गुरुवार, 11 अगस्त 2011

एक थी तरु - 28 & 29.


28 .
अन्दर घुसते ही तरु को  महक लगी जैसे कुछ जल रहा हो .कुछ देर में महक और तेज़ हो गई .
"चंचल , कुछ जल रहा है क्या?"
"नहीं तो मम्मी ."
"बड़ी महक आ रही है ."
"हाँ,हमें भी लग रही है .इनके घर से आ रही होगी ." चंचल ने पड़ोस के घर की ओर इशारा करते हुए कहा .
"अरे ,ये धुआँ भी आने लगा .ये तो अपने घर के अन्दर से आ रहा है .".
"उन्हीं के यहाँ से धुआँ भी आ रहा होगा .मम्मी .अपने यहाँ घुस आया होगा ."
आजकल श्यामा का बेटा सौरभ आया हुआ है .चंचल से खूब पटरी बैठती है उसकी .
चंचल फिर भाग गई सौरभ से गप्पें लगाने .
महक और धुआँ बढता जा रहा है .
तरु से रहा नहीं गया .उठकर भीतर गई .देखा टोस्टर में से आग की लपटें उठ रही थीं .उसने़ फ़ौरन स्विच आ़फ़ किया .
जोर से आवाज लगाई ,"चंचल .ऐ चंचल ."
मम्मी बार-बार आवाज़ दे देती हैं .खेल मे डिस्टर्ब होता है .दो-तीन आवाजें अनसुनी कर चंचल वहीं से चीखी ,"क्या है मम्मी ?"
"क्या है की बच्ची ,यहाँ आकर देख ." उसने माँ को जले हुये टोस्ट निकालते देखा तो घबरा कर बोली ,"अरे, हम लगा के भूल गये ."
"हमेशा यही करती है . टोस्ट लगा देती है और जाकर ही-ही करने लगती है.यहाँ टोस्ट जल कर कोयला हो गये लपटें उठ रही हैं और वह कहे जा रही थी पड़ोस से महक आ रही है ...पड़ोस से धुआँ आ रहा है .."
चंचल क्या बोले ?मम्मी ने कहा था विपिन दादा के लिये टोस्ट भून लो उसने लगा दिये .विपिन दादा चले गये तो वह टोस्ट लगा कर भूल गई .
तरु कहे जा रही है ,"...उस दिन भी फुँक गये थे .मैं न देखूँ तो ये लड़की जाने क्या दुर्घटना कर डाले .---ये ऊपर ही अरगनी पर कपड़े टँगे हैं जिनमें टेरेलीन की साडियाँ और फ्राकें भी हैं --एक बार आग पकड़ लें तो बुझाना मुश्किल ... .
...कल भी यही हुआ दूध उबल-उबल कर गिरता रहा .जल कर भगोना कोयला हो गया,और वह बाहर खड़ी ही-ही- करती रही ."
चंचल विवश सुन रही है .
बिचारी क्या करे .दूध चढ़ा कर सोचती है अभी तो उबलने में बहुत देर है,ज़रा सा चक्कर बाहर का मार ले और बाहर जाकर बिल्कुल ध्यान से उतर जाता है .जब मम्मी चिल्लाती हैं तब होश आता है .
तरु को बड़ा गुस्सा चढ़ा है,
"इतना कहती हूँ पर इस पर कोई असर नहीं .कहा था विपिन के लिये टोस्ट भून ले ,सौरभ के लिये भी.. और भूख खुद को भी लगी होगी  पर ही-ही,खी-खी में उसे खाने का होश कहाँ....
इतनी बार प्यार से समझाया.डाँटा ,,हर तरह से कहा कि दूध चढ़ा कर और टोस्ट लगा कर वहीं खड़ी रहो .पर वह हमेशा चल देती है ... और सौरभ कहाँ है ?"
"बाहर ,बैडमिन्टन खेलने ."
टोस्ट कितने भून लिये ?किसी ने खाये कि नहीं ?"
"अभी कहाँ ?पहले ही तो लगाये थे ."
तरु और बिगड़ी .
चंचल खिसक ली .सामने खड़ी रहेगी तो मम्मी बराबर डाँटती रहेंगी .
चुप होकर तरु ने इन्जार किया .न सौरभ आया न चंचल .अब ये भी नहीं कि दोनों जने कुछ खा लें !
वह उठी  दूध में कार्नफ्लेक्स डाले .
बाहर से बोलने की आवाजें आ रही हैं
उसने आवाज़ लगाई ,"चंचल ."
कोई जवाब नहीं .चंचल ने सोचा मम्मी फिर डाँटने को बुला रही हैं . चुप लगा गई .
"चुड़ैल ,वहां जा कर बैठ गई .बहरी कहीं की .."
चुड़ैल आ कर मुँह फुलाये खड़ी हो गई .
गुस्सा आता है तो आता ही चला जाता है .
"अब क्या कर रहीं थीं ?"
भइया ने बुलाया था .खेल रहे थे ."
"भइया कहे कुएँ में गिर पडो ,तो गिर पड़ना जा के ."
बिचारी चंचल ,क्या बोले !
दो कटोरियों में कार्नफ्लेक्स उसने चंचल को पकड़ा दिये .
वह लेकर झट से चल दी .
भीतर दोनों भाई -बहिन खा रहे हैं .हँसने-बोलने की आवाज़ें बाहर तक  आ रही हैं .

उसने फिर आवाज नहीं लगाई ,दो गिलास पानी अन्दर पहुँचा दिया .
दोनों के ही-ही,खी-खी की आवाजें बाहर तक आती रहीं .
***
पूरे एक सप्ताह बाद असित अटैची लटकाये रिक्शे से उतरे .
आना था परसों ,पर दो दिन पहले अचानक आकर तरु को सरप्राइज़ देना चाहता है .उतावले कदमों से घर की ओर बढ़ते हुए  उसे बंद दरवाज़े पर ताला लटकता दिखाई दिया .
'अरे, 'उसके मुँह से निकला , सात बज रहे हैं ऑफ़िस से तो कब की लौट आई होगी .

आहट सुन कर पीछे के क्वार्टरों से महरी की लड़की शोभा निकल आई .
'बाबू जी ,दीदी तो गई हैं ,'
''कहाँ?'
'एक बाबू जी और बीबी जी आए रहे उनहिन के साथ.'

