शनिवार, 28 जुलाई 2012

कृष्ण-सखी - 53. & 54 .



53.
'आज कैसा निचिंत तुम्हारे पास बैठा हूँ सखी,बस यही क्षण मेरे अपने होते हैं . जब तुम्हारे साथ होता हूँ ,तुमसे सुन लेता हूँ अपनी कह देता हूँ .और कौन है जिससे कह लूँ ?कल नहीं होऊँगा यहाँ.,..पता नहीं फिर.कब...'
 यह कैसा स्वर हुआ जा रहा है - क्या हो रहा है आज इन्हें ! उसने विस्मय से देखा ,
' स्वस्थ हो न ?बहुत श्रमित हो ?मुझसे ऐसे तुम्हारा मुख नहीं देखा जा रहा ,कुछ दिन विश्राम कर लो फिर चले जाना .'
'वहाँ से बुलावा आ रहा है ,अब नहीं रुक पाऊँगा .चाहता  था एक बार गोकुल-वृंदावन जाऊँ पर कहाँ ...'
उन्मन मन में वृषभानु-सुता की स्मृति जाग उठी है - समझ गई , स्मित हास्य पूर्वक छेड़ती हुई बोली ,' क्यों मित्र ,वार्धक्य में क्या स्मृतियों  की चुभन बढ़ जाती है ?'
कृष्ण को हँसी आ गई ,'मुझे तो यही लगता है .जीवन की आपाधापी में किसे इतना विराम मिल पाता है ..!..'
'हाँ, नेक विराम मिला तो अंतर की करवटें शुरू .'' पांचाली एकदम बोल पड़ी ,' मधुसूदन ,तुम्हारा व्यक्तित्व ही एकदम निराला है. तुम्हें सभी चाहते हैं .... पर जिसे सब चाहते हैं वह किसे चाहता है ,यह भी तो कोई सोचे !'
'सखी ,' वही टेढ़ी- सी  हँसी मोहक मुखमंडल पर ,' मेरी कह रही हो या अपनी ?आज बता दो कि तुम सच में किसे चाहती हो ?'
'मेरे चाहने न चाहने का प्रश्न कहाँ उठता है ?दस मर्यादायें जिसके साथ लगी हों  ,ऊपर से कितनी वर्जनायें ?मैं कृष्ण नहीं जो मुक्त मन से किसी को भी चाह सकूँ ,'
कृष्ण की ओर देखा फिर बोली,
 'तुम तो गउएँ चराते रहे हो .जानते होगे जहाँ कोई भटकी, कैसे ,हाँक कर ठिकाने लगा दी !'
 हँस दिये दोनों.
 'जुगाली करने दो अपनी गउओँ को ..'
खिलखिला कर हँस पड़ी,' गो-चारण करते बहुत सिख-पढ़ गये हो न !'
चुप ही रहे वे -किसी सोच में डूबे .
'बहुत गंभीर हो आज. '
'वहाँ द्वारका की स्थितियाँ ठीक नहीं हैं .'
 कहते-कहते गांधारी का शाप याद आया ,अंतर उद्वेलित हो उठा . 
'...वे लोग किसी को अपने समान नहीं समझते .मत्त होकर अपनी अहम्मन्यता में एक दूसरे को नीचा दिखाने को तत्पर रहते हैं .किसी की नहीं सुनते ?'
'दाऊ तो हैं न ?'
'सीधे-भोले मेरे दाऊ . उनके समझाने हँस-हँस कर  हाँ-हाँ करते हैं सब ,और उनके मुड़ते ही ....'
वाक्य अधूरा छूट गया ,सोच में पड़े-से द्रौपदी का मुख देखने लगे 
'..आत्मश्लाघा और अपनी श्रेष्ठता का गर्व . मदपान में लीन सब ,कोई सुनता नहीं किसी की .'
'इतने चिंतित  मत हो माधव .इससे भी विषम स्थितियाँ संभाली हैं तुमने .ये तो तुम्हारे अपने लोग है .'
