गुरुवार, 3 मार्च 2011

कृष्ण-सखी - 5 &.6 .



5.

'कृष्णे ,तुम्हारा कोई मनोभाव मेरा अजाना नहीं है , ये रीति नीति सब अलग रह जाती हैं .तुम्हारी अनुरक्ति और विरक्ति के अंकन मुझसे छिपे कहां रहते हैं !'
कृष्ण ने जो कहा था सोच कर पांचाली संकुचित हो उठती है -
कर्ण को देख कितना असंयत हो उठती हो तुम ! तुम्हें ही सब से अधिक उत्सुकता थी यह जानने की कि ,पत्नी के साथ संबंध में कवच-आड़े आता है .वृषाली के बताने पर कि वह तो त्वचा के समान उसके शरीर का अंग है ,कहीं कुछ अस्वाभाविक नही बल्कि अति सुचिक्कण दमक से भरा स्पर्श सुखद आश्वस्ति-प्रद है -वह धन्य है ऐसा पति पा कर.
'अपने मन में झांक कर देखो .वह आया,मत्स्य-बेध करने . और तुम विचलित .अर्जुन और कर्ण दोनों में से किसी को नहीं देखा था -पहले ही निर्णय कर लिया था न-बिना जाने ?उसे देख एक दम विचलित हो गईँ . अर्जुन के सम्मुख उसे तुच्छ बना कर अपना ही समाधान कर लिया तुमने !'
उन आँखों में भी जो राग दिखा था तुम्हारे लिए -स्वयंवर की बेला में उसका रंग इतना कच्चा नहीं था .पर यह बात पांचाली से कह नही सके कृष्ण . उसके मन की
वेदना कहीं और दारुण न हो उठे !
सिर झुकाए सुन रही है ,गोद में हाथ पर हाथ रखे मूर्तिवत् .
'क्यों? तुम्हें नहीं लगता कि उन सबकी अपेक्षा तुम्हारे पतियों से कहीं अधिक अनुरूपता है उसमें , इनके साथ वह अधिक शोभता है . मन में आता है पाँच की जगह छः तो नहीं हैं ..'
हाँ यही कहा था कृष्ण ने -
'और जब तुम व्याकुल, सभी गुरु-जनों को टेर रहीं थीं उसे उपेक्षित कर दिया -उसकी गणना भी गुरुजनों में थी .बड़े भैया से बड़ा .अंग देश का स्वामी ,एक बार उसका नाम लेतीं,तृप्त हो जाता वह .तुम्हारे किये सारे अपमान भूल तुम्हारे सम्मान के लिए खड़ा हो जाता .पर फिर चूक गईँ तुम !
जो सबसे सक्षम था तुमने हर बार उसे देख कर अनदेखा कर दिया.
दोष उसका कहीं नहीं था .सारे निर्णय तुम्हारे थे.'

'हाँ ,निर्णय मेरे थे' ,उसाँस भरी पांचाली ने ,'मैं ऐसा क्यों करती रही स्वयं नहीं जानती ,मेरे मन में यह विरोध कैसे भर गए ..'

'दोष तुम्हारा नहीं .तुम्हारी मानसिकता ही ऐसी ढाली गई थी. '

चुप सुन रही है .कहने को कुछ है भी नहीं !

समझ में आ रहा है अब ,जब प्रतिकार करना संभव नहीं रहा .

कभी द्रुपद पिता की चाल, कभी कुन्ती माता की नीति ,कभी पतियों के दाँव. अपने हित साधन के लिए एक मोहरा बना लिया सब ने.

बस, एक ने साथ दिया हर विषम क्षण में ,उसे ही बार-बार टेरता है अशान्त मन !
*
महाभारत बीतने के बाद समझा था कृष्णा ने कि उसके वरण का पहला अधिकार कर्ण को था ,कुन्ती पुत्र के रूप में भी और स्वयंवर के प्रतिभागी के रूप में भी .दोनों बार वही छला गया .निरंतर अपमान के दंश उसे प्रतिशोधी बना गये .

