शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कृष्ण-सखी - 33 & 34 .

33

*
साक्षात् काल- रूप धरे हैं भीष्म !
तुले हुये ,जैसे ललकार रहे हों पार्थ को .कब तक संयत रहोगे ? आज मुझसे निपटना ही पड़ेगा .पांचाल और मत्स्य सेना का भयंकर संहार .
दुर्योधन ने कहा था ,' पितामह, आप सेनापति हैं पर उनमें से एक का भी बाल बाँका नहीं हुआ अब तक..अगर आप के बस के बाहर हैं वे लोग, तो कर्ण को अनुमति दीजिये .कम पराक्रमी नहीं है वह ,साथ आने पर एक-एक ग्यारह हो जायेंगे .'
पितामह की मुद्रा बदल गई .
अनायास तीव्र हो उठे वे ,'बस अधिक मत बोलो ,सुयोधन .कोई आवश्यकता नहीं कर्ण की.या तो वे  पाँचो नहीं बचेंगे आज या स्वयं कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को विवश होना पड़ेगा .'
और वही कर दिखाया था पितामह ने .अद्भुत पराक्रम से भयानक संहार मचा दिया. पांडव सैन्य का अधिकांश नष्ट कर डाला .
रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं .जाने कहाँ की विद्युत्-गति समा गई है, जैसे आज ही सब कुछ निबटा देंगे .
कृष्ण विस्मित हैं !
अर्जुन को  प्रबोधित किया . वह पूरी  तत्परता और समग्र एकाग्रता से  नहीं डट सका.
 विवश कृष्ण उत्तेजित हो उठे 'ठीक है तुम नहीं तो मैं ही ..' और सुदर्शन धारण कर प्रस्तुत हो गये  .
अर्जुन को चेत आया ,अभिमंत्रित पाँच शरों का ध्यान आया .
'नहीं ,वासुदेव .विरत हो जाओ तुम रण से .मैं तत्पर हूँ . बस अब आगे नहीं , कोई सोच नहीं अब ....  पितामह का वचन पूरा हो .'
उनके तीर से छूटा एक बाण पितामह के चरण परसता सर्र से निकल गया .
जाग गये  जैसे ,मुख से निकला 'ओह ,तो आ गया पार्थ !'
सिर उठाकर देखा -
शिखंडी को आगे किये वो रहा अर्जुन !
शिखंडी सामने - उन्हें लगा अंबा खड़ी है .
कुछ स्वर कानों में गूँजने लगे -
'तुमने मेरे दो जन्म निष्फल कर दिये.मेरा नारीत्व दो कौड़ी भर भी नहीं तुम्हारे लिये .बड़ा अभिमान है अपने पौरुष का ?'
विगत घटनाक्रम नयनों के आगे घूम गया .
उसने कहा था ,'नारी तुम्हारे इंगितों पर नाचनेवाली कठपुतली नहीं है .स्त्री-पुरुष का संबंध क्या है ,तुम क्या जानो ! विरक्ति ओढ़नेवाले ,तुम क्या जानो प्रेम क्या होता  है !'
हाँ ठीक तो .कहाँ सफल होने दिया था स्वयंवर !
ऐसे ही तो अंधे धृतराष्ट्र के लिये सुदूर देश की विवशा गांधार-कुमारी  खोज ली.
 ये कन्यायें क्या चाहती हैं कभी जानने का प्रयत्न किया ?
 वे अध्याय सदा को अंकित हो गये, छप गये कथा की एक शृंखला बन कर .
पर अब जीवन से  बीत चुका है वह सब .