अपने हैं इसीलिये इतने सिर चढ़े हैं,वे तो मुझे ही टोकने लगते हैं,मेरे कार्य-कलापों पर आक्षेप करना ही रह गया है उन्हें .
 विचार चलते रहे, पर प्रकट में ,बोले ,'जाऊँगा ,प्रयत्न करूँगा .पूरी तरह करूँगा .'
'  .हमेशा ही जाते रहे हो .कहीं टिके कब तुम ?फिर आओगे .वहाँ से निवृत्त हो कर ,चिंता रहित .'
ढाढस बँधाना चाहती है-
'माधव ,फिर आओगे तुम. कहने-सुनने को कितना सारा शेष है .तुम्हें बताये बिना मुझे  कहाँ चैन पड़ेगा !'
'हाँ ,फिर कभी .. ..'
कैसा स्वर !...पांचाली का जी धक् से रह गया .कंठ में आकर कुछ अटक गया हो जैसे .साँस ऊपर की ऊपर नीचे की नीचे .
'तुम मुझे घबरा देते हो !'
श्वेत पड़ गया वह मुख देख, बोल उठे यादव,'घबराओ मत सब ठीक है .'
' तुम क्या कह रहे थे ?'
'मैं तो कुछ नहीं ,तुम कह रहीं थीं ..'
'तुमसे कहना कभी समाप्त नहीं होता .पर आज सब भूल गई हूँ .तुमने सामने हो और विश्वास नहीं हो रहा कि तुम यहीं हो ..'
पांचाली व्याकुल .
'मैं हूँ ,यहीं हूँ देखो ,' आगे बढ़ प्रिय सखी के सिर पर हाथ रख दिया .
.'मैं कभी भी ,कहीं भी होऊँ ,जब तुम्हारा मन  पुकारेगा ,मुझे समीप अनुभव कर लोगी !'
 कृष्ण की असीम करुणामय दृष्टि ! द्रौपदी का अंतर द्रवित हो उठा.
'इस बार तुम शीघ्र आ सके .चिर जीवें उषा-अनिरुद्ध ! अच्छा हुआ तुम शोणित पुर पहुँच गये .बाणासुर को शान्ति से समझा दिया .'
' हाँ ,उषा योग्य वधू है .'
थोड़ी देर दोनों चुप .
'तुम बिन पता नहीं जीवन कैसा होता , क्या होता मेरा ! पर अब तुम भी जा रहे हो ...'
उनके चित्त की गहनता इस पर भी छाई जा रही है . 
' मीत, बहुत थक गई हूँ .  अब इस सब से निवृत्ति चाहती हूँ .'
गहरी उदासी घिर आई है मुख पर ,
'तुम्हीं ने कहा था ,मेरे निमित्त कर दो सब कुछ,फिर तुम्हें कुछ नहीं व्यापेगा .'
माधव देखते रहे उस श्यामल मुख पर घुमड़ती गहन भाव-रेखायें.
'ये दुख-सुख ,  शोक-क्लेश  अब मुझे न व्यापें ! सारी अशान्ति,ग्लानि , और कामनाओं का भार तुम्हें सौंप देना चाहती हूँ -. अब नहीं संभाला जाता मुझसे !'
'हाँ सखी ,हाथ पसारे खड़ा हूँ.लाओ, सब डाल दो मेरी झोली में और मुक्त हो जाओ .'
कृष्ण के दो अरुण कर-तल किंचित आगे बढ़ आये .
'अब तक जो गट्ठर लादे रही उतार कर फेंक रही हूँ तुम्हारे आगे . कोई लगाव नहीं रहा अब. मोह-वश गाँठ में  सेंत कर रखे रही .सब बेकार था -सड़ गल गया ! डूब जाये सब काल की अतल गहराइयों में. मैं हल्की होकर जाना चाहती हूँ .आगे तुम जानो तुम्हारा काम जाने .'
उसे  लगा वे हँस रहे हैं.
