शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

कथांश - 23 .

*
वसु की बिदा के बाद पापा ने मुझसे कहा था ,'मैं  जा रहा हूँ ,अपनी माँ को भेजने की  तैयारी कर रखना.' 
 उनकी बात सुन कर चौंक गया ,मैं ,माँ को अपने पास रखने का सोचे था.
'उनकी तैयारी ? आपने बात कर ली ?'
'उसमें बात क्या करना ,जायेंगी क्यों नहीं ?वहाँ घर है फिर मै भी अब ठीक नहीं रहता....  '
'अभी तो उनकी सर्विस बाकी है ..'
'अरे क्या सर्विस !प्री-रिटायरमेंट लीव ली जा सकती है. वैसे  लोग पहले भी रिटायरमेंट भी ले लेते हैं .अब तुम भी चले जाओगे तो....'
इतने में चाय ले कर माँ आ गईँ ,' किसके जाने की बात?
 'तुम्हारी ..चलो अब. अकेली यहाँ कहाँ पड़ी रहोगी ?'
 'पड़ी हूँ यहाँ मैं ?ये मेरा घर है ..यहाँ से कोई मुझे निकाल नहीं सकता .वहाँ क्या है मेरा ?'
' मैं तो ख़ुद  कह रहा हूँ - अपने घर चलो .इस उमर में सबको सहारा चाहिए होता है.'
'किस उमर में नहीं चाहिए होता ?  तुमने बिना औरत के काम चला लिया क्या ? और मैं जब भरी जवानी में यहाँ पड़ी रही -ऊपर से बच्चों को सँभाला  तब किसी ने  सोचा ?तब भी मैंने पूरी कोशिश की थी ,वहाँ तुमने नहीं रहने दिया  .अब मेरा घर यही है .दिन-रात एक कर  जड़ें जमाईं हैं .मैं यहीं रहूँगी..'
'मान रहा हूँ गलती हो गई पर अब सब ठीक हो जायेगा..'
'और वह कहाँ है ?'
'मुझे उससे कोई मतलब नहीं ,ऐसी फ़ालतू औरतें ....'
'देखो, बेकार दोष मत दो उसे .कोई ब्याहता तो थी नहीं .जो तुम्हारा पट्टा पहने रहती '
'तभी तो तुमसे कह रहा हूँ अपने घर चलो '
'मेरी अब कहीं और जाने इच्छा नहीं . फेरे लिए थे उसका भरना अब तक भरती रही .कभी अपना ध्यान भी नहीं आया कि मेरी अपनी ज़रूरतें भी हो सकती हैं .अब निश्चिन्त हुई  तो फिर....'
'तुम समझती क्यों नहीं ..? '
लगा अभी चिल्ला पड़ेंगे ,माँ के ऊपर गुस्सा होने की पुरानी आदत !
ओह ,अब भी अपना ही अधिकार समझे बैठे हैं  ,माँ के चेहरे पर वितृष्णा झलक उठी. ..
वे बीच में बोलीं ,'बेकार गुस्सा मत दिखाना  ,यहाँ कोई तमाशा  खड़ा नहीं किया जाएगा .चार लोगों में मेरी इज्ज़त है.. .'
वे चुप हो गए थे
'वहाँ मेरे लिए क्या है जानती हूँ .यहाँ मेरा काम है, मेरी  पहचान है ,.और तुम  ?..किसी को बता कर आए हो कि बेटी की ब्याहने जा रहा हूँ ?"
कुछ बोले नहीं , कुछ किया हो तो बताएँ भी .
वे अपनी ही कहती रहीं ,' हाँ, तुम हमारे साथ आ कर  रहना चाहो  तो यहीं चले जाओ . '
  तभी महरी की पुकार  आई  .वे चली गईं थीं
बाद में मौका देख कर मैंने पूछा था ,'माँ  मेरे साथ  तो चलोगी न ? '''आता-जाती रहूँगी मुन्ना, पर  रहना यहीं चाहती हूँ . अजानी  जगह ,कुछ करने-धरने को नहीं, किसी से जान-पहचान नहीं . नई नई जगहों के नये ढंग . अब नहीं कर पाऊंगी . यहाँ पुराने लोग हैं  - सब देखा जाना है ,साथ के हैं सब  .समझते हैं  ,अब तक साथ दिया है माधुरी है,हरषी है मेरी ही उमर की .तीरथ करूँगी,और जो भी अपने को भाए .'
फिर पूछ बैठीं ,
'तुझे भी यही लगता है कि मुझे साथ चली जाना चाहिये था.'
'नहीं माँ .तुम्हारा मन न माने तो बिलकुल नहीं ...?'
'मुन्ना, ये सब बातें मैने वसु के आगे कभी नहीं खोलीं .उसके सीधे-सरल मन में क्यों बाप के लिए कड़ुआहट भर दूँ  .उसने अभी  देखा ही क्या है ..उसके साथ निभा लें तो अच्छा ही है .ससुराल में लड़की के बाप के नाम को जानते-पूछते हैं सब.'
*
उस दिन माँ का मन बहुत संतप्त था.
पिता ने जिस अधिकार से उनके  जाने की बात उठाई , उन्हें गहरे चुभी थी.
.बेटी की बिदा से उत्पन्न रिक्तता में उनका अतीत उमड़-घुमड़ कर  टकरा रहा था .
उस रात पहली बार वे मेरे सामने रोई थीं .
वसु चली गई थी. घर में  खालीपन छाया था. उनका संताप से भरा  मन  कुछ कहने को आकुलाया  होगा  .
 बेटी का ब्याह एक बड़े अनुष्ठान के समान संपन्न  किया था उन्होंने ,पूरी निष्ठा से कि, कहीं कोई त्रुटि न रह जाय .
कन्या-दान में बाप आ गए थे . माता-पिता गठबंधन से बैठे - पूरी विहित भूषा में रहीं वे ,सिंगार के साथ  विधि-विधान से सिन्दूर-टीका  उसी का उपादान रहा था.सच में उनका मन प्रसन्न था .कहीं कोई कसर न रह जाये पूरी कोशिश  रही थी .उनके ही शब्दों में ,'बेटी को किसी बात की जवाबदेही न करनी पड़े .मैंने पूरी ड्यूटी निभाई.'

अब तक का किया-धरा सफल हुआ था . बेटी को  ऐसा घर- वर मिला  जैसा उनकी स्थिति में  सोचना भी मुश्किल था .उनकी खुशी का पार नहीं .सारी औपचारिकताएँ तुष्ट मन से पूरी करती रहीं.
 पर सब कुछ अच्छी तरह निबटाकर भी उनका मनउन बोलों से बिंध गया था जो बाद में सुनने को मिले .वसु नहीं थी ,घर ,उस स्निग्ध माधुर्य से रहित  जैसे काटने को दौड़ रहा था .

