मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

कनक-बिन्दु बिखरे...

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'कनक-बिन्दु दइ-चारक देखे ,सिर धरि जनक सुता सम लेखे'

आज घर में मुझे जगह-जगह कनक-बिन्दु बिखरे दिखाई दे रहे हैं..

महाअष्टमी का पर्व है - बहू ने विशेष रूप से भारतीय वेष-भूषा धारण की है . उसने लाल रंग की किरन लगी साड़ी पहनी है. बार्डर में लगी सुनहरी किरन के नन्हें कण जो घर में उसके चलते-फिरते झर गए हैं जगह-जगह दमक जाते हैं. और मेरे मन में  तुलसीदास जी की पंक्ति गूँजने लगती है 'कनक-बिन्दु दइ-चारक देखे -भऱत जी ने सीता जी के जड़ाऊ वस्त्रों से झरे ऐसे ही  सुनहरे-कण देखें होंगे जो उनका मन श्रद्धा से भऱ गया. सीताजी के वस्त्र सोने की गोटा-किनारी से मण्डित होंगे ,मेरी बहू के कपड़ों में  साधरण गोटा और किरन टँकी है .लेकिन उन्हीं से घर झिलमिला उठा है .पूजा के समय सिर ढाँकने पर किरनवाली कोर मुख के चारों ओर सुनहरा आभा-मण्डल निर्मित कर रही है.मैं अभिभूत सी देखती हूँ. फिर अपनी दृष्टि हटा लेती हूँ. पूजा देवी की हो रही है.मेरा ध्यान क्यों बँटा जा रहा है! 

मुझे लगता है तुलसीदास जी ने रत्नावली को किरन लगी साड़ी में देखा होगा -तब तो महिलाएं सिर पर पल्ला लिये रहती थीं ,सो किरन के आभामण्डल से मुख दमक रहा होगा,एक तो रत्ना पम सुन्दरी ,ऊपर से सुनहरी दमक.वैसे भी तुलसीदास जी की रत्ना के प्रति आसक्ति अकारण ही तो नहीं  थी,और  ऊपर से ऐसा अनोखा शृंगार!

मुझे विश्वास हो चला है भरत जी को भाभी की उपस्थिति का आभास होने के मूल में तुलसी की यही स्मृति रही होगी .

हाँ, तो मैं अपने घर की बात कर रही थी .किरनवाली साड़ी तो बहू ने एक ही दिन पहनी ,लेकिन वे  स्वर्ण-बिन्दु

घर में कई दिनों तक दमकते रहे थे. 


सोमवार, 12 सितंबर 2022

एक सूचना.

ब्लाग-जगत से संबद्ध सभी सुधी जनों को सूचित करना चाहती हूँ कि मेरे द्वारा लिखित उपन्यास कृष्ण-सखी,शवेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित हो कर आ गया है. पुस्तक क्रय करने के लिये संपर्क-Shwetwarna Prakashan,232,B1, Lok Nayak Puram,New Delhi -110041. Mobile:+91 8447540078 Email:shwetwarna@gmail.com पुस्तक पर आपकी प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता रहेगी. - प्रतिभा सक्सेना.

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

'हिन्दू': व्युत्पत्ति के अनुसार -

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जब हम स्कूल में  पढ़ते थे तो बताया गया था कि जिस प्रकार व्यक्ति जीवन में अपना नामकरण स्वयं नहीं करता ,उसका नाम दूसरे लोगों द्वारा उसे दे दिया जाता है उसी प्रकार यह नाम हिन्दूऔर हिन्दुस्तान हमें दूसरों के द्वारा दिया गया है .

- कि  'हिन्दु' शब्द सिन्धु का एक रूप है  -क्योंकि जो लोग उत्तर-पश्चिम से इधर आये थे  उन्हें भारत में आने के लिये  सिन्धु नदी पार करनी पड़ी . इस पार के प्रदेश को उन लोगों ने सिन्धु के नाम को आधार बना कर नाम दे दिया .लेकिन उनके उच्चारण  भिन्न प्रकार के थे  जहाँ 'स' ध्वनि 'ह' में परिणत हो जाती थी (वे सप्ताह को हप़्ता ,मास को माह उच्चरित करते थे )उन्होने 'सिन्धु' को 'हिन्दु ' कहना शुरू कर  दिया था, परिणाम स्वरूप सिन्धु  नदी के इस पार के प्रदेश को हिन्दुस्तान नाम दे दिया.

 परंतु वास्तविकता यह है कि 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग , बहुत प्राचीन काल से होता रहा है. भारत के प्राचीन ग्रंथ " वेदों " और " पुराणों " में . हिन्दू ' शब्द का उल्लेख मिलता है. 

अतः इसका संबंध प्राचीन, संस्कृत  से है, जहाँ यह कथन मिलता है -

" हीनं दुष्यति इति हिन्दूः ।” 

अर्थात : जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं ।

यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विच्छेदन करें तो पायेंगे ....

 हीन + दू = हीन भावना + से दूर

अर्थात् : जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे , मुक्त रहे , वो हिन्दू है !

"ऋग्वेद" के " बृहस्पति अग्यम् " में 'हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-

“ हिमालयं समारभ्य यावद् इन्दुसरोवरं । 

 तं देवनिर्मितं देशं 

 हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।" 

अर्थात् : हिमालय से इंदु सरोवर तक , देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं !

केवल " वेद " ही नहीं, बल्कि " शैव " ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं 

" हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ।”

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !

" पारिजातहरणम् " में 'हिन्दू' को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-

”हिनस्ति तपसा पापान्

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !

" माधव दिग्विजय  में भी 'हिन्दू' शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-

“ ओंकारमन्त्रमूलाढ्य

 पुनर्जन्म द्ढाृंय: ।

 गौभक्तो भारत:

 गरुर्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ।" 

अर्थात : वो जो " ओमकार " को ईश्वरीय धुन माने , कर्मों पर विश्वास करे , गौ-पालक रहे , तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है !

इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक " कल्पद्रुम " में भी दोहराया गया है :

" हिनस्तु दुरिताम्''

ऋग्वेद में " (8:2:41) में हिन्दू नाम के एक बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन  भी मिलता है.

निष्कर्ष  - बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहने वाले , सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू कहलाए.

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बुधवार, 3 अगस्त 2022

एक सवाल -

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क्या कैलेणडरों निमंत्रण-पत्रों और प्रयोग में आने के बाद फेंक दी जानेवाली चीज़ों पर भगवान के फ़ोटो छपवाना सही है?

ऐसी चीज़ें, जो उपयोग के बाद हमारे लिये बेकार हो जाएंँ,कूड़े में फेंक दी जाएंँ या रद्दी मे डाल दी जाएँ,और उन पर छापे गये  फ़ोटो जो कल तक दीवारों या मेज़ की शोभा बने थे किसी काम के न रहें,  बेकार  होकर  कूडे के ढेरों में,डाल दिये जाएं ,फट-फट कर चिन्दियाँ इदर-उधर बिखरती रहें पाँवों से कुचले जाते या रद्दी में बिक कर उनका मनमाना उपयोग किया जाता रहे. क्या यह उचित है या स्वीकार्य है? 

जब तक उनकी ज़रूरत रही, सँभाले रहे और फिर उसका कोई हाल हो इससे कोई मतलब नहीं - सारा सम्मान तब तक, जब तक काम निकलता  है. 

और तो और देवी ,गणेश, श्रीकृष्ण, इत्यादि देवों की स्वर्ण आकृतियाँ गढ़वा कर ,आभूषणों में जड़वा कर ,या पेंडेन्ट बना कर पहनना  उनके प्रति श्रद्धा- सम्मान व्यक्त करना है या अपनी आत्म-तुष्टि का एक साधन है?

होता यह है कि पसीने से चिपचिपातेी देह पर,पहने हुए वस्त्रों के ऊपर-नीचे हिलते-डोलते, झटके खाते, पहननेवाले की शान दिखाने के लिये, लटके रहते हैं, इसे उन रूपाकारों के प्रति,पूज्य-भाव, श्रद्धा या उनका  आदर-मान कहें या अपनी  सम्पन्नता का प्रदर्शन? 

इस प्रकार का आचरण उनका अपमान नहीं कहा जाएगा?

क्या किसी भी प्रकार से इसे उचित कहा जा सकता है? 

*

पुनश्च (दिनांक:6अगस्त,2022.)

एक बात रह गई  -

व्यक्तिगत कहें  अथवा सामाजिक विचार-हीनता (नैतिक-पतन की सीमा तक कहें तो कैसा लगेगा?) ,'ऐसे ही चलती रहे - हमें क्या फ़र्क पड़ता है' सोच कर चुप लगा जाएँ या  उचित कदम उठाना जरूरी लगता है ?

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शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

सुहाग -

'सुहाग' शब्द को लेकर ,अपनी एक मित्र के साथ  मेरी बहस  हो गई .उनका कहना था -जिसका पति जीवित हो वही सुहागिन ,और यह शब्द स्त्री के परिप्रेक्ष्य में ही प्रयुक्त किया जाता है .किसी पुरुष के साथ सुहागवान होने की न होने की समस्या नहीं होती, वह ऐसी चीज़ों से परे है .अधिक से अधिक वह विधुर  हो सकता है जो उसके लिये किसी सामाजिक वंचना का कारण नहीं वनता .लेकिन स्त्री यदि विधवा है तो सुहाग से वञ्चिता कहलाएगी.और सुहाग से वञ्चिता तो तमाम चीज़ों से वञ्चित होना उसके लिये लाज़िमी है - 

 ऐसा लगता है समाज में नारी की स्थिति के साथ  जुड़ा सुहाग शब्द अपने अर्थ  में रूढ़ होता गया .

अब  'सुहाग' एक शब्द -मात्र नहीं,  यह व्यापक अर्थ से परिपूर्ण एक व्यंजक पद है. एक सांस्कृतिक अवधारणा है जिसमें नारी के  सर्वांगसम्पूर्ण  जीवन की परिकल्र्पना -समाई है . सफल-संपन्न नारी-जीवन का बोधक है यह छोटा-सा शब्द - श्री-सुख-माधुर्य से परिपूर्ण जीवन  का सूचक

