बुधवार, 19 मार्च 2014

सागर - संगम: 8 .

मंच पर - लोकमन ,सूत्रधार और नटी.
*
लोक - छठी शती तक शाक्य ,लिच्छवी, कोशल चेदि अवंती
जैसी सोलह महाशक्तियाँ यहाँ शान से दमकीं.

धीरे-धीरे छँटते -बँटते बल में लगे सिमटने
सदी आठवीं  में  अधिकार जमाया आ अरबों ने.
तुर्कों ने दिल्ली की गद्दी  बारहवीं में पाई
 राजनीति में इस्लामी शासन की गंध समाई
निर्वासित बाबर एशिया मध्य से फिर चढ़ दौड़ा
भारत में इस्लाम धर्म का मार्ग बन गया चौड़ा
अगली तीन शती तक पहचानो  उनके हस्ताक्षर
मनमानी पर उठे मराठों सिक्खों के क्रोधित स्वर

सूत्र - समाज और धर्म की स्थितियाँ समझ में आईँ,अब पृथ्वीराज के बाद देश की राजनीति के हाल बताइये.
लोक - छोट-छोटे राज्य और अपने ही मद में डूबे ,
जिनके सीमित स्वार्थ समूचे भारत को ले डूबे,
उठा-पटक के बाद मुगल शासम ने जड़ें जमाईँ ,
संस्कृतियों की टक्कर औ, फिर नये मार्ग कुछ सूझे.
दीन-इलाही जैसे समाधान भी गए बताए .

दृष्यांतर -
नटी- तो हिन्दू-मसलमानों में पारस्परिक  सामंजस्य बैठने लगा ?
लोक. - जन का मन सरल होता है पर दूसरों के  उकसावे  में बड़ी जल्दी आ जाता है .और धर्म के ठेकेदार उसे अपने हिसाब से बहका लेते हैं .
सूत्र- हमेशा यही होता आया है .जीवन की सहज प्रक्रिया में बधायें खड़ी करना और आडंबर फैलाना ,यही इनका काम रह गया है.पर हमें तो तब की स्थिति जानने की उत्सुकता है .
लोक.- सब कुछ बड़ी स्वाभावित गति से हो रहा थ देखो -

 दृष्य -
(एक प्रेमी युगल राजपूत युवक और मसलमान युवती,युवक के हाथ में पुष्प-गुच्छ जो वह युवती की ओर बढ़ाये है उसका हाथ जरा-सा बढ़ा है पर  देने-लेने  की सुध किसी को नहीं.)
पृष्ठभूमि से संगीत -
'तेरी नज़रों में जन्नत का नज़ारा पा लिया हमने,
रहे तू सामने यों ही उमर सारी निकल जाये ,
मचलती बिजलियाँ, लहरों की थिरकन और ये मौसम ,
तेरा चंदन-बदन साँसों में महके और घुल जाये ,'


