मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी - 35.& 36.


35
*
सुभद्रा का पुत्र ,कृष्ण का भागिनेय - अभिमन्यु !
रह-रह कर पार्थ का हृदय  तड़प उठता है, उन सात महारथियों ने कैसे  घेर कर मारा होगा अभिमन्यु को !
सोच-सोच कर विकल हैं अर्जुन .वह जघन्य कृत्य अंतर में शूल सा चुभा है .पीड़ा अधिक या क्रोध -विचलित हैं पार्थ !
दो-दो प्रतापी पुत्र युद्ध की भेंट चढ़ गये -पहले इरावान, उलूपी की एकमात्र संतान ,और आज अभि !
शोक-मग्न चारों भाई धीर बँधाना चाहते हैं ,पर जो मन को कुछ शान्त कर सकें वे शब्द  कहाँ से लायें  !
व्याकुल अर्जुन बार-बार स्मरण करते ,बोलने लगते हैं -
'भीम भैया ने कहा था उस अंतिम द्वार को मैं अपनी गदा से तोड़ दूँगा पुत्र, तू निचिंत रह .आचार्य द्रोण ने उसके लिये पहले ही कह दिया था जब तक इस बालक के करों में धनुष-बाण हैं कोई उससे जीत नहीं सकता ,..'
'उन सात महारथियों ने अनीति और अन्यायपूर्वक  उसे अकेला पा कर घेर लिया  .उनकी छलभरी चाल से  जूझता रहा मेरा पराक्रमी पुत्र.उस धूर्त जयद्रथ ने किसी पांडव को टूटे व्यूहमें घुसने नहीं दिया .अकेला पड़ गया था वह. और सारी रीति-नीति -औचित्य  को भुला वे इकट्ठे उस बालक पर टूट पड़े .वह निहत्था हो गया ,रथ से नीचे गिर गया तब भी वे वार करते रहे .मेरा वीर पुत्र रथ के टूटे पहिये से अंत तक लोहा लेता रहा पर....ओह. ..विद्या और पराक्रम में वह सबसे बढ़ कर था... .अंतिम  क्षण तक ....' .अर्जुन का कंठावरोध हो  आया .
आवेश में आ कर खड़े हो गये पार्थ ,'उस पापी जयद्रथ का वध कल सूर्यास्त तक नहीं कर दिया तो मैं स्वयं को चिताग्नि में भस्म कर डालूँगा !'
पाँचाली अवाक् ,चारों भाई हतप्रभ ,'अरे यह क्या किया ?'
'बस, अब कल यही होना है .'.भाइयों की सांत्वना काम नहीं कर रही , पितृ-हृदय की वेदना  किसी प्रकार शान्त नहीं होती.
आर्द्र-नयन पांचाली पास आ बैठी .
अब सँभाल लेगी ,चारों बंधु इधर-उधर हो गये .
बार-बार ध्यान आ रहा है -
वह चक्र-व्यूह के छः द्वार तोड़ चुका था . हाँ, सातवाँ द्वार तोड़ना उसे नहीं आता था ,'ओ,सुभद्रे तुम क्यों सो गईँ ?वही नींद मेरे अभि का काल बन गई ...'
'समझ रही हूँ मैं ,.'याज्ञसेनी बोली,'  हमारा पुत्र कोई साधारण बालक नहीं था .
कर्ण ,दुर्योधन, शल्य, अश्वत्थामा,शकुनि दुर्योधन सब उससे परास्त हुये थे.प्रतिशोध की अंधी आग में जल रहे थे वे ...'
'ओह, कैसा कारुणिक अंत..वधू उत्तरा गर्भवती और ....' अर्जुन फफक पड़े .
पति का हाथ पकड़ लिया पांचाली ने .बार-बार भर आये अपने नयन पोंछ लेती है .
*

