बुधवार, 24 अगस्त 2011

एक थी तरु - 30. & 31.



30.
तरल का मन विवाह के कार्यों से बार-बार उखड़ जाता है .
एक डर सा बैठ गया  मन में .
बार-बार विपिन का ध्यान आता है .
एक हफ़्ता हो गया कोई खबर नहीं .
आई थी तब स्थितियाँ अच्छी नहीं थी .
बस बुरी-बुरी बातें ध्यान में आती हैं .
अख़बारों में ,कहानियों में जाने कितने ऐसे किस्से पढ़े हैं .ये साधन-संपन्न लोग अपने मतलब के लिये कुछ भी कर गुज़रते हैं -इन्सान का कोई मोल नहीं इनके लिये .फिर विपिन तो अकेला है ,साधनहीन !
 और लवलीन ?सुकुमार सी युवती ,जिसने अभी दुनिया का क्या  देखा ?पाँचवाँ महीना चढ़ चुका होगा,जरा-जरा बात में घबराने लगती है  .
कौन है वहाँ देखनेवाला ?
मायकेवाले उदासीन  ,कहते हैं अपने मन से शादी की है अब तुम जानो .जैसा है अपने आप भुगतो . ससुराल में करने वाला है ही कौन -सास-ससुर और दो ब्याही बहने !भाई को अपनी गृहस्थी से छुट्टी नहीं .
सोच कर  जी उचाट होने लगता है.
अखबार  भी नहीं देख पाती इन दिनों -बाहर ही बाहर आदमियों के पढ़ते  दोपहर होते-होते ,इधऱ़-उधऱ हो जाता है .वैसे ही चीख-पुकार मची रहती है ,बैठ कर इत्मीनान से पढ़े कोई मौका नहीं .
उस दिन  की बात ध्यान आते ही व्याकुल हो उठती है .
किसी लड़की को दरिन्दों ने रौंद डाला ?
.काँप उठती  है तरु -
किसकी बात है ? चुनिया?
 हाँ, विपिन ने ही तो बताया था .
बार-बार  लवलीन का चेहरा आँखों के आगे आ जाता है.

फिर समझाती है अपने को -नहीं, वह नहीं हो सकती .
ये तो रोज़ की खबरें हैं ,जाने कितनी बार ...जाने कितनी स्त्रियाँ .
.बस आगे नहीं सोच पाती..नहीं नहीं ,लवलीन तो किसी के तीन-पाँच में नहीं .उससे क्या मतलब किसी को ?
नहीं ,वह नहीं , यह बिलकुल नहीं हो सकता  ?

डर तो विपिन के लिये है .उसी के पीछे पड़े हैं लोग.
 अब  नहीं रुक पा रही  यहाँ .
निपट जाय शादी औऱ चलें अपने घर .
पर अभी तो दो दिन बाकी हैं .

हे भगवान ,ठीक रखना विपिन को !
*
घर में शादी का माहौल .और दन्नू जैसा कैरेक्टर सामने .कुछ शग़ल तो चाहिये ही ,
होने लगीं चर्चायें .
और सुनो एक किस्सा - सुनाने में राहुल निपुण है ,शुरू हो गया जैसे सामने घट रहा हो .

 तो हुआ ये -
'मामा आये, मामा आये .'
बच्चे चिल्लातेहुये सुशीला के पास भागे .
'कौन मामा ?'
दन्नू मामा ,तुम्हारेवाले .'
आकर देखा दन्नू खड़े सास से बातें कर रहे हैं .
- न बक्सा न बिस्तर,खाली हाथ -.कड़कड़ाते ,ठिठुरते हुये
भरे जाड़े में शरीर पर कोई ऊनी कपड़ा  नहीं .

सास ने सुशीला को आवाज़ लगा कर कहा ,'बिचारे का बकसा चुर गया .उसी में सारा सामान धरा हता .'
मज़ा आ रहा  है सबको .राहुल चालू है -
बड़े विस्तार से दन्नू ने बताया बस ज़रा-सा उठ कर गुसलखाने गये थे ,लौट कर आये देखा बक्सा गायब .
उसके ऊपर धरा हुआ पूरी बाँह का स्वेटर और कोट भी गायब!सबसे पूछा-ताछा ,हल्ला मचाया भाग -दौड़ की सब बेकार !
इसके पास कोट था कहाँ - सुशीला सशंकित नेत्रों से देख रही है .
'अब उसे स्वेटर लाय के देओ,दुलहिन, मार जड़ाया जाय रहा है लरिका .'

सुशीला ने पति का स्वेटर ला कर पकड़ा दिया पहन लिया दन्नू ने .
श्रोता पूरा मज़ा ले रहे हैं.
'ज़रा रुको,राहुल, हम बस एक मिनट में आये '
..श्यामा के दूल्हा ने अल्प-विराम लगवा दिया .

लौटे वे ,फिर कहानी शुरू हुई -
जिठानी का भी तो भाई लगा -उनने आकर सिर पर हाथ फेरा,'कहाँ जाय रहे थे भइया ?'
दन्नू बैठ के रोने लगे .'अरे जिज्जी ,हम तो सरम के मारे मरे जाय रहे हैंगे .जेब न कट जाय इस लै सारे रुपये संदूक में धर दिये थे .अब एक नोट भर बचा है .बच्चन के लै मिठाई तक न लाय पाये .'
उन्होंने जेब उलटी , एक दस का नोट निकाल कर दिखा दिया .

