रविवार, 31 जुलाई 2011

एक थी तरु - 26 & 27.


26.
'अरे ,भाभी तुम यहाँ छिपी खड़ी हो , मैं सब जगह ढूँढ आई,' कहती हुई रश्मि पास आ गई, 'अकेली खड़ी-खड़ी ,क्या कर रही हो ?'
 'बाहर चबूतरे पर बडा मज़ेदार डिस्कशन हो रहा था . तीन-चार लोग थे ,बाद में मास्टरजी और उनका लड़का भी आ गये थे .'
 'चबूतरा पालिटिक्स हमरे यहाँ की खासूसियत है . हर मसला चाहे कहीं का, कैसा भी हो ,पहले चबूतरे पर ही डिस्कस होता है .'
 'हमारे यहाँ भी .हम जब छोटे थे रश्मि ,1947 से पहले की बात है,तब गान्धी जी का आन्दोलन ज़ोरों पर था. हमारे चबूतरे पर भी ऐसी ही गर्मागर्म डिस्कशन्स हुआ करते थे .आज सुन कर मज़ा आ गया .तब लोगों में जोश था .निष्ठा थी,कुछ उद्देश्य था .. हाँ ,.....मास्टर जी के लड़के का नाम क्या है ?'
 'बबुआ का ?अरुण चन्द्रा .मास्टर साहब ने अपने नाम के आगे से जाति तभी निकाल फेंकी थी .स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ कर कॉलेज छोड़ दिया था.इनके भाई,चाचा वगैरा बड़ी अच्छी- अच्छी जगहों पर हैं.यह बिचारे रह गए .अब ल़ड़के को इस सब मे पड़ने से मना करते हैं . कहते हैं पढ़ो- लिखो ज़िन्दगी बना लो .....तुमसे कहना तो मैं भूल ही गई भाभी,माँजी तुम्हें कबसे बुला रही हैं .सामान की लिस्ट बनाई जा रही है आज शाम तक सारा ताम-झाम धर्मशाला में पहुँच जाना है .'
 तरु को मालूम है धर्मशाला सिर्फ तीन दिन के लिये मिली है .वैसे काफी बड़ी और खुली हुई है ,कमरे भी काफ़ी हैं .रश्मि की बिदा के बाद ही खाली कर देनी होगी .छोड़ते ही अगली पार्टी आ जायेगी .इन दिनों बहुत शादियाँ हैं,
 घर में मेहमान काफ़ी आ गये हैं .हलचल बढ़ गई है.
आनेवाले अपनी-अपनी निगाह से तरल को तोल रहे हैं .अलग -अलग झुण्ड बना कर लोग छोटे-मोटे कामो में लगे  हैं ,साथ में बातें भी चल रही हैं .
लड़कियों में उत्सुकता है ,असित भैया ने लव- मैरिज की है -ऐसा क्या है भाभी में ?
 'ऐसी सुन्दर तो नहीं है !'
'देखने में साधारण होते हुये भी अच्छी लगती है .'
'व्यवहार खूब अच्छा है .'
'खूब बातें करती हैं .'
'काम भी तो डट कर कर रही हैं .'
 लड़कों का कहना कुछ और है -,'सिर्फ गोरा रंग ही सबकुछ नहीं .काली  तो बिलकुल नहीं ,कुछ गिरता रंग ,पर बोल-चाल, व्यवहार कितना अच्छा है .बार-बार मिलने-बोलने का मन करता है .'
'ढंग भी खूब है ,ऐसा कि घर बाहर हर जगह निभ जायें .प्रभाव पड़ता है कि मिले हैं किसी से .'
 ' हाँ ,कुछ है जो अपनी तरफ खींचता है .'
 'मन का साथी मिल जाय तो क्या बात है !'
 तरल चुनौती सी खड़ी है सबके सामने .कुछ-कुछ रिमार्क कानों में पड रहे हैं .
 'लड़का इतना हैण्डसम . बीबीऔर बढ़ कर मिल सकती थी?'
 'चलो, जो है सो ठीक है.असित भाई कौन गोरे हैं उनसे तो साफ़ ही है रंग.'
तरल को खुद लग रहा है शादी के बाद उसका रंग काफ़ी खुल गया है .
' मिला-जुला  तो कुछ भी नहीं .'.'किसी बड़ी-बूढ़ी का रिमार्क था ,'भई कुछ जमा नहीं ,पता नहीं काहे पर रीझ गया !'
 'पागल हुई हो लव मेरिज में कुछ मिलता है ?बस लड़की मिलती है .'
 तरु को याद है असित ने कहा था ,'तुम मुझे अच्छी लगती हो .तुम्हारे बिना मै कैसे रहूँगा ?'
 वह सोच लेती है और किसी को अच्छी लगूँ, न लगूँ क्या फ़र्क पड़ता है !