कितना अस्थिर कर जाता है कर्ण का उल्लेख !

मन को समझता है केवल यह सखा .

'....और पांचाली ,तुमने दाँव नहीं लगाया क्या ? स्वयंवर की शर्त थी मत्स्य-बेध -जो भी पूरी करे . क्या अपराध था कर्ण का ? क्यों अपमानित किया गया उसे बार-बार? सूत परिवार में पोषण ही तो पाया था .उसकी तेजस्विता , व्यक्तित्व की गरिमा किसी से कम थी ? सोचो ,ये कौरव ये पाँडव ,कौन होते हैं उसे अपमानित करने वाले . ये धीवर की संतान नहीं हैं क्या ?सत्यवती कौन थीं ,व्यास जिनसे नियोग कराया गया वे कौन थे?

'तुम तो माध्यम बन गईं - अर्जुन को कब देखा-जाना था ,उसकी कामना कैसे जगी तुम्हारे मन में ? लोगों की कही बातें सुन-सुन कर ही न ! पिता की इच्छा थी उस समर्थ धनुर्धर को जामाता बनाने की . प्रतिशोध लेने के लिए अपने पक्ष में करने के लिए .'

द्रौपदी जान चुकी है अपने जन्म की आयोजना .पोषण क्रम में मनोभावों को अपने अनुकूल नियंत्रित करने के पीछे द्रुपद की सावधानियाँ .पुत्री का जीवन ,उसका अपना कहाँ रह गया था,वह तो निमित्त थी ,अर्जुन को वरे ऐसी मानसिकता का निर्माण .

'केशव ,तुम कहे जा रहे हो ये तुम्हारा आरोप है या मात्र विश्लेषण !'

'और तुम? पाँच पतियों की पत्नी बनने के प्रस्ताव पर क्षत्राणी की तरह कह देतीं कि मैं विभाजन की वस्तु नहीं स्वयंवरा हूँ, वीर्य-शुल्का हूँ .जिसने जीता है उसे पति स्वीकार करूँगी .तुम्हारा तेज उन पलों में क्यों मंद पड़ गया ?किसी जन्मान्तर का सोया संस्कार या कोई छिपी कामना तो नहीं जाग उठी कि तुम कमज़ोर पड़ गईं ?'

पांचाली चुप !

करते समय इन्सान बिल्कुल नहीं समझता कि कितनी बड़ी गलती कर रहा है .जीवन की बाज़ी खेली पहले जाती है ,समझ बाद में आती है .

कैसी विडंबना है!

