गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

आत्म-हंता.

*
अंतरिक्ष की असीम परिधि में एक  अति लघु धूमिल छाया डोल रही है .
 पारदर्शी-सा धुआँ, कोई रंग न रूप गड्डमगड्ड भटकता हुआ. हाँ,बीच-बीच में मनोदशा के अनुरूप कुछ शेड्स बदल जाते हैं .
अनिश्चित गति. अनगिनत आकाशीय पिंड बिखरे पडे हैं चारों ओर,कहीं किसी से टकरा न जाये!
नहीं,नहीं, धूम्र के कण कहाँ टकराते हैं, लहराते-डोलते आर-पार निकल जायेगी .
अपार अंतरिक्ष में इतनी आकाश गंगायें, अनगिनत सूरज-चाँद,निर्जीव पिंड और अंध-विवरों के आवर्तन में कभी कभी ओझल हो जाती है.
 दिक्-काल सब खो गये हैं!

' तुम?'
 कोई है भी या केवल भ्रम?
 जैसे कोई  हँस दिया हो.
' तुम यहाँ कैसे?'
'पता नहीं चला कैसे.एक झटका ऐसा कि सारे बोध शून्य !और फिर काल ऊपर से निकलता चला गया.'
'तुम्हीं ने तो झटक कर निकाल दिया था देह से प्राण को, दोष किसका ?'
उत्तर कोई नहीं.
 'क्या चाहती हो ?'
'गहरी नींद सो जाना. विस्मृति के अंक में  पूर्ण विराम!

'जीवन के अध्याय  पूरे हो लेने देते ,अंत में था ही -पूर्ण विराम!
'सब-कुछ समाहित था तुममें , ज्ञान के बीज,चेतना के विद्युत-कण, रूप, धारणा- शक्ति .आरोहण-क्रम चल रहा था. अनपेक्षित ऐसा  आघात ! कितनी पीछे धकिल गया तुम्हारा आत्मिक विकास .झटका खा कर सब छिन्न-भिन्न हो गया . बोधहीन जीव मात्र ! कैसा लग रहा है ?'! 
'बस हूँ इतना भर और कुछ नहीं!'
*
 यह कैसा  संवाद-? प्रश्नों का भान होता है, उत्तर कौंधते  हैं- पर कोई नहीं यहाँ
फिर वही-
'कौन हो तुम? '
' मैं अनाम -अरूप. कुछ था, अब नहीं.... पर तुम कौन? '
'तुम्हारा अंशी,तुम्हारा कारण. पर तुम असमय अचानक क्यों चली आईँ ?'

'...सहन नहीं हो रहा था. सोचा था छुट्टी मिलेगी .पर यह धुँधलका और अथाह-अनंत विस्तार में एकाकी बहते रहना...इससे तो वहीं अच्छा था .वहाँ कुछ करना संभव था .कुहासे के असीम सागर में डोलना रह गया बस. मेरे नियंत्रण में कुछ नहीं.अपनी कोई गति नहीं, कोई स्फुरण तक नहीं ,एक मौन सर्वत्र.

 'देह से छुटकारा पाने की इतनी व्याकुलता? संचालन तो मन कर रहा था. उस पर नियंत्रण नहीं कर पाये?
कितना कुछ था, साधन थे, उपाय थे, कितने क्षेत्र थे. इतना बड़ा संसार कहीं रम जातीं.वहाँ नाते जुड़ते-टूटते क्या देर लगती है .कल एक दम व्यतीत हो जाता है, जैसे हवाओँ पर लिखी धुयें की  पंक्तियाँ.
मन से कैसे छुटकारा पाओगे, जो साथ चला आया? अंत देह का ,मन का तो नहीं. '
और छुटकारा काहे से - बोधों से, साधनों से, सीमाओं से, तब किसके माध्यम से व्यक्त होगा निराधार मन?'
*
स्मृतियों की डोर टूट गई ,बिखरी पड़ी हैं ...'

बीच-बीच में प्रतिबिंबित होता कुछ  आभासित होता जैसे भूली यादें जल की पर्तों में बही जा रही हों .
नेपथ्य में पारदर्शी मेघ से आभास, उड़ते निकल जाते हैं.
'सोचा था- मस्तिष्क पर लगी सारी छन्नियाँ हटा कर इस विराट् ब्रह्मांड का व्यू मिलेगा एक दिन, मूल से संबंध जुड़ने का अवसर होगा. '
'मूल ? शाख से टूट कर मूल से जुड़ने का भ्रम पाले हो !
निज को संचित - संश्लेषित होने का मौका कहाँ दिया. स्मृतियाँ- प्रभाव  सब झटक  दिये .जन्मों की साधना बिना, मूल स्वभाव धारने की क्षमता कौन पा सका ?'
 झकझोर दिया हो जैसे किसी ने.
जन्म-जन्मांतरों के संस्कार आभासित हो जाते हैं, बिना प्रयास- ज्यों छिन्न पात में बिरछ का शेष रस हुमक आये.
विच्छिन्न पड़ा मैं ,क्या जाने कहाँ ? कहाँ थमेगी यह भटकन !'
एकदम रिक्ति ! कुछ छायायें क्षण को लहरा, अंतर का शून्य और गहरा देतीं हैं.कब तक ,ओह,कब तक !
'चेतना का एक तमसाच्छादित कण -अपने स्थान से च्युत!
' जहाँ होना था, वहाँ नहीं जब,किस गगन-मंदाकिनी के किस छोर, या किसी कर्षण  के किस वृत्त में घूर्णित- कैसे कोई जानेगा?!'..
उत्तर कोई नहीं.
एक बहका सीकर!
जीवन-धारा में बहते पहुँचता सागर तक , प्रवाह में मिल अपार बनने की अविराम साधना फलती - हाथ बढ़ा समा लेता उदधि!
 पर  अब कहाँ ठौर!  हवाओं की बहक नसाये या तपन सोख ले- सागर बनने से तो  रहा.
 अपार महाशून्य में एक परिच्युत अणु!
 न पथ, न गति !
 नया प्रारंभ कब, कहाँ से हो- क्या पता!
*

18 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट ....कोई एक बिंदु तो खोजना, चुनना ही होता है ...

