गुरुवार, 3 मई 2012

कृष्ण-सखी - 37 & 38.


37
 गहराती निशा का नीरव अंधकार समूचे कुरु-क्षेत्र पर छाया है .हवायें गुमसुम .बीच-बीच में उठती शिवाओं और श्वानों की ध्वनियाँ उस घोर गहनता को भयावह बना देती हैं .
आज शर-शैया का तीसरा दिन ,युद्ध का तेरहवाँ .
 .अभिमन्यु-वध का दारुण समाचार सुना - सात महारथियों ने किस प्रकार  बर्बरता से एक निहत्थे बालक को मार दिया !
पितामह काँप उठे ,शरों की पृष्ठ-भाग पीठ में धँसे जा रहे हैं  .पर मन के संताप के आगे चुभन का भान किसे ?गोद में खिलाया था उन्होंने कृष्ण के इस भागिनेय को- कितना चंचल बालक !सुभद्रा के समान गौर ,पार्थ कीअनुहार लिये मुख-छवि !
शर-शैया पर लेटे  पितामह के मुँदे नयनों से अश्रु-बिन्दु टपक जाते हैं .कोई भी अंग हिलते ही शरों के पृष्ठ-भाग पीठ में  और दारुण हो लगने लगते हैं .
तन शैया पर ,किन्तु अशान्त मन थिर नहीं रहता .आगे कुछ करने को नहीं ,पीछे भागता है ,स्मृतियाँ घेर लेती हैं .अविराम चिन्तन चलता है .
 इन लोगों में यह दुर्बुद्धि कैसे उपजी ?
अरे ,दुर्योधन !
कुछ शब्द कानों से टकराते हैं  ,'सचमुच  कुरुकुल के होते तो .. .'
 स्मृति-पटल पर कहाँ- कहाँ के दृष्य उभर आये  .
वे शब्द ,वह दिन कैसे भूल सकते हैं ?
उस दिन जब सबसे गुहार लगा कर याज्ञसेनी हताश हो गई, तब  उसने जनार्दन को पुकारा था .
अपमान और विवशता से विकृत मुख तमतमा रहा था , पूरे आवेग में चीख उठी थी , 'समझ गई हूँ अच्छी तरह , सचमुच  कुरु-कुल के होते तो  कभी ऐसा जघन्य आचरण नहीं करते . पूरी खेती कुत्साओँ और अनीति  की ... '  स्वर- भंग में आगे के शब्द अस्पष्ट ही रहे थे .
सारी सभा स्तब्ध हो गई थी !और पांचाली अचानक चुप .
चीर खींचते उद्धत हाथ एकदम शिथिल पड़ गये . दुर्योधन हतप्रभ .विदुर दूसरी ओर मुख घुमाये जैसे झेल न पा रहे हों .पितामह का  झुका हुआ शीष कुछ और झुक गया था .
कर्ण , अब तक बढ़-बढ़ कर बोल रहा था, एकदम सन्न .आँख उठा कर देख न सका .
और पांचाली दुःशासन के हाथ से वस्त्र का छूटा छोर उसकी ओर खिंच आया था ,उसे समेट स्वयं को आवृत्त कर लेने का प्रयास करती हुई !
सभा  नीरव .कोई किसी को नहीं देख रहा .
'सचमुच  कुरु-कुल के होते तो ..' जैसे उस मौन में यही शब्द समा गये हों.वातावरण का भारीपन असह्य होता जा रहा था .
चौंके हुये धृतराष्ट्र  का विवर्ण मुख ,दृष्टिहीन नेत्र कार्यस्थल की ओर घूम गये ,जैसे देख पाने को आकुल हों  -
 मौन भंग हुआ था धृतराष्ट्र के स्वर से,' वधू, क्षमा करो ,मर्यादा भंग हुई है .'
वह बिलकुल चुप खड़ी है .
जैसे अनुनय कर रहे हों , फिर वे बोले ,'पुत्री , वय में तुमसे बहुत बड़ा हूँ.,पितृतुल्य. .विवश हो गया था.क्षमा कर दो .. इन की मति मारी गई है .'
फिर कहा ' मेरे संतोष हेतु वर माँग लो पुत्री ,जो भी चाहो .'
पांचाली ,मौन .
अब तक जो लोग मुखर थे ,सब चुप्प !