( अकबर और बीरबल आते हैं और उन्हें देखते एक ओर से निकल रहे हैं.)
अकबर -  बीरबल,ये बरख़ुरदार तो जैसे जन्नत की सैर पर निकल पड़े हैं .
बीर - (मुस्करा कर )लग तो कुछ ऐसा ही रहा है,जहाँपनाह .
अकबर - पर ये हैं कौन ,अच्छे घरों के लगते हैं ?
बीर- टोडरमल का बेटा कमल और अबुलफ़ज़ल की दोशीजा सुरैया.
अकबर - चुपचाप निकल चलो यहां से .
(दोनों जाते हैं)
*दृष्य परिवर्तन
( मंच पर अकबर और जोधाबाई .)
जोधा- जहाँपनाह,इतने दिनो से हम आपके साथ हैं पर एक बात...
अकबर -महारानी जोधा,आप एक बात क्यों भूल जाती हैं कि आपके सामने हम जहाँपनाह नहीं ,आपके शौहर हैं.
जोधा -मुँह से निकल जाता है क्या करें !
हाँ ,एक बात हमारी समझ में आज तक नहीं आई कि चीज़ों को देखने का आपका नज़रिया सबसे निराला कैसे हो गया?
अकबर - तारीफ़ कर रही हैं या किसी कमी की तरफ़ इशारा कर रही हैं?
जोधा -तारीफ़ है आपकी.आप दूसरों के प्रभाव में नहीं आते ,मज़हबी और जज़बाती न हो कर अपने विवेक से निर्णय लेते हैं ,यह खासूसियत आपमें शुरू से देख रही हैं हम .
अकबर - क्या कहूँ !......पूरे चौदह साल का भी नहीं था,उस नादान उम्र में सिर पर ताज रख दिया गया .हमारा सब से पहला सिंहासन लड़ाई के मैदान में ईंटों से बना था,राज्य के नाम पर पंजाब की थोड़ी सी ज़मीन थी.घर-बाहर सब जगह अशान्ति.
परिवार में अपने-अपने मतलब के लिये चालबाज़ियाँ और धोखे, बाहर दुश्मनों का सामना.हम बिलकुल अकेले पड़ गये थे .जिन अजीब हालातों से गुज़रे बयाँ नहीं कर सकते.हेमू की बातें तो आप भी जानती हैं.उन कड़वे अनुभवों ने हमें समझा दिया किअपने मतलब के पीछे मुसलमान भी दग़ा करते हैं और बफ़ादारी में हिन्दू भी कम नहीं.जब से हमने मज़हब और जज़बातों का चश्मा उतार दिया,वो तजुर्बे हमें ज़िन्दगी भर का पाठ पढ़ा गये.
जोधा - तभी आप इतने उदार हो गये कि किसी मज़हब को नीचा नहीं समझते आपने इबादतखाने में हिन्दू,मुसलिम बौद्ध जैन पारसी,सूफ़ी सबके लिये दिन मुकर्रर किये.पर देखिये न ,इन बातों से मुल्ला-मौलवी खफ़ा हो गये.
अकबर - खफ़ा तो वे तब से हैं जब से हमने तीर्थ-कर और जज़िया माफ़ किया.जब से हमने ऊँचे पद, धर्म के हिसाब से न देकर काबिलियत पर दिये.वो हमें पट्टी पढ़ाते रहे पर हमने हिन्दुस्तान की एकता का जो ख़्वाब देखा है उसमें पूरे एक भारत में सारे मज़हबों के लोग कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं.क़ानून की नज़र में सब बराबर समझे जा रहे हैं.
(बीरबल का प्रवेश )
बिर- आदाब जहाँपनाह,महारानी.
जोधा - आओ बीरू भैया बड़े खुश नज़र आ रहे हो ?
अकबर  -क्या हुआ बीरबल,फिर कोई नया चुटकुला तुम्हारे नाम से जारी हो गया ?
जोधा -बड़े मज़े की बात है ,इन्हें लोग सिर्फ़ मसखरे के रूप में जानते हैं.
बीर -(मुस्कराते हुये)सिर्फ़ मसखरा नहीं अक्लमंद मसखरा !(सब हँसते हैं )
पर अभी कोई दूसरी ही बात है .
अकबर -वह भी कह डालो.
बीर- आपने बताया नहीं महारानी को ?
अकबर -अब तुम ही बता दो .
बीर -महारानी,अभी रास्ते में जो खुशनुमा नज़ारा देखने को मिला उससे दिल खुश हुआ पर तो चिन्ता भी होने लगी .

जोधा  -ऐसी क्या बात है बीरू भाई ?

बीर -बात ऐसी है कि इसका हल आपकी मदद के बिना शायद ही हो सके .अभी रास्ते मेंजहाँपनाह के साथ जो देखा ,अबुफ़ल की बेटी सुरैया और टोडरमल के बेटे कमल को इश्क के सातवें आसमान पर पहुँचे हुये देखा.दिल बाग़-बाग़ हो गया कि इन्सानी जज़बात मज़हब की दीवारों को नहीं मानते.पर उस आसमान से कोई उन्हें धरती पर गिरा दे तो क्या होगा यह सोच कर फ़िक्र भी हुई .
जोधा -संस्कृतियों का सम्मिश्रण एक सामान्य प्रक्रिया है और विकासशील जीवन की अनिवार्य आवश्यकता भी.