'वाह ,कम तुम भी नहीं हो .जब तक काम का लगा अपना सम्हाले रहीं .बेकार लगने लगा तो सौंप दिया मुझे .मैंने तो पहले ही कहा था -क्यों लादे हो ,दे दो मुझे ,तुम्हारा भार मैं ग्रहण कर लूँगा .पर तुम ..'
'यही  तुम्हारी  माया है ,गोविन्द ! कहते हो पर समझने योग्य बुद्धि देर से आती है .'
उस दारुण पल में भी कृष्णा के होंठों पर मुस्कान खेल गई . 
'जो पाँच पतियों से नहीं कह सकती ,जो संसार के सामने व्यक्त नहीं कह सकती ,अपने मन का वह बोझ तुम्हारे आगे रखे दे रही हूँ . गीता में तुमने कहा था तुम सबकी व्यथा झेलते हो कृष्ण ,मुझे विश्वास हो गया है .क्योंकि जो मेरे अनुभव-क्षेत्र में था उसकी पीड़ा मैंने भी सही है .'
' विभाजित होकर रहना ही मेरी नियति रही .एक सामान्य नारी की तरह मुझे भी सुख- दुख व्यापते हैं ,मन में कामनाओं की तरंगें उठती हैं ,मुझ में भी दुर्बलतायें हैं।'
कृष्ण चुप .
फिर बोले ,सब बीत गया .विगत का बोझ मुझे सौंप दिया तुमने. अब क्या ..?'
'क्यों सखे ,सबके दुखों का बोझ तुम्हीं उठाते हो ?'
'हाँ सखी ,  दुख में याद करते हैं सब ।दुख ही मुझसे बाँटना चाहते हैं ।सुख में मेरी याद किसे आती है ?तुम्हें भी तो नहीं .' 
वह उदास-सी मुस्कराई ,' साक्षी रहे हो तुम .मिले होते तो सुख तब तो ! और  तुमने अपने लिये कुछ नहीं रखा कृष्ण !'
 'इसी में  मेरा सुख है ,मेरा संतोष है . जीवन ही इस निमित्त है .'
'लेकिन क्यों ?'
'क्यों ?मैं ही तो हूँ ,ये सब  अनुभव करता हूँ .मेरा मैं सीमित नहीं  सर्वव्याप्त हो गया है  है .मैं रोया हूँ गान्धारी बन कर ,कुंती बन कर जीवन भर दग्ध होता रहा, कितने अपमान झेले ,अपमानित होता रहा  कर्ण रूप में .सखी ,तुम्हारा अपमान आक्रोश ,संताप और अशान्ति मैंने निरन्तर भोगे है .द्रौपदी, मैं तुम्हें अनुभव कर रहा हूँ अपने भीतर ,तभी इतना जुड़ गया हूँ .'
'तुम सब मे व्याप्त हो कर असीम हो गये , सब ग्रहण करते गये .'
वातावरण बोझिल हो उठा था .जाने की घड़ी समीप थी ,चलते-चलते उनके शब्द थे-
सौंप दो अपने को इन लहरों में ,बहे जाओ .सहज रूप से करती चलो क्योंकि इससे बचने का कोई उपाय नहीं कोई निस्तार नहीं.अपने विषय मे मत सोचो उस विराट् चेतना के रूप में इस दृष्य-जगत की साक्षी बनती चलो .फिर कुछ तुम्हें नहीं व्यापेगा !' 
नहीं रोक सकती अब .एक वही तो नहीं ,और संबंध हैं ,परिवार है उनसे विरत हो कैसे रह सकते हैं .बहुत साधा है ,अब जाना तो होगा ही . 
 उसे यहीं रहना है ,और कहाँ जायेगी ?मित्र-हीना ,पुत्र-हीना पांचाली के लिये वे जो वचन छोड़ गये, उन्हें सुमिरती अलिप्त-सी जीवन विताती रहेगी !
*
54.