फिर अनुरोध किया था धृतराष्ट्र नें पर स्वरों में गिड़गिड़ाहट भर आई थी.
 कुछ  सजग हुई पांचाली और अति गंभीर स्वर से  पति का गँवाया हुआ सब वसूल लिया .
पर महाराज के  आग्रह  पर भी अपने लिये कुछ नहीं माँगा .
उस सभा में उपस्थित होते हुये भी विषण्ण से बैठे रहे थे भीष्म .
उस दिन को याद कर आज भी असहज हो उठते हैं .
उद्विग्न हो कर गहरी श्वास खींची  -' तुम्हें  दे सके , इतनी सामर्थ्य  कहाँ है किसी में, पांचाली  !'
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
 ध्यान  आया  'यदि सचमुच पुरु-कुल के  होते '  ... .कहाँ है पुरुकुल ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया,....हाँ!
  'सारी उपज  कुत्साओँ और अनीति  की' क्या गलत कहा उसने ?.....
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि यहाँ  अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
आगे कुछ नहीं सोच पा रहे .जैसे विचार-शक्ति कुंठित हो गई हो .
क्या सोच रहे थे ...ज़ोर डालते हैं मस्तिष्क पर .
   ' सचमुच पुरु-कुल '  ... .पुरु-कुल कहाँ बचा ?
वंश- नाश का कारण मैं ही बन गया .,
कुरुवंश का अंतिम प्रतिनिधि अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है .
चारों ओर परिवार के लोग ,एक दूसरे को मारते-मरते हुये .
उत्तरदायी कौन ?
'क्या कर आये अपने कुल की रक्षा के लिये, प्रतिष्ठा के लिये ?' - पितर पूछेंगे , 'तुम जो इतने सामर्थ्यवान ,इतने दृढ़ और आदर्शवादी थे  ,..?'
कैसा मिथ्याभिमान !
सब नष्ट कर दिया .अनीति -अन्याय का विरोध न कर सका!
कैसा आदर्श .कैसी महानता ?
उसने कहा था ,'मैं  जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ.बड़ी बात नहीं कहूँगी . दुर्बलतायें हैं मुझमें .अपना आक्रोश जीत नहीं पाती.जो अनुभव करती हूँ उसका प्रभाव पड़ता है ,प्रतिक्रिया होती है , सदा गंभीर ,संयत .अकारण मृदु होना मेरे स्वभाव में नहीं . कभी-कभी. आवेग निकाल कर सामान्य हो लेती हूँ .,. महान् नहीं होना चाहती, तात ,स्वाभाविक रहने दीजिये .प्रकृति के नियमानुसार .वही ऋत नियम हमारा धर्म है .'
उस रात्रि को कृष्ण के साथ मार्ग चलते उसने जो कहा था , कानों में गूँजने लगा --' वंश-बेलि सूख कर नष्ट हो रही हो, तो पुत्र का कर्तव्य है उसे सिंचित करना , पल्लवित करना ,औरों के आसरे छोड़ देना नहीं .'
याज्ञसेनी की बात बार-बार याद आती है  .
विचार परंपरा उधर ही चल पड़ती है -
जिसके कारण सब से बडे ऋण -पितृऋण से विरत हो गये थे ,वही अनुरोध करे जब, तब भी कोई बाधा रही क्या  ?  अगर  मानो तो माता की आज्ञा भी .'
द्वैपायन ने वीतराग संसार-त्यागी हो कर भी ,स्थिति की गंभीरता समझी .माँ की विवशता समझी  और अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न किया .
और मैं ?व्रत काहे का लिया था ?
संसार त्यागने का तो नहीं .व्यापक हित या सीमित स्वार्थों का  समर्थन ?