लेकिन सुहाग शब्कीद  परिभाषा कर उसे किसी सीमा में बाँधना संभव नहीं, पीढ़ियों की मान्यताओँ और आचार-व्यवहार  से पोषित धारणा  लोकमन पर गहरी पकड़ रखती है और सदियों के संस्कार संचित उऩ शब्दों की अनूभूति-प्रवणता मंद नहीं होती (फ़ालतू की बौद्धिक  कसरतों से उसमें अर्थ -अनर्थ की संभावना कर ले ,कोई तो बात दूसरी है.).इस प्रकार के 
 शब्द अनुवादित नही हो पाते , क्योंकि किसी भाषा के शब्द ,जिन  मूल्यों और मान्यताओं को वहन करते हैं वह उसकी समाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है जिसे  दूसरी भाषाएँ स्वाभाविक रूप में ग्रहण और व्यक्त नहीं कर पाती .
इस शब्द का सही अर्थ समझने के लिये एक लोक-प्रचलित पद्यमय कथन 'आरी-बारी' दृष्टव्य है,जो स्त्रियाँ अपनी व्रत-पूजाओं में अक्षत-पुष्प हाथ में ले कर श्रद्धापूर्वक कहती- सुनती हैं   सुहाग की कामना करती कन्या ,अपने भावी जीवन की परिकल्पना करती हुई देवी से कृपा-याचना करती है -
आरी-बारी -
' आरी-बारी ,सोने की दिवारी ,
तहाँ बैठी बिटिया कान-कुँवारी .
का धावै ,का मनावै ?
सप्ता धावै,सप्ता मनावै .
सप्ता धाये का फल पावै ?
पलका पूत ,सेज भतार ,
अमिया तर मइको ,महुआ तर ससुरो .
डुलियन आवैं पलकियन जायँ .
भइया सँग आवें ,सइयाँ सँग जायँ .
चटका चौरो ,माँग बिजौरो ,
गौरा ईश्वर खेलैं सार .
बहुयें-बिटियाँ माँगें सुहाग-
सात देउर दौरानी ,सात भैया भौजाई,
पाँव भर बिछिया ,माँग भर सिंदुरा ,
पलना पूत, सेज भतार ,
कजरौटा सी बिटियां सिंधौरा सी बहुरियाँ ,
फल से पूत, नरियर से दमाद.
गइयन  की राँभन,घोड़न की हिनहिन .
देहरी भरी पनहियाँ ,कोने भर लठियाँ ,
अरगनी लँगुटियाँ
चेरी को चरकन ,
बहू को ठनगन
बाँदी की बरबराट,काँसे की झरझराट,
टारो डेली,बाढ़ो बेली,
वासदेव की बड़ी महतारी .
जनम-जनम जनि करो अकेली .
 *
मैं जानी बिटिया बारी-भोरी ,
चन मँगिहै ,चबेना मँगिहै ,
बेटी माँगो कुल को राज .
पायो भाग!
 सप्ता (सप्त मातृका) दियो सुहाग !'
- अपनी कामना के साथ हाथ में धरेअक्षत -पुष्प   देवी-माँ क चरणों में अर्पित कर देती हैं.

  सांसारिक जीवन में अपनी बहुमुखी भूमिका  निबाहती .सुखी समृद्ध  गार्हस्थ्य  की धुरी के रूप में कल्याणमयी नारी का स्वरूप , सुहाग  की मूल अवधारणा है.

रविवार, 11 जुलाई 2021

राग-विराग -15..

राग-विराग 15.

"भौजी, भौजी हो . . . कहाँ गईं? . . देखो तो तुम्हारे लिये क्या आया है?"

साड़ी के पल्ले से भीगे हाथ पोंछती रत्नावली आते-आते बोली, "बड़े उछाह में हो देवर जी, ऐसा क्या ले आये हो?"

देखा, दुआरे नन्ददास खड़े, दोनों हाथों में ग्रंथ सँभाले, रत्ना की गति में वेग आ गया, "तैय्यार हो गई! वाह देवर जी कब से आस लगाए हूँ . . कुछ अंश पढ़े थे, टोडर भैया ने कहा था, प्रतियाँ तैयार करवा रहा हूँ पूरी होने पर, पहले मुझे भेजेंगे . . . " कहती-कहती वह आगे बढ़ आई, दोनों हाथ पसार ग्रहण कर माथे से लगाया . . मुख पर अपूर्व प्रसन्नता छा गई थी।

तुलसी के रामचरितमानस की प्रस्तावना के कुछ अंश और राम-विवाह आदि के कुछ प्रसंगों को रत्नावली ने पढ़ा था और पूरी कथा पढ़ने की इच्छा व्यक्त की थी।

तब तुलसी पण्डितों के कपट व्यवहार से खिन्न थे और उसे अपने मित्र टोडरमल के पास सुरक्षा हेतु रखवा दिया था। उसकी हस्त-लिखित प्रतियाँ बनवाई जा रहीं थीं, जिसमें पर्याप्त समय लग रहा था। टोडर ने मित्र-पत्नी को आश्वस्त किया था कि जल्द ही एक प्रति उनके पास पहुँचवा देंगे। उन्होंने तुलसी से कह कर नन्ददास के हाथ रत्नावली को भिजवा दी थी।

"पधारो, बैठो देवर जी, अब प्रसाद पा कर जाना। आज तो तुमने सञ्चित मनोकामना पूरी कर दी।"

रामचरितमानस यथा-स्थान पहुँचा कर तुलसी का मन अमित तोष से भर गया - अब  कहीं रतन को कुछ उसके मन का दे पाया हूँ. . 

"अब तो पुस्तकें ही मेरा साथ निभाने को रह गई हैं," रत्ना ने नन्ददास से कहा था, "अपने को इसी प्रकार लगाए रखा है। नारी हूँ न, मनचाहा घूमने की सुविधा नहीं, किसी से मेल-जोल बढ़ाना मेरे लिए उचित नहीं। मानसिक ऊहापोह ही बचा था। जीने के लिये कुछ सहारा तो आवश्यक है।" 

"सच में दद्दू, गीता और पुराण से लेकर अब तक जाने कितने ग्रंथ उन्होंने पढ़ लिये हैं। समय की कमी कहाँ उन्हें, कहीं जाती-आती तो हैं नहीं। भाई -भतीजे अपने साथ चलने का आग्रह करते हैं, भौजी किसी के बुलाए नहीं जातीं।  कह देती हैं ’अभी तो एक ढर्रा बना हुआ है यहाँ जब तक हूँ, चलाती हूँ, जिस दिन मुश्किल लगेगा, चली आऊँगी। यहाँ देवर लोग भी सुध लेते हैं, मेरा ख़ूब ध्यान रखते हैं, संदेशे आते-जाते रहते हैं।’ वे कभी कहीं नहीं गईं।" 

कोई मुख से न कहे तो क्या, तुलसी जानते हैं वह क्यों नहीं जातीं। एक बार जा कर तो जनम की व्याधि पाल ली, अब किस मन से जाए। यह भी जानती है रतन, कि उस एक घटना के बाद तुलसी उधर की चर्चा भी नहीं करना चाहते। 

और रतना ने कभी उन्हें उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ चलाना नहीं चाहा।