6.
 लकड़ियों का धुआँ आँखों में लगता  है,पनियाई आँखें आँचल से पोंछ लेती है याज्ञसेनी.
भीम आगे बढ़ आये हैं -
 'आज माँस मैं राँधूँगा .जितना खाता हूं इतना स्वादिष्ट बना भी लेता हूँ .'
वह  हँसती है.
' कितना क्या पड़ेगा जानते हो ?कभी राँधा है ?'
'तुम एक बार बता देना .जंगल में भूना है कितनी बार ..'
भीम नहीं सुनते ,उसे हटा कर बैठ जाते हैं ,नकुल आ गये हैं सहायता करने .
'पांचाली,तुम उधर जा कर बैठो ,नहीं तो हमें टोकती रहोगी .'
'नकुल ,तुम्हारे सुन्दर कोमल हाथ यह सब नहीं सँभाल पायेंगे .कहीं फफोला पड़ गया तो वनवासिनों की चिकित्सा कौन करेगा ?'
छेड़ने से चूकती नहीं वह.
नकुल -सहदेव सबसे सुन्दर सुकुमार और सब से छोटे भी.
सहदेव बोल पड़ते हैं,' कल से मैना आ जायेगी ,काम निपटा देगी . '
'कोई नई पाली है क्या ?
पांचाली की विनोदवृत्ति जाग उठी है , ' ये वनवासिनियाँ .मेरी सेवा करने थोड़े ही, तुम्हार कारण -तुम्हें निहारने तुम्हारी सेवा कर कृतार्थ होने आती हैं .काम करती हैं उधऱ दृष्टि इधर .उन्हें उपकृत कर दिया करो न कभी -कभी .'
दोनों युवा अव्यवस्थित हो उठते हैं .
'यह बात नहीं, पांचाली .वे लोग इस परिवार की सेवा करना चाहते हैं क्योंकि हम लोगों ने उन्हें लाभान्वित किया है .'
हँसती है वह ,'अभी तुम नारी मन को ठीक से समझते नहीं न ..'    
नकुल-सहदेव इतने गंभीर नहीं ,प्रारंभ से कोई दायित्व सिर पर पड़ा नहीं .बड़ों की छाया में रहे सदा .उतनी गहनता -गांभीर्य कहाँ विकस पाया !
नकुल को अपनी विद्वत्ता का गुमान है ,कुशल पशु-चिकित्सक हैं. सहदेव भी तलवार-संचालन और घुड़सवारी में निपुण . दोनों को वर प्राप्त है - अश्विनी-कुमारों से भी बढ़ कर  रूप और शक्तिशाली होने का.
बारह वर्ष के वनवास में कहाँ तक अपने आप में सिमटे रहें दोनों युवक .
जो विद्याएँ आती हैं उनका अभ्यास औऱ प्रयोग करेंगे ही  .पास-पड़ोस की बस्तियों में जा कर अपने कौशल का प्रदर्शन कर  सबको प्रभावित करते हैं .सहायता भी करते हैं . दूरृ-दूर तक लोग उन्हें पहचानते-मानते हैं लाभान्वित होनेवाले अपनी सामर्थ्य के अनुसार वन की उपज मधु ,फल-फूल ,लकड़ी के भारे भेंट कर जाते हैं.
सचमुच दोनों स्वरूपवान कुमार वन-प्रदेश में विचरते देव-कुमारों से लगते हैं .रुक-रुक कर देखने लगते हैं लोग .वन-बालायेंऔर उनकी मातायें गृह- कार्य-हेतु तत्त्पर रहती हैं .पांचाली की सेवा कर भोजन आदि पा जाती हैं .
'भइया ने उनके पशुओं की चिकित्सा की थी ,' सहदेव फिर भी तर्क करते हैं ,'और औषधि का मूल्य नहीं माँगा था .'
'उन्हें घुड़सवारी के गुर  सिखाये  नकुल ने और कितनी बार अपने अस्त्र- संधान से वन्यपशुओं से उनकी रक्षा भी तो की .'
द्रौपदी को पर्याप्त सहायता  मिलने लगी है,पर साधनहीन वन-जीवन की असुविधायें तो हैं ही .
