शुक्रवार, 18 मई 2018

हरफ़नमौला -

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अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं-  आपकी तारीफ़ ? 
भला कोई अपने मुँह से अपनी तारीफ़ करता है?
अब क्या-क्या कहूँ अपने बारे में, मुझे तो शरम आती है.
फिर भी बताना तो पड़ेगा ही  .लेकिन  तारीफ़ नहीं ,असलियत ही कुबूलूँगा.
हाँ, मैं हरफ़नमौला आदमी हूँ .बहुत काम कर-कर के छोड़ चुका . कुछ पढ़ाकू किस्म का भी रहा .अपने आप अनुभव करने में विश्वास है मेरा .कही-सुनी बातें दिमाग से निकल जाती है .ख़ुद करके देखना मुझे ठीक लगता है.
इन्टरनेट का ज़माना है . जानकारी के समुद्र भरे पड़े हैं, ऊपर से लोगों के अपने वक्तव्य भी .व्यक्ति के अनुभव व्यक्तिगत न रह कर उनका सामाजीकरण होता जा रहा है.दुनिया भर के तमाम जानकारियाँ हम एक क्लिक में पा सकते हैं.स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिये एक से एक पते की बातें तुरंत सामने.राजीव दीक्षित जी से लेकर पड़ोस के जगमोहन जी के टिप्स तक
सुबह खजूर खाने के फ़ायदों के विषय में मैंने कंप्यूटर पर पढ़ा तभी  खजूरो से संबंधित खूब जानकारी खोजी और प्रभावित हुआ .कितने प्रकार के होते हैं किसकी क्या ख़ूबी है  ,कहाँ के अधिक फ़यदेमंद हैं .पता चला आपको बहुत एनर्जी देते हैं खजूर ,तभी तो रोज़े के पहले इसे ही खाकर शुरुआत करते हैं लोग.और फ़ायदों का तो कुछ पूछिये मत पूरी लिस्ट की लिस्ट है.काफ़ी-कुछ कापी करके रख भी ली है.
और रोज सुबह दो खजूर खाने लगा  .
फिर किसी  जानकार ने अंजीर के गुण गिनाए.पढ़ा उसके बारे में भी और मैनै अंजीर खाना शुरू कर दिया था.रोज़ दो अंजीर ,रात को भिगो कर सुबह खाली पेट .कभी दूध में डाल कर  भी कम फ़ायदेमंद नहीं . हर तरह का फ़ायदा पाना पाना चाहता हूँ न .कितने दिन खाया यह तो ठीक से याद नहीं ,हो सकता है 
  3-4 महीने खाया हो -अभी भी एक पैकेट पड़ा है मेरे पास.क्योंकि फिर अमरूद के फ़ायदे सामने आ गये .बड़े विस्तार से लिखा गया था. इतना सस्ता फल और सेव से बढ़ कर गुणी. 
अमरूद 
पूरे मौसम खाती रही 
लेकिन जब फ़सल के दिन पूरे होने लगे  ,एकाध बार फलों में कीड़े दिखाई दे गये  ,देख कर पहचान में ही नहीं आते कि अंदर कीड़े भरे हैं मीठे भी ख़ूब थे.पर फल के अन्दर कुलबुलाते दिखाई दिये तो मेरा तो जी घिना गया .
इससे तो  भुने चने अच्छे . किसी गुणज्ञ ने आत्मानुभव के आधार पर खूब वाहवाही की थी .वह  भी खूब खाये मैंने. 

एक चीज खाता हूँ मन भर जाता है तो दूसरी का लग्गा लगता है ,कोई डाक्टर ने तो कहा नहीं कि  खाओ तो खाते चले जाओ.,आखिर को इतनी चीज़े हैं दुनिया में एक से एक बढ़ कर  .हरेक का अपना फ़ायदा. और शरीर को सभी तत्व चाहिये. फिर एक पर ही क्यों अटके रहें हम?
इसी क्रम में सेव,आँवला,हल्दी अजवाइन मेथी ,ज़ीरा और जाने क्या-क्या खा -खा कर छोड़ दिये 
सारी चीज़ेों के नाम भी अब तो याद नहीं ,कौन-सी कित्ते दिन खाई यह भी याद नहीं. कहाँ तक याद रखे कोई .
पर लिस्टें मेरे पास बहुत -सी चीज़ो के लाभों की  हैं और उनके बारे में पूरी जानकारी भी .किसी को चाहिये तो बताए. मिलेगा सब इंटर नेट पर परह बिखरा-बिखरा ,अलग-अलग ढूँढते फिरो ,मैंने एक जगह इकट्ठी कर रखी है .जिसमें सबका भला हो .  
"अपना स्वास्थ्य बनाओ,लोगों ,दुनिया  भर के अनुभव  पाओ . इन्टरनेट का लाभ उठाओ !"
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रविवार, 13 मई 2018

