शनिवार, 28 मार्च 2015

कोख का करार - 2 .


'नमस्कार डॉ.साहब, ये मेरी पत्नी जूली और ये मोनिका जी , संबंधी हैं हमारी  सहायता को तैयार हैं. '
कहते हुये हैरिस दोनों महिलाओं की ओर उन्मुख हुए,' ये डॉ.अमर. इस काम में यहाँ के माने हुए डाक्टर . '
आगे बढ़ आये डॉ.अमर अपने साथी को लक्ष्य कर बोले ,
 ' डॉ. मानस हमारे सहयोगी - सलाह के लिए इन्हें भी साथ  ले आया हूँ.'
औपचारिकताये पूरी कर काम की बातें शुरू हुईं.
पहला सवाल - 'कैसी सरोगेसी चाहिये ? '
इस बारे में सुनी-सनाई  के अलावा किसी को खास पता हो तो बोले.
हैरिस को विस्मय हुआ , 'वो भी क्या कई तरह की होती है ?
मोनिका को बड़ा अटपटा लग रहा है .
' तो समझ लीजिये. नंबर एक ,' दायें हाथ की तर्जनी बायाँ हाथ उठा कर उसकी तर्जनी पर रखे रहे ,' ट्रेडिशनल सरोगेसी - होनेवाले बच्चे का जैविक संबंध  सिर्फ पिता से . उसके शुक्राणु अन्य महिला के अंडाणुओं के साथ निषेचित किये जाते हैं.'
' दूसरी.' दो की गिनती में मध्यमा पर धर दी ,'जेस्‍टेशनल सरोगेसी में  माता-पिता दोनों से संबंध .पहले उन दोनों के अंडाणु व शुक्राणु का मेल परखनली  में कर , निषेचित भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्‍चेदानी में रोप दिया जाता है.
जूली एकदम बोली ,'दूसरावाला. जिसमें दोनों से संबंध हो .'
'ठीक कह रही हैं ' हैरिस ने समर्थन किया .
 मोनिका को चुप देख डॉक्टर ने उसे संबोधित किया,
'हम पहले ही बता देना चाहते हैं मोनिका जी, आपको खास तौर से .क्यों कि आपका रोल बड़ा लंबा चलेगा .'
धीरे से सिर हिला - हाँ ही कही होगी .
जूली और हैरिस ने बीच-बीच में कुछ पूछा ,मोनिका सुनती रही .
डॉक्टर के  'आप भी अपने सवाल पूछ लीजिये ' का उत्तर ,'मैंने इस बारे में काफ़ी पढ़़ लिया है ..'
'वेरी सेंसिबिल.. ' मानस ने  प्रशंसाभरी दृष्टि से मोनिका पर डाली, हैरिस से कहा, 'यू आर सो लकी '
'दैट्स ट्रू.'
'जब परखनली में निषेचन हो जायेगा तो स्थापित करने के लिए आपका गर्भाशय तैयार रखना होगा.'
सिर झुकाए सुनती रही चुपचाप.
'उसके लिए आपका ओवुलेशन रोकना होगा .शिशु के जन्म तक .
'ओह ' अनायास मुँह से निकला .
मोनिका के  फक् पड़ गए चेहरे को देख कर बोले,' यह रोक उतनी पूरी अवधि के लिये .फिर आप सामान्य हो जायेंगी .'
उसने फिर भी कुछ नहीं कहा.
 डॉ.अमर उधर ही उन्मुख रहे -
' डरिये मत. यहाँ तो कुछ महिलायें तीन-तीन बार सरोगेसी कर चुकी है..
 आपके विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा.बाद में सब सामान्य हो जायेगा .'
'उस सब की चिन्ता नहीं मुझे, विवाह करना ही नहीं है' - स्वर एकदम ठंडा.
 जूली बोल उठी, ' क्यों, ऐसा क्यों?'
'उस सब से वितृष्णा हो गई है .'
सबकी दृष्टि उधर उठ गई .
हैरिस उसके बचाव में बोले ,'अभी बहुत बड़े हादसे से गुजरी हैं और गुज़री भी कहाँ गुज़र रही हैं .'
संक्षेप में बता दिया सबको .
' प्लीज़ ,वो सब मत कहिये बार-बार . .'
डॉ.मानस से चुप नहीं रहा गया ,'
'क्या-क्या घटता है जीवन में लोगों को क्या पता !'
उसने सिर उठा कर , डॉ. मानस को देखा ,वे गंभीर हो गये थे.
डॉ. अमर फिर अपनी बात पर आ गए, 'हमारे ग्रुप में लेडी डॉ. रम्या बोस हैं .मनोविज्ञान से भी जुड़ी हैं .आगे उनसे काम पड़ेगा .
कई तरह के चिकित्सकीय तथा सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से गुज़रना पड़ेगा.
आज आप लोग बाकी फ़ार्मेलिटीज़ पूरी कर लीजिये. कल से तैयार हैं आप ?'
' शुभस्य शीघ्रम् ,'जूली की तत्परता मुखर हो गई !