 पास के कमरे से आवा़ज़ें आ रही है ,'अब लाला काहे को पहचानेंगे !अब तो सब भूल गये .जब इन्टर व्यू देने आये थे हमारे पास ,तो इनसे कहते थे -दादा हमे टाई बाँधना सिखा दो .इन्हीं ने सिखाया था ढंग-सहूर .पर अब काहे को याद होगा !'
 बाहर आँगन से तरल सुन रही है .खूब ठसकेवाली जिठानी हैं ,फुफुआ सास की बहू.पढी-लिखी नहीं तो क्या हुआ ,पैसा तो है .सबको कुछ न कुछ सुनाते रहने का अधिकार है उन्हें !
 'रहने दो भाभी ,' किसी ने टोका , 'बाहर आँगन मे तरु भाभी हैं.'
 'हैं तो हम क्या करें ,' उन्होने इठलाकर कहा ,'तब भाभी- भाभी करते मुँह नहीं थकता था असित लाला का .मैं कोई झूठ बात कह रही हूँ क्या ?अब कोई नहीं पूछता कहाँ दादा ,कहाँ भाभी .'
 रश्मि ने तरल के पास आकर बताया था ,'इनकी ऐसी ही आदत है,हरेक से कुछ न कुछ शिकवा है इन्हें.चाहती हैं सब इनके गुन गाते इनके चारों तरफ घूमते रहें .'
 तरु का उत्साह फीका पड गया .
असित ने बताया था - जाता था तो कभी खाली हाथ नहीं जाता था ,घी ,खोया .आम .अमरूद भर-भर कर पहुँचाता रहता था .तब लाला-लाला करते पीछे घूमती थीं .अब दादा का प्रमोशन हो गया है न,रुतबा बढ गया ,ऊपर की आमदनी के ज़रिये बन गये .तब तो कहीं जाना होता था तो  मुझे लिख देती थीं .टिकट के पैसे भी मैं कभी नहीं लेता था .पहुँचा आता था सो अलग .नौकरी लगने पर सबसे पहले उन्हीं को उनकी पसन्द की साड़ी खरिदवाई थी .और मैं करता था तब - इनके मान का भूखा था न !

'पर उस सब को उनने अपना अधिकार समझ लिया .अब पोस्टिंग दूर हो गई तो नहीं जा पाता ,तब से बड़ी शिकायतें हैं. वे चाहती हैं और सबको छोड़ उन्हीं के हिसाब से चलूँ ,सौतेला- सौतेला याद दिलाती रहती थीं . पर अब मेरा भी तो कुछ  फ़़र्ज़ है .
असित को याद है- आते- जाते कुछ न कुछ लेकर ही उनके घर रुकता था ,बस एक बार एक हफ़्ते रहा था ,जब पिता का दूसरा ब्याह हुआ था .पर कहती फिरती हैं सौतेली माँ के मारे हफ़्तों हमारे पास पड़े रहते थे.

 तरु का मन ऊबने लगा है-पहले की विपन्नता और असहायता की याद दिला-दिला कर लोग अपनी कृपा से तरु को अवगत कराना चाहते हैं .
'ऊँह .क्या करना है मुझे.इन सबसे ! चार दिन बाद सब अपने-अपने घर होंगे .बस रश्मि की शादी अच्छी तरह निपट जाये, ' यही मना रही है तरल .
 'भाभी ,तुम्हें पता है ,ये लोग सगापन दिखा-दिखा कर ,फुसला-फुसला कर तुम्हारे बारे में टोहती रहती हैं .थोड़ी सी बुराई कर दूँ तो मगन हो जायेंगी .'
 'तो कर दो न .उनके मन की भी हो जाये .'
 'अरे, फिर एक की दस इधर -उधर लगायेंगी ,और बढ़ा-चढ़ा कर तुम्हारे कान भरेंगी .'

 रात को तरु ने असित से कहा था ,'सुनते हो ,मैंने तुम्हें बहका  लिया है .'
 'कहने दो उन्हें ,'उसे अपने में समेटते हुये कहा असित ने,'मुझे तुम्हारे सिवा और कोई नहीं चाहिये था .'

 इस स्पर्श के साथ एक और स्नेह भरा स्पर्श तरु के मन को छू जाता है ,जिसका आकर्षण कभी कम नहीं होगा , अपने मन में ही दोहराता है-'अब मुझे कुछ नहीं करना ' .यही तो असित ने कहा था ',तुम बहुत कर चुकीं ,अब मुझ पर छोड़ दो अब तुम्हें कुछ नहीं करना है .'
 हाँ, असित तुमसे मुझे दुखों ने जोड़ा है ,सुख के स्वप्नो ने नहीं .यह लेई इतनी कच्ची नहीं  कि जरा से ताप से खुल जाये .
एक आश्वस्ति जो अंत तक सम्हाले रहेगी !
निश्चिन्त पलकें मुँद जाती हैं .
***
25
मकान मालिक शुक्ला जी के घर से ज़ोर-ज़ोर से आवाजें आ रही हैं .
 'आज तो हड्डियाँ तोड़ के  रहूँगा ...ले हरामी ....'
 'हाय, हाय रे अब नहीं करेंगे. बाबूजी ...अब कभी नहीं ...'
 'नहीं समझेगा कभी तू .आज तुझे ठिकाने लगा कर रहूँगा .'और मार-पीट के साथ-साथ हाय-हाय की आवाजें .
 'हाय अम्माँ ,हाय बाबू ,हाय हाय रे मर गया ...'

 तरु और रश्मि बरामदे में निकल आई हैं .
 'कैसी बुरी तरह मार रहे हैं !'
 'वह है ही चार-सौ-बीस. भाभी ,यही है इनका तीसरे नंबर का लडका दन्नू !जब आते हैं दो-चार बार भूत उतार जाते हैं .पर वह भी एक ही बेशरम है .उधर वो गये इधर ये फिर चालू .