पांचाली भोजन परोसती है  .हवा लग कर रोटी कड़ी हो गई है .युधिष्ठिर की असुविधा देख रही है .
मन करुणा से भर आता है .उनकी थाली से निकाल अपने लिये रख लेती है उन्हें गर्म मुलायम दे देती है .
' नहीं पांचाली रहने दो .ठीक है .'
वह चुप अपना काम करती रही .
सारे भाई देख रहे हैं  - पांचाल राज-कन्या ने कभी रोटियाँ सेंकी होंगी धुआँते चूल्हे पर ?कभी ऐसे भूखों की तृप्ति कराई होगी ?
पत्नी को श्रमित देख हाथ खींच बैठ जाते हैं भीम.'बस मेरा हो गया .'
उनकी भूख जैसे वह जानती नहीं .जबरन थाली में डालती है ,कसम दे कर खिलाती है .
'तुम भूखे रहोगे मुझे पाप पड़ेगा . नहीं भीम,  ग्रास नहीं उतरेगा मेरे कंठ से ...नहीं, ऐसे नहीं उठने दूँगी .'
युधिष्ठिर सुनते रहे चुपचाप .
*
कुछ दिनों को बड़े भैया कहीं जाना चाहते हैं . सब को लगता है  ठीक तो है ,उनकी एक और पत्नी है- देविका ,और पुत्र भी - यौधेय .
स्वाभाविक है .जाना ही चाहिये .
नकुल की भी तो एक और पत्नी है -करेणुका ,चेदिराज की पुत्री .नकुल श्वसुरालय नहीं जाते तो क्या .पत्नी को पति के समीप आने से कौन रोक सकता है !
वे भी जाते हैं कभी-कभी .
युधिष्ठिर लौट कर आये - लाल वस्त्र में लिपटी  पोटली-सी  आगे बढ़ाते बोले , 'लो याज्ञसेनी!'
चारों भाई उत्सुकता से देख रहे थे ,क्या भेंट लाये हैं ,हमारे अग्रज !
उत्सुकता से पांचाली ने पोटली खोली - एक पात्र ,किसी धातु की हाँडी जैसा .
'अरे ,यह क्या ?'प्रश्न-वाचक दृष्टि युधिष्ठिर की ओर उठी .
' भोजन की व्यवस्था करने में यह तुम्हारा बहुत सहायक होगा .'
'इतना छोटा पात्र ?इसमें तो पर्याप्त ओदन भी नहीं समायेगा !'
भीम कैसे चुप रहते , 'अरे ,इतने में कौन-कौन खायेगा ,लगता है अब मुझे ही भूखा रखा जायेगा  !'
युधिष्ठिर ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया ,कहते रहे ,
 'ये तुम्हें मेरी तुच्छ भेंट है ,'
और उसके विषय में विस्तार से बता कर बोले  ,'जब तक तुम भोजन कर तृप्त नहीं हो जातीं यह पर्याप्त मात्रा में यथेच्छ खाद्य-सामग्री प्रदान करेगा ,हाँ ,तुम्हारे तुष्ट होने के बाद किसी के लिये आहार पूर्ति संभव नहीं ,स्वामिनी की तुष्टि इसका उद्देश्य है .'
गृहिणी तो सबको तृप्त करके ही संतुष्टि पायेगी - युधिष्ठिर  जानते हैं  - सबको भोजन कराने बाद ही अन्न- ग्रहण करती है वह .
उपकृत हो गई  द्रौपदी .
वन का जीवन बहुत आसान हो गया.    .
भोजन की बेला हर बार युठिष्ठिर के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है मन !
हाँ ,युठिष्ठिर  का यह उपकार वह कभी नहीं भूल सकती .
*
6
कितने दिनों बाद तीनों इकट्ठे हो सके हैं - कृष्ण ,पार्थ और पांचाली .
पार्थ का एक जगह टिकना मुश्किल है .पाँचाली एक डोर है जो बार-बार खींच लाती है और पाँचो भाई ,साथ रह लेते हैं .कृष्ण का आवागमन चलता है .
दोनों मित्र एक से, कब कहाँ होंगे कुछ पता नहीं .