अकबर - हमें तो बहुत अच्छा लगा बीरबल!,हम जिस खाई को पाटना चाहते हैं उस दिशा में यह सही कदम होगा.
जोधा -फ़जलू भाई और टोडर भैया को ख़बर है ?
बीर -शायद नहीं .और इसके बारे में उनका नज़रिया क्या है यह भी पता नहीं.
अकबर - अपनी औलाद को कोई दुखी नहीं करना चाहता .उनकी परेशानी को हम हल करेंगे .वो दोनों भी तुम्हारी तरह रोशन ख़याल हैं. हम उनकी सरपरस्ती करेंगे..
जोधा -तो कमल इस्लाम कुबूल करेगा या सुरैया हिन्दू बनेगी?
अकबर -क्यों महारानी ,आपको इस्लाम कुबूल करना पड़ा या हम हिन्दू हुये?
जोधा -आप सुल्तान हैं.और ये रियाया.मज़हब इन्सानियत के आड़े न आये तो हमारा मुल्क स्वर्ग बन जाये.ऐसे तो रूपमती की मिसाल भी सामने है जिसने अपने मुसलमान शौहर के लिये जान की बाज़ी लगा दी.
 अकबर -और आप यह भूल गईँ कि चित्तौड़ की महारानी कर्मवती हमारी फूफी लगती थीं. उन्होंने हमारे वालिद मरहूम को राखी भेजी थी.फिर भी उन्हें जौहर करना पड़ा. यह बात हमें अब भी खटकती है.तभी से हिन्दू मज़हब के लिये हमारे मन में बहुत इज्ज़त और कशिश है.
बीर -जहांपनाह,आपकी दरियादिली की जितनी तारीफ़ की जाये कम है.
सुलह-कुल की नीति,दीन इलाही जैसा सबको जोड़नेवाला मज़हब,एक दिन सारी दुनिया इसकी कद्र करेगी.
अकबर - समझेगी तब करेगी,अभी तो कोई समझना ही नहीं चाहता..अब तक इस्लाम ने तलवारों के बल पर हुकूमत की थी,कितने क़ीमती ग्रंथों से भरे पुस्तकालय जला दिये गये,बुलन्द मंदिर तोड़ दिये गये मज़हब मे अंधों ने दरिन्दे बन कर दूसरों को मटियामेट कर देने में कुछ उठा नहीं .यह सोच कर मेरा सिर शर्म से झुक जाता है .अब मैं सबको भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि आगे ऐसा कुछ नहीं होगा .सब मिल-जुल कर चैन से रहेंगे ,सब में इन्सानियत का जज़्बा रहेगा .
लेकिन क़ामयाबी कब मिलेगी ,मसझ में नहीं आता.
जोधा- ज़रूर मिलेगी.,सच्चे मन से किया गया कोई संकल्प बेकार नहीं होता .
बीर -हाँ, जहाँपनाह,एक दिन सब लोग इसकी कदर करेंगे ,वह दिन ज़रूर आयेगा .