अनायास हाथ उठकर हिल गया जैसे पट पर अंकित अंक मिटा रहे हों !
असार है यह संसार ,माया के आवरणों से घिर कर कैसी  परिणति हो गई ,
 -सूर्यपुत्र ग्रहण-ग्रस्त .अग्निसंभवा- धूम्राच्छदित.श्यामांगिनी !
 स्वयं को  कौन जान पाता है -प्रभास नामी वसु की देवव्रत में परिणति और आगे निरंतर  बदलती  भूमिकायें !
  उन्होंने  क्षण भर कृतज्ञ नेत्रों से  देखा - तो कुन्ती-पुत्र मुक्ति दिलाने आ गये तुम !
ईषत् हास्य झलका अधर-कोरों पर .
*
पार्थ और शिखंडी तत्पर हैं .
पितामह ने संधान हेतु कोई प्रयास नहीं किया .
'सावधान !'
स्वर कानों से टकराये, उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ा . जस के तस.
 किसी ने पूछा ,'क्यों तात?'
'एक स्त्री  पर शस्त्र प्रयोग करे भीष्म ऐसी अनीति नहीं कर सकता .इतना.नीचे नहीं गिर सकता वह !'
शांत खड़े रहे पितामह .
फिर उन्होंने अस्त्र-शस्त्र रथ में डाल दिये  .
पार्थ और शिखंडी घनघोर  शर- वर्षा कर रहे हैं
शिखंडी आगे कवच बना-सा .
निरंतर आघातों से क्षत-विक्षत होता शरीर!
 भीष्म खड़े हैं ,प्रहारों के वेग से ,हिल जाते हैं बार-बार .झुक जाते हैं कभी दायें कभी बायें .
बस, अब अपने कर्मों का दण्ड ग्रहण कर ,शाप-मुक्त होने जा रहे हैं , तन के घोर कष्ट और मन की अशान्ति में भी एक अजाना-सा संतोष व्याप गया है.
रक्त-स्रवित व्रणों से श्लथ जीर्ण काया ! रण-भूमि में गिरने लगे वे ,किन्तु भू- लुंठित नहीं हुए  ,पार्थ के  संधान से अविरल शरों के पृष्ठों पर सध गये , मानो अर्जुन के धनुष से छूटे निकले शरों ने धरती में गड़ कर  उन्हें  शैयावत्  आधार दे दिया हो !
आठवें वसु  का नर-रूप !
वे सातों मुक्ति  पा गये ,माँ-गंगा ने उन्हें तुरंत शाप-मुक्त कर दिया .पिता शान्तनु ने मोह-डोर में बाँध जिसे  रोक लिया .वही अष्टम् वसु -देवव्रत !
 दीर्घ काल तक भीष्म बने , पितामह कहाते कुल के सूत्र सँभाले रहे . आज उस  अभिशप्त जीवन की अवधि पूरी होने जा रही है .
लगा नेत्रों में गंगा का जल लहरा आया  .
निश्चेत-से भीष्म शरों की नोकों पर पर टिके हैं.
हा-हाकार मच गया .
सेनापति विहीन कौरव सेना हतोत्साह  तितर-बितर होने लगी .
दुर्योधन को सूचना मिली .
जो कान सुनने को उत्कंठित थे कि पांडव मारे गये,उन्होंने सुना सेनापति पितामह घायल हत-चेत पड़े हैं.  कैसी अनहोनी!
 दुर्योधन  स्तब्ध !
*
34
युद्ध-क्षेत्र की संध्या -
पक्ष-विपक्ष के रथी-महारथी ,उपस्थित हैं -
रक्त-क्षीण भीष्म शर-शैया पर टिके हुये बार-बार शीष उठाते हैं कंठ उस भार से थकित बार-बार झुक जाता है .प्रयास पूर्वक साध लेते हैं वे .