कृष्ण चले गये .बहुत दिन बीत गये .
कृष्णा प्रतीक्षा करती रही . वे नहीं आ पाये.  समाचार आते रहे .
द्वारका के तट पर कैसी ऊँची-ऊंची घास उगी है -एरका ! कभी देखी नहीं ऐसी लंबी-लंबी नुकीली पत्तियाँ .उखाड़ने के बाद ऐसी कड़ी पड़ जाती है जैसे मूसल !
सागर तट पर  यादव-कुमार आकर मनोविनोद करते हैं .सबका उपहास करना उनका मनोरंजन है.
एक दिन सूचना मिली वृष्णि वंश के लोग मदिरा-सेवन के पश्चात् विवेकहीन हो कर ,परस्पर लड़ कर समाप्त हो गये .कोई नहीं बचा, एक कृष्ण के सिवा.
ऋषि दुर्वासा और विश्वामित्र का उपहास किया था यादव कुमारों ने.कृष्ण- पुत्र सांब को गर्भवती महिला बना कर उसका भविष्य जानने लाये थे . परिणाम में पाया  उस के पेट पर बँधे आवरण से लौह- मूसल , उनके वंश-नाश का कारण बनने को  .
भयंकर शाप सुन वे भयभीत हो गये . लौह-मूसल  घिस-घिस कर सागर में बहा दिया.अवशिष्ट ज़रा सी नोक सागर में फेंक दी . 
मूसल की घिसन जल में दूर-दूर तक लहराई, फिर उसी तट आ लगी .
सांब ,अनिरुद्ध ,प्रद्युम्न इस संसार से बिदा हो चुके थे .कृतवर्मा और सात्यकि परस्पर नीचा दिखाने में तत्पर थे .युद्ध-काल की अनीतियों पर एक दूसरे को  धिक्कारने लगे .सारे यादव एकत्र हो गये -अपने अहं और मद्य के नशे में चूर .कोई किसी से कम पड़ने को तैयार नहीं.
सब दूसरे की कलंक-कथा खोलने लगे .उत्तेजना बढ़ती गई.
इतने आवेश में आ गये कि उसी एरका घास को  उखाड़-उखाड़  एक दूसरे पर अंधाधुंध वार करने लगे .
अतिशय मदपान ने सबकी मति हर ली थी .
उस घात से कोई नहीं बच पाया ,सारे यादव-कुल का संहार हो गया .
और दाऊ ?बलराम ?
यादवों के आत्म-विनाश के पश्चात् ,वे अति दुखी हो गये .अंतिम बार उन्हें सागर की ओर जाते देखा गया था ,वे अकेले चले जा रहे थे , लौटते कभी किसी ने नहीं देखा उन्हें .
*
श्री हरि कहाँ हैं ?
एकाकी,संतप्त मन ले निकल गये सघन वनों में छाँह पाने .
श्रान्त हो गये थे - तन से और  मन से भी.
वन-तुलसी की गंध पूरित अरण्य प्रान्तर.अश्वत्थ की शीतल छाया ,लता गुल्मों की एकान्त ओट, दाहिनी जंघा पर वाम पद-तल  टिकाये शिथिल-से अर्ध निमीलित नेत्र, विश्रान्त मुद्रा में टिके हैं तरु के तने से .
 पत्तों की ओट से  झलकता ,अर्द्धचंद्राकार नख-कोर से ईषत् आवृत्त वाम पग का तिरछा अँगुष्ठ हिल-हिल जाता है !
'जरा , ओ आखेटक ,तुम्हें नहीं मालूम यहाँ पुरुषोत्तम आत्मलीन हो विराज रहे हैं ?
तुम्हें कुछ नहीं मालूम  ? 
 अरुण-श्याम अँगूठे में मृग-नेत्र का आभास हो रहा है तुम्हें ?
ओह, कर दिया शर-संधान !
फिर दौड़ा उसी ओर .अपने लक्ष्य की परिणति देखने . 
हाय !
