मंगलवार, 18 नवंबर 2014

हे कृष्ण , यहाँ मत आना तुम !


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ओ कृष्ण ,तुम मत आना  !
यहाँ मत आना तुम !!
गला फाड़-फाड़ कर  टेर रहे हैं जो पाखंडी ,अपन- स्वार्थी ,उनके शब्दों पर मत जाना.
ये  लोग अपने स्वार्थ और सुख के लिए पगलाए जा रहे हैं .  न्याय और सत्य के पक्ष में जिन कायरों की वाणी मौन हो जाती है ,खड़े होने का दम नहीं रहता  ,मत सुनना उनकी पुकार , वासुदेव , तुम मत आना !

पूछो ,उनने स्वयं अब तक  क्या किया ?युगों से अन्याय होता देखते रहे ,सहते रहे. प्रतिरोध क्यों नहीं कर पाये?
ये कायर , पलायनवादी हैं. अन्याय के ये हिस्सेदार  चीख-पुकार मचाने के सिवा और कर क्या सकते हैं !
गोविन्द, तुम तुम द्वारकाधीश हो कर भी दीनबंधु बने रहे ,यश-निन्दा से निरपेक्ष ,सुख-दुख में समभाव जीवन भर अविश्रान्त भावेन कर्मशील रहे ?ये सब  अकर्मण्य हैं अपनी हैं लिप्साओं के अधीन ?तुम्हें भी रिश्वत देने पर उतारू हैं -प्रसाद चढ़ायेंगे,रोये-गायेंगे ,नाचेंगे मंदिरों मे छप्पन भोग लगा कर अपनी जिह्वा तृप्त करेंगे. तुम्हारा नाम ले कर  भोग के सारे साधन जोड़ेंगे  ,केवल अपनी तृप्ति के लिए .  किसका भला हो पाया है आज तक उससे ?
 पूछो इनसे किस दीन की सहायता की ?क्या लोक-सेवा की, किस दुखी का दर्द दूर किया?गहन विषाद में डूबे  परम सखा को  कर्तव्य पालन हेतु जो ज्ञान दिया वह मानव-मात्र को दिशा-बोध देता सार्वकालिक संदेश  बन गया , उसका पाठ करनेवाले बहुत होंगे , बाल की खाल  निकालनेवाले व्याख्याकार  भी कम नहीं  पर उसे जीवन में धारण करनेवाले कितने हैं ? आचरण में उतार लिया होता तो न द्विधा-ग्रस्त होते ,न ग्लानि-गलित आत्महीनता के भाजन  होते . मन का समत्व- भाव उन्हें हर विषम स्थिति में साध लेता ,दैन्य-प्रदर्शन की नौबत ही न आती.पर  ये बौद्धिक कलाबाज़ियों वाले लोग धर्मराज बने ,अपने पक्ष में तर्क ढालने में निपुण हैं .
इन आस्था विश्वास हीनों का क्या उपचार करोगे ?
क्या करोगे ,यहाँ आ कर ?
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इन लोगों के  करे-धरे कुछ नहीं होता .तुमने मानवीयता का जो सहज-पावन रूप  निरूपित किया था ,इन्हीं लोगों ने उसे इतना विकृत कर दिया .तुमने दिखा दिया था.नारी-नर का  संबंध इतना स्वस्थ और उन्नयनकारी भी हो सकता है ,वह उनकी उनकी मानसिकता से  परे रह गया , वह  इनकी   मनोवासनायें जगाने का माध्यम बन गया  .  केवल  विकृत रूप ही इनके पल्ले पड़ते  हैं .  नारी की लाज ढाँकनेवाले को ,विवस्त्राओं के बीच चित्रित कर रहे हैं .तुम्हारे सारे अर्थ अपनी वासनाओँ के आरोपण से  गँदला दिये इनने . नारी शरीर पर मनमाना अधिकार मान कर चलने लगे . इनकी  मानवीय संवेदनाएँ कुंठित हो गई हैं  इनकी कुतर्की मति के आगे जीवन के यथार्थ  और सारे  आप्त वाक्य  बेकार हो गये  हैं . और तो और तुम्हारी बाल सखी राधा ,इन के विकृत  मनोरंजन का साधन बन गई - सह पाओगे तुम ?इस वातावरण में रह पाओगे तुम ?नारी-विहीन कर दो संसार को और इस विकृत नर-वंश को   मनमानी करने के लिए छोड़ दो, वैसे ही जैसे अभिशप्त यदुकुल को अपनी परिणति पाने के लिए   छोड़ दिया था .
तुम्हें बरजते मन बहुत दुखता है गोविन्द ,यह दोहरी चुभन   मेरी  वाणी में तीखापन और,शब्दों में  कटुता भर रही  हो तो  क्षमा करना, क्योंकि तुम अंतर्यामी हो ,किसी के मनोभाव तुमसे छिपे  नहीं!
इन्हें क्यों लगता है कि तुम चले गये हो ? अंतर के शुभ संकल्प जगा कर  मन का कलुष धो लेंगे जिस दिन ,उस दिन स्वयं जान  लेंगे कि तुम निरंतर साथ रहते आए हो .इन्हें स्वयं अनुभव करने दो वासुदेव ,अपने से प्राप्त अनुभवों की गाँठ बहुत मज़बूत होती है ,खुलती नहीं कभी .इसलिए हे  नटवर , तुम इन  के दंद-फंद में पड़े बिना इन्हें सच का साक्षात्कार करने दो .
रे कलाधर , इनकी कलाकारियों पर रीझ कर सामने आने का सोचना भी मत .
 मत आना मुरली धर ,तुम यहाँ बिलकुल  मत आना !
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14 टिप्‍पणियां:

