सोमवार, 11 मई 2015

सागर - संगम -10 .

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नटी - युग की विषम स्थितियों को सम करने के लिये महापुरुषों का आविर्भाव होता है ।भक्ति जिस लहर ने सारे भारत की धरती को को सींच दिया ,आपके विचार में उसका श्रेय किसे जाता है  ?
सूत्र - गुरु रामानन्द को !समाज में दलितों और वंचितों के उन्नयन का पथ उन्हीं ने प्रशस्त किया ।क्यों मित्र ,लोक मन ,तुम्हारा क्या विचार है ?
लोक - भक्ति द्राविड ऊपजी ,लाये रामानन्द ,
 परकट किया कबीर ने सप्त द्वीप नव- खण्ड !

प्रत्यक्ष देख लो  .. जन के स्तर पर, विशेष रूप से समाज के वंचित वर्ग  के उन्नयन की संभावनाएँ   निर्गुण भक्ति के प्रसार  ने ही खोलीं .

(दृष्य - रामानन्द कबीर और रैदास का आगमन )
रैदास - गुरु महाराज एक जिज्ञासा है आज्ञा हो तो निवेदन करूँ?
रामा - कहो संत कहो .मन में शंका न रहने दो .
रैदास -महाराज आपके अनगिन शिष्य हैें .पर सब अपने-अपने ढंग से चलते हैं.ये कबीर और हम निर्गुण को ध्याते हैं ,पीपाजी सगुण को मानते हैं .क्या इससे कोई भेद नहीं उपजता ?

रामा - तुम समझे नहीं संत,मन को उस परम शक्ति के प्रति एकाग्र करने के लिये कोई साधन चाहिये.सारी इन्द्रियाँ जिसमें तन्मय हो जायें वह सगुण रूप मन एकाग्र करता है और बाह्य जगत से निरपेक्ष हो कर हृदय जिसमें लीन हो जाये वह निर्गुण भी उसी का भावन है.ये भेद ऊपर से प्रतीत होते हैं,उद्देश्य एक ही है और वह है भौतिक आकर्षणों से विरक्त कर मनुष्य में सतोगुण की प्रतिष्ठा करना.
कबीर - और महाराज गृहस्थ और बैरागी में कौन श्रेष्ठ है?रामा -सबसे श्रेष्ठ है गृहस्थाश्रम जो शेष सभी का भार वहन करता है.संसार के कर्तव्यों से उपराम होने पर वैराग्य भी उचित है -दोनों में परस्पर विरोध है ही कहाँ?
(एक अत्यंत विपन्न दुखी स्त्री का प्रवेश)
स्त्री -क्या गुरु जी यही हैं ?
रैदास - कौन से गुरु जी ?
स्त्री -नाम हमें मालूम नाहीं...पर नाम से क्या अंतर पड़ता है ?
कबीर -गुरु तो बहुतेरे घूमते पिरते हैं .किस गुरु को पूछ रही हो ?
स्त्री- किस गुरु को ? तुम भी तो गुरु हो .
ऐसा ही एक मेरे आदमी को ले गया .पर उसमें तुमसे थोड़ा फरक है.
उसकी लाल लाल आँखें ,कानों को फाड़तेपहने हुये कुंडल रुद्राक्ष की माला ,मांस -मछली -सराब छक कर लेनेवाले गँजेड़ी ...तुम्हें उनका पता तो होगा ..!
रैदास - ऐसे पाखण्डी ,बहुत घूमते हैं .
स्त्री - उधऱ बच्चे रटते हैं बप्पा कब आय़ेंगे. लोगन ने जीना मुस्किल कर दिया है मैं अब का करूँ ?न रहन का ठौर . न खाने -कपड़े का ठिकाना कोई पास फटकने भी नहीं देता ,दुई-दुई जवान होती लड़कियन का छोड़ के मर भी नहीं सकती .
रामा - तुम्हारा आदमी तुम्हें छोड़ कर क्यों चला गया ?
स्त्री -महाराज मरद के लिये सारे रास्ते खुले हैं औरत के लिये सब जगह ताले .आदमी बैरागी बन कर संसार से मुक्त हो सकता है ,औरत को मौत के सिवा कहीं छुटकारा  नहीं .
रामा - स्त्री संसृति धारा चलाती है वह प्रवृत्ति की ओर लाती है ,निवृत्ति उसका धर्म नहीं .
स्त्री -जिस संसार से मरद छुटकारा पाना चाहता है उसे चलाये भी रखना चाहता है ,और वो भी औरत के ऊपर जिम्मेदारी डाल के.उसकी क्या  कोई जुम्मेदारी  नहीं .चाहे जब पल्ला झाड़ के चल दे ..?
कबीर - स्त्री माया है .वह पुरुष को पतित करती हैउसे संसार के बंधनों में जकड़ती है .
स्त्री - तो महाराज छुटकारा सिरफ़ मरद के लिए है औरत हमेसा उस जंजाल में फँसी रहने को है ?
कबीर -नारी का ही फैलाया सारा जंजाल है .वह नरक का द्वार है.