अटैची रख चाबी निकाली असित ने ,घर की एक चाबी उसके पास रहती है .

ताला खोल कर कमरे में जा बैठा .
पानी लेने उठ कर रसोई में गया ,लगता है आज सुबह से खाना नहीं बना .
न खाना बनने का कोई चिह्न ,न सिंक में जूठे बर्तन.
फ़्रिज खोला ,दो स्लाइस के साथ मक्खन जैम निकाला ,बैठक में ला कर खाने लगा .

फिर उठा- चाय का पानी गैस पर रख आया .दूध है थोड़ा-सा .गैस धीमी कर दी शायद तब तक तरु आ जाय !

वह चाय पी चुका.
तरु अभी भी नहीं आई .सात ,फिर आठ बज गये.
बड़ी खीझ लग रही है -क्यों चला आया बेकार में !

नौ बज चुके देखा तरु चली आ रही है ,. 'अरे ,तुम कब आये ?'

असित का चढ़ा मुँह देख सफ़ाई देती-सी बोली ,' जितेन्द्र का मीना से झगड़ा हो गया ,वह मिट्टी का तेल डाल कर आग लगाने को तैयार थी .वो अपनी बहिन के साथ मुझे लेने आया .'
'हाँ ,तुम्हें औऱों के झगड़े से कहाँ फ़ुर्सत है .हमारी ही ग़लती है जो समय से पहले घऱ चले आए.'

'ग़लत मत समझो .यह बात नहीं .लेकिन कोई बुलाने आए तो कैसे मना कर दूँ .वह तुम्हारा ही दोस्त है .कितनी मदद करता है तुम्हारी ...मजबूरी में रुकना पड़ा..' वस्तुस्थिति पर ध्यान जाते ही वह शान्त हो गया .'
'फिर क्या हुआ सब ठीक है न ?'
'बड़ी मुश्किल से समझाया है .जितेन्द्र की माँ उससे बहुत असंतुष्ट है .हमेशा शिकायतें करती है, उसे भरती रहती हैं.''
'अब बस भी करो. वो जाने उसका काम जाने .जिसे देखो मदद के लिये चला आ रहा है .सब के लिये तुम्हारा घर खुला है एक मेरे लिये छोड़ कर .'
'तुमने कुछ खाया कि नहीं ..'तभी उसकी दृष्टि चाय के प्याले और प्लेट में पड़े ब्रेड की कोरों पर गई .
'अभी खाना तैयार करती हूँ ,भूख लगी होगी तुम्हें .'
वह झट-पट किचेन में जा घुसी .फ्रिज में से गुँधा हुआ आटा निकाला  और अंडे लेने फिर बाहर आई ,असित वैसा ही कुर्सी पर बैठा है .
'अब उठो  न ,हाथ-मुँह धो  कर कपड़े बदल लो .'
आमलेट बना कर पराँठे सेंकते-सेंकते उसने प्लेट असित के आगे रख दी .
'लो शुरू करो .'
'तुम भी आ जाओ .आज सुबह तो खाना बना नहीं था?'
सुबह ,हाँ ,सुबह  -
नहीं बनाया था कुछ . चंचल को स्कूल भेज कर कुछ बनाने का मन नहीं किया .शाम को लवलीन  ,चंचल को ले जाने को कह गई थी,अकेले मन नहीं लग रहा था उसका .

 नौकरी छोड़ चुकी थी तरु .चंचल के साथ ,गृहस्थी के साथ न्याय नहीं हो पाता था .
एक तो ढंग के नौकर नहीं मिलते ऊपर से रोज-रोज की किच-किच .पैसा खर्च हो सो अलग और निश्चिन्ती  का नाम नहीं .असित का प्रमोशन हो गया  ,घर का खर्च अच्छी तरह चल रहा़ है फिर बेकार की दौड़-भाग से क्या फ़ायदा  ?
चंचल स्कूल चली जाती है और असित दौरे पर . घर पर अकेली रह गई तरु . कुछ करने का मन नहीं हो  रहा

अकेले खाना खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं .पर अब खा लेना चाहिये,यह सोच कर उठी .खास भूख तो है नहीं .थाली परोस कर क्या करना .उसने फ्रिज में से सब्जी निकाली रोटी पर रक्खी और कौर तोड़ती हुई कमरे में आ गई
कद्दू की सब्जी !
पिता को तरु की बनाई कद्दू की सब्जी बहुत अच्छी लगती थी. बहुत साल पहले की एक घटना मस्तिष्क में कौंध गई --
तरु चौके में बैठी ,कड़ाही से कटोरे में सब्जी निकाल रही है ,बाहर किसी के आने की आहट हुई .जाली में से दिखाई दिया पिताजी ते़ज़-तेज़ कदमों से आ रहे हैं .
कुण्डी खटके इसके पहले ही वह दरवाज़ा खोल आई .
"तरु ,तुमने आज कद्दू की तरकारी बनाई है न ?"
"हाँ ,पिता जी ."
वे चौके के दरवाजे पर खड़े हो गये .तरु ने दाल छौंकने के लिये चमचा अंगारों पर रख दिया .
"रोटी सेंक चुकीं ?"
"बस सेंकने जा रही हूँ ."
तरु ने थाली परसी .पहली रोटी सेंक कर थाली में रखी और थाली उन्हें पकड़ा दी .
अम्माँ पूजा कर अपने कमरे से बाहर निकल रही हैं
"आ गये तुम !जानती हूँ , कोई बिना खाये कैसे रह सकता है."
पिता चेहरा स्याह पड गया है .
"अम्माँ." तरु चिल्ला पडी .
"चुप रह ! बड़ी खैरख्वाह बनी है ."
हाथ का टूटा हुआ कौर उन्होने थाली में ही फेंक दिया है ,"रोटी मैं नहीं खाता , वह मुझे खाती है ."
वे थाली पटक कर चले गये .
तरु रोटी सेंक रही है .आँसू टप-टप कर गिर रहे हैं .वह बाँहे उठा कर पोंछ लेती है फिर रोटी बेलने लगती है .
ऐसा घर होता है ?उसने सोचा था ऐसा घर मुझे नहीं चाहिये .वे भूखे लौट गये ,परसी हुई थाली फेंक कर .यह नरक है .मुझे नरक नहीं चाहिये .
कद्दू की सब्जी वाला कौर हाथ में पकडे तरु कुर्सी पर बैठी है .आँसू भरी आँखों की दृष्टि धुँधला गई है .हाथ उठाकर ब्लाउज की बाँह से  आँखें पोंछ लीं .