एक गहरी साँस निकल गई। 

नन्ददास कहे जा रहे थे, "भौजी ने त्याग का जीवन बिताया है। किसी से शिकायत नहीं, किसी से लेना-देना नहीं, जो मिला उसी में निभा लिया। अब देह जर्जर हो गई है। अपना कष्ट किसी से नहीं कहतीं। कितनी ही अस्वस्थ हों अपना नेम-धरम, व्रत-उपासना में कमी नहीं होने देतीं। इतनी उमर हो गई कभी किसी से कोई आस नहीं रखी।

"इतनी दुर्बल हैं। बस, अपने मनोबल से चले जा रही हैं मुझे डर लगता है । दद्दू अचानक कहीं . . . "

एकदम धक् से हो गये तुलसी। यह तो कभी कल्पना भी नहीं की थी। बहुत छोटी है वह मुझसे।

और फिर एक दिन अचानक ही चक्कर खाकर गिरने के बाद रत्नावली निढाल हो गई। उसका भतीजा अपनी ससुराल में आया हुआ था, जो नन्ददास के पिता के घर के समीप थी। समाचार सुन कर चन्दहास के साथ ही वह भी आ गया। रत्नावली की इच्छा-शक्ति कहें या तुलसी का अन्तर्बोध, वे अगली सुबह, उपस्थित हो गये थे। 

परिवार और परिजनों में रत्नावली का बहुत सम्मान था। सूचना फैल चुकी थी. . 

किसी ने कहा, "लो, बे आय गये।" 

मुख्य द्वार खुला था, अबाध अन्दर चले आये उस घर में जहाँ विगत जीवन की स्मृतियाँ चारों ओर बिखरी थीं। 

शैया पर लेटी क्षीण काया कुछ चेती, आँखें खोलीं, "आ गए?" मुख पर प्रकाश-सा छा गया, लगा  रत्ना मुस्कराई ।

जैसे दीप की लौ बुझने से पूर्व दीप्त हो उठी हो।

और फिर वर्तिका की ज्योति शान्त हो गई।

रत्ना की वयोवृद्ध भाभी बोलीं, "हमारी रतन सुहागिन गई है," अश्रु-प्रवाह रोके नहीं रुक रहा, "सोलहों सिंगार सहित, सिन्दूर मंडित हो चुनरी ओढ़े जा रही है। ननद नहीं, मेरी तो बिटिया समान थी वह, मुझसे पहले कैसे चली गई?" 

भाई, मुँह फेर कर आँसू पोंछ लेते हैं।

कुछ सूझ नहीं रहा तुलसी को , कर्म-काण्ड में जो बताया गया गया यन्त्रवत् करते गये। 

चलते समय चौकी पर उसके लिखे कुछ पृष्ठ, एक दैनन्दिनी और पीली बकुचिया में सैंती मानस की प्रति अपने साथ रख लिये।

अयोध्या का गुप्तद्वार घाट!

इसी घाट से सरयू में उतर गये थे श्रीराम।

मन अकुला उठता है, . . . कैसा लगा होगा प्रभु को, जानकी माता की याद आई होगी!

हाँ, यहीं से जल-समाधि ले कर . . . प्रभु राम ने वैकुण्ठ-गमन किया था।

तुलसी इस घाट पर घण्टों बैठे रहते हैं। सरयू-जल बहता चला जाता है, लहरों का नर्तन अविराम चलता है। कल-कल ध्वनि के साथ अद्भुत शान्ति वातावरण में व्याप्त रहती है। समीपस्थ अनेक छोटे-बड़े मन्दिर हैं, पर घाट पर कहीं कोलाहल नहीं . . . . 

चुपचाप बैठे तुलसी को लगता है, जल की-धारा गहन हो उठी है। प्रवाह की लय थम सी गई हैं। कुछ वर्तुलाकार होती लहरें वहीं-वहीं घूम रही हैं मध्य में एक विवर बनाती-सी, जो क्षण भर झिलमिला कर जल-मग्न हो जाता है। 

कितने बिम्ब बिखर-बिखर कर अतल में विलीन हो जाते हैं।

चतुर्दिक् सन्नाटा छाया है। कहीं कोई नहीं।

अनोखी विरक्ति से तुलसी कह उठते हैं–

"अर्थ न धर्म न काम रुचि पद न चहौं निर्वाण"


मुँदी आँखों से आँसू बह चलते हैं, पोंछने का भान नहीं।

वह अपने भीतर ही खोये हैं। इस घाट से उठने की इच्छा नहीं होती, न रात का भान रहता है न दिन का।

मन जाने कहाँ-कहाँ भटकता फिरता है।

इतने दिन से अकेले रह रहे हैं लेकिन इतना एकाकीपन कभी नहीं खटका।

सब छोड़ते गये। रहीम गये, टोडर गये और अब रतन भी बिदा ले गई।

मन में प्रश्न उठता है–

’हम सोच लें कि किसी को जीवन से निकाल दिया तो वह सच में निकल जाता है क्या? कभी-कभी लगता है वह गुम हो कर भीतर कहीं बैठ गया है।’ 


मन ही मन कहते हैं तुलसी, ’तुम आयु पाकर गई हो, अभागिनी नहीं थीं रतन तुम! हमारे प्रारब्ध में यही था। 

'पता नहीं मैंने जो किया वह सही था या ग़लत पर उसके सिवा उस समय मैं और कुछ नहीं कर सकता था। ऐसा क्यों नहीं किया-वैसा क्यों नहीं किया—यह सब बाद की बातें हैं। उस समय कुछ नहीं सूझता . . मैं विवश था जो नियति मुझे वहाँ तक लाई थी उस पर मेरा कोई बस नहीं था। मैंने स्वयं को ऐसी स्थितियों में पाया जो मेरे लिये भी बहुत विषम और अबूझ रहीं थीं। उनसे कैसे पार पाया, मैं स्वयं नहीं जानता। पार पाया भी कि अभी भी नियति के पैने दंश मुझे झेलने हैं।

'अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं . . . मेरा जीना पता नहीं कितना और है। तुमसे कई वर्ष बड़ा हूँ, बुढ़ापा आ गया है देह क्षीण होती जा रही है। रह-रह कर रोग फेरा लगा जाते हैं। हाथ पाँवों में दम नहीं रहा। कोई नहीं जिसे टेर लूँ। रहूँगा जब तक राम रखेंगे, जैसे रखेंगे। रहना तो पड़ेगा ही। बुढ़ापे में कष्ट झेल-झेल कर लाचार घिसटना जितना कम हो उतना अच्छा। लेकिन वह भी हमारे बस में नहीं।'

वे सोच-लीन हो जाते हैं – ’प्रारंभ से कुछ भी तो अपने बस में नहीं। गुरु-कृपा से कुछ चेता पर सांसारिक व्यवहार में कोरा रहा था, वहीं मात खा गया। जो पाया था, अपने ही आवेग में आ कर गँवा बैठा।' 

दीर्घायु पाई थी तुलसी ने। कष्टों से भरा लम्बा जीवन झेलते बार-बार मन में घुमड़ता, ’मैं जनम का अभागा जहाँ रहूँगा अनिष्ट मेरे साथ चलेगा!’

सरयू की लहरों का कलनाद सुनते तुलसी बैठे रहते हैं। काग़ज़ों पर जो पढ़ा था मन में गूँजने लगता है, लगता है रतन बोल रही है, उठती-गिरती लहरों में एक मुख प्रतिबिम्बित होने लगता है। विभिन्न मुद्राएँ अनेक भंगिमाएँ पल-पल बदलती रहती हैं और वही सुमधुर स्वर रह-रह कर सुनाई देने लगता है . . 

'तुमने मुझे अपने मानस की प्रति भेजी थी, मैं गद्‌गद्‌ हो गई। इतनी अनुपम भेंट किसी पति ने अपनी पत्नी को नहीं दी होगी।'

यही तो पृष्ठ के कोने पर लिखा था रत्ना के अक्षरों में।

आगे और भी बहुत कुछ, हाँ कानों में वही ध्वनित होने लगता है–

’....इन दिनों उसी का अवगाहन करती तुम्हारे मानस को थाहने का यत्न करती हूँ।

'तुम्हारे कातर मानस का दर्पण रामचरितमानस, एक विलक्षण रचना है। पढ़ती गई, मुझे लगता रहा, मैं तुम्हारे साथ हूँ, जहाँ तुम हो, मैं हूँ। भौतिकता की भावनात्मक परिणति, तुम्हारी अपूर्व निष्ठा का सबसे सुगन्धित प्रसून!'

सुनसान रात में किसी पक्षी की पुकार गूँज गई। तुलसी चेते।

अक्षरों में वाणी होती है क्या? रह-रह कर कौन बोल जाता है।

रतन बोली कि वे अक्षर स्वरित होने लगे?

हाँ, रतन के सुन्दर अक्षरों में शब्दशः यही लिखा था, तुलसी याद करते हैं और कानों को उसके के प्रिय स्वर का आभास होने लगता है। 

घाट पर आई रमणियों के वार्तालाप में, कभी ऐसा लगता है वह बोल रही है। सचेत हो कर सोचते हैं—अरे, वह यहाँ कहाँ?

सरयू की लहरों में कुछ बिम्ब उभरते हैं, लगता है कोई आँखें झाँक गई हैं, कुछ स्वर मुखर हो कर कर्ण-कुहरों में ध्वनित होने लगते हैं–

’तुम माँ जानकी का रूप वर्णन कर रहे थे और मैं, तुम्हारे मन को थाह रही थी। समझ रही थी। देह के सौन्दर्य में कैसी दिव्यता का संचार कर दिया तुम्हारी पावन भावनाओं ने। उसका उपयोग जिस निर्मल निर्दोष मन से तुम करते गये– पढ़ कर लगा नारी तन में कुछ भी ऐसा नहीं जो गर्हित हो। सांसारिकता जहाँ दिव्यता में परिणति पा ले, वहाँ देह एक माध्यम रह जाती है, एक उपकरण बन कर। काया निरर्थक नहीं रही।

’इन अनुभूतियों में, इन वर्णनों में, अपनी विद्यमानता पहचान रही हूँ। तुमने कहा था न..."रतन समुझि जनि विलग मोहि," यहाँ उपस्थित हूँ मैं भी, तुम्हारे साथ—तुम्हारे लेखन में समाहित हो कर। अपने को पहचान रही हूँ, सच, मैं तुमसे विलग नहीं हूँ।' 

हाँ, उन पन्नों में जो लिखा था बार-बार पढ़ कर भी नया सा लगता है। रतन का स्वर कानों में समाने लगता है। ज्यों अंतर्मन ने उसका संवाद पा लिया हो।

उसने कहा था, ’तुम्हारे भीतर क्या घटता है मैं समझ रही हूँ, लग रहा है इन अभिव्यक्तियों से बहुत गहरे जुड़ी हूँ । अनेक स्थितियों का अनुभव कर रही हूँ। मैं रामचरित के छन्दों को पढ़ती जा रही हूँ, रोमाञ्च हो आता है, सारी भौतिकता, भावना में ढल गई है, तन्मय हो जाती हूँ। माँ सीता पर बीता लगता है ज्यों मेरा ही बीता हो। 

’एक अवधि तक तुम्हारे साथ रही हूँ, उसे अनुभव किया है, आज उसकी निर्मल-शीतल भावमयता में डूबी जा रही हूँ।

’वही प्रेम राम-जानकी के जीवन-कूलों से टकराता, पावन गंगा-सा लहरा रहा है – तृप्त हो गई मैं। कुछ भी आरोपित नहीं सब, अनुभूत, अंतःप्रसूत, हृदय के गहन तल में निष्पन्न मुक्ताओं सा उज्ज्वल, निर्मल!