 चीख़-पुकार और मारने की आवाज़ें बराबर आ रही हैं .
 'ऐसे मारने से तो बच्चे और बिगड़ जाते हैं .'
 'बच्चा?बच्चा नहीं,अठारह -उन्नीस साल का साँड  है.उसकी शुरू से यही आदतें है .'
 रश्मि उसके किस्से सुनाने लगी -
छोटी बहिन गर्ल-गाइड्स में थी ,उसकी यूनिफार्म का नेवीब्लू दुपट्टा आया  .शाम को उसने तह लगा कर हैंगर पर टाँग दिया .सुबह पी.टी के लिया जल्दी पहुँचना था .वह तैयार होकर दुपट्टा उठाने आई तो देखा दुपट्टा हई नहीं .
 'काहे अम्माँ ,तुमने धर दौ का? हियाँ अरगनी पे टाँगो हतो '
 'हम काहे धरिहैं ?हुअँनई परौ हुइयै .'
 इधर उधर चारों तरफ ढूँढा.दुपट्टा कहीं नहीं .
 अरगनी की लहदी टटोली,गन्दे कपडों की गठरी ,सन्दूक,छान मारा ,गुसलखाने में भी नहीं .दुपट्टा कहीं हो तो मिले !
 'हमेसा देर हुइ जात हैगी .आज टाइम से तैयार हुइ गईं तो दुपट्टा सुसरो गायब .'
 वह हल्ला मचा रही थी .
अम्माँ भी ढूँढने में जुट गईं .
 दन्नू से बड़े मन्नू ताव खाते हुये बिस्तर से उठे ,'सम्हाल के धरो नाहीं जात है किसऊ से .जइये कहाँ? हियनई हुइयै .'
 उनने बिस्तरों को भी  उलट-पलट डाला .
दन्नू पड़े सोते रहे . किसी ने जगाया भी नहीं .
बहिन ने रोना शुरू कर दिया
 'नेक सो दुपट्टा है .कहूँ दबिगौ हुइयै ',मन्नू ने सांत्वना दी .
 गठरी फिर उल्टी गई,अरगनी की लहँदी बिखेरी गई ,बाहरवाला सन्दूक खखोला गया .दुपट्टा नहीं मिला .
 हार कर मन्नू नया लेने चले .
 मोहल्ले की दुकान पर नेवीब्लू दुपट्टा माँगते ही दुकानदार ने झट एक तह लगाया हुआ प्रेस किया दुपट्टा पकड़ा दिया ,' जहै तो लियो बाबूजी ,कल दन्नू बेच गये हते .'
 कह कर दुकानदार ने खीसें निपोर दीं .
 आश्चर्य से मुँह खुला रह गया मन्नू का ,'दन्नू बेच गये हते !'
 'हाँ!आय के कहन लगे-नओ दुपट्टा है ,एकौ बार ओढ़ो नाहीं गौ .अब जा कलर की जरूरत नाहीं है .'
 'साला चोट्टा ,औने-पौने दामन पे बेच गओ बहिनी को दुपट्टा .'दुकानदार से कुछ कहने से क्या फ़ायदा ,लाकर पटक दिया बहन के सामने .
 'हियाँ कहाँ मिलिहै दुपट्टा ?सामई को दन्नू बेच आये हते .'
 'दन्नू बेच आये हते ! 'माँ ने कपाल पीट लिया .फिर सोच कर बोलीं ,'पर बे तो साम ई से घर नाहीं हते .रात दस बजे आये और खाय के सोय गये .'
 दुपट्टा बेच के सनीमा देखन गओ हुइयै ,सुसरा. चोर कहूँ को ,नालायक .है कहाँ ?दन्नू ,अबे दन्नू ...'
दन्नू की ढूँढ पडी अभी-अभी तो सो रहे थे .जैसे ही सुना भाई दुपट्टा खरीदने जा रहे हैं चुपके से सरक लिये .
 'आउन देओ सुसरे को ..जइयै कहाँ ..'गुस्से में मन्नू चिल्ला रहे थे.
 'बहिनी को दुपट्टा भी नाहीं छोड़ो .कैसो हरामी पैदा भओ है .खून पियन के लै जनमो है राक्सस...'माँ बड़बड़ाती रहीं .
 रश्मि और तरु बातें करती चबूतरे पर निकल आई हैं .
 किताबें लादे पड़ोस की उमा ने आकर अपना दरवाजा भड़भड़ाया -उमा का घर आगे सामने की तरफ़ है .दरवाज़ा खुलते ही उमा उत्तेजित-सी अपनी माँ से कह उठी .'अम्माँ ,वह जो गुण्डा बस में लड़कियों को परेशान करता  था , जिसे पुलिस पकड़ ले गई थी ...'
 रश्मि और तरु चबूतरे के उस ओर के कोने पर पहुँच गईं .
 'उमा, किसे पकड़ ले गई पुलिस?'
 'एक गुण्डा था ,खूब छेड़ा करता था बस में लडकियों को,गंदी-गंदी बातें बकता था ,एक दिन एक लड़की की चुन्नी खींच ली . अगले दिन वह अपने भाई को बुला लाई ,तो गुण्डे  ने उसके छुरा भोंक दिया .तब पुलिस पकड़ ले गई थी .'
 'अच्छा !'
 'आज फिर वह बस स्टैंड पर खड़ा था .सबको धमका रहा था कि एक-एक को देख लेगा .'
 उमा के पिता बाहर निकल आये थे .
 'छोड़ दिया होगा कुछ ले लिवा कर .या किसी नेता का पालतू रहा होगा उसी ने छुड़वा लिया होगा .उमा, तुम किसी के बीच में मत पड़ना .अब तुम रिक्शे में जाया करो .'
 'पर बाऊजी ,वो लोग जो बस से जाती हैं वे कहती हैं- हम रोज रोज तीन- तीन रुपये रिक्शे के लिये कहाँ से देंगे ?"
 'उँह ,तुम्हें उनसे क्या करना ?तुम अपनी देखो .'
 उमा चेहरा तमतमा रहा था .
***
"कैसा अभागा शहर है.कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब कोई हत्या ,अपहरण.बलात्कार या दुर्घटना न होती हो ! लोगों की इतनी हिम्मत कैसे पड़ती है !"
 तरु ने अखबार पढ़ कर मेज़ पर रख दिया .
 "पैसा ,पद ,प्रभाव ,तीनों की मिली भगत है ," विपिन बताने लगा,"ये ठेकेदार ,एम.एल .ए .और थानेदार तीनों मिले हुये हैं ,बुआ जी .
डे़ढ़-ढाई लाख का ऐशगाह बनवाया है उसने .उसकी निगाह गाँव से आई एक मज़दूरनी पर थी .पहले लालच देता रहा ,जब नहीं मानी तो राम सरूप ने अपने गुण्डों से उड़वा लिया .उसका आदमी रिपोर्ट लिखाने गया तो थानेदार ने लिखी नहीं ,उसे धमका कर भगा दिया .उल्टे औरत पर तोहमत लगा दी -किसी से फँसी होगी ,भाग गई हम क्या करें ?'
"हमारे ही गाँव की बात हमसे छिपेगी भला ! उसका आदमी रोता हुआ गाँव गया .वहाँ के पुराने जमीदार बड़े सज्जन आदमी हैं.उनकी बिटिया यहीं ब्याही है ,कभी आपसे मिलायेंगे ,बुआ जी .अब तो पूरा गाँव इनके खिलाफ़ है़.और हमारे पास तो पक्के सबूत हैं ,एक नहीं तीनों के खिलाफ़ ."