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  2. प्रभावी प्रस्तुति |
    आभार आदरेया ||

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  3. नया प्रारंभ कब, कहाँ से हो- क्या पता!
    बिल्‍कुल सच
    सादर

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  4. श्रीमती वन्दना गुप्ता जी आज कुछ व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-02-2013) के चर्चा मंच-1164 (आम आदमी कि व्यथा) पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. मन आज यही मांग रहा है, बहुत हो गया। थोथा निरर्थक जीवन, जिसमे कुछ नया शेष नहीं है। इसलिए अब नवीन की ही तलाश है।

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    1. अजित जी,
      आप ऐसा नहीं कह सकतीं.पता है आपसे आगे लाइन में जो लोग हैं,खींच लेंगे पकड़ कर!आप सदुपयोग कर रही हैं समय का अभी बहुत लिखना है आपको. पहला चान्स हमारा है !

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  6. भाव -भाषा व विचारों की दृष्टि से अति गहन रचना ।

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  7. गहन चिंतन .... मन की भटकन को व्यक्त करती हुई पोस्ट

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  8. oh! kitta pyaara,vistrit aur gehan lekhan hai..!!! mujhe to saara pasand aaya..aur sabse adhik wo avruddh aatmik vikaas wali baat....swami vivekananda se related ek pustak me padha tha..ki aatmhatya kisi bhi kasht ka nivaaran nahin hai..aur swayam ko samaapt karne ke baad doosra aarambh jahan kahin se bhi hoga..is mrit deh ke karm aur sanskaar wahin se apni gati pakdenge jahan unhe rok diya gaya tha...aapke aalekh ne is bata ko aur dridh kiya..ek sakaaratmak oorja se bhar gaya mann...ki chaahe jo bhi ho jeewan me..ladna hai..marne ke pehle nahin marna..:)

    'naya praarambh'....magar ant hota hi kahan hai....kuch to hai jo avinaashi hai..deh ke pehle aur baad me bhi raha aata hai.
    bahut kuch sochne ke liye vivash karti hui post..aabhaar pratibha jee..itni achhi post ke liye..:'''''''''-)

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  9. @ Ajit jee aur Pratibha jee...

    line me sabse aage koi aur hai..aur jisne poori line hi hata di hai.. :-| ...isliye mat jhagadiye..khoob sara likhte rahiye bas :) :)
    aur dubara line wine nai banayiyega :(:(

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    1. 'पूरी लाइन हटा दी...'?
      होगा जुम्मा-जुम्मा चार दिन पहले धरती पर आया कोई खुराफ़ाती!
      सीनियर्स के बीच से खदेड़ दिया जाएगा कि जो काम एलाट किया गया है तुम्हें, जाकर मन लगा के करो!

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    2. maine mail kar diya aapko..aur wo bhi bina dare..:-| :( ..aapko to shakuntala ji hi daantengi achhe se ..:-D

      :''-) chaliye shubh raatri..:):)

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  10. शकुन्तला बहादुर24 फ़रवरी 2013 को 10:40 pm

    तरु जी के निचारों से मेरी पूर्ण सहमति है।पुनर्जन्म के प्रति सही
    दृष्टिकोण है।प्रतिभा जी का आलेख गहन दार्शनिकता को दर्शाता है-
    जहाँ इहलोक के साथ ही परलोक की स्थिति का चित्रण भी सटीक है।
    एक बात ये विचित्र लगी कि गूढ़ आध्यात्मिकता का संदेश देने के बाद भी ,अहं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।साहित्य-सृजन के महत्त्वपूर्ण
    दायित्व से क्यों मुख मोड़ना चाहती हैं?अजित जी से कह बैठी है- "पहला चान्स मेरा है।" ये भी कोई बात हुई?
    वैसे आलेख मन पर छा जाने वाला,प्रभावी और सशक्त है। अत्यन्त सराहनीय अभिव्यक्ति !!

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  11. man ko math kar n jane kon kon se moti nikal aaye aur kab evam kitne nikal aaye insaan nahi soch sakta. kashmokash aur vicharon ki shrinkhla ko sateek shabd diye hain...yahi to kamaal hai aapka, apki lekhni ka...fir......gati kyu nahi....? itna tez pravaah hai....fir abhi no. apka ya ajit ji ka kaise lag sakta hai ? baith kar apni gati ki dhaar aur tez kariye ji....achal to ham hue jate hain :)

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    1. अचल नहीं अनामिका,जीवन में ऐसे समय आते हैं जब अपनी ऊर्जा किसी दूसरे अधिक आवश्यक काम में लगानी पड़ती है.पारिवारिक संबंधों के साथ न्याय किये बिना हम अपनी अभिव्यक्ति के साथ कैसे ईमानदार रह सकते हैं.मैने भी खूब लंबे-लंबे गैप दिये हैं.

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