गुरुवार, 6 नवंबर 2014

कथांश - 25.

*
सुबह आँगन से आवाज़ दे कर मुझे चाय का कप पकड़ा दिया था सुमति ने .
कोई विशेष बात-चीत नहीं हुई .
दोपहर में मुझे थाली परोस कर दे गई .
एक रोटी और माँगी थी मैंने. सब्ज़ी सिर्फ़ आलू की थी ,माँ का सारा काम सँभाले है और क्या करती .यही बहुत है .
सुमति रसोई से बाहर चली गई थी .मुझे लगा खाना नहीं खाया है .
'आपने खाना नहीं खाया ?
वह एकदम चौंक गई
,'खाना ..हाँ खा लूँगी .'
ऊपर कपड़े सुखाने गई थी वह ,माँ की दवा के लिए गिलास लेने गया .
रसोई में बर्तन खाली पड़े थे.रोटी का डब्बा  मँजने के लिए  रखा था .सब्ज़ी की कढ़ाई कटोरे भी .
'अरे ये क्या ! खाने को कुछ है ही कहाँ?'
इधर-उधर  ताक-झाँक करने लगा -
 आटे के डब्बे में मुट्ठी भर आटा ,और दो छोटे-छोटे आलू सब्ज़ी की टोकरी में .
 हद है ,  अपने आप  भूखी रही ,मुझे खिला दिया .
वो सीढ़ियाँ उतर रही थी ,'आपने खाना नहीं खाया ?'
'खाऊँगी थोड़ी देर में ..अभी भूख नहीं है. '
' क्या खायेंगी, वहाँ कुछ है भी? माँ बीमार पड़ी हैं,कौन लाता घर का सामान? मुझे खिला दिया आपने और ... कल भी लगता है यही किया .,मुझे बताया भी नहीं ..!'

उधर से कोई उत्तर नहीं.
'मैं भी कैसा बेवकूफ़ हूँ ,मेहमान का ध्यान नहीं रखा ..'
'मान न मान मैं तेरा मेहमान ..सिर पड़ गई  हूँ  मैं तो.. .'

 'प्लीज़ ऐसा न कहें आप ही तो सब कर रही हैं ,माँ की देख-भाल घर के सारे काम..मैं तो बाहरी जैसा होगया  ..' 
वह फिर भी चुप रही.
'आप जरा लिस्ट बना दीजिए  बाज़ार से क्या-क्या सामान आना है ..'
'मैं ?मैं बना दूँ .'
'प्लीज़ ,मैं तो यहाँ रहता नहीं .कभी हफ़्ते-दो हफ़्ते में एकाध दिन को आता हूँ ,वैसे भी सब माँ करती रहीं या वसु ,मुझे कोई अंदाज़ नहीं ...'
कुछ न कहने का मतलब 'हाँ' ही समझा जाता है .

बाद में लिस्ट पकड़ा दी थी सुमति ने-
चीनी -चाय,आटा चावल अरे, सब कुछ आना है .कुछ था ही नहीं ..कैसे चलाया होगा तीन दिन !'
फिर उसने कहा-
'सुनिये, अब मुझे भी जाना है आप सँभालिये यहाँ  ..'
'और माँ को ..?पारमिता  तो आप को सौंप गई हैं ..'
'तब आप नहीं थे .'
'पर इतना सब मैं कैसे..करूँगा  .और आप कहाँ जायेंगी ?'
'चली जाऊंगी ,माँ -बाप तो हैं न ..'
'फिर वे जीजा से शादी करने का... .'
'देखी जायगी ..'
मुझे पता था नौकरी है नहीं ऊपर से वे लोग पीछे पड़े हैं जीजा से शादी कर लो.'
'आप साफ़-साफ़ क्यों नहीं कह देतीं ?"
'क्या साफ़ कह दूँ ?जितना कह सकती थी कहा. ,पर वे लोग ज़िन्दगी भर मुझे सिर पर बैठाये रखेंगे.?पढ़ लिख कर और मूंग दली है उनकी छाती पर ..'
'तो फिर  आप उनसे ..'
'मैं करूँगी या नहीं ,आप क्यों परेशान है .मेरी अपनी बात है ..'
 इसी ने पारमिता से कहा था ,ऐसे आदमी के साथ घुट-घुट कर मरने से अच्छा एक बार सुसाइड कर ले.मैंने चट् कह दिया 
'अरे वाह ,यहाँ से जाकर सुसाइड किया तो फँसेंगे तो हम! .पुलिस इन्क्वायरी और जाने क्या-क्या...नहीं..नहीं ,.. मैं नहीं जाने दूँगा ऐसे .'
'जाने कैसे नहीं देगें ?.