मोनिका चुप बैठी बाहर देखती रही .
*
दो महीने निकल गये ,.
तीसरा भी जा रहा है
शुरुआत ही न हो तो आगे का सोचना बे-कार. बीतते समय के साथ धीरज क्षीण होता जा रहा है.मोनिका को तो अभी बस इन्तज़ार करना है .
वे लोग परेशान हैं -सात लाख उधर  दे चुके. इधर ऊपर के खर्चे भी क्या कम हैं !
और अभी आगे का पता नहीं कब तक!
अब ?
क्या करें अब ?
 डाक्टर भी चक्कर में पड़े  हैं - कुछ गड़बड़ है .
ज़रूर होगी. नहीं तो अब तक धरती बंजर पड़ी रहती .
हार कर कह दिया - कितना समय ? ये मत पूछिये . कोशिशें और प्रयोग करते जाने की कोई सीमा नहीं होती. हमारी ओर से कोई कसर नहीं रह रही. पर हम भी भगवान तो हैं नहीं .और यहाँ तो भगवान भी 12 बरस में कुछ नहीं कर पाये .'
कोई बोले भी, तो क्या बोले ?
'..यह केस हमारी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है  - अब अपने  फ़ायदे की नहीं सोच रहे हम.'
'कुछ दिन और ट्राई करते हैं फिर दूसरा उपाय ...'
*
मोनिका क्या करे ?
सात लाख मिले ज़रूर पर सिर पर खर्च भी चढ़ा था .सहेली के माता-पिता कहाँ तक करेंगे?