 अब तक कभी नहीं सोचा .
मैं देव-व्रत .दैवव्रत हो गया .
क्या दे जा रहा हूँ ,आगत को कौन सी थाती सौंपे जा रहा हूँ !
काशिराज कन्याओं के विवर्ण मुख याद आये.
 राजमहल के रनिवास में उनका घुटता जीवन याद आया .अनजान-अनचाहे पुरुष से वितृष्णापूर्वक किया गया बलात् संसर्ग याद आया .जिसके विकृत फल... ,हाँ सामान्य नहीं था दोनों में से कोई  ,एक अंधा ,दूसरा पांडुर !
 विवश कर दिया उन बालाओं को .कहाँ जातीं वे ? कहीं और ठिकाना था उनके लिये?
सब तो अंबा नहीं हो सकतीं !
माता सत्यवती को आश्वस्त किया था .नारी वीरभोग्या होती है ,पर वे वीर नहीं थे ,जन्म के रोगी ,निर्वीर्य ! मेरे पिता का पुत्र होना ही उनका  एक मात्र गुण था .'
उस दिन नहीं ,आज समझ में आ रहा है .स्वयं भी जीवन भर विवश रहा अन्याय के पक्ष में बने रहने को ,अनीतियों का मौन समर्थन करने को .मर्यादाहीन व्यवहार सहन करने को .
क्या आशा लगाई थी  उन बेबस नारियों से ,जिनके जीवन की स्वाभाविक इच्छाओं पर भी वर्जनायें ठोंक दी गईँ थीं .कुल के रत्नों को जन्म देंगी ?
विवाह के नाम पर बलपूर्वक स्वस्थ सुन्दर ,सौभाग्यकांक्षिणी ,स्वयंवरा कुमारियों को लाकर जन्म के रोगी असमर्थ भाइयों को सौंप देना ?
मेरी ही योजना थी .जानता था मेरी सामर्थ्य के , मेरे पराक्रम के सामने सब विवश हो जायेंगे .
 मैंने व्रत लिया ,भीष्म कहलाया , यश पाया ,.वे कुमारियाँ जीवन भर वंचित रखी गईँ. विवश कर दिया गया . विरक्ति से भरा मन ले कर जिससे अरुचि हो उससे संसर्ग या बलात्कार! पशुओं से भी गई-बीती रहीं वे .
अंबा के नयनों में प्रश्न था ,'हरण कौन करे और वरण कौन ?'
सब कुछ उलट-पलट गया .
पति बनने में असमर्थ ,पत्नी का पद कैसे दे पाते ,मनोरंजन के लिये स्त्रियाँ चाहिये थीं उन्हें .
गांधार-कुमारी से विवाह का प्रस्ताव मैंने भेजा .अपनी नीति में सफल रहा मैं .
कुरु-साम्राज्ञी जीवन भर आँखों पर पट्टी बाँधे रही .
पतिव्रता ?
कैसा विचित्र सत्य - हँसी हो शायद पाँचाली !
सौ पुत्र जन्म दिये , पति का मुख तक न देखा .माँ की स्नेहमय दृष्टि कभी संतानों पर न पड़ी .कौन संस्कार देता ?संतान का .जीवन सफल रहा क्या ?'
थक गये पितामह .
तंद्रा ने घेर लिया .निस्पंद पड़े हैं .हिलते ही शूलों की चुभन !
जब तक चेतना है निस्पंद कैसे रह सकता है कोई !
मस्तिष्क कुछ सजग हुआ .
सब भूल-भूल जाते हैं .पांचाली ने कहा था या स्वयं की विचारणा - -
'ये  ऋत नियम हैं-प्राकृत. जीवन की  स्थिति ,विकास और  कल्याण के लिये . हठपूर्वक उनके विपरीत आचरण . परिणाम -विषमता और व्यतिक्रम के अतिरिक्त और क्या ? स्वयं को वर्जित कर ,बाधा बन गया वंश के क्रमिक विकास में ..जब भी प्रकृति में  व्यधान पड़ेगा, विकृतियों का समावेश होगा ,जो कुछ अस्वाभाविक है ,कल्याणकारी कैसे हो सकता है .'
हाँ, उसने कहा था -
