गुरुवार, 26 मार्च 2015

कोख का करार - तीन किस्तों में समाप्य (कहानी).

*
'बहुत भटक लिये अब जाकर हमारी खोज पूरी हुई .'
 हैरिस ने अपने मन की बात मोनिका की ओर देखते हुए कह दी, फिर पुष्टि के लिए पत्नी की ओर देखने लगे  .
'बड़ी मुश्किल से हमें मन पसंद  महिला मिली हैं . अब हमें और कहीं नहीं खोजना . हमें पूरा इत्मीनान हो गया  कि हमारे आनेवाले बच्चे को बहुत सुसंस्कृत माँ मिल रही है .'
मोनिका एकदम चुप ,सिर झुकाए सोच में लीन .
'आप तैयार तो हैं न ? .
उसने   सिर उठाया बोली, ' इतनी जल्दी मत कीजिये . थोड़ा समय  दीजिये मुझे. हड़बड़ी में हाँ कर लेना बड़ा मुश्किल लग रहा है. '
'आप करेंगी तो न ?' पत्नी की आवाज़ में कुछ गिड़गिड़ाहट उतर आई थी,' देखिये न ,हमारी मजबूरी है और आपको भी ज़रूरत है  .समय कभी एक सा नहीं रहता ..आज हम दोनों एक दूसरे का आसरा बन गए हैं..आप सोच-विचार कर देख लीजिये ... '
हैरिस ने पत्नी को समझाया
' जब हमारे पास वे ख़ुद आईं हैं ..,तुम बेकार शंका कर रही हो, जूली .'
मोनिका दोनों हाथों की अँगुलियाँ एक दूसरी में फँसाए हिलाए जा रही है .उत्तर कोई नहीं
जूली  चुप न रह सकी
' हमारी लाचारी है कि सब कुछ ठीक होते हुए भी रही  हम संतान नहीं पा सके. तभी ज़रूरत पड़ी ऐसी महिला की जो हमारे बच्चे को अपनी कोख में धर सके .आप ने रुचि दिखाई ,हमसे संपर्क किया .बहुत अच्छा किया. अब हमारी तरफ़ से 'हाँ' है तो आप किस सोच में पड़ी हैं.'
'मेरे लिए करने को कुछ बचा ही कहाँ  है .फिर भी कुछ ऊँच-नीच सोचे बिना ..'.
'बात पैसे की है ?
'सिर्फ़ पैसे की नहीं .तमाम बातें आती हैं मन में ... '
जूली लाचार- सी , पर चुप भी न रह सकी,
'...यों तो बहुत तैयार हो रही थीं पर . हम नहीं चाहते कोई गिरी हुई मानसिकता वाली हमारी संतान धारण करे .मन पुसाय तो पैसा इतनी बड़ी बात नहीं है .माँ के संस्कार संतान में  आय़ेंगे ही. इस बीच तरह-तरह की औरतों से वास्ता पड़ा .दिखाती कुछ हैं पर अस्लियत कुछ और होती है  सिगरेट पीना ,ड्रिंक करना और भी जाने क्या-क्या . .एक झूठ पकड़ में आ जाये तो मन हट जाता है .आपको देख कर हमें पूरा संतोष होगया है .'
'इतना विचित्र ,इतना बड़ा !काम थोड़ा समय तो दाजिये  ..मन को पूरी तरह तैयार कर लूँ पहले .'
कुछ देर कोई कुछ न बोल पाया.
 'आप पर अचानक जो आ पड़ी  सुन कर बहुत दुख है , हम मजबूरी का लाभ नहीं उठाना चाहते ... आपसे पूरी सहानुभूति है. खातिर जमा रखिये  हमसे आपको कोई शिकायत नहीं होगी .आपको कैसा लगता होगा समझ रहे हैं हम .बस विश्वास ही दिला सकते हैं कि आपको निराश  नहीं होना पड़ेगा.हम भी  इज्ज़तदार लोग हैं ,अच्छे परिवार के .' 
पति के कथन पर जूली  समर्थन की मुद्रा में .
मोनिका की समझ में नहीं आ रहा क्या कहे .
  ' मैं क्या कहूँ आपसे .मेरे भीतर क्या-क्या चलता है कौन समझेगा ..  माता-पिता के एक्सीडेंट की खबर मिली तो अपनी सहेली के घर पर थी.....' भावावेग में वाणी कुछ क्षणों को रुँध गई , ' उसी के माता-पिता ने साधा-सहेजा , मेरे तो पैसा भी नहीं गाँठ में कि आगे की ज़िन्दगी के बारे में सोच पाऊँ, इतना समय हो गया  सहेली के मात-पिता ने बहुत सहारा दिया. पर हर बात की एक हद होती है. '

