शनिवार, 26 मार्च 2011

कृष्ण-सखी - 7. & 8..



7,
ओह, उस दिन की बात -
बाहर से दुर्वासा की पुकार आई थी ,
युधिष्ठिर बाहर आए ,शीष नवाया ,अभ्यर्थना की .
'आज्ञा दीजिये ऋषिवर ,'
'आज्ञा ?हाँ .हम सब अभी स्नान करने जा रहे हैं '.
'तत्पश्चात् सेवा ग्रहण कीजिये ,पूज्यवर .'
'हाँ ,अवश्य. तब हम सब भोजन ग्रहण करेंगे .'
वे अपनी शिष्य मंडली को ले कर स्नान -ध्यान करने चल दिये .
अब क्या होगा ?क्या करेगी पाँचाली ?
चिन्ता का वार-पार नहीं .क्या करे पाँचाली ? आज अतिथि को भोजन कराने के लिए कोई साधन नहीं उसके पास .
ये दिन भी देखने थे !
बुरे दिन आते हैं तो उबरने का कोई साधन नहीं मिलता .कैसे बच पाएँगे अनिष्ट से- उनके शाप से !
सब चिन्ता मग्न !
भोजन की बेला कब की बीत चुकी थी ,सब निवृत्त हो चुके थे पांचाली ने रसोई उठा दी थी .किसी को क्या पता था असमय ऐसे अतिथि का आगम हो जाएगा !
अचानक कानों में स्वर पड़े -
'आज तो वन में भटक गया था, बड़े भैया ?
अरे, यह तो गोविन्द की आवाज़ है ,
देखा तो कृष्ण चले आ रहे हैं अस्त-व्यस्त से .
'भूखा-प्यासा चला आया हूँ , 'कुछ दो न खाने को, कृष्णे.'
'हमें लाचार देख कर तुम भी हँसी उड़ा लो ! '
....''तुम्हारा भंडार खाली हो ,असंभव .'
'यही तो झिंकना है .सब ऊपर-ऊपर से अपने अनुमान लगा लेते हैं .सच्चाई क्या है ,कोई नहीं जानता.'
' दैन्य तुम्हें शोभा नहीं देता ,याज्ञसेनी.'
'हाँ .अभी दुर्वासा आकर शाप देंगे तब सारा मान धरा रह जाएगा .'
'पर हो क्या गया ?'
बताया गया कृष्ण को .
'तभी सब ऐसे विषण्ण हो बैठे हैं ?.
'...सारी सोची-समझी चाल होगी दुर्योधन की .अपनी विशाल शिष्य-मंडली के साथ दुर्वासा को प्रेरित किया ,यहाँ आ कर आतिथ्य पाने के लिए .
...'जानता होगा ,पाँचाली सबको भोजन करवा कर स्वयं भी निवृत्त हो चुकी होगी .'
कृष्ण की समझ में आ रहा था,वे कहे जा रहे थे -
'....वाह !तब पहुँचेंगे दुर्वासा अपनी मंडली के साथ .कहाँ से कराएगी भोजन ! सूर्यदेव का वह पात्र धुल चुका होगा ,पाँचाली तृप्त है अब भोजन क्यों देगा वह? बस अब तो शाप ही उनका प्राप्य है .ठठा कर हँसा होगा वह .'
कोई बोले तो कहे भी क्या ?
' पर , मैं तो तुमसे अन्न पाने की आशा में भूखा भटक रहा हूँ '
'वासुदेव , हम संकट में पड़े हैं , हँसी न उड़ाओ.'
'तुम्हारे पास तो अक्षय-पात्र है पाँचाली ! चिन्ता काहे की ?'
'केशव ,यह बेला होने आई, भोजन पा चुकी हूँ .पात्र स्वच्छ कर रख दिया है अब कहाँ भोजन ?'
'अच्छा ! ऐसा ?देखूँ लाओ तो पात्र ,मैं भूखा औऱ पात्र रिक्त! मैं भी तनिक देखूँ तो. '
चुपचाप पात्र लाकर दे दिया द्रौपदी ने .
उठा कर घुमाया-फिराया ,झाँका उसके अंदर.मुस्कान से आलोकित हो उठा आनन .
'कैसे पात्र स्वच्छ करती हो पाँचाली?  ये देखो .'