’तुम्हारी साधना को प्रणाम करती हूँ।

’मुझे लगता था मेरा नारी जीवन अकारथ हो गया है, सबसे प्रमुख कार्य योग्य संतान देना संभव नहीं हुआ। आत्म का विस्तार करने को साधन न मिले। आत्मोन्नयन का यत्न लगातार करती रही, लेकिन अब जान रही हूँ कि अपने स्तर पर मैं कभी महत्वहीन नहीं रही। इस सार्थकता बोध के लिये, जीवन की संध्या में ही सही, मैं तुम्हारा ऋण अनुभव करती हूँ, उदार हृदय की विशालता को 

नमन करती हूँ। अब तक स्वयं को समझने का जतन करती रही अब देख लिया मैंने कि मेरा सीमित अस्तित्व विस्तार पा गया है तुम्हारे मानस की रतन व्याप्ति पा गई है। अब समय आ गया है अपने को समेट रही हूँ। 

’जाने-अनजाने अपनी दीन-हीनता को तुमने इतना विराट्, इतना व्यापक कर लिया कि सृष्टि का ऐश्वर्य उसमें प्रस्फुटित हो उठा।’

बहुत धीमे स्वरों में कहती है, ’अपना उज्ज्वल पक्ष तुमने राम जी को समर्पित कर दिया, उनके नाम लिख दिया . . धन्य हो गये तुम और साथ में मैं भी।’

अपने अंतःर्वार्तालाप में खोये तुलसी को समय का भान नहीं होता।

मेरा क्या? जिनको साथ देना था और जिसका साथ वाञ्छित था वह सब छोड़ गये।

मन में कचोट उठती है – मैंने भी तो उसकी उपेक्षा की।

नन्ददास के हाथ उपदेशों के संदेश लिख कर भेजे थे, उन्हीं में एक था –

"तू गृह श्री हृी धी रतन, तू तिय सकति महान।

तू अबला सबला बनै, धरि उर सती विधान॥"

बड़ी बातें सभी सुना सकते हैं मन को समझे ऐसा कोई है क्या?

एक वार्तलाप अविराम मन ही मन चलता रहता है . . 

कभी बड़ी निराशा से भर उठते हैं, शरीर निर्बल और सामर्थ्य सीमित हो तो बार-बार मन का दैन्य उमड़ता है। रोगों ने अपना स्थान चुन लिया है, कंधे जकड़ जाते हैं, हाथ पूरा घूमता नहीं। रात को ऐसा पिराता है कि चैन नहीं पड़ता।

अंतर्मुखी मन जब बहिर्मुखी हो स्थितियों पर विचार करता है तो कोई समाधान नहीं मिलता।

मैंने रामराज्य की परिकल्पना साकार करनी चाही थी। अपने मानस में सँजोई कितनी आशाएँ वहीं समो दी हैं। सब कुछ वहाँ व्यक्त कर दिया। लगता है अब कहने को कुछ नहीं रहा। संसार का चलन देख बड़ी निराशा होती है, न आचार रहा न संस्कार। अब तो बच्चों को सचेत करने की ओर कोई ध्यान भी नहीं देता। भोजन-कपड़े और आश्रय दे कर कर्तव्य पूरा समझ लेते हैं। कुल धर्म और रीति-नीति सदाचार की सीख कौन देता है?

धर्म-गुरु, अपनी-अपनी साधने में लगे हैं। समाज किधर जा रहा है किसी को चिन्ता नहीं। सबको अपनी पड़ी है। न बाप-बाप बन पाया न बेटा बेटा। सब अपनी-अपनी राह जा रहे हैं कोई चेतानेवाला, राह दिखानेवाला नहीं।

समाजिक विसंगतियों और उथल-पुथल से खिन्न तुलसी के मन को राम जैसे निस्पृही नायक में युग का त्राणकर्ता परिलक्षित हुआ जिस का सारा जीवन जन-कल्याण के हेतु समर्पित रहा. राजा थे राम, राज-धर्म पूरी तरह निभाया। जहाँ व्यक्तिगत संबंध आड़े आये वहाँ राज-धर्म जीत गया। 

एक गहरी साँस लेते हैं तुलसी।

घोर अंधकार में एक प्रकाश किरण झलकी।

और तुम, जिसके लिये सब कुछ त्याग आये वह तुम्हारे साथ है, उसे पुकारो। 

लगा वह कह रही है, ’किसी और के आगे दैन्य क्यों, अपने परम समर्थ स्वामी को पुकारो, अपनी विनय उन चरणों में धर दो , वे ही समाधान करेंगे. .

’सारे सभा-जनों के बीच प्रभु के दरबार में अर्ज़ी लगेगी तो उसे बिना विचारे नहीं रहेंगे।'

राम का दरबार, दीन की अर्ज़ी? 

तीनों बंधु, पवन-पुत्र, सभी देवता सभा में विराज रहे होंगे, अर्धासन पर माँ जानकी सुशोभित होंगी।

वहाँ उन सामर्थ्यवानों के बीच मेरी क्या बिसात!

तो क्या? अंतर्मन की पुकार निष्फल रहेगी?

मैं, सबसे अनुनय करूँगा।

और जगन्माता सीता करुणामयी हैं। विनती करूँगा अनुकूल अवसर देख, प्रभु राम से मेरी चर्चा कर दें। तभी मैं अपनी अर्ज़ी सामने रख दूँगा।

उस दरबार की मर्यादा के साथ, सभी को सादर प्रणाम करते हुए, अंतर्निहित भावों से रच कर अपनी विनय की पत्रिका उन चरणों में धर देनी है मुझे . . 

हाँ प्रभु, यह तुलसी भी कम मुँह-लगा नहीं है, अपनी-सी करेगा ज़रूर!