आज भी उसे स्वप्न आता है -पिता आये हैं ,चुपचाप खडे उसकी ओर देख रहे हैं
"पिताजी ,खाना ."वह कहती है . और वे लौट कर चले जाते हैं .वह आवाज नहीं दे पाती .चुपचाप देखती रहती है .कितने घरों मे ,कितने लोग ऐसे भूखे रहते होंगे ?बिना किसी से कहे ,बिना किसी के जाने ,यों ही तिल-तिल कर समाप्त हो जाते होंगे ?
ये कैसे व्यवहार हैं दुनिया के ,जहाँ जीवन भर साथ रह कर भी आदमी एक दूसरे को समझ नहीं पाता ?अकेले बैठे-बैठे तरु को लगने लगा है सारा जीवन व्यर्थ बीता जा रहा है .लेखा-जोखा करने बैठती है ,कुछ भी हात नहीं आता .उसने कभी सोचा था जिन्दगी का क्या है ,यों ही बीत जायेगी .दूसरे की जान का जंजाल बन कर घर क्यों बसाया जाय १पर घर के लोग पीछे पडे ,असित को लेकर मन दुर्बल हो गया और अब यह गृहस्थी .क्वाँरी रहती तो भी सबकी सुनती ,इतराती किसके बल पर ?रूप उसके पास था नहीं ,स्वभाव सदा का ऐसा ,जिसकी सदा आलोचना ही सुनती आई -सोच समझ कर बोलना नहीं आता ,लट्ठ सा मारती चलती है .
पर जो लगता है वही तो कहती है .अगर न कहे और कुछ और बना कर कह दे तो भीतर -भीतर कुछ कचोटता रहता है,अन्दर ही अन्दर उफान साउठता रहता है .उस स्थिति को वह किसी तरह सहन नहीं कर पाती .सारी दुनिया धिक्कारती रहे वह चुप सनती है  पर अपने ही भीतर से उठती धिक्कार उससे सही नहीं जाती .
मन क् उद्वेग बार-बार जागता है.तरु को बराबर लगता है,जिसने हमे दुनिया मे सिर उठा कर जीने योग्य बनाया ,हमने उसे जीने नहीं दिया .समने कोशिस की होती तो वे इतनी जल्दी न मरते .यह क्या उनके मरने की उम्र थी ?
भीरे-धीरे मौत की ओर बढते हुये उनके कदमो को देखा है तरु ने  .मृत्यु से पहले ही उनकी जीने की इच्छा समाप्त हो गई थी .गड्ढे मे धँसी आँखें और निष्प्राण सी देह .अच्छा हुआ जो मर गये वे .उस कष्टमय जीवन से मुक्ति पाली उन्होने ..नहीं तो कितना और घिसटते ?
उसकी समझ मे आ गया है कि जीवन के सुख बहुत सतही होते हैं और दुख अपने मे पूरी तरह डुबो लेने मे समर्थ .
  और अम्माँ !उनका अन्त भी कैसा हुआ !आधे शरीर को लकवा मार गया था .जुबान बन्द  हो गई थी .हमेशा कुछ नकुछ कहती रहने वाली जीभ पूर्णतः शान्त हो गई थी .आँखों से देखती रहती थीं ,इशारे करती रहती थीं ,कभी समझ मे आते कभी नहीं ,जितने दिन घसटीं साक्षात् नरक .न स्वयं को चैन न दूसरों को . भाभी को क्यों दोष दे .उन्होने जो किया बहुत किया ,कोई दूसरा शायद उतना भीन करता .उस अन्तिम सप्ताह मे तरु ने एक दिन उनके साथ बिताया था ..फिर वह चली गई थी और उसे तार द्वारा हा ही उनकी मृत्यु की सूचना मिली थी .अन्त काल मे उन्होनेयाद किया होगा .शायद किया हो १मस्तिष्क सारी शक्तियांतो पहले ही जवाब दे गईँ थी
तरु की कहीं नहीं चल सकी थी .उसके ऊपर भीकितने आरप लगे थे .मां कुपित रहतीं थीं ,बहिनअसंतुष्ट.विवाह के ाद शन्नो की तरु से उम्मीदें और बढ गईं थीं .उन्हें लगता था वे तो अब मेहमान बन कर आती हैं ,तरु को उनकी हर तरह से खातिर करनी चाहिये ,आराम देना चाहिये .वे कहती भीथीं मै आती हूं पर इसे अपनीपढाईऔर घूमने से ही छुट्टी नहीं -घर का काम किसी तरह निपटा दिया और चल दी .
"कहाँ जाती है रोज-रोज ?घर मे नहीं बैठा जाता ?"शन्नो जवाब तलब करतीं तो वह कुछ नहीं बोलती .
तरु आवारा है ,घंटों घर से बाहर रहती है ,किस-किस के साथ जोड दिया था उसका नाम उन्होने .घर मे रिस्तेदारों के आने पर तीखी -तीखी आलोचनायें होतीं .रिश्तेदार थे कौन /मौसी ,मामा और उनके बाल-बच्चे .वे तो बहुत पहले से ही तरु को अपनी नजरों से रृगिरा चुके थे .अब वह उनकी परवाह नहीं करती थी .
उसे वह सब बद -दिमाग और स्वेच्छाचारी कहते थे ,पर उसने कभी सफाई देने का प्रयत्न नहीं किया उसे लगता था सफाई देने से वह और नीचे गिर जायेगी .
हां ,रोज जाती थी वह .दो आठवीं की ट्यूशने की थीं उसने ,मीना ने दिलाई थीं .कुल तीन महीने वह ट्यूशनकर पाई थी ,बिना किसी को बताये .बताने पर घर मे हल्ला मच जायेगा ..पर पिता की भी कुछ जरूरतें हैं यह कोई नहीं समझता !
