बुधवार, 1 जुलाई 2020

कृतार्थता के क्षण -

*


 खुले आकाश की झरती रोशनी में नहाए, ये कृतार्थता  के क्षण और मेरा कृतज्ञ मन - लगता है नारी-जीवन का प्रसाद पा लिया मैंने!

कितनी नई फ़सलें फूली-फलीं मेरे आगे ,पुत्री में  पहली बार अपना अक्स  पाया था.आज, वही मातामही बन गई - और  नवांकुर को दुलराने का सुख तन्मय मानस में समो लिया.अपनी निजता की यह व्याप्ति उसकी गोद में प्रतिरूपित होते देखना रोम-रोम को  पुलक  से भर रहा है.
 बीतते जाते समय के तार कैसे परस्पर जुड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता कौन  तन्तु एक नई बुनावट को रूप देता किस दिशा में बढ़ चलेगा.  एक मैं, कितने रूपों में विस्तार पाती जा रही हूँ.  
वर्षों के अंतराल को जोड़ते ये संबंधों के तार - कितने व्यवधान पार कर नित-नवीन रूप धरते कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं. यह है ,मेरी निजता की व्याप्ति ,यहाँ से वहाँ तक ,व्यवधानहीन अटूट यात्रा.
नवजीवन के सुकुमार अंकुर में प्रतिफलन पायी यह नई सृष्टि,मेरा ही तो अंशागमन, मेरा पुनरागमन ,मेरे चित् का नव-नव प्रस्फुटन, हर बार परंपरा को आगे तक ले जाने की आश्वस्ति प्रदान करता मन-प्राङ्गण उद्भासित कर रहा है  .
 अपने बोये बीजों की फ़सल हर बार नये रूप में अँकुआते देख, अंतर्मन गहन संतृप्ति से आपूर्ण हो उठा है 
मैं विद्यमान हूँ अभी , और मेरे कितने प्रतिरूप ,कितने-कितने आकार लिये ,भिन्न नामों में, भिन्न देहों में साकार हो उठे हैं. यहाँ से वहाँ तक मेरा ही स्वत्व नये रूपों में अस्तित्ववान हो प्रकट हो रहा है.मेरे निजत्व कोअमित विस्तार मिल गया. 

नतशीश तुम्हें शत-शत प्रणाम करती हूँ, 
हे सृष्टि के नियन्ता, 
तुम्हारा अनुपम आदान शिरोधार्य कर धन्य हो गई हूँ मैं !
*

मंगलवार, 12 मई 2020

का चुपि साध रहेउ बलवाना...'