'ठीक है. तो मैं भी चलता हूँ साथ .आप उन से नहीं कहेंगी तो मुझे कुछ कहना है उनसे
'क्या कहना है ?
'जो कहना है खुद बात कर लूँगा .'
 'नहीं, फ़ालतू में किसी को बीच में नहीं डालना है मुझे.'
'तो  मैं चला जाता हूँ ,यहाँ  आप आप सँभाल लीजिये ..'
'अरे वाह,ये अच्छी रही',
फिर बोली -
' आप भला  क्या कहेंगे,  सुनेगा कौन वहाँ आपकी ..?'
मुझे हँसी आ गई ,' खूब सुनेंगे मेरी बात , मैं लड़का हूँ न !आप नहीं जानतीं मुझे ....'
पता नहीं कब से खाना भी नहीं खाया होगा, मुझे खिला दिया ऊपर से मैंने सुना  दिया ' मैं लड़का हूँ.'

और चिढ़ कर बोल गई ,' हुँह ,लड़के ?  हाँ, समाज के विधायक तो वही हैं .सारा कर्मकांड, लड़कियों के मत्थे ठोंक ,हाथ झाड़ कर चल देते हैं.' 
मैं चुप रह गया .
वैसे माँ की सेवा खूब कर रही है . देखा था कुर्सी पर बैठे-बैठे  सो गई .
पर उससे क्या कहूँ लिस्ट ले कर बाज़ार निकल  गया .
*
 लौट कर देखा वसु तनय के साथ आई है . मीता से माँ की बीमारी का सुन रुक नहीं पाई .
'अरे भैया तुम यहीं हो ! अच्छा हुआ मैं राखी यहीं ले आई.'
 जब राखी बँधवाने जा रहा था  ट्रेन का एक्सीडेन्ट हो गया था 12 घंटे लेट.. तब जा ही  नहीं पाया .
वह कह रही थी,'मुझे तो रोना आ गया  उस दिन ,फिर  अम्माँ ने कहा भगवान को धन्यवाद दो  तुम्हारे भाई कुशल से हैं , राखी यहीं मंस कर रख लो जब  मिलें बाँध देना ..'
'तनय कहाँ हैं?'
' दीदी के घर गए हैं बाबूजी से मिलने .'
अपने बैग में से एक पैकेट निकाला उसने एक नारियल-गरी का गोला ,उस पर तिलक किया हुआ ...'
'ये क्या ?'
  तब इस पर तिलक किया था  भइया के नाम का ...वैसे आज भी करूँगी...'
सुमति खड़ी हँस रही है , पहली बार उसे यों देखा -  कितना कम हँसती है,कह रही थी 'ये अच्छा !भाई का माथा नहीं तो   टीका गोले पर कर लिया . अच्छा उपाय !'
' और आप क्या करती हैं ?'
'भाई नहीं है मेरे ,' वह उदास हो गई . 
माँ जैसे सोते से जागी हों,
'अब  मेरे सामने बाँध दे राखी वसु ,अभी -अभी  राखी बीती है.'
' तो फिर पूरी विधि से बाँधूँगी .'
कुछ लेने रसोई में गई ,खाली थाली लिए चली आई
'वहाँ आटा चावल कुछ नहीं, आप कैसे क्या करती हैं ..'
'मेरा पेट भरती रहीं ये,  ख़ुद अनखाये रह कर ...आज तो बिलकुल ..'
अचानक बीच में टोक दिया गया ,तीखी आँखों देखते उसका हाथ हिला ,जैसे बरज रही हो, 'ऐसा कुछ नहीं ..'
मैं विस्मित देखता रह गया.
'ये सब सामान आ गया है अब .' और कहता भी क्या?
वसु ने बाकायदा ज़मीन पोंछ कर चौक पूरा ,कलश भर लाई ,बड़ा-सा पटा रख दिया
'लो भैया बैठो.. .'
'पैंट पहने हूँ इस पर नहीं बैठ पाऊँगा.'
'चल खड़े-खड़े बाँध दे ' माँ इन सब मामलों में बिलकुल रिजिड नहीं हैं.
मैं पटे के आगे खड़ा हो गया
'तू अकेला ?भाई-भाभी जोड़े से राखी बाँधते हैं अपने  यहाँ तो  .'
 सब चौंक कर माँ का मुँह देख रहे हैं .
'रिवाज़ तो यही है हमारे वहाँ भी ' वसु धीमे-धीमे हँस रही है.
 क्या करता ,माँ से कुछ कहते नहीं बना. हाथ पकड़ कर ..सुमति को साइड में खड़ा कर लिया.
वह झिझकी ,पर चुपचाप वैसी ही खड़ी रही ,बस पल्ला खींच कर सिर ढँक लिया था.
 इतने में तनय आ गया ,'अरे, यहाँ तो अच्छा-खासा ड्रामा चल रहा है ,वसु ,रुको ज़रा, ...अपना कैमरा ले आऊँ .'
वसु खुशी के मारे 'अरे एक राखी और लाती हूँ , ' कह कर अंदर दौड़ गई ,'