 विपिन की बात तरु बड़ी रुचि से सुन रही है .
 "थानेदार तो खुद साला चोर है .उसके एरिया में चोरी- रहजनी होती है ,उसका हिस्सा उसके घर पहुँच जाता है .गुण्डों को राजनीति में संरक्षण मिला है .कोई किस्सा उभरता भी है तो ऊपर  का ऊपर दबा दिया जाता है .ग़रीब आदमी बिचारा साधनहीन ,उसे डरा-धमका कर चुप कर देते हैं ये लोग .ज्यादा गड़बड़ की तो मार दिया जान से ..बस इनका रास्ता साफ़.अबकी  तो हमने सोच लिया है  अपने गाँव की मदद करनी है. "
 "तुम अकेले क्या-क्या कर लोगे विपिन ?"
 "अकेले कहाँ?बुआजी .पूरा गाँव साथ है .सब गवाही देंगे .ऐसे तो जब वो लोग हल्ला मचाते हैं ,ये भ्रष्ट लोग झूठी वारदातों मे उसे फँसा देते हैं .बिचारे की जिन्दगी चौपट कर देते हैं .तबाही मचा रक्खी है .चुनिया की बात को अब दबाया नहीं जा सकता .चुनिया नाम है उसी औरत का .पता नहीं जिन्दा है या मार डाला इन राक्षसों ने ."
 "तो इतने दिन तुम यही सब करते रहे .वही मैं कहूँ कि विपिन आजकल है कहाँ !लवलीन से पूछा उसे भी पूरी बात नहीं मालूम ."
 "पूरी बात कैसे बतायें उसे ?वह डरती है .कहती है तुम्हें कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी ? मायकेवाले तो वैसे ही खफ़ा हैं.पर हम डर कर कैसे बैठ जायें ?"
 "तुम उसे हमारे यहाँ भेज दिया करो .अकेली परेशान होती होगी ."
 "बुआ जी कोई एक दिन थोड़े ही है ,यहाँ तो ज़िन्दगी ऐसे ही बीतनी है .वैसे सब बता भी दें पर आजकल उसकी तबीयत ऐसी ही चल रही है ..उससे कह दूँगा आपके पास चली जाया करे ."
*
 अख़बारों में चुनिया अपहरण काण्ड ज़ोरों पर है .
कितने बड़े-बड़े लोग इन्वाल्व्ड हैं .निशान्त की बिक्री बढ़ गई है .
हर जगह वही चर्चायें .विपिन का नाम बार-बार सामने आता है .उसके पास टेप मौजूद है .
इधऱ चुनिया की लाश मिल गई है .एम.एल.ए.ठेकेदार और थानेदार बुरी तरह फँस गये हैं .
 तरु को आज कल बिल्कुल चैन नहीं पड़ता .लवलीन को दिन चढ़े हैं .ऊपर से आये दिन विपिन को मिलने वाली धमकियों से वह उद्विग्न रहती है .विपिन किसी की नहीं सुनता .वह तुल गया है .
तरु समझाती है तो कहता है  ,"बुआ जी , आप ही तो बताती थीं कि पत्रकार का कर्तव्य क्या है .अब पीछे हटने को मत कहिये .'
 हफ़्ते भर बाद फिर आया विपिन .
 "देखा बुआ जी ,ये चिट्ठी आई है .कैसे धमकाते हैं .लिखते हैं हमारे बीच में मत पड़ो वरना अंजाम बहुत बुरा होगा ."
 ले कर पढ़ा तरु ने .और भी बहुत कुछ लिखा है चिट्ठी में .
 "ये तो लिख कर भेजा है .कहलवा भी चुके हैं कई बार .पूछते हैं कितना पैसा चाहते हो ?खरीदना चाहते हैं हमें, .पढ़ा ?बुआ जी ,हम पर पीत- पत्रकारिता का आरोप लगा रहे हैं ,और साले खुद क्या हैं ?वो हमारी बहन के नौकर की लड़की है .हम नहीं छोड़ेंगे .हम कई बार उससे पहले भी मिल चुके हैं .हमसे भइया जी ,भइया जी कहती थी .बड़ी नेक लड़की थी बुआ जी .अभी उमर भी अठारह -उन्नीस की ही थी ."
 असित कहते हैं , 'विपिन को समझाओ .यह सब ठीक नहीं वह अकेला पूरी व्यवस्था से कैसे जूझेगा ?हर कदम पर उसकी जान को ख़तरा है '.
 पर विपिन नहीं मानता .अख़बार में फिर उन तीनों के कच्चे-चिट्ठे खोले गये .मशहूर गुण्डों-बदमाशों के नाम और उनकी करतूतें प्रकाशित की गईं .
विपिन को जो पत्र लिखे गये थे वे भी छपाकर सार्वजनिक किये गये ,उनकी दी  गई धमकियों से अवगत कराया गया .
सब का श्रेय विपिन को .
  लवलीन रोई-धोई ,तरु फिर विपिन के घर पहुँची ,होनेवाले बच्चे की दुहाई दी.असित ने लाख समझाया .विपिन पर कोईअसर नहीं पड़ता .वह थानेदार को भी नहीं बख्शता .तीनों की करतूतें सामने आ रही हैं .चारों ओर थुड़ी-थुड़ी हो रही है .
 सम्पादक ने कई बार इशारा किया -यह क्या कर रहे हो ?इन लोगों से भिड़ने से पहले अच्छी तरह सोच लो .हर तरह का ख़तरा हो सकता है .
 पर विपिन पर एक नशा-सा सवार है ,जैसे जुनून सवार हो गया है उसे .
 बस एक ही बात दोहराता है ,"अब पाँव पीछे नहीं देना है.सारी दुनिया जान ले विपिन बिकनेवाला नहीं है अब पीछे लौटना नहीं है ,सोचना नहीं है .अब बस करना है ,कर डालना है .."
 ठेकेदार थानेदार एम.एल.ए. तीनों अपने-अपने ढंग से उसे साधने की कोशिश कर रहे हैं .
 विपिन किसी तरह काबू में नहीं आ रहा .
वह हँसता है,"ये लोग कहाँ किसी से दबते हैं .अपने खिलाफ़ तथ्य सिद्ध होने पर कहीं के नहीं रहेंगे इसलिये दबते हैं .अब तक लालच दे रहे थे ,खुशामद कर रहे थे अब धमकी पर उतर आये हैं .पर हमने जो काम हाथ लिया है उसे अधूरा नहीं छोड़ना है .आप डरिये मत बुआ जी ,लिली को  भी समझा दीजिये.हम सब से निपट लेंगे .तब आप कहेंगी - ऐसे होते हैं पत्रकार !"
 तरु को लग रहा है उसकी फेंकी  चिन्गारी सुलग उठी है ,अब अंगारों को धूल डाल कर बुझाने की लाख कोशिश करे , कुछ नहीं होने वाला .
***
*
27.