*
राम कथा के अंतर्गत सुन्दरकाण्ड,  परम सात्विक वृत्तिधारी पवनपुत्र हनुमान के बल,बुद्धि एवं  कौशल की कीर्ति-कथा है, उन्नतचेता भक्त की निष्ठामयी सामर्थ्य का गान है.
इस काण्ड का प्रारम्भ होता है जामवन्त के वचनों के उल्लेख से, जो मूलकथा से घटनाक्रम को जोड़ते हैं ,जिन पर सुन्दरकाण्ड का सम्भार खड़ा है.
रामत्व पर आपदा के चरम क्षणों में,आगे बढ़ कर चुनौती को स्वीकार करने का प्रश्न सामने खड़ा और परम समर्थ पवन-पुत्र मौन हैं.
'का चुपि साध रहे बलवाना...,,,,,,,,,पवन तनय बल पवन समाना'
जामवन्त की चुनौती भरी ललकार ने वज्राङ्ग को झकझोर दिया. शक्ति-सामर्थ्य का बोध जागा, अपार ऊर्जा तन में लहरा गई.तत्क्षण उन्होंने ठान लिया ,और दृढ़ निश्चय के बोल फूट पड़े -
'तब लगि मोहि परिखहु भाई.....
...........
जब लगि आवहुँ सीतहि देखी.'
इसी शक्ति-जागरण का प्रतिफल है सुन्दरकाण्ड,  सीता को खोजते हुए हनुमान सागर पार कर लङ्कापुरी पहुँचे ,जो तीन शिखरोंवाले(सुबेल,नील और सुन्दर )त्रिकूट पर्वत पर स्थित थी. सुन्दर शिखऱ स्थित अशोक वाटिका में, रावण ने सीता को बन्दिनी बना कर रखा था ,पवन-पुत्र के क्रिया-कलापों का केन्द्र वही रहा इसलिए इस काण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड उचित ही है.
शक्ति का यह उन्मेष किसी अहं की तुष्टि के लिए नहीं अन्याय के प्रतिकार के लिए, नीति ओर मनुज-धर्म की रक्षा के लिये है, स्वयं के मान-अपमान का विचार छोड़,निस्पृह भावेन अनीति के प्रतिकार एवं  शुभकार्यों के प्रति तत्परता के लिए है, इसी निर्वाह के कारण  राम-कथा का यह अंश अमर गाथा की परिणति पा गया है.
अञ्जनी कुमार की भक्ति कोई साधारण भक्ति नहीं थी, उन राम को पूर्णरूपेण समर्पित थी,जो आजीवन अपने सुख अथवा हित-साधना का विचार न कर,कर्तव्य के प्रति सतत तत्पर रहे. .विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने आदर्शों का निर्वाह किया. राम के परम उपासक हनुमान का बल,विवेक ,विज्ञान, रामकाज को ही अर्पित रहा.
रामत्व की विजय-यात्रा के लिये ऐसा ही समर्थ योगदान चाहिये, यही हनुमत् प्रयास,रामत्व को काँधे चढ़ाकर, उसके निर्वहन में सतत संरक्षक बन ,कई-कई आयामों में विस्तार पाता है.
हनुमनत्व की साधना के बिना रामत्व की सिद्धि नहीं होती.
अशोकवाटिका की वानरी कूद-फाँद,मारुतिनन्दन की वर्जना का घोष है कि अनीति से विरत हो, सन्मार्ग ग्रहण करो.
इस वज्राङ्गी क्षमता और शक्ति का उपयोग रामत्व अर्थात् सर्व-कल्याण की सिद्धि के लिये है.निस्वार्थ-निस्पृह भाव से ,उस के फलीभूत होने की साधना है और यही सुन्दरकाण्ड का प्रतिपाद्य है.
हनुमान की भक्ति निष्क्रिय हो कर बैठ जाने के लिए नहीं,अपनी क्षमताओं का समुचित उपयोग कर,अनर्थों के निवारण हेतु सतत प्रयत्नशील रहने की  साधना है, विश्व-कल्याण की प्रयोजना है, अनीति और अन्याय के निवारण का सङ्कल्प है. लोक-कल्याण राम का जीवनादर्श रहा ,और हनुमान,सम्पूर्ण निष्ठा के साथ, आजीवन उनकी कार्य-सिद्धि हेतु तत्पर रहे .
'कौन सो काज कठिन जग माँहीं', का उद्घोष कर जामवन्त ने सोई ऊर्जा को जगा कर ,जो संदेश दिया वह साधक के लिेए  अनुकरणीय है ,अन्यथा  हनुमान भक्ति का ढिंढोरा पीटना दिखावा मात्र है, बुद्धि, विवेक, ज्ञान का होना व्यर्थ है.
हनुमनत्व का सञ्चार ,तभी होगा जब उसका उपयोग अपने स्वार्थ ,के लिए न हो कर अनर्थों के निवारण, नीति और धर्म की रक्षा और सत् के सम्पादन एवं पोषण हेतु हो.जन साधारण सब सुनते समझते भी मौन रह जाय,इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? हनुमान-भक्ति निष्क्रियता की ओर नहीं ले जाती ,रामत्व के धारण एवं पोषण के लिए प्रेरित करती है.
दृष्टा कवि सचेत करता है कि सामर्थ्यवान का निष्क्रिय रहना समाज के लिए हताशाजनक होता है,सङ्कट के समय काम न आ सके उस बल,बुद्धि ,विवेक का होना, न होना बराबर  है.
सुन्दरकाण्ड,राम-कथा का अङ्ग होते हुए,अपना महत्व रखता है,उसका पाठ प्रियकर है क्योंकि उससे आस्थाओँ को बल मिलता है.
अंतर्निहित क्षमताओँ का भान भूले व्यक्ति को चेताने की,उसके सुप्त बोध जगाने की कथा है सुन्दरकाण्ड. और इसका प्रेरक उद्घोष कि तुम तुल जाओ तो 'कौन सो काज कठिन जग माहीं?'  चेतना को उदीप्त  करता है. अपने सीमित स्पेस में कथा-गायक का आशान्वित करता स्वर, भ्रमित मानव-जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने को प्रयासरत है.
सुन्दरकाण्ड का पाठ, साधक की सुप्त ऊर्जा को जगाने का साधन बने और  विश्व-मङ्गल के निर्वहन एवं संरक्षण हेतु तत्पर रहने का विवेक जगा सके तभी सार्थक और कल्याणकारी है महत् उद्देश्य की सिद्धि के लिये,संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए  हनुमनत्व की साधना,निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाने में है, और यही सच्ची वज्राङ्ग-भक्ति है, जिसके होते रामत्व पर आँच आना सम्भव नहीं. साधक का मनोबल उसे निरन्तर आश्वस्त करता, है कि असम्भव का सेतु पाटने को उसका योगदान, चाहे  नन्हीं गिलहरी के परम लघु प्रयास जैसा हो ,स्पृहणीय है.
*

