बुधवार, 4 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी .31 & 32 .



31.
 व्यग्रता  से  पांचाली के पीछे बारादरी में निकल आये थे पितामह.
 जनार्दन को देख विस्मयाभिभूत  से  कुछ  पल  खड़े रह गये . आगे के  घटनाक्रम की भावाकुलता में अभिव्यक्ति का लोभ संवरण न कर सके .
कृष्ण के साथ पांचाली बाहर निकल गई,यंत्र-चालित से वे द्वार तक आ पहुँचे .
प्रहरी द्विधा में .
'विश्राम करें ,पूज्यवर ,'
'हूँ ऊँ ,' वे खोये-से बाहर देख रहे हैं .
पितामह की देह-यष्टि सीधी ,प्रलंब भुजायें ,केशों का रजतवर्ण और स्थिर नेत्र-दृष्टि .अभी भी इतने सबल कि दो योद्धाओं को एक साथ पटक दें .
वे दोनों  आगे मोड़ पर ओझल हो गये  .
पितामह .कुछ क्षण चुप रहे ,फिर बोले ,'बड़ी घुटन है शिविर में ,ज़रा बाहर खुले में भ्रमण करना चाहता हूँ.''
'मैं साथ चल रहा हूँ पूज्यवर ,अंधकार बढ़ रहा है .'
'नहीं तुम  रुको .,मैं यहाँ आस-पास ही हूँ .'
वे निकल गये.
बाहर तारों का मद्धिम उजास .
वे मंद  स्थिर पग धरते बढ़ चले .
युद्धक्षेत्र से हट कर पगडंडी ,आगे दूसरे शिविर की ओट से घूम कर आगे बढ़े .कुछ वार्तालाप की ध्वनियाँ कानों से टकराईं .
मन का कौतूहल जाग उठा .
  वृक्षों की छाँह से भरा  अँधियारा और  सघन हो आया था .युद्ध-भूमि में रात्रि का सुनसान प्रहर .कभी-कभी  किसी घायल के कराहने की ध्वनि पवन के झोंकों के साथ तैर आती थी .
पास ही मानव-स्वर सुनाई दे रहा है -मध्यम ध्वनि में अस्पष्ट से संवाद .
 वे सतर्क हुये - इस बेला यहाँ क्या चल रहा है ?
संशय में  तेज़ी से पग बढ़ाते वे उधर बढ़े .
मुकुन्द और पांचाली ,वार्तालाप में लीन मंद गति से बढ़े जा रहे थे .ध्वनियाँ पहचान में आने लगीं .
..'नहीं..नहीं तो ,मैं  महान् नहीं बनना चाहती ! सहज- सामान्य नारी  रहने दो मुझे ....'
 हवा के झोंकों में हिलते पत्तों की झर-झर में आगे की कुछ बातें बात अस्पष्ट रह गई .
फिर कृष्ण के  स्वर --
'...क्या कुछ नहीं करना पड़ा  ! पितामह की  निष्ठा ...उनका कठिन व्रत !'
'पितामह' सुन कर वे चेत गये .उत्सुकता से कान उधर ही लगा दिये .
कृष्णा बोल रही थी ,' कठिन व्रत पाला उन्होंने ,लेकिन किसका हित संपादित हुआ ?कौन से उच्च उद्देश्य की पूर्ति हुई ? वृद्धावस्था में पिता की भोग-लिप्सा पूरी करना- यही महत् उद्देश्य !उस तृप्ति के लिये कितने निरपराधों को वंचित किया ....'
 'वंचित किया. किसकी बात कर रही हो ?'
'माधव !अधिक कहलवाओ मत ,प्रकृति के नियमोल्लंघन का यही परिणाम होता है .'
परिणाम से क्या तात्पर्य है तुम्हारा..?'
'बुढ़ापे की बढ़ती असंयमित वासना पूर्ति-हित युवा पुत्र का ब्रह्मचर्य व्रत !  प्रकृति के प्रतिकूल जाने से  विकृति ही पनपेगी ! इसी अस्वाभाविकता में आगत संतानें तन-मन दोनों से अस्वस्थ रहीं .अनिष्ट की भूमिका तो वहीं से बनने लगी.उस के साथ जुड़ते   कितनों के आचरण कलुषित हुये, बुद्धि भ्रष्ट हुई , इस सबका दायित्व किसका ?'
चुपचाप सुने जा  रहे हैं भीष्म !
'...और अब ,पीढ़ियाँ उस महानता का मूल्य चुका रही हैं.