'अभि..की.- एक बात पार्थ ,मैंने तुम्हें नहीं बताई थी...' ,
'हाँ,हाँ ,क्या? कहो पांचाली ,' विह्वल से बोल उठे ,'क्या बात ..?'
'वासुदेव का भागिनेय तुम्हारा अंश.उसके जन्म की बात ...मैं बता नहीं सकी थी ..चाह कर भी अब तक नहीं कह सकी ..'
'क्या .कहो तो ...'
' सब देवों ने अपने पुत्रों के अवतार रूप में अभिमन्यु को धरती पर भेजा था .तब चन्द्रदेव ने कहा वे अपने पुत्र का वियोग अधिक सहन नहीं कर सकते .अतः वह मानव- योनि में 16 वर्ष पर्यंत ही रह सकेगा.'
दोनों चुप !
'और उसके उतने जीवन का अधिकांश भी  ननिहाल में बीता !'
'वही क्यों ,हमारी सारी संतानें !केवल जन्म देने की दोषी हूँ मैं तो , लालन-पालन किसने किया ?सुभद्रा ने ...अभि के साथ शिक्षा-दीक्षा  वहीं ननिहाल में हुई .यहाँ वनवास में क्या होता .उनके पालनहार कृष्ण रहे .उधर इरावान और बभ्रु .अपने ननिहालों में ..'
'ओह, अपनी संतानों को भी समुचित संरक्षण न दे सका कैसा अभागा ..'
'चुप.चुप .अभागे तुम नहीं ,अपनी ही दुर्बलता से बनाई गई परिस्थितियाँ  हैं ये ...तुम्हारा किया  नहीं ...'
लंबी सांस खींची द्रौपदी ने .
' अपनी सपत्नियों की ऋणी हूँ .मेरे पति, और पुत्रों को भी उन्होंने अपना दायित्व बना लिया ...'
अर्जुन ने स्वीकारा ,'हाँ उनके बिना क्या होता, हमारी अगली पीढ़ी का ? उन सबकी तो योजना यही थी कि हम सब वनों में पड़े रहें .'
पति के मन का आवेग बाहर निकलवाना चाहती है वह ,'हां ,पार्थ,अपनी सुभद्रा ,हमारे पुत्रों को उसी ने तेरह वर्षों तक स्नेह संरक्षण दिया -बाल्यावस्था से युवा हो जाने तक .
सखा कृष्ण की भगिनी  -उन्हीं के अनुरूप निस्स्वार्थ ,स्नेहमयी , हम सुभद्रा के ही नहीं उस पूरे परिवार के ऋणी हो गये,जहाँ हमारी संतानों को ठौर मिला .समुचित शिक्षा-दीक्षा से संपन्न किया ,भ्राता अभि ने उन्हे पग-पग पर संरक्षण दिया .
और आज हमारा दुर्भाग्य ...मैं नौ पुत्रों की माता थी .वीर घटोत्कच ने बंधु-वध सुन कौरव सेना में प्रलय मचा दिया था . दो को खोने का महादुख है .,..पर गर्व भी ...
सचमुच धनंजय, मेरी सपत्नियाँ मेरा सहारा रहीं  .मेरी अकेली के बस का कहाँ था तुम्हें सँभाले रखना ..'
' किसे सुखी रखा मैंने , क्या दे सका किसी को ?उलूपी, चित्रा दोनों एकाकी जीवन बितातीं रहीं ...और तुम्हें आजीवन विभाजित रहने का  का संताप !'
उसके नेत्र झुक गये , ' शिकायत नहीं कर रही फिर भी .तुम्हारे लिये  जितना चाहती हूँ नहीं कर सकती .'
'समझता हूँ  ..कह नहीं सकता प्रतिबंध है मेरे ऊपर, पांचाली ,अपने ढंग से नहीं जी सकता मैं ! '
' कोई तो समझता है ,यही बहुत है  मेरे लिये .'
'तुम्हें पुत्र-वध का बदला चुकाना है ,हताश हो कर मनोबल हत न होने दो .'
बातों-बातों में द्रौपदी ने अर्जुन के सम्मुख धीरे से पक्वान्न और पेय प्रस्तुत कर वार्तालाप के क्रम में ही उदरस्थ करा दिया .
'अपना प्रण पूरने के लिये ,दुख सहन करने के लिये, शरीर की  सामर्थ्य होना भी आवश्यक है ! '
***
 इरावान की मृत्यु पर भी व्याकुल हुये थे अर्जुन .पर आज उनकी पीड़ा सारे बाँध तोड़ बह निकली थी .
पाँच ही दिन तो हुये , राक्षस अलंबुश ने उलूपी-पुत्र का वध कर दिया था .
पुत्र-शोक के पहले अनुभव ने  उन्हें झकझोर दिया था.
युधिष्ठिर धैर्य देने का प्रयत्न कर रहे थे ,पार्थ के कान कुछ नहीं सुन रहे थे .भीम ,नकुल-सहदेव क्या कहें, क्या करें .हत्बुद्ध हो अपने आपको दोष देने लगते थे .
पार्थ चुप हो गये थे बिलकुल !

