मंगलवार, 20 नवंबर 2012

पीला गुलाब - समापन सत्र.

*
10
'एक तो दो-दो लौंडियाँ ,ऐसी चढ़ा के रक्खीं बिलकुल अपने मन की हो रही हैं .ऊपर से अंग्रेजी इस्कूल में दाखिल करवा दीं' - जिठानी की शिकायत पर रुचि समझा देती -
बदलते हुये समय के साथ नहीं चलेंगे अपने बच्चे पिछड़ जायेंगे , दीदी,लड़कियाँ हैं तो क्या. वे भी खुश रहें ,आप  भी  तो यही चाहती होंगी ..'
' हमारे कौन जमापूंजी धरी है .इत्ता चढ़ जायेंगी तो कहाँ लड़का मिलेगा .हम तो इसी में परेशान हैं कि शादी कैसे होयगी .' किरन कहती रही .

कर्नल साहब अपनी बेटियों को किसी से कम नहीं देखना चाहते .होस्टल में रह कर पढती रहीं दोनों .
'और क्या करते दीदी, जहाँ उनकी पोस्टिंग हुई वहाँ ,अच्छे स्कूल नहीं थे ,कैसे साथ रखते बच्चों को !'
'तो क्या  वहाँ की लौंडियाँ पढ़ती नहीं .अरे, पैसे जोड़ते शादी के लिये .'
किरन को  याद आता है कित्ता दबा रखा गया था उसे.
'रुचि ,तुम्हीं अच्छी रहीं ..हम तो गाय थे,जहाँ हाँक दिया चले आये !'
शिब्बू कहते हैं,'  किस्मत सराहो भाभी , ऐसा घर-वर पाने को तरसते हैं लोग .'
' तो  फिर इनने ...कोई अकारन ही तो आई बरात वापस नहीं करता ...? ' इशारा रुचि की ओर
अब, इसका जवाब किसके पास !
 *
पिछली बार जब शिब्बू ,दादा के पास आये थे तब की बात .
इस लड़ाई के कोई आसार नहीं थे तब .यों ही बातें चल रहीं थीं.
अचानक अभिमन्यु कह उठे -
तुम भी बी.ए कर लेतीं किरन तो मुझे संतोष हो जाता .परिस्थितियाँ बदलते देर नहीं लगती .और फिर सेना में होने का मतलब ..'
किरन से रहा नहीं जा रहा ,'मत कहिये, नहीं ,कुछ भी मत कहिये .भगवान ऐसे  दिन न दिखाए .
 सब चुप हैं .
कर्नल सा. कह उठे थे, ' अपनी बेटियों को क़ाबिल बनाना चाहता हूँ ,उन्हें कभी बेबस न होना पड़े ..'
'दादा, तुम बेकार परेशान होते हो .हम लोग भी तो हैं न .'
'अरे शिब्बू ,तुम्हारी  ढंग की कमाई होती तो ..'
'मैं नहीं हूँ क्या ? रुचि बीच में बोल पड़ी,' निश्चिन्त रहिये आप .'
 ' पर  कल को तुम्हारे अपने भी तो  ....'किरन बीच में बोल पड़ी.
 '  हमारे न सही ,लाला तुम्हारे एक लड़का हो जाता .वंश का नाम  तो चलता .'
सात साल में दो बार आस बँधी पर निष्फल चली गई .
'यहाँ  अपना बस कहाँ चलता है, भाभी ."
'अपने अलग नहीं चाहिये हमें. निश्चिंत रहिये  .इनके लिये जो  अरमान हैं दिल में ,ज़रूर पूरे होंगे .'
