शनिवार, 1 नवंबर 2014

कथांश - 24.


*
रमन बाबू के 'माया-भवन' (माया उनकी पत्नी का नाम) में रौनक हो गई थी .विनय तो वहीं अपने स्नातकोत्तर कालेज में  खुश थे  अब  पारमिता भी  वहीं पॉलिटेक्नीक में पढ़ाने लगी . तनय का दो जगह  सेलेक्शन हो गया.-देखो कहाँ ज्वाइन करे .वसु सब के साथ वहीं थी.
 उसी से हाल-चाल मिलते रहते थे.
रमन बाबू और मायादेवी आराम से ज़िन्दगी गुज़ारने के आदी थे. गाँव का एक आदमी,आउट हाउस में रखा  था .घर का काम सँभालने को  महरी-महराजिन पहले से थीं .
मीता को पूरी फ़ुर्सत थी अपना काम करने की .
उस के ज्वाइन करने से पहले एक और नियुक्ति हुई थी -बिलकुल टेम्परेरी  . लाइब्रेरी एसिस्टेन्ट, मेटर्निटी लीव पर गईं  ,कह गईं  अब साल  पूरा कर के आऊँगी ,उनके स्थान पर , अस्थाई नियुक्ति कर ली गई  वह टर्म समाप्त होने को थी . लड़की थी सुमति .अकेली . अक्सर ही मीता साथ ले आती.
उस दिन चाय पर उसी की चर्चा चल रही थी .
 विनय पूछ रहे थे ,' पर ऐसा हुआ क्या  था ?'
'क्या करे बिचारी सुसाइड करने जा रही थी.'
वे  चौंके,'अरे क्यों .'
'बड़ी उलझी कहानी है ...'
'पर तुम्हें कैसे पता सुसाइड का?'
' इसकी टर्म खतम हो रही है .इधर कई दिन से परेशान थी मुझे पता था, तो कल इसके कमरे पर चली गई कि शायद कुछ मदद कर सकूँ.
दरवाज़ा खोला इसने. रोई-रोई लग रही थी . हड़बड़ी में उठी थी ,मुझे बैठा कर एकदम अंदर चली गई -एक कागज़ जल्दी से किताब में घुसा दिया था मेज़ के कोने पर टेढ़ी पड़ी  किताब साड़ी के पल्ले में फँस कर  नीचे जा गिरी. कागज़ निकल कर दूर जा पड़ा.उठाया तो  देखा -सुसाइड नोट !रो-रो कर यही लिख रही होगी .
'बाप रे !' विनय के मुँह से निकला
'पर बात  क्या ?'
 चार बहनों में दूसरे नंबर की है ये ,भाई कोई नहीं .माँ-बाप पढ़ाना नहीं चाहते थे .अपनी ज़िद में पढ़ा किसी तरह .
उनके तो बड़ी के लिए लड़का ढूँढने में ही तलवे घिस गए, जमा-पूँजी खर्च हो गई .ऊपर से तीन-तीन और .पढ़ा- लिखा लड़का देखो तो उसके दिमाग नहीं मिलते .
ये सोच रही थी अपने पाँव पर खड़ी हो जाऊँगी पर नौकरी कहाँ धरी आजकल?
 ब्याही बड़ी बहिन की  पिछले साल मौत हो गई ,  छोटा बच्चा छोड़ गईँ . वे सब चाहते हैं इसे जीजा से ब्याह दें - सारी समस्यओं का हल . वह  तो  तुला बैठा है . इसकी कोई नहीं सोचता
अब  ये घर जाने को बिलकुल तैयार नहीं .वो लोग जबर्दस्ती जीजा को पल्ले बाँध देंगे . ये कहती है घुट-घुट कर नहीं जीना,मर जाऊंगी पर उस आदमी से शादी नहीं करूँगी .
मैंने कहा - यहीं रुक जाओ .
बोली -यहाँ कहाँ रहूँ ,नौकरी खतम.कल से क्या करूँगी?'
घोर अरुचि के आदमी के साथ ज़िन्दगी भर गुज़ारूँ ,मुझसे नहीं होगा.हाँ बच्चा पाल दूँगी ,अलग से  .'
'तो..?', विनय ने पूछा था ..,'क्या करेगी अब ? ..'
वसु बताती रही थी - मैं श्रोता-मात्र .
याद पड़ता है एकाध बार वहाँ आते-जाते उस लड़की को देखा था