  1. माँ! कृष्ण की ओर से सफ़ाई देने का अधिकार तो मुझे नहीं... लेकिन कृष्ण की व्यथा से अनभिज्ञ भी नहीं मैं... स्वयम उनके शब्दों में:
    माता!
    प्रभु हूँ या परात्पर
    पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो!
    मैंने अर्जुन से कहा -
    सारे तुम्हारे कर्मों का पाप-पुण्य, योगक्षेम
    मैं वहन करूँगा अपने कन्धों पर
    अठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
    कोई नहीं केवल मैं मरा हूँ करोड़ों बार
    जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
    कोई नहीं था
    वह मैं ही था
    गिरता था घायल होकर जो रणभूमि में.
    अश्वत्थामा के अंगों से
    रक्त, पीप, स्वेद बन कर बहूँगा
    मैं ही युग-युगानतर तक
    जीवन हूँ मैं
    तो मृत्यु भी मैं ही हूँ माँ!
    शाप यह तुमहारा स्वीकार है!!
    /
    अब और क्या कहूँ!! आपकी रचना के मर्म तक पहुँचने की चेष्टा कर रहा हूँ माँ, उतार रहा हूँ अपने अंतस में, लेकिन कृष्ण की भी व्यथा को अनसुना नहीं कर सकता!!

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    1. जो परमात्म है उसे हर जीव की व्यथा व्यापती है ,सलिल -किसी से परे नहीं हैं कृष्ण .उनकी अंतर्व्यथा सुनने का शुभ संकल्प उस करुणा का संस्पर्श ही देगा .

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  2. हे केशव तुमने ज्ञान,
    कर्म और भक्तियोग समझाकर
    अर्जुन का विषाद हर लिया था
    पर इस कलयुग में
    तुम्हारी कोई जरूरत नहीं
    निज स्वार्थ में डूबे पार्थों को
    यहाँ कोई विषाद नहीं
    इस युग में तुम्हारा कर्मयोग
    अब सैनिक नहीं पैदा करता
    नाई, पंडित और शिक्षक में
    यह क्यों ओज नहीं भरता
    भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ़
    यह क्यों टंकार नहीं करता
    जनता की आहत भावनाओं का
    हवाई सर्वेक्षण कर रहे नेता
    कर्मयोग को पीछे छोड़
    ज्ञानयोग में गोते खा रहें हैं
    और भक्तियोग से जनता को
    आपस में लड़ा रहें हैं