 बहुत सी रहस्यमय अनुभूतियां ,विभोर करती ध्वनियाँ ,कोमल रंग,सुकुमार अनुभव और अनेक सुहानी महकें ,जो बचपन में हमें मिले हैं अगली पीढियों को नहीं मिलेंगे ,क्योंकि दुनिया अब बहुत बदल गई है .
 अनेकानेक अनाम पंछियों का संयुक्त कलरव ,जिनमें कुछ ध्वनियों का अपना अस्तित्व होता था ,अब सुनने को नहीं मिलता .
तब लगता था दुनिया में अनेक प्रकार के प्राणी निवास करते हैं,वनस्पतियों के निराले संसार मे आश्चर्यजनक विविधता थी .हर मौसमकी अपनी गंध,अपना स्पर्श,अपने रूप ,रस और ध्वनियाँ थीं.अब वह सब नहीं लगता ..सब तरफ आदमी ही आदमी दिखाई देते हैं या सड़कें और मकान .चाँदनी तो आज के जीवन से ही गुम गई, ,उसकी जगह बिजली की कृत्रिम रोशनी ने ले ली है .
रात्रियों के नित नये रूप कहीं खो गये हैं .चाँद-तारों का अनोखा संसार आँखों से ओझल रह जाता है.
 पीछे के बाड़े में  करौंदों के झुण्ड से उठती एक लम्बी संगीत की तान-सी आवाज जिस पक्षी की थी तरु उसे देखते ही पहचान लेती थी
 स्वर्ण चंपा पर लगातार ' ठाकुर जी,ठाकुर जी' रटनेवाली चिडिया की झलक भर मिलती थी और सघन वृक्षों के पत्तों से आती क्रीं-क्रीं,चीङ्-चीङ् ,,ट्यू-ट्यू और बहुत सी कर्ण-मधुर ध्वनियाँ वातावरण में अवर्णनीय माधुर्य भर जाती थीं .पता नहीं किस पक्षी की आवाज ,जैसे कोई घडा भर -भर कर उँडेल रहा हो .गिलहरीका  दोंनो पाँवों पर  बैठ कर हाथों में कोई छोटा सा फल पकडे,दाँतों से चिट्-चिट् करती खा रही होती और तरु की आहट पाते ही भाग जाती ,जैसे तरु उसका फल छीनने आई हो .
भोर से साँझ डूबे तक प्रकृति की संगीतमय ध्वनियां!सारा परिवेश जीवन्त सा प्रतीत होता था .
 अब वह सब कुछ नहीं है .सडकों पर दौड़ते वाहनों का प्रतिदिन बढ़ता अनवरत शोर,हर घर में गूँजते रेडियो के वही-वही फिल्मी गीत ,कान फोड़ू लाउडस्पीकर या चक्कियों और मशीनों की अविराम एकरस आवाज़ !आरती की बेलामें मन्दिर की घंटियों की प्रिय ध्वनि अब सुबह-शाम कानों में नहीं पडतीं .प्रसाद तो शायद अब कोई बाँटता ही नहीं
.रास्ते के आस-पास तक छाया फैलाये घने वृक्षों की सघन-श्याम आकृतियां  ,परछाइयों की रोमांचित करती अनुभूति,बादल और आकाश के रंग,अब जीवन से दूर हो गये हैं .
.सारे रहस्य खुल जाने के बाद कौतूहल ,माधुर्य,चाव, रोमाँच सब खत्म हो गये .अब जीवन एक सीधी सपाट कोलतार की सडक पर अविराम दौड़ है .
 शाम होते-होते आकाश में काफ़ी नीचे तक धुआँ-सा घिर आता है जिसमे बिजली की रोशनी धुन्ध के बीच तीर से चलाती है .बचपन सब कुछ बडी सहजता से स्वीकार लेता था पर अब हर जगह एक प्रश्न-चिह्न खडा हो जाता है .सारे संबंध अपना अर्थ खोते जा रहे हैं .हर जगह रिक्तता और तिक्तता भरती जा रही है .