माँ अकेली रह गई थीं .उनका मौन रुदन मुझसे  देखा नहीं जा रहा था. पर मैं विवश ,कुछ नहीं कर पाया.धीरज देने को कुछ बोलता रहा पर उन्हें सांत्वना हो ऐसा कुछ नहीं था मेरे पास  कहने को .
अब तक कभी ध्यान नहीं गया था ,उस  दिन माँ बहुत थकी लगीं ,बहुत शिथिल -सी !
 उन्हें अब  मन का चैन चाहिये, विश्राम चाहिये!  जीवन-क्रम में थोड़ा बदलाव, कुछ नयापन आए तो फिर से  चेत जागेगा -मुझे उनके लिए लग रहा था . 
पर मैं तो  दो दिन और हूँ , फिर  चला जाऊंँगा . माँ को तो यहीं रहना है !
इनके लिए कुछ  परिवर्तन ज़रूरी है .कुछ दिनों के लिए कहीं घुमाने ले जाने से, मन बदलेगा यही सोचता रहा .
*
बाद में मीता ने उनसे पूछा था,'उस दिन आपको देख कर बहुत अच्छा लग रहा था ..अब ऐेसे ही खुश-खुश रहिये, माँ '
वे मुस्करा दीं .
 उन्होंने कहा था -लोगों का  एक ही प्रश्न- पति ले जा रहे थे उनके साथ क्यों नहीं गईँ?कुछ ने पूछ भी लिया  सुहागिन हो कर रह रही हो ,फिर अकेली काहे के लिए?
' दूसरे के लिए कहने में  किसे ज़ोर पड़ता है माँ ,उनकी चिन्ता ही किसे  है  ?'
'औरतें तो और भी...मंडप में पाँव धरते ही  मैंने देख  लिया था - आँखें फाड़-फाड़ कर देखती स्त्रियाँ एक दूसरी दूसरे से कानाफूसी  रहीं थीं . वही जो पराये औगुन खोज कर अपने गुन दिखाने में  पीछे नहीं रहतीं-अच्छी ,पढ़ी-लिखी, औरों पर अपने ही निष्कर्ष लादने को तुली  दूसरी औरत पर आक्षेप करने से कब चूकती हैं ? उद्देश्य ये कि उसे  नीचा दिखा कर अपनी श्रेष्ठता जताना !'
  और पति  ? हाँ ,फेरे लिए थे   , .मेरी बेटी के बाप  -लाचार थी  .निभा दिया मैंने.'
 'समझ रही हूँ माँ ,और कोई समझे न समझे .मैं आपको समझती हूँ .आपने ठीक किया .'
पारमिता के अपनत्व  भरे व्यवहार से  माँ को सदा  मनोबल मिलता है .
एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि स्त्री हो तो  उसके वैवाहिक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान क्यों टिक जाता है ?अगर विवाह-चिह्नों की बात न हो ,तो आजीविका हेतु कार्य करनेवाली स्त्रियों में  विधवा,विवाहिता और सुहागिन में क्या कोई भेद रहता है?
यह भी कि पति की हर ज़रूरत पत्नी के पल्ले बाँध दी जाय  या समर्थ हो कर भी संतान  का माँ पर निर्भर हो रहने का चाव उमड़ता रहे ,यह उसके प्रति प्यार नहीं केवल अपना सुख देखने का स्वार्थ लगता है मुझे .वह कहे नहीं चाहे , और सबके सुख में अपनी सार्थकता खोजती रहे , पर एक व्यक्ति होने के नाते,अपने लिए भी थोड़ा जी सके इतना अवकाश कोई क्यों नहीं छोड़ता ?
- पर यह मेरी सोच है ,दुनिया अपनी  सुविधा से चलती है 
हाँ,उसकी बात पर माँ ने कहा था-
'अब अपने हिसाब से जीना चाहती हूँ . किसी के कहने का डर  नहीं .बच्चे सँभल गए ,वे खुश रहें !मेरे जैसे और लोग भी हैं ,कुछ और मत सोचना, .मेरे साथ की टीचर्स ,जिनने जीवन को झेला है ,उनकी अपनी कहानियाँ है .एक-दूसरे को समझते हैं और एक दूसरे का सहारा है .अब  दुनिया देखने का चाव जगा है .कुछ तीर्थ आदि भी . ..'
उनमें एक परिवर्तन लक्षित था  .माथे पर धीमी रह जानेवाली बिंदिया चमकने लगी थी.
*
 'चलो माँ ,कहीं चलें  कुछ दिनों के लिए ,कहीं सैर कर आएँ .'जाने से पहले ,मैंने प्रस्ताव रखा था.
'चलूँगी मुन्ना, पर अभी तो यहाँ का सारा पसारा समेटना है .'
लगा जैसे अपने से ही बात कर रही हों,' अभी पूरी निश्चिंती कहाँ ? तेरा जीवन भी ढर्रे पर आये तो चैन पड़े मुझे.'
'जरूर आएगा माँ '
'सच में ! ' उनके तो चेहरे का भाव बदल गया ,'तू  तैयार है शादी को   ?'
'सब कुछ करूँगा जो करना चाहिये .'
तब  अपने मन की बात कह डाली उन्होंने,' हाँ , मेरा नर्मदा मैया की परिक्रमा  का मन है .इधर से निपट कर वही करना चाहती हूँ  .'
 'अकेली ?'
'अकेली कहाँ ? साथ होते हैं कितने यात्री . समान भाव ,समान चर्या .अपना-पराया कुछ  नहीं -यहाँ का बीता यहीं छोड़  ,आगे बढ़ चलते हैं  ... उतने दिन दुनिया के झंझटों से मुक्ति मिलती हो  शायद ...  !'
चकित -सा  उनका मुख  देखे जा रहा हूँ.
' ..पुष्पी और सुधा  दोनों साथ चलने को कह रही हैं, और दो-एक जन भी...'
'मैं भी चलूँ ?'
अभी नई नौकरी है ,..इतनी छुट्टी कहाँ ?'
हाँ , ठीक कह रही हैं वे .
 मैं भी तो जाना  चाहता हूँ , कब से सोच रहा हूँ .
 जाऊँगा !
पर जाऊँगा अकेला ही , मुझे किसी का साथ नहीं चाहिये अब ! 
*
(क्रमशः)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

कथांश - 22.

*
 वसु के विवाह की तारीख तय होने पर माँ ने कहा था
'मुन्ना, मेरा एक कहा मानेगा ?
मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि के उत्तर में बोलीं
'शादी में पिता का होना बहुत ज़रूरी है उन से बात कर.'
 'वे अब वहाँ नहीं रहते ..'
'तुझे कैसे पता?
'पता लगाया था मैंने ..मकान में कब से  ताला पड़ा है. '
'जरूर आते होंगे मकान है तो  ,पड़ोस में पता किया? .'
'नहीं.'
'मुझे जाना होगा.'

 ' ऐसी-वैसी कोई बात न निकल आए  ,बोलनेवालों की कोई  कमी है यहाँ ?बेटी  ब्याहने जा रही हूँ .  उसका मुख उजला रहे और मेरा भी . पिता हैं तो उन्हें ,होना चाहिये .मंडप में बैठी बेटी का हाथ सौंप जायें. उनके हाथ से कन्यादान हो जाये तो सारा किया-धरा सकारथ हो जाये .'
' पर तुम वहाँ जा कर क्या कर लोगी ?"

' पहचानवालों से मिलूँगी , पता करूँगी ,उनके साथ के लोगों को जरूर पता होगा . सिर उठा कर जी सकें मेरे निर्दोष बच्चे ... मैं  जाऊँगी. उनसे कुछ नहीं चाहती  पर उसके लिए बुलाना होगा  .'
गईँ थीं माँ .
ऑफ़िस के पुराने दोस्त से उनका पता मिल गया .उन्हीं से  'कोई खास बात हो तो ख़बर दे देना 'कह गए थे..
माँ को पता चलीं  तमाम बातें .. वह औरत उन्हें चाट गई .खूब पीने लगे हैं  आते हैं छठे -छमाहे .सभी  से कटे-कटे रहते हैं .
माँ ने ही चिट्ठी-पत्री की  .
मुझे दी थी चिपका कर डालने को ,मुझसे रहा नहीं गया   खोल कर देख  ली .
कुछ खास नहीं .ऊपर ' श्री मान जी '

एकाध औपचारिक लाइन के बाद लिखा था -
दुनिया की आँखों में जो प्रश्न होते हैं ,क्या उत्तर दें ?इन  निर्दोष बच्चों को कैसा कुंठित जीवन मिला है  .लड़के ने  मेरी लाज रख ली .लायक निकला .
अब बेटी ब्याही जा रही है किस्मत से  घर-वर अच्छा  है पर वह सिर उठा कर जी सके ,कोई दाग उसके माथे पर न  रह जाए . शान्ति से जी सके बस, यह चाहती हूँ .मेरी तो निकल गई अब इन बच्चों को वो सब न झेलना पड़े.

 एक बार आकर शकल दिखा जाओगे तो सब को भरोसा हो जायेगा ,मैं लाख करूँगी तो भी लोगों के मनों में शंका रहेगी.तुम सामने  खड़े भी हो जाओगे तो सब विश्वास कर लेंगे .मेरी मजबूरी है, इन बच्चों के लिए ही ज़िन्दा हूँ ,..
कुछ नहीं चाहूँगी ,कुछ नहीं कहूँगी ,मेहमान बन रहना अपनी मर्जी से .बस एक विनती -उसे मत लाना यहाँ .उस अतीत को सबसे दबाए हूँ .वह मुझसे नहीं सहन होगा .तुम्हारी ये बातें किसी से कह भी नहीं सकती ,कि कहीँ तुम्हारा बेटा होने के नाते उसके आचरण पर भी लोगों को शंका रहे ... . '
आगे कुछ विशेष नहीं
नीचे केवल  'ललिता '- माँ का नाम !
माँ के लिए बहुत लगता रहा था ,अब भी लगता है.
*
वे आए थे ,विवाह से  एक दिन पहले  .

पहचान में नहीं आ रहे थे , देह घिस गई थी -एकदम हाड़-हाड़ .
रस्में शुरू हो चुकी थीं .वसु मंडप तले पटे पर बैठी थी ,  सुहागिने तेल चढ़ाने का उपक्रम कर रहीं थी . जैसे ही सुना  - 'पिता जी आए हैं ' - मामा की लाई  पचिया पहने ही उठ कर भागी .'पापा ,मेरे पापा..'..आगे गला रुँध गया , आवाज़ नहीं निकल रही आँखों से आँसू बह रहे हैं .
 आँखें धुँधला गईं पर जो नया व्यक्ति आया है उसे पहचानने की जरूरत किसे ? 

वही आया है आज  है जिसके लिए अंतर से  टेर उठती रही . जा कर लिपट गई .' आ गये पापा,
कितना तरसी हूँ  ...अब मत जाना ,पापा ..' हिलक-हिलक कर रो उठी.

'सब लोग हमें  कैसे देखते  थे ,हमारे पास कोई जवाब नहीं ..' था वह हिचकी ले-ले कर बोल रही थी, ' कितना बुरा लगता था पापा...'
'मैं भी बहुत पछताया हूँ बेटा '

ध्यान से देखते रहे  बेटी का मुख,'' अपनी माँ  की पूरी छाप ,न कोई कहता तो भी पहचान लेता. '
'माफ़ करना  बेटा , तुम सब के साथ बड़ी नाइंसाफी की .फल भुगत रहा हूँ ....' सीने से लग गई थी वसु रोए जा रही थी लगातार .
मुझसे देखा नहीं जा रहा था.मन का रोका हुआ  बाँध सबके सामने फूट न पड़े !
आँखें छिपाता चला आया वहाँ से .