तरु बता देगी तो अम्मआँ नाराज होंगी ,कहेंगी हां ,तुम्हीं तो एक लगी हो उनकी !मेरे लिये तो आज तक कुछ नहीं सोचा ,और रुपये उनके पास चले जायेंगे .अपने मायकेवालों के लिये अभी बहुत कुछ करना है उन्हे .शन्नोकहेंगी -मेरे बच्चों के लिये कभी कुछ लाने का मन नहीं हुआ तेरा ?
पिता की चाय की आदत थी .जब मां आस-पास नहीं होतीं  तो चुपके से बना कर दे आती वह .वे तरु के लाने पर मना नहीं कर पाते थे चाय उनकी कमजोरी थी ,उनकी तलब थी उनकी शक्ति थी .पर मां बहुत कटु थीं .कुसी बात पर तिनक कर बोलींथीं ,"तुम अपनी चाय छोड सकते हो ?"
"तुम्हें इतनी ही दुश्मनी है तो वह भी छोड दूँगा ."उन्होने भी ताव मे आकर कहा था .
तलब लगती है तो उन्हें कितना कष्य होता है तरु जानती थी परवे जिद के मारे पीते नहीं थे . दो-चार बार फपनेदफ्तर जाते समय उन्होने तरु से पूछा था ,"एकाध रुपया है तुम्हारे पास ?"
उन्हे मालूम था ,गौतम भइया जब-तब तरु को कुछ दे जाते हैं .जब तक रहे वह पकडा देती थी पर अब कुछ नहीं है उसके पास .पिता की जेब मे कुछ पडा रहे तो अच्छा है .वे चाहें तो चाय पी सकते हैं ,चाहें तो रिक्शा ले सकते हैं .वे एक बार रास्ते मे गिर पडे थे ,उन्होने बताया नहीं पर उसे मलूम है .
उसी बीच मौसी अपने लडके नवीन के साथ आई थीं .नवीन उससे कुछ बडा था .तरु की आलोचना सुनकर उसने जानना चाहा था .
नवीन का समाधान कर रही थी वह .घर आकर रहनेवाला वैसे भी घर की स्थितियों का अन्दाज लगा लेता है ,उससे सब कुछ तो छिपा भीनहीं सकती थी .
उसे धीमे-धीमे बता रही थी ,मां की कठोरता के बारे मे नहीं ,पिता की जिद के बारे मे नहीं ,वह बता रही थी आजकल मै खाली हूँ ,कई साथिने भी अच्छे-खासे घरों की होकर ट्यूशन करती हैं .
बातों के बीच मेअम्मांकी जरदार आवाज आईथी ,"बेशरमकहीं की ,नवीन से घुट-घुट कर क्या बातें किया करती हो ?समझ लिया कि हम लोग बेवकूफ है !"
मौसी ने तेज स्वर मे नवीन को आवाज दे ली थी .जब उसने तरु की वकालत की तो बात और बिगड गई .मौसी ने तिरस्कार से कहा ,"भाई को भी नहीं छोडा ."
अगले दिन नवीन वापस लौट गया था .चलते-चलते वह शन्नो को बता गया था ,"वह ऐसी नहीं है .उसने बच्चों की ट्यूशने की हैं इसमे क्या बुराई है ."
शन्नो ने तरु से पूछा ,"कितने रुपये कमा लिये ?मेरे बच्चों के लिये तो कभी कुछ किया नहीं .ट्यूशन की थी तो कह कर करती .बहाने बनाने और झूठ बोलने मे तू शुरू से होशियार है ."
फिर सन्देह भरी द-ष्टि से देखते हुये बोलीं थीं ,"अच्छा ,मीना का भाई नहीं होता था वहां ?"
"मीना का भाई ?वह तो उनबच्टों की बहनविभा से मिलने आता था .अब उनदोनो की शादी हो रही है ."
"तू चाहेगी भी तो तुझे लिफ्ट देगा कौन ?"
शन्नो हमेशा चुभनेवाली बात कहती हैं .पर तरु से कुछ कहते नहीं बनता ,वह चुपचाप उठ कर चली जाती है ,इन झूठे आरोपों का खण्डन कर अपले को और कितना गिरा ले!वह हमेशा की अडियल है शन्नो ठीक कहती हैं .
मुझे कोी नहीं चाहता पर इसमे मेरा क्या दोष !तरु सोचती है पर समझ नहीं पाती .,जो ठीक समझ कर करती है वह भीसबको गलत लगने लगता है .
पर पिता ?उन्हें कुछ हो गया तो? कहो जिसे कहना हो कहो ,पर मेरे पिता का कुछ अनिष्ट न हो !
पर अनिष्ट कहां रोक सकी थी ?कुछ नहीं कर पाी तरु .जो सोचती है कभी नहीं होता .उनकी निर्बलता बढती गई ,वे बिस्तर पर पड गये ,उन्होने खाना-पीना बिल्कुल बंद कर  दिया  उठना मुँह धोना कुल्ला करना छोड दिया .बोलना छोड दिया ,सुनना छोड दिया और तरु बेबस देखती रही .उस असह्य स्थिति का साझीदार तब कोईनहीं था ,फिर अब उसकी स्मृति का साझा करके क्या होगा ?
डॉक्टरों का क्का ?कोई भीबीमारी बता देंगे ,दवा लिख देंगे ,उनके बूते का कुछ नहीं .
जिन्गीमे क्या -कुच जायेगा पहले से कुच मालूमनहीं पडता .बडी-बडी घटनायें अनायास ही घट जाती हैं .मनजाने कितनी योजनायें बनाता है ,उन्हे साकार करने को एडी-चोटी का जोर लगा दिया जाता है ,पर सारे किये धरे पर पानी फेर देनेवाली घटनायें अनायास ही घट जाती हैं .तरु का मन सुन्न सा हो गया है
भीतर से कोई पूछता है ,"किसी के सही गलत का निर्णय करनेवाली तू कौन ?तूने क्या किया ?मां को फालिज गिरा तेरे ही कारण .?
वह अपने से कहती है -मै अपराधी हूं ,मै पापी हूं ,हाँ ,पापी हूँ !
---------