'अब शीष साधे नहीं सध रहा. उसे भी अवलंब चाहिये .'
दुर्योधन ने आज्ञा दी उसके शिविर से  तुरंत  राजसी शिरोपधान लाया जाये .'
'नहीं !रण-क्षेत्र है यह.जैसी मेरी शैया है उसी के अनुरूप ....'
अर्जुन की ओर दृष्टि डाली .'मेरे शिर को भी साध दो , वत्स ,'
तुरंत धरती की ओर तीन शर छोड़े पार्थ ने ,और धरती में धँसे उन शरों के पृष्ठों पर  भीष्म ने शीष टिका दिया .
' बस अब कुछ नहीं चाहिये .'
सब धीमे स्वरों में अपनी-अपनी कह रहे हैं .
सुन रहे हैं वे ,स्वयं भी जानते हैं सेनापति के बिना सैन्य -संचालन असंभव है .दुर्योधन की दृष्टि कर्ण पर गई .कर्ण ने कुछ कहा .उसने आचार्य द्रोण की ओर संकेत किया - कुछ वार्तालाप मंद स्वर में .
द्रोणाचार्य सेनापति  बन उनके सम्मुख आये ,हाथ उठा कर आश्वस्त,किया पितामह ने .
शिविर में नहीं जायेंगे पितामह,वैद्य की भी कोई आवश्यकता नहीं .
इच्छा-मृत्यु का वर पाया है ,बस अब प्रतीक्षा -सूर्य के उत्तरायण होने की .
*
यहाँ आ कर किसे स्मरण रहता है कि वह क्या है !संसार के आवरण चारों ओर से लपेट लेते हैं और वह कर्तव्य समझ कर निर्वाह करने लगता है .
उन्हें कैसे ध्यान आयेगा पूर्व का वह घटना क्रम जब द्यौ, प्रत्यूष,प्रभास आदि आठों वसु भ्रमण करते करते ,वशिष्ठ मुनि के आश्रम पहुँच गये थे .
वहाँ की मनोरम दृष्यावली ने मन मोह लिया .
'कितनी सुन्दर गौ ,' द्यौ की पत्नी अचानक कह उठी .
 उस श्वेत सौम्य सुन्दर गौ को अपलक निहार रही थी वह.
'यही तो है ,मुनि की नन्दिनी ,जो भी माँगो प्रस्तुत कर देती है .मनोकामना पूर्ण करती है .'
'कैसी लुभा गई है ,'पत्नी को निर्निमेष उसे ही देखते पा द्यौ ने छेड़ा.
'हाँ लुभा गई हूँ !तुम ,वसु कहलाते हो ,ऐसी गौ मुझे नहीं दे सकते और वे मात्र मानव , उदासीन मुनि होकर भी उसके अधिकारी बन गये !'
 प्रभास सहानुभूतिपूर्वक बोले ,'तुम्हें चाहिये ?'
सातवें  प्रत्यूष का साहस बढ़ा ,'वनवासी, उदासी मुनि को इससे क्या काम ? चलो, हम लिये चलते हैं इसे .'
शेष पाँचो का हँसते हुये समर्थन - मुनि हैं,ऐसी ऐश्वर्यदायिनी,कामदा  गौ का क्या करेंगे !
प्रभास ने आगे बढ़ नंदिनी की पीठ थपथपाई ,कंठभाग पर हाथ फेरते ,पुचकारते रहे .फिर उसे आगे हाँक ले चले.
शेष सब उनके साथ चल पड़े .
जब मुनि को नंदिनी के ले जाने का समाचार मिला ,वे व्याकुल हो गये .
जानकारी मिली कि आठों वसु आये थे, हाँक ले गये . तब क्रोधित हो कर शाप दिया ,' जाओ,अब तुम सब जा कर मृत्युलोक में  जन्म लो.'
वसुओं को  शाप की बात पता लगी ,घबरा गये .दौड़े मुनि के पास .