*36

उस दिन भी भाइयों के जाने के बाद पांचाली ही सँभाले रही थी.
सबसे बड़ी चिन्ता थी '  कैसा लग रहा  होगा उलूपी को !सांत्वना  देने भी नहीं जा सकता ..'
पांचाली  समझ रही है -उलूपी के प्रति अपराध-बोध जाग उठा है .
'इरावान , चंद्र-वंश और नागवंश का विलक्षण संयोग था उसमें. माँ हूँ मैं भी उसकी.'
शोक-ग्रस्त पत्नी का मुख कृतज्ञता से देख रहे हैं पार्थ !
अब तक कभी सपत्नियों के विषय में विस्तार से नहीं पूछा ,पर आज  वह सब कुछ कहलवा लेना चाहती है .चाहती है वे मन खोल कर अपनी बात कहें  .
उलूपी के साथ बीते पलों की स्मृति ताज़ा कराना चाहती है.कुछ तो आवेग शान्त हो मन का !
' सदा उत्सुकता रही थी जानने की कि कैसे तुम्हारा नाग-कन्या से मिलन हुआ ? वह तो ऐरावत वंश के कौरव्य नाग की अनुपम सुन्दरी पुत्री थी?तुम्हें कैसे हृदय समर्पित कर बैठी?'
विगत के पृष्ठ खुलने लगे -
'हाँ , उसका पिता कौरव्य , तक्षक नाग के अधीन था , वह कभी उलूपी को मुझ से  विवाह की सहमति नहीं देता. उलूपी यह समझती थी.
  पिता का विरोध जानते हुये भी उसने मुझे ,पाताल लोक ले जा कर  विवाह रचा लिया . ....और उस मानिनी ने कभी साथ रहने का आग्रह नहीं किया .अनुमान था उसे  पिता  किसी प्रकार  अनुमति नहीं देंगे .पांचाली ,काश ,अपने बाहु-बल से उसे ला सका होता .'
'स्वयं को दोष मत दो प्रिय, समय अनुकूल होता तब न !
हम लोग स्वयं ही वनवासी ,अज्ञातवासी रहे ....सोच भी कैसे सकते थे ,फिर तुरंत युद्ध की हलचल .. '
'सच में तो तुम गये ही थे शस्त्र और सहयोग की प्राप्ति हित .तुम्हारा यह बारह वर्ष का तप था.'
'फिर भी उसके साथ अन्याय हुआ ,उसका पहला विवाह निष्फल रहा था . पति की गरुड़ों ने हत्या कर दी थी.युवावस्था में एकाकिनी .और  फिर मेरे साथ  भी... कहाँ रह सकी ! '
'ओह,तो क्या कभी दाम्पत्य सुख न पा सकी उलूपी !' द्रौपदी करुणा से द्रवित .
आज सब कुछ पूछ लेगी ! पार्थ के मन की गहराइयों में दबी स्मृतियों को
उभारे बिना आवेग शान्त नहीं होगा .
कैसे मिलन हुआ था.उससे ,तुम तो तीर्थाटन पर थे ?'
 ' मैं तीर्थाटन करता हुआ गंगासागर पहुँचा था ,विश्रान्त ,अकेला ,इतना थकित-विभ्रमित कि गंगासागर तक पहुँच कर कहाँ बैठ गया या निद्रालीन हो गया मुझे कुछ सुध नहीं .
उस  अवसन्न स्थिति से उसने उबारा .
जब चेतना सजग हुई तो पाया किसी अद्भुत , विलक्षण सौंदर्य से युक्त, निराले सुख-सुविधापूर्ण कक्ष में पर्यंक पर .चारों ओर विलक्षण शान्ति ,संगीत लहरियाँ ,कैसे दृष्य और रंग जो कभी इस धरती पर नहीं देखे .चकित विस्मित मैं .तभी उसे देखा .वह सब कहने का विषय नहीं .नहीं ,नहीं व्यक्त कर पाऊंगा ,पांचाली ...'