'तात के संयम से किसका हित हुआ ?किस महान् उद्देश्य की प्राप्ति हुई कौन सा दायित्व, कहाँ पूरा हुआ ?'
उन तीन उछाह-भरी कान्तिमती  स्वयंवराओं के मुख सामने आ जाते हैं ,जिन्हें हर लाया था मैं .बेबस .भयाक्रान्त .विवाह के समय उन के साथ मेरे हतवीर्य रोगी भाई... नहीं, याद नहीं करना चाहता .
उस दिन कृष्ण के साथ मार्ग चलती पांचाली हँसी थी.स्वयं के लिये बोली थी  ,'मेरा कठिन व्रत!क्या हो गया तुम्हें ,जनार्दन ? अपने से तुलना कर देखो ?'
विवश हैं पितामह इस ओढ़ी हुई चादर के नीचे कितनी घुटन है ,पर उतार सकते नहीं ,दुनिया के सामने ओढ़े-ढँके ही ठीक ..
*
कानों में लहरों की मंद्र ध्वनि .
अरे, सरस्वती का प्रवाह इतनी निकट है ,अब तक मुझे पता नहीं था .
मन हुआ उठ बैठें, निकल चलें सरिता तट पर .
माँ की याद आई .गंगा कहाँ यहाँ !
हवाओं की थपक भाल पर अनुभव की .हल्का सा सिर घुमाया .आधी रात के बाद हवा गतिमान हो गई थी.पवन झोंकों से शिविर का पट कुछ सिमट आया है .हवा के झकोरे अंदर तक चले आ रहे हैं .
'सौमित्र ' प्रहरी को पुकारा
 लगता है निद्रामग्न है  .
पड़े रहे चुपचाप .
न सो रहे, न जाग रहे .
रात्रि की नीरवता में जल-तरंगें रह-रह कर बज उठती है ,साथ में सदानीरा से होकर आते शीतल पवन झोंक .
जैसे  कोई हौले-हौले माथे पर थपकियाँ दे रहा है .
अर्ध-निद्रा में लगता है ,माँ  के थपकी देते  करों की चूड़ियाँ बार-बार खनक रही हैं .
'ओ माँ ,मेरी सुध ले रही हो तुम !'
अति क्लान्त नयन , पलकें मुँदने लगीं .
**
38
*
सांध्य-बेला समीप है ,आज के युद्ध का विराम .
किसी-न किसी के द्वारा वहाँ की सूचनायें  मिलती रहती हैं . बाद में विस्तार से वर्णन करते हैं रण-क्षेत्र से लौटे, वे पाँचों .
जयद्रथ-वध का समाचार भी ऐसे ही मिला था .
और आज आचार्य द्रोण का शिरोच्छेदन ! कौरव सेनापति थे वे .
पांचाली चौंक उठी .
रुक न सकी ,द्वार के समीप आच्छादन की ओट से बाहर देखती खड़ी रह गई.
 आते-जाते लोग ,कुछ वाक्यांश, कुछ नई भंगिमायें दिन की एकरसता से कुछ मुक्ति मिलती है .
दो चर वार्तालाप करते जा रहे थे- 'हाँ ,मार दिया आचार्य को .'
' उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया ?'
'प्रतिरोध ?वे जड़ीभूत-से हो गये थे पुत्र-वध का समाचार सुन कर .'
'पर अश्वत्थामा जीवित है !'
'अब क्या कहें ,उन्हें भरमा दिया सब ने मिल कर .'
'तो .मरा तो..हाथी था? '
'उन्हें  भी संदेह था,  धर्मराज से पूछा था.. '
आगे नहीं सुन पाई ,वे दोनों दूर चले गये थे
पांचाली असमंजस में .
इतने  गुणी व्यक्ति का कैसा दुर्भाग्य !
मित्र रह कर भी पिता उसकी योग्यताओं का आकलन नहीं कर  सके .
अनायास कृष्ण -सुदामा  याद आ जाते हैं .
घोर अभावों में पले पिता-पुत्र .
दूध  माँगते  पुत्र को बहलाने के लिये आटा घोल कर देना , करुणा से भर आया था पांचाली का हृदय .
 ओ पिता ,दरिद्र विप्र को  दिया गया वचन पूरा कर देते !