परम धुनी तुलसीदास ने सोच लिया, सो सोच लिया। अब वह श्रीराम के दरबार में अपनी अर्ज़ी (विनय पत्रिका) पर सही करवा कर ही दम लेगा, इसके लिये उसे प्रत्येक जन की चिरौरी क्यों न करनी पड़े! 

(समाप्त)



गुरुवार, 24 जून 2021

राग-विराग -14.

*

गोस्वामी तुलसीदास कोरे धूनी रमाने वाले संत नहीं थे, जिसे केवल  अपनी मुक्ति की चिंता सताती. वे ऐसे संत थे जिसका हृदय लोक-जीवन में संत्रास देख कर व्यथित होता था. उनके आऱाध्य श्रीराम ने स्वयम् अपनी प्रिय प्रजा के हित-संपादन के लिये  अपने सुख को बिसार दिया था, वे मात्र राजा नहीं, समस्त लोक में व्याप्त हो, लोक के विश्वास  और संवेदना में छा गये थे. श्रीराम का यही रूप तुलसी का आदर्श रहा. 

जब नन्ददास ने कहा, 'दद्दू ,गृहत्यागी साधु हो कर भी  असार संसार पर  दृष्टि रखते हो?' .

तुलसी मुस्कराये ,'क्यों नन्दू,संत क्या केवल अपना लाभ देखता है? मेरी दृष्टि में तो वह स्वयम् हानि-लाभ,सुख-दुख,निन्दा-स्तुति से परे है. संत का जीवन समाज से उदासीन रह कर नहीं, समाज को सही राह दिखा कर सार्थक होता है'.

उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया था -

'जीने की कला सिखा गये जो ,ये जीवन अब उन्हीं प्रभु की धरोहर है, और उन्हीं को समर्पित है.'

'सिया-राममय लोक को असार कैसे कहूँ? इस लोक के जीवन को सँवारना मेरे लिये राम-काज है .जन-जन में प्रभु राम समाए हैं. श्री राम ने ,धर्म और नीति के लिये जीवन धारण किया. लोक  कल्याण के लिये श्री राम प्रभु आजीवन तपे. उनका महत्व जितना मेरी समझ में आता जा रहा है,उतना ही उद्घाटित होना शेष रह जाता है.' 

नन्ददास से वार्तालाप करते समय एक बार उन्होंने कहा था,'मैंने कब कहा कि मैं दूध का धुला हूँ. मैं तो लिख कर स्वीकार करता हूँ कि मैं पुराना पातकी हूँ. पर श्रीराम की शरण में आ गय़ा हूँ .....अब तक का जीवन नसाया ,अब नहीं नसाना चाहता. अपने सारे विगत कर्म मैंने उन्हीं के चरणों में अर्पित कर दिये ,अब अपने लिये कुछ नहीं करूँगा, सब कुछ उन्हीं के निमित्त होगा.

'मैं, दुर्बल प्राणी ,उन्हीं से संचालित हो रहा हूँ .वापस लौटना संभव नहीं. लौटने का मतलब दुर्बलताओं के आगे समर्पण, उसी मोह-माया में लौट जाना. वहाँ से बहुत दूर निकल आया हूँ, अब दिशा परिवर्तन संभव नहीं. मैं नहीं कहता कि मैंने सब ठीक किया. लेकिन अब मैंने श्रीराम को हृदय में धारण कर लिया है -सांसारिक कामनाएँ मेरे लिये त्याज्य हैं.'

 नन्ददास  ने यह भी पूछा,' काहे दद्दा ,राम जी औऱ कन्हैया जी में काहे भेद करते हो?'

उन्होंने तुरन्त प्रतिप्रश्न किया,' कौन से कृष्ण जी ,नन्दू ?  

 'पीन पयोधर मर्दनकर्ता कृष्ण? वस्त्र-हरण कर अभिसार करते कृष्ण? यह कैसा लम्पट  नायक बना डाला? किस रूप में याद कर मगन होते हो,चीर-हरण ,रास-लीला,अभिसार या व्यभिचार?'

'इसमें कन्हैया जी का क्या दोष? ये तो लोगों ने अपनी रुचि से ढाल लिया है.' 

'व्यवहार में जो स्वरूप बन गया है वही तो असली समस्या है. लोक में वही प्रत्यक्ष है, आँखों के सामने ऐसा व्यक्तित्व क्यों रहे कि कोई अपने अनुसार ढाल ले? लोक-रुचि को क्या कहें ? पर जीवन में इतनी विभीषिकाएँ हैं ,उनसे छुटकारा दिला सके, ऐसा महानायक पूज्य है. कहाँ गीता का ज्ञान, अनासक्ति और कर्मयोग ,और कहाँ रास-रंग, छप्पन-भोग, दान-मान लीला और अभिसार प्रसंग.'

नन्ददास के साथ अनेक बार उनका वार्तालाप होता था ,जिससे उनका दृष्टिकोण स्पष्ट होता था होता था. उनका कहना था -

'कर्मयोगी कृष्ण का स्वरूप ही विकृत कर डाला गया .जन्मभूमि पर गाये जानेवाले अश्लील गीत कैसे सबके मुँह पर चढ़ जाते हैं! उनकी निम्नवृत्तियों का पोषण करते हैं और लोग आनन्द नहीं, मज़ा लेते है. स्वकीया त्याज्य हो गई और परकीया-प्रेम की महिमा गाई जा रही है.समाज में व्यभिचार को पोषण मिल रहा है.. हम अकेले  नहीं ,और क्योंकि परिवार बृहत्तर समाज का ही एक घटक है. देखो न, सनातन परंपराओं को भंग कर हमारा समाज पतन की ओर जा रहा है और हम आँखें मूँदे बैठे हैं. क्या कवि का कोई दायित्व नहीं?'

'बड़ा अनर्थ हुआ श्रीकृष्ण के साथ. उनक .जीवन के अर्थ ही बदल दिये गए. जब कवि की यह प्रवृत्ति होगी तो लोक में भी वही सन्देश जाएगा. जाएगा क्या, बल्कि जा ही रहा है. 