वे चुप उसका मुँह देख रहे हैं.
'कुछ मत सोचिये ... , मेरे होते इनके सामने कोई बाधा नहीं आयेगी .'वह कहती चली गई ,'जीवन में और चाहे  कुछ न कर सकी होऊँ, पर यहाँ पीछे नहीं हटूंगी.'
आज पहली बार जेठ के सामने रुचि इतना बोल गई .
कर्नल ने उसकी ओर  आँख भर कर देखा था -परितृप्त दृष्टि!
'अपना भी जीवन जीना साथ में, सुरुचि ,बिलकुल अकेली मत पड़ जाना .'.
देवर -भाभी चकित .आज पहली बार दोनों को बोलते सुना .
'और कुछ कहाँ कर सकी , इतना तो संतोष रहे .'
चाय के बर्तन उठा कर चलती रुचि की आँखें भर आईँ थी .
 *
दिन बहुत धीरे-धीरे बीत रहे हैं.
इस साल तो पिछले ग्यारह सालों का रिकॉर्ड टूटा है. बहुत सर्दी पड़ रही है .उड़ाने कैंसिल ,ट्रेने  सब लेट .धुंध के मारे दिखाई नहीं देता . एक्सीडेंट भी तो कितने हुये हैं .
जीवन जड़-सा हो उठा है. क्या करे कोई-
  कैसे-कैसे कुविचार उठते हैं !
निश्चिंत कहाँ रह पाता है मन .
इधर कोई खबर नहीं आ रही .
रेडियो की ख़बरों पर ध्यान लगा रहता है सबका .सीमा पर एक विमान दुश्मन ने गिरा दिया .झटका-सा लगा था सबको
शीत-लहरके कारण स्कूलों में छुट्टी. लड़कियाँ घर आ गई हैं ..
पर्वतों पर हिमपात और कोहरा ,
हेलिकाप़्टर और प्लेन यथास्थान लौट आयें तभी निश्चिंत हो पाते हैं सब.
कभी -कभी पता ही नहीं मिलता .खोजना भी मुश्किल .
अभिमन्यु कहाँ हैं, कैसे हैं, किसी को पता नहीं .
इस कठिन समय में वह  जिठानी के पास बनी है.
*
11.
अचानक एक दिन   सेना की वर्दी में कुछ अधिकारी  उपस्थित हो गये .
सब सन्न !
 क्या हो रहा ह किसी की समझ में नहीं आ रहा .बस यह समझ में आया कि अब बड़के भैया  कभी घर नहीं लौटेंगे .
रंजना-निरंजना सहमी खड़ी हैं ,
'हमारे डैडी..'
'बेटा तुम्हारे डैडी,' ऑफिसर ,'उठ कर उन तक गया ,थपकता हुआ बोला ,'बड़े बहादुर आदमी थे ...देश के लिये बलिदान किया ... उन्होंने ...'
किरन सपाट स्वर में कह उठी 'वे अब कभी नहीं लौटेंगे ..' 
 रो उठी वह,मुख  पर आँचल दबाए ,दुर्वह वैधव्य का  घुटा  हुआ रुदन ,विचित्र सी ध्वनि में उस मौन अशान्ति  को  तोड़  गया . सब के ह़दय  तल तक काँप उठे.  .
लड़कियाँ माँ से आ लिपटीं .
वे लोग बहुत कुछ कहते रहे ,बहुत तारीफ़ करते रहे कर्नल अभिमन्यु की ,पर कुछ भी ,किसी के मन तक नहीं  पहुँच रहा .
यह सबको सुनाई दे गया कि कर्नल अभिमन्यु ,की पार्थिव देह पूरे सैनिक सम्मान के साथ आ रही है .