'फिर तुमने क्या खाया ?'असित का स्वर सुन वह चौंकी-सी वर्तमान में लौट आई .

असित  उत्तर की प्रतीक्षा में. .

'रखा था .शाम का काफ़ी बच गया था.फिर अकेले के लिये बनाने का मन नहीं हुआ .तुम शुरू करो ,बस मैं अभी आई .'
वह फिर चौके में जा घुसी .

खा-पी कर सोते-सोते ग्यारह बज गए .
'मुझे घर चाहिये और तुम चाहिये .तुम नहीं होतीं तो मुझे घर अच्छा नहीं लगता .तरु, मुझे हर पल तुम्हारा साथ चाहिये .बाहर से भटक कर आता हूँ तुम्हारी बाहों में शान्ति पाने के लिये .तुम सिर्फ़ मेरी हो और किसी की नहीं '
'हाँ ,मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ .'
'तुम्हें अपने से बिलकुल अलग नहीं रहने देना चाहता ....'असित तरु को अपने में समेट लेना चाहता है ,'तरु तुरइया ..'
'तरुइया क्या होती है ,जानते हो ?'
'क्या?'
'तुरई को लोग तरुइया भी कहते हैं .'
'सच में तुम तरुइया होतीं तो मैं तुम्हें खा जाता.तरुई..तुरई.तुरई ..'
यों ही लेटे-लेटे ,असित का सामीप्य. अनुभव करते वह बहुत बातें करना चाहती है .बहुत-कुछ है कहने को उसके पास ,बहुत कुछ असित से पूछना है .पर बात करने का अवकाश वह नहीं देता .इस समय नहीं ,बिलकुल नहीं .तरु के बोलने पर मुँह बंद कर देना उसे आता है .
***


राहुल के तिलक से शादी तक के लिए भी मकान मालिक से इधऱ के दो कमरे और एक बराम्दा ले लिया गया है .इसी के पाँच-सौ रुपए माँग लिये उन्होने - सिर्फ़ पन्द्रह दिन के .
माँजी ने ना-नुकुर की पर सबकी सलाह हुई कि कहीं और जाने में परेशानी बहुत होगी और खर्च अलग से, सो यहीं ले लिया जाय .सामान उठाये-उठाये इधर-उधऱ भागना तो नहीं पड़ेगा .इस खिड़कीवाले कमरे के उस तरफ़ शुक्लाइन का चौका है ,और पीछे एक कुठरिया जिसमें उनके बक्से धरे हैं .
उनकी बड़ी बेटी सुशीला जब से ससुराल से आई है उसे हिदायत दे दी गई है -गहना-गुरिया उतार के संदूक में मती धरियो .कहूँ दन्नू के हाथ परिगौ तो हम तो मुँह दिखाबे के लायक नाहीं बचिंगे .
और सुशीला हर बखत झुमकी, कंगन ,हार और अँगूठियाँ पहने रहती है .
एक दिन घर के सब लोग कहीं गये थे ,सुशीला चौके में खाना बना रही थी.आँगन से दन्नू कमरे में जाते दिखाई दिये .सारे घर का चक्कर लगाने के बाद सुशीला से पूछा कौन ,कहाँ गया है ,कब तक आयेगा.
फिर वे चुपचाप कुठरिया में जा घुसे .
थोड़ी देर बाद सुशीला का ध्यान गया  - जे दन्नू इत्ती देर से कुठरिया में का कर रहा है?
तवा उतार कर वह उधर गई.
देख कर सन्न !
'जे का कर रहे हो , दन्नू?चोरी कर रहे हो,?..हाय..हाय हमार बकसा .'वह चिल्लाई.
चीख की आवाज़ सुनकर रश्मि दौड़ी ,पीछे-पीछे तरु भी चली आई.
दन्नू सुशीला के बकसे से जूझ रहे थे .बड़ी करुण दृष्टि से ताकने लगे .

ताला मज़बूत था उसे तोड़ने की कोशिश उनने नहीं की ,ढक्कन के साइड की एक कील निकाल दी थी ,और उसे उचका कर बकसे में हाथ घुसा दिया था.लेकिन भारी ढक्कन ऊपर उठा नहीं  हाथ बीच में फँस गया .दूसरे हाथ से दन्नू दूसरा जोड़ खोलने के चक्कर में थे ,उधर फँसा हुआ हाथ बाहर निकल नहीं रहा था ,पीरता जकड़ा हाथ फँसाये जस के तस बैठे रह गये .
'चोट्टा कहूँ को ,काहे तोड़ रहो है हमार बकसा ?'
परिश्रम से लाल मुँह घुमा कर दन्नू बोले ,'जौ बकसा कैसो टूटो धरो है .हम सँभार रहे हते सो हाथ फँस गौ. हाय..हाय टूटो जात है .'
'अच्छा होय टूट जाय हाथ ! बकसा अपने आप जाय के जूझ गौ तुझ से ,हरामी ,चोर दुस्मन कहूँ को ..'
सुशीला ने भुनभुनाते हुये ढक्कन उचकाया .
हाथ खींच कर सहलाते हुये दन्नू बाहर भागे .
रश्मि और तरल हँसते-हँसते दोहरी हो गईं.
***
आज शुक्लाइन सफ़ाई पर तुल गई हैं.
इधऱवाले कमरे में भारी-भारी धन्नियां रखी हैं और ईंटं सीमेन्ट की बोरियाँ वगैरा भी.
कोई नहीं आता इधऱ .

इधर से तरु को आवाज़ देकर उन्होंने कहा ,'दुलहिन ,नेक धन्नी उचकाय देओ,नीचे मार दलिद्दर जमा है .ऊपर को खंड बनन की नौबत ही नाहीं आय रही है .मार घुनाय जाय रही है लकड़ी .'
उन्होंने झाड़ू से नीचे का कूड़ा खींचा तरु हाथ से ज़ोर लगा कर धन्नी उचकाये है .
कूड़े के साथ फड़फड़ा कर आते नोट देख तरु चौंक कर बोली,' अरे,अरे ,यह क्या ?चाची जी आपके यहाँ धन्नियों के नीचे नोट रखते हैं ?'