अब तक सब करते आये हैं . पर उनकी भी अपनी सीमा है .
उसने उन्हें लिख दिया मेरी नौकरी लग गई ,अब आपके पास आ कर रहना संभव नहीं हो पायेगा. कुछ भेज सकूँ इतनी समर्थ भी हो गई हूँ .
वही लोग उधऱ का सब सँभाल रहे हैं... सारी व्यवस्थायें करना कोई आसान काम है ! अब से तो हर महीने उन्हें भी ...'
पैसे खर्च हुए चले जा रहे हैं.
और कोई चारा नहीं , यह काम तो अब कैसे भी पूरा करना पड़ेगा !
 *
उस दिन डॉ. रम्या ने अपने ट्रीटमेंट के लिये बुलाया था.
दोनों साथ आईं .
'अभी डा.बोस बिज़ी है आप लोग थोड़ा इन्तज़ार कीजिये .'
कॉरिडोर में हो कर वे प्रतीक्षा-कक्ष में जा रहीं थीं कि डॉ.अमर की आवाज़ सुनी,'मानस, तुम डाक्टर बेकार बन गये.' 
बाहर से दिखा डक्टरों के विश्राम-कक्ष में वे लोग हैं.
मानस की बात कानों में आ रही थी ,
 'जीवन के बीजारोपण हेतु प्रकृति की कितनी मधुर योजना रही ,लेकिन
 अपने स्वार्थसिद्धि की झोंक में आदमी खुराफ़ातों पर उतारू हो जाता  है, सोचता नहीं, कि बीज को ग्रहण और पोषित करनेवाली धरती रूखी भावनाहीन रहे तो , वैसी ही औलाद पैदा होगी.. सब व्यापार बना डाला है .'
'तुम खाली कमियाँ निकाल रहे हो ,कितने लोगों का भला होता है इससे .'
'पराये को अपनाने की गुंजाइश समाप्त होती जा रही है. ऊपर से काम निकालने के बाद किसी का किसी से मतलब नहीं. '
सुनत-सुनते दोनों महिलाओं ने चाल धीमी कर ली थी.
'अब इस केस में आगे क्या..?'
कान खड़े हो गये वहीं रुक गईँ .
डॉ.मानस का स्वर था -
'जब आना उसी ठिकाने है तो काहे को दुनिया भर के तमाशे ,सीधे काम करने में शान घट जाती है ?'
'दूसरी समस्यायें सामने आती हैं ..'
' ये कहो ,दुकानदारी बन गया है  सब कुछ . लगाव न हो जाय कहीं ,ममता,मोह-छोह बाधायें बन गईं .रूखे-सूखे ढंग से फेंको बीज .फिर एक दूसरे बचते रहो, व्यभिचार किया हो जैसे.'
' मानस, तुम कैसे डाक्टर हो ?'
'मैं दूसरी लाइन पकड़ता बापराम ने ठोंक-पीट कर बना दिया ?
वे और धीमे चल रही हैं .
'...और डाक्टरों के नाम पर एक नई स्पेसी तैयार कर दी ?
' क्यों, डाक्टर बन कर क्या नॉर्मल इंसान नहीं रह जाता ?'
'हमारा काम कोशिश करना है, सो कर रहे हैं, कुछ तो हो ही जायेगा  .'
' अपन लोगों की मक्खन-ब्रेड का सवाल है न. '
'तुम्हारा सोचने का तरीका अजीब है ..'
कुछ लोग आते दिखे ,आगे बढ़ गईं दोनों.
*
आज डॉ. अमर ने साफ़ कर दिया ,
' अधिक वेट करने में आप लोगों को परेशानियाँ हैं तो संतान पाने का एक ही रास्ता दिखाई देता है.'
सबकी प्रश्न-वाचक दृष्टि चेहरे पर अनुभव कर बोले,
'जिस पक्ष का उपयोग नहीं हो पा रहा तो उसे बाहर करके ही  काम संभव है.'
  हैरिस के मुँह से निकला 'लेकिन... ?'
'ये 'लेकिन' ही तो सबसे बड़ी समस्या है.'
 सोच में थे डाक्टर भी.
'अब तो आप की नैय्या एक ही व्यक्ति पार लगा सकता है,' वे मोनिका  की ओर देख रहे थे.
'मैं अपनी ओर से कोई कोशिश बाकी नहीं छोड़ूँगी. इट्स माइ प्रामिज़!'
' नतीजा वही रहेगा . फ़ालतू प्रयोग में वक्त न ज़ाया हो तो आशा है जल्दी.. बशर्ते आपकी पत्नी को आपत्ति न हो '.
'मुझे क्यों ? ..मैं तो हर कीमत पर संतान चाहती हूँ.'
'बच्चा आपका, पर पत्नी भागीदार नहीं हो सकीं ,इसलिये उन्हें हटना पड़ेगा. आगे  ईश्वर का बनाया सबसे सीधा रास्ता.'
सब स्तब्ध.

अचानक ही फ़ुर्ती से बढ़ कर डॉ. मानस ने बैलेंस -बिगड़ी मोनिका की, गिरती हुई कुर्सी  थाम ली.
 हे, भगवान् !
*

(आगामी अंक में समाप्त.)

11 टिप्‍पणियां:

  1. माँ,
    कहानी का नया मोड़ दिल को छूने वाला है. बहुत हद तक मेरे मन की भावनाओं को व्यक्त करता है. आज की कड़ी के एक वक्तव्य "रूखी और भावनाहीन धरती" के बीज को ग्रहण करने पर औलाद भी वैसी ही होगी वाली बात पर मुझे मेरी अपनी लिखी एक कहानी स्मरण हो आई (मेरे ब्लॉग पर भी है)..!
    डॉकटरों की आपसी बातचीत सुनकर बड़ा अजीब सा लगा, लेकिन सचाई वही है!
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी और तब पूरी कहानी पर अपनी समेकित प्रतिक्रिया दूँगा. तब तक मेरा वित्तीय वर्षांत कार्य भी समाप्त हो चुकेगा!
    कहानी जिस मोड़ पर रुकी है उसका पूर्वानुमान न जाने क्यों हो रहा था मुझे! देखें आगे क्या होता है!