घर के लोग इकट्ठे होकर 'चच् चच्'करने लगे
 .
दन्नू फिर शुरू हुये ,'हमारे जो बड़के भैया हैं उन्हई के दोस्त ने मुरादनगर की मिल में नौकरी लगवाय दी थी...समझ में नहीं आता अब का करें ..
एक मन करता है घर लौट जायँ .'
 मज़ा आ रहा है सबको-समझ रहे हैं दन्नू कौशल
सुशीला की सास ने दिलासा दिया ,'अपसोच न करो बेटा ,कभी-कभी अइसा भी हुइ जाता है .जो तुम्हें चाहिये यहाँ से लै जाओ ,बहिनी का घर सो अपना घर .'
सास ने कह-सुन  कर  कोट दिलवाया ,अटैची और कुछ कपड़े भी निकाले .बिस्तरा  बँधवा दिया सो अलग !-रुपये तो पास में कुछ होने ही चाहियें ,'नई जगह में क्या करेगा बेचारा ,मुसीबत का मारा .'
जिठानी ने भी कहा ,'अऊर का ! सब वापस कर देगा .बहिनी का कौन रखता है !फिर उसकी तो नौकरी लग गई है .मुसीबत में साथ हमीं लोग तो देंगे .'
हफ़्ते भर बाद शुक्लाइन की लिखाई चिट्ठी आई कि दन्नू आठ-दस दिन से लापता हैं .फिर ख़बर मिली कि खाली हाथ घर पहुँच गये हैं .
  अब तो  जिसे देखो दन्नू का बखान कर सुशीला को छेड़ रहा है , अरे अम्माँ ,उनका एक टिपिन काहे नाहीं दै दिया !'
'दादी को सबसे जियादा तरस आय रहा था ,और सौ का नोट पकड़ाय देतीं मामा को ?'
सुशीला के लिये मुँह छिपाने की जगह नहीं .
दूल्हा ने अकेले में चुटकी ली ,'काहे ,तुमने अपने भैया का जस पहले नहीं बताया .हमारी जेब से सौ का नोट कहाँ ग़ायब हुआ था ,अब समझ में आय रहा है .'
रो-रो आती है .बोले क्या बिचारी !
किसी ने रिमार्क कसा ,'कैसा राढ़ा है ,इत्ता पिटता है फिर भी..'

राहुल  ने  छौंक लगाई -जित्ता पिटता है  उत्ता और मज़बूत होता जाता है .
सब हँस पड़े ..
वाह ,आनन्द आ गया .

'अरे चलो रे ,सब लोग !वहाँ मंडप गाड़ा जा रहा है .'
अब पड़ेंगे हल्दी के छापे !
*
गाने होंगे आज सारी रात .
तैयार हो रहे हैं सब.
चंचल में बड़ा उत्साह है .पहली बार मौका मिला है उसे  घर की शादी में शामिल होने का .

लंबी हो गई है -पतली-सी, प्यारी सी !

'काहे दुलहिन 'माँ जी ने तरु से पूछा,'पजारूी धोतिन के जोड़ा कहाँ धरे हैं /'
'अरे ,'तरु के मुँह से निकला ,'वो पैकेट तो वहीं भूल आई ,उस कमरे में .'
हाय राम. दन्नू के हाथ तो नहीं पड़ गये !
जाकर देखा जस के तस रखे थे .
दन्नू हैं कहाँ ,दो दिन से ग़ायब हैं वो तो !

चंचल को  भी  सजने का शौक है.हर चीज़ चाहिये उसे .दौड़-भाग लगाये है

' मम्मी ,हमारी काजल की डिब्बी तुमने कहाँ रख दी ?'
'मैनें काहे को रक्खी ,मैं क्या लगाती हूँ काजल?तुम्हीं ने कहीं डाली होगी .'
मम्मी की बनारसी साड़ी हाथ में लिये निकल आई है .
'उफ़्फोह ,अब मेरी साड़ी नहीं बचेगी चंचल.तुमसे सम्हलेगी नहीं ,लँहगा क्यों नहीं पहन लेती ?'
'हाँ ,हर जगह वही लँहगा लटका कर चल दें !'
 हवा के झोंके की तरह निकल गई वह .
*
कुछ देर बाद ,श्यामा और तरु बच्चों के साथ बाहर निकलीं .
तरु की निगाहें चंचल और साड़ी पर लगी हैं .,'अरे चंचल,ज़रा ऊँची करो ,..और पल्ला इतना लंबा झाड़ू लगाता चल रहा है .'
'वो इधर खिंच आया होगा ,हमने तो छोटा लिया था मम्मी.'
'ज़रा ढंग से चलो वो उधर से लिथड़ रही है .'
'मम्मी ,तुम तो सबके सामने टोके जा रही हो !'
'सात सौ की मेरी नई बनारसी ,तुम लथेड़ रही हो और मैं टोकूँ भी नहीं ?अभी सैंडिल में उलझ गई तो ज़री नुचने लगेगी .'
चंचल साड़ी सम्हालती आगे लड़कियों में भाग गई .
अब मम्मी के सामने ही नहीं पड़ेगी .

*
उसकी की रंग-बिरंगी, बोलती चमकीली तस्वीरोंवाली किताबें सबके आकर्षण की केन्द्र हैं ,मन्नो ने अमेरिका से चंचल के लिये भेजी हैं .
श्यामा के बच्चे बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं .

दन्नू ने पीछे से आकर झाँका बोले ,'जे का है ?जे तो बहुत बढ़िया किसम की चीज है .'
'हमारी मौसी ने सात समुंदर पार से हमारे लिये भेजी है ,' चंचल ने रौबदार आवाज़ में कहा ,पता है कहाँ है कनाडा ? हवाई जहाज़ से जाओ तो तीसरे दिन पहुँचते हैं .'
'जे तो बहुत काश्टली हुइ हैं.'
एक किताब हाथ में उठा ली दन्नू ने ,उलट-पलट कर देखने लगे .बच्चे एक दूसरे को देखने-दिखाने में लगे हैं
उन्होंने धीरे से कमीज़ के नीचे छिपाने की कोशिश की
'ये क्या कर रहे हो दन्नू मामा ?'श्यामा की लड़की चिल्लाई.
'' अरे ,कुछू नाहीं जरा खुजलाय रहे थे ...' किताब हाथ में पकड़े रहे,' जे वाली हम लै जाय रहे हैं पढ़ के वापस दै जइहैं ,तुम्हारे पास तो इत्ती सारी हैं .'
वे ले कर चलने लगे ,
'नहीं हमारी किताबें यहीं रक्खो, तुम्हें अंग्रेजी पढ़ना आता भी है ' ,चंचल झपटी ,' तुम ले जा कर बेच आओगे .'
बच्चों को बता दिया गया है दन्नू चोट्टे हैं ,उनसे सावधान रहें .
अनसुनी करते हुये वे तेज़ी से चले जा रहे हैं ,चंचल ने पास पड़ी खुरपी उठा ली ,और दन्नू पर तानती हुई पीछे दौड़ी ,'देखो, हमारी किताबें उठाये लिये जा रहा है ..'
उसने किताब वहीं फेंकी और तेज़ी से निकल गया .
अपनी किताब पोंछती -सहलाती ,चंचल बुआ के बच्चों को बताने लगी ,'ये दन्नू बड़ा चोर है .घर का सामान बेच देता है और खूब पिटता है .'
अंदर से आवाज आई ,'अरे तुम लोग तैयार हो जाओ ,बुलावा शुरू होनेवाला है .