मिलने पर उनकी चर्चायें चलती रहती हैं ,शस्त्रों पर शास्त्रों पर और वर्तमान स्थितियों पर .
द्रौपदी ,डलिया में पुष्प लिये प्रातःकालीन पूजा के लिए माला गूँथने में व्यस्त है .दोनों की बात-चीत सुनती हुई बीच-बीच में बोलती जा रही है.
'तुम्हें इतनी प्रिय थी ब्रज-भूमि ,छोड़ कर चले गए. इतनी दूर सौराष्ट्र में सिंधु तीर जाकर नये सिरे से पुर की रचना की .ये लोग जो तुम्हारे नेह में बावले हैं उनसे इतनी दूर जा कर?'
'वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं इसीलिए .मेरे साथ कौन शान्ति से रह पाता ?अब मैं वहाँ रहूँगा तो इन्हें जरासंध के आतंक से मुक्ति मिलेगी .देखो न ,अठारह बार उसने मथुरा पर आक्रमण किया ,मुझसे बैर मानता है .जो मेरे साथ हैं उन्हें भी चैन नहीं लेने देगा .
अर्जुन ,अपने तरकस -तीरों को सँभालते बोल उठे -
'सखे ,जीवन में ये लोग कभी शान्ति से बैठने नहीं देंगे .'
द्रौपदी का कहना,'क्यों उन सबका बैर-भाव हमारे लिए है तुमसे तो नहीं .'
'क्यों? कंस मामा की दोनों पत्नियाँ .अस्ति और प्राप्ति ,उसी जरासंध की पुत्रियाँ हैं .विधवा कर दिया मैंने. कैसे चैन पड़ेगा उसे ?'
'उसने भी तो कंस जैसे अत्याचारी से पुत्रियां ब्याहीं .जो अपने जनक का भी न हो सका .इतने श्रेष्ठ कुल में जन्म लेकर कैसा निकृष्ट आचरण !'
'जिसके पास सामर्थ्य होती है उसके दोष नही देखे जाते ,' पार्थ का मत था .
'फिर वही बात ,आचरण किसी कुल की बपौती नहीं .और एक बात जो लोग नहीं जानते कंस का कुल, नाना का कुल नहीं .'
पार्थ ने विस्मय से देखा ,'क्या कह रहे हो.पुत्र था उनका ?'
'तात उग्रसेन कंस के पिता नहीं थे ?'
पांचाली विस्मित , 'तो ..फिर कौन ?कहां से आ गया उनके घर में ?'
गहन सोच में हैं गोविंद .क्या कहें क्या छोड़ दें तय नहीं कर पा रहे .
'अंदर की बातें हैं पांचाली .लोगों को पता भी नहीं .'
'रहने दो ,मन गवाही न दे तो मत बताओ ,' पार्थ ने साधने का यत्न किया .
'मीत हो तुम मेरे,तुमसे क्या दुराव .बस तुम्हारे आगे अपना मन खोल देता हूँ ,बाँट लेता हूँ सब कुछ ...वह महाराज उग्रसेन का क्षेत्रज पुत्र था .'
'अरे ,यह तो एक नई बात सुन रही हूँ . ऐसी विचित्र घटनाएँ घटती हैं,कुछ सिर-पैर समझ में नहीं आता .स्पष्ट कहो ?'
'हर घर के अपने रहस्य होते हैं ,मत कुरेदो पांचाली !'
'नहीं मित्र ,पांचाली को पूछने दो ,सब जानने का अधिकार है उसे ,और तुम्हें भी. तुम्हारे आगे कोई भेद रखना नहीं चाहता .'
फिर बताया गोविन्द नें ,
'मेरी नानी ,नाना उग्रसेन की पत्नी ,सरोवर में क्रीड़ा कर रहीं थी ,निर्वस्त्र .उनके स्नात-स्निग्ध सौंदर्य पर आकाश मार्ग से जाते द्रुमिल गंधर्व की द़ष्टि फिसल गई .ये गंधर्व बड़े कामुक होते हैं द्रौपदी .'
