सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

तृप्ति!


*
बड़ी देर में लौट कर आई थी.
 पूछा,' खाना खा लिया?'
'अभी नहीं.'
'क्यों? इतनी देर से बैठे हो ,रामरती से कहते परस देती.'
'मन नहीं हुआ. तुम दे दो.'
'उससे कह गई थी- टाइम से गरम कर के दे देना !'
'उसने पूछा था ,मैंने कहा रुक कर खाऊँगा. अब तुम दे दो!
'हाँ, वह तो दे रही हूँ पर. इत्ती देर हो गई .'
कोई उत्तर नहीं .
 कभी खा भी लिया तो दो रोटी, बस. सब्ज़ी वगैरा भी सब बची पड़ी, जैसे कोई कोई रस्म पूरी की हो.
वैसे तो मेरे सामने तीन रोटी ,चावल और सब्ज़ी भी ठीक से .

पूछने पर भी दुबारा न लें, तो रामरती क्या करे?
कई बार हो चुका है.
उससे पूछती हूँ-  समय पर खिला देतीं.
उत्तर मिलता है साब ने कहा, 'अभी नहीं.'

ये भी कोई बात हुई ?

आज फिर वही!
' खा क्यों नहीं लिया टाइम से?'
 'अब, तुम्हीं दे दो न!'
*

18 टिप्‍पणियां:

  1. भोजन की तृप्ति अपनों के ही हाथ से होती है। इसे कोई भी रंग दिया जा सकता है।

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  2. बहुत ही सुंदर छोटी सी कहानी,प्रियवर के हाथों से खाने का आनंद ही कुछ और है.

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  3. :-)मर्द ऐसे बच्चे है जो कभी बड़े नहीं होते पहले माँ फिर पत्नी .... कितना भी करे तृप्ति कहाँ

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  4. दो भाव आ रहे हैं मन में, फिर कभी सही :)

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    1. फिर कभी...,फिर कभी नहीं हो पाता,शिखा जी. बात तो अभी है, अभी क्यों नहीं?

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  5. अपनेपन का एहसास ज्यादा तृप्त करता है ...

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  6. आपके इस पोस्ट की चर्चा बुधवार के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. शकुन्तला बहादुर12 फ़रवरी 2013 को 8:26 pm

    मेरे विचार से-समय एवं परिस्थितियों में आए परिवर्तन के अनुसार गृहस्थी की गाड़ी के दोनों पहियों को ही अब समान रूप से चलना होगा।दोनों को अपने अपने दायित्व स्थिति को देखकर स्वयं ही उठाना अभीष्ट होगा।ऐसीआत्मनिर्भरता से दोनों में परस्पर अधिक अपनापन परिलक्षित होगा,जो सुदृढ़ प्रेम का आधार बनेगा। आजकल की युवा पीढ़ी में इस बदलाव की झाँकी मिलने भी लगी है।इस छोटी सी कहानी ने बहुत कुछ कह दिया है,जो सत्य भी है और रोचक भी है।

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  8. प्रेम के इन्द्रधनुषी रंगों में एक रंग यह भी है
    सुंदर

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  9. Shikha di ke jaise mere mann mein bhi do-do baatein aayin thin...jisme nakaraatmakta adhik thi.shayad isliye ki maine ye ehsaas kabhi nahin jiya..aur jinke bech ye panapta hua dekha wahan sneh ka pratishat kam tha.mann mein maanyata ulti hi banti gayi.

    khair..Shakuntala jee ne ekdum mere mann kee baat kitne achhe se keh di..poori tarah sehmat hoon unse.
    aaj firse padhi post to laga ..kitna pyaara ehsaas lekar ek chhoti si kahani rach di aapne..maanon ek naazuk si dori ho samvedna keee...aur usme shabd piro diye gaye hon..aur ek pyaara sa gehna ban gaya :)..aisi hi to hai kahani bhi..:)

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    1. सोनल,शिखा जी,शकुन्तला जी और तरु,
      समझ रही हूँ- दोनों ही एक-दूसरे के विश्राम,तुष्टि और सुविधा का ध्यान रखें तभी दाम्पत्य का सौंदर्य, माधुर्य और सार्थकता है:और यह चिन्ता भी कि तृप्ति एक का अधिकार,और दूसरे का कर्तव्य बन कर न रह जाए,क्योंकि प्रशंसा का टॉनिक और सहानुभूति का मक्खन धीरे-धीरे प्रभाव खो बैठते.
      परिस्थितियों के साथ मानसिकता में बदलाव ज़रूरी है.

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  10. पत्नी को प्रेम और अधिकार दर्शाने का सबसे कोमल और आसान तरीका .....
    बहुत सुंदर .....

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