'हमें सब पता है आप पर अचानक आ पड़ी विपदा और आपका यों अकेले रह जाना ..पर बहुत हिम्मत की आपने इतने धीरज  से काम लिया  ....'
'विषम काल में बुद्धि ही रास्ता दिखाती है कोई उपाय तो अपनाना पड़ता है .जब हम दोनों के टर्म्स स्पष्ट हैं कहीं किसी धोखे की गुंजाइश नहीं . और कोई गलत काम नहीं कर रहे .कोई डर नहीं सब साफ़ है ,'हैरिस ने फिर अपनी बात रख दी.'
'डर किसी का नहीं....पर पहले अपना मन पक्का कर लूँ .'
'ठीक है हम एक हफ़्ते और इंतज़ार कर लेंगे  .
' वैसे  हम समझ रहे हैं आपकी उलझन .शादी भी नहीं हुई आपकी .माँ बनने की बात बड़ी अटपटी लगती  होगी .घबराहट  लगेगी ही.  हम अपनी तरफ़ से हर कोशिश करेंगे कि कोई बाहरी परेशानी न हो आपको .
नई जगह रहने का सारा प्रबंध, जहाँ कोई जानता नहीं हो और उस सारे व्यय का जिम्मा हमारा .आपके  हिस्से पर  कोई आँच नहीं आयेगी.  यह तो नई जगह है  नये लोग ,फिर आजकल किसे इतनी फ़ुर्सत है. इन फ़्लैटों के कल्चर में जिसे  जो बता दें वही ठीक .नौ-दस महीने गुज़रते क्या देर लगती है.'
'आप  अपना समय लीजिये ,तनाव में मत रहिये ,शान्ति से विचार कीजिये.'
 'अभी चलती हूँ ,' वह उठने लगी.
हमलोग उधर ही जा रहे हैं आप को छोड़ते चले जायेंगे .

*
'ज़रा समझने की कोशिश करो जूली .थोड़ी सबूरी रखो  , एक तो कँवारी लड़की  बहुत उमर भी नहीं है अभी,..24-26 से ऊपर नहीं लगती?'
'हद से हद 25 या छब्बीस ,इससे आगे नहीं .'

'अचानक मुसीबत पड़ गई .कोई  अपना सगा नहीं .बिलकुल अकेली रह गई  .अभी कुछ ही महीने हुए हैं .'
 जूली सहमत है ,' रिश्तेदारों से परेशान हो गई .मुझसे काफ़ी खुल कर बात करती रही . बता रही थी ,एकाध तो उसे अपने हिसाब से पटाने चक्कर में थे.'
 'फुसलानेवालों की कोई कमी है क्या ?' हैरिस ने स्वीकार किया ,यहाँ भारत में हालात और भी अजीब हैं .
पर बड़ी हिम्मतवाली है '
'क्या करे जब सिर पर पड़ती है तो झेले बिना छुटकारा कहाँ ?'
लाचार देख कर सब फ़ायदा उठाना चाहते हैं .पैसे के बिना दुनिया में कहीं गुज़र नहीं. काम तलाश रही  है -टाइम तो लगेगा.
'एयर लाइन से मुआवज़ा मिलेगा उसे.बात चल रही है  पर पता नहीं कित्ते पापड़ बेलने पड़ें खर्चा ही खर्चा हर कदम पर ..'.
'अब ये न हाथ से निकल जाय किसी तरह सधी रहे .पैसे का मुँह देखने का समय नहीं. कैसे भी यह काम हो जाय,' जूली की अपनी चिन्ता व्यक्त हो गई.
'बेचारी ! '
'हाँ ,तरस तो आता है.आज को माँ-बाप होते तो काहे को ...' एक उसाँस ली  जूली ने ,'लेकिन कोई  कर क्या सकता है ?