*
लोग आ-जा रहे हैं .मिलिट्री का बैंड बज रहा है .
गूँज आ- आ कर हृदय से टकराती है . अपना कर्तव्य निभा रही रुचि .

रो-रो कर निढ़ाल हुई जिठानी एक कुर्सी खींच कर बिठा दिया किरन के साथ होकर साध लिया उसने .
दोनो पुत्रियाँ एकदम विमूढ चिपकी खड़ी है.
बहुत लोग आ गये हैं .व्यवस्थायें हो रही  है .
 'अब हम क्या करें ?'
उसके कंधे पर सिर रख निरंजना अचानक रो उठी .
एक व्यक्ति बढ़ आया,
'बेटा ,तुम्हारे पिता मरे नहीं अमर हो गये .घबराना मत मैं हूँ .'
' हम हैं तुम्हारे साथ .,'
सांत्वना देनेवालों की कमी नहीं है .
रुचि ने आगे बड़कर दोनों को गले लगा लिया. वे रोती हुई सिमट आईं,'चाची, अब आप ही अम्माँ को समझाओ .'
वे जानती हैं ,माँ के लिये यह सब कितना भारी पड़ रहा है .

व्याकुल सा भरभराता स्वर फिर उठा,'अब हम कैसे क्या करेंगे?'
'दीदी , हम हैं .बच्चों के लिये आप चिन्ता मत करिये .'
'वो हमारी जिम्मेदारी हैं ,हम करेंगे उनका सब कुछ .' शिब्बू ने साथ दिया.
दोनों अपने से लगाये रुचि कह रही है -
'आज से ये मेरी बेटियाँ .सारी जिम्मेदारी मेरी .दीदी ,अब आप कुछ नहीं कहेंगी इनके लिये!'
*
किरन कह रही है ,'सब चले जायेंगे,सब  भूल जायेंगे ,बस मैं रह जाऊँगी  बेबस अकेली .क्या करूँगी ?कैसे बिताऊँगी ज़िन्दगी ?'
'रास्ता मिलेगा दीदी ,जरूर मिलेगा.'
शिब्बू बेचारे समझ नहीं पा रहे क्या कहें .
'हाँ, और क्या हम लोग हैं ,फिर दादा की पेंशन भी तो  .और हमारी जिम्मेदारी भी .'
'अरे ,आगे की भी सोचनी है ,ऐसे ही थोड़े बैठी रहेंगी ..'
' क्या मतलब ?'
'मतलब,बेकार बैठे दुखी होंगी .,' उनकी ओर घूम कर बोली ,'दीदी ,आप तो शादी के बाद इन्टर कर चुकी हैं ?'
' हाँ ,उनका बहुत मन था मैं आगे पढ़ूँ ,ट्यूशन रखवा दी थी,'
 किरन को अब पछतावा हो रहा  है.

'..कितना अच्छा होता उनकी सुन लेती .कुछ करने लायक हो जाती .वहाँ  तो हमें घर के काम में लगा देती थीं मामी .अम्माँ हमारी बेबस थीं .टीचरें हमसे हमेसा खुश रहीं पर हमें पढ़ाता कौन ! फिर बाद में तो मेरा मन नहीं लगता था पढ़ने में.'
'  अब ..किसके सिर पड़ूँ  .  पहाड़ सी ज़िन्दगी कैसे कटेगी  ? कहीं लग जाऊं . ढंग का काम कौन देगा मिुझे किसी प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने का न सही पानी पिलाने का और ऊपर का काम ही सही ..'
'कैसी बातें करती हैं दीदी ,चलिये मेरे साथ बी.ए का फ़ार्म भरिये .दो साल में बी.ए. '
' कुछ कर पाऊंगी क्या ?'
'हो गया सो हो गया , आप में कोई कमी थोड़े न.तब  ध्यान नहीं दिया अब तो कर सकती हैं  .खूब कर सकती हैं अगर चाहें तो .'
चुपचाप सोच रही है किरन .
'अब इत्ती उमर में?सब हँसेंगे हमारे ऊपर  .'
' तो क्या ..?पता है हमारे यहाँ एक पचास साल से ऊपर की महिला ने एडमिशन लिया .किसी की परवाह नहीं की ,और पता है ,सबसे अच्छे नंबर उसी के आये .
हम लोगों ने खूब तारीफ़ की उसे हिम्मत दी . वो हमारे यहाँ लाइब्रेरी में है अब.'
*
अभि के व्यक्तिगत सामान का बड़ा-सा बंडल आया है .
रुचि पर सारी जुम्मेदारी आ पड़ी है .
 खोल कर देख रही है .
 ड्रेस ,मेडल ,रोज़ के उपयोग का सामान .
देखती रही आँखें धुँधला आईँ .
एक लिफ़ाफें में बड़ा सहेज कर रखा हुआ कुछ!
क्या है यह ?
रुचि खोल कर देखती है .
एक रुमाल में लपेटा हुआ पीला गुलाब - सूख गया था पर आकार लिये था .
 .दोनो हाथों में रूमाल सामने किये  रुचि देखे जा रही है .
बीती हुई  बातें अंतस् में टीस भरती उभर आईं