गुड़ - शक्कर


 कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ ! एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त, सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला, पुटलिया सा भेली बना गँवार अक्खड़  ठस जैसा गुड़?
पर क्या किया जाय पहले उन्हीं बुढ़ऊ को याद करते हैं लोग.
 इस चिपकू बूढ़-पुरान के चक्कर में, चंचला किशोरी-सी शक्कर किस चक्कर में पीछे कर देते हैं लोग! माँ की लोरी में गुड़ का गुण-गान है -'निन्ना आवे ,निन्ना जाय निन्ना बैठी घी-गुड़ खाय.,गुड़ खाय.' यों कहावतों में शक्कर अब गुड़ से टक्कर लेने लगी है- तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर  ,शक्क्रर में कुछ मक्कर ध्वनि साम्य होने से कुछ लोगों ने शकर कहना शुरू कर दिया, एक  छोटा, प्यारा-सा नाम चीनी भी दे दिया.  विदेशी नाम पाकर वह और इठलाने लगी.. स्वाद की बात कह  रहे हैं आप ? हाँ क्यों नहीं आयेगा स्वाद ,गोरी छरहरी के नखरे भरे अंदाज. रस देंगे ही .खुदा जब हुस्न देता है नज़ाकत आ ही जाती है.
तो यह भी जान लीजिये शक्कर के रूप के पीछे बड़ा भारी केमिकल लोचा है, फार्मलीन काम आता है  उसके लिये . और फर्मिलिन जैसी मारक चीज़ की अस्लियत आप केमिस्ट्री की डिक्शनरी में देख सकते है. जो इसमें  रूप का गुरूर भरती है, उस फार्मलीन का 0.5 मिलीग्राम किसी भी आदमी को कैंसर से मार देने के लिए पर्याप्त है. तो ,शक्कर का रूप सँवारने में  23 हानिकारक रसायनों का प्रयोग होता है .तभी न  जानलेवा स्वाद पाती है
 सच्ची बात तो यह है कि शक्कर से रोटी खाना चाहो तो मिठास देने से पहले पहले दाँतो के नीचे पहुँचते ही करकराने लगती है ,कण बिखेरने लगती हैं .कितना भी घी लगा लो ,पकड़ से छूट निकलने में माहिर है.  झऱ-बिखर कर भागती है, जैसे विद्रोह पर उतारू हो.
ऊपर से  इस नखरीली को पचाने में  500 केलोरी खर्च करना पड़ता है.  , इसको बनाने की पक्रिया में इतना अधिक तापमान होता है कि फास्फोरस जल कर  खतरनाक हो जाता है. ऊपर से अपने ताव में हमारे भोजन के प्राकृतिक शक्कर को शरीर के उपयोग में आने से रोक देती है . वैज्ञानिको ने एक स्वर से चीनी को  इसके लिये दोषी माना है -जी हाँ, वही चीनी जो आप बड़े चाव से मिठा3ई ,चाय. शर्बत सब में खाते हैं.
 गुड़ में लोच-लचक है ,अपने हिसाब से मोड़-माड़ कर रोटी मे लपेट लो ,काट-काट कर खाते रहो, ,कोई डर नहीं कि  बाहर निकलने की कोशिश करेगा.  रोटी से बाहर भी आ गया तो मुँह में चिपका रहेगा ,कहीं जायेगा नहीं धीरे-धीरे घुलता, मिठास देता रहेगा .चीनी तो एकदम बिखरने पर उतारू हो जाती है. पहले कर्रकर्र टर्रायेगी फिर  जहाँ मौका लगा छूट भागेगी.
रोटी पर दानेदार घी लगा हो और उस पर लाली लिये सुनहरा गुड़, लंबाई में लगा  चोंगा-मोंगा बना  हाथ में पकड़ कर मौज से खाते रहो - घी और गुड़ मिल कर विलक्षण स्वाद-सृष्टि करेंगे .बातों -बातों में मुँह खुल भी जाए  पर साथ नही छोड़ेंगे.
 मुझे तो तिल की पट्टी और रेवड़ी भी शक्कर से  गुड़ की अधिक स्वादिष्ट लगती है .मलाईदार गर्म दूध हो और गुड़ की रेवड़ी साथ में. मुंह में रेवड़ी रहे साथ में दूध के घूँट भरते जाओं .संतुष्टि और पोषण पूरा मिलेगा.उसके आगे कौन चीनी घोल कर दूध घूँटना चाहेगा !रही तृप्ति और स्वाद की बात ! सो पूछिये मत ,स्वयं अनुभव कर  लीजिये
सीधा-सादा ,शरीफ़-सा गुड अकेला ऐसा है जो बिना किसी जहर के  बनता है गन्ने के रस को गर्म करते जाओ, गुड बन जाता है. इसमे कुछ मिलाना नही पड़ता.  ज्यादा से ज्यादा उसमे दूध मिलाते है और कुछ नही मिलाना पड़ता.धरती से जुड़ा है गुड़ उसी का सोंधापन  समाया है इसमें ,चीनी मैं कहाँ  वह अपनापा ,रसायनों की रसाई पूरी है वहाँ
 तो अब आप गुड़ खाइये और गुलगुलों का भी स्वाद लीजिये .याद रखिये - शक्क्रर में शक करने की बात यों ही नहीं है , चीनी नाम पाया है ,तो असलियत भी जान लीजिये .  मीठी-मीठी बन कर जान ले बैठेगी एक दिन - चीनी जो ठहरी !