धन्नी के नीचे से निकले मुट्ठी भर नोट देख शुक्लाइन ने आँखें फाड़ दीं .
.
हँसी को तरु ने भरसक दबा लिया
.दस-दस के पाँच-छः के दो-दो के ,एक-एक के नोट बिखरे पड़े थे .
'उसई हरामजादे की करतूत  है,' खिसियाई-सी चाची बोलीं ,'उहै है जान को दुसमन .मरत भी तो नाहीं अभागो .हियन छिपाय के धरे हैं.'
 दन्नू के लिये मुँह से गालियों और बद्दुआओं की बौछार  फूट पड़ी.
झाड़ू डाल कर फिर खींचा तो कुछ नोट और चिल्लर और निकली.गिने कुल सड़सठ रुपये सैंतालिस पैसे .
'हाय सुसीला ,' सिर पीट लिया शुक्लाइन  ने.
सुसीला के दूल्हा की जेब से उसई ने चुराय के धरे हैं .माता खायें ,हरामी के कोढ़ फूटे .कौन पापन को फल है जो हियन आय के पैदे भओ है ...'
सुशीला के दूल्हा जब बिदा कराने आये थे तो बाहर टँगे उनके कोट की जेब से सौ का नोट ग़ायब हो गया था .इधर-उधऱ सबसे पूछा ,ढूँढा पर नोट न मिलना था न मिला .
सुशीला समझ गई पर नई-नई शादी ,बिचारी क्या कहे !
उलटा उसने अपने दूल्हा से ही पूछा,'नोट धरो थो कि कहूँ और निकरवाय आये ?'

'हाँ,हाँ खूब धरो थो ,सुबे दन्नू के सामने धरो थो .'
तब तो हुइ गौ कल्याण ,सुशीला ने मन -ही-मन सिर पीट लिया .वह चोट्टा काहे को छोड़ेगा .पर चुप लगा गई .

दन्नू की करतूतें सब के मनोरंजन का साधन बनी हैं .
असित कहते हैं ,'जैसी कमाई बाप की वैसे ही तो जायगी .दूसरों का ख़ून चूस-चूस कर दौलत जोड़ी .तभी तो लड़के उड़ा रहे हैं .कोई भी ढंग का न निकला ..अब तो बहुयें भी आपस में खूब लड़ती-झगड़ती हैं .हमेशा कुछ-न-कुछ कोहराम मचा रहता है .
इधर बहुत दिनों से पिटे नहीं हैं दन्नू .आने दो शुक्ला जी को फिर उधेड़े जायेंगे .
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29..
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मिले-मिले घर ,ऊपर से इधर शुक्ला जी के पोर्शन में अबाध आवागमन -आपस में  एक-दूसरे का पूरा हाल पता रहता है.मेहमान अभी कोई खास नहीं बस श्यामा का परिवार वह भी पूरा नहीं .माँजी की एक बहिन भी आई हैं.तरु की जिम्मेदारी बढ़ गई है .उसका काम अधिक तर इस कमरे में ही चलता है ,जोशादी के लिये लिया गया है . उसके कमरे से लगा हुआ है और इधर सामने चतबूतरा ,-सब दिखाई सुनाई देता है - बस खिड़की का परदा   ज़रा- सा खींचने  भर की देर है .

.मकान-मालिक शुक्ला जी ने सुबह-सुबह दन्नू की जम कर धुनाई की और गरियाते हुये बाहर चबूतरे पर निकल आये ,
 इतवार का दिन है नहीं तो साइडवाले मकान के बाहरी कमरे में ध्यानू मास्टर लड़कों को ट्यूशन पढ़ा रहे होते ' शुक्ला जी से 'जै राम जी' के बाद दोनों बाहर चबूतरे पर पड़ी बेंच पर जम गये .
'देखा आज का पेपर ?नैनीताल के एक इँग्लिश स्कूल में हिन्दी फ़िल्म देखने पर दसवीं के पाँच स्कूली छात्रों को स्कूल से निकाल दिया गया .और उनमें गूजरमल मोदी का एक पोता भी है .'
'अउर का होयेगा ,' शुक्ला जी हथेली पर तंबाकू रगड़ते बोले ,'सुसरे अँगरेज चले गये औलाद छोड़ गये .हिन्दी बोलने पर सजा मिलती है .चले जाओ किसी कॉन्वेंट स्कूल में हिन्दी बोला बच्चा कि पड़ी एक छड़ी .न माँ ,माँ रहे न बाप,बाप .आपुन सब भुलाय जात हैंगे .'
और मास्टर साहब ?
बड़ी-बड़ी शिकायतें हैं उन्हें सरकार से ,समाज से ,शिक्षा प्रणाली से .पर सुनता कौन है यहाँ उनकी !बस कह-सुन कर भड़ास निकाल लेते हैं .बोले ,'अरे, सब सरकार की कमज़ोरी है ,किसी देश में ऐसा हो सकता है क्या ?'
'सरकार-उरकार क्या होता है ,'मुँह में तंबाकू दबाये शुक्ला जी शुरू हुये ,'वोट पक्के रहें इनके ,ये लोग पहले ही अलग-अलग बाँट कर कुछ को मनमानी छूट दिये रहते हैं जिसमें उनके सारे वोट इन्हई को मिलें .'
सब्ज़ी का झोला पकड़ेउधरवाले वर्मा जी दिखाई दिये ,उन्हें भी पुकार लिया गया .
'नहीं भई ,अभी बैठेंगे नहीं,नहाया भी नहीं है कहते-कहते वे भी वहीं आ जमे ,'किसके वोट गिने जा रहे हैं मास्साब?'

जवाब दिया शुक्ला जी ने ,' अरे वोट हम का गिनेंगे ?ऊ गिनेंगें सुसरे जो सबका ठीका लिये बैठे हैं .उहै तो खरीद रहे हैं .'
'खरीद काहे उनके हितन की रच्छा कर रहे हैं .'

ध्यानू मास्टर थोड़ा तेज़ पड़े, 'सिर्फ़ उनका हित न ! देश का काहे में हित है सो कोई नहीं देखता .'

'अपना तर गये तो समझो देश का उद्धार हो गया. ' वर्मा जी ने आगे बढ़ कर चबूतरे के नीचे पान की पीक थूकी .,'कोउ नृप होय हंमे का हानी  !साले सब एक से हैं जैसे साँपनाथ उइसेइ नागनाथ.'

'सेक्यलरिज़म तो खाली नारा है ,अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग लालच देते हैं रोज़गार भी संप्रदाय के आधार पर बाँट दें इनका बस चले तो .सब को अलग-अलग के सिर पे चढ़ाये ले रहे हैं इकतीस साल बीत गये अभी निपल लगा के दूध पिलाये रहे हैं जाने अपने पाँव पे कब खड़े हो पायेंगे .'
-बोलते-बोलते मास्टर का मुँह लाल पड़ गया था .
'और खुद का हैं ?अपने मतलब पूरन के लै  जो बीच में आय जाये उसई  को ठिकाने लगाय देते हैं .सुसरे .इन्सान की जान की कोई कीमतै नहीं .'