'अमेरिका में पली बढ़ी है इसलिए इतना सोच भी सकी .,वो यहाँ रहेगी भी नहीं . कह रही थी इतनी बंदिशें हैं .अपने ढंग से रह नहीं सकती ,निश्चिंत हो कर काम कर सकती नहीं .कहीं आने-जाने में डर और सबसे बड़ी बात  इज्ज़तदार कमाई का कोई रास्ता नहीं मिल रहा.'
'बेबस जान कर लोग गिद्ध की तरह घेरने चले आते हैं.वह  किसी का एहसान नहीं लेना चाहती सहायता करने वालों की असलियत जानती है  ....लड़की  दीन-हीन बन कर रहना नहीं चाहती ..अपने दम पर जीना चाहती है .'
मुझसे तो  काफ़ी बातें हुईँ कह रही थी - मजबूरी में यह कदम उठा रही हूँ.'
मैंने  समझाया कोई पाप नहीं कर रही हो  ,किसी को धोखा नहीं दे रही हो .अपनी ग़ैरत का सौदा नहीं है यह .सम्मान से जीने की सुविधा बहुत ज़रूरी है  तुम्हारे लिए.'
'उसे घबराहट होती है ,ज़रूर होती होगी .थोड़ा समय तो लेगी ही.'

हैरिस ने अपने ढंग से जान कारी  इकट्ठी कर ली थी पर सहज व्यवहार हेतु  लड़की से भी  पूछना-बताना होता रहा
 ,' आपके संबंधी  रिश्तेदार वग़ैरा कोई ,,,?'
'रिश्तेदार ?नहीं जानती और कोई है कि नहीं पता भी नहीं है  .उस एक्सीडेंट के बाद कोई सामने नहीं आया .जो आए वे अपने मतलब से...आगे बोलते उसका गला भरभरा आया ,कुछ देर को चुप हो गई.
रहने दीजिये .. हर बात जानना ज़रूरी भी नहीं.'
'ऐसा कुछ नहीं ..कि बता न सकूँ..
 ...मेरे माता-पिता ? उनकी लव मेरिज थी पिता क्रिश्चियन थे माँ हिन्दू .वहीं पली  पली-बढ़ी थीं . पिता काम से लग गये थे ,माँ  पढ़ रहीं थीं ,माँ  के घरवाले तैयार नहीं थे अपने लोगों में ब्याहना चाहते थे ,इन लोगों ने कोर्ट मैरिज कर ली ,पिता का परिवार से  खास जुड़ाव नहीं रहा था,बाद में आना-जाना होने लगा  .रिश्तेदारों की बातें होतीं थीं कभी-कभी, पर कभी किसी से व्यवहार नहीं रहा .बस यों ही सब कुछ अच्छा चल रहा था .मेरी पढ़ाई पूरी होनेवाली थी. मीना मेरी अच्छी दोस्त है, तीन साल से हम साथ हैं .छुट्टियों में कई बार मेरे घर रही है. अबकी से मुझे साथ ले आई कि चलो भारत घुमा लाऊँ . मुझे भी माँ से सुन-सुन कर यहाँ आने का चाव जगा था .उस के साथ कुछ दिन को आई थी .. बस हफ्ते भर बाद प्लेन दुर्घटना में ...आगे आपके मालूम ही है..' कहते-कहते वह रो पड़ी .
' ..हे भगवान् !किसी पर ऐसा दुख न पड़े..!'
*
...'और आप लोग,' मोनिका ने पूछा था ,मूल निवास कहाँ का रहा ?
'हैं तो यहीं के .पर दो पीढ़ी पहले बाबा कनाडा जा बसे थे .वहीं अपना बिज़नेस जमा लिया .
और सुनिये नाम हरीश  था ,सो हैरिस हो गया ' .
मुस्कराहट दौड़ गई दोनों के मुख पर .लोग हमें फ़ारेनर समझ लेते हैं अच्छा है हमारे मामलों में  दखल नहीं देते
'वही समझ कर तो मैं भी, मैं भी .. .तभी आपका प्रपोज़ल जान कर  चली आई.'
'यहाँ कुछ रिश्तेदारी है अभी ,और यहाँ सरोगेसी में आसानी है फिर ये कि वो  यहाँ रहेगी हम वहाँ . तो आगे कभी मिलने-जुलने का सवाल नहीं उठेगा.'
'खर्चा भी कम होता होगा यहाँ?'
'हाँ, ये बात भी है.अच्छी तकनीक उपलब्ध है और लागत भी अपेक्षाकृत कम .'