शनिवार, 5 मई 2018

व्यक्ति की स्वाधीनता -

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कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के लिए दुनिया के दूसरे छोर के लिए रवाना हो गए.
उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन वे अपने जीवन का सम्मानजनक अंत चाहते हैं. उनका कहना हैं कि उनकी आज़ादी छिन रही है और इसीलिए उन्होंने ये फ़ैसला लिया .
(लंबे वक्त तक चले विवाद के बाद, गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया के एक राज्य ने 'असिस्टेड डाइंग' को कानूनी मान्यता दे दी है. लेकिन इसके लिए किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार होना चाहिए.)
गुडऑल ने अपनी ज़िंदगी को ख़त्म करने का फ़ैसला एक घटना के बाद लिया. एक दिन वे अपने घर पर गिर गए और दो दिन तक किसी को नहीं दिखे. इसके बाद डॉक्टरों ने फ़ैसला किया कि उन्हें 24 घंटे की देखभाल की ज़रूरत है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना होगा.डॉ गुडऑल कहते हैं, "मेरे जैसे एक बूढ़े व्यक्ति को पूरे नागरिक अधिकार होने चाहिए जिसमें 'असिस्टेड डेथ' भी शामिल हो."
उन्होंने एबीसी को बताया, "अगर कोई व्यक्ति अपनी जान लेना चाहता है तो किसी दूसरी व्यक्ति को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."
उनके इस निर्णय पर विभिन्न मत हो सकते हैं लेकिन
औरों पर पूरी तरह निर्भर होकर एक लाचार शरीर के साथ जीना - अपनी अस्मिता का क्षरण होते देखते रहना - एक सचेत प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये इससे से बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती.
और सच्चे अर्थों में वह जीवंत कहाँ रहा - 'औरों के सहारे तो ज़नाज़े उठा करते हैं.'
मैं, तुम्हारे लिये शान्ति की कामना करती हूँ ,डॉ. गुडऑल, तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारा ऊर्जस्वित जीव , संपूर्ण मानवी गरिमा सहित अपने विश्रामगृह में निवास करे !
फिर पुनर्नवीन हो ,नवोर्जा और नये उत्साह के साथ लौट आना अपनी कर्मभूमि में, जहाँ मानव-जीवन की निरंतरता और उत्तरोत्तर पूर्णता, फलीभूत हो सके !
तुम्हें मेरा नत-मस्तक प्रणाम !
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शनिवार, 17 मार्च 2018