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  2. रोचक कहानी !
    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा
    मैं आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हु
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है अगर पसंद आये तो कृपया फोल्लोवेर बन अपने सुझाव दे .

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  3. कहानी की तीसरी क़िस्त के लिए प्रतीक्षा अत्यंत कठिन लग रही है। न जाने कब मैं आपकी तरह भावपूर्ण बांध कर रखने वाले साहित्य की रचना कर पाऊँगी। शायद 7 जन्म लग जाएँ। आपको पढ़ पाना मेरा सौभाग्य है।आपके लेखन में सब कुछ होता है विषय का ज्ञान उसकी गहराई शब्द रत्न और उनका अत्यंत सुन्दर वर्णन।जानती हूँ आपका समय अमूल्य है फिर भी विनती है एक बार dj के ब्लॉग्स एक लेखनी मेरी भी और नारी का नारी को नारी के लिए तक जाने और मेरी रचनाओं का अवलोकन करने की राह भी तय करलें।ब्लॉग जगत में नए नए कदम रखने वाले हम जैसे तथाकथित लेखकों को आपके मार्गदर्शन की परम आवश्यकता है।
    http://lekhaniblog.blogspot.in/ एक लेखनी मेरी भी
    http://lekhaniblogdj.blogspot.in/ नारी का नारी को नारी के लिए
    इस राह के बाद की मंज़िल में काँटे मिले या गुलाब ?आपका मार्गदर्शन अपेक्षित है । धन्यवाद

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    1. आपका आना बहुत अच्छा लगा . लेखन की सराहना के लिए आभारी हूँ -ब्लाग जगत में अनेक बहुत कुशल और दृष्टि संपन्न ,चिन्तक एवं लेखक हैं ,बहुत विविधता है यहाँ ,आपको बहुत-कुछ मिलेगा.
      निश्चिंत रहिये आपके प्रयत्न आपको भी बहुत आगे ले जायेंगे .

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    2. चरण वंदन के साथ हृदय से आभार इतनी व्यस्तताओं में भी समय निकल कर मेरी रचनाओं को पढ़ा आपने उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। और आपके सुझावों के प्रति हमेशा सजग रहने और उन पर अमल करने का प्रयास करूंगी ये वादा है। आप द्रोणाचार्य वाला अन्याय नहीं करेंगी मैं आश्वस्त हूँ। परन्तु मैं एकलव्य बने रहना चाहती हूँ आपके साहित्य को निरंतर पढ़ते रहना और आपसे सीखते रहना मेरा सौभाग्य होगा।
      और आपने आशीष दे दिया है कि वाणी की अनुकम्पा बनी रहे आशा है ईश्वर ने आपके इस वाक्य पर मुझे तथास्तु कह दिया होगा।

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  4. आज के माहौल में भावना पिछड़ गयी है व्यापार प्रमुख हो गया है..कहानी एक ज्वलंत समस्या की ओर ध्यान दिलाने में सफल हुई है

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  5. क्या होगा इस कहानी का अंत ? जो मैं सोच रही हूँ वही ? जल्दी पोस्ट कीजिये.

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  6. शकुन्तला बहादुर30 मार्च 2015 को 6:14 pm

    मैंने सरोगेसी के विषय में सुना अवश्य था , किन्तु इस दिशा में इतनी व्यापकता से विस्तृत जानकारी लेखिका से मिल रही है , उसने मुझे विस्मित कर दिया है । इस प्रयोग की प्रगति में आई बाधा से मन कुछ उदास सा हो गया है । लेखिका की सूझ-बूझ कथा को किस ओर ले जाएगी , इसकी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है ।

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  7. बहुत भावपूर्ण रचना.सरोगेसी के संबंध में पहली बार किसी कहानी के माध्यम से पढ़ा.

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  8. सबसे अच्छा तो बच्चा गोद ले लें तो बच्चे के कमी भी दूर और एक बच्चे को माँ-बाप मिल जाते हैं ...
    आधुनिक समाज का चेहरा दिखती चिंतनशील प्रस्तुति

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  9. बहुत ही involving कहानी, जैसे सब आंखों के सामने घट रहा हो।

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