अरे ,पारमिता क्यों यहाँ खड़ी रो रही है ?हाथ में  कटोरी लिये .
आँसू पोंछती बोली,' मैं खुश हूँ ,कितना अच्छा हुआ !'
मंडप में जा कर बोली,' ये उबटन , दूल्हे का  छुआ हुआ दुल्हन के लिए . हमारे यहाँ यही  लगता है  तेल के बाद .'..
नाउन आईं थीं बुलाने,' बिटिया चलो, तेल को मुहूरत निकरो जात है..'

सब ने कहा -अब तो आ  गये हैं. इत्मीनान से मिलना बात करना .

किसी ने  देखा नहीं था, उत्सुकता  सभी को थी . 
'बिटिया का कन्यादान  करने आए हैं ,आखिर को बाप हैं !'
 बड़ी मुश्किल से समझा कर वसु को भेजा गया  ,भीगी आँखों के साथ धुली हुई मुस्कान उसके मुख पर खिल उठी थी.
*
 उन्होंने कहा था.' कैसा दिमाग फिर गया था मेरा. ..'
 नाउन आकर पंडिताइन से बोली .'.आज कबूले हैं बाबू. उन पे कौनो टोना कर दिया गया रहे ! ।"
 महरी कैसे चुप रहतीं  ,'अइस  चूस लेती हैं ,ई कहो बचि गए .आय गए  ..'
 सुना-सुनी में बात फैली ' बिरजू के बाबू  आय गए ,उन पर जौन टुटका भा रहे ,अब निकरिगा ... '
' तभै तो हम कहें ,इत्ती सुघर मेहरिया अउर आपुन औलाद कइसे बिसराय गए ?'

'कुछू पूछो मत अइस मंतर फुँकती हैं कि मानुस भेड़ा बन के रहि जात है .
मंतर की पता नहीं हमें तो पता है कुछ ऐसा-वैसा खबाय देती हैं और उनहिन के बस में हुई जात है मरद का और कुछू दिखाई सुनाई नाहीं देत'.
वाह ! गया सारा दोष किसी  अनजान मेहरिया पर , और वे बन गए बेचारे !
*
पिता दो हीरे जड़ी अँगूठियाँ लाये थे .माँ को देकर बोले,' एक तो इस विवाह के लिए  हमारी अँगूठी थी न ,बहुत ढीली हो गई थी.अब कौन पहनेगा !एक और तुम्हारे लिए ..." कह कर माँ का मुख देखने लगे .
'अब मैं क्या ....मुन्ना की बहू के लिए रख लेती हूँ. आकर  दे देना अपने हाथों .'
'मैं  बहुत शर्मिन्दा हूँ .'
'यहाँ आ गए यही बहुत है हमारे लिए ' माँ ने कहा था .


मंडप में रमन बाबू को देख  कर पहचान लिया उनने ,'अरे रमन ?"
 तुम ..माधो हो  .दसवीं के बाद आज देखा ..?
 पिता का नाम माधव प्रसाद है न !
दोनों गले लग गए,' कैसी शकल निकल आई है .क्या हो गया तुम्हे ?'
कहते क्या .शराब ने पी लिया था उन्हें .
अधिक खोज-बीन फिर किसी ने नहीं की ,

विवाह की कार्यवाहियों  में सब व्यस्त हो गए , रायसाब का उत्साह बढ़ गया था .
*
जयमाल संपन्न हुई  .खान-पान के साथ हँसी-ठिठोली चल रही थी
 किसी समधी ने  फर्माइश की -
' वो वाला गाना लगाओ हमारी शादीवाला '
'कौन-सा? कौन सा ?'
के बाद गाना लगा -
'समधिन तेरी घोड़ी चने के खेत में .
..चने को लग गया पाला ,समधिन को ले गया बरात का बाजेवाला '
.'फिर . काई ...  नाई ,
'अरे, ये तो बड़ा ज़ोरदार गाना है .'
'इतना पुराना गाना वाह !'
हुँह,  आज के गाने क्या बराबरी करेंगे पहले होते थे असली  गाने '
खूब मज़े लिए सब ने .
समधिन की बात आते ही ,माँ की ओर नज़रें उठ जाती थीं ,
'हाँ ,हाँ, वर के फूफा को भी दुल्हन की माँ बहुत पसंद आईं !'
पिता छिपी दृष्टि से माँ का मुख देख रहे हैं .
शुभ कामों में पहनी जानेवाली लाल पाड़ की साड़ी पहने हैं वे ,
 सफ़ेद हो आये केशों में सिन्दूर की गहरी लाल रेखा आज ही देख रहा हूँ .अब तक कभी ध्यान नहीं गया लगाती भी थीं कि नहीं ,और माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी .
 मुख जगमगा रहा है !
मैंने फ़ोटोग्राफ़र से कहा , 'माँ  की एकाध फ़ोटो अलग से भी ,और हाँ ,पापा के साथ ज़रूर ले ले.'
 मेरी माँ को आज कहीं किसी की  नज़र न लग जाय !

*
(क्रमशः)

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

भूख का तमाशा.