मैं अश्वत्थामा बोल रहा हूँ --



शप्त मानवता के  विषम व्रण माथे पर लिये मैं,अश्वत्थामा ,युगान्तरों से  भटक रहा हूँ .चिर-संगिनी है  वह अहर्निश वेदना जिसकी यंत्रणा से विकल ,मैं वहाँ से भागा था .कितना लंबा विरामहीन जीवन जी आया ,अनगिनती पीढ़ियों को  बनते-बिगड़ते देखा .कितने युगों का साक्षी  मेरा मौन अभी तक नहीं भंग हुआ. 
समर  बीता कहां है सत-असत् का युद्ध हर जगह चल रहा है- व्योम में ,जल में ,थल में .
दृष्टा नहीं बन पाता ,भोक्ता रहा हूँ जिसका ,जिसके बहते घाव लिये चिरकाल यही सब देखने को अभिशप्त हूँ उससे निर्लिप्त रहना कहाँ संभव? वह दारुण युग जाते-जाते गहरे अवसाद की छायायें छोड़ गया - हर जगह विषाद के घेरे ,कहीं प्रसन्नता नहीं .बहुत समय लगा मुझे संयत होने में . 
 बीतती शताब्दियों के बीच एकदम चुप , बहुत  कुछ है कहने को मेरे पास ,पर कैसे , किससे कहूँ.  किसे अवकाश है ,और कहाँ धीरज ?
 मेरे जीवन में विसंगतियों का अंत कहाँ ,जीवन भर का उपेक्षित मैं.हँसी आती है सोच कर कि जब गोकुल में दूध-दही की नदियाँ बह रहीं थीं एक गुण संपन्न सद्विप्र का पुत्र दूध के धोखे आटे का घोल पिला कर बहलाया जाता रहा था.  
  जनो में,निर्जनो में ,देश-विदेश के पहचाने-अजाने लोगों के बीच चलता-फिरता हूँ .हाँ ,पहचाने लोग भी  हैं ,सामान्य जन नहीं जानते तो क्या,मैं चीन्हता हूं जिनके साथ रहा हूँ.काल के दीर्घ अंतराल के बीच जनमते हैं ,एक दूसरे से अनजान -पर मैं पहचान लेता हूं,अश्वत्थामा हूँ न .जी चुका हूँ कृष्ण के साथ उन्हीं के युग में,भीष्म,कर्ण,दुर्योधन,युधिष्ठिर, पार्थ,द्रौपदी ,कुन्ती, जो आज सब से अतीत हैं ,मेरे समकालीन थे.  युग-युग की पीर भरी ,यात्रा करते युग पर युग बीतते चले गये पर मेरा जीवन नहीं बीता, मेरा मौन नहीं टूटा .
विस्तृत काल खण्डों में बिखरे ,अधिकांश लोग जन्म लेते हैं ,परस्पर मिलते भी हैं- अपना देन-लेन पूरा करना है अभी .पर हिसाब की बही में नये अध्याय जुड़ने लगते हैं .फिर छुटकारा कहाँ?सांसारिकता में ,अपने राग द्वेष में ऐसे डूब जाते हैं कि भान नहीं रहता किधर बहे जा रहे हैं .पहचानते नहीं एक-दूसरे को  लेकिन पिछले संस्कारों से प्रेरित परस्पर जुड़ते - टूटते रहते हैं..इसी जग-बीती का एक भाग मैं भी .

ओह, आज कह रहा हूँ, उत्तेजित मन अपने अस्थिर आवेश में उतावला हो  सारा सोच-विचार खो बैठा था ,मैंने भी यही किया था.
(क्रमशः)


सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सप्ता धाये का फल पावै --


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हिन्दी भाषा में परम्परा से चले आते कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका ,समय के प्रवाह और परिस्थितियों के फेर में , अपने पूर्व अर्थ से बहुत अपकर्ष हो चुका है.सामाजिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक अवमूल्यन के कारण शब्द भी अपनी व्यञ्जना शक्ति और प्रभावशीलता खो कर सामान्य और रूढ़ हो जाते हैं.
ऐसा ही एक प्रचलित शब्द है - सुहाग ,जिसका तात्पर्य अहिवात या विधवा न होना,  अर्थात् पति का जीवित होना, यही सुहाग के लिये पर्याप्त है.फिर एक नई व्यंजना सामने आई  -जिसको पिया चाहे वही सुहागिन .
मूल रूप में  -सुहाग एक शब्द -मात्र नहीं यह व्यापक अर्थ से परिपूर्ण एक व्यंजक पद है. एक सांस्कृतिक अवधारणा है जिसमें नारी के सर्वांग-संपूर्ण जीवन की परिकल्र्पना -समाई है.सफल-सुखी नारी-जीवन का बोधक है यह छोटा-सा शब्द, 
सुहाग की परिभाषा कर उसे किसी सीमा में बाँधना संभव नहीं, पीढ़ियों की मान्यताओँ और आचार-व्यवहार  से पोषित धारणाएँ  लोकमन पर गहरी पकड़ रखती हैं और सदियों के संस्कार-संचित ऐसे शब्दों की अनूभूति-प्रवणता मंद नहीं होती (फ़ालतू की बौद्धिक  कसरतों से उसमें अर्थ -अनर्थ की संभावना कर ले ,कोई तो बात दूसरी है.)इस प्रकार के शब्दों का किसी दूसरी  भाषा में उचित अनुवाद संभव नही होता , क्योंकि किसी भाषा के शब्द ,जिन  मूल्य-मानों को वहन करते हैं वह उसकी समाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है जिसे  दूसरी भाषाएँ स्वाभाविक रूप में ग्रहण और व्यक्त नहीं कर पाती .
इस शब्द का सही अर्थ समझने के लिये एक लोक-प्रचलित पद्यमय कथन 'आरी-बारी' दृष्टव्य है,जो स्त्रियाँ अपनी व्रत-पूजाओं में अक्षत-पुष्प हाथ में ले कर श्रद्धापूर्वक कहती- सुनती हैं . सुहाग की कामना करती कुमारी कन्या ,अपने भावी जीवन की परिकल्पना में देवी से कृपा-याचना करती है -
आरी-बारी -
' आरी-बारी ,सोने की दिवारी ,
तहाँ बैठी बिटिया कान-कुँवारी .
का धावै ,का मनावै ?
'सप्ता धावै,सप्ता मनावै .
सप्ता धाये का फल पावै ?
पलका पूत ,सेज भतार ,
अमिया तर मइको ,महुआ तर ससुरो .
डुलियन आवैं पलकियन जायँ .
भइया सँग आवें ,सइयाँ सँग जायँ .
चटका चौरो ,माँग बिजौरो ,
गौरा ईश्वर खेलैं सार .
बहुयें-बिटियाँ माँगें सुहाग-
सात देउर दौरानी ,सात भैया भौजाई,
पाँव भर बिछिया ,माँग भर सिंदुरा ,
पलना पूत, सेज भतार ,
कजरौटा सी बिटियां सिंधौरा सी बहुरियाँ ,
फल से पूत, नरियर से दमाद.
गइयन  की राँभन,घोड़न की हिनहिन .
देहरी भरी पनहियाँ ,कोने भर लठियाँ ,
अरगनी लँगुटियाँ
चेरी को चरकन ,
बहू को ठनगन
बाँदी की बरबराट,काँसे की झरझराट,
टारो डेली,बाढ़ो बेली,
वासदेव की बड़ी महतारी .
जनम-जनम जनि करो अकेली .'
मैं जानी बिटिया बारी-भोरी ,
चन मँगिहै ,चबेना मँगिहै ,
बेटी माँगो कुल को राज .
पायो भाग,
सप्ता# दियो सुहाग !
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(#सप्तमातृका) 
  सांसारिक जीवन में अपनी बहुमुखी भूमिका  निबाहती ,सुखी समृद्ध  गार्हस्थ्य  की धुरी के रूप में कल्याणमयी नारी का स्वरूप ही सुहाग की मूल अवधारणा है.
 - प्रतिभा सक्सेना.

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

श्रीकृष्ण चरित्र का यथार्थ : एक दृष्टि .


भारतीय जन-मानस में श्रीकृष्ण की छवि ईश्वर का पूर्णावतार होने के साथ परम रसिक नायक एवं प्रेम तथा करुणा के आगार के रूप में विद्यमान है .अपनी रुचि के अनुसार उसे इन दोनों के अलग-अलग अनुपातों में ढाल लिया जाता है.इन्हीं दोनों का गहरा आवरण उनके कठोर चुनौतियों भरे जीवन की वास्तविकताओं को गौण बना देता है .लेकिन गीता के गायक का व्यक्तित्व ,ठोस वास्तविकता से परिपूर्ण रहा है. 