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  3. कृष्ण कहाँ आते हैं उनकी पुकार पर जो मीरा का हृदय नहीं रखते, जिनका अंतर राधा सा प्रीत से ओतप्रोत नहीं है..आपके हृदय की व्यथा समाज के जिस रूप को देखकर बही चली जा रही है ऐसे समाज के तो तो वह भी पक्षधर नहीं...अंतिम पंक्तियों में आपने स्वयं ही कह दिया है किसको मिलते हैं कृष्ण...

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-11-2014 को चर्चा मंच पर तमाचा है आदमियत के मुँह पर { चर्चा - 1803 } में दिया गया है
    आभार

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  5. श्री कृष्ण को कलियुग में न आने का सुझाव देकर आपने सही काम किया | कलि के कौरव तो कृष्ण के भी वश में नहीं है |ये तो रक्तबीज का वंशधर हैं ,इनको वश में करने के लिए माँ काली को आना पड़ेगा !
    आईना !

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  6. बेहद सार्थक .. कृष्ण को अपने अनुसार स्वार्थ में ढाल लिया हमने अब कहते हैं कृष्ण कहाँ है...
    बहुत बढ़िया पोस्ट.

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  7. magar mere liye aa jana kishnu ...Pratibha ji rokein to b aa hi jana :( :(

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    1. वे कहीं नहीं गये तरु,साथ-साथ चलते हैं .तुम जो इतनी कहा-सुनी कर लेती हो उनसे, वो क्या यों ही !

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    2. Arre nahin Pratibha ji!! 
      Ek series padh rahi hoon aajkal Shri Sudershan Singh Chakr dwara rachit ‘’Saanskritk Kahaniyaan’’..usme we ek jagah likhte hain ,’’ Nand ka gop baalak bahut bhola hai..use sab sweekaar hai..yadi aap use gaay ka chitr dikha ke kahenge k kanhaiyya ye tu hai…! To jhatt se maan legaa haan ye to main hoon…ya uske janmdin pe koi baal sakha usi kee bansi utha k use uphar de dega to bhi jhatt rakh lega k haan badi pyaari hai!! Asweekriti use tabhi dena hoti hai jab aap swayam use apne aap se mana kar dein.’’

       aur fir wo aapke bete bahu hain na…pata chala merko keh denge ki maa ne mana kiya tha so nai aaya..radha bhi to maa ki hi baat sunegi na..!! kishnu ka koi bharosa nai Pratibha ji..:(

      kshama kijiyega..mail nai chal ri hai :''-(

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  8. सच्चे भक्त की पुकार कृष्ण को रोक नहीं सकती और जो पुकारते है वो सब अपने स्वार्थ हेतु पुकारते हैं । आपकी व्यथा आज के परिपेक्ष्य से उपजी वितृष्णा दिखाई देती है । समाज में हो रहे व्यभिचार यूँ ही मन को उद्द्वेलित करते हैं और मन कह उठता है प्रभु मत आना ।

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  9. शकुन्तला बहादुर30 दिसंबर 2014 को 3:37 pm

    प्रतिभा जी, आपने तो कृष्ण को आने से ब्रज दिया किन्तु मुझे लगता है कि "परित्राणाय साधूनां ........धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।" का उद्घोष करने वाले श्रीकृष्ण को क्या आज के समाज की व्यथा द्रवित
    नहीं कर पाती । मुझे वो भजन याद आ जाता है - "छिपे हो कहाँ कष्टहारी कन्हैया ?" या फिर " मुरली की टेर सुनाने को कब आओगे श्याम कादम्बिनी के तले ?" देखें कब आते हैं दुष्टों के नाश और साधुओं की रक्षा के लिये - कृष्ण कन्हैया ?

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