शनिवार, 26 जनवरी 2013

इतना तो विहित है -



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अब के लोगों के गले से ज़रा कम ही उतरेगी .बात तब की  है जब हमारे देश में स्त्रियाँ पति का नाम नहीं लेती थीं, मेरी तो ऐसी आदत पड़ी है कि अब भी 'ये' 'वो' कह कर काम चलाती हूँ .कभी नाम लेना भी पड़े तो अपने ही कान खड़े हो जाते हैं .और 'ये' धड़ल्ले से शुरू से नाम लेकर चिल्लाते रहे .तभी मेरा पोता बोलना शुरू करते ही मेरा नाम ले कर आवाज़ देने लगा. अपने ननिहाल में मेरा खूब तमाशा बनवाया है उसने. अब तो खैर बड़ा हो गया है .
 हाँ ,तो मुझसे 15 साल बड़ी मेरी जिठानी फरक्काबाद(फ़र्रुखाबाद)की . उनकी चाची ,बड़ी क़ायदेवाली रहीं..('क़ायदा' =बहुओं के आचरण को नियंत्रित रखने के लिये ,खास अर्थों में ढाला गया एक  पारिभाषिक शब्द है.).
 उनके पति का नाम था 'पीतांबर' -सब 'पितंबर' कहते . इसलिये उन्होंने कभी  सितंबर महीने तक का नाम तक अपने मुँह नहीं लिया. शैतान देवरों ने पूछा तो बोलीं ,'का फरक है  ,एकै अच्छर को तो है!'
सही बात ,एक अक्षर इधर-उधर हुआ तो उनका तो धर्म गया !
 (सच्ची , मुझे भी  सितंबर शब्द बिलकुल 'पितंबर' की टक्कर का लगता है - एक साथ बोलिये 'सितंबर-पितंबर'  समान लगे न!) .
एक दिन मुझसे बोलीं ,' काहे तुम किलास में लड़कियन के नाम कैसे लेती हो ?.'
मैं तो चकपका गई .उनने स्पष्ट किया -
' जैसे लाला को नाम किसउ लड़किनी को नाम होय तो ..? अब तो लड़कियन के नाम भी ....'
'हाँ वो तो है... .तब? ..तब मैं ... मैं क्या करती हूँ ,..' मैं तो फँस गई .
मुँह से सच निकल गया तो अभी  शिकायत ऊपर तक न पहुँच जाय  सो बोली ,'शकल देख के 'उ'  (उपस्थित) लगा देती हूँ .'
उनसे और क्या कहती मैं !
वैसे एक लड़की है ,पति की नामाराशि ,पढ़ने-लिखने के नाम डब्बा गोल . ऊपर से क्लास में चकर-मकर करने में मुस्तैद.
अब नाम लेकर डाटूँ नहीं तो क्या सिर पे बिठाऊँ ?
पर घर पर कह तो नहीं सकती न !
फिर जब सामने हों ऐसी निष्ठावतियाँ जो पितंबर के हित में सितंबर का उच्चाटन कर डालें ,
तो मुझे अपनी भद्द पिटवानी है क्या ?
वैसे भी संकट-काल में इतना झूठ तो विहित है !
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22 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक,
    इतने से झूठ से संकट-काल टल जाये तो कोई बुराई नहीं:)

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  2. सही कह रही हैं , मैं कभी बुलाने के उसमें या वैसे नाम तो नहीं लेती हूँ लेकिन जब कहीं जिक्र हो और पूछा जाय तो ऐसी कसम भी नहीं खाई है। वैसे ये और वो ही सही संबोधन होता है। बच्चों से पूछो की पापा कहाँ है? तो बोलेंगे किसके पापा आपके तो हैं नहीं मेरे पापा का तो नाम भी है न। अब सब नाम ही लेते हैं। मेरी बच्चियां भी।

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  3. लोट-पोट ----

    गजब कायदा काल्ह का, दादी चाची तंग ।

    मेले में जाएँ भुला, दिखता असली रंग ।

    दिखता असली रंग, लाल छेदी शिव शंकर ।

    हरे राम गुरु-बख्श, कन्हैया रूप पितम्बर ।

    हँस-हँस कर के लोग, स्वास्थ्य का करें फायदा ।

    बढ़िया यह दृष्टांत, लगे अब गजब कायदा ।।

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  4. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  5. नाम लिख तो देती ना? हा हा हा हा। बहुत मस्‍त रहा प्रसंग।

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  6. :):) ... आज कल मेरा पोता भी धड़ल्ले से नाम ले कर बुलाता है मुझे .... संगता... संगता :):)
    आपकी ही तरह मैं भी काम चला लेती हूँ .... वैसे हालात इतने बुरे भी नहीं कि ज़रूरत पड़ने पर नाम न लिया जा सके ... रोचक

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  7. Main भी 'ये' 'वो' कह कर काम चलाती हूँ ....Smiles...

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  8. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  9. काफी रोचक लगा ये पढ़ना...वास्‍तव में पहले लोग नाम नहीं लेते थे....अब तो धड़ल्‍ले से नाम लि‍या जाता है।

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  10. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि को आज दिनांक 28-01-2013 को चर्चामंच-1138 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  11. आज के यथार्थ को प्रस्तुत करती सुन्दर रचना।

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  12. हा हा हा ..आप भी न बड़ी मजेदार है :):)..मुझे अपनी नानी याद आ गईं उनसे हम बहाने बहाने से नाना जी का नाम बुलवाने की कोशिश करते थे, पर मजाल है कि वो ले जाएँ :).

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  13. ई मेल से शकुन्तला जी -
    "पतिपरमेश्वर का ज़माना अब नहीं रहा । आजकल सखाभाव के नाते दोनों ही खुल्लमखुल्ला एक दूसरे का नाम लेकर खुश होते हैं । कहीं पढ़ा था कि मेले में भटक गई एक ग्रामीण स्त्री ने पति का नाम पूछे जाने पर अपनी नाक के छेद पर उँगली रख कर
    लाल रुमाल दिखा दिया था यानी कि " नकछेदीलाल" । एक शैतान छात्रा ने अपनी नवविवाहिता टीचर के पति का नाम मज़ाक में बोर्ड पर small red ( छोटेलाल ) लिख दिया था । टीचर के आते ही झटपट मिटा दिया था । ऐसे ही काम चला करता था । अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं पड़ती है । प्रसंग रोचक है ।"
    -
    शकुन्तला

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  14. अब न तो वो दिन रहे , न वो लोग और न वो बातें...पुराने समय को याद दिला गई आपकी यह पोस्ट...इस सन्दर्भ में एक स्त्री की याद आ रही है जिसके पति का नाम राजाराम था और पुत्र का नाम पप्पू था, वो गांधी जी का भजन यूँ गाया करती थी:

    रघुपति राघव "पप्पू के पापा का नाम"
    पतितपावन सीताराम.....

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  15. yaad aa gaya jab shuru shuru me maine naam liya to meri saasu maa boli kaise apne pati ka naam le leti ho tum aaj-kal ki ladkiyan...lekin han sach hai ab dhadalle se lete hain.

    sach kaha aapne aise samay me jhoot bolne se koi gurez nahi jahan baat izzet ki aa jaye....rochak prasang. :)

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