सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

कथांश - 22.

*
 वसु के विवाह की तारीख तय होने पर माँ ने कहा था
'मुन्ना, मेरा एक कहा मानेगा ?
मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि के उत्तर में बोलीं
'शादी में पिता का होना बहुत ज़रूरी है उन से बात कर.'
 'वे अब वहाँ नहीं रहते ..'
'तुझे कैसे पता?
'पता लगाया था मैंने ..मकान में कब से  ताला पड़ा है. '
'जरूर आते होंगे मकान है तो  ,पड़ोस में पता किया? .'
'नहीं.'
'मुझे जाना होगा.'

 ' ऐसी-वैसी कोई बात न निकल आए  ,बोलनेवालों की कोई  कमी है यहाँ ?बेटी  ब्याहने जा रही हूँ .  उसका मुख उजला रहे और मेरा भी . पिता हैं तो उन्हें ,होना चाहिये .मंडप में बैठी बेटी का हाथ सौंप जायें. उनके हाथ से कन्यादान हो जाये तो सारा किया-धरा सकारथ हो जाये .'
' पर तुम वहाँ जा कर क्या कर लोगी ?"

' पहचानवालों से मिलूँगी , पता करूँगी ,उनके साथ के लोगों को जरूर पता होगा . सिर उठा कर जी सकें मेरे निर्दोष बच्चे ... मैं  जाऊँगी. उनसे कुछ नहीं चाहती  पर उसके लिए बुलाना होगा  .'
गईँ थीं माँ .
ऑफ़िस के पुराने दोस्त से उनका पता मिल गया .उन्हीं से  'कोई खास बात हो तो ख़बर दे देना 'कह गए थे..
माँ को पता चलीं  तमाम बातें .. वह औरत उन्हें चाट गई .खूब पीने लगे हैं  आते हैं छठे -छमाहे .सभी  से कटे-कटे रहते हैं .
माँ ने ही चिट्ठी-पत्री की  .
मुझे दी थी चिपका कर डालने को ,मुझसे रहा नहीं गया   खोल कर देख  ली .
कुछ खास नहीं .ऊपर ' श्री मान जी '

एकाध औपचारिक लाइन के बाद लिखा था -
दुनिया की आँखों में जो प्रश्न होते हैं ,क्या उत्तर दें ?इन  निर्दोष बच्चों को कैसा कुंठित जीवन मिला है  .लड़के ने  मेरी लाज रख ली .लायक निकला .
अब बेटी ब्याही जा रही है किस्मत से  घर-वर अच्छा  है पर वह सिर उठा कर जी सके ,कोई दाग उसके माथे पर न  रह जाए . शान्ति से जी सके बस, यह चाहती हूँ .मेरी तो निकल गई अब इन बच्चों को वो सब न झेलना पड़े.

 एक बार आकर शकल दिखा जाओगे तो सब को भरोसा हो जायेगा ,मैं लाख करूँगी तो भी लोगों के मनों में शंका रहेगी.तुम सामने  खड़े भी हो जाओगे तो सब विश्वास कर लेंगे .मेरी मजबूरी है, इन बच्चों के लिए ही ज़िन्दा हूँ ,..
कुछ नहीं चाहूँगी ,कुछ नहीं कहूँगी ,मेहमान बन रहना अपनी मर्जी से .बस एक विनती -उसे मत लाना यहाँ .उस अतीत को सबसे दबाए हूँ .वह मुझसे नहीं सहन होगा .तुम्हारी ये बातें किसी से कह भी नहीं सकती ,कि कहीँ तुम्हारा बेटा होने के नाते उसके आचरण पर भी लोगों को शंका रहे ... . '
आगे कुछ विशेष नहीं
नीचे केवल  'ललिता '- माँ का नाम !
माँ के लिए बहुत लगता रहा था ,अब भी लगता है.
*
वे आए थे ,विवाह से  एक दिन पहले  .

पहचान में नहीं आ रहे थे , देह घिस गई थी -एकदम हाड़-हाड़ .
रस्में शुरू हो चुकी थीं .वसु मंडप तले पटे पर बैठी थी ,  सुहागिने तेल चढ़ाने का उपक्रम कर रहीं थी . जैसे ही सुना  - 'पिता जी आए हैं ' - मामा की लाई  पचिया पहने ही उठ कर भागी .'पापा ,मेरे पापा..'..आगे गला रुँध गया , आवाज़ नहीं निकल रही आँखों से आँसू बह रहे हैं .
 आँखें धुँधला गईं पर जो नया व्यक्ति आया है उसे पहचानने की जरूरत किसे ? 