पात्र टेढ़ा कर दिखाया कृष्ण ने - शाक का एक पत्ता चिपका हुआ गले के मोड़ पर ,'यह क्या.. है तो..'
विस्मय से देख रही द्रौपदी जब तक पात्र ले .कृष्ण ने वह शाक-पत्र छुटाया औऱ मुख में डाल लिया 'इसी से परित़प्ति हो बुभुक्षित की ! '
सब चकित . पाँचाली जैसे आसमान से गिरी .'यह क्या किया तुमने .वह जूठा शाक क्यों खाया ?'
' सखी ,भूख ऐसी ही होती है ,सुच्चा-जूठा कुछ नहीं देखती .तृप्त हो गया मैं तो ! मैं तृप्त हो गया, समझो संसार तृप्त हो गया .अगर कोई भूखा रह भी गया होगा तो भोजन देगा यह .लो ,यह पात्र ..अभी धुला कहां है ?
और परम तृप्ति की डकार लेते उठ खड़े हुये .
'बस जल और पिला दो पांचाली !'
'मुझे देख कर अन्यथा न समझ लें कहीं .वे आते होंगे ...चलता हूँ .'
जल पी कर चल दिये कृष्ण .
उस दिन दुर्वासा फिर लौटते कैसे ! .वहीं स्नान-ध्यान करने के बाद उन सबको लगा पेट भरा हैं. पूर्ण तृप्ति हो गई .डकारें आने लगीं .
'नहीं ,अब नहीं जाना है पांडवों का आतिथ्य लेने .द्रौपदी का बनाया अन्न ग्रहण नहीं किया तो अनर्थ होगा .'
'चलो, लौट चलो .'
और वे अपनी शिष्य मंडली को ले ,वहीं से लौट गए थे .
उस विपत्ति के क्षण में जूठा शाक खा कर पानी पी लिया था उसने और
उसे देख कर हँस गया था - यही टेढ़ी हँसी !
बेबस खीज उठती है द्रौपदी . कोई उत्तर नहीं बन पड़ता .
सारा दृष्य साकार हो गया, पाँचाली के मानस में .
उधर वह कहे जा रहा था ,
'तुम्हारा क्या ठिकाना ! कल को कहो पदत्राण उठा लो मेरा .मुझे उठाना पड़ेगा .'
'बस चुप करो,तुमसे पदत्राण उठवाऊंगी मैं ! सोचना -समझना कुछ नहीं. बोलने की भी हद होती है .'
'मैंनें कहा ही तो है.नाराज़ क्यों हो रही हो ?और क्या पता कभी...'
फिर ...वही टेढ़ी मुस्कान .
दूसरे को छेड़ कर कैसे मुस्कराता है .
द्रौपदी बुरी तरह खिसिया गई .इससे पार पाना मुश्किल !
तन का काला ,जनम का टेढ़ा कभी सीधी बात करते नहीं देखा !
झुँझलाहट में भूल गई वह कि स्वयं भी श्यामवर्णी है .
8
रात्रि आधी से अधिक बीत चुकी है .बाहर मद्धिम-सी चाँदनी फैली है - सप्तमी या अष्टमी की तिथि . निशा के जादू भरे उजाले - अँधेरे के जाल सारे संसार को छाये हैं .लगता है एकरसता भंग करने को लिए छाया-प्रकाश ने अपना खेल शुरू कर दिया है.रह- रह कर झिल्लियों की झनकार तरु-पातों में पवन-संचार का मंद्र रव- जैसे  सुप्त हुई विभावरी की मंथर श्वास-ध्वनि गूँज रही हो. .
युठिष्ठिर शान्ति से सो रहे हैं .चाहे कुछ होता रहे दुनिया में, वे शान्त रहते हैं .
पाँचाली सोचती है - इन्होंने घर- गृहस्थी पता नहीं क्यों की , साधु-संत हो जाते !
