सोमवार, 18 मई 2015

उलनबटोर / झुमरीतलैया .

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जब पहली बार उलनबटोर का नाम सुना तो मन वैसे ही कौतुक से भर उठा था जैसे झुमरीतलैया का नाम सुन कर .आठ-दस साल बीत गए उस बात को , मन में बार-बार दोनों नामों की गूँज उठती रही .फिर एक बार और उलनबटोर के बारे में एक खास बात पढ़ी - वहाँ के लोग अपनी महिलाओँ को ,गर्दन में मोच के दर्द से छुटकारा दिलाने का, बड़ा नायाब तरीका अपनाते हैं - करना बस ये है कि दर्दवाली महिला घुटनों के बल बैठ कर किसी खूबसूरत पुरुष के घुटनों पर अपना सिर रख दे. कुछ ही देर में दर्द कम होते-होते ग़ायब!
हर्रा लगे न फिटकरी और रंग आए चोखा!' की तर्ज़ पर , सारी परेशानी उड़न-छू और महिलाएँ प्रसन्न-चित्त ! 
कमाल का उपाय है .मुझे लगा ,मानव-प्रकृति हर जगह एक सी - जो एक के लिये गुणकारी,  सब के लिये मुफ़ीद होना चाहिये .और दर्द से छुटकारा दिलाना यों भी बड़े पुण्य का काम है. सो मैंने 4-5 वर्ष पहले एक पोस्ट लिखी थी  'दर्द की दवा' - महिलाओं से खासतौर पर निवेदन किया था , कि जिनकी गर्दन में वास्तव में दर्द है, इस इलाज से फ़ायदा उठायें. देखा जाय तो  कुछ बीमारियाँ मानसिक होती हैं शारीरिक लक्षण बाद में दिखाई देते हैं.मैं चाहती थी प्रयोगकर्त्री अपनी शारीरिक-मानसिक स्थिति और भावनात्मक अनुभव हमें खुल कर लिख भेजें. उनके अनुभवों से बहुतों का मार्ग-दर्शन होता , एक नई पद्धति में प्रशंसनीय योगदान होता.पर मेरी बात को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया.'बरेली के झुमके' की तरह सब ने सुना, पर  चिन्ता किसी को नहीं ,वाटरप्रूफ़ हुए चलते बने .वास्तविकता  पता लगाने तक का नहीं सोचा किसी ने.
अब मंच पर मोदी जी का आगमन हुआ है ,लोक-कल्याण कामना को वांछित महत्व मिला है. उन्होंने स्वयं  जाकर प्रत्यक्ष कर दिया कि उलनबटोर इस धरती पर विद्यमान है, मंगोलिया की राजधानी है, उसकी अपनी खासूसियतें हैं .जाने क्यों मंगोलिया का नाम लेते ही मुझे मंगल ग्रह का ध्यान आने लगता है - बड़ा पराक्रमी ग्रह है ,बड़ा साहसी और सुविदित योद्धा - सब जानते-मानते हैं .पर बात हो रही है राजधानी उलनबटोर की .प्राचीनकाल से वहाँ की बात निराली रही और अब  अपने प्रधान मंत्री, मोदी जी के जाने से हमें वहाँ का और-और हाल मिल रहा हैं.उलनबटोर से सटे सोंगिनो खैरखान जिले में दो सौ साल पुराने एक बौद्ध भिक्षु का ममीकृत शरीर मिला है .जिसके लिए एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु ने दावा किया कि यह मृत नहीं बल्कि पद्मासन (ध्यान लगाने का आसन) की मुद्रा में हैं और गहन चिंतन में हैं.सब पहेली जैसा लग रहा है मुझे तो .अब तक कौन जानता था उलनबटोर की पुरातन कथा .मोदी जी ने जाकर नाम उजागर कर दिया.
बची अपनी झुमरीतलैया .बहुत बातें इस नाम के साथ जोड़ रखी हैं लोगों ने.उलनबटोर की ही तरह कभी-कभी मुझे लगने लगता था कि इस नाम का कोई स्थान है भी या बस ,विनोदी लोक-मानस की संकल्पना भर! एक की असलियत सामने आ गई . अब इसकी भी आशा बँधी है .मैं तो मना रही हूँ ,मोदी जी वहाँ का भी चक्कर लगा डालें कभी. उन के चरण पड़ें, इसके भी दिन बहुरें ,दुनिया के नक़शे पर पहचान बने .झुमरी तलैया का भी उद्धार हो जाए!

