सोमवार, 31 दिसंबर 2012

हम चाहते हैं ..



"...I have tried to keep the memory alive.I have tried to fight those who would forget because if we forget we are guilty, we are accomplices...we must take sides-- neutrality helps the opresser , never the victim. Silence encourages the tormenter, never the tormented. Sometimes we must interfere when humans lives are  endangered, when human dignity is in jeopardy, national borders and sensitiveness become irrelevant..."
- Elie Wiesel
( Winner of the Nobel Peace Prize)


त्वरित न्याय की पुकार करते हुये भी मैं नहीं समझ पा रही.कि  हमारा तंत्र  अपने नियम कानून उन जानवरों पर कैसे लागू करेगा (जब अब तक नहीं कर पाया). वह यह  भाषा समझते ही नहीं!. .
और सवाल यह कि अपराध स्वयं सिद्ध है तब औपचारिकताएँ और विलंब काहे को ?
न्याय किसे चाहिये -बर्बर पशुओं को  या  पीड़िता को ?उसे फिर-फिर अंगारों पर क्यों धकेला जाय?न्यायाधीश  की पूछ-ताछ और वकीलों की बहसबाज़ी में यही तो होगा . घृणित अपराध  किया गया खूब समझ-बूझ, कर कोई नादान नहीं थे वे लोग .पीड़िता और उसके घरवाले क्षण-क्षण जो दाह झेलते रहे हैं .उसका तुरंत उपाय होना चाहिये था. 
  जघन्य अपराध  सिद्ध है  .पहले वे पापी  सरे आम चिह्नित हों जिससे ऐसी पीड़िता की दुस्सह मनोवेदना को कुछ तो चैन पड़े . वह अंग काटकर कुत्तों को डाल दें और उसके सिर पर दाग दें कि उसने क्या किया ,उसे सबके सामने एक उदाहरण बना कर जीने दें  .यही एक कारगर. इलाज  ऐसी मनोवृत्तिवालों की समझ में आ सकता है .
सभ्यता का आचरण मानवों के लिये ही विहित हो !
-प्रतिभा सक्सेना.

10 टिप्‍पणियां:

  1. मंगलमय नव वर्ष हो, फैले धवल उजास ।
    आस पूर्ण होवें सभी, बढ़े आत्म-विश्वास ।

    बढ़े आत्म-विश्वास, रास सन तेरह आये ।
    शुभ शुभ हो हर घड़ी, जिन्दगी नित मुस्काये ।

    रविकर की कामना, चतुर्दिक प्रेम हर्ष हो ।
    सुख-शान्ति सौहार्द, मंगलमय नव वर्ष हो ।।

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  2. इस लो को जलाए रखना है -नव-वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ

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  3. प्रभावी लेखनी,
    नव वर्ष मंगलमय हो,
    बधाई !!

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  4. इस अपराध में सजा में देर किस बात पर है यही मेरी समझ से परे है.

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  5. आज पैसी होगी उन आदमखोरों ..देखना है हमारे न्यायाधीश क्या सजा सुनाते है ...आपके सुझाव बेहद सटीक है।

    यहाँ पर आपका इंतजार रहेगा शहरे-हवस

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  6. शकुन्तला बहादुर3 जनवरी 2013 को 2:15 pm

    फाँसी। का दण्ड कारगर नहीं होगा । इन पशुओं के साथ पशुओं जैसा व्यवहार ही किया जाना चाहिए । आजीवन तड़पते हुए शर्मिंदगी और पश्चात्ताप करते जिए जिससे समान मानसिकता
    वाले सावधान रहें और कभी भी ऐसा दुस्साहस। न कर सकें । प्रतिभाजी का सुझाव ठीक है ।

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  7. सही कहा .... भला न्याय में देर क्यों ?

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