 कभी-कभी बड़ी भयंकर ऊब लगने लगती है तरु को.
ऐसी मनस्थिति से मुक्ति पाने के लिये सुहास चन्द्रा ने मायके हो आने का सुझाव दिया था -थोडा चेन्ज हो जायेगा और फिर मन हल्का हो उठेगा .
 मायका ?माँ-बाप ही नहीं तो मायका कैसा ?भाग्यशालियों को नसीब होता है मायका !
 मेरे लिये ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ कुछ दिन मुक्त मन से चिन्ताहीन होकर बिताये जा सकें .अब तो अदले-बदले वाले रिश्ते हैं .मनों में कहीं गुञ्जायश नहीं .जितना वह करेगी उसके हिसाब से बदला चुका दिया जायेगा ,या संभव है उससे लोगों को शिकायत ही रह जाय !
 शन्नो की एक बात तरु के मनमे बडी गहरी चुभी है -'गौतम मेरे कहने पर तुझे बुलाता है ,बता कर शन्नो ने यह भी जोडा था ,'वह मेरे बच्चों को इतना चाहता है,मुझे इतना मानता है ,तू बीच में अडंगा डालने आ जाती है

 गौतमकी पत्नी के साथ हुये अनुभव,जो कभी सुखद नहीं रहे मन को और खिन्न कर देते हैं .गौतम के औपचारिक बुलावे आते हैं पर तरु जाना हमेशा टाल देती है .कितने वर्ष बीत गये ,किसी शादी ब्याह में चलती-फिरती मुलाकात हो जाये तो हो जाये .बस.
 और संजू के घर का हाल ! इस हाथ दे उस हाथ से लेने की इच्छा करे .पर लेने की इच्छा न हो तो इस बेकार के हिसाब -किताब को चलाये रखने की जरूरत ही क्या है ?और जहाँ जा कर सिर्फ परायापन लगे वहाँ जाने से क्या फ़ायदा ? कुछ दिन भी काटने मुश्किल हो जाते हैं .
  इन हिसाबी संबंधों से मन ऊब गया है .
ऐसी कोई जगह नहीं इस दुनिया में -जहाँ इस भागम-भाग से कुछ समय को निवृत्ति मिल सके ?इस रोज-रोज के क्रम से कहीं कुछ अल्प-विराम मिल सकता है क्या ?असित और चंचल ,बाजार और घर ,बाहर और भीतर और इन सबके बीच चक्कर खाती तरल !
 "अरे मौज से रहो ,तुम्हें परेशानी क्या है " असित कहते हैं ,फिर जोड़ देते हैं ,"मुझ लगता है तुम्हें आराम से रहने से  एलर्जी है ."
 सही कहते हैं वे !
तरु सोचती है ,कोई कुछ नहीं कर सकता .ये तो मेरी अपनी बनाई नियति है !

बने -बनाये खाँचों मे अगर कोई फिट न हो पाये तो बेचारे असित क्या करें ?

*
27.