कहाँ हैं अब  पिता ,वे भी  युद्ध की भेंट चढ़ गये .
*
निरंतर बढ़ता वैमनस्य और क्या-क्या दिखायेगा -न्याय-अन्याय ,नीति-अनीति, सब एक हो गये .चल रहा है हिंसा और क्रूरता का नग्न नृत्य !
पार्थ को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का श्रेय आचार्य को है. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये औरों के साथ अन्याय भी कर गये -यह भी जानती है वह!
कंठ सूख रहा है ,देहरी से लौटी  कक्ष में जा कर पात्र भरा.
पीने की मुद्रा में पकड़े अनमनी सी चली आई.दृष्टि द्वार पर गई .पात्र हाथ से छूट पड़ा.
युधिष्ठिर कक्ष में  प्रवेश कर रहे थे .कुछ दूरी से भाइयों के वार्तालाप के स्वर भी .
विस्मित-सी पति का मुख देख रही है .
वे आँखें बचा गये .नीचे झुक कर लुढ़कता पात्र उठाने लगे   .
पीछे आते शेष चारों झिझके से खड़े.
' जा कर जल पी लो, पांचाली .'
'हाँ ..,हो गया आज का संग्राम?'
श्रान्त बैठ गये वे सब.
आज के समाचार सुनाने का उत्साह किसी में नहीं .
भीम कह रहे थे , 'ये अच्छा हुआ.आज बड़े भैया नीति से काम न लेते तो सब चौपट हो जाता .'
पात्र ले कर जाती हुई वह उनकी बातें सुन रही है .
*
बाद में कृष्णा ने पूछा था -
'धर्मराज ,जान बूझ कर या अनजाने में .?'
'मैंने सहज रूप से कहा था .'
'आचार्य ने तुम पर विश्वास किया था, मन में अपराध बोध तो नहीं न ?'
वे एकदम सकपका गये .
'रहने दो मैं समझ गई.'
उन्होंने फिर  स्पष्ट किया -
'मैंनें तो  सच ही बोला था .'
चुप देख रही है पांचाली अर्ध-सत्य -'नरो वा कुंजरो वा' .
'पता तो था न ..?'
'भैया कृष्ण ने कहा था नीति से काम लो ,नहीं तो कोई राह नहीं बचेगी . मैंने ...मिथ्या-भाषण नहीं किया ..'
'अपना मन सबसे बड़ा निर्णायक है धर्मराज ,मेरे -तुम्हारे कहने से क्या .'
कुछ शब्द चुपचाप व्यवधान बन कर दोनों के बीच खड़े रहे.
'बहुत थक गया हूँ .विश्राम करूँगा .
वे चले गये. द्रौपदी उसाँस ले कर रह गई .
भाई ने अपना प्रतिज्ञा पूरी की -समाधिस्थ द्रोणाचार्य का शीश काट कर -
उसके मुख से निकला - ओह, धृष्टद्युम्न ?
*
धर्मराज ?
सत्य और मिथ्या के बीच और क्या होता है - विभ्रम !
सारा दृष्य उसके आगे सजीव हो उठा -
भीम के चिल्लाने पर कि अश्वत्थामा मारा गया ,आचार्य द्रोण को विश्वास नहीं हुआ- इतना समर्थ मेरा पुत्र , भीम के हाथों मारा जाय? यह कैसे संभव है ?
 चारों ओर कोलाहल मचा था .
उन्होंने वास्तविकता जानने को सत्यवादी युधिष्ठिर की ओर देखा .
 ' अश्वत्थामा हतो .' शब्द उनके कानों में  और आगे का वाक्य ... 'नरो वा कुंजरो वा' (अश्वत्थामा मारा गया है, लेकिन मुझे पता नहीं कि वह नर था या हाथी).शंख, घंटा, तुरही और उत्तेजित कंठ-ध्वनियों के कोलाहल में डूब गया .
सुन कर स्तब्ध , एकदम जड़ी-भूत हो गये  द्रोणाचार्य !
और धृष्टद्युम्न ने एक ही वार से उनका शीष,धड़ से छिन्न कर दिया .