वही आया है आज  है जिसके लिए अंतर से  टेर उठती रही . जा कर लिपट गई .' आ गये पापा,
कितना तरसी हूँ  ...अब मत जाना ,पापा ..' हिलक-हिलक कर रो उठी.

'सब लोग हमें  कैसे देखते  थे ,हमारे पास कोई जवाब नहीं ..' था वह हिचकी ले-ले कर बोल रही थी, ' कितना बुरा लगता था पापा...'
'मैं भी बहुत पछताया हूँ बेटा '

ध्यान से देखते रहे  बेटी का मुख,'' अपनी माँ  की पूरी छाप ,न कोई कहता तो भी पहचान लेता. '
'माफ़ करना  बेटा , तुम सब के साथ बड़ी नाइंसाफी की .फल भुगत रहा हूँ ....' सीने से लग गई थी वसु रोए जा रही थी लगातार .
मुझसे देखा नहीं जा रहा था.मन का रोका हुआ  बाँध सबके सामने फूट न पड़े !
आँखें छिपाता चला आया वहाँ से .

अरे ,पारमिता क्यों यहाँ खड़ी रो रही है ?हाथ में  कटोरी लिये .
आँसू पोंछती बोली,' मैं खुश हूँ ,कितना अच्छा हुआ !'
मंडप में जा कर बोली,' ये उबटन , दूल्हे का  छुआ हुआ दुल्हन के लिए . हमारे यहाँ यही  लगता है  तेल के बाद .'..
नाउन आईं थीं बुलाने,' बिटिया चलो, तेल को मुहूरत निकरो जात है..'

सब ने कहा -अब तो आ  गये हैं. इत्मीनान से मिलना बात करना .

किसी ने  देखा नहीं था, उत्सुकता  सभी को थी . 
'बिटिया का कन्यादान  करने आए हैं ,आखिर को बाप हैं !'
 बड़ी मुश्किल से समझा कर वसु को भेजा गया  ,भीगी आँखों के साथ धुली हुई मुस्कान उसके मुख पर खिल उठी थी.
*
 उन्होंने कहा था.' कैसा दिमाग फिर गया था मेरा. ..'
 नाउन आकर पंडिताइन से बोली .'.आज कबूले हैं बाबू. उन पे कौनो टोना कर दिया गया रहे ! ।"
 महरी कैसे चुप रहतीं  ,'अइस  चूस लेती हैं ,ई कहो बचि गए .आय गए  ..'
 सुना-सुनी में बात फैली ' बिरजू के बाबू  आय गए ,उन पर जौन टुटका भा रहे ,अब निकरिगा ... '
' तभै तो हम कहें ,इत्ती सुघर मेहरिया अउर आपुन औलाद कइसे बिसराय गए ?'

'कुछू पूछो मत अइस मंतर फुँकती हैं कि मानुस भेड़ा बन के रहि जात है .
मंतर की पता नहीं हमें तो पता है कुछ ऐसा-वैसा खबाय देती हैं और उनहिन के बस में हुई जात है मरद का और कुछू दिखाई सुनाई नाहीं देत'.
वाह ! गया सारा दोष किसी  अनजान मेहरिया पर , और वे बन गए बेचारे !
*
पिता दो हीरे जड़ी अँगूठियाँ लाये थे .माँ को देकर बोले,' एक तो इस विवाह के लिए  हमारी अँगूठी थी न ,बहुत ढीली हो गई थी.अब कौन पहनेगा !एक और तुम्हारे लिए ..." कह कर माँ का मुख देखने लगे .
'अब मैं क्या ....मुन्ना की बहू के लिए रख लेती हूँ. आकर  दे देना अपने हाथों .'
'मैं  बहुत शर्मिन्दा हूँ .'
'यहाँ आ गए यही बहुत है हमारे लिए ' माँ ने कहा था .


मंडप में रमन बाबू को देख  कर पहचान लिया उनने ,'अरे रमन ?"
 तुम ..माधो हो  .दसवीं के बाद आज देखा ..?
 पिता का नाम माधव प्रसाद है न !
दोनों गले लग गए,' कैसी शकल निकल आई है .क्या हो गया तुम्हे ?'
कहते क्या .शराब ने पी लिया था उन्हें .
अधिक खोज-बीन फिर किसी ने नहीं की ,

