शनिवार, 31 मार्च 2012

नहीं ,नहीं जायेंगे आप !

*
(यह पोस्ट, इसी ब्लाग की (वर्णों पर आधारित) 'देवनगर वार्ता' दिनांक 4.10.10, के अगले क्रम के रूप में प्रस्तुत  है .कृपया उसी संदर्भ में देखें)

    जब सुबह-सुबह  दरवाज़ा खटका तो मुझे लगा पड़ोस की तन्वी कोई पत्रिका लेने आई है .
'आती हूँ ,'  आवाज़ लगाते हुए खोलने बढ़ी ही थी कि पीपिंग- होल से दिखाई दिया .चार-पाँच लोग बाहर खड़े हैं .,एक आगे बढ़ा दरवाज़ा खटका रहा था .
समझ नहीं पा रही थी कौन लोग हैं .फिर भी खोलना तो था ही .
वे पाँच लोग ,एक के बाद एक ,बिना पूछे अंदर घुस आये
.मैं चकित .
आप लोग?
'हाँ हम  ,हमें पहचाना नहीं , रोज़ वास्ता पड़ता है फिर भी..?
'देखे हुये लग रहे हैं पर ...'
'हम बाराखड़ी वाले.. .'
अब पहचान लिया मैंने .वर्णमाला के पाँचो अनुनासिक वर्ण ,ङ,ञ,ण, न और म .
सबसे आगे 'ङ' मुँह सुजाये खड़ा था और 'ञ' ऐसी शकल बनाये कि अभी चिमटी काट लेगा .
 दोनों आगे थे .
'अरे, आप सब इकट्ठे यहां ! वहाँ लोगों का काम कैसे चलेगा भला ?'
'आप ही ने तो कहा था कि अब  लोग 'अं' की बिन्दी छुटा कर अपना काम चलाते हैं .हम सब तो  बे-कार हो गये अब ..'
'और अभी तो वो सिर पर बिन्दी और चाँद-तारे वाला भी आता होगा .' 'ण' बोल उठा .
बाप रे ,पूरी फ़ौज़ !
'संकर वर्णों में से 'ज्ञ' भी आने को कह रहा था ,दरवाज़ा बंद मत करना .' म ने बताया..
'उसे कुछ कहना है ?'
'हाँ ,उसे लोगों ने बहुत ग़लत समझा है .'
अरे , मैंने कुछ लिख दिया क्या?
सफ़ाई देने लगी ,'यह बात मुझे ठीक नहीं लगी थी ,जिसका काम उसी को साजे..,
आइये, आप लोग ,स्वागत है !
सम्मानपूर्वक आसन दिया सब को . वे सोफ़े पर जम कर बैठ गये .
'आप भी बैठिये ,बात करनी है आपसे .'
'हे भगवान! क्या होगया मुझ से, जो ये सब जवाब तलब करने आ गये !
इधरवाली कुर्सी पर मैं बैठ गई
'पहले कुछ ठण्डाई बगैरह ..'
'ङ' बोला पहले हमारी समस्या का समाधान ,फिर कुछ और ..'
न ने स्पष्ट किया ,'हम गगनचारी लोग ,बस हवा खाते हैं .'
' मैंने कुछ अनुचित कर दिया क्या ?'
'ञ' आगे झुक आया .'हम दोनों इस बाराखड़ी में सबसे अधिक उपेक्षित हैं .आपने स्वयं कहा कि  अं की बिन्दी हमारा  काम करती है  और हमें टरका दिया जाता है .'
'ङ' ने जोड़ा ,'कितनी ग़लत बात है, ऊपर से ये भी जोड़ दिया कि हम नकियाते रहते हैं.'
वह कुछ ताव में आ गया था ,' ख़ुद साफ़ बोल नहीं पाते .नाकवालों के ही बस का है हमें  उच्चरित करना   .जरा कोई नाक बंद कर बोल कर तो देखे !'
मैं एकदम सकपका गई -यही दोनों तो हैं जिनका ठीक से उच्चारण लोग नहीं कर पाते -उअँ,इयँ करते रहे हैं . बच्चों को अक्षर ज्ञान काराते समय इन दोनों को मुँह से बुलवाना टेढ़ी खीर हो जाता है .जब कि ण,न,म को ठीक से  बोल लेते हैं .