'दादा भी एक ही निराले हैं .'शिब्बू ने कहा था. 
बराम्दे में बैठे शेव कर रहे थे, बग़ीचे में माली ,गुलदस्ता बनाने को फूल छाँट रहा था .
'और सब रंग हैं बस एक  कमी - पीले गुलाब की बेल यहाँ बहुत जमेगी '
' नहीं लाला,' भाभी ने चट् जवाब दिया था ,'पीला गुलाब बिलकुल नहीं चलेगा यहाँ  .माली ने चाव से लगाया पर ,तुम्हारे दादा ने हटवा दिया था .'
कर्नल साहब को पीला रंग बिलकुल पसंद नहीं !'
खूब याद है रुचि को .
और आज समेटे खड़ी है वही फीकी पड़ गई पीली पंखुरियाँ !
हथेली में भर लेती है नाक के पास लाकर वास  लेती है .बहुत मंद-सी गंध-शेष . यही है क्या - बहकी हुई प्रीत की महक !
 उस प्रथम परिचय की भेंट , अनायास जुड़े  प्रेम-बंधन की स्मृति ,नये जुड़े संबंध का साक्षी वह पीला गुलाब ,जिसे उन नेह भरे हाथों ने उसके केशों में टाँक दिया था.
उस सज्जा में सबके सामने कैसे जाती ?
 बगीचे से लौटती बार उसने  खींच कर  निकाला ,अभि ने तुरंत हाथ बढ़ा कर थाम लिया था.
डंण्डी पकड़े नचाते हुये सबके सामने कहा था उसने  ,'आपके बग़ीचे के ये पीले गुलाब बहुत दिलकश  हैं , लिये जा रहा हूँ एक  .'
उसी  फूल के अवशेष देखे जा रही है रुचि ..
 'क्या है इसमें?' शिब्बू आ कर खड़े हो गये थे.
' पूजा के फूल लग रहे हैं, कहीं का प्रसाद, उन्हीं के सामान में  रक्खे दे रही हूँ ..'
बिखरी  पंखुरियाँ उसी रुमाल में सहेज दीं उसने .
अभि ,तुम नहीं हो , अब तुम मेरे जेठ भी नहीं हो .उस संबंध से मुक्त हो .पर मैं बँधी हूँ वचन की डोर में ,दो-दो  वचनों की डोर .मैं दोनो ओर से बँधी हूँ .
एक बार की चूक  का परिताप सदा को पल्ले से बँध जाता है .
गालों पर बह आए आँसू पोंछ लेती है वह.
 जो करणीय है वही करूँगी- राह बहुत बाकी है अभी !
(समाप्त)
*

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ।

    लगातार पढ़ता रहा हूँ-

    मार्मिक-हकीकत

    पैरों पर होना खड़े, सीखो सखी जरुर ।

    आये जब आपात तो, होना मत मजबूर ।

    होना मत मजबूर, सिसकियाँ नहीं सहारा ।

    कन्धा क्यूँकर खोज, सँभालो जीवन-धारा ।

    समय हुआ विपरीत, भरोसा क्यूँ गैरों पर ?

    खुद से लिखिए जीत, खड़े अपने पैरों पर ।।

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  2. मन को छूती कहानी ..... रुचि को कम से कम किसी रूप में तो प्रेम की अभिव्यक्ति मिली .... सभी रिश्तों का सुंदर समंजस्य मिला इस कहानी में .... शिक्षा कितनी ज़रूरी है लड़कियों के लिए .... यह संदेश भी दे रही है कहानी ... बहुत सुंदर ।

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  3. एक परिपक्व सोच को दर्शाती सशक्त कहानी भावना से बडा कर्तव्य होता है

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  5. बहुत उम्दा रचना मन को छु गयी |
    आशा