*
पीछे वाले  क्रीक के दोनों ओर बाजरे  जैसी कलगी वाली लंबी-लंबी घासें उग आई  हैं.फिर ऊँचे पेड़ों की पाँत, साइकिल और पैदल वालों की  लेन के बीच के ढाल को , कवर करती हुई . सड़क की सतह लेन से भी कुछ ऊँची और बीच में फिर वनस्पतियों का भराव .ऊँचे पेड़ों के साथ  रोज़मेरी और अन्य झाड़ियों की पूरी शृंखला साथ चलती है .कहीं-कहीं  काँटेदार ब्लैक-बेरीज़ भी हैं .
आगे जाकर क्रीक का प्रवाह  ताल में परिणत हो गया है.अच्छा जीवन्त  है ताल - मछलियाँ ,बगुले ,सुना है कछुए भी हैं .पर बतखें तो खूब हैं ,'क्वेक-क्वेक' करती जल में तैरती रहती हैं .अब तो लोगों ने वहाँ मछलियाँ पकड़ना भी शुरू कर दिया है.
 आसमान में  बक-पंक्ति की उड़ान जब-तब लहरा जाती  है  .ताल में भी एक टाँग पर खड़े ध्यानस्थों के  दर्शन सुलभ हैं .जल-पक्षियों की क्रेंकार से परिवेश मुखरित रहता है.पेड़ और झाड़ियाँ तो चारों ओर हैंं ही , दो ओर खुली जगह भी, जिन पर पड़े बड़े-बड़े पत्थरों पर आराम से बैठा जा सकता है.अब दो  बेंचें भी आ गई हैं  . हरे भरे पेड़ों के नीचे बैठने का अपना ही आनन्द है.पहले अक्सर से खाली रहती थीं . अब लोग आने लगे हैं ,अपने बच्चों को भी लाते हैं, जल-पक्षी दिखाने. 
 खेल-खेल में बच्चे  खाने की चीज़ें बतखों को भी डालने लगे.
जब से बच्चों ने खाने की चीज़ें डालना शुरू किया वे परच गईं,  लोगों को देखते ही  सजग हो जाती हैं  हैं , लोग भी उन्हें चुगाने का आनन्द उठाने लगे .जब बतखें  चोंचें फैला कर लपकती हैं , बच्चे उछलते हैं.
 सब ख़ुश हो कर देखते हैं वह तमाशा !
      इस साल ताल को काफ़ी सँवारा गया.जाड़े बीतते ही  चहल-पहल भी बढ़ने लगी -बच्चों के साथ बड़े भीउन्हें  खिलाने को  दाने या ब्रेड के पीसेज़ आदि लाने लगे .वे भी खूब हिल  गईँ , जल से बाहर आने लगीं .शुरू में दो-चार आईँ  ,देखा-देखी  हिम्मत बढ़ने लगी . अब तो 20-20,25-25 के झुंड निकल आते हैं .खाना डालने बाले बच्चों के हाथ से भी झपटने की कोशिश कर लेती हैं, कोई- कोई तो . जब वे ब्रेड के टुकड़े फेंकते हैं और वे फ़ुर्ती से बीच हवा में लपक लेती हैं.
पहले  बतखें मुझसे डरती थीं .पानी के समीप जाऊँ  तो एक ओर सिमट जाती थीं .
सब को देख कर मैं भी  खाने की चीज़ें लाकर डालने लगा . थोड़ा-थोड़ा फेंकता रहता ,वे पास आ जातीं उछल-उछल कर खाती रहतीं .एक क्रम-सा बन गया था.वे भी खुश ,हम भी खुश !
मौसम ने करवट ली .दिन छोटे होने लगे ,सब अपने में व्यस्त होने लगे  गए .झील पर आना कम हो गया
फिर आईँ बड़े दिन की  छुट्टियाँ .क्रिसमस की हलचल, मनोरंजन के नये विषय. सब अपने आयोजनों-प्रयोजनों में लीन हो गए .
बतखों को कौन याद रखता !
हवाओं में ठंडक घुल गई.ताल पर आने का क्रम भंग होने लगा .बतखों पर मौसम का कोई असर नहीं था,उनकी शामें अब सुनसान हो गईं. झटका लगा होगा ज़रूर .सोचती होंगी कैसे होते हैं आदमी लोग ?
 तब सब खुश हो-हो खिलाते थे ,उत्साह से बतखें दौड़ी चली आती थीं .एकदम सब बंद हो गया .पर उनकी खाने की आदतें बदल गईं .
हम लोग भी तो - पहले कैसे थे , और अब ?
 वे आशा लगाए प्रतीक्षा करती , निराश होती रहीं .
इधर कुछ दिनों से घर पर अकेला हूँ .ताल पर आना कम हो गया है.बच्चों की भी छुट्टियाँ .झील के किनारे कोई नहीं होता .कभी-कभी अकेले ऊब लगने पर वहीं  बेंच पर जा बैठता हूँ .आज फिर निकल गया .उधरवाली बेंच पर बैठ गया .सन्नाटा पड़ा था . अक्सर ही घर से नहीं आता .वैसे भी अकेला होने पर  ध्यान नहीं रहता, खाली हाथ चला आता हूँ
अब  शाम होते-होते यहाँ सन्नाटा पसर जाता है .
मुझे देख ताल में तैरती बतखों की गतिशीलता बढ़ गई .वे इधर ही तैरती आ रही हैं .किनारे तक आकर ठहर गईँ हैं.
इसी ओर देख रही हैं ,मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं .
एकाध  झिझकती सी मेरी ओर आने लगी .मैं चुप  देखता रहा .
 वे  इस ओर सूखे में आ गईँ. मेरी ओर ताके जा रहीं  ,वे आशा लगाए हैं कुछ मिलेगा.पर मेरे हाथ खाली हैं.
'क्वेक-क्वेक' की आवाज़ें उठ रही हैं . वे खाना माँग रही हैं .
'लाओ ,लाओ खाना .हम भूखे हैं...' ,उनकी शिकायतें जारी हैं.
उन्हें  खाना चाहिये पेट भरने को !
लगा जैसे कह रही हों-और कुछ नहीं चाहिये हमें, न कपड़े न घर ,न कोई साज सामान ,सिर्फ़ खाना!..
सारा समेट लिया तुमने हमारी भूख का तमाशा बनाए हो -कैसी मन मानी !'
एकाध बेंच के पास तक चली आई  .छोटीवाली बढ़ कर मेरे पांवों तक आ गई .जैसे कह रही हो  ,'खाना लाओ, लाओ' .
लगातार मेरी ओर देख रही है.
पीछे-पीछे  दूसरी आ कर खड़ी हो गई .अरे, एक और, फिर और. उधर से वे सब इधर चली आ रही हैं-  पूरा झुंड का झुंड.
उन्हें खाना चाहिये -वे इकट्ठी हो गई हैं .
'क्वेक-क्वेक,  क्रें-क्रें, ' के स्वरों में  तीखापन आता जा रहा है  ,जैसे क्रोध से भरती जा रही हों .
 मैं चुपचाप बैठा हूँ . कुछ नहीं लाया हूँ उनके लिए .एक  बढ़ती हुई मेरे पाँव तक चली आई .दूसरी उसके पीछे है .पास में  दो-तीन और शिकायत भरी निगाहों से देखे जा रही है .
मैंने,' हुश-हुश ' कर भगाना चाहा .वह थोड़ा हटी पर वहीं डटी रही .पीछेवाली के बराबर में खड़ी है वह .
वह निराश हो गई , हटने के बजाय और पास आ गई .
उसने गर्दन बढ़ा कर मेरे पाँव पर चोंच मारी ,मैंने पाँव पीछे खींच लिया .
 बड़ी तीखी है चोंच !
 वह फिर  आगे बढ़ आई . मैं चुप , न पुचकार न सत्कार! दुत्कार रहा हूँ बार-बार हाथ हिला कर धमका रहा हूँ!
उस पर असर नहीं पड़ा,बढ़ कर फिर चोंच मारने लगी . तभी  एक और  बढ़ आई ,वह भी  प्रहार करने लगी .फिर तो दो-तीन और ,तीन- चार और!
वे सब चोंचें उठाये मारने को तैयार. एकाध झपट रही है - हुश्-हुश् करते हाथ की ओर.
कुछ उड़-उड़ कर बेंच के हत्थे पर आ बैठीं .हाथ पर ,गले पर जहाँ जगह मिलेी चोंचों  से वार कर रही हैंं
एकदम घबराया हुआ मैं खड़ा हो गया. दोनों हाथ पूरे ज़ोर से चलाने लगा  .
वे पहुँच भर प्रहार करती रहीं -जैसे कह रही हों ,'धोखेबाज़ !'
हाथ लहू-लुहान हो रहे हैं, गर्दन पर भी चोंच के वार .
दहशत से भर मैं उठ कर भागा.पीछे लग गईं वे.पगडंडी से सड़क की ओर अंधाधुंध दौड़ा  .
उस दिन किस तरह निकल पाया  मैं ही जानता हूँ.
एक बार पलट कर देखा था - 
लगा जैसे दिशा में  आग लगी हो.साँझ के बादलों का  नारंगी रंग गहरा सिंदूरी और जलता लाल  हो उठा था,और ताल के  पानी में वही छायायें , बतखों के फड़फड़ाते आकार जिनसे उठती तीखी कंठ-ध्वनियाँ !
फिर सारे रास्ते उधर सिर घुमा कर उधर नहीं देखा.

आपको असंभव लग रहा है यह सब ?

*

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

कथांश - 21 .

*
 मेहमान को बोर नहीं होने दिया था विनय ने .  मेहमान ही तो था मैं वहाँ ,घूम कर लौटने का बाद  देर रात तक बातें चलती रहीं.
वे ही सूचनाएँ देते रहे -तनय अपने ताऊ जी के यहाँ है,शुरू से लगाव रहा है उनसे .जुटा है कुछ न कुछ करके ही दम लेगा .स्कूल कॉलेज में पढ़ाना उसके बस का नहीं ,कई जगह हाथ-पैर मार रहा है .
फिर पूछा था, ' बंधु-बांधवों में एक आप ही का नाम लेती हैं वह, तो ..शादी में नहीं आए आप ?
'उन्ही दिनों मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई थी .फिर मैंने ये भी सोचा ,मैं कोई सगा या रिश्तेदारों में तो हूँ नहीं.इस मौके पर बहुत से अपने भाई-बंधु, आएँगे उनमें हमारी पैठ कहाँ  ..?'
'ये तो है .हमें भी लगता है रिश्तेदारों के घेरों से अपना अलग अच्छे ! लगता है जैसे इनमें हम फ़ालतू फँस गए हों. बेकार में  उनकी निगाहें क्यों झेलो. ...पर हाँ  असली ज़रूरत पर आप ही खड़े रहे.'
'असली ज़रूरत ?'
  'कॉलेज के छोकरों  से उसकी ढाल बने चोटें खाते रहे रहे ,और हमारे सुपुर्द कर दिया.ये एहसान कैसे भूल सकते हैं हम !'
'अरे  ,कॉलेज में तो ये सब चलता है .'
'बता रही थी आपके कारण लोगों की ऐसी-वैसी  हिम्मत नहीं पड़ती थी ,जानते थे ब्रजेश से पंगा लेना महँगा पड़ेगा.'
पारमिता ने विनय को बता रखा था कि विषम स्थितियों में उसे मैं ने  ही साधा .अकेली थी ,किसी से बोलती -चालती नहीं तो लड़कों को लगता अपने आप को जाने क्या समझती है ,घमंडी कहीं की  - इसे सबक़ सिखाना चाहिये .
  'उस समय स्थिति को आपने सँभाला नहीं तो पता नहीं क्या होता !'
मैं क्या कहता ,चुप रहा .
विनय कहे जा रहा था ,'  हमें सब मालूम है ,एक बार तो   चार-चार  से अकेले निपटे थे .वो सबक सिखाने पर तुले थे .झगड़े में उन्हें तो समझा  दिया पर ख़ुद ने  मार खाई .किसी को क्या ,मीता तक को बताया नहीं ,वो तो इसकी सहेली वाणी से पता लगा उसे ,तब तुम्हें देखने गई थी .'
'जिसे जानता हूँ उस लड़की के लिए मेरा  फ़र्ज़ बनता है .कोई दूसरी होती तो भी कोशिश भर बचाता .'
'फिर भी तुमने अपना हक़ नहीं जमाया सुरक्षित मुझे सौंप दिया.कौन कर  पाता है ऐसा !'
'रिश्तेदारी जुड़ गई थी , इनकी बुआ जी ने माँ को बहिन मान लिया था '
'असली रिश्ता तो वही जो ज़रूरत पर काम आए. सच्ची ब्रजेश ', फिर अटक गया विनय , 'नाम ले सकता हूँ न तुम्हारा ,मेरी पत्नी के बंधु ,मेरे दोस्त ही तो ..'
'नहीं ,नहीं ,विनय बाबू मैंने ऐसा कोई बड़ा काम नहीं किया.मैं इस योग्य था भी नहीं .'
'यह मत कहिये .कहीं कोई कमी नहीं .कैरियर की भी इतनी अच्छी शुरुआत !मीता तो करती ही है मैं भी आपका बहुत सम्मान करता हूँ . यहाँ तो तन्नू -कह देता है हमें नहीं बनना टीचर- फटीचर .'
'आप मेरी बांधवी के पति हैं मेरे माननीय.हमारी तो नौकरी है ,ज्ञान की  यह प्यास कहाँ !'
'अरे ,छोड़ो यार हम दोनों दोस्त हुए आज से -लाओ हाथ मिलाओ !' 

'जो आपसे पढ़ ले सच में बन जायेगा विनय बाबू ,उल्लू बनाने की टालू विद्या आपके बस की नहीं .सच में विद्यानुरागी हैं आप !'
तभी पारमिता आ गई ,'ये कैसा हथलेवा हो रहा है ,भई?'
'तुम्हारा साथ और इनका हाथ दोनों मेरे, '
मुझे हँसी आ गई .