'नहीं महोदय, मेरा ये मतलब नहीं था .मैं ध्यान दिलाना चाहती थी कि हमारी असावधानी और उपेक्षा से कुछ वर्ण लुप्त होने के कगार पर हैं , जिससे कि लोग सावधान हो जायें . हमारी  वर्णमाला का ध्वनि-विभाजन बड़ा स्पष्ट और सतर्क है ,बिलकुल वैज्ञानिक .जो बोलें वही लिखना .पर लोग मनमानी करने लगे हैं .'
'बिलकुल मनमानी चल रही है .ऐसा ही रहा तो और कुछ लोग भी ग़ा़यब हो जायंगे .फिर मत वैज्ञानिकता और जो बोलें वही लिखने की  डींग हाँकना !.
मैंने नत-शिर स्वीकार किया .
इतने में 'अं' दरवाजे से आता दिखाई दिया ,साथ में ज्ञ भी था  . मैंने तुरंत स्वागत कर उन्हें आसन प्रस्तुत किये .
'हाँ तो बात ङ औ ञ की है .' म आगे आ कर बोला ,'ये दोनों ,बारखड़ी से निकल जाने को तैयार बैठे हैं. .हमने कहा जाने से पहले अपनी बात कह देना चाहिये .इतनी पूर्ण वर्णमाला क्षति-ग्रस्त हो जायेगी .'
बिन्दी धारे और चाँद तारा चिपकाये दोनों लोग एक साथ बोल उठे ,'हमारे ऊपर अन्याय है  हर वर्ग में जा घुसने का हमें कोई शौक नहीं .बेकार घसीट लिया जाता है.  हमें वहाँ बड़ी बेचैनी होती है ..मन करता है उठ कर भाग जायें .'
बिन्दीवाला समझ गया बात स्पष्ट नहीं हो पाई ,उदाहरण दे कर समझाया '.पंक,इंच,बंडा चंपा ,तंदुल हर जगह हमें घसीट दिया .अरे अपने वर्ग का पंचम बुलायें .'
'आप ठीक कह रहे हैं ,पङ्क,इञ्च,बण्डा,चम्पा ,और तन्दुल होना चाहिये . '
'हाँ, उनके अपने सानुनासिक अक्षर और काहे के लिये हैं ?'
मैने समझाया ,'लग जाय भले बिन्दी ,उच्चारण तो अपने वर्ण के पंचमवर्ण का ही होता है ,देखिये तंदुल में साफ़-साफ़, 'न' निकलता है मुँह से ,चंपा में 'म' ,बंडा में 'ण' और इंच ध्यान देकर सुनिये 'ञ' की ध्वनि है ,ऐसे ही पंक में 'ङ' की .आप ,इम्च,इन्च इण्च या इङ्च न लिख सकते हैं न,उच्चरित कर सकते हैं -कर के देख लीजिये .'
मैने ख़ुद कोशिश की -' इम्च ,इण्च ...'
सब हँसने लगे .
'...और देखिये शंख को लीजिये ,मैं बोल कर दिखाती हूँ .
 शन्ख ,गलत  ,.शण्ख, नहीं , शम्ख ना ना .शञ्ख , बिलकुल नहीं . देखिये बोलने में मुँह से शङ्ख ही निकलेगा.'
'जब बोलने में निकला तो  वैसे ही लिखा क्यों नहीं ?
'आपका प्वाइण्ट बिलकुल सही है .'
'तो फिर ये बिन्दीवाला क्या करे, कहाँ जायेगा . ?'
 जानती हूँ, उससे ये लोग पहले से चिढ़े बैठे हैं .
'उनकी कोई गलती नहीं ,गलती हम लोगों की है .जो ज़बरदस्ती  घसीट लाते हैं .'
वे लोग मेरा मुँह तक रहे हैं .
'देखिये न ,जैसे  शब्द है  'संयोग',इस पर देखिये