मोनिका फिर अपनी सुनाने लगी -
'यहाँ लोगों को हर बात से मतलब रहता है -शादी,माँ-बाप ,कहाँ जाना -हे भगवान !क्या करती हो ?अरे ट्रेन में बैठे -बैठे तक पूछ लेते हैं.पहले तो हँसी आती थी पर अब  चिढ़ छूटती है . इतनी-पूछा-बताई कि आराम से जीना मुश्किल ..'
'जानती हूँ यहाँ का हाल सारा, शिजरा पलटने पर तुल जाते हैं लोग..'
'मैं स्टेट्स में पली-बढ़ी यहाँ जैसी नहीं रहती न . वे समझ लेते हैं चालू लड़की है .'

  'मैं वहीं लौट जाना चाहती हूँ.यहाँ रहना मेरे बस का नहीं. इन हालतों में और भी मुश्किल .बस ज़रा हाथ मज़बूत हो जायें इसीलिये तो...ये सब .'
' बिलकुल सही ,इस काम के बाद आप आराम से जा सकती हैं.तब तक समझ लीजिये हमारी गार्डियनशिप.. '
' थोड़ा समय दीजिये ,विचार करने को .मुझे भी सोचना होगा कैसे क्या करूँ .इतना बड़ा काम ,इतना विचित्र .अच्छी तरह सोच-समझ लूँ पहले .
साधारण सौदा नहीं है, मैं ईमानदारी से करना चाहती हूँ  .एक नया जीवन रचना है . केवल तन से नहीं पूरे मन से और निष्ठा से .'
' हम समझ रहे हैं आपको .तभी आप पर विश्वास जम गया है ...'
' पैसे की बहुत ज़रूरत है तभी तो ..'
आपकी मुश्किलें सच में  बहुत भारी हैं नहीं तो यों साहस भरा कदम उठाना क्या कोई आसान काम है!'
जूली चुप न रह सकी ,'  पर आप तैयार तो हैं न  ?'
सिर झुकाए सोचती रही वह,' और कोई उपाय नहीं .. बस,ज़रा मन को साध लूँ ..'

जिस दिन आप की 'हाँ' होगी सात लाख घर पहुँच जायेंगे .बाद में पूरा काम होने पर हाथ के हाथ भुगतान ..आप डालर में चाहें तो.. जैसा आप कहें....'
मोनिका ने सिर हिला दिया
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11 टिप्‍पणियां:

  1. सरोगेसी का नाम भर सुना था, सचमुच कितना कठिन होता होगा किसी औरत के लिए किसी दूसरे की सन्तान को जन्म देना..मजबूरी ही उसे इस कार्य के लिए प्रेरित करती होगी...या शायद कभी त्याग की भावना...