कभी-कभी मन करता है खिलखिला कर हँसे . एक निश्चित अवधि के बाद क्रम बदलता है .एक नया आयोजन -एक के स्थान पर दूसरे का आगमन.मनस्थिति बदलती है ,रंग बदलते हैं . कुछ परिचित कुछ नवीन अनुभूतियाँ ,अनुभवों की शृंखला में नई कड़ियों का समायोजन .हर एक की बातों का नया आयाम, जैसे एक ही पुस्तक के अध्याय एक के बाद शुरू हो रहे हों .पढ़ कर समझना पड़ता है पांचाली को -ताल मेल बैठाने के लिए ,और कथा आगे बढ़ चलती है .
दिन में सभी एक साथ होते हैं .बात तो रात्रि की है .पहले बड़ा अजीब लगता था .अब आदत पड़ गई है.विस्मय होता है ,इन भाइयों में कैसा आत्म-नियंत्रण कैसा संयम है! उँह,होगा मुझे क्या मेरे लिए कोई देवर-जेठ थोड़े ही हैं - सब पति हैं .
उसे नींद का सुख नहीं है .गहरे अँधकार में आँखें खोले जागती रहती है .
स्मृतियाँ पीछा करती हैं .विगत-कथा के बिखरे अंश बार-बार सामने ले आती हैं.
पांचाली का मन अस्थिर हो उठता है . कोई समाधान नहीं मिलता तब सखा की याद आती है. अंतर की किसी गहराई में कृष्ण के शब्द जागते हैं -
'तुम्हें समझ रहा हूँ .पांचाली. कितनी बार मैं आत्म के घेरे से निकल कर तुम्हारे स्तर पर जिया हूँ .तुम्हारी यंत्रणा का भागीदार रहा हूँ .तुम्हारा मित्र हूँ न -अपने मन में तुम्हारे मन को अनुभव करता हूँ.'
पांचाली का थकित मन विश्राम पाता है .
जीवन भी कैसी वस्तु है -हमारे निर्णयों पर जाने कितने तंत्र हावी रहते है? वह अपनी ही गति से बहेगा - कहीं कोई छुटकारा है क्या !
कंठ सूख रहा है .जल पीने ,शैया से उठी द्रौपदी.
आंचल-पट देह से हट कर पति के कंधे नीचे दब गया था .धीरे से खींचना चाहा .
युठिष्ठिर की नींद खुल गई ,उठते देखा पत्नी को -
'सोईं नहीं, कृष्णे ?'
'बस यों ही ,जल पीने .'
लौट कर शैया पर आ बैठी.
पति ने हाथ फैलाया ,भुजा पर शीष धर कर सिमट आने का आमंत्रण.
अनदेखा कर दिया द्रौपदी ने .
अनिच्छा देख युधिष्ठिर ने बाँह समेट ली .
जानती है उनका स्वभाव , पति होने की पूरी मर्यादा निभाते हैं ,बहुत सभ्य-संयत हैं प्रेम-प्रदर्शन में भी. हर काम समय से ,उचित ढंग से करने में विश्वास.दुनिया में कुछ होता रहे विचलित नहीं होते .द्रौपदी की इच्छा का मान रखते हैं . उनकी बारी जब तक रहती है पाँचाली को खूब सोच-विचार करने का अवकाश रहता है .
और कहीं भीम होता तो !
कैसे भींच लेता है - उफ़ !
सांस लेना मुश्किल ,द्रौपदी ,पहले कहती है, फिर घूँसे लगाना शूरू करती है ,भीम को चोट लगती है कहीं ! हँसता रहता है ,'देखो तुम्हारे हाथ पर चोट लग जाएगी .'
पर पत्नी को अनमनी देख कर कितना लाड़ करता है .'थकी हो प्रिये ,आओ तुम्हें सुला दूँ .'
केश सहला कर ,थपकी दे कर सब विध विश्रान्त करने का प्रयत्न करता है .
'तुम भी थके हो सारे दिन के. आराम करो .कभी घर नहीं टिकते .'
'तुम्हारी शीतल मलय-गंध मेरी सारी तपन हर लेती हैं ,तुम चैन से सोओ .देख कर मुझे सुख मिलता है .'