विवाह की कार्यवाहियों  में सब व्यस्त हो गए , रायसाब का उत्साह बढ़ गया था .
*
जयमाल संपन्न हुई  .खान-पान के साथ हँसी-ठिठोली चल रही थी
 किसी समधी ने  फर्माइश की -
' वो वाला गाना लगाओ हमारी शादीवाला '
'कौन-सा? कौन सा ?'
के बाद गाना लगा -
'समधिन तेरी घोड़ी चने के खेत में .
..चने को लग गया पाला ,समधिन को ले गया बरात का बाजेवाला '
.'फिर . काई ...  नाई ,
'अरे, ये तो बड़ा ज़ोरदार गाना है .'
'इतना पुराना गाना वाह !'
हुँह,  आज के गाने क्या बराबरी करेंगे पहले होते थे असली  गाने '
खूब मज़े लिए सब ने .
समधिन की बात आते ही ,माँ की ओर नज़रें उठ जाती थीं ,
'हाँ ,हाँ, वर के फूफा को भी दुल्हन की माँ बहुत पसंद आईं !'
पिता छिपी दृष्टि से माँ का मुख देख रहे हैं .
शुभ कामों में पहनी जानेवाली लाल पाड़ की साड़ी पहने हैं वे ,
 सफ़ेद हो आये केशों में सिन्दूर की गहरी लाल रेखा आज ही देख रहा हूँ .अब तक कभी ध्यान नहीं गया लगाती भी थीं कि नहीं ,और माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी .
 मुख जगमगा रहा है !
मैंने फ़ोटोग्राफ़र से कहा , 'माँ  की एकाध फ़ोटो अलग से भी ,और हाँ ,पापा के साथ ज़रूर ले ले.'
 मेरी माँ को आज कहीं किसी की  नज़र न लग जाय !

*
(क्रमशः)

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. hichkiyon kee bhasha hai bas..achha hai ye kisi kitaab ke safhe nahin hain..bheeg jaate..aankhein musalsal beh rahin hain..vikrit sa mukh..kahan chhupaun? jhooth nahin kahungi...ek hi baar padha ansh aur rulayi roke nahin ruk rahi. kathanak, shabd shilp, bhavnayein...kuch nahin dkeh paayi...keh bhi nai sakti ki dubara aaungi ye wali post padhne :( kitta ro ro ke ye novel padh rahi hoon :'( aap wahan se merko do chaar bade se rumaal zarur bhejiyega ab :(:(:(

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  3. ek baat kehna bhul gayi k akhir me Brajesh ne jo photographer se kaha..uske liye aapko dher sara sneh...itta baareeq sochne wala beta ho to sau dukh bhi phool jaise lagein. behad pyar umda brajesh k liye..mann hi mann uski balayein le lin..jaanti hoon k paatr hai..par itni peeda me hoon k dua khud se nikal rahi hai..aise hi rehna Brajesh...ek akeli paalak maa ke liye uske mann ko baareeqi se samjhne wale bete se bada bhala kya ashirwad hoga samay ka aur eeshwar ka bhi.aur yadi aisi maa aise bete se vanchit ho...to uska dukh kitna bada hota hai log shayad tasavvur bhi nahin kar sakte. sau betiya bhi ..sau layak betiyan bhi kabhi kabhi aise ek bete ki ummeed ko sab kuch nyochhawar karke bhi maa ke mann se mita nahin paatin.
    zindagi me ek hi shakhs ko jaane kitne qirdar nibhane hote hain na Pratibha ji...aur kisi na kisi pehloo me sab kuch kar kar bhi aap muqammal nahin hi ho paate hain. ek qasak ek tees saath chalti hi chalti hai..kabhi kabhi taaumr.

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    1. घायल की गति घायल जानै ..। पति कितना ही बेवफा हो , स्त्री कहीं न कहीं हार्दिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर आखिर उसी पर निर्भर होजाती है । पर कितनी पीड़ा के साथ ..यह तो वही जानती है । निश्चित ही ब्रजेश उसकी तमाम पीड़ाओं को भुला देने वाला बेटा है एक तरह से जीवन के सूनेपन और उदासी को दूर करने वाला लेकिन पति की ओर से जो जख्म मिलते हैं वे जीवन को एक तरह से असाध्य रूप से बीमार कर देते हैं । सब कुछ खोखला होकर रह जाता है । हँसी खुशी उम्मीदें ..सब कुछ