' गंधर्व ही क्यों , पुरुषों का मन ही... .जाने दो वे बातें नहीं लाऊँगी .और भी तो... जयद्रथ ,कीचक . वैसे तुम भी कौन दूध के धुले हो माधव? गोपियों के स्नान के समय उनके वस्त्र ... .'
बंकिम मुस्कान पांचाली के मुख पर .कृष्ण को हँसी आ गई .
पार्थ ने टोका -'किसी पर आरोप लगाना जितना आसान होता है,याज्ञसेनी, उसे समझना उतना ही मुश्किल .'
'अरे, सब जानते हैं जो बात ,उसमें आरोप क्या ?'
' और सबसे कोई अंतर नहीं पड़ता मुझे ,हाँ पर तुम्हें अपना सच बताऊँगा .'
'अपने को छोड़ो , वह बात आगे .हाँ तो ..'
'पहुँच गया प्रणय-याचना करने. इतना शोभन पुरुष, रानी हत्बुद्ध !सँभल गई लौटा दिया उसे .पर वह कहाँ माननेवाला .द्रुमिल नाना का वेश धर कर पहुँच गया शयनागार में ,उनकी अनुपस्थिति में ,वाद्य-यंत्रों का मधुर संगीत .मादक-गंध - मालाएँ,उत्तेजक दृष्य और शृंगार के सारे उपकरण ,
रानी आत्मविस्मृता-सी ,असली रूप पहचान नहीं पाई. लगा पति प्रणयी बन आया है .पर भेद कहीं छिपा रह पाता है .खुल गया .
होना था वह हो चुका था ! कंस का जन्म उसी का परिणाम.'
विस्मित द्रौपदी देख रही है कृष्ण की ओर.
'कुल के अनुरूप कैसे होता? ऊपर से जरासंध जैसे उकसानेवाले श्वसुर और वैसी ही मनोवृत्तिवाले मित्र .'
एकदम चुप्पी छा गई .पहले कृष्ण ही बोले ,
'हाँ, तुम गोपियों के स्नान की बात कर रही थीं .
'अच्छा 'अर्जुन ने छेड़ा ,गोपियों को स्नान करते देखने का तुम्हें चाव नहीं था?'
'तुम और भड़काओ पाँचाली को .अपने जैसा समझा है क्या ?'
'तुम दोनों आपस में फिर निपट लेना, माधव, तुम अपनी चर्चा पर आओ .'
कृष्ण विचार-मग्न जैसे अपने को समेट कर तैयार हो रहे हों .
अर्जुन अपने हथियारों की सँभाल में ,पर कान इधऱ ही लगाये .
'कंस मामा के जन्म की कथा कानों में पड़ी थी मेरे . मन बड़ा उद्विग्न रहता था पांचाली ,कि इस प्रकार मनमानी क्यों की जाती है ?करे कोई परिणाम , भोगना पड़ता है कितने निर्दोषों को .नारी को इतना विवश क्यों बनाया विधाता ने ?'
पांचाली ,सुन कर भी चुप कुछ सोचती-सी .
उसी ने मौन भंग किया ,'सृष्टि में अधिकतर स्त्री तत्व कमज़ोर लगने लगता है. वह अपने संसार में व्यस्त ,अपनों से जुड़ उन्हीं के नेह-छोह में डूब जाती है .सृजन और पोषण के हेतु कोमलता और शान्ति आवश्यक हैं न.तब पुरुष तत्व की भूमिका संरक्षकवाली .पर जब अपना ही सुख उद्देश्य बन जाए .यह सिर्फ़ मनुष्यों में होता है .पशु-पक्षी सब अपना धर्म पालते हैं . लेकिन तुम बताओ अपनी बात .'
' हाँ ,मैं ,देख चुका था कैसा अनर्थ होता है ,कितनों का जीवन दूभर हो जाता है.चाहता था इन सरल बालाओं के जीवन में कभी ऐसी स्थिति न आए .गोपियाँ स्नान करने ,वस्त्र किनारे रख उतर जाती थीं -एकदम दिगंबरा कुमारी -ब्याही सब ....जल में क्रीड़ायें करतीं और पांचाली ,आकाश मार्ग में गंधर्वों का आवागमन चलता है . जल में वरुण देव का वास ,उनकी भी अवमानना , मैं उन्हें इस सब से विरत करना चाहता था ....'