बहुत अनुनय-विनय, क्षमा-याचना  करने पर उन्होंने  समाधान दिया - 'यदि कोई नारी तुम्हें गर्भ में धारण कर जन्म लेने के बाद  जल में बहायेगी तब तुम्हारी मुक्ति होगी .पर सबसे उत्पाती वसु प्रभास को मृत्यलोक में बहुत दिन रहना होगा .'
वही प्रभास .गंगा के आठवें पुत्र !
सात वसुओं को जन्म देकर वे प्रवाहित कर चुकी थीं .आठवीं बार ,राजा शान्तनु सह न सके .अधीर हो  मार्ग रोक कर खड़े हो गये,' नहीं .इसे नहीं .छोड़ दो इसे .पुत्र है मेरा, नहीं ,जल-समाधि नहीं देने दूँगा .'
रुक गईं गंगा और वचन-भंग के परिताप के कारण  पुत्र को ले  उन्हें त्याग कर चली गईँ.
कुछ समय बीता ,शान्त होने पर शान्तनु के बहुत अनुनय करने पर गंगा ने  पुत्र उन्हें प्रदान कर दिया -यही देवव्रत!
देवव्रत ,घोर प्रतिज्ञा-बद्ध  भीष्म !
उन्हें कहाँ कुछ  भान होगा कि वे अष्टम् वसु हैं ,अभिशप्त जीवन व्यतीत करने धरातल पर आये हैं .
 जिस आठवें वसु को गंगा-माँ ने देवव्रत अभिधान दिया था ,संसार  की रीति-नीति और आदर्शों से आवेष्टित होने लगा .पितृ-मोह ने उसे भीष्म बना दिया और अगली पीढ़ियों ने पितामह - तथाकथित  कुरु-कुल के सिंहासन का संरक्षक !
वही आज शर- शैया पर  पड़े हैं ,
सबसे बोलते-बात करते हैं ,लेकिन मन का एक भाग कहीं खोया रहता है .
कभी अचानक चौंक उठते हैं .
*
इस लोक में आकर देवव्रत को संबंधों का भान हुआ. सांसारिक कर्तव्यों का चेत जागने लगा,वंशानुक्रम और वातावरण के निरंतर लगते ढबकों से ढलने लगे वे.यहाँ तो व्यवस्था-व्यथा ही व्यक्ति की निर्धारक हो जाती है.सोच भी उसी अनुरूप बनने लगता है .
एक बार प्रारंभ हो जाये परिवर्तन का क्रम, तो रुकता कहाँ है.अपनी  ही मान्यताओं में रमा , अपनी औचित्य-नीति  से संचलित कार्य-व्यापार बढ़ता चला जाता है .
कोई बड़ा झटका अंतरात्मा को झकझोर दे तो चौंक कर चेतने लगता है प्राणी !
 वही हुआ गंगापुत्र के साथ .
पांचाली के शब्द -उन्हें याद आ रहे हैं -
 'कठिन व्रत पाला उन्होंने ,लेकिन किसका हित संपादित हुआ ?कौन से उच्च उद्देश्य की पूर्ति हुई ? वृद्धावस्था में पिता की भोग-लिप्सा पूरी करना यही महत् उद्देश्य !उस तृप्ति के लिये कितने निरपराधों को वंचित किया ....'
उसी ने कहा था -
 'एक के महानता -अर्जन के लिये कितनों को अपनी स्वाभाविकताओं की आहुति देनी पड़ती हैं ,.कितने पात्रों को रिक्त रह जाना पड़ता है .कितनों को बलि का बकरा बनना पड़ता है. ''
और आज शर-शैया पर ..
प्रायश्चित करते पितामह पड़े हैं - सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में .
*
(क्रमशः)