नारी पर अन्याय होते देख तुम्हारा हृदय विचलित हो जाता है गोपेश ,.तुम्हें कभी नहीं लगा कि यह अनुचित है अन्याय है ? उन तीन कुमारियों का स्वयंवर  विद्रूप बन कर रह गया. नारी की बात आती है तो तात किस किस सीमा तक संवेदनाहीन हो जाते हैं .'
कुछ क्षणों की चुप्पी असह्य लगने लगी भीष्म को, वे अस्थिर हो उठे.
' अब मौन क्यों हो ,पार्थसारथी .'
'वहाँ मेरा कोई वश नहीं था पांचाली .पर देखो  न आज वही नारी पितामह से प्रतिशोध लेने आई है . अब उनका पौरुष उसके सम्मुख लाचार है .'
द्रौपदी ,चुप नहीं रही -
' न  स्वयं स्वीकार किया ,न किसी के योग्य रहने दिया .निष्फल नारीत्व. देख लो ,क्या  बन बैठा .किसके कारण ?'
पितामह का शीष झुका है . दीर्घ निश्वास छोड़ा उन्होंने .
मन किया लौट चलें .पाँव मन-मन भर के हो गये .
नहीं,सुन लूँ ,ये कटु सत्य भी ..
गिरिधारी ने कुछ कहा  ,हवा के झोंकों और तरु पातों की मर्मर में स्वर डूब से गये  .
' महानता का लोभ !मुझे लगता है जीवन की  स्वाभाविकता ही सबसे बड़ा वरदान ..
सृष्टि संचालन के   ऋत नियम का उल्लंघन करके क्या मिलेगा !'
तात विचार मग्न थे -ऋत नियम!
पांचाली के बोल हैं या तात का अपना अंतर गुंजित हो रहा है -
'हाँ  सृष्टि के रक्षण-पोषण और विकास के लिये  .जीवन की निरंतरता  के साथ उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये   .उनके विपरीत हठ , सहज  प्रवाह में व्यतिक्रम तो आयेगा ही.. '
 बुद्धिमती है याज्ञसेनी.
यह बात मन में उठी थी क्या पहले कभी ?
'एक के महान् बनने का मूल्य कितनों से वसूला जाता है .और क्या उपलब्धि रहती है उस  की ?
कृष्णा कहे जा  रही थी -
'.अविकृत वंश-बेल चलाने का दायित्व किसका था ?पुत्र का कर्तव्य निबाहते.
पिता के प्रति निष्ठा थी तो माता की बात मान कर स्वयं नियोग करते. मैंने तुमसे ही सीखा है रणछोड़ ,किसी बड़े कल्याण के  हेतु वचन-भंग  में अहं को आड़े न आने देना  ?...कभी अपने यश-अपयश की चिन्ता की तुमने ? सचमुच , उनकी महानता से बड़े मुझे तुम लगते  हो .'
'मैं और यश ! ' लगा कृष्ण हँस रहे हैं,
' मेरे लिये तुम्हारा पक्षपात बोल रहा है .'
'नहीं खरी बात.'
भीष्म भीतर तक हिल गये !
 हवा चलते ही पत्तों की मर्मर  में शब्द खो जाते हैं.
सुनने में बार-बार व्यवधान आ जाता है .
' दोनों लाचार  अभागी वधुयें प्रसन्नता से स्वागत करतीं ,समर्थ संतान जन्म लेती .कुल की रक्षा होती .पर वहाँ प्रण आड़े आ गया . महानता  बाधित हो जाती न !'
ओह पांचाली !
वह बोल रही थी-
'कौरवों के लिये भी तो पितामह का संरक्षण ,चाहे विवशतावश ही किये हों, उनके अनुमोदन , उन्हें किन राहों पर ले गये ?'
कृष्ण चुप हैं .नहीं कुछ बोल रहे हैं .
वार्तालाप की ध्वनियाँ अति  मंद हो गईं .
अंधकार सघन हो उठा था
दूर से आती श्वानों और सियारों की आवाज़ें रह-रह कर सुनसान  को भयावह बना रहीं थीं.
किसी पाहन  से पग टकराया,.पितामह सँभले,.कुछ पल खड़े रहे अंधकार तकते,
फिर लौट पड़े .
*
32.
'आपने स्मरण किया था  तात ?'
 शिविर में प्रवेश कर अभिवादनपूर्वक प्रणत हो धनंजय ने पितामह को संबोधित किया.
 'हाँ पुत्र .जब भी अपने हित का कुछ करवाना चाहता हूँ तुम्हें स्मरण करता हूँ... .
और सब तो यहाँ  अपने-अपने में लीन ,किसे अवकाश है इस वृद्ध की सुध लेने का !'