उसने कहा ,'मैं तुम्हें यहाँ लाई हूँ ,वहाँ मगर-मच्छों ,या वन्य-पशुओं के ग्रास बन जाते ,या ..किसी वनचरी , निशाचरी ..को भा गये तो... '
पांचाली मुस्कराई  ,'भा तो तुम उसे गये थे .'
'बहुत मादक सौंदर्य था उसका .इतने दिन तपोवनों- पर्वतों की धूल फाँकने बाद ,विश्राम मिला था .मैं मुग्ध देखता ही रह गया .'
'बहुत स्वाभाविक है. कोई अपने आप को कितना बाँध कर रखेगा !'
मेरे प्रति प्रेम के कारण उसने सारे विरोध झेले ,मेरे मार्ग की बाधा कभी नहीं बनी  .अपने पिता के विरोध और तक्षक के कोप  को जानते हुये भी मुझसे विवाह किया .जानती थी कहीं से समर्थन नहीं मिलेगा ....कभी नहीं कहा कि वह क्या चाहती है.निस्स्वार्थ   !.अपने लिये कुछ नहीं चाहा..उसने कहा था ' यह मत समझना पार्थ, मैं तुमसे प्रेम का प्रतिदान मांगूँगी . कुछ नहीं चाहती तुमसे मैं ,बस मेरा मान रखना ...नागलोक के कितने वरदान सहज ही उपलब्ध कराये उलूपी ने .कभी भूल सकता हूँ ?'
'मैं प्रसन्न हूँ ,कोई तो है तुम्हारे प्रति पूर्ण समर्पित ..'
'बस अपने से तुलना नहीं, परोक्ष रूप में भी नहीं .मेरे ही कारण ..'
बीच में  बोल बैठी ,'इतना  संतुलन और संयम किसी पुरुष में दुर्लभ है  ,
'भाग्यशाली हो धनंजय .,तुम में  सामर्थ्य है वह सब धारण करने की ,' गहरी सांस लेकर बोली , ' तभी तो तुम्हें  सुलभ हो सका . '
धीर बँधाते बोली ,'तुम्हारे संकट काल में तुम्हारी रक्षा की ,तुम्हारी पत्नी थी ,मेरी भगिनी तो हुई .उस समय वह नहीं होती तो मेरा पार्थ..भटकते-भटकते कहीँ खो न जाता ..'
कुछ देर चुप ही रह गये वे फिर द्रौपदी बोली,
' चित्रा ने वभ्रुबाहन को वहाँ भेजा था , स्वागत के लिये ?
'हाँ वभ्रुवाहन ,मेरा पुत्र.मणिपुर नरेश  का उत्तराधिकारी वभ्रु ,उलूपी ने उसका मातृवत् सत्कार किया  .जननी के रूप मे उसकी जो देख-रेख की चित्रा भी उपकृत हुई .और वभ्रु उसे मातृवत् ..उतना ही मान देता है.'
वार्तालाप के बीच बार-बार  इरावान की चर्चा आती है ,द्रौपदी विह्वल हो उठती है.
आँखों के आँसू रुक नहीं पा रहे .पोंछती हुई कहती है
'नहीं  रोऊँगी , नहीं दुर्बल होने दूँगी तुम्हें .विश्वास करो उलूपी को यहाँ लाना है मुझे वीर-पुत्र की  जननी ..'.
 अंतस का हर भार बँटा लेना चाहती है . हाँ , कुछ भी गोपन न रह जाये !
 देर तक वह पूछती रही ,वह बताते रहे.
 पता नहीं कितनी रात बीत गई.
अंत में  पांचाली ने ही कहा,' कल का संग्राम सम्मुख है .उसका घात करनेवालों को पाठ पढ़ाना है.,अब शयन करो, सव्यसाची .'
*
(क्रमशः)