' हाँ,हाँ, क्यों नहीं ?'
'माँ ने तो कभी अलग समझा नहीं.' 
'उन्हें इनका  बड़ा सहारा था .'
'उन्हें अपनी माँ कहती हैं ये,.और था ही कौन इन का.... '
'सच में ..'
 *
खाना खा कर बराम्दे के वाशबेसिन पर हाथ धो रहा था कान में उन लोगों की आवाजें आ रहीं थीं-
विनय के शब्द ,' झोंका हवा का, पानी का रेला.मेले में रह जाए जो अकेला. इसे छुट्टा मत छोड़ना  अकेला रहा तो बिखरता चला जाएगा.हिल्ले से लगा दो इसे भी.'
'इसे भी से क्या मतलब ?'
'जैसे मुझे लगाया है .'
तुम्हें हिल्ले से लगाया मैंने !ये क्यों नहीं कहते कि मुझे रेस्ट्रिक्ट कर दिया तुमने ?'
'अरे, रस्सी को तो बँधना ही पड़ता है .'
'अपनी ऊलजलूल फ़िलासफ़ी अपने पास रखो .'
'देखो .और तो  कोई है नहीं एक तुम्हीं उसकी बाँधवी हो ,भला-सा लड़का है सो चेता रहा हूँ ..'
'तुम्हीं समझाओ न !मेरी माँ जैसी थीं वे .उनके दुख में मैं भी, इन्वाल्व हो जाती हूँ .फिर कुछ कहते नहीं बनता .'
' प्रेक्टिकल बनाने की कोशिश करता हूँ मैं तो  ..पर खूंटे वाली रस्सी गले पड़ेगी नही तो  सिर उठाए जहाँ-तहाँ भागता फिरेगा .'
बड़े पते की बातें करते हो तुम तो ..काफ़ी तेज़ आदमी हो.'
'दिमाग से काम लेता हूँ न ..'
आते-आते तारतम्य में मैंने अपनी ठोंक दी ,'ये दिमाग की बात कहाँ से आ गई .'
'इन्हें समझा रहा हूँ ,ये दुनिया को अपनी ही तरह देखती हैं .'


सब कुछ बड़ी आसानी से चल रहा था लेकिन उसी रात को एक गड़बड़ हो गई -
भोजन और गप्पबाज़ी से छुट्टी पा कर अपने कमरे में आया .सोने के पहले  ब्रश करने चला गया था .वहाँ से बाहर सड़क दिखाई देती है. जाने क्या सोचता खड़ा रह गया वहाँ  .कमरे में जा रहा था,बत्ती नहीं जलाई -कमरों की रोशनी की उजास, बरामदा पार करने को काफ़ी लगी.कुछ कदम चला था कि  अचानक दिख गया -मीता की गोद में सिर रखे विनय लेटा-लेटा कुछ कह रहा था, वह उसकी ओर देख कर हँस रही थी .
उनके शयन कक्ष की

 खिड़की के आधे हिस्से में  पर्दा लगा है .नीचे का स्प्रिंग बीच से कुछ ऊपर खिंच गया था, नीचे से गैप बनाता हुआ . अनायास दृष्टि उधर चली गई  मुझे नहीं पता था उन लोगों का शयन कक्ष है ये .नाइट गाउन पहने  वह .गोद में लेटा उसका चेहरा देखता विनय कुछ कहता जा रहा है .वह हँस रही है उसका टेढ़ावाला दाँत रोशनी में चमक गया .
 मैं स्तब्ध - सा ,आँखें फाड़े वहीं के वहीं खड़ा रह गया !फिर सँभला और  आँखें फेर कर तुरंत आगे चल दिया 
 अपने आप पर शर्मिन्दा हो उठा .जितना हटाता हूँ उतना ही ध्यान आता है .उफ़् नहीं सोचूंगा..बिलकुल नहीं . कौन सी गलत बात  ? वह उसकी पत्नी है . मुझे नहीं सोचना चाहिये .
 नहीं, मैंने कभी नहीं चाहा था .उनके शयन-कक्ष में झाँकना, मुझे अनुमान भी नहीं था .अब इधर बिलकुल  नहीं आऊँगा .
नहीं मुझे बुरा नहीं लगा .क्यों लगेगा? 

एकदम अजीब सा लगा- ऐसे- कभी देखा नहीं था न . नाइट गाउन पहने और वह  ...जाने दो ...मुझे क्या करना .... नहीं ,नहीं,मुझे नहीं सोचना चाहिये .
पर कहीं कोई देख लेता तो ... ?
हे भगवान् , ये क्या हो गया !

*
(क्रमशः)

सोमवार, 22 सितंबर 2014

कथांश - 20 .

 ' एक क्षण का भी स्वतंत्र अस्तित्व  होता है ,आज समझ पाया हूँ उसका  महत्व, उसकी सार्थकता . कुछ बीते हुए पलों की तृप्ति मन को छाँह दे गयी है .शब्दों में अपार शक्ति है , देख  लिया मैंने .कुछ शब्द मनःतपन पर शीतल प्रलेप धर गए , अंतर की उद्विग्नता कुछ  शान्त हुई , अंतर्विषाद विश्राम पा गया. आता-जाता रहेगा जानता हूँ पर वह उतना दारुण  नहीं.
लेकिन अपने को बहुत अकेला अनुभव करने लगा हूँ !
मन की बातें कहना चाहता हूँ . काग़ज़ों से ही सही . तभी लिखने बैठा हूँ   , लेखनी हाथ  आई तो अनायास लिख गया  - पारमिता.
मन में झाँका .कुछ उमड़ रहा है जिसे व्यक्त करना  है .अपनी ही   असलियत पहचानने को लिख रहा हूँ , अपने ही लिए . तुम्हें भेजूँगा नहीं  किसी का नाम ऊपर होने से लिखा हुआ चिट्ठी नहीं बन  जाता .मेरा अपने निज से वार्तालाप है यह ,तुम जाने कहाँ से बीच में आ जाती हो.
 यों चाहता भी हूँ  किसी रूप में तुम्हारा मन मेरा आभास  पा ले .विचार और इच्छाएँ सूक्ष्म होती हैं जैसे हवा ,यहाँ से वहाँ पहुँचते बाधा नहीं  उन्हें . कैसे भी ,किसी रूप में भास  जाएँगी तुम्हें.लिख रहा हूँ इसीलिए ,मेरे मन में जो है उससे अविदित नहीं रहोगी तुम.
यों इतना भी गांधी जी नहीं कि अपनी हर कमी उघाड़ता चलूँ .जानता हूँ डीसेंसी भी कोई चीज़ है !अपनी सारी  कमज़ोरियाँ  तुम्हें कैसे बता सकता हूँ ? अंततः पुरुष हूँ ,तुमसे जब मिलूँ सिर उठा कर ,थोड़ा बड़प्पन बना  रहे मेरा !
ये कुछ पन्ने ,जो केवल मेरे हैं - अपने से अपनी बात !
तुम्हें समझता हूँ, उतरा चेहरा याद कर मन  कसकता है .कमी मुझमें रही -पर जैसा  हूँ ,विवश हूँ  .तुम्हारे साथ वही बना रहूँ , अंत तक उसी रूप में - स्वाभाविक सहज!
जानता हूँ, कभी-कभी तुम मन ही मन  मेरे ऊपर हँसी हो .सामने -सामने नहीं ,कभी नहीं .मेरी कमज़ोरियाँ जानती हो तुम . उद्घाटित नहीं करती  दबा  जाती हो, यह  सोच कर कि मुझे कैसा  लगेगा.

औरों का सोचती हो तुम .मुझसे अपना सोचे बिना नहीं रहा जाता .ओ,पारमिता ....'
डोर-बेल बजी , बाहर कोई है - कलम रख दी मैंने .

माँ की चिट्ठी आई है -  साधारण कुशल के बाद लिखा है - 
रमन बाबू के साथ विनय के  माता-पिता  हमारे घर आए थे ,वो सब यहाँ आने पर बताऊँगी . बाकी हाल लिखने के बाद अंत में जोड़ा था.'तुम्हें पता है मुन्ना ,पिछले दिनों एक बार मीता ने मुझसे कहा था -'वसु की चिन्ता न करना माँ ,मेरी बहिन है .मैं देखूँगी उसके लिए . पूरा कर दिया उसने अपना कहा. मैं तो उसकी  ऋणी हो गई,  कैसे चुकाऊंगी ?'
कुछ समझ में नहीं आया .दोनो बातों में क्या ताल-मेल ?
अब जाने पर ही पता लगेगा.
*
बड़ी  रुचिपूर्वक माँ ने वर्णन किया था .
बहुत दिनों बाद ,उस दिन सुबह वसु गाने की प्रेक्टिस करने बैठी थी.
उसकी आदत है ,कमरे  के दरवाज़े उड़का लेती है और फिर चारों ओर का भान नहीं रहता उसे .
 सुर निकाल कर गाने में लीन हो गई थी -
'प्रभू जी मेरे औगुन चित न धरो.'
बाहर की कुंड़ी खटकती रही ,उसे कहाँ सुनाई दे !
माँ ने पहले एकाध  बार टाला, शायद उठ जाये .फिर हार कर गईँ खोलने .देख कर तो एकदम चौंक गईँ ,न कोई  सूचना न ख़बर और रमन बाबू अपने समधी-समधिन सहित हाज़िर !
 'अरे, आइये,आइये '

