शनिवार, 5 मई 2018

व्यक्ति की स्वाधीनता -

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कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के लिए दुनिया के दूसरे छोर के लिए रवाना हो गए.
उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन वे अपने जीवन का सम्मानजनक अंत चाहते हैं. उनका कहना हैं कि उनकी आज़ादी छिन रही है और इसीलिए उन्होंने ये फ़ैसला लिया .
(लंबे वक्त तक चले विवाद के बाद, गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया के एक राज्य ने 'असिस्टेड डाइंग' को कानूनी मान्यता दे दी है. लेकिन इसके लिए किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार होना चाहिए.)
गुडऑल ने अपनी ज़िंदगी को ख़त्म करने का फ़ैसला एक घटना के बाद लिया. एक दिन वे अपने घर पर गिर गए और दो दिन तक किसी को नहीं दिखे. इसके बाद डॉक्टरों ने फ़ैसला किया कि उन्हें 24 घंटे की देखभाल की ज़रूरत है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना होगा.डॉ गुडऑल कहते हैं, "मेरे जैसे एक बूढ़े व्यक्ति को पूरे नागरिक अधिकार होने चाहिए जिसमें 'असिस्टेड डेथ' भी शामिल हो."
उन्होंने एबीसी को बताया, "अगर कोई व्यक्ति अपनी जान लेना चाहता है तो किसी दूसरी व्यक्ति को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."
उनके इस निर्णय पर विभिन्न मत हो सकते हैं लेकिन
औरों पर पूरी तरह निर्भर होकर एक लाचार शरीर के साथ जीना - अपनी अस्मिता का क्षरण होते देखते रहना - एक सचेत प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये इससे से बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती.
और सच्चे अर्थों में वह जीवंत कहाँ रहा - 'औरों के सहारे तो ज़नाज़े उठा करते हैं.'
मैं, तुम्हारे लिये शान्ति की कामना करती हूँ ,डॉ. गुडऑल, तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारा ऊर्जस्वित जीव , संपूर्ण मानवी गरिमा सहित अपने विश्रामगृह में निवास करे !
फिर पुनर्नवीन हो ,नवोर्जा और नये उत्साह के साथ लौट आना अपनी कर्मभूमि में, जहाँ मानव-जीवन की निरंतरता और उत्तरोत्तर पूर्णता, फलीभूत हो सके !
तुम्हें मेरा नत-मस्तक प्रणाम !
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4 टिप्‍पणियां:

  1. निर्वाण का फलसफा। अति उत्तम।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-05-2017) को "मिला नहीं है ठौर ठिकाना" (चर्चा अंक-2963) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  3. धीरे-धीरे कई देशों में इच्छा मृत्यु को मान्यता मिल रही है, मानव को गरिमापूर्ण विदाई के लिए इसका अधिकार मिलना ही चाहिए, यदि वह सामान्य जीवन जीने में भी असमर्थ हो गया है.

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