'लाओ,किताबें अल्मारी में रख दें ,दन्नू के हाथ पड़ गईं तो समझो गईं .'
*
31.

.इतनी सहन शक्ति कहाँ से आ जाती है इन्सान में ?
तरु बहुत छोटी थी,तब याद करती थी-सी.ए.एन. कैन ,कैन माने सकना .
उसकी समझ में नहीं आता था 'सकना ' क्या होता है .
तरु और उसी के बराबर का  - मोहन,पड़ोस के पोस्ट-मास्टर का बेटा .दोनो बैठे मीनिंग रट रहे हैं .रटते-रटते तरु चुप हो गई .
"याद करो तरु ,नहीं तो डाँट पड़ेगी ."
फिर वे शुरू हो जाते हैं -सी.ए.एन. कैन,कैन माने सकना .
"मोहन ,ये सकना क्या होता है ?"
"ये तो हमें भी नहीं मालूम ."
मैन ,रैट,कैट ,फैट सब समझ मे आते हैं ,पर कैन का सकना क्या होता है ,दोंनो मे से किसी को नहीं मालूम .बस रटे जा रहे हैं
'सकना ' क्या होता है ,यह जानने की उम्र तब उनकी थी भी नहीं .
बड़ा होकर इन्सान जब घबराता है ,सोचता है नहीं ,नहीं कर सकता .तब कोई अदृष्ट व्यंग्य से हँस पडता है
,'नहीं सकता क्या ,यही करना होगा !'
और तब सकना का अर्थ समझ में आने लगता है .

विपिन के बारे में सोच कर वह दहल उठती है .
यह क्या हो गया ,जिसकी कल्पना भी नहीं की थी !
लिली ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?वह बेचारी तो क्या चल रहा है यह भी नहीं जानती थी.

*

विपिन के भीतर प्रचण्ड दावाग्नि धधक उठी है .
लवलीन का ध्यान आता है तो  पागल सा हो उठता है .
रात-रात भर चक्कर काटता है,बाल नोचता है ,सिर पटकता है ,चिल्लाता है ,"उसने क्या बिगाड़ा था उनका ?उसने क्या किया था ?
पहले ही घबराती थी .वह इस सब के बीच में थी ही कहाँ ?
फिर रोने लगता है बुदबुदाने लगता है ,"--क्या-क्या अत्याचार किये होंगे तुझ पर ?--सिर्फ मेरी वजह से --मुझे एक बार बतला दे लिली ---मैं एक-एक से बदला लूँगा . तड़पा-तड़पा कर मारूँगा .---एक बार बता जा लिली ,बस एक बार --."
पर उसकी लिली कहाँ है इस दुनिया में ?
विपिन के सिर पर वार कर ,वे लोग लिली को उठा ले गये थे .उसके बाद वह नहीं मिली .दो दिन बाद नहर के किनारे उसकी लाश मिली -नग्न ,वीभत्स !
बदला किस-किस से लोगे विपिन ,यहाँ तो सारी व्यवस्था एक सी है  ?
तरु के मन में प्रश्न ही प्रश्न चीख़ते हैं .
वह हर बार धीरज देना चाहती है ,पर वह कुछ नहीं समझता .
लोग आते हैं पूछते हैं -वह लाल आँखें किये देखता रहता है .
तरु अपने घर ले आई उसे .यत्नपूर्वक रखा ,पर मौका पाते ही विपिन ग़ायब हो गया .
असित दौड-धूप कर रहे हैं ,तरल बहुत उद्विग्न है सब जगह हल्ला मचा है .
पत्रकार हर तरफ विरोध कर रहे हैं ,अखबारों मे अपीलों पर अपीलें निकल रही हैं प्रदर्शन हो रहे हैं ,पुलिस दौड़ रही है ,और सरकार निष्पक्ष पूरी जाँच का आश्वासन दे रही है .
 पर कुछ होगा क्या ?
हल्ला मचानेवाले कुछ कर पायेंगे ?
एक और घर बनते-बनते बिग़ड गया .लवलीन मार डाली गई .विपिन विक्षिप्त सा घूम रहा है .
दोष किसका है ?
अतीत की स्मृतियाँ तरु को बहा ले गईं .विपिन को भूली कभी नहीं थी .पर आज उसके लिये मन में सोया मोह उमड़ पडा है.
*
बुआ कहता था विपिन !
कितना अपनापन पाया था -कितनी सहज सहानुभूति और निश्छल प्रेम  ! कितना विश्वास करता था ,कितना महत्व देता था मुँह से निकली एक-एक बात को ! तरु को लग रहा है -मैंने ही उसे झोंक दिया जलते अंगारों में.