अंदर आते-आते संगीत के स्वर कानों में पड़े -
' सम- दरसी है नाम तिहारो  ,चाहो तो पार करो ..'
कैसा गहरा भाव ,कैसा  स्वर -अंतर की गहराइयों तक  उतरा  जा रहा हो जैसे !  चारों जन एकदम चुप .
रमन बाबू  ही बोले ,'बिटिया गा रही है .'
'बड़ी बुरी आदत है .ऐसी डूब  जाती है गाने में कि दीन-दुनिया का होश नहीं रहता. अब देखिये न, मैं रसोई में थी ,सोच रही थी अब उठेगी अब उठेगी ,खोल देगी.पर कहाँ सुनाई दे उन्हें .आपको इत्ती देर खड़ा रहना पड़ा .'
'ये तो सरस्वती का वरदान है उसे .'
पत्नी बोलीं ,'कितना मधुर और गहरे उतरने वाला संगीत !'
'आज कल सिनेमा के गानों से कहाँ छुट्टी मिलती है लड़कियों को ,और यह ऐसा  पावन संगीत - मन प्रसन्न हो गया  !'
उन लोगों को बैठा  कर वे उधर गईं, उसे चेताने .
पर उसे  देख कर चुप न रह सकीं , 'उफ़फोह ,ये लड़की ..! कहाँ का पुराना घिसा सलवार-सूट चढ़ाये बैठी है, क्या कहेगा कोई ... ?'
 साथ-साथ चली आई समधिन -पीछे खड़ी थीं.
बोलीं  ,'कोई दिखावा नहीं उसमें ,ऊपरी बनावट से क्या होता ?वह सहज-सरल अपने आप में पूरी !'
माँ क्या कहतीं ,चुप हो गईँ . 
वसु ,सकपका कर खड़ी हो गई ,'आंटी जी ,नमस्ते ! अरे,मैंने देखा  नहीं ..'.'
''कोई बात नहीं , परेशान मत हो .अपना टाइम लो सुविधा से आना .'
अपनी वेष-भूषा पर कांशस हो गई थी वह,चुन्नी समेटती दूसरे कमरे में चली गई.

उधर से  राय साब की पुकार आई -

'जिज्जी, ख़ातिरदारी बाद में कर लेना.अभी ज़रा हमारे पास बैठ लीजिये .'
फिर बोले ,'  ये रमन बाबू और भाभीजी आपसे कुछ कहना चाहते हैं.'
'ऐसा क्या है, आज्ञा दीजिए समधी जी .'
'समधिन कहें या जिज्जी ?'
फिर बोले ,'क्या फ़र्क पड़ता है,मन में सम्मान भाव होना चाहिये .'
'बैठिए न आप .ये बताइये हमलोग आपको कैसे लगे ?'
'ये भी कोई पूछने की बात है समधी जी ?ऐसा घर-वर तो बड़े भाग से मिलता है , .'
'आपसे एक प्रार्थना है ,'उन्होंने अपनी पत्नी को इशारा किया और
पीछे की एक कुर्सी आगे खींच दी ,आगे  आ बैठी समधिन कह रही थीं,
' ...मैंने एक बार बहू से पूछा  ,'ये सब बातें कहाँ से सीखीं ,तुम्हारे तो माँ नहीं थीं? पता है उसने क्या कहा -
उसके शब्द थे जन्मदात्री माँ नहीं थीं ,पर एक माँ मुझे मिली थीं, जिनका प्यार और सँवार पाई .उनसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला.'

फिर उन्होंने जोड़ा ,'आपने ख़ूब सँभाल लिया ,माँ की कमी नहीं रहने दी.'
'मुझे शुरू से ही वह अपनी लगी '
'सच है, अपना समझे बिना कोई इतना नहीं कर सकता .'
रमन बाबू बोले,'अपनी बात कहो न !'
'...समधिन हों ,तो भी मेरी जीजी ही हैं आप ,वैसे दोनों ही रिश्ते अच्छे हैं... '

'जो आपको भाए .मैं सब में खुश .'
'विनय तो आपका हो गया .हमारे छोटे बेटे तनय को आपने देखा है?'
हाँ ,खूब ! हमारे घर भी आए थे तनय बाबू पिछली बार . लग ही नहीं रहा था कहीं बाहर के हैं ,मुन्ना से तो उनकी खूब जम गई थी ..'
'उसके लिए भी ऐसी ही लड़की चाहिये .' रमन बाबू बोल रहे थे.
'अरे , लड़कियों  की आपको क्या कमी ?इशारा मिले ,दौड़ के आयेंगे लोग ,ऐसे संबंध के लिए .'
'तो फिर आप ही अपनी छोटी बिटिया को उसके लिए ..'
माँ आँखें फाड़ कर देखती रह गईँ !

'आपकी बिटिया को कब से अपनी बेटी मान रहा हूँ . अब आज्ञा दें तो  अपने घर बाकायदा बिदा करा के ले जाऊँ  !...तनय है न हमारा ?'
माँ बिलकुल अवाक् -सच है या सपना ?
'क्या हुआ जिज्जी ?'
'ऐसा सौभाग्य हमारा !अरे ,तर गये  हम तो ..पर आपने तनय बाबू से पूछा ?"
'उसी की इच्छा से आगे बढ़े हैं.'
पता लगा, खूब पटती है  देवर-भाभी में . वहाँ पहले ही सलाह हो गई है .यहाँ तो अब आये हैं .'

सब बता कर माँ ने कहा था  'मीता का यह ऋण कैसे उतार पाऊंगी ?
'कोई ऋण-विण नहीं ,' मैंने तुरंत कहा ,'कॉलेज में चार साल उसकी निगरानी की है .कैसे-कैसे बचाया है सब जानती है वह .'
दाहिना हाथ अनायास बाएं कंधे पर चला गया ,अभी तक कभी-कभी टीसने लगता है.

*
बाद में मैंने पूछा था ,'वसु को भी मंज़ूर है ?'
''अरे, उसे काहे नहीं होगा? भरा घर ,इतना अच्छा लड़का ..'
फिर भी एक बार पूछ तो लो .'
ये माँ के बस का नहीं ,जानता था. मैंने ही बात शुरू की
' तेरी दीदी ठीक हैं वहाँ ?
'हाँ भइया ,उनने पॉली टेक्नीक में एप्लाई भी कर दिया है .'
'अच्छा!'
'हाँ ,बाबूजी ,माँ ,मतलब उनके बाबूजी- माँ,सास-ससुर तैयार हैं. वे चाहें सर्विस करें चाहें  कुछ और ... .वे लोग बहुत अच्छे हैं .'

'और सब लोग तो ठीक हैं. ये तनय ज़रा गड़बड़ है उनके घर में '
वह चौंकी ,'क्या ?'
'बड़ा झगड़ू लगता है .'.
वह कुछ बोली नहीं .
'उसका उजड्डपन मुझे पसंद नहीं ..'
' वैसे तो नहीं होगा . शादी-ब्याह में लोग हो जाते हैं..' .
'उससे तो तेरी  नहीं पट सकती , तू बता- मना कर दूँ ?'
खिसिया कर बोली ,'मुझे नहीं पता !'
'कितना लड़ा था तुझसे शादी में .नहीं,नहीं उसे तो दूर से नमस्ते  ..'
' ये सब मुझ से क्यों कह रहे हो ?माँ देखो ... ..'
'क्यों परेशान कर रहा है उसे ?
'.तो तू ने 'हाँ' कर दी  उसके लिए ?'
'मैंने कुछ नहीं कहा.. .'
मन ही मन हँसी आ रही है पर जानबूझ कर छेड़े जा रहा हूँ .
'तो ठीक  ,वह नहीं  कोई और ढूँढ़ूगा ..'
'मुझे नहीं करनी किसी से '
'तनय से भी नहीं न ?'
'मैं नहीं जानती .माँ , देखो न फ़ालतू में .'
वे भी हँस रहीं थीं .
'अरे, क्यों उसके पीछे पड़ा है  ?'
 बाद में  माँ को आश्वस्त किया था मैंने ,'बहन की शादी ठाठ से करूँगा .
कोई ये न कहे कि ...' पर आगे  नहीं बोल पाया.
माँ  समझ गईँ थीं .
हम दोनों चुप हो गए थे फिर .
*
वसु चली जाएगी ,माँ का उनका मन  कच्चा हो रहा है .क्या लग रहा है समझ रहा हूँ एक वही तो थी मैं चला जाता हूँ ,वे बिलकुल अकेली .उस दिन कहने लगीं,'औऱ मैं हमेशा क्या-क्या सोचती कर घबराती रही. जहाँ कोई मुश्किल आई ,अपने आप उसका हल निकलता रहा वह हमारे लिए हमेशा भाग्यशाली रही  मैं उलटा उसी पर खीजती थी. मैने कभी उसकी कदर नहीं की. रहा   .हुई थी तो मेरी नौकरी लग गई .

