डबलू ,बी बीई और बी ईई. आई दो तरह से . ई वाई ई औऱ अकेली वाली सिर्फ आई
हे राम जी, चकराय गये बे तो .
'इन सब अच्छरन की स्पेलिंग भी अलग से सीखै के परी .?'
 'अब का अच्छरन की भी स्पेलिंग रटन का परी .एक-एक अच्छर की इत्ती बड़ी पूँछ -ई भासा है कि तमासा.!'
'अरे, चुप बे जाहिल !'
उस समय तो अचकचा कर चुप हो गये.पर मन ही मन कुलबुलाते रहे.
 थोड़े उद्दंड शुरू से रहे थे .सोचा , गुरू जी जरा गुस्साय ही तो लेंगे , बात तो पता चल जायेगी.
'गुरू जी ,मान लो कोई अच्छर सीख के पढ़ना चाहे तो लिखना सीखै के बाद उसे पढ़ना अलग से सीखना पड़ेगा 
?अइसा नहीं कि एक बार अच्छर आय जायँ तो अपने आप पढ. लें जैसे अपनी हिन्दी  ?'
'अरे .हिन्दी का क्या !कोई ऐरा-ग़ैरा नत्थूखैरा सीख ले, फिर ज़िन्दगी भर पढ़ता रहे .ये अंगरेजी ठहरी ,हमेशाअकल लगानी पड़ती है. ' .
'तो इसके स्पेलिंग और उच्चार कौन तय करता है ?'
'काहे ?'
'उसई से बात करें . लिखने-बोलने में कोई तालमेल नहीं .  कोई नियम-कनून होय तो उसके हिसाब से चलें .'
'ये रानी भाषा है अपने हिसाब से चलाती है .'

परेशान हो गये वो तो , लोगन को ई भासा सीखन की जरूरत काहे आन पड़ी ?
दुनिया में चलन है इसका ,इसे जानके विद्वान कहाओगे ,सब तुम्हारी सुनेंगे आदर-मान देंगे .        
कैसा चलन है दुनिया का -निश्वास लेकर रह गये 
मास्टर ने समझाया था
 कबीर देखो कानूनबाज़ी बीच में मत लाओ .ई जानकारन की भासा है, गँवार कुँआ के मेढ़क जैसन की नहीं 

*
बड़ी मुश्किल में हैं ,कबीर  कैसेीअच्छर-माला है,
 कुछ तो अइसे कि  आवाज़ ही नहीं निकाल पाते ,जहाँ डाल देओ बेदम-से पड़ जाते  हैं .

 अजीब बात  talk Walk  दोनों में एल चुप्पा . इतना दब्बू कि आवाज़ नहीं निकलती. बहुत बार   बेकार पड़े रहते हैं . know  हो चाहे knot, दोनों में k बुद्धू सा बैठ गया .! knowledge लिखा है है कि कनऊ लद गे ,मनमाने आखऱ  ठूँस दिये , कैसे अवाक् बैठे हैं जगह घेरे  .एकदम बेआवाज़.ऐसी कैसी बाराखड़ी जिसके आखर जब दखो गूँगे हो  जायेँ !  अक्षर अपनी आवाज़ नहीं उठा सकते तो बेकार भर्ती  से क्या लाभ  ?
बजट शब्द सुना तो लिखने लगे -  budget होता है .अरे ये डी बीच में कहाँ से आ गई ?
.अड़ गये - ये फ़ालतू का अच्छर नहीं लिखेंगे    इससे कोई फ़रक नहीं पड़नेवाला .

इस भासा का कोई ठिकाना नहीं   ,चाहे जो लिख लो चाहे जो बोलो -पता नहीं कौन तय करता है ?
पता होता तो उस से बात करते .
लिखेंगे कोलोनल ,पढ़ेंगे कर्नल .टी बेचारी अक्सर ही साइलेंट मिलती है .एम.सी लिख कर मैक पढ़ेंगे .मात्रायें बोलेंगे पहलेवाले में ,बादवाले में वूमेन ,वीमेन .
ऊब कर कह उठे 
 ई नटनी का काहे घुसाय लिया घऱ में   ढंग की कोई बात नहीं, हर तरफ़ से बेतुकी  .अपनी घरवाली बानी,अच्छी खासी ,नियम-कानून मानैवाली .अपना असलीपन बरकरार रखनेवाली कैसी सुघर -सुलच्छनी.
 .लोग अचरज  मैं - अब तक तो  तो देसी आदमी अंगरेजी की चार किताब पढ़ ले तो अपने आप को तीसमारख़ां  समझने लगता है ,ई तो सबसे निराला है. कमियाँ निकाल रहा है .
कोई हँसा किसी ने  समझाया , किसी ने खब्ती बताया.
 पर कबीर  धुन के पक्के,
तुल गये - .उठा ली लुकाठी और चल पड़े बाज़ार की ओर..