क्या ज़रूरत थी  आदर्शवाद  की पट्टी पढ़ाने की ?
और वह भी जब यह पता हो कि उसे इस घोर भ्रष्टता के संजाल में जीना है ?पैने नखों और विषैले दाँतों वाले पशुओं के बीच  एक अकेला आदमी कैसे जी पायेगा अपने सिद्धान्तों को ले कर ?
उसके विश्वास का क्या प्रतिफल दिया मैंने ?
वह और उसकी लिली .एक दूसरे के अनुरूप ,एक दूसरे के पूरक .कितना शान्त ,संतुष्ट जीवन जी रहे थे ! तरु को सब याद आ रहा है -
उसने विपिन से कहा था ,"तुम पत्रकार हो .तुम अनुचित को संकेतित नहीं करोगे ,अन्याय के विरोध में खड़े नहीं होगे ,तो और कौन होगा ?  इस महाभारत के संजय हो तुम ! निष्पक्ष ,निर्द्वंद्व, सत्यान्वेशी . पत्रकार बन कर  वरदान मिला है तुम्हें , सजग दृष्टा और समर के साक्षी होने का .अपना कर्तव्य करो विपिन .बड़ा दायित्व है तुम्हारे ऊपर !"
"पर ,बुआजी ,सब एक से हैं .हम कुछ करेंगे ,तो हमारा ही पत्ता काट देंगे .."
"नहीं विपिन ,सत्य और न्याय का मूल्य कभी कम नहीं होता .आज के युग में तो और भी नहीं ,क्यों कि ,ये इतने दुर्लभ हैं .ये छोटे-छोटे टुटपुँजिये लोग उन्हें अपने अधिकार मेंकर लें ,और समाज का सबसे जाग्रत  वर्ग ,तुम पत्रकार लोग ,चुप बैठे देखते रहो तो देश का क्या बनेगा ?मैनें तो ऐसे पत्रकार देखे हैं ,जो जान जोखिम में डाल कर झूठ का पर्दा फाश करते हैं .वही सच्ची पत्रकारिता है .पत्रकार जैसा सत्य की तह तक पहुँच जानेवाला प्रबुद्ध ही जब विवेकहीन और पथ-भ्रष्ट हो जायेगा ,तो वही होगा जो आज हमारे देश  मे हो रहा है ."
और आज विपिन सिर पर पट्टियाँ बाँधे पागल सा घूम रहा है ,भ्रष्टाचार का पर्दापाश करने की कीमत चुका रहा है .उसकी प्रिया को गुण्डों ने उड़ाया ,दरिन्दे बन कर   नोच-नोच कर मार डाला .उसका अजन्मी सन्तान को गर्भ मे ही रौंद दिया .
विपिन चिल्लाता है ,"मेरी लिली ,मेरे कारण तुझे लूटा गया ,तुझे नोचा-खसोटा गया .ओ,मेरे बच्चे मैंने तुझे देखा भी नहीं .--उस अजन्मे को दाँव पर लगा दिया मैंने ..."
तरु का मन लगातार धिक्कार रहा है ,'मैंने ही आग सुलगाई थी .एक सुखी परिवार को झोंक दिया उसमें .सब नष्ट कर दिया .मैंने किया यह ,मैं ने .उन लोगों को झोंक दिया  हवन-कुण्ड में और आराम से घर  बैठी ताप रही  हूँ ..'
दर्द करते सिर को वह हाथ से दबाती है .
ओह , क्या करूँ मैं ?--वह कहाँ भटक रहा होगा !
न स्वयं चैन लेती हूँ ,न दूसरों को लेने देती हूँ .
चार दिन बाद असित विपिन को लेकर  लौटे .
"ये ,तुम्हारा भतीजा .वहाँ स्टेशन पर बैठा था .मुझे भी नहीं पहचाना .बड़ी मुश्किल से लाया हूँ ."
तरु को देख विपिन की आँखों पहचान उभरी ,अचानक वह सीने पर हाथ दबा कर झुक गया .
"क्या हुआ विपिन .क्या हुआ तुम्हें ?"
तरु ने उसे लिटा दिया .तकिया सिर के नीचे लगाया और हाथ सीधा करने लगी तो हाथ झटक दिया उसने .दर्द के मारे कराह उठा .
हाथों पर इंजेक्शनके निशान हैं .बार-बार बेहोश हो जाता है .बड़ी मुश्किल से एक गिलास दूध पिला पाई .तब तक असित डॉक्टर को ले आये .
""ये बाँह पर किसका इंजेक्शन दिया है ,बड़ी सूजन है ?"
"विपिन बोलो ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
बड़ी कोशिशों के बाद ,टूटे- उखड़े शब्दों मे उसने जो बताया उससे पता लगा उसे पकड़ ले गये थे ,कार में डाल कर ले गये थे .कमरे में बन्द कर दिया ,फिर इन्जेक्नश लगाये ,बडा दर्द--आह...
विपिन का चेहरा ज़र्द होता जा रहा है .अटक-अटक कर शब्द मुँह से निकलते हैं ..
"वो कौन थे ?"
"वो पाँच --."
तरु बार-बार सजग कर पूछती है ,"नाम बताओ ,कौन थे ?"
डॉक्टर ने रोक दिया ,"अभी मत पूछिये ,उत्तेजित हो जायेंगे ."
बाद में भी तरु धीरे-धीरे निकलवाने की कोशिश करती रही .
" विपिन ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
"उनने.उनने--कह रहे थे --कह रहे थे --."
साँस धीरे-धीरे चल रही है .
"इन्हें अस्पताल ले चलिये ."डॉक्टर ने कहा .
डॉक्टरों ने जाँच की .कितनी सुइयां भोंकी हैं .शरीर के साथ दिमाग पर भी असर है .
तरु रो रही है बराबर .असित चुप हैं .एस.पी को ,निशान्त के सम्पादक को फ़ोन किये जाते हैं ..बहुत लोग इकट्ठा हैं . भीड उत्तेजित है .
सब आये और सब चले गये .केस सी .आई. डी को सौंप दिया गया .
कुछ हो पायेगा ?
जहाँ हर चीज पैसे और प्रभाव से तोली जाती हो ,वहाँ न्याय कौन करेगा ?
जो लोग मिलने आते हैं,विपिनसे खोद-खोद कर पूछने का प्रयत्न करते हैं.
तरु  बार-बार रोकती है ,"स्वस्थ हो लेने दीजिये .अभी उत्तेजित होना नुक्सानदेह है ."
बेसुधी मे वह 'लिली,लिली ' चीखता है .उसकी हालत गंभीर है .सीने मे दर्द ,सिर में चक्कर ,बार-बार बेहोशी . मुँह से कुछ शब्द निकलते हैं --एम्बेसेडर कार ,अँधेरा .,हाय ,मार डाला  ,भयानक यातना .कुछ कागजों पर जबरन हस्ताक्रष भी कराये हैं .
कौन हैं यह सब करनेवाले ?
शान्ति -व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदार पुलिस ?जनता का पैसा लूटनेवाला ठेकेदार ?गुण्डों के सरदार ,हमारे नेता ?
कोई अकेला नहीं ,सब मिले-जुले हैं .
अकेला है विपिन ,बस .जो सच का साथ दे रहा है !
*
डॉक्टरों ने व्यवस्था कर दी है ,रात को आराम से सोयेगा विपिन .
तरु का मन उसे कटघरे में खडा कर  उत्तर माँगना शुरू कर देता है
.बहुत दुःसह होती है वह स्थिति !
तुम्हें क्या पडी थी ?
अब उसे कौन सम्हालेगा ?
वह तुम्हारा अपना होता ,तो भी तुम ऐसा ही कर पातीं ?
अपना कोई होता ?
तरु के मुँह पर थप्पड़ सा पडा .विपिन कितना अपना है कैसे बतायेगी? जिसे कोई नहीं समझ सकता कैसे समझाये वह ?
और--- ग़लत को सही कैसे कह पाती ?
किसी भी कीमत पर .चाहे वह स्वयं हो ,असित हो ,बेटी हो ,बेटा हो ?और तब तो अन्दाज भी नहीं था कि इतना कुछ हो जायेगा .अपने पराये की क्या परिभाषा है ?मन को चीर कर तो नहीं दिखाया जा सकता .
भीतर ही भीतर एक अँधड़ सा चल रहा है ..दिमाग ठिकाने नहीं रहता .