उनकी आँखों मे आँसू छलक आये
और मैं हमेशा डाँटती -टोकती रही ,कभी सुख नहीं दे सकी अपनी बेटी को .
माँ ,तुमने हमेशा ठीक किया .मैं तो खुश रही हमेशा .पर अब तो तुम बच्ची बनी जा रही हो .लगता है तुम्हारा ध्यान रखना पड़ेगा .'
'तू तो हमेशा से ही ,सहती आई है ,पछतावा तो मुझे रहेगा .'
'पछतावा क्यों रहे,'मैं एकदम बोला ,'ऐसा करो अभी शादी की तारीख आगे बढ़वा देना.पहले उसकी कदर कर अपना मन भर लो  ब्याह तो फिर भी हो जायेगा..' 

 कई बार ऐसी बातें सुन कर  कुछ खीझ-सा गया था .बहुत ज़रूरी था उनका ध्यान हटाना  नहीं तो वे यही सोच-सोच कर दुखी होती रहेंगी.
'आगे कभी टालने की बात मत करना,मुन्ना शुभ- शुभ बोल बेटा .अडंगे की बात भी नहीं करते !'

माँ बहुत प्रसन्न थीं ,संतुष्ट कहूँ तो ग़लत नहीं होगा . बहुत बड़ी चिन्ता दूर हुई थी उनकी और हाँ ,मेरी भी . 
माँ  ने कहा था ,' बहिन का संबंध तय हो रहा है. पहल उनकी ओर से हुई है , तुम्हें उनके घर हो आना चाहिये .दीवाली आ रही है ,अच्छा मौका है .मिठाई ले कर चले जाओ .'
'ठीक है एक दिन को चला जाऊँगा .'
गया था उनके घर . उसके सास-ससुर के पाँव छुये थे ,बाबू जी कहा था उन्हें .
विनय से गपशप होती रही थी -पर अनचाहे ही एक गड़बड़ हो गई . कह  नहीं सकता किसी से -  मन बड़ा अव्यवस्थित हो रहा है .
*
(क्रमशः)

बुधवार, 10 सितंबर 2014

कथांश - 18. & 19.

18.
विवाह जैसे पारिवारिक समारोहों में सम्मिलित होने का अवसर ,वसु को पहली बार मिल रहा था.आगत संबंधियों की समवयस्का लड़कियों में घुलने -मिलने का रोमांच उसके लिए सुखद अनुभव था . 
आगत जनों में सहज उत्सुकता थी  -इनसे हमारी  क्या रिश्तेदारी है ?
राय साब ने स्पष्ट कर दिया , 'मेरी बड़ी बहिन हैं. दीदी के साथ में , और बाद में  तो पूरा ,सब इन्हीं ने सँभाला है .'
उनके घर की महिलाओं  के बीच और बरात के समय भी  ,माँ ने वसु को पूरी निगरानी में रखा.

उसे आँखों तले रखने की कोशिश करती थीं .उन्हें लगता था  महिलाओं में कोई  उससे फ़ालतू बातें न पूछने लगे -बाप के बिना बेटी कितनी निरीह हो जाती है माँ जानतीं थीं .
पिता के आकाश और प्रकाश तले  बेटी सहजमना विकसती है , उसकी छाया में निश्चिन्त साँस लेती है .
वसु को वह सुरक्षा कहाँ मिली ,कहीं एक कसक रही होगी उसके मन में!
मुझे याद है एक बार अकेले में , कुछ झिझकते हुए उसने  मुझसे  कहा था ,' मैंने पिता जी के कभी नहीं देखा .भइया ,एक बार उनसे मिलना चाहती हूँ .'
'कोशिश करूँगा...' मैंने कहा था .क्या पता कभी हो भी पायेगा या नहीं!
*
'कितना सुन्दर गाती है आपकी बेटी, ' एक रिश्तेदार महिला ने माँ से कहा था,' रतजगे में इसे यहीं रहने दीजिये न .'
वसु ने बड़ी आशा से उनकी ओर देखा था माँ  अनदेखा कर गईँ .
'बारह बजे तक तो मैं ही रहूँगी .फिर  एकाध घंटा ही तो और होगा ... इसके बिना वहाँ का  काम नहीं चलता . सारा घर फैला पड़ा है. कामवाली आएगी   ,नहाते-धोते  उसकी भी  चौकसी ज़रूरी ..'

मीता ने साध लिया, अपनी चाची से कहा,'कामवाली पर तो कड़ी नज़र रखनी होती है..पर हाँ अभी पांच-सात मिनट और रुक जाइए . वसु ,मेंहदी लगा ले... . '

हमारे घर जब वह तनय को और मुझे नाश्ता देने आई तो वह बोला था, 'बोला ,'आप ने गाने में हरा दिया हमें .बहुत अच्छी आवाज़ है .एक गाना रिकार्ड करलूँ आपका?'

वह बोली,'मेरा गला खराब है .'

'मुझे तो बिलकुल ठीक लग रहा है.'

'बोलना और गाना क्या एक ही बात है ?'

वह चुप हो गया .चलते समय फिर बोला था,

'अरे वसु जी ,आपको भाभी ने बुलाया है '.

बड़ी बेरुखी  से वसु बोली ,'अच्छा  ?"

मैने ताज्जुब से देखा ये ऐसे क्यों बोल रही है .

बाद में पता चला जूते-चुराई में इन लोगों की खूब लड़ाई हुई है.

कल रात कह भी रही थी,'ये लोग बरात में क्या आए आए अपने को लाट साब  समझने लगे ..'
अपने साथियों के साथ तनय इधर की लड़कियों को ,खूब हँस-हँस कर चिढ़ाता -खिजाता रहा था.

घर वालों ने अपनी लड़कियों को ही हिदायतें दीं उन लड़कों से कुछ नहीं कहा ,इसलिए और  खिन्न थी वह.

ऊँह, शादी-ब्याह में तो ये सब चलता ही है .
*
19.
शादी की तारीख रमन बाबू ने बड़ी सोच कर रखी थी .
 बीच में पड़नेवाली दुर्गापूजा की छुट्टियों का पूरा फ़ायदा विनय को मिला .कॉलेज बंद रहता है उन दिनों  .
मैं बड़ी उलझन में पड़ा  था उन दिनों .शादी के दिन वहाँ रहना नहीं चाहता.भेंट देने का सामान भी खरीदना था .,सोच लिया था, यहीं से  ले कर जाऊँगा .
पूजा की छुट्टियों के पहले वेतन मिलना था - मेरी पहली आय !
समय पर पहुँचाना भी जरूरी - माँ को सामान न मिला तो क्या भेंट देंगी उसे?
महिलाओं के लिए खरीदारी कभी की नहीं ,करना तो दूर साथ में गया भी नहीं था - वह भी जेवर और साड़ी की .दूकानदार  बडे ताड़ू होते हैं . अकेला पा कहीं उल्लू न बना दे .
कुछ  ट्रेनियों से अच्छी पहचान हो गई थी ,उन्हीं में एक शेखर ,जिसके ससुराली संबंधी   नगर में थे ,से बात कर ली .
'काहे ,चिन्ता करते हो .मेरी साली आखिर किस दिन के लिए है ,साथ ले लेंगे.'
उसने बताया हमारी शादी की तो सारी  तो सारी ज्वेलरी यहीं की रही. इस दुकान के पुराने गाहक हैं ये लोग .'
इधर बीच में रविवार था, बीच में एक छुट्टी लेकर मुझे  तीन दिन मिल रहे थे ,वेतन हाथ में आ गया था.
 भेंट खरीद कर   पहुँचानी भी थी  .
 उन लोगों के साथ  खरीदारी कर लाया. 
'पैसों की चिन्ता मत करो बाद में आ जायेंगे' - दुकानदार ने कह दिया था  .
माँ को पहले  लिख चुका था .
पहुँचना ज़रूरी था.साड़ी और चेन के बिना माँ क्या करतीं ?

शाम को पहुँचा .मेरे लिए खाना बना रखा  था.वसु घर आ गई थी ,माँ आनेवाली थीं .रात ही फेरे पड़ जायेंगे .बस ,फिर बिदा की तैयारी तैयारी .
कुछ करने को नहीं मुझे . ट्रेन के सफ़र के बाद नहाने चल दिया .
निकला तो माँ आ गईं थीं .
अटैची से निकाल कर साड़ी और चेन माँ को पकड़ा दी .
वे चेन को हाथ में लेकर वज़न का अनुमान कर रही हैं .ढाई तोले की लग रही है पेंडेन्ट भी सुन्दर  है - मोर का पंख !पर इत्ती भारी क्यों ली?'
'माँ, तुम्हारी भी कोई पोज़ीशन है. किसी से कम क्यों रहो !'
वसु साड़ी निकाल कर देखने लगी ,'अरे वाह,कित्ती सुन्दर  !'
नीले बैकग्राउंड पर रुपहले बूटे , भरा-भरा आँचल !
उसके ऊपर नील रंग खूब खिलता है.
'भइया तुम्हारी पसंद कितनी अच्छी है .'
हाथ में फैलाए  वसु अपलक देखे जा रही है .
'अच्छी लगी न तुझे ,मुझे पता था ,'
 अटैची से एक और नीली साड़ी निकाली लगभग वैसी ही बस ज़रा कम भारी - वसु के लिए भी ले ली थी.
 उसे पकड़ा दी  ,'ले वसूटी !'
दोनों हाथों से साड़ी चिपकाए मुझसे  आ लिपटी,' भैया तुम कितने अच्छे हो !'
'तू उससे गोरी है, और अच्छी लगेगी तुझ पर .'
मुख पर मंद स्मित लिये  माँ परम संतुष्ट भाव से देखती रहीं .
'कुछ अपने लिए भी लिया या सब इन्हीं लोगों पर लुटा आया ?'
'अभी पूरी ज़िन्दगी पड़ी है माँ ,हर महीने पैसा मिलेगा .'
'खूब तरक्की कर बेटा ,बस  मंदिर में प्रसाद चढ़ाना है !'
 'माँ ,मुझे एक बात लग रही है तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया ..'
'कैसी बात कर रहा है मुन्ना,' फ़ौरन टोक दिया उन्होंने .'ये सब मेरे लिए ही तो है. बस यही चाहिये मुझे ,तुम लोग खुश रहो भरे-पुरे- मेरा सबसे बड़ा सुख यही ...'
जानता हूँ अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा उन्होंने . .
'पर्स निकाल कर उनके हाथ में पकड़ा दिया था,'जित्ते चाहिये हों, मां' .
'बस एक-सौ-एक प्रसाद के ..'
निकाल लिए गिन कर और पर्स वापस कर दिया.
'किसी से कह मत देना कि मेैं घर पर हूँ  '
उपहार पैक किया वसु ने, फिर चले गए वे लोग - उसके विवाह के साक्षी बनने.
मैं घर पर हूँ अकेला -
रात ही तो निकालनी है ,बीत जायेगी यह भी  !