स्त्री - तब तो महाराज नरक के द्वार को पैदा होते ही खतम कर देते .या ऐसा करते कि लड़का पैदा हो कर माँ को मार डालता क्यों कि पहला संपर्क उसी औरत से हुआ फिर को नरक का दुआर सदा को बंद हो जाता ,
(कुछ रुक कर )पर मुझे तो जिसने बंधनों में जकड़ा वह मरद था.नहीं तो मैं स्वतंत्र होती.
(कुछ देर चुप्पी)

स्त्री - कैसी अजीब बात !अपने ऊपर संयम नहीं और दोष-पाप की भागी सिरफ़ औरत !
रामा- का भया सो स्पष्ट कहो ?
स्त्री -नौ बरिस की उमर में बाप ने ब्याह दीना .तब तो मुझे कुछ अकल न थी.उस नादान उमर से ही तन पर अत्याचार शुरू हो गये.मैं तो उसके नाम से काँप-काँप जाती थी,पर खैर जाने दो ..,फिर हर साल बच्चे जनने मेरा काम, तीन बचे और सब मर गये.सारा दिन घर की चक्की में पिसने को मैं वो तो खाने और सेवा करवाने का अधिकारी.
 बच्चे पैदा करने का हकदार.पर दोष तो सिरफ मेरा .
रामा - क्यों ?वह कुछ करता नहीं था?
स्त्री - करता ?बाबाओं की संगत सुल्फ़ा-गाँजा का सेवन और मेरी पिटाई .
(तीनो लोग कानों पर हाथ रख लेते हैं)-हरे हरे .
रामा - राम राम .अब वह कहाँ है ?उसे मेरे पास लाओ .
स्त्री -वह तो काम फुँकवा कर बाबा बन कर निकल गया.सारा जंजाल मेरे सिर डाल गया.
रमा -बहन ,दोषी वह है तुम नहीं .
स्त्री -जब घर-गिरस्थी करने का बूता नहीं रहता तब आदमी ऐसे ही साधू बन कर औरत पर सब छोड़ कर चल देता है.
अब तो बच्चों को भी लोग जीने नहीं देते ,लड़कियों की और मुस्किल कहाँ ले जाऊँ .का करूँ ? ...ये नियाव होता है औरत के साथ?
रामा -(आवेश में आ जाते हैं ) नहीं यह अन्याय है .उसने गृहस्थ धर्म का भार लिया था वह निभाना था.
स्त्री - पर महाराज पाप की भागी तो सिरफ़ औरत होती है न!वह तो जानवर होती है,उसके मन-आत्मा कहाँ ..?अभी ये महाराज-(कबीर की तरफ़ इशारा)भी तो कुछ जदली-कटी कह रहे थे.
कबीर -माफ़ करो बहना मुझे यह  पता नहीं था...
.स्त्री - मुझसे अब सहन नहीं होता महाराज,इच्छा होती है तीनन को जहर खिला कर खुद अपनी भी भी जान दे दूँ .
रामा - भगवान की शरण में आओ बहन ,वही कल्याण करेंगे.
स्त्री -औरत के लिए भगवान के पास भी जगह कहाँ है?

रामा -(कुछ  सोच कर )भक्ति का अधिकार सबको है. स्त्री दलित है, विवश है , दीन है .उसे तो और भी अधिक.
रैदास -धन्य हो महाराज ! शूद्र को भक्ति का वरदान दिया ही था अब स्त्री का भी कल्याण हो !

रामा -संत रैदास, आप इस बहन को पीपा जी के पास ले जायें वे इनकी व्यवस्था करेंगे.
(रैदास और स्त्री जाते हैं )
8कबीर- महाराज स्त्रियों को भक्ति के मार्ग में स्वीकार कर लिया पर उसका परिणाम?

रामा- पुरुष स्वयं विचलित होता है और स्त्री पर प्रतिबंध लगा देता है.एक को वंचित कर दूसरा अपनी सुविधा चाहे यह कहाँ का न्याय है ?वह तो जननी है पालनकर्त्री है .स्वभाव से वह विकारों की ओर नहीं जाती उसे ले जाता है पुरुष अपनी कामना के लिए ,अपना अधिकार मान कर ..हमारे दक्षिणात्य समाज में नारी की बड़ी प्रतिष्ठा है.
रैदास - आपने शूद्रों को,जो पशुओँ से भी बदतर जीवन व्यतीत कर रहे थे,भक्ति का संदेश दे कर सही अर्थों में मानवता की प्रतिष्ठा की.और आज चिरकाल से वंचित और पीड़ित स्त्रियों को भी मानवी का दर्जा दिया,इससे सबका कल्याण होगा.
रामा - संत रैदास, मैं कुछ नहीं ,केवल एक माध्यम हूँ .जो लोग भगवान के समकक्ष बनते हैं ,अपने सारे कर्तव्य औरों पर डाल कर सुविधायें भोगते हैं वे समाज के दूषण हैं. उन्हीं ने व्यवस्था दी कि शूद्रों को केवल सेवा करनी चाहिये .स्त्री के लिये उन्नयन के सारे मार्ग रूँध दिये .हमारे यहाँ नारी को देवी स्वरूप माना गया है.-स्त्रियःसमस्ताःतव देवि रूपा .
तात्तविक रूप से स्त्री-पुरुष मानव योनि में समान भागी हैं ,जातिृगत भेद भी ऊपरी आरोपण हैं .अंततःसब मनुष्य हैं.
पीपा - धन्य हो महाराज !
कबीर - मैं बहुत घूमा हूँ महाराज पर दक्षिण नहीं जा पाया.आज आपने मुझे नई दृष्टि दी आप धन्य हैं.
रामा - संत कबीर कुछ सुनाओ .
कबरी
 -साधो एक रूप सब माँहीं ,
अपने माँहिं विचार के देखोऔर दूसरो नाहीं !
एकै त्वचा,रुधिर पुनि एकैविप्र सूद्र के माँहीं ,
कहीं नारि,कहिं नर हुइडोले गैब पुरिस वह नाहीं !
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(क्रमशः)

2 टिप्‍पणियां:

  1. भक्ति का अधिकार मानव मात्र को है...रामानन्द ने इस बात को समझकर स्त्रियों के लिए भी साधना का मार्ग प्रशस्त किया..सागर संगम का यह अंक भी सदा की तरह विचारणीय तथा प्रशंसनीय है

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  2. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें. कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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