'वो देखो न कल के  पेपर में रहे ,जो इनकी पोल खोले उसे कैसे उखाड़ देते  हैंगे ..'
 .
तरु कान लगा कर सुनने लगी .
'गुंडागीरी की तो हद है .ऊ केस भया था बड़े-बड़े लोगों की फँसत भयी . फिर एक अपहरण अउर हत्या !'

तरु हाथ में पैकेट पकड़े वैसे ही खड़ी ,कान उधऱ ही लगे हैं
'गरीब मेहरिया की आबरू कहूँ सुरच्छित नहीं.'
  मन में अजीब सी हलचल होने लगी .
दो-तीन लोग एक साथ बोल देते हैं -कुछ समझ में नहीं आ रहा.चुनिया के केस  की बात है क्या?
'दुस्मनी होय आदमी से ,खींची जाय मेहरिया ..'
'इहै होता है दुनिया में .करै आदमी भरै मेहरिया .''

जी धक् से हो गया .
नहीं , वह नहीं हो सकती .उसकी किसी से क्या दुश्मनी !
एकदम लिली का ध्यान क्यों आ गया.
औरत ब्याही हुई होगी नहीं तो लड़की कहते न.
तो भी .वह नहीं हो सकती .धमकियाँ विपिन को मिल रही हैं . लवलीन की किसी को क्या दुश्मनी .



उसने आगे बढ़ कर पैकेट मेज़ पर रख दिये .


इतने में गली से आगेवाली सड़क पर कुछ हल्ला उठा .लोग खड़े होकर देखने लगे .
चबूतरे से झुक कर सड़क पर झाँकते वर्मा जी बोले ,' अभी सब्ज़ी खरीदते सब ठीकै-ठाक था .'
वर्मा जी सब्ज़ी भूल थैला साइड में रख कर बैठ गये शुक्ला जी ने बनियान की जेब से चूने-तंबाकू की डिबिया निकाल ली.
'जीप, टैक्सी ,स्कूटर,बैंड-बाजा सब है .अरे ,लड़िकन का जलूस है !'
'डीएवी कालेज का इलेक्सन है ,दोनउ उम्मीदवार जान की बाजी लगाय दिये हैं .पिछलीबार तो छुराबाजी भई थी.'सूचना देनेवाले शुक्लाजी हैं ,'अबके गोलियाँ तो एक बार चल चुकीं ,आगे देखो का होय?'
'कालिजन का चुनाव और सहर भर में हल्ला ...',वर्मा जी ने फिर पान पीका .
'पढ़ाई-लिखाई सब भाड़ में ,अभै से नेतगीरी सीख लेत हैंगे.कोई इनसे पूछे वोट देनेवाले -लेनेवाले उसी कालिज के फिर काहे दुनिया भर में फैन मचाये हो ?पाप का पैसा है ,लुटाय रहे हैं .'

मास्टर जी ने स्पष्टीकरण दिया ,' कराता है नेता .वो पार्टीवाले इन्हें संरक्षण देते हैं और स्कूल कालेज में अपनी पालिटिक्स चलाते हैं .यहाँ भी वोई होता है ,गुटबंदी ,मारपीट और गुंडई.'
'अभै से से टिरेनिंग दे रहे हैं कि बेटा आगे येई करना है .'
मास्टर का लड़का डी.ए.वी. से बीएस .सी. कर रहा है -जुलूस की आवाज़ सुन बाहर निकल आया .
'काहे बबुआ ,ई सब का करवाय रहे हो ?और कऊन-कऊन हैं इन लोगन में ?'
'हम लोग साइन्साइ़ के हैं हमारे पास इतना टाइम ही कहाँ ?प्रतापसिंह,और सुमेर  दोनो ही मैदान में हैं -बराबर की टक्कर है .सुमेर ने तो चालीस हजार लगा दिये .'
वर्मा को ताज्जुब हुआ ,'बाप ने इत्ता रुपैया दै दिया ?'
'उसे कांग्रेस का सपोर्ट मिला है .अभी एक मकान बेचा था उसी का पैसै मिला सो इलेक्शन में लगा दिया '
'अरे चालीस हजार खर्च किये ,'मास्टर ने बात समझाई,'जीत गये तो समझो आ गये राजनीति में ,फिर तो पचासगुने कमा लेंगे .लग्गू-भग्गू अभी से साथ लग जायेंगे .सारे दंद-फंद अभी से सीखते चलेंगे .'
'काहे,तुम किसे वोट दे रहे हो बबुआ?'
'हम तो सुमेर को ही देंगे ,कह रहा है जीत गये तो छात्रों के हित के लिये लड़ेंगे .,पोस्टों में रिज़र्वेशन खतम करायेंगे .छात्र-वृत्ति योग्यता और आर्थिक स्थिति के हिसाब से मिलेगी ..और भी बहुत से प्लान्स हैं '
'करा लिये भइय़े,करा लिये .सब करा लिये .,'वर्मा जी उठकर खड़े हो गये ,'सरू-सुरू में सब ऐसे ही डकराते हैं .'
और अपना झोला उठा कर चल दिये .
बताइये चाचा जी ,एक तिहाई कोटा रिज़र्व हो जायेगा तो हम लोग क्या करेंगे ?
इसीलिये लड़के इतना शोर मचा रहे हैं .'

तरु का मन उधऱ ही लगा है -पर उस बारे में कोई बात नहीं हो रही .टॉपिक ही बदल गया है

क्या सुना था अभी थोड़ी देर पहले ?

इतने दिन हो गये  चुनिया के केस को चलते , वही या फिर कुछ हुआ   ?
फिर किसी लड़की को .....
.स्तब्ध-सी  बैठी है .
बाहर  वार्तालाप चल रहा है , आवाज़ें कान तक पहुँच रही हैं कि नहीं !