 ' बुआजी आज का पेपर पढा ?"
अभी कहाँ पढ़ पाया विपिन .कोई खास बात ?"
 विपिन के पाँव जमीन पर नहीं पड रहे हैं .
 "अब सब सालों की समझ मे आ जायेगा कि हराम के पैसों से खरीद लें ,ऐसा सस्ता नहीं है विपिन !"
"वो जो ठेकेदार था न,जिसने ढाई साल में अपना महल खडा कर लिया और पुल में ऐसा मेटीरिल लगाया कि पन्द्रह लोगों की बलि लेकर छः महीनों में बैठ गया ,उसकी पोल खोली है हमने .उसकी राम स्वरूप से मिली-भगत है ,वही एम,एल. ए., ,उसने फिर से एक ठेका दिला दिया .पर अब हम प़ड गये हैं पीछे .हमें भी दाना डालने की कोशिश की थी पर हम नहीं आये उसके फन्दे में ."
तरु की आँखें चमक उठीं ,"अरे सच !इतना बडा कदम उठा लिया तुमने विपिन !कहाँ है अखवार देना ज़रा ."
 पढ़-प़ढ कर तरु की बाँछें खिली जा रही हैं ,विपिन की छाती फूल उठी .
पर तरु विचार मग्न हो गई .
 "विपिन, बडा ख़तरा मोल ले लिया तुमने .अब हर समय तुम्हें सावधान रहना पड़ेगा .मुझे तो बडी चिन्ता हो रही है ."
 "आप क्यों डरती हैं ? खुश होइये .हम सच बात सामने ला रहे हैं .फिर झिझक काहे की ?इन्हे तो यों चुटकी में उड़ा देंगे ."उसने चुटकी बजाई ,"जन-मत खिलाफ़ हो जाये तो ये साले कहीं के नहीं रहेंगे .और यहाँ क्या धरा है हमारे पास?/रोज कमाना ,रोज खाना ,कोई लेगा तो क्या लेगा ?"
 तरु को चुप दख वह फिर बोलने लगा ,"सम्पादक सुसरे की पहले तो हिम्मत नहीं पड़ रही थी छापने की .हमने सीना तान कर कहा-बेशक हमारा नाम दे दो .जब प्रमाण मौजूद हैं तो पीछे हटने से क्या मतलब ?"वो बोला -जुम्मेदारी तुम्हारी है ,विपिन बाबू . हमने कहा -लाओ हम अपने हाथ से लिख दें अपना नाम .--यह तो पहला कदम है ,बुआ जी .अभी  आगे-आगे देखिये .अभी एम.एल ए. के यहाँ से बुलावा आयेगा .हम भी कम नहीं हैं ..सब टेप कर लेंगे .हाथ में सुबूत होगा फिर दबना किससे ?"
 "आज यहीं खाना खाकर जाना विपिन ,अपने फूफा की भी सलाह ले लो ."
 "अरे ,आप नाहक घबरा रही हैं .पीछे हटने के लिये कदम नहीं बढाता ,अपने विपिन को इतना कच्चा मत समझिये .आप तो बस आशीर्वाद दीजिये कि सत्य पर डटा रह सकूँ ."
 विपिन ने झुक कर उसके पाँव छू लिये ,उसके सिर पर हाथ रखते तरु का मन जाने क्यों कच्चा हो आया ,अन्दर  कुछ वेग से उमडा और गले में आ कर अटक गया .
  उसे चलने को तैयार देख तरु ने कहा "अभी बैठो विपिन ." कुछ और कहना चाहती थी पर क्या कहे कुछ निश्चय नहीं कर पाई .
 "नहीं ,बुआ जी .लिली अकेली होगी आजकल उसे जाने क्या हो गया है .मुझे देर हो जाती है तो घबराने लगती है .और हम ठहरे पत्रकार ,देर- सवेर तो होता ही रहता है .--अच्छा ,अब चलने दीजिये .
 विपिन जा रहा है .पीछे-पीछे निकल आई है वह .दरवाजे पर खड़ी विपिन को  निहार रही है .
 इसी विपिन ने एक बार कहा था ,"एक बार उछाल दो किसी को ,फिर देखो हमेशा को दबा रहेगा .हमेशा डरेगा कि कोई ऐसी-वैसी बात साथ न जुड़ जाय .--इन लोगों की पोल तो हमें मालूम है.जब चाहें एक खबर छाप दें और इनका डब्बा गोल ."
 "वे भी तो अपना स्पष्टीकरण देते होंगे ?"
 'छपने ही कौन देता है उनका ?और उस पेपर में  तोछप नहीं सकता ."
 "और जनता ?"
 "जनता की खूब कही आपने ! अरे ,जनता क्या समझे .उसने तो जो पढ़ लिया सो ठीक .किसी के बुरे प्वाइन्ट्स लोगों के गले जल्दी उतरते हैं,बुआ जी.  और आस-पास के दो-चार लोगों ने असलियत जान भी ली तो उससे फ़रक नहीं पड़ता .कभी तो  लोग कहने लगते हैं-बडा साफ़-सुथरा बनता था अब खुली असलियत !बुराई पर विश्वास जल्दी जमता है लोगों का .स्पष्टीकरण दिया भी जाये तो वह लीपा-पोती समझा जाता है ..."
हाथ हिलाता घूम कर चल पड़ा  वह.

जनतंत्र का सच्चा चित्र खींच देता है विपिन !

पीछे-पीछे  दरवाज़े तक आई हुई तरल ,सोच में डूबी  उसे जाते  देखती  खड़ी रह गई.