*
(मंच पर सूत्रधार, नटी और लोकमन .एक कोने से  सुरैया आती है और अपने आप में ही चलती हुई नेपथ्य में निकल जाती है .तीनो विस्मय से देखते रहते हैं. )
नटी- ये तो अबुलफ़जल की की बेटी है सुरैया... कहाँ जा रही है ?
लोक .- चलो देखते हैं .
(तीनों  उसके पीछे चले जा रहे हैं)
 सूत्र - ये तो उस घर में चली गई ,किसी बड़े ओहदेदार का घर लगता है .
लोक - बहुत उत्सुकता है ?चलो हम भी चलते हैं ,देखे क्या हो रहा है .(जाते हैं .)
दृष्य - बीरबल का सुसज्जित कक्ष ,कालीन बिछा है गाव तकिए आदि .बीरबल की पुत्री फूलमती और सुरैया शतरंज खेल रही हैं
सुरैया,'हाँ ,फूलमती ,चलो चाल .
फूल -(कुछ देर सोचती है )ये, लो सुरैया बाजी ,मात !
सुरैया- अरे, तू बहुत तेज होती जा रही है, मुन्नी .बीरू चचा की बेटी है न !(ठोड़ी पर हाथ रख चाल सोचती है.मुन्नी की माँ का प्रवेश)
माँ -बेटी सुरैया,
सुरैया - (एकदम उठ कर खड़ी हो जाती है )चची, आदाब !
माँ - (उसे कंधे से लगाती है)जियो बेटी ,जियो .
एक दासी आती है - कमल लल्ला आए हैं .(प्रस्थान, फूलमती  उठ कर दौड़ जाती है. )
उसी  की आवाज़ -  देखो तो भैया मछलियाँ लाए हैं ,वाह कित्ती खूबसूरत हैं .सुरैया बाजी आओ देखो ..
(उठती हुई सुरैया को मां रोक लेती है )
माँ -तुम कहाँ जा रही हो ,कमल को यहीं बुलाए लेते हैं .मुन्नी ,कमल को यहीं ले आ
 (दोनो आते हैं हाथ में शीशे की हाँडी  लिए कमल).
कमल - देखो सुरैया ,तुम्हें यही मछलियाँ चाहिये थीं .
मुन्नी -  हमें पता था बाजी के लिए लाए होंगे ..अब बाजी ,हमसे बात भी क्यों करेंगी ,कमल भैया जो आ गए .
(सुरैया आँखें तरेरती है ) ये मुन्नी बड़ी शैतान है .चची इसकी बात का एतबार मत  कीजिएगा .
माँ - बैठो ,बेटा ,अभी शर्बत भिजवाती हूँ .(जाती है )
मुन्नी - ( हाँडी ले ली है उसमें झाँकते हुए )लाल पीली ,और  सुनहरी मछली भी ,कितनी छोटी छोटी !
कमल -हौज़ में डाल देना बड़ी हो जाएँगी ,इनके रंग और निखर जायेंगे.छः इंच से ज्यादा कोई नहीं होंगी.देखा सुरैया ,तुम्हें पसंद थीं न .ये सुनहरीवाली तो व़ी मुश्किल से मिली है ,
सरैया- बहुत दिलकश हैं कमल भाई कितना ध्यान रखते हो तुम .
(बीरबल का प्रवेश ,हाथ में कुछ पोथी-पुस्तकें)कमल -चाचा,प्रणाम,
सुरैया- चचा आदाब .बीर.- ख़ुश रहो बच्चों !फूलमती तुम्हारी अम्माँ कहाँ है ?
मुन्नी -रससोई की तरफ़ होंगी.टोडरमल चाचा और फ़ज़लू चाचा आनेवाले हैं ,सो कुछ खास चीज़ें बनवा रही हैं .अम्मा,अम्माँ..
(आवाज़ -आ रही हूँ. बीरबल .किताबें रख कर बैठते हैं)
कमल -बीरू चाचा ,आप क्या मज़ेदार किस्से रचने लगे हैं .चारों तरफ़ आपका नाम फैल रहा है .
बीर -- (हँसते हुए)मैं भी यही सब सुन-सुन कर आ रहा हूँ (मुन्नी की अम्माँ आती हैं )यह तो मशहूर है कि बादशाह अकबर वेश बदल कर प्रजा मेैं घूमते हैं
लेकिन अब तो उनके और मेरे नाम से किस्से गढ़-गढ़ कर कहे जाने लगे हैं.
सुरैया -  फिुर तो बड़ा मज़ा आता होगा ,बीरू चचा. पर आपको पता कैसे चलता है ?
बीर.- कुछ किस्से मेरे कान तक आए. तब मैंने एक क़िस्से के लिए एक अशर्फी मुकर्ररकर दी .
माँ - फिर तो अशर्फ़ी के लालच में  लोगों के दिमाग़ से सीधे तुम्हारे पास आने लगेंगे .नाम तुम्हारा .
बीर. -तो मैं क्या कोई मक्खीचूस बनिया हूँ ?कम-अज़-कम ये तो पता चले कि क्या-क्या खुराफ़ात हमारे नाम से रची जा रही है.
कमल -चाचा,आपने तो दीन-इलाही कुबूल कर लिया ,उसके बाद किसी और ने नहीं कुबूला ?
बीर.-जिसकी मर्ज़ी हो करे ,किसी के साथ ज़बर्दस्ती नहीं है.लोग उनकी नीयत पर शक करते हैं वे तो हर तरह सेअवाम को खुले दिमाग और रोशन ख़याल बनाना चाहते हैं .देखो, कोशिशें कितनी क़ामयाब होती हैं !
 सुरैया - हमने सुना है मुल्ला-मौलवी उनसे बहुत खफ़ा हैं.
कमल -खफ़ा तो होंगे ही.वे उन        को अपने इशारों पर नचाना चाहते हैं और बादशाह सलामत सोच-समझ कर चलने की बात कहते हैं .
बीर.- उनके इबादतख़ाने में सब मज़हबों के लिए दिन तय हैं हिन्दू,बौद्ध,जैन पारसी ,ईसाई,शिया सन्नी ,सूफ़ी सब मतों को सुनने समझने पर ज़ोर देते हैं .ये बातें पाखंडी और अहंकारी लोगों को रास नहीं आतीं .
 सुरैया -जज़िया हटाने पर ही कैसा तूल मचाया था.
मुन्नी -सुरैया बाजी,होज़ में मछलियाँ डालें.,चलिये कमल भैया  चलिये
(तीनो जाते हैं)
माँ - कंमल  और सुरैया का मामला बहुत आगे बढ़ता जा रहा है .इसका पता नहीं क्या नतीजा हो.
बीर -होगा क्या शादी कर दी जाएगी .
माँ -इतना आसान है ?एक तो धर्म का मामला है .फिर फ़ज़लू और टोडर भैया दोनों क्या पता क्या करें .
बीर -उन्हें अंदाज़ है .और सिर पर शाहंशाह का हाथ है.
माँ -तो सुरैया हिन्दू बनेगी या कमल मुसलमान ?
बीर. -अकबर बादशाह की बेगम जोधाबाई तो मुसलमान नहीं हुईँ .उन्हें अपना धर्म मानने की पूरी छूट है .न शाहंशाह हिन्दू हुए ,उनकी ज़िन्दगी कितनी अच्छी तरह चल रही है.
पर ..वे बादशाह हैं .इनकी बार तो हिन्दू-मुसलमान झंझट खड़ा कर सकते हैं .
बीर- तुम देखना .एकाध बार हल्ला मचेगा ,फिर सब ठीक हो जाएगा . बादशाह तो तालीम से भी मज़हब का दख़ल हटा रहे हैं .एक सी तालीम जिसमें सब खुले दिमाग़ से जो अच्छा हो कुबूल करें .
देखो हर क्षे्त्र में संगीत ,भवन-निर्माण ,चित्रकला,सब में हिन्दू और फ़ारसी शैलियों का योग हुआ फिर इंसान का सोच ही क्यों बँधा रहे !
मुन्नी -( प्रवेश कर ) पिताजी चलिये , चलिये. अम्माँ ,देखिये हौज़ में मछलियाँ कित्ती अच्छी लग रही हैं .
(सब जाते हैं ,सूत्रधार आदि आड़ से निकल आते हैं)