*
माँ ने बताया था -इनके रिवाज है पहली बिदा जनवासे में हो जाती है .वहाँ ससुर, जेठ ,ननदोई ,आदि भेटें देकर कुछ खिला -पिला कर वापस भेज देंगे. तब ससुराल के जोड़े में,जमाई को टीका कर ,उसी के साथ कल ससुराल के लिए बिदा होगी .दो प्रस्थान ,एकदम एक आँगन  से न हों, सो शादी के बाद जनवासे के लिए  पहली बिदा हमारे आँगन  से होगी .
नहा कर तौलिया डालने छत पर गया था .
इतने में नीचे से आवाज़ आई ,'माँ  दीदी आई हैं.'
साथ आई लड़कियाँ देहरी के बाहर ही रुकी रहीं. 

वह अंदर आ रही थी .
माँ कह रहीं थीं ,'अरे ,तैयार हो तुम तो ?

'बाबूजी ने कहा सगुन पूरे होना चाहियें ,कोंछा डलवा आओ! माँ, रुकना नहीं है.'
बाहर से एक लड़की बोली ,'विनय भैया ले जाने के लिए  के लिए वहाँ दरवाजे पर इंतज़ार कर रहे हैं ,भाभी जल्दी करना .'
उसने चुपचाप सुन लिया .

माँ कह रहीँ थी, 'हाँ , हाँ वो तो करना ही है .मैं लाती हूँ .'
वे  सामान लेने अंदर गईं

मैं नीचे उतरते उतरते बीच में रुक गया था .

वह उधर चली आई.

'मुझे पता था आओगे .मुझसे बड़े हो प्रणाम कर लूँ  तुम्हें.'

मैं बड़ा हूँ ? हाँ.
 उसने एक बार माँ से पूछा था,' ब्रजेश मुझसे बड़े हैं न ?'

माँ ने माना था,' हाँ ,उन पुराने चक्करों में इसका साल बेकार चला गया था .पढ़ाई में पिछड़ गया !'
वह सामने खड़ी कह रही थी,
'देखो ,तुम्हारी पहली आय में से अपना हिस्सा वसूल लिया न मैंने ?'

 ध्यान से   देखा - वही रुपहले बूटोंवाली नीली साड़ी - सिर ढके नीले पल्ले  का बॉर्डर चेहरे पर दमक रहा था ,भाल बिन्दी माँग सिन्दूर, पेंडेन्ट का मोरपंख ऊपर ही  झलमला गया - जैसे कोई अप्सरा ! 
अपलक देखता रह गया था.

मेंहँदी रचे हाथ जोड़े वह झुकी. अध-बिच ही मैंने  दोनों हाथ बढ़ा कर सिर  साध, जड़ाऊ टीके से सजा उसका भाल चूम लिया ,'जाओ पारमिता ,सुखी रहो!'

अपने को  सँभाल नहीं पा रहा था दृष्टि धुँधला गई . कहीं देख न ले , सिर घुमा कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा .
वह देहरी की ओर चली गई.
 उसे छूट थी सब के सामने खुल कर रोने की , मिल-भेंट कर कर आँसू बहाने की.

माँ सूप लिए चली आ रहीं थीं पहले ही तैयार कर रखा था.

 'अरे वसू , वो  बड़ा रूमाल ले आ ,वहीं रखा है ,इसका आँचल खराब हो जाएगा .'
वे लोग घर की देहरी के समीप खड़े हैं .इस मुँड़ेर की झिंझरी से दिखाई दे रहा है .

'बेटा ,पति के घर जा रही हो मन  में कोई पूर्वाग्रह ले कर मत जाना ,गृहस्थ-जीवन एक कसौटी है ,मुझे विश्वास है खरी उतरोगी तुम !'

'माँ ,कृतार्थ हुई! आशीष तुम्हारे अंतर्मन से निकला है. शिरोधार्य किया मैंने .'

ज़रा रुक गई थी बीच में ,गले में कुछ आ गया था शायद .फिर बोलने लगी -

'...और उनके प्रति शंका न रखना माँ ,विनय ने ख़ुद मुझसे पूछा था ,'आप के मन में कोई बाधा-संशय हो तो मुझे बता दीजिए ,मैं इस शादी से  मना कर दूँगा .आप पर कोई आँच नहीं आएगी .'

'जान कर  कर बहुत संतोष हुआ' 
उनकी आवाज़ में वही भाव झलक रहा था

भावावेश में मीता ने झुक कर उनके पाँव छू लिए.

उसे अँकवार भरते दोनों के आँसू बह रहे  थे .

रूमाल लेकर आ गई वसु.

देहरी पर खड़ा कर माँ  कोंछा डालने  बढ़ीं .सूप में चावल और चने की दाल वाली द्यूलारी,उसमें कुछ लड्डू,और दस-दस के कुछ नोट  .देहरी पर खड़ी मीता ने आँचल पसार कर ग्रहण किया.
माँ ने रूमाल  ऊपर  फैलाया दिया  . सात बार सूप से उसका आँचल भरा, मुट्ठी भर बचा लिया .
 सजल नयन हो बोलीं ,'बेटा,  ये अंजलि  में भर ले , जब चलने लगना बिना इधर घूमे ,मुँह फेरे हुए ही पीछे उछाल देना . और ये पानी -दो घूँट पीकर भरा गिलास वहीं रख देना - मायके में तेरा अन्न-जल बना रहेगा .... फिर आना बेटा !'

रोती हुई वसु को खींच कर पारमिता ने अपने से लगा लिया .नीचे वे तीनों रो रहीं थीं

'दीदी को ले जा बेटा ., वहाँ सब इन्तज़ार कर रहे होंगे .कह देना मैं अभी आ रही हूँ ..'
 पानी का गिलास वसु ने लेकर ताक पर रख दिया .पलट कर देखने की  मनाही थी वह आँसू बहाती चली गई. 
वसु साथ है .साथ की लड़कियों ने अपने बीच ले लिया. 

 माँ सूप लेकर अंदर .
मैं छत पर खड़ा ,ज़मीन पर उसके बिखेरे द्यूलारी के दाने अपलक देखे जा रहा हूँ !
(क्रमशः)
*

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

A LAST WISH .


by
Kishore Asthana
Is there more that I can want than that the flag of my country be draped on my coffin? Yes there is. Is it too much to with that the flag be a proud one, unsullied by the pettiness of the politicians and held up by even a lone statesman?
Statesman, yes, father-figure, no. We do not want father figures - or mother figures - in India. We have too many of them and all of them, perhaps the right men or women at the right time, are the wrong men for now. They stand still as the world passes them by and instead of leading it, they try to hold it back, to keep alive the illusion that they are the right men for ever.
These father & mother figures demand attention, they compel the present to keep looking at the past and they divert those who should be looking at the future and shaping it. Those who should be building for tomorrow are busy planning mausoleum and memorabilia.
We need young people of today to become leaders in their own right not shadows of old people of yesterday. We need to face the rising sun so that the learning of the past is in our being but the facts in our shadow. We need young people to think for themselves, of others. And be mature enough not to feel lost because there is no one to look up to or even because no one looks up to them. From a country of nearly a billion people, it is too much to expect one such? Six? A dozen?
But where are they? Are they waiting for the challenge, the call to arms? Do such people wait for anything? Does the world wait for them?
Unfortunately, we do have some young people posing as leaders but these young people are a mirror image of father figures. They are son figures. We do not want father figures and we do not want ‘son-figures’. Just because their father or grandfather was a leader does not mean they should be viewed in the same light. It is not logical to hire the son or grandson of doctor to cure us just because of his relationship with a doctor. The logic holds for leaders, too.
Perhaps my country has yet to produce a person of today, a person of promise who comes ahead on his own and lives up to this promise. And the time is now for we cannot wait any more. 

In the current context, we have to ask – “Is Mr. Modi such a leader?” Yes, he has come ahead on his own. Now we have to see if he lives up to his promise. If he does not do so, it would be another false dawn. However, if he does live up to his promise, India would have found the kind of leader we need.
And when I die, there is nothing more I ask than that such a person drapes me in my flag, while others rejoice that I had lived with them.
 *