'आज्ञा दें पितामह .'
भीष्म उन्मुख हो कर भी मौन, कुछ द्विधा में .'
प्रतीक्षा कर रहे हैं अर्जुन .
कल रात्रि ही  द्रौपदी ने  सूचना दी थी कि पितामह ,स्मरण कर रहे थे .
रात्रि को बिदा लेते समय कृष्ण  ने भी कहा था, 'मित्र,पितामह तुमसे कुछ कहना चाहते हैं .'
उन्हें आभास था द्रौपदी को दिये गये वचन की डोर में बँधे  पितामह अब स्वयं पार्थ को उचित उपाय बतायेंगे .
'अच्छा हो कि कल प्रातः ही... .'
और अर्जुन उपस्थित थे पितामह के शिविर में
भावाकुल शब्द पितामह के मुख से निस्सृत होने लगे -
'बहुत बड़ा भार  है मन पर .किसी से बाँट नहीं सकता ,कह नहीं सकता .पुत्र, मैं तो किसी के सामने अपना पछतावा भी व्यक्त नहीं कर सकता .'
 विस्मित-से अर्जुन .
'आप जैसे ,दृढ़ संकल्पी इस प्रकार विचलित न हों .आपने कब अपना स्वार्थ  साधा ?  सब के हित-संपादन में जीवन लगा दिया  .यह सोच आपके  उपयुक्त नहीं .'
'किसका हित संपादित कर पाया ?...क्या सार्थक किया मैंने ?जब  विचार करता हूँ तो निराशा ही हाथ आती है .'
'सब-कुछ आपका ही किया हुआ है तात,किस में इतनी सामर्थ्य थी कि इतना शक्तिशाली ,सुदृढ़ साम्राज्य खड़ा करता .कोई आँख टेढ़ी कर देख नहीं सकता .सब आप का ही प्रताप .'
'मेरा प्रताप?मैं विगत पीढी़ ,अगली पीढ़ी अधिक समर्थ और तेजस्वी हो यह व्यवस्था कर पाया क्या ?..जिसके हाथों  सब सौंप जाने का विचार करता हूँ वह इस योग्य है क्या --अब तो यही प्रश्न बारंबार कुरेदता है .मेरी  सारी दृढ़ता भरभरा कर ढह जाती है, वत्स.'
पार्थ का शीष झुका रहा.
'मेरे संरक्षण में कितने कार्य मर्यादा के अनुकूल हुये कितने प्रतिकूल !सब में मेरी मौन सम्मति .दायित्व मेरा था .किस दिशा में घटना-क्रम ले गया . मैं रोक सकता था .मैं अड़ जाता .मैं साक्षी नहीं बनता .कह देता अन्याय नहीं देख सकता .चला जाऊंगा.  तो औरों का साहस कितना था ? पर ..
पर ,अब कुछ नहीं .अब घटना-क्रम मोड़ना मेरे हाथ में नहीं.फिर भी अनर्थ रोकना चाहता हूँ .'
गला कुछ भर- सा आया  ,गीलापन घुटक कर बोलने लगे ,
' तुमसे विनती करता हूँ... , '
पार्थ  बीच में बोले बिना न रह सके , 'नहीं तात आज्ञा .आपकी आज्ञा ..'
बोलने से पहले गले में फँसी साँस को सहज किया तात ने ,
'मैं स्वयं बताना चाहता था ,वत्स .'
मनोयोग से सुन रहे हैं अर्जुन .
'बहुत जीवन जी लिया...देख लिया बहुत कुछ ..मृत्यु अवश्यंभावी  है,'
 वे चुप हुये कुछ क्षण,
'प्रस्थान से पूर्व कुछ प्रायश्चित कर सकूँ, पांचाली के प्रति अपराध-बोध भी कम होगा ,और जिनके साथ अन्याय कर बैठा हूँ ,उन्हें भी कुछ शान्ति मिले ..'
अर्जुन स्तब्ध .ऐसा तो कभी नहीं देखा था.कुछ नहीं बोलते थे तो भी उनकी मुद्रा सभी के  नियंत्रण हेतु पर्याप्त होती थी  .वह तेजस्वी व्यक्तित्व कैसा निरीह-सा हो उठा है .क्या हो गया पितामह को ?
 आज स्वयं को संयत नही कर पा रहे ,क्या हो गया तात को ..?.
'बैठे रहो  पुत्र,..तुमसे बहुत कुछ कहना है आज.'
चुप बैठे हैं  पार्थ .
युद्ध के सेनापति ,ऐसे हताश-विवश  जब कि रण-भेरी बजते ही सन्नद्ध हो कर नेतृत्व करना ,संचालन की बागडोर सँभालना उन्हीं का दायित्व !
और फिर एकदम  याद आया पार्थ को , तात का प्रण .पाँच अभिमंत्रित  तीर और पाँच पांडव!