 सूत्र. - यह तो बड़े ओहदेदारों की बातें हैं.जनता का  हाल तो कुछ और ही होगा ?
लोक.- वह अपने ढर्रे पर चल रही थी .
नटी - अपना ढर्रा क्या मतलब ?
सूत्र.  - एक झलक उसकी भी देखते चलें...
लोक. जैसी तुम्हारी इच्छा.
*
दृष्य-परिवर्तन.
( स्थान-मार्ग,कुछ स्त्री-पुरुष ,साथ में  एक अधनंगा लड़का - गाते हुए आते हैं )
  कारे मेघा पानी दे ,
पानी दे गुड़-धानी दे .
कारे मेघा पानी दे ...'
(लड़का ज़मीन पर बैठता-लोटता है ,फिर जीभ निकालता है .एक स्त्री लोटे में पानी लेकर आती है उस पर डालती है कुछ पानी फैल जाता है , लड़का उसमें लोटता है )
' बरसो राम धड़ाके से ,
बुढ़िया मर गई फाके से .
कारे मेघा..'
(आकाश की ओर हाथ उठा कर सब गाते हैं -
'आओ बदरा झूम के, धऱती प्यासी घूम के ..')
एक स्त्री -(आँखों पर हाथ छाये आकाश ताक रही है)अरे देख ..देख .हमारी पुकार उसने सुन ली .वो रहा बादल .
लड़का उठ खड़ा होता है -कहाँ,कहाँ ?
(सब देख रहे हैं)
आदमी - वो देख पूरब की तरफ़ से कैसी तज़ी से बढ़ा आ रहा है. ( बिजली चमकती है ,बादल की गरज).
(लोग प्रसन्न ताली बजा कर गाते हैं -)
 सावन बरसे भादों बरसे झूम बदरिया कारी ,
प्यासी धरती करवट बदले, छाए रे हरियाली.
नदियाँ भर गईँ, ताल-तलैया लहर-लहर लहराए ,
भर गई गगरी ,बह गई छपरी ,पिया बिदेस न जाए.
घटा साँवरी अंबर छाई ,ननदी मत दे गारी !
*
(क्रमशः)

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति..होली की शुभकामनाएँ

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  2. शकुन्तला बहादुर26 मार्च 2014 को 8:07 pm

    इतिहास के पृष्ठों को नाट्य विधा में बड़ी कुशलता से चित्रित किया है ।
    इस ऐतिहासिक नाटिका से लेखिका का व्यापक ज्ञान पुन: उत्कृष्टता
    से प्रमाणित हो रहा है । आनन्द के इन क्षणों के लिये आभार एवं साधुवाद!!

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  3. सम्यक सटीक सामयिक संरचना । बधाई ।

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