वह जानती है उसकी हर इच्छा पूरी करने को प्रयत्नशील रहता है भीम.भोजन-प्रिय ,निश्छल मन .
हल्के हाथ की स्नेहमय थपकियाँ .पाँव भी दाबने लगता है .वह हाथ पकड़ लेती है टोकती है 'क्यों मुझे पाप में ..'
चुप कर देता है ,'मेरे तुम्हारे बीच पाप कुछ नहीं,कुछ सुख दे सकूँ तुम्हें . सो जाओ तुम '
और यों ही जाने कब सो जाती है पाँचाली .
हर एक के साथ रहने का अलग ढंग,सबके अपने स्वभाव ,और वह सबमें अनुस्यूत.
अर्जुन का प्रणय-भाव एकदम भिन्न , इन्द्र के अंश .रूप-स्वरूप और गुण-गरिमा-संपन्न ,अनेक कलाओं-विद्याओं में निष्णात ,सौम्य व्यवहार और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी -जिस पर अप्सरियाँ भी रीझ जाएँ .उसी के लिए कामना जागती है पाँचाली के मन में , पर साथ कितना कम मिल पाता है .भटकता फिरता है कभी शस्त्रों की खोज में ,कभी शाप पाकर .धरती-आकाश एक करता हुआ .कितनी यात्राएँ की हैं इस अवधि में .कुछ दिन बीतते ही अकेला-सा लगने लगता है उसके बिना .पर वह जैसे टिक कर रहना नहीं चाहता .
बाहर निकाल लाता है ,पांचाली को भी ,
'चलो,यहां से बाहर निकल चलें कहीं और.'
ले जाता है प्रिया को दूर की वन- भूमियों में ,सघन घाटियों में ,या किसी फेनिला के तट पर .
कुछ नये अनुभव पाए हैं उसके साथ. वनवासियों के उत्सव में भी पहुचे हैं दोनों ...तब अर्जुन की नृत्य-संगीत विद्या बहुत काम आई .रंग जमा लिया .निश्शंक रहती है पाँचाली ,पार्थ जैसा धनुर्धर साथ तो भय काहे का !
भीम भी पक्का घुमक्कड़ है ,पाँचली को ले जाता है कभी-कभी .
उस दिन ,ताल की शोभा दिखाने साथ ले कर चल दिया ,
काफ़ी दूर चल कर द्रौपदी ने पूछा,' और कितनी दूर ले जाओगे ?'
'डरो मत, मैं हूँ न ! थक जाओगी तो यों उठा ले चलूँगा,' और झट उठा कर लेता है ,बाहों में भऱ कंधे से लगा लेता है .
वनवासियों का आतिथ्य ,उनकी भाषा जानता है.आग जला कर चारों ओर आनन्द मनाते हैं लोग , उनके रंगारंग कार्यक्रम चलते हैं -भीम कहता है 'तुम्हारे मनोरंजन के लिए रंग-मंच नहीं तो क्या हुआ ,ये जीवन - मंच तुम्हारे चरणों से धन्य हो रहा है !'
एक बार तो क्या किया भीम ने ? ले गया पाँचाली को सरोवर का सौंदर्य दिखाने ,असंख्य कमल खिले हुए, भ्रमरों की गुँजार !
मुग्ध सी देखती रही ,'कितने सुन्दर ये सरसिज !'
'तुम्हें अच्छे लगे, ला दूँ ?'
'नहीं, रहने दो .कहाँ इस शैवालों से भरे जल में उतरोगे .'
पर वह कैसे रुक जाता .पाँचाली को जो प्रिय है !
उतर गया भीम.
चुन-चुन कर विविध वर्णों के सरसिज ले गुच्छ बनाये.प्रसन्न मुख आया . साथ चल रही थी पाँवों से निकलती रक्त की धार .
'अरे, रक्त बह रहा है ! ज़रा देखो तो .. मैंने मना किया था पहले ही ..' पाँचाली व्यस्त हो उठी, तुरंत उत्तरीय से चींट फाड़ पट्टी बाँधी .