हत्बुद्ध हो देखते रहे .
  ..इतना म्लान और हत कभी नहीं देखा था उन्हें.
मन उमड़ पड़ा,चुप न रह सके -
'कुछ अस्वस्थ  हैं पितामह ?'
 दोनो हाथों की  अँगुलियाँ आपस में फँसाये वे  बार-बार चलाने लगते हैं .
बड़े अस्थिर लग रहे हैं .
अर्जुन उत्तर  सुनने की  प्रतीक्षा में.
'सुनो पुत्र ,आज तुमसे बहुत आवश्यक बात कहनी है ...मैं दोंनो ओर से  वचन बद्ध हूँ .'
मुझे क्या आज्ञा है पितामह?'
'सुनो अर्जुन .मेरा वचन तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक मैं युद्ध में डटा हूँ .
मुझे इच्छा-मृत्यु का वर प्राप्त है ..युद्ध से मेरा मन विरत हो गया है .
जीवन में बहुत से अकार्य किये अब कुछ प्रायश्चित करना चाहता हूँ .'
'तात ,अस्वस्थ हैं आप ?'
'पुत्र ,मन अत्यंत अस्वस्थ है .अब कुछ मत पूछो .मैं कहता हूँ वह सुनो .'
कुछ थम गये वे , फिर तत्पर हो आगे बोलने लगे-
' शिखंडी नारी है .अंबा अपना प्रतिशोध लेने जन्मी है .मुझे उसके नयनों में  वही भाव , वही दृष्टि दिखाई देती है ,मुझसे शिकायत करती  हुई ,,मुझे धिक्कारती हुई  ..मैं नहीं शस्त्र उठा सकूँगा उस पर .'
थक गये थे वे .विश्राम हेतु रुके ,
जीवन भर अंतरात्मा की पुकार दबाकर जिसके संरक्षण का व्रत लिया ,आज उसकी व्यर्थता समझ में आ रही है .अब मुक्ति चाहता हूँ .
'शिखंडी ..' उनने कहा फिर चुप हो गये कंठ को खखार कर साफ किया ,'शिखंडी पूर्वजन्म  में नारी था ,काशिराज की कन्या अंबा .मेरे कारण  उसका जन्म व्यर्थ गया .वही शिखंडी हो कर जन्मी है . मैं जानता हूँ , मुझे उसमें वही अंबा दिखाई देती है .मैं उस पर शस्त्रघात नहीं कर पाऊँगा . कल उसे सामने कर देना पुत्र ,तभी तुम ...तभी तुम मुझे गिरा पाओगे .अन्यथा ...'
व्याकुल से पार्थ बोल उठे ,'नहीं ,तात ,मुझसे नहीं होगा ...'
'तुम्हें करना होगा.मुझे मुक्ति दिला दो पार्थ.जीवन की अस्वाभाविकताओं से ऊब चुका हूँ .
और मुझे अपने उन ,माता सत्यवती को दिये, वचनों की रक्षा हेतु .जो  करना होता है  अंतरात्मा उसकी  गवाही नहीं देती .मुझे छुटकारा चाहिये अब .'
अर्जुन स्तब्ध .क्या बोलें समझ नहीं पा रहे .
'नहीं, अब सहन नहीं होता ..पुत्र...कल वही करना है तुम्हें जो मैंने कहा .'
चुप हैं अर्जुन .
'मौन रहने का समय नहीं है . बोलो , पार्थ,बोलो .'
वे जानते हैं अगर कल उन्होंने पांडवों को नहीं गिराया तो दुर्योधन का सामना कैसे कर पायेंगे ,.और इधऱ द्रौपदी को दिया अमोघ आशीष !
'अब मुझे मुक्ति चाहिये .बहुत बोझ है ,कुछ प्रयश्चित कर लेने दो  .मुझे कुछ तो हल्का होने दो! वचन दो मुझे ,तभी निचिंत हो पाऊँगा .'
तुम पाँचो को जीवित रहना है भविष्य के लिये , न्याय -नीति के संरक्षण के लिये ...मेरा आशीर्वाद फलेगा  तभी न..'
'तात..'
विवश से बोल फूटे ,'करूँगा पूज्य .आपकी आज्ञा पूरी करूँगा .'
उदास सी स्मिति भीष्म के अधरों पर झलकी .'
'विजयी हो पुत्र,चिरायु हो !'
*
 संध्या होते ही  परिचारिका के साथ भानुमती आई थी तात सरस्वती के तट पर संध्या-वंदन कर लौटे नहीं थे .कुछ देर शिविर में बैठी रही  फिर लौट गई .
दुर्योधन निश्चिंत था ,बस दो दिन की बात .
*
(क्रमशः)


