सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

कुछ पुराने पन्ने -

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विवाह के बाद,  प्रारंभिक वर्षों में दीवाली हर साल अम्माँ-बाबूजी के साथ (ससुराल में)होती थी. सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी.
हमारे यहाँ दीवाली पर दो दिन डट कर बाज़ी जमती थी .कई संबंधी आ जाते थे.  
बराम्दे में गद्दों पर चादरें बिछा कर बीच मे एक बड़ा सफ़ेद मेज़पोश फैला , चारों ओर महफ़िल जम जाती. ताश की एक गड्डी से कहाँ काम चलता दो मिलानी पड़ती थीं .
लड़के -बहुएं देवर-जेठ सब को बाबूजी बैठा लेते थे .
मेरी पहली दीवाली थी .मुझे खेलना नहीं आता था.
अरे, तुम्हें फ़्लश नहीं आता...कोई बात नहीं ..चलो, हम सिखाए देते हैं.
ससुर जी ने कहा था.
उन्होंने एक गड्डी ताश की उठा ली. हुकुम, पान, ईँट, चिड़ी बता कर तीन इक्के निकाले. वैसे पत्तों की थोड़ी-बहुत  जानकारी मुझे थी.     
अब आगे  देखो दुल्हन ,
यह सबसे बड़ी ट्रेल,फिर रन बताए फिर सीक्वेंस ,कलर .
तीन-चार बाज़ी खेल कर बाबूजी उठ गये  
खेलने के लिये रुपये दिये थे उन्होंने ,कहा अब खेलो -पैसा सब सिखाय देगा.'
 उठते-उठते कह गये ,दिन्ने ,इनको बताते रहना ..
हाँ हाँ बाबूजी ,आप निश्चिंत रहिये,हम सब बता देंगे.
फिर भी वे मुझसे कह गये समझ में न आए तो अपने पत्ते दिखा कर दूसरे से मिल लेना. .
अब सब खेलने बैठ जाएँगे तो चाय कौन बनाए ?
नहीं ,इन दो दिन बहुएँ उधर नहीं लगेंगी .ताईजी और अम्माँ हैं न,वे बनाएँगी चाय.
विधवा ताई जी सबसे विरक्त-सी रहती हैं,अम्माँजी .चूल्हे पर भगोने में चाय का पानी चढ़ा देती हैं. 
कुछ देर बाद आवाज़ लगती है ,अरे मनुआ की दुलहिन ,कित्ती पत्ती पड़ेगी ,अंदाज बताय जाओ .
जिठानी उठती हैं 
वे कहती हैं सक्कर तो डाल दी .बस चाय कित्ती पड़ेगी? .
कित्ती डाली शक्कर ?
दुई लोटा पानी धरा था,सो कटोरी भर डाल दी.उसकी चिन्ता मत करो ,हमने पानी चख कर देख लिया .
उन्होंले चीनी घुलने के बाद ,चमचे निकालकर ,मिठास चख ली है.
कटोरे में चाय की पत्ती जिज्जी ने निकाल दी.
दूध की कोई चिन्ता नहीं .डालते जाओ ,रंग आ जाए तब तक .(वाह ,क्या चाय बनाई है अम्माँजी ने ,खूब औटी हुई गाढ़ी चाय उसमें दूध की बहार -चीनी भी खूब मन से डाली है ). 
हम लोग उठे पानी निकालनेवाली डोई से निकाल-निकाल,  चाय कपों मे छानी और ट्रे मे रख कर ले आए.
अम्माँ जी कप या शीशे बरतन में कुछ खाती पीती नहीं ,उनका काँसे का गिलास चलता है,जिसमें दूध और चीनी उनके हिसाब से, ढंग से पड़ी हो .
चार प्लेटों में दीवाली की पापड़ियाँ -अजवाइन हींग-मिर्च की बेसनवाली ,मैदा की नमक-ज़ीरे वाली और गुड़वाली मीठी पहले से चल रहीं थीं .
खेल जारी था.
हाँ, तो उसमें क्या हुआ?
 मैंने कई बार चाल चली .
इनने टोका , ए क्या कर रही हो ?
मैं हँस कर रह गई .
और एक चाल चल दी.
 अपने पत्ते फेंककर ये मेरे पास चले आए 
अरे वाह, कमाल करती हो तुम..
तीन इक्कों ने खूब जिताया मुझे उस दिन .
मैं सबके सामनेअधिक बोलती नहीं .घर में सबसे छोटे हैं मेरे पति ,छोटे जेठजी से नौ साल छोटे .अम्माँ कहती हैं , जौ तो हमारो पेट-पुँछना है .

मैं भी कौन सा राग छेड़ कर बैठ गई. बड़ी लंबी गाथा है उन दिनों की जो आज के लिये अजनबी हो गए है .
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6 टिप्‍पणियां:

  1. सारा सार अजनबी हो गये में आ गया। लाजवाब।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(०२-०५-२०२०) को "मजदूर दिवस"(चर्चा अंक-३६६८) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

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  3. बहुत सुन्दर संस्मरण मैम .

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  4. वाह लाजवाब मुग्ध कर गयी।

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