      श्रीकृष्ण ने जिस धर्म की अनुशंसा की वह किसी परलोक के लिये नहीं , इसी लोक-जीवन के लिये आनन्द,शान्ति और कल्याण का विधान है,जो समाज और व्यक्ति के जीवन को सुन्दर संतुलित और सरस बनाने का संदेश दे कर संगति ,समता एवं सहिष्णुतामय  जीवन की अपेक्षा करता है. वे सच्चे कर्मयोगी थे, जिन्होंने जो स्वयं जिया उसी का उपदेश दिया.जन्म से लेकर परमधाम प्रस्थान तक उनका जीवन संघर्षो में बीता. जनहित के लिये विषम स्थितियों से निरंतर जूझे, सब के प्रति जवाबदेह बन कर स्वयं में नितान्त निस्पृह,निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
       लोक कल्याण के लिये जो अपना ही अतिक्रमण कर गया वह व्यक्ति श्रीकृष्ण हैं . अनीति और अन्याय के विरोध में ,अपना मनोरथ सिद्ध करने को , किसी के या स्वयं के वचन का बहाना नहीं लिया .विषम स्थितियों को किसी भी तरह सम बनाना, समाज और व्यक्ति के लिये जो संगत और हितकारी हो वही करने को प्रेरित किया . आगे का सारा भविष्य जिससे प्रदूषित हो जाये, जिसका निराकरण कभी न हो सके  उस स्थिति को टालने के लिये वे हर मूल्य पर तत्पर रहे.ऊपरी आदर्शों का आडंबर उन्होंने कभी नहीं पाला .उनका धर्म लोक-जीवन को सहज-स्वाभाविक एवं सुूखमय बनाने की परिकल्पना लेकर चला था, नृत्य-गान आदि कलाओं से जीवन पूर्ण और सरस हो जाये.वैयक्तिक विकृतियों का यही मानसिक उपचार बन जाए.
       मानसिकता के उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठित उनका अदम्य व्यक्तित्व मानव मात्र की मुक्ति का विधान कर गया . कंस के आतंक और षड्यंत्रों के बीच पल कर मानवता की रक्षा के लिये , प्रचलित मान्यताओं से विद्रोह की सीमा तक जा कर वे अन्याय एवं रूढ़ परिपाटियों का प्रतिकार करते रहे.
नारी को खाँचों की घुटन से निकाल कर ,उसकी मनुजोचित निजता और गरिमा को प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . पशुबल से पराभूत की गई स्त्री को कलंकित मान कर त्याग देने की समाज-प्रचलित मानसिकता के निराकरण हेतु भौमासुर द्वारा अपहृता सोलह हज़ार नारियों को बंदी जीवन से मुक्त ही नहीं कराया उन्हें ,तिरस्कार से बचाने के लिये उनसे स्वयं विवाह करने का साहसिक कदम उठा कर , सामाजिक स्वीकृति और सम्मान प्रदान किया. नारी-पुरुष संबंधों का चिर-विवादित समाधान उनके संतुलित एवं उन्नयनकारी मैत्री-भाव में प्रतिफलित हुआ .
        मेरे मन में एक बात बार-बार आती है - अर्द्धांगिनी सहित छत्र-छँवर धारे, सिंहासनासीन ,बंधु-बाँधवों से सेवित प्रभुतासंपन्न भूपति के रूप में श्रीकृष्ण का चित्र मैंने कहीं नहीं देखा .देखा तो चक्र लेकर दौड़ते हुये ,रथ संचालित करते , गीता का उपदेश देते और देखा है ग्रामों के सहज-सरल परिवेश के बीच, गोप परिवार के चपल बालक की कौतुक-क्रीड़ाओं वाली चर्या की झाँकियों में . श्रीकृष्ण का लोक-रंजक किन्तु अदम्य  कभी रूढ़ प्रतिमानों में नहीं बँधा    -जूठन खाई,अपने ,पीतांबर में पांचाली के पदत्राण समेटे , युद्ध छोड़ भागे , स्वयं अपनी प्रतिज्ञा भंग करने में संकोच नहीं किया,मित्र से बहन का अपहरण करा दिया,हँसकर वंशनाश का शाप सिर धर लिया, अपने हित-साधन हेतु नहीं ,अनर्थों के निवारण के लिये अनिष्टों के निस्तारण के लिये . सबके कल्याण के लिये जो अपने ,यश-अपयश,सुख-दुख , हानि-लाभ से निस्पृह रहा हो , वही उच्चाशयी , श्रीकृष्ण के समान स्वयं अपना अतिक्रमण करने में समर्थ एवं सिद्ध-मति हो सकता है .
          अब थोड़ी चर्चा उनकी सखी ,मनस्विनी पांचाली के संदर्भ में  .इस नारी की प्रखरता और विदग्धता से हत पुरुषवर्ग कितने रूपों में उस के विखंडन का, उसके गौरव को क्षीण करने का प्रयास करता है ,उसे अपमानित करने और नीचा दिखाने से कभी चूकता नहीं और विषम समय में सिद्धान्तों की आड़ ले कर स्वजन और गुरुजन भी किनारा कर जाते हैं .तब पग-पग पर विशृंखलमना होती है पांचाली ,पर समेटती है अपने आप को .कैसा कड़वा सच है कि अपने कर्तव्य पूर्ण करने के लिये , अपने दायित्व -निर्वहन के लिये नारी को स्वयं के प्रति कितना निर्मम होना पड़ता है , प्रत्यक्ष उदाहरण है वह .