13 टिप्‍पणियां:

  1. कितना गहन .... हर दृश्य जैसे चित्र के सामान चल रहा हो आँखों के सामने .... अद्भुत लेखन .... आज आपके दो लेख और पढे हैं ... पर टिप्पणी देने में असक्षम रही हूँ ... फिर से पढ़ूँगी वो लेख ... डूबना पड़ता है आपके लिखे को पढ़ने के लिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह!!!!बहुत सुंदर गहन प्रस्तुति,..अद्भुत लेखन ,..

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. har bar apki is shrinkhla ko padhte padhte guru ke se bhar se dab jati hun...kitna gyan pradan kar rahi hai ye shrinkhla...bata nahi sakti.

    kabhi kunti k vivah ka vivran bhi likhe ki unhone pandu se kyu vivah kiya...kya unki bhi koi mazboori thi.

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या-क्या देखा है, उस जननी ने, इस जन्मभूमि ने ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपके लेखन की रोचक शैली चमत्कृत करती है और अपने प्रवाह में बहा ले जाती है !

    उत्तर देंहटाएं
  7. शकुन्तला बहादुर25 अप्रैल 2012 को 11:30 pm

    महाभारत के कथा-सागर में पांचाली और उससे संबद्ध पात्रों के जीवन की घटनाऔं की उठती गिरती लहरों में पाठक का मन भी
    डूबता उतराता रहता है। अनायास ही कथा के दृश्य आँखों के समक्ष
    आ जाते है। इस शृँखला का मार्मिक प्रसंग भी मन पर छा सा जाता है।सदा की भाँति ये शृँखला भी सशक्त एवं प्रभावी है।कथा में अद्भुत प्रवाह है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस रचना के द्वारा आप एक ऐतिहासिक काम कर रही हैं। भाषा का माधुर्य पाठक को बांधे रखता है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. अद्भुत लय है, बहाव है- मुग्ध सा रहता है पाठक जब तक उबरता नहीं, और उबरता है तो फिर से डूबना चाहता है।
    साधु!

    उत्तर देंहटाएं
  10. कई बार अश्रु पौंछे मैंने भी।मन पांचाली से बाहर निकल कर भीष्म पितामह की पीड़ा में डूब गया है।कितना भयानक है मृत्यु शैय्या पर भीष्म पितामह का अंतर्द्वंद।अविनाश से सहमत हूँ..मगर मुझे जो अनुभव होता है...कि इस डूबने उतराने में पीड़ा अधिक है..मौन अधिक है।स्वयं से स्वयं का अनवरत संघर्ष ..जिसका परिणाम केवल शून्य..केवल धर्म और अधर्म के बीच की रेखा।
    ये पहला अंश ऐसा है जिसमे मैं कुछ निश्चित ही नहीं कर पा रही हूँ।अभिमन्यु की मृत्यु का मार्मिक वर्णन, पांचाली की अप्रत्यक्ष रूप से दर्शायी गयी पीड़ा,पिता का बिलखना..कातर होना,भीष्म पितामह जैसे पराक्रमी पुरुष की विवशता.....किस दुःख पर कहूँ किस पर न कहूँ..?..सब के सब किसी न किसी अर्थ में देवों के अंश अथवा कृपा पात्र हैं..किन्तु तब भी सभी अपने अपने दुःख से कितने विचलित ..कितने व्यथित हो रहे हैं।अधर्म का साथ देते हुए एक बार को दुर्योधन और उसके मित्रों सहयोगियों को इस पीड़ा से मुक्त करने का मन कर रहा है..पर अगले ही क्षण सोचने लगती हूँ..कि उनके ह्रदय में भी अपनी तरह के अनेक संताप होंगे बस उनसे मैं अभी परिचित नहीं हूँ। इस तरह का विचार आता है तो 'मीरा चरित' से मीराबाई का कथन याद आने लगता है ''सदैव श्रेष्ठ का,धर्म का चिंतन करना चाहिए..''।
    अंतिम समय कैसे श्वासों ओर हृदय के प्रत्येक स्पंदन से मानस तरंगे उलझ जातीं हैं...बड़ी से बड़ी संतुष्टियों के बीच से रिस रिस कर छोटे से छोटे अपराध/गलत निर्णयों की ग्लानि मन को सालने चलीं आतीं हैं।जितनी व्याकुलता से पांचाली के इस भाग को पढ़ना शुरू किया..उतना ही हृदय और विचलित होता गया..अंत की पंक्तियों ने,पितामह की निद्रा ने मन को आश्वस्त किया।किसी किसी समय निद्रा भी कैसी औषधि सी प्रतीत होती है।समय अपनी गति से भागता रहता है।प्रकृति किसी के लिए नहीं रूकती।
    कितना प्रभावी लेखन है प्रतिभा जी..शब्द शब्द को सच मानकर जीने का मन करता है।पिछली दो तीन पोस्ट से मन पांचाली से अधिक भीष्ममय हुआ जा रहा है :(

    उत्तर देंहटाएं