मंगलवार, 10 सितंबर 2013

कुछ पंक्तियाँ.


*
हमारे भारत में इधर मनुष्यों की नर-जाति में एक बदलाव नज़र आ रहा है.लगता है पुरुषत्व की परिभाषा ही बदल जाएगी .औसत में जो होता है उसी के आधार पर सामान्य विशेषताओं का निर्धारण होता है .उससे ऊपर-नीचे अनेक स्थितियाँ होना स्वाभाविक हैं .आज के युवा, बल्कि रसिक अधेड़ों की भी लालित्य-भावना और अपने पौरुष-  प्रदर्शन का एक ही क्षेत्र बचा है - नारी की देह . पैंतालीस या पचास पार के कितने ऐसे आदमी होंगे जो परायी लड़कियों को वात्सल्य भरी दृष्टि से देख सकें !और साथ की महिलाओं का  उल्लेख करते समय रस-वृत्ति या  विनोद-भावना से न भर उठें  (शब्द-चयन मनोभावों को उद्घाटित कर देता है.).मानसिकता ऐसी है कि बराबरी का सम्मान देना उनके लिए स्वाभाविक नहीं रहा .अब तो लगने लगा है पौरुष की सारी गरिमा और गाम्भीर्य चुकता  जा रहा है.
मनुष्य सभ्यता की दौड़ में जितना आगे बढ़ रहा है उतना ही उद्दंड  होता जा रहा है.अपने मन का  पुरा नहीं तो दूसरे को चैन से नहीं रहने देंगे .सब पर तो बस चलता नहीं ,अकेली लड़की निशाना बन जाती है.रोज-रोज सुनाई देता है किसी  लड़की पर तेज़ाब टाल दिया ,सड़क पर जला दिया . समाचार पढ़ कर लगता है आज का युवा अपनी इच्छा पूर्ति के लिए जानवर बना जा रहे हैं .बल्कि उससे भी गया -बीता.  वह जो चाहता है उससे लड़की को सहमत हो .नहीं तो जीने नहीं देगा .
 आठवीं कक्षा में एक कविता पढ़ी थी ,'यौवन', जिसकी कुछ पंक्तियाँ. हैं-

'सुन्दरता की जिस पर श्रद्धा,वैभव जिसके चरणों में नत ,
हो शक्ति भक्त जिसकी ,जिपर हो मुग्ध प्रशंसा तन-मन .
जो इन चारों से ऊँचा हो जो इन चारों से युक्त रहे ,
कवि के सपनों की साध वही ,कवि का आराध्य वही यौवन !'

(पता नहीं अब ऐसी कवितायें क्यों नहीं पढ़ाई जातीं?)
चलो, यह तो आदर्श है ,इससे कुछ कम भी  चलेगा .और कुछ नहीं तो इंसान की औलाद हो ,हैवानियत पर तो मत उतरो .
आजकल के युवा बेकार बातों में बहुत कुछ कर गुज़रते हैं इतना ही दम है तो सिर उठा कर कुछ उच्चतर साध्यों की ओर हाथ बढ़ाएँ- बहुत कुछ करने को है परिवार समाज देश  के लिए के लिए.अपनी इच्छा तृप्ति के लिए मरे जा रहे हैं और दूसरे का जीवन नरक बना रहे हैं .ऐसा  समर्थ और सक्षम बनने का दम नहीं बचा कि  नारीत्व स्वयं उनकी कामना करे !
विवाह की कुंकुम पत्रिका में  लड़की को 'सौभाग्यकांक्षिणी' लिखने की परंपरा है .नारीत्व की सफलता हेतु  कन्या अनुरूप वर की कामना करती है.उसके हृदय में जिसके प्रति रुचि नहीं , वह जबरन क्यों अपने को उस पर थोपना चाहता है? भारतीय काव्य-शास्त्र में शृंगार रस की पूर्णता तब होती है जब कामना नारी की ओर से व्यक्त हो.उसी में पुरुषत्व की गरिमा है, रसराज का सच्चा समाहार है, साथ ही जीवन में सुख-शान्ति तथा समाज की मर्यादा भी सुरक्षित है .
*
नोट -  आगामी ,जनवरी 2014  तक ब्लाग-जगत से मेरी उपस्थिति बाधित रहेगी . भारत जा रही हूँ .वहाँ  मुझे पता नहीं इन्टरनेट की कितनी सुविधा उपलब्ध हो .आप सब को पढ़ सकूँ यह मेरा पूरा प्रयत्न रहेगा.




12 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल कविता कौन पढता है प्रतिभा जी ,आज कल तो फिल्म गाने ,शीला की जवानी ,,,,,,,, फेविकोल से चिपका लो ,.......जैसे गाने से युवा पीढ़ी प्रेरणा लेते है i इनके प्रभाव दिखाई दे रहा है. पूजा पंडालों में भजन के स्थान पर यही गानों का भोंपू बजता रहता है .कोई इसका विरोध भी नहीं करता
    latest post: यादें

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रतिभाजी, मनुष्‍य को जानवर बनाने की ओर धकेला जा रहा है, सारा ही वातावरण दूषित हो चला है। क्‍या कहा जाए? भारत में आपका स्‍वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 13 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... ताकि आप की ये रचना अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...


    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]

    उत्तर देंहटाएं
  4. यथार्थ को कहती आपकी पंक्तियाँ ..... बद से बदतर हालात हो गए हैं ....
    भारत में आपका स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सही कहा है आपने, और आजकल स्त्री देह को भी तो हर वस्तु बेचने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है, विज्ञापन,फ़िल्में हर कहीं फूहड़ता नजर आती है..

    उत्तर देंहटाएं
  6. दमित वासनाओं को बाहर निकालने की सार्वजनिक प्रक्रिया में अनर्थ हुआ जा रहा है !
    सारगर्भित आलेख !

    उत्तर देंहटाएं
  7. विचारोत्तेजक लेख, हालात कुछ ऐसे ही बने हुए हैं.... शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी यह रचना पुरुष मानसिकता के मुंह पर एक तमाचा है जो सही है !
    हालात शायद इससे भी खराब है !
    आभार आपका !

    उत्तर देंहटाएं
  9. हम्म! असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं।
    खैर, अब तो संभवतः भारत में होंगी, आशा है आपकी यात्रा सुखद रही होगी।
    भारत प्रवास सुखमय हो।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपसे एकदमसहमत। संस्कारहीनता के युग में जी रहे हैं हम।

    उत्तर देंहटाएं