 चौराहे पर खड़े लाठी चटकाने लगे .
लोगों ने  उत्सुकता से देखा . कुछ आकर वहीं खड़े हो गये,' क्या हो गया ,भई ?
 और लोग आगये ,फिर और  लोग. 
वहाँ तो मजमा लग गया .

बोलने लगे कबीर-


'सुनो  ,लोगन सुनो ,  अपनी भासा , जिसने जनम से गोद  खिलाया,तोतले बोलों पे लाड़ लुटाया, दिल-दिमाग के रेशे-रेशे में अपना नूर समाया ,  उसमें कितनी  ममता माया .जरा अकड़ नहीं   प्यार से भरी  देस-देस के ढाँचे में  ढल गई कहीं राजस्थानी  ,कहीं अवधी कहीं ब्रज कितनी बोलियाँ बोल - सबसे नाता निभाने .को तैयार .
उसई को बेदखल किये दे रहे हैं.
जो गलत है वो काहे सहते हो ,चिल्लाओ ,शोर मचाओ ,दुनिया जाने कि अपनी सुघर -सुलच्छनी अनुशासित घरवाली बानी  बेदखल हो रही है ,  और बाहरी लोगों के साथ भागी आई बहुरूपिन को  घर में बिठा लिया ,सिर चढ़ाये हैं . उसके पीछे पुरखों की अमानतें लुटाये दे रहे हैं.उसी के नचाये  नाच रहे हैं .
जरा भी ग़ैरत  बची है कि नाहीं ?.'
 कुछ लोगो ने सुना ,फिर औरों ने सुना .
कबीर बोलते रहे  -
'ई कैसी साजिश चल रही है?देखो तो , सच्चे नेम नियमवाली , चाकर बन गई और वो  जो  घर में घुस आई उसके ठाठ हो गये .उसके लच्छन ही निराले हैं ,कौल-फ़ेल का कोई इत्मीनान नहीं .'

'बात तो ठीकै कह रहा है .हमारी पहचान मिटाय के रट्टू  तोता बनाय रहे हैं -'
पर कुछ को लगा - यह तो  ख़ब्ती है.

 पराये घर  में जो रानी बनी बैठी  उसके टुकड़खोरों को  खबर हो गई .
ये तो सारी बखिया उधेड़ी जा रही है ,सारे गुन-औगुन और  सच्चाई    सामने आने लगी  तो हम कहीं के ना रहेंगे.
 बाहरवाली का राजपाट गया तो हमें कौन पूछेगा?
  पीढ़ियों से अच्छे-अच्छे ओहदन  पर दूध-मलाई खाते आये .  ये लोग हम से रौब खाते थे,दब के रहते थे .लगता है अब   रूखी-सूखी नहीं पचती , 

 और देखो आज उसकी बात सुन कर उठाने लगे  .
वो मजमा लगा के चिल्लानेवाला मिल गया तो  हमारे खिलाफ़ हल्ला मचा रहे हैं.ये अक्खड़ देसी लोग ,क्या जाने अंग्रेजी की नफ़ासत ,कितनी पहुँच है ,कितना रुतबा है !ये सब इनके गले नहीं उतरेगा .
 ये देसी लोग हमारे  सुख-चैन में पलीता लगा देंगे  
. बताओ भला कबीर को अंगरेजी सिखाने की क्या  जरूरत थी ?वह  तो हई  उजड्ड  .अपना सुख-चैन भी नहीं देखेगा - जमीन-आसमान एक कर देगा 
करो भई, कुछ करो .
ये जाहिल लोग ,उसी भरम-जाल में उलझते  रहें . यहाँ की इन सब बानी-बोलियों को लड़ाओ .आपस में ये भिड़ी रहें ,और हमारा उल्लू सीधा होता रहे .
औरों को लड़ाओ ,दूध-मलाई खाओ !

पर अब कबीर  सामने आ खड़ा है - लिये लुकाठी हाथ!