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    2. hmm so true..! waise ye baat to har rishtey ke liye sach hi hai. magar striyon ke liye kuch maapdand badal jaate hain.samaj ke banaye tamaamtar niyamon kanoonon ke ghere use bachpan se gherne lagte hain.patni ya maa ke unwaan ke bina uska samoocha astitva khokhla hai.jaise wo ek shakhs hi nahin..koi alag pehchan nahin. wo tabhi muqammal hai jab maa bane..tabhi muqammal hai jab tamamtar reeti riwajon rasmon me pati ke sath shareeq ho..tabhi muqammal hai ki yadi wo akeli hai to uske maang me sindoor na bharne ki jayaz wajah ho uske pas. mujhe nahin lagta pati ka hona ya na hona koi bahut bada dard hai ya zakhm hai...humne use zakhm bana diya hai.aur isme bhi sabse adhik haath aurton ka hi hai.kabhi kabhi mujhe lagta hai ki samaaj ne kash bhagwadgeeta ka palan karte hue naari aur nar donon ko aatma mana hota..aur jitne dharm ek vivahit stri ke pati ke liye banaye hain..utne parmatma k liye banaye hote to aaj jaane kya aalam hota.

      baharhaal, main dkeh rhai hoon apni peedhi ke logon ko..unki soch unke rishtey ek nayi parwaaz le rahe hain.patni ko barabari se ek aazaad wajood ke roop me pati dekh rahe hain.shayad aaj se 50 saal baad ye pati specific zakhm bahut peechhe kee baatein ho jayenge.

      main aapse sehmat hoon..magar broad aspect mein....k har rishtey ka apna alag aasmaan aur alag udaan hoti hai..ehsaason kee parwaaz unki seemayein unki tavaqqu har rishtey k liye alag aur unique hoti hai.koi kisi ka poorak nahin hi ban skata. bas takleefein kam hon to koi ek zakhm (koi sa bhi ho) kam dukh deta hai. bhagwan shrikrishn bhi 16 kala se sampoorn hokar kisi ko eksath sukhi santusht nahin rakh paaye.
      zindagi to ek safar hai. humsafar hum sabhi hi hain...kewal pati aur patni nahin.safar se rooh guzarti rehti hai...kabhi purush bankar kabhi stri ban kar kabhi kuch aur.ye to hum par nirbhar hai ki hum kis pal ise samajh jaayein aur apni zindagi ka ikhtyaar apne haath mein le lein.adhyatmikta se jud jayein fir to kya hi kehna!!! jahan ''main'' ka lop ho jata ho..wahan sab gaun ho jata hai..fir kisi bhi tarah ke zakhm zkahm nahin lagte.uparwala hi aapke mere hum sabke roop me shirqat karne lagta hai :''-)

      upar ke mere donon comment kal ke ekant aur ksheen kshanon kee bahivyakti the.geeta ko bahut bahut adhik follow karti hoon par kal jaane kyun itna vyathit hui thi.
      achha hua aapne comment kiya..kal se mann bahut vichlit tha..aapko jayaz aur diplomate uttar dene ke chakkar me shrimadbhagwadgeeta fatafatt revise kar daali...abhaari hoon aapki..aap jo bhi hain...mujhe apni vichal ka hal mila.fir diplomate hone kee zarurat mehsoos nai hui. mann ko wapas aatma per sthir kar sakne me samrth hui :) kritagyata sweekarein! koi baat katu lagi ho to kshama bhi.

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  4. आज इस कथांश पर टिप्पणी करने का न साहस है न ही उपयुक्त शब्द । बस इतना ही कि पुरानी फिल्मों में जैसे सारे दुख दर्दों और भूल-भटकावों पर धूल डालते हुए अन्त भला सो सब भला जैसा दिखाया जाता है वैसा ही कुछ ......हालांकि सब कुछ सहज और स्वाभाविक ...

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  5. शकुन्तला बहादुर14 अक्तूबर 2014 को 5:05 pm

    वसु के जीवन की सबसे बड़ी लालसा पूरी होने पर उसकी प्रसन्नता आँसुओं में बह निकलना स्वाभाविक है । माँ अपने बच्चों को लोकापवाद
    से बचाने के लिये हर संभव प्रयास करती है- जो सफल होकर मन को आश्वस्त कर देता है । पिता पश्चात्ताप करके भूल को स्वीकार करता है तो माँ की सारी तपस्या फलीभूत हो जाती है । कथा का प्रवाह सहज स्वाभाविक है ,जो सुखद अन्त का आभास देता है । कथांश प्रभावी है ।

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  6. दिल को छूने वाला वर्णन ...कहानी लिखने का अंदाज़ बहुत सुंदर है

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  7. इतनी आसानी से कोई कैसे स्वीकार लेता है किसी को...बहुत बड़ा कलेजा चाहिए...गिरिजा जी ने सही कहा है अंत भला तो सब भला...वैसे जिन्दगी में ही चमत्कार घटते हैं..और किसी को दुःख देकर कोई चैन से नहीं रह पाता..बधाई इस अंश के लिए...