 जरा चीख उठा, ' हाय, मैंने क्या कर डाला ?'
सिर पटकने लगा .
'रुको व्याध ,शान्त होओ !'
'मुझे क्षमा करो स्वामी...हाय, मैं क्या करूँ अब ..मैं पापी कहाँ जाऊँ  ' व्याकुल हो- हो कर विलप रहा है .
 बाण खींच कर निकाला ,हथेली से दबाये हैं कृष्ण रक्त से रंजित अँगूठा .
 व्याध ने शऱ को घुमा-फिरा कर देखा 
वही लौह खंड !याद आ गया उसे  मछली के पेट से जो मिला था .
 'कितना नुकीला ! एकदम घातक.' शर के अग्र-भागके लिये बिलकुल उपयुक्त ,सोच कर रख लिया था उसने.
' आह, इसके अग्र-भाग में वही तीक्ष्ण लौह-खंड ,शर कितना संघातिक हो गया .'
ध्यान से देखा कृष्ण ने .
'तुम केवल निमित्त हो .व्याध ,अपराधी  नहीं तुम . '
'क्या नाम है तुम्हारा ?'
'पापी हूँ मैं ,घोर पापी !मत पूछिये मेरा नाम.....'
वह कुछ सुन नहीं रहा ,कुछ उसकी समझ में नहीं आ रहा ,कहे जा रहा है ,कुछ बोले जा रहा है पगलाया-सा .. 
'शान्त हो ,मैंने क्षमा किया ?'
 'मेरा एक काम है ,पहले नाम बताओ अपना .'
'प्राण दे कर भी करूँगा. स्वामी , जरा नाम है इस पातकी का ..'
उसे समझा-बुझा कर शान्त, किया कृष्ण ने और  तुरंत द्वारका जाकर सूचित करने को कहा.
व्याध दौड़ा चला गया ! 
*
मन जाने कैसा- कैसा हो रहा है .
 अपना  वचन पूरा करने आये हैं अर्जुन !
जब वे  द्वारकापुरी गये थे तब एक कार्य सौंपा था कृष्ण ने ,
बोले थे जनार्दन ,'अभिशप्त हैं हम सब, किसी न किसी रूप में ,'
यादव वंश का भवितव्य घट कर रहेगा , कितना भी कहें, कोई सुनने को तैयार नहीं .,' वे अति गंभीर थे  , 
,' पार्थ ,पुरुष सारे मर-खप जायें तो वृष्णि,और अंधक वंश की इन कुलनारियों की सुध लेना मित्र,इन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देना,संभव है उस समय मैं भी यहाँ न होऊं .'
विस्मय हुआ था पार्थ को ,कैसी बात कर रहे हैं जनार्दन!
'...उनका वह पहलेवाला .सहज जीवन  समाप्त हो चुका है .मदमत्त हो-हो कर मनमानी करते हैं अपने आगे किसी को नहीं गिनते .मद और पारस्परिक अहं .कोई समझने को तैयार नहीं .क्या कहूँ मेरे पुत्र भी उनके साथ उच्छृंखल हो गये .'
अर्जुन क्या बोलें ? 
'कितना भी प्रयत्न करो सब ठीक करने का ,कहीं न कहीं कुछ दोष निकल ही आता है '
' संसार है यह ,बिलकुल सही कौन रह सका है यहाँ ..? '
एक उसाँस भरी कृष्ण ने .
कैसी मनस्थिति है आज .अर्जुन ने कुछ पूछना चाहा ,पर उनकी मुद्रा देख कुछ न कह सके .
'न तुम कहीं जा रहे न मैं ,' पार्थ ने हलका करना चाहा था ,''मैं उन सब का दायित्व लेता हूँ .तुम चिन्तित न हो .'
'आओ,मिल लें मित्र ,फिर तो...'
दोनों मित्र गले मिलते भावाकुल  हो गये थे. 