सब्जी छौंकने बैठी थी .चूल्हे पर कढाही रख कर तेल की बोतल उठा लाई और गर्म कढाही पर उँडेल दी .
एकदम खूब जोर से उछलती लपट और मिट्टी के तेल  का तेज़ भभका !
फ़ौरन पीछे हटी तरु .बोतल दूर हटा दी उसने .
ओफ़ ,क्या हो गया है मुझे ? कडुये तेल और मिट्टी के तेल की पहचान नहीं रही ?
जलते-जलते बच गई,साड़ी भी सिन्थेटिक  .कुछ हो जाता तो ?
 लोग दस तरह की बातें करते .कोई कहता - सुसाइड .कोई कहता हत्या .
और मेरी बच्ची ?कौन सम्हालता उसे ?
नहीं -नहीं  !कोई बच्चा ऐसे न जिये जैसे असित या.. बस आगे नहीं सोच पाती .
इन लोगों को मँझधार में छोड़ कर कहीं शान्ति नहीं पा सकती तरल -मरने बाद भी नहीं !


अस्पताल और घर दोनों के बीच चक्कर काट रही है.-
लोग आते हैं ,जाते हैं .तरह-तरह के लोग .बातें ही बातें !
कब तक? कैसे ?
चंचल से काफी मदद मिलने लगी है ,पर उसे भी कालेज जाना ,अपनी पढ़ाई  .असित का सहयोग मिल रहा है .पर उनका अपना काम भी तो है .तरु को मना नहीं करते,रोकते नहीं ,खुद भी जितना हो सकता है कर देते हैं .
विपिन कभी थोड़ा सम्हलता है ,तो कभी एकदम उन्मत्त सा हो जाता है .तब उसे नियंत्रण मे रखना मुश्किल हो जाता है .
सिर का घाव भर आया है,स्वास्थ्य पहले ले ठीक है ,जीवन खतरे ले बाहर हो गया है ,पर मन और मस्तिष्क में संतुलन  नहीं आया .
तरु के मन में निरंतर एक मंथन चलता है -भीतर ही भीतर कुछ उमड़ता घुमड़ता अपने साथ बहा ले जाता है .क्या होगा विपिन का ?इन अपराधियों को कौन दण्डित करेगा ?
अपराधी ?
 हाँ,अपराधी .
मन के दर्पण में उसे अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा है-पर दर्पण चटका हुआ है .
चेहरा एक नहीं अनेक हैं -आधे-अधूरे   ,विद्रूप करते से !
*

च्चों को बताने लगी ,'ये दन्नू बड़ा चोर है .घर का सामान बेच देता है और खूब पिटता है .'
अंदर से आवाज आई ,'अरे तुम लोग तैयार हो जाओ ,बुलावा शुरू होनेवाला है .

'लाओ,किताबें अल्मारी में रख दें ,दन्नू के हाथ पड़ गईं तो समझो गईं .'
*
31.

.इतनी सहन शक्ति कहाँ से आ जाती है इन्सान में ?
तरु बहुत छोटी थी,तब याद करती थी-सी.ए.एन. कैन ,कैन माने सकना .
उसकी समझ में नहीं आता था 'सकना ' क्या होता है .
तरु और उसी के बराबर का  - मोहन,पड़ोस के पोस्ट-मास्टर का बेटा .दोनो बैठे मीनिंग रट रहे हैं .रटते-रटते तरु चुप हो गई .
"याद करो तरु ,नहीं तो डाँट पड़ेगी ."
फिर वे शुरू हो जाते हैं -सी.ए.एन. कैन,कैन माने सकना .
"मोहन ,ये सकना क्या होता है ?"
"ये तो हमें भी नहीं मालूम ."
मैन ,रैट,कैट ,फैट सब समझ मे आते हैं ,पर कैन का सकना क्या होता है ,दोंनो मे से किसी को नहीं मालूम .बस रटे जा रहे हैं
'सकना ' क्या होता है ,यह जानने की उम्र तब उनकी थी भी नहीं .
बड़ा होकर इन्सान जब घबराता है ,सोचता है नहीं ,नहीं कर सकता .तब कोई अदृष्ट व्यंग्य से हँस पडता है
,'नहीं सकता क्या ,यही करना होगा !'
और तब सकना का अर्थ समझ में आने लगता है .