  'नहीं नन्दू, मुझसे नहीं होगा. मुझे धनुर्धारी राघव में ही सारी समस्याओँ का समाधान दिखाई देता है.मैंने अपने सारे बोध श्री राम को अर्पित कर दिये हैं. और अपनी सारी वृत्तियाँ राममय कर लेना चाहता हूँ 

 मैंने अपनी निजता उन्हें सौंप दी ,कि भला या बुरा जैसा हूँ वे ही सँभालें.अब मेरा अपना कुछ नहीं. 

जो बीत चुका वह भी उन्हीं चरणों में अर्पित कर चुका हूँ.' 

मन ही मन कहते हैं तुलसी -हे प्रभु, मुझे संसार का नहीं, तुम्हारा रुख़ देखना है..

तुलसी समझ गए हैं कि दुर्बलताओं को मौका मिलते ही वे प्रबल होने लगती हैं. और मन बहाने गढ़ने मे बहुत कुशल है. 

.नन्ददास को समझाने का प्रयत्न करते हैं. 'मन ऐसा उपद्रवी है कि इन्द्रिय सुखों की ओर ले जाता है. लगाम दिये बिना बस में नहीं आता.जरा छूट मिली कि भागचलता है और सारे भान भुला देता है. सचमुच नन्दू, मैं अपने ऊपर विश्वास नहीं करता बहुत धोखा खा चुका हूँ. अवसाद की छाया छोड़,वह रात्रि बीत गई. अब जाग गया तो आँखें कैसे बन्द कर लूँ?'

'...और जो लोग तुम्हारे साथ जुड़े हैं उनका कभी सोचा ?'

'नदी-नाव संयोग ,और कर्मों का लेखा .वह सब अब रामजी को अर्पण कर चुका. जिनके सान्निध्य से मति निर्मल  हुई. उनका ऋणी हूँ . हर ऋण इसी जन्म में चुका सके इतना समर्थ कोई नहीं. श्री राम भी कहाँ उऋण हो कर गये. इस धरती से प्रस्थान के समय भी माँ सीता की त्यागमय अनुपम प्रीति  को मन में धारे गये होंगे.'  

*

 संत तुलसीदास जी'' को ''रामचरित मानस'' रचने की प्रेरणा 'सरयू नदी' के किनारे मिली थी. बहुत समय तक सरयू  के उस घाट पर समाधिस्थ-से घण्टों उस प्रवाह को देखते रहते थे ,जिसमें श्रीराम ने जल-समाधि ली थी. 

प्रभु को, धरती से प्रस्थान करते समय, माता जानकी की याद आई होगी.मन में विचारणा चलती रहती .सघन भावों में डूबे नेत्रों से अश्रु प्रवाहित होने लगते, रात-दिन की सुध नहीं रहती . 

'सरयू' का एक नाम ''मानसी'' भी है. नेपाल के ऊपरी भाग में इसे मानसी कहा जाता है क्योंकि यह नदी ''मानसरोवर'' से निकलती हैं, इसीलिए गोस्वामी जी ने इस ग्रन्थ को  'रामचरित मानस' नाम दिया.


तत्कालीन शाहंशाह अकबर की ख़्वाहिश थी  जन-भाषा का कोई कुशल कवि की उसकी प्रशंसा में कसीदे कहे, जिससे उसकी लोकप्रियता  बढ़ने लगे. मानसिंह ने उसे सलाह दी, कि बनारस शहर का आत्माराम का लड़का अवधी भाषा में खूब लिखता है और  लोक में उसकी मान्यता है , लेकिन वह किसी के कहने नहीं लिखता .

राजा मानसिंह का जलवा जग-विदित था. अकबर ने तुरंत अपने दरबार के नवरत्नों में सम्मिलित करने हेतु तुलसीदास का नाम प्रस्तावित कर,उन्हें निमंत्रित करने हाथी की अंबारी सजा कर, बनारस रवाना कर दिया ,.

तुलसी दास समझ रहे थे, अकबर की अनायास मिली कृपा  उनके कार्य में बाधा डालेगी. पद या धन के प्रति यों भी उन्हें अनासक्ति थी. उन्होंने अकबर का प्रस्ताव स्वीकार न कर उसकी बेरुखी मोल ले ली.उनका उत्तर था - 

'हम चाकर रघुवीर के पटो लिखो दरबार,

तुलसी अब का होहिंगे नर के मनसबदार.'

उस विषम स्थिति में, परम मित्र टोडरमल ने उनका मनोबल बनाए रखने का पूरा प्रयत्न किया था. पहले भी जब पंडितों ने तुलसी पर जानलेवा हमला किया तो उन्होंने उनकी प्राण-रक्षा की थी। इतना ही नहीं बनारस के अस्सी घाट पर अपना एक भवन तुलसी के नाम कर दिया . 

तुलसी और उनके ग्रंथ रामचरित-मानस  को टोडरमल ने ही पण्डितों के षड्यंत्रों से बचाया और पूरा संरक्षण दिया था.

काशी के पण्डितों ने क्या कम बैर निभाया था? कैसे-कैसे कुचक्र रचे पर तुलसी का  कुछ बिगाड़ न कर सके .

1659 में टोडरमल का स्वर्गवास .हो गया .वे तुलसीदास के आत्मीयवत् रहे थे. अति सरलमना ,उदार-हृदय, टोडर ने विषम स्थितियों से कितनी बार तुलसी को उबारा था.उ नकी सन्तानों में भी तुलसी का बहुत मान रहा था. टोडरमल की मृत्यु ने उन्हें बहुत अकेला कर दिया.अनायास ही एक दोहा तुलसी के मुख ले निकल पड़ा -

'रामधाम टोडर गए, तुलसी भए असोच,

जियबो मीत पुनीत बिनु, यहै जानि संकोच.'

*

(क्रमशः)