 - लगा कर देख लीजिये ,सिर्फ़ अनुस्वार चलेगा .कोई  पंचम वर्ण काम नहीं आयेगा .
,अंश,कंस,आदि में आप अनुस्वार के सिवा और किसी अनुनासिक का उपयोग नहीं कर सकते .ट्राई कर लीजिये .'
बिन्दीवाला अं मुस्करा उठा .
मैं अपनी बात पूरी करने लगी --
'और ये नीचे की लाइन के आठ लोग यरलवशषसह  इन सब के लिये बिन्दीवाला तैनात है .'
फिर इस चंद्र-बिन्दु (चाँद-तारा ) का क्या ?इसे भी परेशान किये हैं लोग .'
बोलने की मेरी हिम्मत बढ़ गई ,
'.लोग बड़ा दुरुपयोग करने लगे हैं इस बेचारे का .सुन्दर  लगता है न .ग़लत  जगह लाकर बैठा देते हैं ..
'लोग अनुस्वार की जगह इसे लगा देते हैं .गांधी को लिखते हैं गाँधी .'
'अगर आँधी को आंधी लिखें तो कैसा लगेगा ?'
'एकदम ग़लत.'
'एक बात और मेरे दिमाग़ में आ गई, .कह डालूँ ?  .
.'हाँ,हाँ .'
'और तो और श्र का भी दुरुपयोग हो रहा है .'
'अच्छा!'
उसका रूप  विकृत कर देते हैं उसमें  भी 'ऋ' की ृकार  लगा कर 'श्रृंगार' लिखते हैं लोग ,बताइये श्रृ का उच्चारण कैसे करेंगे ? जबकि होना चाहिये शृंगार .'
सबने एक स्वर से कहा ,'ग़लत बात.'
' ये 'ज्ञ' कुछ कह रहा है .'
'हाँ ,हाँ ,कहिये .'
उसने कहा ,'ज़रा ये शब्द बोल कर देखिये - ज्ञान ,अभिज्ञान .कृतज्ञ.'
आज्ञा का पालन किया मैंने .
वह खुश, ' देखा, मुझे संकर बता रहे थे .'ग्य' नहीं हूँ मैं !हल्का-सा अनुस्वार आता  है मेरे साथ'
 .'हाँ ,आता  तो है ,आप सच्ची में 'ग्य' नहीं हैं विज्ञान बोलने में  सिर्फ़  ग्य नहीं ज़रा सी नाक भी शामिल होगी , और शुद्धतावादी लोग आपको ज्+यँ कहते हैं ,वहाँ भी अनुस्वार का पुट है.'
उन लोगों ने हामी भरी ,मेरा हौसला बढ़ा .
 लेक्चर देने की इत्ते सालों की आदत ,झट शुरू हो गई मैं ,' लोगों के उच्चारण अवयव पहले की तरह नहीं रहे ,वे सिद्धान्तों  को परे कर, आसान से आसान रास्ता ढूँढते हैं .शुद्धता का तो कोई विचार ही नहीं ..हर जगह शार्ट-कट और मुख-सुख की चाह !
हमारी चार ध्वनियाँ चली गईँ .ऋ,ऋृऔर लृ ,लृृ. अब तो श और ष में भी लोग अंतर नहीं कर पाते वह भी एक दिन किनारा कर जायेगा '.
 'सबको  ङ की और ञ की  ध्वनि को बोलने और पहचानने में कठिनता का अनुभव होता है .मुखावयवों की वे क्षमतायें भी कुण्ठित  हुई जा रही हैं . कुछ तो पहले ही समाप्त हो गईँ .'
बिना रुके बोले जा रही हूँ ,'स्वरों के साथ  मनोभाव भी समझने पड़ते हैं .बिहारी ने कहा था -'नासा मोरि सिकोरि दृग करत कका की सौंह ..' मुद्रा देख कर नारियों के मनोभाव भाँपने में बिहारी जैसा कुशल कवि मैंने नहीं देखा. कभी-कभी लोग कहते कुछ हैं पर उनका मतलब कुछ और होता है .'
वे लोग एक दूसरे का मुँह देख मुस्करा रहे  हैं.
मैं समझ गई .चुप हो गई .  .