सुने जा रहें है पार्थ और पांचाली .
'...उन्हें रोकने का कोई और उपाय नहीं था .और कृष्णें,मैंने उनकी लज्जा पर आँच नहीं आने दी ,वृक्ष की उस डाल पर मुँह फेर कर बैठा रहा .मित्र, ज़रा विचार करो ,वे युवतियाँ, मैं किशोर ! लज्जा नहीं आती मुझे ?नहीं, मन में ऐसा कुछ नहीं था .बस एक धुन थी ,उनका व्यवहार बदल जाय किसी भी तरह .'
'नहीं, केशव.' अर्जुन ने कहा .'तुम मर्यादा हीन नहीं ,निर्लज्ज नहीं .तुम ने नारी को सदा मान दिया है.'
पाँचाली ,गंभीर हो उठी, 'ठीक ही किया तुमने ,नदी-जलाशयों में इस प्रकार नग्न हो कर स्नान करना शोभनीय नहीं . उन का यह आचरण किसी प्रकार संगत नहीं था .'
पार्थ सजग हुए , 'तुम तो बहुत चौकन्नी हो गईं ,याज्ञसेनी. उनका सोचो ,घर से निकलती थीं दही बेचने ,रास्ते में जलाशय पड़ा ,उतर कर नहा लिया . कहाँ कपड़े रखे होंगे बदलने के लिए !'
यास तीनों के मुखमंडल हँसी से भर उठे .
कृष्ण अपनी रौ में कहे जा रहे थे '..और सीधे से नहीं मानती वे ग्रामीणायें , अपनी सुविधा के लिए मेरी बात चुटकी में उड़ा देतीं .करना पड़ा मुझे .फिर जब उनने आ-आ कर वचन दे दिया मैंने वस्त्र नीचे फेंक दिये .'
'पर लोग तो ..'
'लोगों की भली कही ,तब कहाँ युवक था मैं.नौ वर्ष की आयु में तो मथुरा जाना पड़ा था .लोगों का कहना? उन्हीं की मनोभावना बोलती है .उन्हें रस मिलता है इस प्रकार की कल्पनाओं में ,अपनी विकृतियों से औरों को रँग कर .'
इसी बीच पांचाली जा कर प्रातराश ले आई थी - दुग्ध,मधु और फल .चौकी पर रख कर बोली ,'चलो मधुसूदन ,और पार्थ,जलपान प्रस्तुत है .'
'तुम भी आओ न ,' अर्जुन का आग्रह था .
'हाँ, मैं भी हूँ .वो लोग पहले ही कर चुके ,' इशारा अन्य भाइयों की ओर था .
'तुम लोग लो .' तीन जगह रख पांचाली ने दोनों को पकड़ाया
',अरे जल पात्र..' ,अपना भाग चौकी पर रख कर वह लेने चली गई .
लौटने में कुछ समय लग गया .
वाह , तुम लोग वैसे ही रखे बैठे हो ?'
उठा कर फिर पकड़ा रही है ,
'कौन सा किसका ?.'
'सब तो एक साथ रखे हैं, क्या पता?'
'मैंने अभी खाना शुरू नहीं किया था.मेरा जूठा होने का तो प्रश्न ही नहीं '
'हो भी तो क्या ..' कृष्ण बोल उठे ',तुम्हारा जूठा पार्थ के लिये तो प्रसाद होगा.' ज़रा-सा रुक कर और जोड़ दिया ,' और मैंने तो कभी ..'
अर्जुन भी मुस्करा रहे हैं ,
'तुम्हारे जूठे से कब मुझे आपत्ति हुई कृष्णे ,' मुख पर वही टेढ़ी हँसी .' मैं तो चुपचाप खा लेता हूँ !'
चाहे जब खींचने लगता है. इसकी इन आदतों पर चिढ़ छूटती है.
खीझ उठी द्रौपदी .अपने टेढ़ेपन से कभी बाज़ नहीं आता .कहने को कुछ- न- कुछ निकाल ही लेता है. मेरा जूठा खाया था !कैसी लज्जा लगती है सोच कर .
कुछ बोल नहीं पा रही ,कहे भी तो क्या कहे .
इसी ने तो उबार लिया था उस दिन  .
*