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

कुछ पुराने पन्ने -

*
विवाह के बाद,  प्रारंभिक वर्षों में दीवाली हर साल अम्माँ-बाबूजी के साथ (ससुराल में)होती थी. सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी.
हमारे यहाँ दीवाली पर दो दिन डट कर बाज़ी जमती थी .कई संबंधी आ जाते थे.  
बराम्दे में गद्दों पर चादरें बिछा कर बीच मे एक बड़ा सफ़ेद मेज़पोश फैला , चारों ओर महफ़िल जम जाती. ताश की एक गड्डी से कहाँ काम चलता दो मिलानी पड़ती थीं .
लड़के -बहुएं देवर-जेठ सब को बाबूजी बैठा लेते थे .
मेरी पहली दीवाली थी .मुझे खेलना नहीं आता था.
अरे, तुम्हें फ़्लश नहीं आता...कोई बात नहीं ..चलो, हम सिखाए देते हैं.
ससुर जी ने कहा था.
उन्होंने एक गड्डी ताश की उठा ली. हुकुम, पान, ईँट, चिड़ी बता कर तीन इक्के निकाले. वैसे पत्तों की थोड़ी-बहुत  जानकारी मुझे थी.     
अब आगे  देखो दुल्हन ,
यह सबसे बड़ी ट्रेल,फिर रन बताए फिर सीक्वेंस ,कलर .
तीन-चार बाज़ी खेल कर बाबूजी उठ गये  
खेलने के लिये रुपये दिये थे उन्होंने ,कहा अब खेलो -पैसा सब सिखाय देगा.'
 उठते-उठते कह गये ,दिन्ने ,इनको बताते रहना ..
हाँ हाँ बाबूजी ,आप निश्चिंत रहिये,हम सब बता देंगे.
फिर भी वे मुझसे कह गये समझ में न आए तो अपने पत्ते दिखा कर दूसरे से मिल लेना. .
अब सब खेलने बैठ जाएँगे तो चाय कौन बनाए ?
नहीं ,इन दो दिन बहुएँ उधर नहीं लगेंगी .ताईजी और अम्माँ हैं न,वे बनाएँगी चाय.
विधवा ताई जी सबसे विरक्त-सी रहती हैं,अम्माँजी .चूल्हे पर भगोने में चाय का पानी चढ़ा देती हैं. 
कुछ देर बाद आवाज़ लगती है ,अरे मनुआ की दुलहिन ,कित्ती पत्ती पड़ेगी ,अंदाज बताय जाओ .
जिठानी उठती हैं 
वे कहती हैं सक्कर तो डाल दी .बस चाय कित्ती पड़ेगी? .
कित्ती डाली शक्कर ?
दुई लोटा पानी धरा था,सो कटोरी भर डाल दी.उसकी चिन्ता मत करो ,हमने पानी चख कर देख लिया .
उन्होंले चीनी घुलने के बाद ,चमचे निकालकर ,मिठास चख ली है.
कटोरे में चाय की पत्ती जिज्जी ने निकाल दी.
दूध की कोई चिन्ता नहीं .डालते जाओ ,रंग आ जाए तब तक .(वाह ,क्या चाय बनाई है अम्माँजी ने ,खूब औटी हुई गाढ़ी चाय उसमें दूध की बहार -चीनी भी खूब मन से डाली है ). 
हम लोग उठे पानी निकालनेवाली डोई से निकाल-निकाल,  चाय कपों मे छानी और ट्रे मे रख कर ले आए.
अम्माँ जी कप या शीशे बरतन में कुछ खाती पीती नहीं ,उनका काँसे का गिलास चलता है,जिसमें दूध और चीनी उनके हिसाब से, ढंग से पड़ी हो .
चार प्लेटों में दीवाली की पापड़ियाँ -अजवाइन हींग-मिर्च की बेसनवाली ,मैदा की नमक-ज़ीरे वाली और गुड़वाली मीठी पहले से चल रहीं थीं .
खेल जारी था.
हाँ, तो उसमें क्या हुआ?
 मैंने कई बार चाल चली .
इनने टोका , ए क्या कर रही हो ?
मैं हँस कर रह गई .
और एक चाल चल दी.
 अपने पत्ते फेंककर ये मेरे पास चले आए 
अरे वाह, कमाल करती हो तुम..
तीन इक्कों ने खूब जिताया मुझे उस दिन .
मैं सबके सामनेअधिक बोलती नहीं .घर में सबसे छोटे हैं मेरे पति ,छोटे जेठजी से नौ साल छोटे .अम्माँ कहती हैं , जौ तो हमारो पेट-पुँछना है .

मैं भी कौन सा राग छेड़ कर बैठ गई. बड़ी लंबी गाथा है उन दिनों की जो आज के लिये अजनबी हो गए है .
*