'चिन्ता मत करों. यह तो कुछ नहीं है .'
'अब मैं कभी तुम्हारे साथ नहीं आऊँगी .'
हँस पड़ा ,' उठा कर ले आऊँगा .'
मन भर आय़ा था द्रौपदी का .
वे कमल-पुष्प जल के पात्र में डाल कर कक्ष में रख लिए उसने ,संध्या को पात की द्रोणी में वर्तिका रख उसमें .एक दीप तैरा दिया .
कक्ष में प्रवेश करते युधिष्ठिर अभिभूत से देखते रह गए , मुख से निकला 'वाह पांचाली!'
अधिक कभी वे बोलते ही कहाँ हैं !
नकुल विद्वान है -उससे चर्चा करने में आनन्द आता है .खूब बहस चलती है दोनों में.बड़े उत्साह से हर बात स्पष्ट करता है - कभी-कभी सबके सामने भी वाग्विनोद कर लेते हैं दोनों.
और सहदेव ! कुछ संकुचित सा किशोरों की तरह झिझकता देख द्रौपदी का प्यार उमड़ पड़ता है .मित्रता कर ली उससे ,सँभाल लिया. स्वेच्छा से छोटी बन गई ,उसे बड़ा बना दिया .
सहदेव में भी युवावस्था का चाव .सहज स्वभाव . चतुर हैं ,मनभावन हैं -प्रसन्न रखने का कौशल भी है .
आँखें मूँदे अपने ही विचारों में भटकती रही वह.
पति सो रहे हैं -निश्चिंत. चुपचाप लेटी है द्रौपदी. विचार चल रहे हैं .
कोई, किसी के समान नहीं .सबके पिता भिन्न हैं न ! कुन्ती माँ ने नियोग के लिए स्वयं चुनाव किया ,पूर्वजा अंबिका अंबालिका को विवश कर दिया गया -जिससे वितृष्णा हो वही पुरुष -सहन करो , मन से या बेमन .तभी ऐसी संताने - पाँडु ,धृतराष्ट्र .किधर से संपूर्ण हैं .सब आधे अधूरे !
- अपनी भोगलिप्सा में कितना मत्त हो गया पुरुष कि उचित-अनुचित का भान भी खो बैठा. . शान्तनु की बात मन में उठी , गंगा के प्रति आसक्ति ,चलो ठीक है ! फिर भी वार्धक्य की लालसा मिटी नहीं . युवा पुत्र को वंचित कर डाला .
'....'नहीं मुझे नहीं विचारना है यह सब.
ध्यान बटाने लगी अपना.
एकदम कर्ण का ध्यान आ गया .पता नहीं इन लोगों के साथ ध्यान में वह क्यों चला आता है !
उसके प्रति कृष्ण के हृदय में असीम करुणा और सहानुभूति है- शायद स्नेह भी . कौन जाने !
क्या कहा था मीत ने , क्यों कृष्णे ,वही सूत-संतान है ?और ये सब कुलवान हैं ?
सचमुच, न पांडव पांडु-पुत्र हैं न कौरव कुरुवंश की संतान .कर्ण की ही बात पर कहा था कृष्ण ने ,' मेरे आगे कुलीनता की चर्चा मत करों .'
और भी कहा था -
उस एक के आगे यह भीड़ कहाँ ठहरती है- मेरा मतलब तुम्हारे पतियों से नहीं ,और सब से है जो अपने को संभ्रान्त समझते हैं .. और तुम भी, पालनकर्ता को उसमें आरोपित करोगी ? व्यक्ति अपने आप में कुछ नहीं क्या ,उसकी तेजस्विता, चाल-ढाल-शील ,देह और मन-प्राण के परिमाप क्या विचारणीय नहीं ?