(क्रमशः)



11 टिप्‍पणियां:

  1. शकुन्तला बहादुर3 मार्च 2011 को 3:59 pm

    पाँचाली के मन की गहराइयों में उतर कर ,उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म मनोभावों,अन्तर्द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति मन को छू गयी।पाँचाली के अन्तरंग क्षणों का ,शब्दों की तूलिका से जो मनोरम चित्र खींचा है,वह सहज ही नेत्रों के समक्ष आ जाता है। अद्भुत!! प्रतिभा जी,
    आपके वैदुष्य और लेखनी को नमन!!

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  2. गज़ब का लेखन...वाह!! आनन्द आ गया पढ़कर.

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  3. आपके लेखन को पढने का अलग ही सुख है।
    रोचकता आद्योपांत बनी रहती है।

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  4. अद्भुत!!
    पांचाली के अंतर्द्वंद, उसके विचार, विश्लेषण आपकी कलम से उतर जीवंत हो उठते हैं।
    चकित हूँ, मुदित भी।
    आभार।

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  5. प्रतिभा जी...
    अद्वितीय hai आपका लेखन....शैली...उपमाएं...सबकुछ!
    us par to jitna kahoon kam ही होगा।

    जो अतिरिक्त anubhav था,वो ये कि सदा की तरह हैरत में डालने वाला पांचाली का दृष्टिकोण इस दफे चकित करने के साथ साथ बहुत से प्रश्न भी छोड़ कर गया। सलाह मिली कि उनके उत्तर मैं ही खोजूं मगर मैं आपसे ही पूछूंगी..पर कभी और...(अभी तो प्रश्नों को जिनमे गूंथ सकूं वे शब्द ही नहीं मिल रहे...कल से प्रयत्न कर रहीं हूँ)और एक और विकल्प ये भी मन में आता है...कि शायद 'पांचाली' श्रृंखला के अंत में मुझे उत्तर मिल जाएँ...किसी भी रोचक किताब/आलेख का मैं सबसे पहले अंत पढ़ती हूँ...अधीरता मेरा स्वभाव है......मगर यहाँ धैर्य धारण करना होगा...सो प्रयत्न और प्रतीक्षा करुँगी ''पांचाली'' की अंतिम पोस्ट की।

    ''कर्ण की आत्मकथा'' और ''कृष्णा'' ये दो किताबें ''पांचाली'' के साथ साथ पढ़ रही हूँ...कह सकती हूँ...एक नए दृष्टिकोण से कृष्ण/द्रौपदी/कर्ण को जानना ..अनुभव करना आपके लेखन का अब तक का सबसे बड़ा उपहार है..ह्रदय से आभारी रहूंगी सदैव।

    बहुत शुभकामनाएं और नमन !

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  6. तरु,शिवाजी सावंत की 'मृत्युंजय' भी हो सके तो पढ़ लेना .
    घेरे रहेगी मन को ,जाने कितने दिनों तक .

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  7. जी शुक्रिया प्रतिभा जी.....ज़रूर पढूंगी......कल ही एक शॉप पर जाना होगा...अच्छा हुआ संयोग ऐसा हुआ कि आज ही पुस्तक का नाम आपने बता दिया।

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  8. आपकी यह श्रृंखला अजीब सा सुकून दे रही है ...क्या यह पुस्तक के रूप में है ? यदि है तो बताइए कैसे मिल सकती है ...

    मैंने भी शिवाजी सावंत की पुस्तक नोट कर ली है ..जब भी मौका मिलेगा पढूंगी .

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  9. संगीता जी ,
    अभी तो लिखती जा रही हूँ और पोस्ट करती जा रही हूँ -दूसरा उपन्यास भी .
    आपको अच्छा लग रहा है -प्रोत्साहन मिला .आभार .

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  10. बस यहीं से पढ़ा पर अच्छा लगा

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