               लेकिन कृष्ण जैसा सखा है उसके साथ - क्षीण होता मनोबल साधने को ,विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्तव्य-पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी .तुम उन सबसे बीस ही रहोगी क्योंकि तुम्हारी बुद्धि बँधी नही है ,विवेक जाग्रत है ,निस्स्वार्थ भावनायें और निर्द्वंद्व मन है . पांचाली के विषम जीवन की सांत्वना बने कृष्ण उसे प्रेरित करते हुए आश्वस्त करते हैं कि दुख और मनस्ताप कितना ही झेलना पड़े ,अंततः गरिमा और यश की भागिनी तुम होगी.और कृष्ण-सखी के जीवन में कृष्ण के महार्घ शब्द अपनी संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ चरितार्थ होते हैं.
              मित्र के रूप में एक जीवन्त प्रेरणा बराबर उसके साथ रही जो प्रत्यक्ष कर गई कि विरोधी परिस्थितियों की निरंतरता में भी असंपृक्त रह कर किस प्रकार व्यक्ति अपने निजत्व को अक्षुण्ण रख सकता है .
जाने कितने जन्मों के पुण्य जागते हैं तब ऐसे व्यक्ति का सान्निध्य मिल पाता है जिससे जीवन कृतार्थ हो जाये .विपदाओँ से उबारने में सदा सहयोगी, सामाजिक विषमताओं को अपने नीति-कौशल से सम की ओर ले जाने वाला निष्काम कर्म-योगी कृष्ण और बिडंबनाओं से निरंतर जूझती तेजस्विनी पांचाली की मित्रता एक उदाहरण है आज के देहधर्मी नर-नारियों के लिये कि संसार में बहुत-कुछ ऐसा है जिसकी अवधारणा ,मानसिकता के उच्चतर स्तरों पर प्रतिष्ठित कर जीवन को श्रेष्ठतर बना कर सांसारिक व्यवहार का मूल-मंत्र बनी रहे . गिरावट और आक्रामक होती कामनाओँ से ग्रस्त आज की मनुष्यता को उबारने के लिये इससे बड़ा अवदान और क्या हो सकता है!
- प्रतिभा सक्सेना.

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डॉ शकुन्तला बहादुर के शब्दों में -

 नर-नारी के संबंध सदा से विविध रूपों में सामने आते रहे हैं .पारस्परिक संबंधों का जो  उज्ज्वल  रूप यहाँ चित्रित है वह बिंब-प्रतिबिंबवत् एक दूसरे की मनोभावनाओं को निरूपित करते हुये पारस्परिक प्रेरणा का स्रोत बनता है .देह के आकर्षण से परे दोनों की आत्मीयता जिस विश्वास पर आधारित है वह  सारे संबंधों को पीछे छोड़   मानव-जीवन के उच्चतर मान स्थापित करती है.पूर्ण  आश्वस्ति और गहन निष्ठा से पूर्ण यह मैत्री जिसे मिल सके सचमुच उसका जीवन धन्य हो जाता है . ऐसे ही घटनाक्रम की  मर्मकथा है -पूर्णावतार श्रीकृष्ण और याज्ञसेनी पांचाली की मैत्री को आधार बना कर लिखा गया  यह उपन्यास- कृष्ण-सखी .
- डॉ. शकु्न्तला बहादुर.