वसु को आगाह कर दूँ ,सो उसके पीछे-पीछे चला गया.
रेशम की डोरी निकाल रही थी वह ,' देखो वसु ,सीरियसली मत लेना ,माँ के कारण करना पड़ रहा है.'
,'भइया ...अपना काम निकाल कर हाथ झाड़ लोगे? वह भी हम लोगों जैसी है ,और  इस समय बहुत बेबस .' .
कहते-कहते उसकी मुद्रा  रुबासी हो आई थी.
अपने पर बड़ी शर्मिन्दगी लगी ,'ऐसा कैसे सोच लिया तूने .?.' कहते-कहते अपना ही स्वर कमज़ोर  लगने लगा था .
मैं, फ़ौरन जहाँ से आया था जा कर वहाँ वैसा ही  खड़ा हो गया.
'भइया, आप भी न..,'अपना रूमाल निकाल कर  तनय ने मेरा  सिर ओढ़ा दिया '
'तुझ से तो वो समझदार है ,' सिर ढँके सुमति को देख ,माँ का कमेंट आया था ,'सब लापरवाह हैं बकसे में से अच्छी साड़ी निकाल कर इसे काहे नहीं पहना दी ?'

देने के लिए और कुछ तो था नहीं ,मैंने जेब में से रुपये निकाल कर आड़ से उसकी ओर बढ़ाये ,सुमति ने हाथ बढ़ा कर पकड़ लिए ..
(बाद में पता लगा ये भी तनय ने कैमरे में कैद कर लिया).

बहन ने दोनों के भाल पर  रोली-अक्षत का शुभांकन और कलाइयों पर राखी बाँधी. उसने सिर झुकाए हाथ बढ़ा कर  चुपचाप बँधवा ली.
वसु जब हम दोनों पर वार-फेर कर रही थी  उड़ती-सी दृष्टि  सुमति पर गई उसकी आँखें भरी-भरी सी लगीं ..मन जाने कैसा होने लगा.
 उसकी ऐसी माधुर्य से पूर्ण,  सौम्य मुख-मुद्रा पहली ही बार देखी .भीतर   से कचोट - उठी पता नहीं दुनिया में सजह रूप से रहने के अवसर इतने दुर्लभ क्यों हो गए हैं !
पग-पग पर प्रताड़ना झेलती, हमेशा 'तुम लड़की हो' की चेतावनियाँ पाती लड़की को जब अचानक  सहज स्वीकृति और स्नेह सत्कार मिले  तो अंतर के आवेग की उमड़न  कैसे रुके  !
मेरे पकड़ाये रुपये उसने थाली में रख दिये ,तो हम दोनों को देख वसु मुस्करा उठी थी.
विधान संपन्न होने पर उसने वसु के चरणों में झुकना चाहा .
उसे  गले लगाते वसु -धीरे से कान में बोली ,' अभी नहीं.'
आज मेरी समझ में आया बहन छोटी भी मान्य होती है - ठीक ही है.