ण कहने लगा ' बस एक बात बता दो ,,मुझे  क्यों बदनाम किया ?शिव जी का अनुयायी हूँ मैं .वे भी दिगंबर है ,शिवलिंग पूजनीय और मुझ पर आक्षेप !
हाय राम ,मैं  तो अवाक्.
.शिव लोक-पूजित हैं औघड़ भी ,और आप भी .लोक जीवन के इतने समीप इतने लोक-प्रिय कि  एक से एक कथायें प्रचलित हो गईं . .मैंने सहज विनोद भाव से आपका उल्लेख किया.बुरा मान गये आप ! क्षमा कीजिये '.
वह खुश हो गया ,'तब कोई बात नहीं ,शिव भी मनोरंजन करते हैं ऐसे  ही .'
मैं इन लोगों की मुद्रा देख रही हूँ
'आप लोगों ने हमें आकृतियों में बाँध दिया, हम तो स्वर हैं आकाशगामी! वायु-तरंगों से भाव-भोग  ग्रहण कर तुष्ट होते हैं .'.
'हाँ ,आप स्वर हैं ,अक्षर भी है अजर, अमर ,वर्णमाला छोड़ कर ,कहीं जाने का सोचिये भी मत.'.ये सारा वाङ्मय अनुनासिक ध्वनियों के  बिना ऐसा लगेगा जैसे सुन्दरी का सिंदूरबिन्दु- विहीन भाल !स्वरों व्यंजनो का माधुर्य ग़ायब हो जायगा .संगीत के सुर राग-विहीन हो जायेगे .
कितनी मंगल-ध्वनियां हैं ,आप लोगों की. न औ म के बिना कोई आरती स्तुति ,वंदना के बोल कैसे उभरेंगे और स्वागतम् ,,आनन्द- मंगल मौन हो रहेंगे .
नहीं ये जीवन के सुंदर वरदान आप लोगों  बिना नहीं बचेंगे .आप लोग तो शताब्दियों से हमारे पूर्वज ठहरे ,वर्ण देव है आप ! '
प्रभाव पड़ा उन पर .बोले ,'ठीक है .पर लोगों को समझा लीजिये ,जिसका काम उसी का करें आह्वान !
'आज्ञा शिरोधार्य' - मैं और क्या कहती .
'अच्छा ,तो अब चलें '.
सब एक साथ उठ खड़े हुये .
'अरे ,कुछ .अर्घ्य-पाद्य..! साधिका हूँ आपकी. कुछ तो स्वीकारें .. !'
अनायास कर-बद्ध नत-शिर प्रणाम कर उठी .
वरद-मुद्रा में दक्षिण-हस्त उठे ,और द्वार से बाहर निकलते ही  पल भर में जाने कहाँ अदृष्य हो गये .
 सचमुच वे आये थे या स्वप्न मेरा   - विमूढ़-सी खड़ी हूँ   !
*
- प्रतिभा सक्सेना