*
सब कुछ बदल गया है .यादवों का पारस्परिक  विनाश लोगों का भय समाप्त कर गया ,द्वारका  अरक्षित हो गई . इस समृद्धिपूर्ण नगरी पर बाहरवालों की आँखें लगी हैं .
पुर में  सूचना हो गई , कुछ भी ठीक नहीं है .कृष्ण का पूरा  रनिवास प्रस्थान कर रहा है 
पुरजन त्रस्त हो उठे , अपने आश्रय खोज, संबंधियों के पास प्रस्थान करने लगे ,
 अपने वचनानुसार महाधनुर्धारी अर्जुन  परम मित्र की अट्टालिकाओं से  कुलनारियों को सुरक्षित स्थान की और ले जा रहे हैं. जहाँ उन्हें अपनत्व मिल सके ,जीवन  सुविधापूर्वक बीत सके.
अनगिनती रथ राज-महिषियों, सहचरियों के साथ  चलने को ,बहुमूल्य सामग्री रथों पर लाद दी गई. 
सारी व्यवस्था कर प्रस्थान को उद्यत हैं सब . 
रथों के पास जाकर उन्होंने रुक्मिणी ,सत्यभामा ,कालिन्दी जांबवंती ,मित्रविन्दा, नीला, लक्ष्मणा आदि सबसे  बात की उन्हें धीर बँधाया .
मित्र -पत्नियों के  श्री-हत मुख ,शृंगारहीन वेष !
 देख कर इच्छा हो रही थी फफक कर रो पड़ें .किसी तरह संयत किया अपने आप को  .रथ में चढ़ा-चढ़ा कर सारथियों को सावधान किया . 'कहीं अधिक रुकने की आवश्यकता नहीं .कोल-भीलों के आवास से जितनी दूर रहो उतना अच्छा. मार्ग में आभीरों की बस्तियाँ हैं ,धीमे से रथ निकाल लेना -कोई वार्तालाप , कोलाहल हलचल  न हो .'
अनेक रथ चल पड़े .
 निरंतर आगे बढ़ते रहने का आदेश .
मार्ग लंबा ,दुर्गम वन-पर्वतों से संकुल .कोल-भील और वन्य-जातियों से भरा पड़ा  है .पग पग पर भय .
रथ द्वारका से निकल कर अधिकांश वाहन आधा रास्ते भी पार नहीं कर पाये थे. तीर-कमान लिये अधनँग कोल-भीलों  के  समूह के समूह वन मार्गों पर निकल आये .
अर्जुन की भृकुटियाँ तन गईं .इतना साहस ,वन्य जातियों का !
वे झुंड के झुंड शोर मचाते पास आ रहे थे .
अर्जुन ने ललकारा -दूर हट जाओ .अपनी कुशल चाहते हो तो एक पग भी आगे मत बढ़ाना .
पर वे और वेग से आगे बढ़ रहे थे .आगे के रथों को दूसरी ओर मोड़ने का निर्देश देकर पार्थ सन्नद्ध हो गये. वन के निवासियों की उत्तेजनाभरी आवाज़ें ,चीत्कार और पुकार भरी मदोन्मत्त ध्वनियाँ बढ़ती जा रहीं थीं .उन्होंने वेग से रथ हाँकने को कहा .सारे वाहन आगे बढने लगे .
वे  लोग निकट आ गये ,पीछे दौड़ रहे हैं .  
आवाज़ें आ रही हैं 
'ये कितनी-कितनी औरतें रख लेते हैं ?'
'अरे ,इतनी औरतों का तुम क्या करोगे ?हमें भी चाहियें .'
'खूब धन जोड़ा है न ,इसीलिये तो .तरह-तरह की औरतों के बिना मन नहीं भरता .'
' और ये औरतें भी तो ,इनका जी नहीं ऊबता .अरी ,चलो उतरो .हमारे साथ चलो !' 
अर्जुन ने निकल कर टोका ,'नहीं बलात् नहीं ले जा सकते उन्हें .'