विपिन के बारे में सोच कर वह दहल उठती है .
यह क्या हो गया ,जिसकी कल्पना भी नहीं की थी !
लिली ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?वह बेचारी तो क्या चल रहा है यह भी नहीं जानती थी.

*

विपिन के भीतर प्रचण्ड दावाग्नि धधक उठी है .
लवलीन का ध्यान आता है तो  पागल सा हो उठता है .
रात-रात भर चक्कर काटता है,बाल नोचता है ,सिर पटकता है ,चिल्लाता है ,"उसने क्या बिगाड़ा था उनका ?उसने क्या किया था ?
पहले ही घबराती थी .वह इस सब के बीच में थी ही कहाँ ?
फिर रोने लगता है बुदबुदाने लगता है ,"--क्या-क्या अत्याचार किये होंगे तुझ पर ?--सिर्फ मेरी वजह से --मुझे एक बार बतला दे लिली ---मैं एक-एक से बदला लूँगा . तड़पा-तड़पा कर मारूँगा .---एक बार बता जा लिली ,बस एक बार --."
पर उसकी लिली कहाँ है इस दुनिया में ?
विपिन के सिर पर वार कर ,वे लोग लिली को उठा ले गये थे .उसके बाद वह नहीं मिली .दो दिन बाद नहर के किनारे उसकी लाश मिली -नग्न ,वीभत्स !
बदला किस-किस से लोगे विपिन ,यहाँ तो सारी व्यवस्था एक सी है  ?
तरु के मन में प्रश्न ही प्रश्न चीख़ते हैं .
वह हर बार धीरज देना चाहती है ,पर वह कुछ नहीं समझता .
लोग आते हैं पूछते हैं -वह लाल आँखें किये देखता रहता है .
तरु अपने घर ले आई उसे .यत्नपूर्वक रखा ,पर मौका पाते ही विपिन ग़ायब हो गया .
असित दौड-धूप कर रहे हैं ,तरल बहुत उद्विग्न है सब जगह हल्ला मचा है .
पत्रकार हर तरफ विरोध कर रहे हैं ,अखबारों मे अपीलों पर अपीलें निकल रही हैं प्रदर्शन हो रहे हैं ,पुलिस दौड़ रही है ,और सरकार निष्पक्ष पूरी जाँच का आश्वासन दे रही है .
 पर कुछ होगा क्या ?हल्ला मचानेवाले कुछ कर पायेंगे ?
एक और घर बनते-बनते बिग़ड गया .लवलीन मार डाली गई .विपिन विक्षिप्त सा घूम रहा है .
दोष किसका है ?
अतीत की स्मृतियाँ तरु को बहा ले गईं .विपिन को भूली कभी नहीं थी .पर आज उसके लिये मन में सोया मोह उमड़ पडा है.
*
बुआ कहता था विपिन !
कितना अपनापन पाया था -कितनी सहज सहानुभूति और निश्छल प्रेम  ! कितना विश्वास करता था ,कितना महत्व देता था मुँह से निकली एक-एक बात को ! तरु को लग रहा है -मैंने ही उसे झोंक दिया जलते अंगारों में.

क्या ज़रूरत थी  आदर्शवाद  की पट्टी पढ़ाने की ?
और वह भी जब यह पता हो कि उसे इस घोर भ्रष्टता के संजाल में जीना है ?पैने नखों और विषैले दाँतों वाले पशुओं के बीच  एक अकेला आदमी कैसे जी पायेगा अपने सिद्धान्तों को ले कर ?
उसके विश्वास का क्या प्रतिफल दिया मैंने ?
वह और उसकी लिली .एक दूसरे के अनुरूप ,एक दूसरे के पूरक .कितना शान्त ,संतुष्ट जीवन जी रहे थे ! तरु को सब याद आ रहा है -
उसने विपिन से कहा था ,"तुम पत्रकार हो .तुम अनुचित को संकेतित नहीं करोगे ,अन्याय के विरोध में खड़े नहीं होगे ,तो और कौन होगा ?  इस महाभारत के संजय हो तुम ! निष्पक्ष ,निर्द्वंद्व, सत्यान्वेशी . पत्रकार बन कर  वरदान मिला है तुम्हें , सजग दृष्टा और समर के साक्षी होने का .अपना कर्तव्य करो विपिन .बड़ा दायित्व है तुम्हारे ऊपर !"
"पर ,बुआजी ,सब एक से हैं .हम कुछ करेंगे ,तो हमारा ही पत्ता काट देंगे .."
"नहीं विपिन ,सत्य और न्याय का मूल्य कभी कम नहीं होता .आज के युग में तो और भी नहीं ,क्यों कि ,ये इतने दुर्लभ हैं .ये छोटे-छोटे टुटपुँजिये लोग उन्हें अपने अधिकार मेंकर लें ,और समाज का सबसे जाग्रत  वर्ग ,तुम पत्रकार लोग ,चुप बैठे देखते रहो तो देश का क्या बनेगा ?मैनें तो ऐसे पत्रकार देखे हैं ,जो जान जोखिम में डाल कर झूठ का पर्दा फाश करते हैं .वही सच्ची पत्रकारिता है .पत्रकार जैसा सत्य की तह तक पहुँच जानेवाला प्रबुद्ध ही जब विवेकहीन और पथ-भ्रष्ट हो जायेगा ,तो वही होगा जो आज हमारे देश  मे हो रहा है ."
*