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

मन की लगाम -

*
शाम को जब भ्रमण पर निकलती हूँ तो  बहुत लोगआते-जाते मिल जाते हैं.
अधिकतर फ़ोन कान से सटाये बोलते-सुनते चलते जाते हैं ,अपने आप में मग्न .सामना हो गया तो हल्का-सा हाय उछाल दिया या सिर हिलाने से ही काम चल जाता है . ऐसा भी  नहीं लगता कि जरूरत आ पड़ने पर अनायास चलती-फिरती बात हो रही हो .बाहरी दुनिया से बेखबर  पूरे मनोयोग से लंबे वर्तालाप. और अब तो यह कोई नई बात नहीं,  कोई मौसम हो ,आस-पास कुछ भी चल रहा हो -सबसे निरपेक्ष ..अपनी बातें ,वही दिनरात की वारदातें साथ लिए रास्ता पार कर लेते हैं . अपने से  परे  कुछ देखने का  न चाव है, न अवकाश .
रास्ते के दोनो ओर के  परिदृष्य ओझल रह जाते हैं अपनी वही दुनिया जो साथ लगा लाये हैं. वे परम संतुष्ट हैं, कि समय बेकार नहीं जा रहा . टहलना हो ही रहा है ,साथ  अपना काम भी चलता रहेगा  (बहुतों के हाथ में कुत्तें की डोर, उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखते हैं .वह काम भी साथ चलता है. फ़ोन पर बोलते-बोलते उसे ढील देना ,कहीं ज़रा रुक जाना ,सब अनायास चलता है .)
प्रकृति  लीला-विलास का अपना पिटारा खोले बैठी है . वन प्रान्तरों की ध्वनियाँ ,पंछियों की चहक ,वनस्पतियों की महक चारों ओर बिखरी हैं .उसके सहज कार्य-व्यापार  अपनी लय में चल रहे हैं
दिशाएँ उन्मुक्त हैं , धरती आकाश   के बीच रूप-रंगों का खेल ,अबाध गति से चलता है  मेरा बस चले तो इस लीलामयी के निरंतर प्रसारित संदेश अपनी झोली में भर लूँ ,लहरों की रुन-झुन,,पंछियों की लय-बद्ध उड़ान,गिलहरी ,खरगोश जैसे प्राणियों की कौतुकी चेष्टाएँ  की ,हवा मे हिलते   फूलों-पातों की चटक,सब समेट कर धर लूँ . ये लोग क्यों घर की दीवारों से बाहर उन्मुक्त वातावरण में आ कर भी अपने  मन को लगाम दिये रहते हैं . कभी तो छुट्टा छोड़ दिया करें . इस विशाल पटल पर  बहुत-कुछ है ,चरने-विचरने के लिये . इस मुक्त वातावरण  में यह  लगाम  ढीली कर दें तो संभव है  अन्य  दिशाओं में इतना चलायमान न रहे .
 धरती और आकाश के परिवेश पल-पल परिवर्तित होते ,एक नयापन निरंतर रूपायित होता  है . पर उन्हें इस सब से कोई मतलब नहीं . पता नहीं  ये लोग भ्रमण के लिये क्यों निकलते हैं .जब उसी मानसिकता  में रहना है तो बाहर जाने की ज़रूरत क्या है !.व्यायाम की मशीने बाज़ार में उपलब्ध हैं.तन को स्वस्थ रखना आवश्यक है ,नहीं तो दुनिया में  काम कैसे चलेगा.मन बीच में कहाँ से टपक पड़ा !
 तो ,ये दीवारों से बाहर आकर ,सैर करनेवालों के हाल हैं  अब उनसे क्या कहें कि ऐसे भी लोग होते हैं जो पुलिया पर बैठे  भी जन-जीवन का मुजरा लेने से हिचकते नहीं  . रोज़मर्रा की चलती राहें हों  या अप-डाउन करती ट्रेन का सफ़र हो , जीवन केअविराम बहते प्रवाह को आँकते-परखते , उसकेसचल दृष्य, अपने विनोद-कौशल से रंजित कर सर्व -सुलभ कर देते हैं, बाह्य संसार से उदासीन   लैपटाप या फ़ोन में नहीं घुसे रहते .
*

शनिवार, 12 नवंबर 2016

पर मैं और क्या करती ..!