'सारे उपदेश हमारे लिये .तुम लोग भी तो अपने भुज-बल से छीन लाते हो ,'
 'ये सारी अपने आप थोड़ी चली आई होंगी ! '
अर्जुन क्या उत्तर दें ?
'अब वे विवाहितायें हैं ,'
'तो का ? कुंआरी हो चाहे बियाही  ,कौनो छूत लग जाती है .ई सब तुम लोगन के चोंचले .' 
दूसरा बोला -
'जान्यो , ,शंबर की पत्नी मायावती भी तो उसकी बियाही थी ,काहे हरण किया था ?'
 '..दूसरों की बेर शिक्षा दे रहे हैं .औरत तो औरत !जो भुजबल से जीत ले उसकी ...'
तीर चलाने लगे वे .
 सारथी घायल हो-हो गिर रहे हैं .
झपट रहे हैं वे लोग .नारियाँ चीत्कार कर रही हैं .
'काहे रोती हो री ,'हम भी आदमी हैं,जानवर थोड़े ही न . ,रक्खेंगे तुम्हें  अपने साथ .'
अर्जुन के तीर चलने लगे .गिरे कुछ लोग, पर वे रुके नहीं .
'छीन लो रे ,ये सीधे देने वाले नहीं .'
दूसरा बोला ,'इनकी कहाँ से हो गईं ,जिसमें ताकत होगी ,उसकी ..'
'चलो री ,उतरो  नीचे .हमारे साथ चलना है तुम्हें .
महिलायें त्रस्त हो कर चीत्कार कर रही हैं.अर्जुन क्रोध से भरे ,ललकार रहे हैं .
चारों ओर से घेर लिये गये हैं .
कुछ वनवासी ,रथों को स्त्रियों सहित हाँके लिये जा रहे  हैं ,
अर्जुन पीछे दौड़ते हैं ,गाँडीव से शर-संधान करते हैं .एकाध कोई गिर भी गया तो दूसरे तैयार .इनके पास जुझारू पुरुष  गिनती के .और वे  तक-तक कर निशाने लगाते हैं उनके तीर औषधियों से सिक्त हैं .लगते ही अपार पीड़ा और मूर्छा .
मौका पाते ही झपटते हैं और स्त्रियों को खींच कर ले भागते हैं .
किस-किस का पीछा करें पार्थ ?जो रथ आगे चले गये हैं उनकी भी चिन्ता .कुशल से पहुँच जायें किसी तरह .
कोल-भील बहुत हैं एकदम जंगली - रुक्ष और कठोर .
अर्जुन का गांडीव प्रभाव खो चुका है .न वह टंकार, न वह वेग !    
पता नहीं रानियों का क्या हाल होगा ?
किसी तरह बच कर निकले अर्जुन .
कुछ वाहन जो आगे निकल गये या शीघ्र पलायन कर गये थे उनकी चिन्ता नहीं की वनवासियों ने .जो सामने थे वही  उन्हें यथेष्ट लगे .उन्हें  घेर लिया .स्त्रियों को ले-ले कर सघन वनों की ओर भाग गये धन-संपदा भी लूट ली उन लोगों ने . 
अवसाद ग्रस्त .अर्जुन .
गांडीव की गरिमा कहाँ खो गई !
उस दिन अर्जुन के तीर व्यर्थ हो गए .इतनी बड़ी भीड़ में एक अकेला योद्धा ! 
किसी तरह प्राण ले कर वहाँ से  निकले .आगे रानियोंवाले रथों की चिन्ता चैन नहीं लेने दे रही !
**
 कृष्ण परमधाम सिधार गये ।
 उदधि हिलक-हिलक कर रो रहा है .उत्ताल तरंगें  उमड़ी चली आ रही हैं  .मन का आवेग नहीं थम रहा , प्रवाह बढ़ा चला आ रहा है .आगे ,द्वारावती से आगे और आगे - कहाँ हैं श्री हरि के चरण !
 एक के ऊपर एक ,चढ़ती लहरें ,उद्दाम वेग जल का -नहीं सागर के खारे आँसू ये !