और आज विपिन सिर पर पट्टियाँ बाँधे पागल सा घूम रहा है ,भ्रष्टाचार का पर्दापाश करने की कीमत चुका रहा है .उसकी प्रिया को गुण्डों ने उड़ाया ,दरिन्दे बन कर   नोच-नोच कर मार डाला .उसका अजन्मी सन्तान को गर्भ मे ही रौंद दिया .
विपिन चिल्लाता है ,"मेरी लिली ,मेरे कारण तुझे लूटा गया ,तुझे नोचा-खसोटा गया .ओ,मेरे बच्चे मैंने तुझे देखा भी नहीं .--उस अजन्मे को दाँव पर लगा दिया मैंने ..."
तरु का मन लगातार धिक्कार रहा है ,'मैंने ही आग सुलगाई थी .एक सुखी परिवार को झोंक दिया उसमें .सब नष्ट कर दिया .मैंने किया यह ,मैं ने .उन लोगों को झोंक दिया  हवन-कुण्ड में और आराम से घर  बैठी ताप रही  हूँ ..'
दर्द करते सिर को वह हाथ से दबाती है .
ओह , क्या करूँ मैं ?--वह कहाँ भटक रहा होगा !
न स्वयं चैन लेती हूँ ,न दूसरों को लेने देती हूँ .
चार दिन बाद असित विपिन को लेकर  लौटे .
"ये ,तुम्हारा भतीजा .वहाँ स्टेशन पर बैठा था .मुझे भी नहीं पहचाना .बड़ी मुश्किल से लाया हूँ ."
तरु को देख विपिन की आँखों पहचान उभरी ,अचानक वह सीने पर हाथ दबा कर झुक गया .
"क्या हुआ विपिन .क्या हुआ तुम्हें ?"
तरु ने उसे लिटा दिया .तकिया सिर के नीचे लगाया और हाथ सीधा करने लगी तो हाथ झटक दिया उसने .दर्द के मारे कराह उठा .
हाथों पर इंजेक्शनके निशान हैं .बार-बार बेहोश हो जाता है .बड़ी मुश्किल से एक गिलास दूध पिला पाई .तब तक असित डॉक्टर को ले आये .
""ये बाँह पर किसका इंजेक्शन दिया है ,बड़ी सूजन है ?"
"विपिन बोलो ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
बड़ी कोशिशों के बाद ,टूटे- उखड़े शब्दों मे उसने जो बताया उससे पता लगा उसे पकड़ ले गये थे ,कार में डाल कर ले गये थे .कमरे में बन्द कर दिया ,फिर इन्जेक्नश लगाये ,बडा दर्द--आह...
विपिन का चेहरा ज़र्द होता जा रहा है .अटक-अटक कर शब्द मुँह से निकलते हैं ..
"वो कौन थे ?"
"वो पाँच --."
तरु बार-बार सजग कर पूछती है ,"नाम बताओ ,कौन थे ?"
डॉक्टर ने रोक दिया ,"अभी मत पूछिये ,उत्तेजित हो जायेंगे ."
बाद में भी तरु धीरे-धीरे निकलवाने की कोशिश करती रही .
" विपिन ,इन्जेक्शन किसने लगाया ?"
"उनने.उनने--कह रहे थे --कह रहे थे --."
साँस धीरे-धीरे चल रही है .
"इन्हें अस्पताल ले चलिये ."डॉक्टर ने कहा .
डॉक्टरों ने जाँच की .कितनी सुइयां भोंकी हैं .शरीर के साथ दिमाग पर भी असर है .
तरु रो रही है बराबर .असित चुप हैं .एस.पी को ,निशान्त के सम्पादक को फ़ोन किये जाते हैं ..बहुत लोग इकट्ठा हैं . भीड उत्तेजित है .
सब आये और सब चले गये .केस सी .आई. डी को सौंप दिया गया .
कुछ हो पायेगा ?
जहाँ हर चीज पैसे और प्रभाव से तोली जाती हो ,वहाँ न्याय कौन करेगा ?
जो लोग मिलने आते हैं,विपिनसे खोद-खोद कर पूछने का प्रयत्न करते हैं.
तरु  बार-बार रोकती है ,"स्वस्थ हो लेने दीजिये .अभी उत्तेजित होना नुक्सानदेह है ."
बेसुधी मे वह 'लिली,लिली ' चीखता है .उसकी हालत गंभीर है .सीने मे दर्द ,सिर में चक्कर ,बार-बार बेहोशी . मुँह से कुछ शब्द निकलते हैं --एम्बेसेडर कार ,अँधेरा .,हाय ,मार डाला  ,भयानक यातना .कुछ कागजों पर जबरन हस्ताक्रष भी कराये हैं .
कौन हैं यह सब करनेवाले ?
शान्ति -व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदार पुलिस ?जनता का पैसा लूटनेवाला ठेकेदार ?गुण्डों के सरदार ,हमारे नेता ?
कोई अकेला नहीं ,सब मिले-जुले हैं .
अकेला है विपिन ,बस .जो सच का साथ दे रहा है !
डॉक्टरों ने व्यवस्था कर दी है ,रात को आराम से सोयेगा विपिन .
*
तरु का मन उसे कटघरे में खडा कर  उत्तर माँगना शुरू कर देता है
.बहुत दुःसह होती है वह स्थिति !
तुम्हें क्या पडी थी ?
अब उसे कौन सम्हालेगा ?
वह तुम्हारा अपना होता ,तो भी तुम ऐसा ही कर पातीं ?
अपना कोई होता ?
तरु के मुँह पर थप्पड़ सा पडा .विपिन कितना अपना है कैसे बतायेगी? जिसे कोई नहीं समझ सकता कैसे समझाये वह ?
और--- ग़लत को सही कैसे कह पाती ?
किसी भी कीमत पर .चाहे वह स्वयं हो ,असित हो ,बेटी हो ,बेटा हो ?और तब तो अन्दाज भी नहीं था कि इतना कुछ हो जायेगा .अपने पराये की क्या परिभाषा है ?मन को चीर कर तो नहीं दिखाया जा सकता .
भीतर ही भीतर एक अँधड़ सा चल रहा है ..दिमाग ठिकाने नहीं रहता .