यह भी संभव है - कभी सोचा  न था.
अश्वत्थामा जीवित है ,सब देख रहा है ,पिता की जघन्य हत्या .सत्य का मिथ्याकरण .
वह भी क्रोध में अंधा हो गया तो ...?
आचार्य की मृत्यु का श्रेय  -धृष्टद्युम्न को जाये या  धर्मराज को ?
कहाँ जाकर विराम लेगा यह महा-समर !
प्रतिशोध की ज्वाला ने  विवेकहीन कर डाला सबको !
*
38
नीति क्या है ?
जान कर भी अनजान बने रहना !
अर्जुन ने कहा था-
'याद करो, हमारे अभि को इन्हीं के नेतृत्व में कैसी अनीति-अन्याय से मारा  गया .'
'उनका वही स्तर है ,तुम में और दुर्योधन में कोई अंतर नहीं क्या ? फिर वे तो धर्मराज ठहरे. '
नीति की बात एक बार पहले भी उठी थी ,तब पांचाली ने युधिष्ठिर से कहा था -
'जो रीति एक आड़ बन गई हो अपनी चाल को सफल बनाने का ,उसे मानना आवश्यक तो नहीं .आप कह सकते हैं मुझे द्यूत से घृणा हो गई है ,नये मान स्थापित करना समर्थ पुरुषों का काम है .आपको जो अनुचित लगता है वह मानने को आप विवश नहीं  .'
 ''स्त्रियों को इस बहस में पड़ना शोभा नहीं देता .. तुम्हारी सोच ही अलग है ,पत्नी का धर्म है पति के अनुकूल रहना .'
यह भी याद है कृष्ण ने कहा था ,मन की द्विधा ,बात उनकी हो ,तो मत पूछना उनसे . पांचाली ,पुरुष स्त्री के प्रति इतना विचारवान नहीं होता .अधिकार की भावना उसकी मानसिकता में होती है .अपनी दुर्बलतायें उसे सहज स्वभाव लगती हैं . कोई कह दे तो चोट पहुँचती है उसे .पत्नी के सभी गुण उसके निमित्त हैं कोई भी कमी हो तो खटकती है .'
आज उसे किसी के खटकने की चिन्ता नहीं .मर्यादा केवल उसी के बाँटे नहीं आई ,सभी के लिये है.
 वह रुकी, नहीं कहती रही  ,'बुद्धिमान मनुष्य ,अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये  शब्दों के कुशल वार से  मार देता है ,किसी को ख़बर नहीं होती कोई दोष नहीं लगाता .साधारण आदमी सब के सामने खुलकर अपना काम साधता है,  पापी कहलाता है .  छल से शस्त्राघात सबके सामने कर बैठता और धिक्कारा जाता है .बस, बुद्धि का अंतर है.'
 युधिष्ठिर मुँह घुमा कर भीम से बात करने  लगे .
याज्ञसेनी उठ गई .समर से लौटे पतियों के विश्राम -जलपान की व्यवस्था जो करनी थी .
*
 'तो अब निचिंत हैं ?
उत्तर अर्जुन ने दिया ,'अभी कहाँ ,अब कर्ण की बारी है सेनापति बनने की ,सबसे बड़ी बाधा. ...'
'ओह, कर्ण !'पांचाली ने सिर झुका लिया .'
सबके अन्याय और आक्रोश का केन्द्र वही रहा .सुपुरुष हो कर भी, समर्थ हो कर भी ...नहीं.. कर्ण, तुम हट जाओ मेरी स्मृतियों से भी .तुम्हारे दैदीप्यमान व्यक्तित्व पर छाया डालनेवाली एक मैं भी हूँ .मैं क्या करूँ मेरी भी विवशता ! नहीं जाऊँगी उस छोर जहाँ केवल अशान्ति और अशेष ग्लानि है.
नहीं,नहीं सोचना चाहती वह सब .
कितनी विसंगतियों  के पनपने का निमित्त मुझे ही  बनना था !
देखा था उसे पहली बार स्वयंवर की संशय भरी मनस्थिति में .
कुछ क्षणों को अनुभव की थी उछाह भरे ज्योतित नयनों की नेह-भीनी दृष्टि .
पर तभी पिता के कितने कथन ध्यान में आ गये . चिर-संचित आक्रोश उमड़ पड़ा ,अर्जुन के स्थान पर यह कहाँ से आ गया ?
वह वीरासन में बैठ कर नीचे जल में देखते हुये शर-संधान को प्रस्तुत था .
 एक दम ज़ोर से बोल उठी  ,'नहीं,नहीं , रुको ,रुक जाओ !मैं कुलहीन पुरुष का वरण नहीं करूँगी .'
 वे आजानु बाहु एकदम शिथिल हो गये ,सारा उत्साह झप् से बुझ गया .
पांचाली के वचनों के दाह से, नेहमयी दृष्टि ,  सुलग कर भभक उठी .
आज तक पांचाली उस संताप से  मुक्त कहाँ हो पाई और कर्ण भी .आमना-सामना होते ही ,एक आँच सुलग उठती है .
भोजन परोसती द्रौपदी का वह मनोयोग आज कहाँ चला गया !
.कोई कुछ पूछ नहीं रहा , कोई कुछ कह नहीं रहा.  
  चुपचाप भोजन में  लीन ,सब मौन . जैसे आज के घटना-क्रम से निर्लिप्त हों - नितान्त उदासीन .
*
(क्रमशः)