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

कृष्ण सखी - एक प्रतिक्रया

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डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक ऐसा नाम है जिनके नाम से जुड़े हैं उत्कृष्ट खण्ड-काव्य, लोक गीत, हास्य-व्यंग्य, निबंध, नाटक और जुड़ी हैं कहानियाँ, कविताएँ तथा बहुत सारी ब्लॉग रचनाएँ. विदेश में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य की सेवा वर्षों से कर रही हैं. बल्कि यह कहना उचित होगा कि चुपचाप सेवा कर रही हैं. सीमित पाठकवर्ग के मध्य उनकी रचनाएँ अपना एक विशिष्ट स्थान रखती हैं. इनकी प्रत्येक रचना उत्कृष्टता का एक दुर्लभ उदाहरण है और भाषा वर्त्तमान में लुप्त हो चुकी है. “कृष्ण-सखी” डॉ. प्रतिभा सक्सेना का नवीनतम उपन्यास है, जिसकी प्रतीक्षा कई वर्षों से थी.
विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आया है कि पौराणिक उपन्यासों के प्रकाशन की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. इनमें से कुछ उपन्यास/ ग्रंथ पौराणिक पात्रों और घटनाओं को लेकर काल्पनिक कथाओं के आधार पर लिखे गये हैं तथा कुछ उन घटनाओं की अन्य दृष्टिकोण से व्याख्या करते हैं. यह सभी उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुए. किंतु ध्यान देने की बात यह है कि सभी उपन्यास मूलत: अंग्रेज़ी में लिखे गये तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उनका हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित किया गया, जो अंग्रेज़ी पाठक-वर्ग से इतर अपना स्थान बनाने में सफल हुआ.
कथानक
“कृष्ण सखी”, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कृष्ण और उनकी सखी मनस्विनी द्रौपदी के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालता है. उपन्यास की कथा मूलत: महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ “महाभारत” की कथा है. किंतु इसमें महाभारत की उन्हीं घटनाओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है जहाँ कृष्ण अथवा द्रौपदी की उपस्थिति है. अन्य घटनाओं का विवरण सन्दर्भ के रूप में अथवा उस रूप में उल्लिखित है, जिस रूप में वह घटना इनकी चारित्रिक विशेषताओं को रेखांकित करती है. मत्स्य-बेध, पाँच पतियों के मध्य विभाजन, वन गमन, सपत्नियों व उनकी संतानों का उल्लेख, कर्ण के प्रति मन में उठते विचार व द्विधाएँ, चीर हरण, कुरुक्षेत्र का महासमर, भीष्म से प्रश्न, पुत्रों की हत्या और अंतत: हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं के मध्य हिम समाधि... यह समस्त घटनाक्रम पांचाली के सन्दर्भ में तथा कारागार में जन्म, मातुल द्वारा वध किये जाने की आशंका में भगिनी के जीवन के दाँव पर जीवन दान पाना, राधा तथा अन्य गोपियों के साथ रास रचाना, फिर उन्हें छोड़कर द्वारका प्रस्थान करना, सखा अर्जुन को प्रेरित कर निज बहिन का अपहरण करवाना, युद्ध में सारथि तथा एक कुशल रणनीतिज्ञ की भूमिका निभाना, गान्धारी का शाप स्वीकार करना, अश्वत्थामा को शापित करना तथा एक वधिक के वाण द्वारा मृत्यु को प्राप्त होना जैसी घटनाएँ कृष्ण के सन्दर्भ में प्रस्तुत की गयी हैं.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
अंत में:
उपन्यास का कलेवर आजकल जिस प्रकार के उपन्यास बाज़ार में उपलब्ध है उसके समकक्ष रखने का प्रयास प्रकाशक “शिवना प्रकाशन” द्वारा किया गया है. आवरण चित्र मनस्विनी द्रौपदी को पारम्परिक रूप में दर्शाता है, जबकि उपन्यास की माँग उसके सर्वथा विपरीत है. चित्रकार द्रौपदी की विशेषताओं से नितान्त अनभिज्ञ है, उसकी विपुल केश-राशि के स्थान पर दो-चार लटें दिखा कर दीनता में और वृद्धि कर दी है, केशों से आच्छादित हो कर वह अधिक गरिमामयी और वास्तविक लगती . ग्राफिक्स की मदद कम ली गई है जिसके   आवरण थोड़ा फीका दिखता है.
पौने तीन सौ पृष्ठों के इस उपन्यास का मूल्य रु.३७५.०० हैं, जो बाज़ार के हिसाब से अधिक है. मैंने इस उपन्यास की मूल पांडुलिपि पढ़ी है, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ की प्रकाशक ने पुस्तक “प्रकाशित” नहीं की है बल्कि “छाप दी है”. क्योंकि अनुमानतः ९०% पृष्ठों में वाक्य एक पंक्ति में बिना विराम चिह्न के समाप्त होता है तथा दूसरी पंक्ति में विराम चिह्न से आरम्भ होता है. टंकण की त्रुटियाँ जैसी पांडुलिपि में थीं हू-ब-हू उपन्यास में भी देखी जा सकती हैं. संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रूफ-रीडिंग की ही नहीं गई है.
उपन्यास में सबसे निराश करने वाली बात यह है कि रचनाकार की ओर से कोई वक्तव्य नहीं है – यथा उपन्यास की रचना प्रक्रिया, रचना के सृजन का मुख्य उद्देश्य, पाठकों के नाम सन्देश, आभार आदि. लेखिका की ओर से यह पुस्तक कृष्ण भगवान को समर्पित है. पुस्तक के प्रारम्भ में उपन्यासकार का परिचय या भूमिका या किसी अन्य साहित्यकार, मित्र अथवा सहयोगी द्वारा नहीं दिया गया है.
आजकल जितने भी उपन्यास “बेस्ट सेलर” की श्रेणी में आते हैं, उनसे यह उपन्यास कहीं भी उन्नीस नहीं है, लेकिन अप्रवासी लेखक के लिये एक प्रबंधन टीम द्वारा पुस्तक का विज्ञापन अथवा मार्केटिंग करना संभव नहीं, इसलिए यह उपन्यास, उपन्यास न होकर एक शृंखलाबद्ध ब्लॉग पोस्ट का पुस्तक संस्करण भर होकर न रह जाए इसका दुःख होगा मुझे व्यक्तिगत रूप से.
- सलिल वर्मा.
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