अधीर सागर उफन रहा है, दुखोद्गार पर संयम खो गया ,दहाड़-दहाड़ कर दिशायें पूर रहा है. 
उस वृक्ष के तल तक चली आईँ व्यथा से बल खाती ,नीली लहरें .चरण परसने को व्याकुल !
 पखार रही हैं वे सुकोमल चरण तल .
वनभूमि में बिखर-बिखर ,सिर टकराती विलपती रहीं विकल लहरियाँ . प्रस्तरखंडों और तरुओं से लिपट-लिपट प्रहरों-प्रहर रोईं .अंततः निढाल हो सागर में जा समाईं.
अश्रु-धाराओं के शेष चिह्न उस वनभूमि में अपना खारापन बो गये .
श्रीकृष्ण की गंभीर  मुद्रा देख सहम गया जलनिधि .
कुछ नहीं कहेंगे वे .परम शान्त हैं ,पुरुषोत्तम !
*
अपनी शैया पर विश्राम हेतु आते होंगे वे ,
और पयोधि ने वह सुन्दर नगरी ,जिसके वैभव का कोई सानी नहीं था अपने अतल जल  में समेट ली .
संसार ने समझा श्री कृष्ण की  द्वारकापुरी सागर में समा गई !
'त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये !'

*
(क्रमशः)
.

12 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक प्रसंग।
    मन भर आया पढ़कर।

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  2. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 30-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-956 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. बहुत बढ़िया मार्मिक प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST,,,इन्तजार,,,

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  4. शकुन्तला बहादुर29 जुलाई 2012 को 2:51 pm

    कृष्ण एवं कृष्णा की मानसिक व्यथा की अभिव्यक्ति अत्यन्त सूक्ष्म
    और चित्रात्मक है।प्रसुप्त मन की अनेक घटनाओं को इस प्रकरण ने
    पुनः स्मृति-वीथी पर ला खड़ा किया है।यदुकुल का विनाश और उसके बाद की घटनाएँ दुःखद एवं मार्मिक हैं।समग्र घटना-क्रम का
    निर्वाह अत्यन्त कुशलता से किया गया है,अतः बोझिल नहीं लगता।
    सराहनीय प्रस्तुति!!

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  5. भावमय करती प्रस्‍तुति ..आभार

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  6. कृष्ण की दरती से विदाई का मारमिक चित्रण ।

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  7. aabhar apke pryatno se adhkhule adhyaay saamne aa rahe hain. yaduvansh k naash aur krishn ji k ant ki marmik prastuti padh man vyathit aur vismit hua.

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  8. अद्भुत...आँखों देखा वर्णन, चलचित्र जैसा...जैसे सबकुछ सामने घटा हो...स्मृति में कौंधकर फिर से याद दिला गया हो...जैसे।

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  9. आपका लेखन धाराप्रवाह रोचक और मार्मिक है.
    कृष्ण पांचाली वार्तालाप अनूठा है.
    कृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक बधाई.

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  10. मन व्यथित हो गया।श्रीकृष्ण को इस रूप में देखा नहीं गया।वे ईश्वर हैं..पुरुषोत्तम हैं...सर्वशक्तिमान हैं..सर्वज्ञ हैं.और उनके कहे अनुसार मेरी भी आत्मा के दुःख से उन्हें ही दुःख पहुंचेगा। किन्तु देह की..मनुष्य के स्वभाव की विवशता है ..कि मैं लाख प्रयत्न करने के बाद भी ये सोचने और चाहने से स्वयं को नहीं रोक पा रही..कि पांचाली के लिए जिस तरह कृष्ण थे..उसी तरह इस मोड़ पर उनके लिए उनके पास श्रीराधा या मैया यशोदा होतीं।पलकें मूँद कर आपके शब्द ओझल कर लिए दृष्टि ने...मन की आँखों का बहना कैसे रोकूँ?

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