*
(क्रमशः)
















10 टिप्‍पणियां:

  1. तरल का मन, असित का मन, विपिन..तरल से जुड़े लोग, बंधन, व्यवहार।
    पढ़ा जा रहा हूँ, उत्सुकता से।

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  2. असित के बचपन में मन खो गया....बस यही लगता रहा बार बार.....असित का सा बचपन जीने के बाद स्वभाव कैसा हो जाता होगा आगे?
    किसी बहुत अपने को बार बार स्पर्श करके और तसल्ली करना कि वो अभी 'है'.....इस बात को वो ही समझ सकता है..जिसने वाकई ऐसा अनुभव किया हो जीवन में। बहुत देर तक इसी एक बात का एहसास ज़हन पर तारी रहा।

    तरु और असित के झगड़े फिर मान-मनुहार अच्छी लगी। हालाँकि अभी भी मुझे असित पर विश्वास नहीं ही है। ऐसा हमेशा अनुभव होता है..कि असित आगे चलकर तरु से अलग हो जायेगा या फिर उसके जीवन में नहीं रहेगा...कारण जो भी हो उसके 'न रहने' के पीछे।

    विपिन पर ढेरो प्यार उमड़ आया इस बार तो..जैसे मैं ही उसकी बुआ हो गयी हूँ। सोचा नहीं था कभी कहानी के प्रवाह में बाधा देने वाला पात्र मुझे इतना प्रिय हो जायेगा।उसकी हिम्मत और जूनून बड़े भाते हैं उपन्यास के आखिरी हिस्से में।

    आगे की कहानी सोच रही हूँ कि क्या होगी....काश पुस्तक होती तो पलट कर सबसे पहले अंत पढ़ लेती। :)

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  3. तरु,किसी पर विश्वास क्यों नहीं कर पा रही हो ?

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  4. किसी पर नहीं सिर्फ असित पर ही प्रतिभा जी..विपिन आता था तो राजनीतिक चर्चाएँ आरंभ हो जातीं थीं...मुझे उसमे रूचि नहीं होती थी।
    असित पर भरोसा क्यूँ नहीं है??...उसका कोई ठोस कारण नहीं है .....बस ऐसा ही लगता है हमेशा....कि तरल के जीवन में सब कुछ सीधा सीधा तो नहीं ही चलेगा...और उसकी कठिनाईयाँ प्रत्यक्ष रूप से असित से अवश्य जुड़ी हुईं होंगी.....तो देर सबेर कुछ न कुछ अनहोनी तो होनी ही है।अंत के बारे में जानने की हालांकि सबसे अधिक उत्सुकता है.....ये मेरी जिंदगी की पहली ऐसी कहानी है..जिसका अंत मैं पहले नहीं पढ़ रही हूँ..:)
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    (एक और बात प्रतिभा जी...आपने 'पांचाली' को आगे पोस्ट नहीं किया???आज ही पुराने पोस्ट फिर से पढ़े थे...इसलिए आगे पढ़ने की तीव्र इच्छा हुई...अगर समय और स्वास्थ्य साथ दे तो अनुरोध रहेगा कि कृपया पांचाली पर भी लिखियेगा !! )

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  5. तरु दीदी वाला अनुरोध मेरा भी है।
    मैं कब से कहना चाहता था, किन्तु न जाने क्यूँ नहीं कह पाता था।

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  6. तरु और अविनाश जी ,
    कोशिश की थी दोनों को साथ-साथ चलाने की पर दोनों की मनोभूमियों में इतना अंतर है कि ,एक सिर पर सवार हो तो दूसरे को साथ अन्याय की संभावना रह जाती है .मैं भी जल्दी कर रही हूँ इसलिये कि मेरे पास जितना समय बचा है उसी में कई अधूरे काम पूरे कर लेना चाहती हूँ ( दो-दो अध्याय एक साथ लिख कर). बस अगली बारी उसी की है .
    आप की उत्सुकता से मुझे बहुत प्रोत्साहन मिल रहा है .

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  7. .

    कहानी के साथ पूरा न्याय कर रही हैं आप ! ...उत्कंठा बनी हुयी है सतत ! ....लेकिन जाने क्यूँ आज मन बहुत पीछे चला गया . .....बचपन में माँ के साथ छत पर जाकर धूप में उरद की बड़ियाँ डलवाती थी ! ...पिताजी को बहुत पसंद है , वे तो अब अकेले रहते हैं लखनऊ में ....माँ अब नहीं हैं...

    कमेन्ट लिखते समय आँखें आंसुओं से भीगी हैं !

    अभिवादन स्वीकार कीजिये !

    .

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  8. ये तो कहानी है दिव्या जी ,
    इतने गहरे उतर जायेंगी तो मुश्किल हो जायेगी .
    फिर भी आपकी संवेदना का सम्मान करती हूँ और अपने लेखन के प्रति आपके उद्गार प्रशंसा के रूप में ग्रहण कर ,आभार स्वीकार करती हूँ !
    कथा को कथा तक ही रखेंगी तो मन उद्विग्न नहीं होगा
    मेरी संवेदनाएँ और सद्भाव आपके साथ !

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  9. शकुन्तला बहादुर8 अगस्त 2011 को 8:29 pm

    कारणवश प्रतिक्रिया में विलम्ब हुआ है।परिवार में होने वाली नोक-झोंक और मान-मनुहार ने कथा के प्रवाह में सहज स्वाभाविक वातावरण बनाया है।विपिन के प्रसंग द्वारा बीच बीच में कथा को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ देना मन को भाता है।कथा में निरंतर
    उत्कंठा को सजीव रखते हुए प्रतिभा जी ने पाठकों को बाँध सा लिया है।

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  10. बहुत रुचिकर और प्रवाहपूर्ण चल रहा है कथानक...निरन्तर पढ़ रही हूं.

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