मैं तो कुलीन होने की बात कर ही नहीं सकता ,उसी वर्ग में आता हूँ न? जब प्राण बचाने को जन्मते ही गोकुल भेज दिया गया ,मेरे साथ कुछ अनिष्ट घटता , या मुझे कोई और पालता ,तब मैं क्या होता? सब संयोग की बात .अरे पांचाली ,प्राण बचाने हों तो कोई ठौर कहाँ देखता है! जहां सुरक्षा मिल जाए वही अपनी शरण .सोचता हूँ कहीं और पाला गया होता तो कैसा होता ! मान्यता पालने वाले को दृष्टि में रख कर मिलती या मेरे अपने गुण-अवगुणों के आधार पर? व्यक्तित्व -और आचार व्यवहार पर ? जिनके अंश ले कर देह और प्राण साकार हुए उसे किनारे कर दिया तो फिर तो मैं भी...'
'अपनी बात क्यों लाते हो .उसका तो पता भी नहीं किसकी संतान है .'
'तभी तो !...जब किसी के बारे में जानकारी नहीं तो उसे अपमानित करने का क्या अधिकार?'
कोई उत्तर नहीं बन पड़ा पांचाली से .
उत्तर की अपेक्षा भी नहीं की थी कृष्ण ने ,अपनी बात कहते रहे -
' कोई कुलकन्या ही माँ बन कर लोक- लाज से त्याग सकती है ,कि वह मरे कि जिए कोई मतलब नहीं ,धींवर कन्या ने तो ऐसी संतान को स्वीकार कर पिता का नाम दे दिया . .हैं तो व्यासदेव ,सत्यवती के कानीन पुत्र .
जिनके अंश से उसका जीवन निर्मित हुआ वह कहीं नहीं क्या ?'
ग्लानि है द्रौपदी के मन में .अपनी मुखरता में कई बार बोल गई है ऐसे बोल जो काँटे बो गए . अब भी मन दुखता है सोच कर .
बाहर अँधेरा बढ़ गया है .उस ओर के नभ में चाँद ढल रहा है .और कितना जगूँ .नींद क्यों नहीं आती !मन कहीं शान्त हो कर बैठता है !
लोक-लाज ?पुरुष को लोक-लाज नहीं होती ! ऋषि होकर धीवर-कन्या पर आसक्त हो गये ,नाव में ही .
और मान्य पूर्वज शान्तनु -पहले गंगा पर आसक्त ,उसकी शर्तों पर विवाह .वह गई तो इसी सत्यवती की लालसा, जो ऋषि के अनुग्रह से योजनगंधा बन गई .फिर उसी की शर्तें मान्य ,चाहे युवा पुत्र वंचित रह जाय !
उम्र की मर्यादा पुरुष को नहीं होती क्या? या राजा हैं इसलिए सब क्षम्य ! उस ढली उम्र में भी भोग का रोग ,तभी संतान कैसी ?विचित्रवीर्य और चित्रांगद !'
मन में उठती हैं तमाम बातें पर ये सब चर्चायें पतियों से करने की नहीं हैं .
अच्छा हुआ जो कृष्ण मेरे पति नहीं हैं , मित्र हैं.सब  कुछ कह सकती हूँ बिना लाग-लपेट के ,मन का नाता है. उसे पूरी तरह उँडेल कर हल्का कर सकती हूँ- आश्वस्ति पा सकती हूँ ,तन के संबंध ऊपर ही रह जाते हैं ,प्रायः ही मन तक नहीं पहुँचते .औपचारिकता का निर्वाह, मर्यादा की दीवार कहीं आड़े नहीं आती .
रात्रि का अँधियार गहरा गया .
शिथिल होती जा रही विचार-परंपरा .तंद्रा छाने लगी.पता नहीं कब धीमे से आगे बढ़ निद्रा ने सारे बोध छा लिये .
ब्राह्म-मुहूर्त में युधिष्ठिर जागे .
पाँचाली सो रही थी . खुले सघन श्याम केश शैया के नीचे लटक आए थे .हल्के हाथ समेट कर ऊपर कर दिये .
अपना उत्तरीय हौले से उसके तन पर उढ़ा दिया .
पता नहीं रात कितना जागती रही होगी - सो लेने दो अभी.
बाहर निकल कर द्वार उड़का दिया .
*
(क्रमशः)


