शनिवार, 5 अप्रैल 2014

इंसानी फ़ितरत -

             ये कौए लोग इतने बेवकूफ़ नहीं कि कोयल के अंडे फ़्री मेल में सेते रहें . वे अपना फ़ायदा देखते हैं. स्पेन के ओविएडो वि.वि. में डॉ. डेनिएला और उनकी टीम द्वारा  एक अध्ययन किया गया. उन्होंने आकार में बड़ी ,चित्तीदार कोकिलाओं की, वहाँ की एक प्रजाति और केरियन कौओं के व्यवहार पर प्रयोग किये .पाया यह गया कि कौए अपना हित देखते हैं,इतने भोले नहीं कि कोयल के अंडों को अपना समझ कर व्यर्थ में सेते रहें.कोयल के बच्चों का होना उनके बच्चों की परवरिश के लिए लाभकारी है .
कोयल के चूजें एक विषैला स्राव छोड़ते हैं ( बड़े होने के बाद नहीं ). जिसके रसायनों और क्षारीय तत्वों के कारण ,आक्रान्ता उनसे दूर भागते हैं और वे सुरक्षित रहते हैं .
 इन लोगों ने जब  उस स्राव से युक्त मांस ,जिस घोंसले में केवल कौए के चूज़े थे, रखा तो जंगल की बिल्लियों और अन्य पक्षियों  ने छुआ भी नहीं .अन्यथा तो वे अंडे-बच्चे सब गड़प् जाते . 
   कौए अपनों  की सुरक्षा के लिये कोयल- शावकों का प्रयोग करते हैं ,उन पर कोई एहसान नहीं करते .न कोयल चालाक है न कौआ मूरख !  प्रकृति की 'पेइंग गेस्ट' प्रणाली है - सह-अस्तित्व का सिद्धान्त!
कुछ भी कह देना तो इंसानी फ़ितरत है - खुराफ़ाती दिमाग़ की सूझ !
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13 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 07/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  2. बिलकुल नई जानकारी...आभार !

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  3. नई जानकारी है यह हमारे लिए !
    आभार !

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  4. नवीन जानकारी देने के लिए धन्यवाद प्रतिभा जी |

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  5. हमारी कोई भी राय हमारी सीमित जानकारी के आधार पर ही बनती है.आजतक कोओ को बहुत ही महान समझती थी.धनयवाद !

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  6. ये तो एकदम नयी जानकारी है ..
    अच्छा है सहभागिता प्राकृति ने अपने आप ही सुझाई हुई है ...

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  7. गज़ब की जानकारी दी आपने तो , और प्रकृति का सन्देश भी.

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  8. प्रकृति के सहअस्तित्व की बिलकुल नयी जानकारी मिली .

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  9. Prakriti me kuch bhi aisa nahin jo logical na ho.yahi saabit hota hai is research se.vastava me kabhi sochne kee koshish bhi nai ki hogi maine to k akhir aisa kyun hai (ek aur insaani fitrat..jo barson se kaha jata raha hai..padha jata raha hai..mind set karke use aankhein moond karke bina us par soche vichaare tathya ke roop me sweekaar kar lena.) Parmatma ke diye vivek ka sahi upyog to in shodhkartaaon ne kiya sach me.
    sehastitva ke siddhant bahut padhe hain..magar ye to sabse rochak tha.just ma ako bataya phone per ..unhe bhi kaafi aashcharya hua..k apan log to kabhi soche hi nai k aisa gar hai to kyun hai..aur wahi typical indian saying k videshi logon ka kitta dimag chal jata...:-| khair...dimag to sahi samay pe jiska chal jaye uska chal jay..warna kya desi kya videsi.

    baawjood..in sabke..aapke liye vishesh vishesh aabhar..k is jankari ko apanse sabse baanta Pratibha Ji. do tho maasoom panchhin aur ek mamtamayi prakriti...teenon aapas me kitte samanvay aur sanyojan se jee rahein hain..insaan apna khuraafati dimag chalakar kaise koyal me chaalaaki aur kauve me moorkhta ka aaropan kar deta hai na !!!!! aur kehne ko hum viveksheel praani hain.i wish jisne sabse pehle ye socha ho k koyal chalaki karti hai aur kauva kitta moorkh hai..wo ye tathya jaanein k aisa nahin hai :-|

    hehehe :):):):):):)

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    1. हाँ तरु, प्रकृति की योजना पर इंसान विश्वास नहीं कर पाता अपनी डेढ़ टाँग की मुर्गी अलग चलाना चाहता है !

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  10. शिप्रा की लहरों की अपनी खूबसूरती है लेकिन यहाँ नई जानकारी पढ़कर हैरानी के साथ साथ खुशी भी हुई क्यों कि कौए मुझे बेहद पसंद हैं वे अपनी बोली और हावभाव से बहुत कुछ कह जाते है लेकिन अपने पराए अंडों में फर्क न कर पाएँ ,,,यह समझ से बाहर था लेकिन आज आपने तो मन की शंका ही दूर कर दी.. आभार ...

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