11 टिप्‍पणियां:

  1. एक से ही नकियाने लगते हैं, यहां तो पांच-पांच एक साथ धमके हैं, लेकिन अच्‍छी मेजबानी...

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  2. सार्थक बैठक!! उनका द्वार प्रवेश बड़ा भयजनक था :)

    पञ्चमाक्षरों की शिकायत वाज़िब है। बड़े स्वच्छ और सचेत होते है अपने अपने वर्ग सीमा में रहते हुए ही अपने साथी की अग्र-ढ़ाल बनते है। नासिका सुरक्षा के लिए। भिन्न वर्गाक्षर के सिर पे सवार होना इनकी फितरत नहीं है। पर अनुस्वार जाति के होने के कारण अपने ही जातिबंधु से भेदभाव प्रकट नहीं करते।

    ण की नकल उतारना भारी पडा :) वस्तुतः प्राकृत भाषा में इसे सबसे बड़ा सम्मान प्राप्त है वस्तुत: राजस्थान, पंजाब, हरियाणा नें तो ण को कण्ठ लगाया हुआ है।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 02-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

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  4. शुरू में तो लगा की आप कोंई कहानी सुना रही होंगी ---अंत आ जाता है पर मन नहीं भरता पडने(पढ़ने) से ---

    आप मेरी प्रतिक्रिया की --हंसी (हँसी) न उडाना (उड़ाना )

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  5. बहुत सुंदर । पञ्चमाक्षरों की रामकहानी ही हिन्दी की रामकहानी है । दरअसल पहले मैं इसे शोकगाथा समझता था । मगर बाद में जब सन्त साहित्य देखा, हिन्दी समेत अन्य भाषाओं का व्यापक स्वरूप देखा तब लगा कि किसी भी भाषा का शुद्धतम रूप निश्चित करते ही सबसे पहले वही मानक रूप चलन से बाहर होता है । पिछली टिप्पणी में भी कहा था कि मनुष्य का स्वभाव ही अराजक होता है और भाषाओं का भी । वही भाषा बढ़ती है जो ज्यादा अराजक होती है । वर्णों का स्वभाव और चरित्र निश्चित होने के बावजूद भाषा के दायरे में आकर सचमुच गड़बड़ होने लगती है । यह ठीक वैसा ही है जैसे आप पानी के गिलास से पेपरवेट का काम लेने लगें। पेपर वेट से हथोड़ी का और चम्मच से स्क्रू कसने लगें । किताब को मटके का ढक्कन बना दें । लेकिन ऐसा ही होता है । ये तो बेजान चीज़ें हैं, हमारे संस्थानों तक में यही होता है । जिसे जो करना है , वह न कराते हुए उससे कुछ और काम लिया जाता है । स्वाभाविक है कि कशमकश तो होती है । पर दुनिया यूँ ही चलती है :)

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  6. मेरे पास तो बस इस प्रस्तुति के लिये एक ही शब्द है "अद्भुत".

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  7. अक्षरों का इतना बारीक अध्ययन, उनके उच्चारण के फर्क को इतना सरल, बोधगम्य और रोचक बनाकर पेश करना, वर्णों को जीवंत पात्र बना देना, यह सब प्रतिभा जी के वश की ही बात है. कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग आदि के अंतिम अक्षरों की जगह अनुस्वार के प्रयोग के बाद भी ध्वनि उस अंतिम वर्ण की ही आती है, खास तौर से इस तरह की बातों की ओर ध्यान आकृष्ट करना उनके फोनेटिक्स के गहरे ज्ञान को दर्शाता है. प्रतिभा जी का प्रोफाइल देखा यह जानने के लिए कि वे हैं क्या. वहां इतनी काम जानकारी है कि निराशा हुई. अस्तु.

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  8. शकुन्तला बहादुर2 अप्रैल 2012 को 8:06 pm

    अनुस्वार एवं अनुनासिक का विश्लेषण सूक्ष्मता से किया गया है।आज
    कल लोग दोनों के भेद को भूलने लगे है।"कादम्बिनी"जैसी पत्रिका में भी चन्द्रबिन्दु के स्थान पर सर्वत्र अनुस्वार का ही प्रयोग शब्द की ध्वनि को विकृत करके अनिष्ट अर्थ देने लगता है।उसे अपनी बुद्धि से ही समझा जाता है।जैसे-हँस(हँसना) और हंस(पक्षी)।हँसने में अनुस्वार का प्रयोग अनुचित है।कुँवर और कुंदन-एक में क् का उकार अनुनासिक है और दूसरे में क् के उकार पर अनुस्वार है,जो
    नकार के स्थान पर आया है।दोनों की उच्चारण ध्वनियाँ भिन्न हैं।
    अनुनासिक वर्णों और अनुस्वार के सूक्ष्म स्पष्टीकरण के लिये प्रतिभा जी का साधुवाद!!आलेख की नाटकीयता ने वर्णों के विवरण को अत्यन्त रोचक बना दिया है।

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  9. पोस्ट के बारे में कहने योग्य नहीं हूँ प्रतिभा जी.....मगर मुझ अल्पज्ञानी ने ज्ञानार्जन किया बहुत अधिक... आपकी पोस्ट से भी और गुणीजनों की मूल्यवान टिप्पणियों से भी ।
    अच्छा है आपने इस विषय को विस्तार दिया :)

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  10. अद्भुत शैली में गूढ़ विषय

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