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  8. माँ, सबसे पहले देर से आने की माफ़ी माँग लेता हूँ. आपका बेटा फिर से व्यस्त हो गया है काम में.. यात्राएँ और काम दोनों मारे दे रहे हैं.. ख़ैर यह सब शिकायत बाद में..
    मेरे लिये यह कथांश आज आँसू और मुस्कान लिये आया है. बच्चों के पिता की वापसी, जिसका मुझे इंतज़ार ही नहीं यकीन भी था, सम्भव हो पाई, मेरे लिये यही बहुत बड़ी खुशी है.. कह नहीं सकता कि यह सुबह के भूले का शाम को लौट आना है या फिर जाने के लिये आना है.. जो भी हो, घर आया मेरा परदेसी वाली भावनाएँ अवश्य उमड़ रही होंगी.
    इतने दिनों का विछोह सम्बन्धों में तीखापन लाए न लाए औपचारिकता ज़रूर ले आता है.. ख़ुद अपने अभिन्न मित्र से वर्षों बाद मिलकर कहाँ से बात शुरू करें की बर्फ़ पिघलते-पिघलते पिघलती है.
    इसलिये आज की इस कड़ी पर वसु के लिये "पिता समान" राय साहब की जगह पर पिता का होना शायद जीवन का सबसे सुखद पल होगा. आज तो जी में आता है कि अगर व मेरे सामने होती तो उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उसका माथा चूमते हुये मैं ख़ुद कहता कि इतने दिनों बाद मिले अपने खोये पिता से बात भी न करना मगर उनसे लिपट कर रोना ज़रूर. अपने अनदर की सारी कड़वाहट बह जाने दे. शायद यह गंगा विछोह का वह मरुस्थल सींच सके!
    यह दृश्य अपने अन्दर कई कहानियाँ समेटे है माँ! लिखने बैठूँ तो पता नहीं कहाँ जाकर रुकूँगा. इसलिये इस फ़ैमिली रियुनियन के साथ उन्हें अकेला छोड़ देता हूँ! और वसु के लिये - सौभाग्यवती भव!!

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    1. वत्स ,जीवन इतना आसान नहीं होता ,जितना लगता है .
      उस नारी ने बच्चों के लिए उनके पिता से आने को कहा है यह भी किसी ने जानने की कोशिश की कि क्या उसके मन उस प्रकार के जीवन के प्रति कोई मोह बचा है .अथक श्रम से जो स्वाभिमान ,सम्मान और सामर्थ्य अर्जित की वह ,अब तुच्छ- त्याज्य हो गया ,जो
      फिर गुमनामी के निष्क्रिय अँधेरे में लौटना अपनी नियति बना ले ?जो पति कभी उसका नहीं हुआ उसी को भजना , उसका सुखान्त कहा जाएगा ?
      ज़रा सोचना सलिल ,यह उसके प्रति न्याय होगा क्या ?
      पूछा जा रहा है फिर माँग में सिंदूर लगाना & शृंगार का क्या अर्थ ? क्या तुम भी यह सोच रहे हो ?

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    2. माँ! मैंने बच्चों की स्वाभाविक ख़ुशी का ज़िक्र किया है, विशेष तौर पर वसु का! मैंने यह भी कहा है कि इसमे कई कहानियां छिपी हैं! बिरजू की सोच, उसकी माँ का न लौटने वाला जीवन-पल, सुहागिन होते हुए भी विधवा सरीखी रहना, समाज परिवार के लोगों की सोच.. बहुत कुछ बाकी है कहने को।
      माँ, मैं कथानक से एक पात्र की तरह जुड़ गया हूँ.. मानो शब्द आपके, कथा वाचक बिरजू और श्रोता मैं। सुनता हूँ, हंसता हूँ, रोता हूँ, गुनता हूँ, समझता हूँ, समझाता हूँ. मुश्किल तो ये है कि पूरे कथांश पर एक चादर की तरह फैले दर्द की टीस भी महसूस करता हूँ।
      वसु का पिता भी मैं, बिरजू का दोस्त भी मैं, पारमिता की विवशता भी मैं, माँ की वेदना भी मैं! जब जैसा महसूस किया कह दिया!
      फिर कहूंगा कि अच्छे कलाकार मिलते तो एक फिल्म बनाता इस कहानी पर!

      सादर
      सलिल

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  9. लोकापवाद से बच्चे बचे रहें यह भाव एक माँ ही सोच सकती है । मर्द की गल्तियों को किसी स्त्री के सिर ही मंढ दिया जाता है । बृजेश के मन के भावों को बहुत भावुकता से उकेरा है । वसु तो पिता मिल वैसे ही भाव विह्वल हो हो उठी ।

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