*

यहाँ अमेरिका में लोग जिस तरह अंग्रेज़ी बोलते हैं,कभी-कभी सिर के ऊपर से निकल जाती है.
 रोज़ शाम को टहलने निकलती हूँ.अड़ोस-पड़ोस में कोई साथ का नहीं ,अकेले जाती हूँ .बहुत लोग निकलते हैं . रोज़ राह चलते लोगों से साबका पड़ता है . अधिकतर उसी समय टहलने निकलनेवाले परिचित चेहरे -कुछ नये भी ,स्त्री-पुरुष हर वय के. देख कर निर्लिप्त भाव से नहीं निकल जाते ,एक दूसरे का संज्ञान लेते हैं., शुरू-शुरू में लगता था पता नहीं क्या बोल रहे हैं अब तो चलते-चलते कभी एकाध बात भी हो जाती है .

हाँ, तो पहले जब वे कान से फ़ोन सटाये बोलते तो कुछ ध्वनियाँ कानों तक पहुँचतीं - अजब गुड़े-मुड़े शब्द गुलियाए मुँह से निकलते .ऐसे ही विश करते हैं वे .शुरू में बात को समझना मुश्किल होता था (अब तो सब ठीक). लगता था जाने क्या कह गये.आवाज़ भी साफ़ नहीं .पर सहज सौजन्यमय मुद्रा मन को भाती . सद्भाव का अनुभव होता . औपचारिक अभिवादन के बँधे-बँधाये बोल होंगे .पर मैं अचकचा जाती . इतने अचानक , अब मैं क्या बोलूँ ?

उत्तर देना चाहिये - पर क्या, जब उनकी सुनी ही नहीं? .

सोचा-समझा काम नहीं आता .कभी समाधान अचानक अपने आप हो जाता है.

उन्हीं की टोन में मु्स्कराते हुये मुँह गोल कर बिलकुल हल्की  आँय-बाँय ध्वनियाँ निकाल दीं . अस्पष्ट आवाज़ कानों तक पहुँचेगी ,मिल जायेगा समुचित उत्तर .

जब ताल के किनारे बेंच पर आ बैठती तो अपने उन आँय-बाँय बोलों पर देर तक हँसी आती रहती(अब भी आ जाती है) फ़ौरन सावधान होकर चारों ओर देखती हूँ - यों अकेले हँस रही हूँ कोई क्या सोचेगा?

नहीं ,कोई नहीं ,वो उधर एक जोड़ा बैठा है अपने आप में मगन

पर तब मैं और करती भी क्या ?

*

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

और मैं चुप !

  *
'नानी ,काँ पे हो...?'
'कौन है ?'अनायास मेरे मुँह से निकला,
महरी बोली,'आपकी नतनी ,और कौन ?'
वैसे मैं जानती हूँ कौन आवाज़ लगा रहा है.
और कौन हो सकता है इतना बेधड़क !
पहले चिल्ला कर पूछती है ,पता लगते ही दौड़ कर चली आती है.नानी के हर काम में दखल देना जैसे उसका जन्म-सिद्ध अधिकार हो. 
सोच रही थी मशीन पर बैठ कर उसकी फ़्राक की सिलाई पूरी कर दूँ .
अभी सिर पर सवार हो जायेगी - मेरे और मशीन के बीच में घुस कर खुद चलाना चाहेगी.नीचे के कपड़े को खुद कंट्रोल करना चाहती है .
कहती है ,'हमको भी चिलना.'
मैं रुक जाती हूँ नन्हीं सी अँगुली सुई के नीचे आ गई तो वह तो चिल्ला-चिल्ला कर रोना शुरू कर देगी और पछताऊंगी मैं.
 नाती भी कौन कम है !
 महरी अपनी रोटी एक किनारे रख देती है .वह आता है और रोटी उठा कर भागता है .मुँह लगा कर खा भी लेता है .महरी भागती है उसके पीछे ,देखो ये हमारी रोटी उठा  कर भागे जा रहे हैं ...और झपट कर रोटी ले लेती है .
.पर करूँ क्या मुझे भी तो इनके बिना चैन नहीं पड़ता .
कभी -कभी लगने लगता है मैं उसकी नहीं वह मेरी नानी है.
कहती है लड़कियों आईं हैं ,मैंने कहा लड़कियाँ कहो बेटा , फिर सहज रूप से कहा-हाँ लड़कियों को अंदर बुला लो 
मेरे कहने से क्या होता  सही-ग़लत का निर्णय वह अपनी बुद्धि से करती है 
  उसने सिर टेढ़ा कर ,मेरी ओर देखा ,मन में सोचा होगा खुद लड़कियों कह रही हैं और मुझे मना कर रही हैं
फिर बोली ,'लड़कियों बाहर खेलने बुला रही हैं .'
और मैं चुप !
*