गुरुवार, 31 मार्च 2011

भानमती की बात - आग और फूस.

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बड़ों की कही हुई बातें कभी-कभी सोचती ही रह जाती हूँ .कुछ सार तो था ही ,अब कोई चाहे जितना दकियानूसी कह ले .व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाय तो उनका कहना सही लगता है और यों तो जैसे जिसका मन माने.
मेरी सासु-माँ कहती थीं,' जब आग और फूस एक साथ होई तो जरन(जलने) से कहां तक रोक सकित हो.नारी-नर का साथ ऐसा ही है .अरे भई, भगवान की रची दुनिया है अइस बनावा है कि सिरजनहार की इच्छा पूरी होवत रहे . ऐसा नहीं होता तो वो काहे अइस रचता .फिर काहे कोई फंदे में फँसता ,सब उसकी लीला है ! दुनिया कैसे चलती, सब न साधू-संत बन जाते ! ...कित्ता भी साध लो, मूल सुभाव कहाँ जाएगा आखिर है तो इन्सान ही न .जाने-अनजाने उमड़ आवत है . कित्ता बचि हैं विचारा !सो पहले ही अइस नउबत आवन से बचे रहो .पर दुनिया के मनई ,जहाँ मना होय उहाँ उपत के जाय परत हैं .'
जिसे कबीर ने कहा है 'रुई पलेटी आग' वह तो धधकेगी ही .लपटें चाहे पल भर में बुझ जायँ बाद में राख और कालिख ही बचे .तन के साथ मन भी तो लपेट में आता ही है. सुलगने से कैसे कोई रोकेगा? चाहे कित्ता साधो ! कहाँ तक रोक लगाएगा कोई . भड़कन अनिवार है . समेटे रखो जित्ता बस चले .
आग और फूस एक साथ रह कर भी जले नहीं .कौन मानेगा? एक बार को दूध का धुला रह भी जाए कोई, तो वह नियम का अपवाद कहा जाएगा.संभावना तो स्वाभाविक जो है उसीकी की जाएगी . अपवाद को कौन मानता है ?और लोगों के मानने न मानने से फ़र्क पड़ता ही है.तो पहले से सावधानी रखने में क्या हर्ज ! बनी रहे कल्याणकारी दूरी . आँच सेंकना तक तो सही पर जानबूझ कर लपटों में हाथ डालना तो...! मुझे भी लगता है ठीक कहती थीं सासु-माँ .आग और फूस में एक समझदारी भरी दूरी बनाए रखने में ही कुशल है .

पर अपने को क्या करना ! काहे को चले आए हम बेकार .लौट चलो ,यहीं से , . काँटों की बाड़ है आगे तो - वर्जित प्रदेश !हमें तो सासु-माँ की बात याद आ गई - तुक की लगी, सो बता दी !

सब समझदार हैं,सोचेंगे अपनी-अपनी .

- भानमती .

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8 टिप्‍पणियां:

  1. ठीक कहती थीं सासु-माँ .आग और फूस में एक समझदारी भरी दूरी बनाए रखने में ही कुशल है .
    एक दम सही बात!!

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  2. सासू जी की बात बहुत सटीक है । आपने उचित समझकर सांझा की , यह भी अच्छा लगा । आग और फूस साथ-साथ , बिना किसी अनिष्ट के रह सकें , इसके लिए पर्याप्त दूरी अति-आवश्यक है ।

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  3. .छोटो के समक्ष ...बड़ो की बाते हमेशा ही उपयोगी होती है ! इस सामंजशय को बनाये रखना सभी को नहीं आता !बेहद सुन्दर याद गार !

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  4. गाँठ बाँधने योग्य बात, सारगर्भित रचना , आभार

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  5. लौट चलो ,यहीं से , . काँटों की बाड़ है आगे तो - वर्जित प्रदेश !

    -हम भी लौट जा रहे हैं...

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  6. हर शब्द कितने अर्थ समेटे है।
    सच में सोचने सहेजने की बात तो है ही।

    इस अर्थपूर्ण बात के लिए आपका और भानमती का भी, धन्यवाद।

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  7. बात तो बहुत सटीक और समझाने वाली ही है ..अब कोई न समझे तो क्या किया जाए ...काँटों की बाड़ देख हम भी लौट ही चलते हैं ...

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  8. वैसे तो काँटों की बाड़ को पार करके वर्जित प्रदेश की यात्रा करना पसंद hai...:)..मगर आज आपकी बात सुन लेने का मन है...सबकी तरह सबक लेके यहीं से लौट जाउंगी :)

    आभार भानमती जी का..!!

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