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  2. नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-03-2015) को "जहां पेड़ है वहाँ घर है" {चर्चा - 1931} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. kahani baandh rahi hai ..vishay hee kuchh aisa hai..mujhe ab jaldi hee agli kisht padhni hai.

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  4. आधुनिकता और परंपरा का संघर्ष ......!

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  5. behad vicharniy mudde ko kahani ke roop me dhala hai aapne aur bahut hi sahajta se .aabhar .रामनवमी की शुभकामनायें।

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  6. माँ! यह विषय मेरे दिल के सदा करीब रहा है. जितना सेंसिटिव विषय है, उतने ही साज-सम्भाल से कोई इस विषय को छुए यही सोचकर टालता रहा. सच कहूँ तो पिछले बीस सालों से इस विषय को दिमाग़ में लिये घूम रहा हूँ.
    बीच में गुलज़ार साहब की पुत्री मेघना की पहली फ़िल्म "फ़िलहाल" आयी, जिसने सरोगेसी के मुद्दे पर एक बहुत ही सुन्दर फ़िल्म बनाई, तो दिल को तसल्ली हुई. और आज माँ की कहानी पढने को मिल रही है.
    तीन अंकों में समाप्त होने वाली इस कथा का पहला अंश कथा के चरित्रों को स्थापित करता है और पाठकों से परिचय करवाता है. एक नहीं बन सकी माँ का उतावलापन, एक पुरुष का संतुलन और एक सरोगेट माँ होने जा रही युवती का संकोच... सब साफ-साफ दिख रहा है. आगे की कहानी के लिये मोनिका की तरह "दोनों हाथों की उंगलियाँ फँसाए" घुमाए जा रहे हैं हम लोग!
    आशा करता हूँ कि आगे की कड़ियों में तीनों का मनोविज्ञान समझने का अवसर मिलेगा!
    प्रणाम माँ!!

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  7. कहानी की तीसरी क़िस्त के लिए प्रतीक्षा अत्यंत कठिन लग रही है। न जाने कब मैं आपकी तरह भावपूर्ण बांध कर रखने वाले साहित्य की रचना कर पाऊँगी। शायद 7 जन्म लग जाएँ। आपको पढ़ पाना मेरा सौभाग्य है।आपके लेखन में सब कुछ होता है विषय का ज्ञान उसकी गहराई शब्द रत्न और उनका अत्यंत सुन्दर वर्णन।जानती हूँ आपका समय अमूल्य है फिर भी विनती है एक बार dj के ब्लॉग्स एक लेखनी मेरी भी और नारी का नारी को नारी के लिए तक जाने और मेरी रचनाओं का अवलोकन करने की राह भी तय करलें।ब्लॉग जगत में नए नए कदम रखने वाले हम जैसे तथाकथित लेखकों को आपके मार्गदर्शन की परम आवश्यकता है।
    http://lekhaniblog.blogspot.in/ एक लेखनी मेरी भी
    http://lekhaniblogdj.blogspot.in/ नारी का नारी को नारी के लिए
    इस राह के बाद की मंज़िल में काँटे मिले या गुलाब निःसंकोच मार्गदर्शन अपेक्षित है । धन्यवाद

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  8. शकुन्तला बहादुर30 मार्च 2015 को 6:02 pm

    अपनी सभी पूर्व रचनाओं से हट कर प्रतिभा जी ने अत्यन्त संवेदनशील विषय का चयन किया है , जिसकी चर्चा वर्तमान समय में सर्वत्र सुनने को मिल जाती है । संतान के लिये तरसती माँ की ममता , पिता बनने की लालसा लिये हैरिस और सरोगेसी के लिये स्वयं की भावनाओं को टटोलती मोनिका का मनोवैज्ञानिक चित्रण ,तीनों पात्रों की भाव-भंगिमा का चित्र सा प्रस्तुत करता कथा का प्रथम भाग मन में उत्सुकता के साथ ही कौतूहल जगाता है । अगले भाग की प्रतीक्षा है ।

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