सब्जी छौंकने बैठी थी .चूल्हे पर कढाही रख कर तेल की बोतल उठा लाई और गर्म कढाही पर उँडेल दी .
एकदम खूब जोर से उछलती लपट और मिट्टी के तेल  का तेज़ भभका !
फ़ौरन पीछे हटी तरु .बोतल दूर हटा दी उसने .
ओफ़ ,क्या हो गया है मुझे ? कडुये तेल और मिट्टी के तेल की पहचान नहीं रही ?
जलते-जलते बच गई,साड़ी भी सिन्थेटिक  .कुछ हो जाता तो ?
 लोग दस तरह की बातें करते .कोई कहता - सुसाइड .कोई कहता हत्या .
और मेरी बच्ची ?कौन सम्हालता उसे ?
नहीं -नहीं  !कोई बच्चा ऐसे न जिये जैसे असित या.. बस आगे नहीं सोच पाती .
इन लोगों को मँझधार में छोड़ कर कहीं शान्ति नहीं पा सकती तरल -मरने बाद भी नहीं !


अस्पताल और घर दोनों के बीच चक्कर काट रही है.-
लोग आते हैं ,जाते हैं .तरह-तरह के लोग .बातें ही बातें !
कब तक? कैसे ?
 चंचल से काफी मदद मिलने लगी है ,पर उसे भी कालेज जाना ,अपनी पढ़ाई  .असित का सहयोग मिल रहा है .पर उनका अपना काम भी तो है .तरु को मना नहीं करते,रोकते नहीं ,खुद भी जितना हो सकता है कर देते हैं .
विपिन कभी थोड़ा सम्हलता है ,तो कभी एकदम उन्मत्त सा हो जाता है .तब उसे नियंत्रण मे रखना मुश्किल हो जाता है .
सिर का घाव भर आया है,स्वास्थ्य पहले ले ठीक है ,जीवन खतरे ले बाहर हो गया है ,पर मन और मस्तिष्क में संतुलन  नहीं आया .
तरु के मन में निरंतर एक मंथन चलता है -भीतर ही भीतर कुछ उमड़ता घुमड़ता अपने साथ बहा ले जाता है .क्या होगा विपिन का ?इन अपराधियों को कौन दण्डित करेगा ?
अपराधी ?
 हाँ,अपराधी .
मन के दर्पण में उसे अपना ही चेहरा दिखाई देने लगा है-पर दर्पण चटका हुआ है .
चेहरा एक नहीं अनेक हैं -आधे-अधूरे   ,विद्रूप करते से !
*

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रवाह और संवाद ! बांधे रखा।
    मन का चटका दर्पण और उसमें दीखते असंख्य चेहरे। --Awesome.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज कहने को बस मौन है।
    विचार, अनुभूतियाँ, अनुभव और आत्मिक द्वंदों ने बाँध कर रखा।
    तरल सचमुच जीवंत हो उठी हैं।
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. फिल्म ''रंग दे बसंती'' का एक दृश्य अनायास ही याद आया अंत में.....जहाँ आमिर खान के मरने पर आमिर के दादाजी आकाश की ओर देख कहते हैं..''साड्डे बच्चे की कुर्बानी क़ुबूलना रब''..और उनके इस कथन पर आमिर की माँ शांति से आँखें मूँद लेती है।
    कहने का अर्थ है...अपने अंश को हम सच्चाई के लिए क़ुर्बान होते आसानी से देख सकते हैं शायद। तब अपने पराये का प्रश्न गौण हो जाता है।क्यूँकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उस व्यक्ति का सुख और विशेषतया दुःख केवल हमसे जुड़ा होता है।
    क्रांतिकारी और आदर्शवादी विचारों का उत्तरदायी होना आसान नहीं....किसी के लिए भी। कभी आदर्शवादिता पर एक माँ से तर्क हुआ था मेरा ..विषय उनके बेटे को आर्मी में भेजने से संबंधित था...तब थोड़ी बातों के बाद उन्होंने ये कहकर बात समाप्त कर दी ''कि अपने बेटे को भेजना सरहद पर मरने के लिए...तब देखतें हैं कितने कलेजे से ये सब कह पाती हो..जो मुझे सिखा रही हो..''। और मैं ये बात भूल भी गयी थी....आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद तरल के अंतर्द्वंद में और विपिन में अपनी और अपने अनुज की छवि नज़र आई।साथ ही सामना हुआ गंभीर परिणाम की संभावना से भी।शुरू शुरू में मन विचलित हुआ था...लगा..सच ही तो है...क्यूँ किसी को इतना सिखाना पढ़ाना और इस कठिन पथ पर ढकेल देना। कुछ दिन ऐसे ही बीते ..बार बार आकर आपकी पोस्ट दोहराकर जाते हुए .......फिर जबसे स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारजनों के बारे में सोचना शुरू किया..और जब लगा कि ये तो मार्ग ही दुर्गम है....भयंकर से भी भयंकर परिणाम की संभावना सोच कर ही इस पर पग बढ़ाए जाने चाहिए।तब जाकर प्रतिक्रिया देने योग्य पाया खुद को। अब तरल और विपिन के लिए नहीं है मन व्यथित।आशा है आप दोनों को मजबूत बनायेंगी। :)

    जब पहली बार पढ़ा तब उपन्यास का ये अंश बहुत कष्टकारीलगा था प्रतिभा जी...मैं पीड़ा को हमेशा 'स्वाद' पर तौलती हूँ परंतु इस तरह की पीड़ा स्वादिष्ट नहीं अपितु दुःखदाई होती है मेरे लिए.....हृदय से अधिक जो बुद्धि को प्रभावित करती है।

    आगे के समीकरण खुद ही जमा रही हूँ....सही भी गलत भी।अब अंत तो पढ़ भी नहीं सकती न....:(

    प्रतीक्षा रहेगी अगले अंक की....!

    उत्तर देंहटाएं