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  6. जीवन सच में कितना अनिश्चित है। अंत की सकारात्मकता विशेष रूप से आँखों में ख़ुशी की नमी ले आती है।मैंने बिल्कुल ऐसा अंत नहीं सोचा था।भविष्य की तरह किसी कहानी का समापन भी संभावनाओं पर बुनता है पाठक।मैं भी यही कर रही थी मगर नकारात्मक होकर।भूल ही गयी थी कि संयत रहकर विपरीत परिस्थितियों में भी उचित निर्णय लिए जा सकते हैं।
    पता नहीं क्यूँ आरम्भ में मन नहीं जोड़ पाई थी इस श्रृंखला के साथ प्रतिभा जी :(..और तटस्थ भाव से पढ़ती रही थी।इसी वजह से साथ-साथ कह नहीं पायी कुछ...वास्तव में समझ ही नहीं पाती थी कि क्या कहूँ :(..क्षमा
    कीजियेगा... पर अंत की दोनों post दिल को छू गयीं।कारण केवल रूचि का स्नेह और व्यवहार था।गुलाब पर दिया गया उसका उत्तर मुझे आकर्षित करता है। दो परिवारों को एक घर में बाँध के रखने वाली और संवेदनशील रिश्तों को सहेज के संभाल के रखने वाली रूचि सहज रूप से हृदय में स्थान बना ही लेती है।अपनी अपनी जगह प्रत्येक पात्र ही प्रभावित करता है।छोटी छोटी बातें हों,भाषा का सौन्दर्य हो या स्त्री मन के सूक्ष्म मनोभाव ..मेरे लिए सब कुछ पूर्ण है।
    कहानी का समापन पता नहीं क्यूँ मुझे चौंका गया।ज़िन्दगी से जोड़ कर देखूँ तो सीखती हूँ कि जीवन में जो भी अप्रत्याशित घटित होता हो ...ज़रूरी नहीं कि वो दु:खद ही हो।बशर्ते उसका खुशनुमा पहलू समझने के लिए हमारा दिल बड़ा और पूर्वग्रहों से ग्रस्त न हो।मेरा पाठक मन संतुष्ट हुआ प्रतिभा जी।समापन के समय जागी हुईं आशाएँ मन को किसी भी तरह की अनहोनी पालने नहीं देतीं।
    यहाँ आपकी एक और कहानी ''क़र्ज़ '' याद आ गयी ..वहाँ भी मैंने यही सोचा और कहा था...एक स्त्री को भी घर चलाने वाले सदस्य के विकल्प के तौर पर सदैव स्वयं को तैयार रखना ही चाहिए।(कहानी का नाम अभी खोज के लिखा.:(..)
    बहरहाल बहुत आभार पीले गुलाब के लिए! :)

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  7. वाह शमाजी कितनी ह्रदयस्पर्शी कहानी है । पीछे जाकर पिछला भी पढूंगी । कभी लिखना बंद करने की सोचिये भी मत ।

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  8. marmsparshi...first half ke bad bhasha badal gaee..shuru ki panktiyan blogvani par padh kar maine ise chod diya tha ...mmagar aaj padha to kahani bahut achchi lagi...

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  9. बहुत ही मार्मिक ह्रदय स्पर्शी कहानी है इसके पहले अंक भी पढूंगी हार्दिक बधाई प्रतिभा जी

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  10. गुलाब आखिर विवरण हो ही गया यही हासिल है फौजी की ज़िन्दगी का -

    वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा ..

    और पहाड़ सी ज़िन्दगी भी विरदन से गुजरेगी रास्ता खोजेगी .बढिया भाव प्रधान प्रस्तुति .

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  11. is kahani ki doosri kist me hi maine comment diya tha ki kuchh jakhm aise hote hain jo jindgi bhar nahi bharte...aaj fark itna hai ki vo jakhm nahi ek tees hai jo sach ho gayi....aur aaj abhi k n rahne k baad ruchi ko aur adhik mehsoos ho rahi hai. bahut sundarta se, sookshamta se nari man ki, jindgi ki roj-marra ki ghatanao ka baariki se sashakt chitran hai.

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  12. शकुन्तला बहादुर6 दिसंबर 2012 को 12:03 am

    संगीता स्वरूप जी ने मेरे मन की बातें कह दी हैं। उन्हें दोहराऊँगी नहीं । संबंधों और चरित्रों के निर्वाह
    में लेखिका की अपनी विशिष्टता है । इस मर्मस्पर्शी कथा को अंत में प्राप्त सूखे पीले गुलाब ने और
    भी अधिक मार्मिक बना दिया है । यह सूत्र जितनी सहजता से जुड़ा है , उतना ही गहराई से मन पर
    छा जाता है और पाठक देर तक कथा में डूबा सा रह जाता है । अत्यन्त सशक्त ,प्रभावी एवं अद्भुत
    प्रस्तुति के लिये हार्दिक -बधाई !!!

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