14 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर श्रृंखला |
    बधाई प्रतिभा जी ||

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  2. बहुत सुंदर सार्थक श्रृंखला बधाई प्रतिभा जी..//

    MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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  3. पांचाली का स्वयं से मौन वार्तालाप !
    कितनी घटनाओं की निमित्त बनी !

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  4. युद्ध के दृश्य और द्रौपदी के मन की भावनाएं .... बहुत अच्छी लग रही है यह शृंखला

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  5. अन्तर्द्वन्द्व का सुन्दर चित्रण...

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  6. bas apne gyan chakshuon ko kholne ka bharsak prayaas kar rahi hun apki is shrinkhla ki kadiyon ko padh kar....aur ye kahna atishyokti nahi hogi ki kam se kam pura saptaah is lekh ki ghatnaaye mastishq me ghoomti rahti hain...aur jahan to ho sakta hai apne ird-gird walo ko bhi in ghatnaao ki jankari deti rahti hun.

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  7. कितना विराट है महाभारत! और कितना सजीव वर्णन करती जा रहीं हैं आप।

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  8. ‘नरो वा कुंजरो वा‘ का प्रसिद्ध प्रसंग रोचक और पठनीय रहा।

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  9. एक एक पंक्ति पढने को मजबूर रहा मैं ...
    साकार कर दिया वह द्रश्य
    लेखन इतना शक्तिशाली हो सकता है....
    कभी नहीं सोंचा...
    वंदन आपका !

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  10. कितना रोचक और सशक्त प्रस्तुतीकरण ....एक एक द्रश्य आँखों के सामने जीवंत हो जाता है...नमन आपकी लेखनी को..

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  11. शकुन्तला बहादुर8 मई 2012 को 6:39 pm

    ये लेखिका का करिश्मा है कि शब्दों की तूलिका से सारे दृश्य प्रत्यक्ष आ खड़े होते हैं।पांचाली का अतीत उसके अन्तर्मन को निरन्तर कुरेदता रहता है और आत्मविश्लेषण के माध्यम से विगत की घटनाएँ उद्घाटित
    हो जाती हैं। फलस्वरूप पांचाली के उदात्त चरित्र और उसके अन्तर्द्वन्द्व की अत्यन्त सशक्त और प्रभावी अभिव्यक्ति पर मन मुग्ध हो जाता है।

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  12. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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  13. पांचाली का मन किसी ने न समझा।
    महागाथा का संवेदनापूर्ण अंश।

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  14. महाभारत के सबसे बड़े अनर्थों मे से एक की भावभीनी प्रस्तुति के लिए आभार!

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