'वसु, उसमें बिस्किट के पैकेट हैं और कुछ नमकीन मिठाई भी .देखना इनने पता नहीं कब से कुछ खाया नहीं ,मेरा ही पेट भरती रहीं ....' मैंने उसकी ओर देखे बिना कह ही डाला.
 पटाक्षेप में माँ ने कहा था ,,'लेटे-लेटे किसी के पाँव नहीं छूते ,मैं उठ कर बैठ जाऊँ, तब छूना .'
सहारा दे कर बैठाना चाहा पर उनकी  हिम्मत नहीं पड़ रही थी.
*
( क्रमशः)

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (08-11-2014) को "आम की खेती बबूल से" (चर्चा मंच-1791) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सचमुच लडकियों को सहजता से जीने का अधिकार कहाँ मिल पाता है, जिसको बचपन से ही बोझ माना जाये उसे यह अधिकार दिया भी कैसे जाए, अच्छा घर-वर मिलना ही उनके जीवन में सहजता को जन्म देता है...भावपूर्ण कथांश..

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  3. सुखद नाटकीय मोड़ । जीवन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि आपको अच्छे लोग कब , और कहाँ मिलते हैं । कैसे मिलते हैं यह नहीं । अच्छे लोगों का मिलना जख्मों को भर देता है देता है । जिन्दगी एक नए सबेरे में आखें खोलती है । ऐसा होना सचमुच एक नियामत है । कहानी का यह मोड़ काफी आशाजनक और सहज है ।

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  4. माँ... आज तो बस मेरी मुस्कुराहट शुरू से आख़िर तक थमी नहीं! शायद इसलिये कि मैं हमेशा कहानियों को फ़िल्मों के फ़ॉर्म में विज़ुअलाइज़ करता हूँ! और आज तो विलुप्त प्रजाति की फ़िल्मों का पूरा दृश्य सामने रख दिया आपने.
    एक बेहतरीन पटकथा, उतने ही सुन्दर सम्वाद और उतनी ही ख़ूबसूरती से कैरेक्टर्स की एण्ट्री. बीच बीच में हमारी परम्पराओं और रीति-रिवाज़ों की झलक... कुल मिलाकर सिम्प्ली ग्रेट माँ!!!

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    1. यह सोच-सोच कर अच्छा लगता है सलिल, कि तुम शब्दों को दृष्यों में देखते हो ,वर्णन को अनुभव करते हो और चरित्रों(पात्रों)से जुड़ उनकी मनोभूमि तक पहुँच बना कर साक्षात् कर लेते हो - मूर्तिविधायिनी कल्पनाशक्ति और मानवी संवेदनशीलता कमाल की पाई है तुमने . इधर मेरे ही रचे पात्र ,पर अपने मन से चला नहीं सकती . प्लानिंग कुछ और होती है ,पर उनका प्रतिरोध और मुझे करना पड़ता है कुछ और .

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  5. sehmat hoon Salil ji se..maine b ekdum aise hi dekha..padha is waale ansh ko...esp wo drishya jahan maa kee wajah se sab bhayi behan ka joda bana ke rkahi baandh rahe hain. 'Khushbu' film se Gulzar kee Hema Malini wala qirdaar aankhon ke aage aa gaya Sumati ke roop mein..:D
    bade dinon baad padhne se lutf ekdum khatm ho jata hai...magar internet se mohtaaj hoon. :(
    mann me kuch prashn swat: upaj re hain..humesha se mujhe sanshay rehta hai ki kaise ek vyakti se judne ke baad usi sthan per teesre vyakti ki gunjaayish nikal aati hai!! Meeta ka sthan Sumati lene wali hai shayad aage...ghar me aur Brajesh ke hriday me bhi!!!? bhavnayein /rishtey titliyon jaise lagte hain mujhe...zara der bhi mann ke haathon se pakad liya to rang lagna bahut swabhavik hai. aage prateeksha rahegi...maa ke paatr ke liye chintit ho rahi hoon...i wish unhe bahut bahut sara sukh mile Sumati se..BRajesh se..ekdum mann bharr jaaye unka :''-)

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  6. घटना क्रम जीवन को सहज बना सकते हैं बशर्ते हम घटनाओं को सहजता से स्वीकारें । मन को आनंदित करने वाला रहा ये अंश ।

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