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16 टिप्‍पणियां:

  1. शकुन्तला बहादुर18 मई 2015 को 1:48 pm

    वाह ! वाह !! आपका प्रस्ताव अच्छा लगा । झूमरीतलैया की प्रसिद्धि की श्रेय तो रेडियो सीलोन और विविध भारती को ही जाता है । इन दोनों नामों में कुछ तो अनूठापन और विशिष्टता अवश्य है - ऐसा मेरा विचार है।

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  2. हास्य रस से सराबोर करती हल्की-फुल्की सी इस रचना के लिए बहुत बहुत बधाई ! गर्दन की मोच दूर करने का नुस्खा वाकई मजेदार है, पर जब तकिये को धूप दिखाने मात्र से भी काम चल jजाता है तो अब कहाँ नकुल- सहदेव की प्रतिकृति को खोजने जायेंगे लोग..वाकई मोदी जी के कारण देशवासियों का वैश्विक ज्ञान बहुत बढ़ रहा है और भारत के बारे में भी अन्य देश जान रहे हैं..

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  3. झुमरीतलैया का नाम अक्सर आल इंडिया रेडिओ पे फरमाइशी गानों के दौरान सुना है ... उलनबटोर नहीं सूना था कभी ... पर जय हो मोदी जी की ... हलके फुल्के अंदाज़ में बाखूबी रखा है इस बात को ... मज़ा आया ...

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  4. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।

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  5. उलन बटोर की तरह झुमरी तलैया भी है । एक मंगोलिया में दूसरा म.प्र. में । कुछ वर्ष पूर्व बाबर के नाना-दादा की तलाश में मंगोलिया पहुँचा था । हूण, तातार, चंगेज़ ख़ान, तिमूरलिन (तैमूर लंग) ...आदि के आकर्षण ने मध्य एशिया के इतिहास की ओर मोड़ दिया । तब पता चला कि - 1 एक समय मंगोल साम्राज्य विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य हुआ था जिसकी सीमा का विस्तार एशिया से योरोप तक था । 2- मंगोलिया में स्थानीय जनजातियाँ निवास करती थीं जो बाद में बौद्ध धर्म के प्रभाव आयीं ..और फिर इस्लाम के प्रभाव में । 3- मंगोल लिपि पर भारतीय लिपियों का प्रभाव रहा है । 4- मंगोलिया पर चीन की अपेक्षा भारतीय सभ्यता व संस्कृति का कहीं अधिक प्रभाव रहा है । 5- मंगोलिया कभी चीन से भयभीत नहीं रहा बल्कि एक समय तो मंगोलियन कबीलों ने चीन की ही नाक में दम कर दिया था ।

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  6. जी हाँ, झारखंड के कोडरमा जिले का एक छोटा कस्‍बा है,झुमरी तलैया .इसे अपने रेडिओ प्रेमी श्रोताओं के आधिक्य के कारण प्रसिद्धि मिली . असली नाम यहाँ के दामोदर नदी पर निर्मित 'तिलैया बाँध' के नाम पर था ,जिसके 'तलैया' (झुमरी तलैया) में परिवर्तित रूप ने इसमें मिथकीय तत्वों का समावेश कर दिया .
    मंगोलिया पर जानकारी के लिए आभार , डॉ.कौशलेन्द्रम् !

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  7. बहुत सुंदर .बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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  8. वाह आदरणीया! रोचक आलेख। मजेदार। आभार उलनबटेर और झुमरीतलैया से सम्बंधित जानकारी बाँटने के लिये

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    1. अरे दिव्या ,'...बटोर'(उलनबटोर) है ,'बटेर 'कह के उडाओ मत !
      एक और बात याद आ गई-मेरी एक परिचिता होमियोपैथी को हेमियोपैथी कहती थीं ,मैं चुप सुनती थी हिम्मत नहीं पड़ी कभी कहने की .नहीं तो सुनने को मिलता 'अपने को बड़ा बनती है '.

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  9. शकुन्तला बहादुर20 मई 2015 को 11:48 am

    प्रतिभा जी , ब्लाॅग पर अपना चित्र बदल कर आपने मेरी बात मान ली - तदर्थ आभार स्वीकार करें । सुन्दर चित्र है । अच्छा लगा और लेखन?
    उसका तो कहना ही क्या ? सभी की प्रशंसा से गौरवान्वित है ।

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  10. विनोदपूर्ण बढि़या लेखन ।

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  11. अब कृष्ण चल पड़े चक्र ले तो उद्धार तो होना ही है किस किस का होता है समय साक्ष्य देगा ।

    आपकी लेखनी लाजवाब है कोई भी विधा हो ।

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  12. आभार झुमरी तलैया की तरफ से !

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  13. कमाल है, उलनबटोर नाम मुझे भी चमत्कृत करता था। और वह आसन (नमन? बालासन?) तो वाकई गर्दन की मांसपेशियों को आराम दिलाता है। सामने कोई हो या न हो।

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  14. रोचक अंदाज़ .....झुमरी तलैया का भी शायद उद्धार हो जायेगा कभी .

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