'लड़कों  इसमें नहीं पड़ना चाहिये ,'ध्यानू मास्टर ने ज़ोर से कहा ,'तुम अपनी पढ़ाई लग कर करो ,तुम्हें औरों से क्या ?'
'हमें कुछ क्यों नहीं ,बाऊ जी ?हम फस्ट डिवीजन लायें ,तो भी हमें कोई नहीं पूछेगा और वो चार साल में सरकारी मदद से थर्ड ले आये तो पहले नौकरी उन्हें मिलेगी ,पहले प्रमोशन उनका होगा चाहे करना-धरना कुछ न आये .ज्यादा तो हमें ही मतलब है .'
मास्टर जी की पत्नी कूड़ा फेंकने निकली थीं ,वहीं रुक कर सुनने लगीं .
उन्होंने लड़के की बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त की ,'ये तो बहोत गलत बात है .'
शुक्लाजी और मास्टर जी चौंक कर उधर देखने लगे ..
वे कह रहीं थीं ,'लायकियत पे देना चाहिये काम .ये क्या कि वो ऐसी जात के हैं तो वो ज्यादा सगे हो गये .और हमारे बच्चे लायक हो कर भी नालायक हो गये !'
'वजीफ़े उन्हें अलग से ,उमर में छूट अलग से ..'बबुआ ने जोड़ा .'
मास्टर जी को बड़ा नागवार गुज़र रहा था ,पर चुप लगाये रहे .मास्टरनी को अपने होनहार पूत पर बड़ी उम्मीदें थीं .सरकार की नाइन्साफ़ी सबसे ज्यादा उन्हें खटकी ,'हमारे बच्चे पैसा लगाय के मेहनत करके पढ़ें और सब बेकार जाय,फिर ये करेंगे क्या ?'
' डंडे चटखायेंगे ,बेकार घूमेंगे. अऊर का ?' शुक्ला जी अपनी बीती बोले .
'वो थर्ड डिवीजन में हो के अच्छा काम कर लेंगे ? मास्टरनी के मन में द्विविधा थी.


'लड़के कह रहे हैं आग लगा देंगे .'बबुआ ने सनसनीखेज़ सूचना दी .

मास्टर जी चौंक गये ,'कहां लगा देंगे आग?'
'ये हमें नहीं मालूम. पर  कह रहे थे कुछ करेंगे ज़रूर.'
'तुम मत पड़ना इस सब में .तोड़-फोड़.आगज़नी,लूट-पाट,क्या होगा इससे ?'
शुक्ला जी तंबाकू दबाये सुनते रहे .
'फिर काहे से होगा ?ये लोग तो इलेक्सन के पहले ही वादे करके वोट माँगेंगे ,और फिर हमारा क्या होगा ?'
'तुम चुपचाप पढ़ो बैठ के ,'मास्टर जी रोष में आ गये ,'चलो अंदर ,तुम इस सब में नहीं पड़ोगे .'
बबुआ को घर चलने का इशारा करते हुये वे उठ पड़े .
मास्टरनी पहले ही चल दी थीं ,पीछे-पीछे जाता हुआ बबुआ कह रहा था ,'किसी को कुछ नहीं करना तो कौन आगे आयेगा क्या ? क्या फ़ायदा इस पढ़ने-लिखने से ?.हमारे लिये कोई कुछ नहीं करेगा ,हमें अपने आप लड़ना पड़ेगा .'

मास्टर जी अंदर जा कर आँगन में खड़े हो गये और अंदर आते लड़के को डाँटा ,'अच्छा ज्यादा ज़बान मत चलाओ ,हमारी अपने बाप के आगे बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती थी.अभी किसी लायक नहीं तब ये हाल हैं .'

'अरे , तो क्या कह रहा है ,'माँ ने बेटे का पक्ष लिया ,'भुगतना तो उसी को पड़ेगा ...और अपनी सोचो सुराज के पीछे तुमने नहीं पढ़ाई छोड़ी ?नहीं तो आज मास्टरी करते न झींकते होते .'
'मास्टर जी की दुखती रग छू दी थी उनने ,एकदम बौखला गये ,'तुम और ओरी ले ले के बिगाड़ो.कहो जा के लगाये आग गिरफ़्तार होये जाके ,फिर मुझसे मत कहना लाओ छुड़ा के .'
'काहे गिरफ़्तार होगा शान्ति से सब समझ जायेगा .'
मन का आक्रोश दबाये लड़का चुप खड़ा रहा .

अंदर से आवाज आई ,'दुलहिन हो ..कहाँ बैठ गईँ जाय के?'
अरे, मैंतो भूल गई ,माँजी बुला रहीं  थी .
'आई'.वह हड़बड़ा कर चल पड़ी . पैकेट वहीं रखे रह गये .


*
(क्रमशः)

3 टिप्‍पणियां:

  1. माता पिता से जुड़े आँसू कभी नहीं सूखते.....लगता है सब जैसे कल की ही बात हो। जतन ही नहीं करना पड़ता...आप ही आप सजल हो उठतें हैं नयन। हालांकि दुखद है तरल का पिताजी को खो देना..उनके लिए चाहते हुए भी उनके जीते जी कुछ भी नहीं कर पाना ,मगर दिल को कहीं बहुत सुकून मिलता है.....बेटी और पिता के दुःख से भीगे इन लम्हों में। स्वार्थ कह लीजिये अथवा प्राथमिकता ।

    बहुत भय था कि इस बार विपिन को लेकर कोई न कोई बुरी खबर अवश्य ही सुनने मिलने वाली है........मगर ऐसा कुछ मिला नहीं।सुकून की साँस ली मैंने।

    इस बार की पोस्ट में यूँ तो कोई विशेष बात नहीं हुई...मगर अंतिम भाग में भाषा का सौंदर्य बहुत प्रभावित करता है......बहुत आनंद आया बार बार पढ़ने में.....कुछ शब्द जो हमारे यहाँ भी प्रचलित हैं...सो मैं परिचित थी उनसे.....इसलिए अनुभव होता रहा कि मानो सारा कुछ मेरे नज़दीक ही घटित हो रहा हो।

    ..अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी प्रतिभा जी......!

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  2. बहुत रुचिकर! पढ़ा जा रहा हूँ, मुग्ध!

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  3. शकुन्तला बहादुर16 अगस्त 2011 को 1:16 pm

    पारंपरिक घरेलू माहौल में प्रादेशिक लोकभाषा ने प्राण फूँक दिये। सभी घटनाओं से मनोरंजन भी हुआ। मुझे लगा कि मैं अपनी नानी
    (माँ की मामी-जो कन्नौज की थीं)के घर पहुँच गई हूँ ,बड़ी मिठास
    और अपनापन सा है -उस बोली में। कथा का प्रवाह बड़ा स्वाभाविक सा चल रहा है। आगे का हाल जानने को मन उत्सुक हो गया है।

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