15 टिप्‍पणियां:

  1. कथा की रोचकता पाठक को बांध कर रखने में सक्षम है।

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  2. बहुत सुन्दर वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 16-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-851 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. हर घटना क्रम जैसे आँखों के सामने उपस्थित हो गया हो ...बहुत अच्छी लगती है ये शृंखला

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  4. हर घटना क्रम में रोचकता बनी हुई है जो पाठकों को बांध कर रखती है,

    बहुत ही बढ़ीया प्रस्तुति,की है प्रतिभा जी,बधाई ....
    आपका समर्थक भी बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,..

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  5. rochak vrataant geeta to nahi padhi kintu aapki post prabhaavit kar rahi hai atah aapke blog se judna saubhagya hoga.

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  6. eun to mahabharat ko kai baar padha ..jeewan me roj mahabharat dekh hee rahe hain..lein aaj aapke lekh ko padkhar anand aa gaya...

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  7. शकुन्तला बहादुर16 अप्रैल 2012 को 6:27 pm

    युद्ध-क्षेत्र के दृश्यों ने मन को बाँध सा लिया है।कथा से परिचित होने पर भी इस घटना-क्रम में निरन्तर कौतूहल बना रहता है,जो प्रतिभा जी की लेखनी का चमत्कार है।फ़्लैशबैक की तरह भीष्म द्वारा जीवन की विगत घटनाओं का स्मरण, कथा को पूर्णता भी देता है और मन को आश्वासन भी। शब्दों ने दृश्यों और पात्रों के मनोभावों को सजीवता सी प्रदान की है।ये चित्र सराहनीय हैं।

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  8. सचमुच! गद्य गीत ही है यह!
    मोहक!

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  9. कालजयी कथा का कालजयी प्रसंग !

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  10. निष्कर्ष बहुत ही सटीक दिया है आपने ।कभी कभी कुछ बातें दूर तक जीवन को अभिशप्त बनातीं हैं ।

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  11. अपार रोचकता और ज्ञान से भरा वृत्तांत पढ़ा. आपकी लेखनी की फैन हूँ , सभी कुछ ऐसा लगता है कि सीधे हृदय और मस्तिष्क में जा बैठा हो.

    कलम के कौशल से बढ के मुझे ये सुन्दर लगता है कि आप प्रश्न उठाती हैं... जो लीक से हट कर हों, वो भी.

    सादर शार

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  12. इसके पहले वाले अंश के जादू से ही बाहर नहीं आ पायी शायद अथवा पितामह के रण में घायल होने के दृश्य के लिए मानसिक रूप से कुछ अधिक ही तैयार थी।इस बार मन बिलकुल भी व्यथित नहीं हुआ जैसा कि मैंने सोचा था ।जी मगर ये बात भी अपनी जगह सत्य है कि परिचित होने के बावजूद भी कौतूहल में कमी नहीं होने पाती है।एकदम सही कहतीं हैं शकुन्तला जी।
    अंतिम पंक्तियाँ पुन: मन में बहुत सा द्वन्द छोड़ कर जा रहीं हैं।किन्तु हमेशा की तरह अंत में ईश्वर से तर्क-वितर्क करके मन इसी प्रश्न पर बात समाप्त कर देगा कि क्यूँ रचा इतना सब?
    शार्दुला जी के कथन पर विशेष रूप से गौर किया। मैं तो इस बार सभी पाठकों से सहमत हूँ। गिरिजा जी की बात दूर तक हृदय चीर गयी।मन चैन नहीं पाता ये सोचकर कि सब कुछ पूर्वनिश्चित है तो क्यूँ प्रश्न करें हम?..क्यूँ किसी बात को अभिशाप या वरदान मानें? मस्तिष्क उत्तर दे रहा है..तटस्थ रहकर कर्म करने का।हृदय कहता है..मात्र ये कह देने से किसी का दोष कम या समाप्त हो जाएगा!!मन मस्तिष्क दोनों मौन...गीता की बातें याद आ रहीं हैं ..यहाँ लिखने से बचना चाह रही हूँ । :(
    खैर, ३-४ पुस्तकें पढ़ीं थीं पिछले दिनों उनमे से एक भीष्म पर भी थी।आभारी तो मुझे होना ही चाहिए उन सभी लेखकों का..किन्तु नहीं भी पढ़ती न तो भी पांचाली में आपने जो सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी उपलब्ध करवाई है, उससे इस श्रृंखला को समझने में कठिनाई नहीं होती।जी, थोड़ी सरलता अवश्य होती है मुझे क्यूंकि मैं और बातों पर अधिक ध्यान लगा कर पढ़ सकती हूँ। आभारी शब्द भी बहुत ही कमज़ोर है आपके श्रम के आगे ..नमन प्रतिभा जी...लेखनी को..आपको भी!
    (बहुत खटकती है कंप्यूटर स्क्रीन ,काश बहुत मोटी सी पुस्तक के रूप में 'पांचाली' मेरे पास होता और जब जी चाहे तब अपनी मनपसंद पंक्तियाँ उसमे से मैं देख पाती।
    एक रोचक अनुभव भी हुआ..इस अंश के अंत में अर्जुन के साथ साथ सचिन तेंदुलकर का भी ध्यान आया। :) ..)

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