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत रोचक प्रस्तुति...अंत तक बांधे रखने में समर्थ..इससे पूर्व की कड़ियाँ भी शुरू से पढने की इच्छा जाग्रत हो गयी...आभार

    http://aadhyatmikyatra.blogspot.in/

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  2. यह श्रृंखला न सिर्फ़ रोचक है बल्कि ज्ञानवर्धक भी।

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  3. खूबसूरती से उकेरा सारा प्रकरण ..... अद्भुत शृंखला

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  4. शकुन्तला बहादुर5 अप्रैल 2012 को 10:53 pm

    अद्भुत कथा-प्रवाह पाठक के मन को दूर तक बहा ले जाता है और
    घटना-क्रम की तरंगों में मन डूबते उतराते कुछ देर को खो सा जाता है।अभिव्यक्ति-कौशल से सारा दृश्य प्रत्यक्ष होने की विचित्र सी
    अनुभूति आश्चर्यचकित कर देती है। मैं अभिभूत हूँ लेखिका के वैदुष्य से।

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  5. अद्भुत! यही एकमात्र शब्द है मेरे पास, वह भी जीर्ण सा प्रतीत हो रहा है।

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  6. यदि पितामह को श्रीकृष्ण के ईश्वर होने का ज्ञान था तो इस अंश के अंत तक आते आते नेत्र भीष्म पितामह के लिए भर आयें हैं।कैसी मनोदशा रही होगी उनकी श्रीकृष्ण के मौन पर ?पांचाली द्वारा उठाये गए प्रश्न और कही गयीं बातें तो उनके अंतर में अवश्य कई बार गूँजतीं होंगी।कितना पीड़ादायी है..जीवन को एक डोर के सहारे सहारे जीना और अंत में दोनों सिरे खाली पाना।महान जीवन की पृष्ठभूमि में भी कितने त्याग,कितने आरोप और कितने अंतर्द्वंद समाहित होते हैं।नियति का घटनाक्रम कितने ही अवसर छीन लेता है उचित निर्णय लेने के और तत्पश्चात हमारा ये कहना कि ,'विधि का विधान था अथवा नियति यही थी ' भी पर्याप्त नहीं होता स्वयं की गलतियों के लिए।एक दीर्घ श्वास छोड़कर सोच रही हूँ..अच्छा होता कृष्ण कुछ ऐसा न्यायोचित कथन कह देते जिसे सुनकर भीष्म शान्ति का अनुभव कर पाते कि कम से कम उनके वासुदेव ने उनकी समस्या का निराकरण तो कर दिया।
    आपके शब्दों का, शैली का जादू है...जो इस अंश के अंत तक मेरे मन में भीष्म पितामह तनिक विचलित तनिक शांत से बैठे हुए हैं....नेत्रों में उदास अर्जुन के निढाल क़दमों के दूर जाने की आहट तरल हो आई है।

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