11 टिप्‍पणियां:

  1. कृष्ण कथा जितनी बार पढ़ी जाए उतनी ही बार आनंद देती है

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  2. बहुत सुन्दर ...आज की परिप्रेक्ष में यह महाभारत ..!

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  3. शकुन्तला बहादुर27 मार्च 2011 को 12:07 am

    प्रतिभा जी,
    साख्य-भाव सुलभ चुटीले एवं रोचक संवादों में आपने अत्यन्त सजगता से सम्बद्ध अन्तर्गत कथाओं को उद्घाटित कर दिया है। कथा
    का प्रवाह पाठक को निरन्तर कृष्णमय भाव में सराबोर किये रखता है।आपकी तदनुरूप भाषा,भावाभिव्यक्ति और अनूठी शैली से मैं अभिभूत हूँ। सदा की भाँति इस आनन्द के लिये पुनःआभारी हूँ।

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  4. यह प्रसंग जितनी बार भी पढ़ा जाये मन नहीं भरता ....लेखन शैली मनभावन ...आनंद आ गया पढ़ कर

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  5. श्रीमदभागवतकथा का अपने शव्दों में वर्णन /अति उत्तम

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  6. मन मोह लेता है यह वर्णन। विस्मित सा देखता/पढता हूँ एक साँस में चित्रित होता जाता है सब कुछ।
    पांचाली-कृष्ण के बारे में, बीच में, इतना जानने को मिल रहा है, इसके लिए बहुत बहुत आभार।
    उस पर यह शिल्प, यह भाषा, शैली, मंत्रमुग्ध हूँ।

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  7. मुझे भी बिलकुल इल्म नहीं था कि...कंस मामाजी महाराज उग्रसेन के पुत्र नहीं हैं...उनकी पत्नियों के नाम भी आज ही सुने... .:( ।


    दूसरी बात...वो गोपियों के वस्त्र चुरा लेने वाली.....कितनी उत्कृष्ट सोच और दृष्टिकोण है प्रतिभा जी......वस्त्र चुराने के पीछे ये उद्देश्य हो सकता है श्रीकृष्ण का...मैंने कभी अंदाजा भी न लगाया होगा।


    'पांचाली' में वर्णित द्रौपदी और श्रीकृष्ण का ये नाता कितना मीठा और निश्छल है.....ऊपर से आपकी सहज लेखनी कितनी सरलता से सजीव चित्रण कर जाती है दृश्यों का..सब कुछ आँखों के आगे घटित होता हो ..ऐसा महसूस होता है...और मुझे जो भाता है वो है 'संतुलन'......पांचाली और श्रीकृष्ण की मैत्री का......पांचाली और पाँचों पाण्डवों का.......आपकी शब्द शैली और महाभारत के कालखंड का.....भगवानजी के कथनों और श्रृंखला की रोचकता का.....और सबसे अधिक श्रीकृष्ण की स्पष्टवादिता और उससे परिवर्तित होने वाले द्रौपदी के मनोभावों का।

    नमन है इस श्रृंखला को...जो प्रारम्भ से शब्दों का मनका मनका फेर कर पाठकों को कृष्णमय कर रही है...अधिक प्रसन्नता इस बात की होती है...कि यहाँ आस्था के नेत्र पूरे खुले हुए हैं......

    आभार है प्रतिभा जी..!!

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  8. एक सुन्दर कथा आयोजन! के एम् मुंशी ने महाभारत के चरित्रों को भी कुछ ऐसे ही उभारा है !

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  9. झुँझलाहट में भूल गई वह कि स्वयं भी श्यामवर्णी है .

    हा हा नारी का सहज भाव

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  10. बहुत सुन्दर कथा-श्रंखला । अद्भुत शिल्प ! काफी कुछ नया भी जाना इस कथा के माध्यम से ।
    बहुत आभार प्रतिभा जी ।

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