*
फिर पारमिता ने ही सजेस्ट किया था -
' मैं जा रही हूँ  .पिता अकेले हैं महीने-पन्द्रहवें देख-सुन आती हूँ -एकाध दिन रह लेती हूँ.  चलोगी  मेरे साथ ?'
' कहीं नहीं जाना, एक फ़ालतू का बोझ हूँ सब के लिए .'
'अरे ,मेरे पिताजी हैं बस,बड़े ख़ुश होंगे . न अच्छा लगे तो ज़हर की शीशी तो  रखी है आकर पी लेना .'
कह-सुन कर मीता उसे लेकर मायके आई थी.
वहाँ पता चला माँ की तबियत खराब .देखने गई  सुमति के साथ ,
 दिन निकल गया .फिर मीता बोली ,'कैसे अकेली छोड़ूँ इन्हें.तुम घर जाओ सुमति ,मैं यहीं रहूँगी .बाबूजी जी को बता देना .'
'नहीं दीदी ,आप जाइये मैं रह जाती हूँ .सँभाल  लूँगी यहाँ का.'
थोड़ी बहस के बाद तय हुआ कि मीता लौट जाय सुमति माँ को पास रहे.
क्या करती पारमिता भी? न उन्हें ऐसा अकेले छोड़ सकती न रुक सकती  ..नई नौकरी  छुट्टी भी नहीं.
वह बोली, ' ठीक है, मैं रुक जाऊँगी .'
मीता ने चैन की साँस ली.माँ को भी जाने क्या समझा दिया उसने .'
*
मैं तो यों ही चक्कर लगाने आया था ,माँ के हाल-चाल लेने.
उस लड़की को देखा ,समझ गया वही है.
कुछ अजीब उसे भी लगा होगा .पर सँभाल लिया था उसने .
रसोई से उसने कहा,
'माँ को  दवा देनी है वहीं सिरहाने रखी है.'
मैं  शीशियों के लेवेल देख रहा हूँ प्रेस्क्रिप्शन देख कर गोली निकाली
आहट पा कर माँ ने आँखें खोलीं ,'ले आया ,मुन्ना तू ?'
'हाँ, लाया हूँ न ' मैंने गोली आगे बढ़ाई ,वे तो कुछ और देख रही थीं हाथ नहीं बढ़ाया ,'
 'माँ तुम्हारे लिए ..'

'मुझे लगा  सपने में हूँ  ,पर तू सच में लाया है . आज  खुश कर दिया तूने ... '
उनका चेहरे पर चमक  आ गई थी.

'अरे, पानी के बिना दवा कैसे लेंगी ,' गिलास पकड़े सुमति चलीआ रही थी.

'मुन्ना, तू भी ऐसा ही है किसी को बताया तक नहीं ,'देखती रहीं फिर बोलीं ,'अच्छी है ,पढ़ी-लिखी तो होगी ही.'
पता नहीं माँ कैसी गफ़लत में हैं -बुख़ार चढ़-उतर रहा है.
बोल रहीं थीं-'कैसे  सादे कपड़ों में घूम रही है ..मैंने वसु के साथ ही गोटे की साड़ी बनवा ली थी .वही निकाल दे .अरे ,लगे तो नई नई है ...
.. मुझे तो कोई कुछ बताता ही नहीं .दो दिन से मीता थी घर में उसने भी कुछ नहीं कहा..' फिर सोचती सी बोलीं ,'..शादी कब हुई ?'.
 मैं हड़बड़ा गया मुँह से निकला-
 'हुई कहाँ ?'
' ओ, तो दिखाने लाया है .अच्छी है. बहुत प्यारी .बिलकुल  घर मिलताऊ ..'
वह चकराई-सी वहीं रुक गई - तो ये मुझे कल तक मीता समझती रहीं थीं.
मैंने बढ़ कर ताप अनुभव किया ,'बुखार कम लग रहा है अभी  !"
'हाँ, ठीक से बोल भी रही हैं ..'
'पर इन्हें कुछ कन्फ़्यूज़न हो रहा है ..'
वे कहे जा रहीं थीं ,'मेरी तो आधी बीमारी भाग गई मुन्ना ,तूने खुश कर दिया ! मैं अब ठीक हूँ .'
'आराम करो माँ .दवा खा लो .'
वह रसोई में चली गई.
मैं गया तो चुपचाप खड़ी थी.
'असल में मेरी माँ को कुछ पता-अता है नहीं .उनकी बात का बुरा मत मानियेगा..'
'सो तो मैं भी देख रही हूँ . '
*
(क्रमशः)

 


9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (03-11-2014) को "अपनी मूर्खता पर भी होता है फख्र" (चर्चा मंच-1786) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. किसको किससे कब मिलाना है..यह ऊपर वाला कैसे जुगाड़ कर देता है..पता नहीं सुमति के जीवन में आगे क्या लिखा है पर हमने तो विवाह के लड्डू की प्रतीक्षा करनी शुरू कर दी है..

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    1. अनिता जी ,आपकी टिप्पणी पढ़ कर अग्निपुराण का कथन याद आ गया,
      'अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।
      यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।।'
      कथा साहित्य की रचना -प्रक्रिया सृष्टा होने का अनुभव करा देती है .

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  3. शकुन्तला बहादुर5 नवंबर 2014 को 7:12 pm

    नये नये घटना-चक्रों के सृजन और सम्बन्धों के जुड़ाव में प्रतिभा जी
    का कल्पनाशील उर्वर मस्तिष्क सिद्धहस्त है । कथा का प्रवाह भी तो साथ में अत्यन्त स्वाभाविक गति से बहता चला जाता है । साधुवाद !!

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  4. माँ! आज तो बस तालियाँ बजाने का मन कर रहा है! आपकी स्क्रिप्ट राइटिंग के आगे तो बस सिर झुकाने का मन कर रहा है. कब कौन सा चरित्र सामने आने वाला है और उसकी एण्ट्री कैसे होनी है...!! आज के घटनाक्रम बड़े फास्ट हैं और एक ख़ुशगवार हवा के झोंके की तरह!

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  5. जीवन में कब कौन सी घटना घट जाए यह अंश पढ़ कर लग रहा है । माँ किबीमारी भी शायद खुशियाँ ले कर आये ।

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